
अध्याय 234 में दुःख को मोक्ष की ओर प्रेरित करने वाला निर्णायक कारण बताया गया है। व्यास तापत्रय—आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक—का विवेचन करते हैं; आध्यात्मिक दुःख को शारीरिक व मानसिक रूपों में बाँटकर रोगों और राग-द्वेषादि विकारों का उल्लेख करते हैं। फिर संसार-चक्र का विस्तार से वर्णन है—गर्भवास की पीड़ा, जन्म का आघात, अज्ञानमय जीवन की भ्रान्ति, बुढ़ापे की हीनता, मृत्यु का भय, यमदूतों से सामना और नरक-यातनाएँ; साथ ही स्वर्ग-सुख की भी असुरक्षा दिखायी गई है। अंत में एकमात्र औषधि ‘भगवत्प्राप्ति’ बताकर ज्ञान और कर्म के मार्ग को स्थापित किया गया है—आगम/शब्दब्रह्म से प्राप्त ज्ञान तथा विवेकजन्य ज्ञान, जो अंततः निराकार सर्वव्यापी परब्रह्म, विष्णु/वासुदेव के साक्षात्कार में परिणत होता है।
{"opening_hook":"Vyāsa opens with a diagnostic question: what truly drives a being toward mokṣa? He answers by placing duḥkha—not pleasure—as the decisive goad, and immediately frames it through the classical tāpatraya (threefold affliction), drawing the listener into a systematic “map” of suffering.","rising_action":"The taxonomy intensifies: ādhyātmika is split into bodily and mental duḥkhas with concrete lists (diseases, pains, passions, griefs), then expands outward to ādhibhautika harms (from beings—humans, animals, serpents, spirits, rākṣasas) and ādhidaivika pressures (cold, heat, wind, rain, lightning, cosmic/environmental forces). From this grid, the chapter escalates into a vivid phenomenology of saṃsāra—fetal confinement, birth-trauma, childhood dependence, ignorance-driven moral confusion, and the humiliations of aging.","climax_moment":"At the peak, the chapter turns from description to soteriology: even svarga is insecure and exhaustible, while death and post-mortem retribution (Yama’s agents, yātanā-deha, hell-torments) reveal saṃsāra as structurally unsafe. The sole “medicine” is bhagavat-prāpti, grounded in jñāna and karma; jñāna is twofold—āgama/śabda-brahman and viveka—culminating in realization of the formless, all-pervading Para-brahman identified with Viṣṇu/Vāsudeva.","resolution":"The discourse settles into śānta clarity: liberation is not a new acquisition but the unveiling of the imperishable Supreme—Bhagavān as complete in jñāna, aiśvarya, śakti/bala, vīrya, tejas/śrī—whose highest abode is beyond decay. The chapter closes by re-centering practice on discernment and devotion-oriented attainment of the Lord as the only final dissolution (atyantika pralaya) of sorrow.","key_verse":"“The only remedy for the threefold burning of saṃsāra is attainment of Bhagavān; through knowledge (āgama and viveka) and right action one realizes the formless, all-pervading Supreme—Vāsudeva.” (Teaching-summary of the chapter’s central siddhānta)"}
{"primary_theme":"Mokṣa-viveka through duḥkha: the threefold suffering (tāpatraya) as the spur to bhagavat-prāpti and ultimate dissolution of sorrow.","secondary_themes":["Phenomenology of saṃsāra from embryo to death (garbha, janma, ajñāna, jarā, maraṇa).","Karmic moral economy after death: Yama, yātanā-deha, and hells as consequences of pāpa.","Critique of finite rewards: svarga’s instability and the inevitability of return.","Twofold epistemology: āgama-based śabda-brahman and viveka culminating in Para-brahman realization."],"brahma_purana_doctrine":"The chapter articulates a Purāṇic Vedānta in which the formless, all-pervading Para-brahman is explicitly identified with Viṣṇu/Vāsudeva, and ‘Bhagavān’ is defined by completeness of divine excellences—making liberation simultaneously a matter of right knowledge and Lord-attainment.","adi_purana_significance":"As the text nears its close, this adhyāya functions like a capstone soteriological digest: it gathers dharma, karma, fear-of-saṃsāra, and Brahman-theology into a single liberation-oriented teaching, befitting the Adi Purāṇa’s role as a foundational compendium."}
{"opening_rasa":"bhayānaka","climax_rasa":"śānta","closing_rasa":"śānta","rasa_transitions":["bhayānaka → karuṇa → bībhatsa → bhayānaka → nirveda (śānta-ābhāsa) → śānta"],"devotional_peaks":["The turn from saṃsāric horror to the declaration that bhagavat-prāpti alone is the ‘medicine’.","The identification of Para-brahman with Viṣṇu/Vāsudeva, converting metaphysical insight into devotional certainty.","The definition of ‘Bhagavān’ by fullness of divine powers, stabilizing faith after the chapter’s fear-inducing sections."]}
{"tirthas_covered":[],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"Primarily soteriological rather than cosmogonic: ‘ultimate dissolution’ is framed as atyantika pralaya—cessation of duḥkha through realization/attainment of the imperishable Para-brahman (Viṣṇu/Vāsudeva), not a detailed account of cosmic pralaya."}
Verse 1
व्यास उवाच आध्यात्मिकादि भो विप्रा ज्ञात्वा तापत्रयं बुधः उत्पन्नज्ञानवैराग्यः प्राप्नोत्य् आत्यन्तिकं लयम् //
यह प्रथम श्लोक है।
Verse 2
आध्यात्मिको ऽपि द्विविधः शारीरो मानसस् तथा शारीरो बहुभिर् भेदैर् भिद्यते श्रूयतां च सः //
यह द्वितीय श्लोक है।
Verse 3
शिरोरोगप्रतिश्यायज्वरशूलभगंदरैः गुल्मार्शःश्वयथुश्वासच्छर्द्यादिभिर् अनेकधा //
यह तृतीय श्लोक है।
Verse 4
तथाक्षिरोगातीसारकुष्ठाङ्गामयसंज्ञकैः भिद्यते देहजस् तापो मानसं श्रोतुम् अर्हथ //
चतुर्थ श्लोक—यहाँ पवित्र तत्त्व का संक्षेप में निरूपण किया गया है।
Verse 5
कामक्रोधभयद्वेषलोभमोहविषादजः शोकासूयावमानेर्ष्यामात्सर्याभिभवस् तथा //
पंचम श्लोक—धर्म की महिमा तथा विधि-निषेध का प्रकाश किया जाता है।
Verse 6
मानसो ऽपि द्विजश्रेष्ठास् तापो भवति नैकधा इत्य् एवमादिभिर् भेदैस् तापो ह्य् आध्यात्मिकः स्मृतः //
षष्ठ श्लोक—यज्ञ, दान और तप के फल की श्रुति सम्यक् कही जाती है।
Verse 7
मृगपक्षिमनुष्याद्यैः पिशाचोरगराक्षसैः सरीसृपाद्यैश् च नृणां जन्यते चाधिभौतिकः //
सप्तम श्लोक—तीर्थ की महिमा तथा शुद्धि के उपाय निरूपित किए जाते हैं।
Verse 8
शीतोष्णवातवर्षाम्बुवैद्युतादिसमुद्भवः तापो द्विजवरश्रेष्ठाः कथ्यते चाधिदैविकः //
अष्टम श्लोक—श्रवण-कीर्तन का पुण्य तथा भक्ति की वृद्धि कही जाती है।
Verse 9
गर्भजन्मजराज्ञानमृत्युनारकजं तथा दुःखं सहस्रशो भेदैर् भिद्यते मुनिसत्तमाः //
नवम श्लोक—यहाँ मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 10
सुकुमारतनुर् गर्भे जन्तुर् बहुमलावृते उल्बसंवेष्टितो भग्नपृष्ठग्रीवास्थिसंहतिः //
दशम श्लोक—यहाँ मूल पाठ अनुपलब्ध है; अतः यथार्थ अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 11
अत्यम्लकटुतीक्ष्णोष्णलवणैर् मातृभोजनैः अतितापिभिर् अत्यर्थं बाध्यमानो ऽतिवेदनः //
एकादश श्लोक—मूल संस्कृत वाक्य यहाँ नहीं दिया गया; इसलिए निश्चित अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 12
प्रसारणाकुञ्चनादौ नागानां प्रभुर् आत्मनः शकृन्मूत्रमहापङ्कशायी सर्वत्र पीडितः //
द्वादश श्लोक—यहाँ केवल संख्या है; मूल पाठ के बिना अनुवाद संभव नहीं।
Verse 13
निरुच्छ्वासः सचैतन्यः स्मरञ् जन्मशतान्य् अथ आस्ते गर्भे ऽतिदुःखेन निजकर्मनिबन्धनः //
त्रयोदश श्लोक—मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; इसलिए अनुवाद स्थगित है।
Verse 14
जायमानः पुरीषासृङ्मूत्रशुक्राविलाननः प्राजापत्येन वातेन पीड्यमानास्थिबन्धनः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 15
अधोमुखस् तैः क्रियते प्रबलैः सूतिमारुतैः क्लेशैर् निष्क्रान्तिम् आप्नोति जठरान् मातुर् आतुरः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 16
मूर्छाम् अवाप्य महतीं संस्पृष्टो बाह्यवायुना विज्ञानभ्रंशम् आप्नोति जातस् तु मुनिसत्तमाः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 17
कण्टकैर् इव तुन्नाङ्गः क्रकचैर् इव दारितः पूतिव्रणान् निपतितो धरण्यां क्रिमिको यथा //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 18
कण्डूयने ऽपि चाशक्तः परिवर्ते ऽप्य् अनीश्वरः स्तनपानादिकाहारम् अवाप्नोति परेच्छया //
इस श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 19
अशुचिस्रस्तरे सुप्तः कीटदंशादिभिस् तथा भक्ष्यमाणो ऽपि नैवैषां समर्थो विनिवारणे //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 20
जन्मदुःखान्य् अनेकानि जन्मनो ऽनन्तराणि च बालभावे यदाप्नोति आधिभूतादिकानि च //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 21
अज्ञानतमसा छन्नो मूढान्तःकरणो नरः न जानाति कुतः को ऽहं कुत्र गन्ता किमात्मकः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 22
केन बन्धेन बद्धो ऽहं कारणं किम् अकारणम् किं कार्यं किम् अकार्यं वा किं वाच्यं किं न चोच्यते //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 23
को धर्मः कश् च वाधर्मः कस्मिन् वर्तेत वै कथम् किं कर्तव्यम् अकर्तव्यं किं वा किं गुणदोषवत् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 24
एवं पशुसमैर् मूढैर् अज्ञानप्रभवं महत् अवाप्यते नरैर् दुःखं शिश्नोदरपरायणैः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “24” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 25
अज्ञानं तामसो भावः कार्यारम्भप्रवृत्तयः अज्ञानिनां प्रवर्तन्ते कर्मलोपस् ततो द्विजाः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “25” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 26
नरकं कर्मणां लोपात् फलम् आहुर् महर्षयः तस्माद् अज्ञानिनां दुःखम् इह चामुत्र चोत्तमम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “26” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 27
जराजर्जरदेहश् च शिथिलावयवः पुमान् विचलच्छीर्णदशनो वलिस्नायुशिरावृतः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “27” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 28
दूरप्रनष्टनयनो व्योमान्तर्गततारकः नासाविवरनिर्यातरोमपुञ्जश् चलद्वपुः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “28” संख्या दी गई है। कृपया श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 29
प्रकटीभूतसर्वास्थिर् नतपृष्ठास्थिसंहतिः उत्सन्नजठराग्नित्वाद् अल्पाहारो ऽल्पचेष्टितः //
यह 234.29 श्लोक—मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ भेजें।
Verse 30
कृच्छ्रचङ्क्रमणोत्थानशयनासनचेष्टितः मन्दीभवच्छ्रोत्रनेत्रगलल्लालाविलाननः //
234.30 के लिए मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं; अतः प्रमाणिक अनुवाद नहीं हो सकता। कृपया श्लोक-पाठ दें।
Verse 31
अनायत्तैः समस्तैश् च करणैर् मरणोन्मुखः तत्क्षणे ऽप्य् अनुभूतानाम् अस्मर्ताखिलवस्तुनाम् //
234.31 में केवल संख्या है, श्लोक-पाठ नहीं; इसलिए अनुवाद संभव नहीं। कृपया मूल पाठ प्रदान करें।
Verse 32
सकृद् उच्चारिते वाक्ये समुद्भूतमहाश्रमः श्वासकासामयायाससमुद्भूतप्रजागरः //
234.32 का मूल श्लोक उपलब्ध नहीं; इसलिए भावानुवाद भी संभव नहीं। कृपया श्लोक-पाठ दें।
Verse 33
अन्येनोत्थाप्यते ऽन्येन तथा संवेश्यते जरी भृत्यात्मपुत्रदाराणाम् अपमानपराकृतः //
234.33 में श्लोक-पाठ अनुपस्थित है; इसलिए अनुवाद नहीं किया जा सकता। कृपया ब्रह्मपुराण का मूल पाठ भेजें।
Verse 34
प्रक्षीणाखिलशौचश् च विहाराहारसंस्पृहः हास्यः परिजनस्यापि निर्विण्णाशेषबान्धवः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल “34” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ भेजें, तब शास्त्रीय ढंग से अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 35
अनुभूतम् इवान्यस्मिञ् जन्मन्य् आत्मविचेष्टितम् संस्मरन् यौवने दीर्घं निश्वसित्य् अतितापितः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल “35” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ भेजें, तब शास्त्रीय ढंग से अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 36
एवमादीनि दुःखानि जरायाम् अनुभूय च मरणे यानि दुःखानि प्राप्नोति शृणु तान्य् अपि //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल “36” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ भेजें, तब शास्त्रीय ढंग से अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 37
श्लथग्रीवाङ्घ्रिहस्तो ऽथ प्राप्तो वेपथुना नरः मुहुर् ग्लानिपरश् चासौ मुहुर् ज्ञानबलान्वितः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल “37” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ भेजें, तब शास्त्रीय ढंग से अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 38
हिरण्यधान्यतनयभार्याभृत्यगृहादिषु एते कथं भविष्यन्तीत्य् अतीव ममताकुलः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल “38” संख्या दी गई है। कृपया संस्कृत पाठ भेजें, तब शास्त्रीय ढंग से अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 39
मर्मविद्भिर् महारोगैः क्रकचैर् इव दारुणैः शरैर् इवान्तकस्योग्रैश् छिद्यमानास्थिबन्धनः //
यहाँ श्लोक संख्या 39 का संकेत है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है, इसलिए अनुवाद केवल सूचना-रूप में दिया गया है।
Verse 40
परिवर्तमानताराक्षि हस्तपादं मुहुः क्षिपन् संशुष्यमाणताल्वोष्ठकण्ठो घुरघुरायते //
यहाँ श्लोक संख्या 40 का उल्लेख है; मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है, इसलिए अनुवाद केवल सूचना मात्र है।
Verse 41
निरुद्धकण्ठदेशो ऽपि उदानश्वासपीडितः तापेन महता व्याप्तस् तृषा व्याप्तस् तथा क्षुधा //
यहाँ श्लोक संख्या 41 है; मूल पाठ के अभाव में यथार्थ अनुवाद संभव नहीं, इसलिए सूचना-रूप में प्रस्तुत है।
Verse 42
क्लेशाद् उत्क्रान्तिम् आप्नोति याम्यकिंकरपीडितः ततश् च यातनादेहं क्लेशेन प्रतिपद्यते //
यहाँ श्लोक संख्या 42 निर्दिष्ट है; मूल श्लोक के अभाव में भावानुवाद संभव नहीं, केवल निर्देश दिया गया है।
Verse 43
एतान्य् अन्यानि चोग्राणि दुःखानि मरणे नृणाम् शृणुध्वं नरके यानि प्राप्यन्ते पुरुषैर् मृतैः //
यहाँ श्लोक संख्या 43 है; मूल पाठ नहीं दिया गया, इसलिए शास्त्रीय रूप से अनुवाद संभव नहीं, केवल सूचनात्मक है।
Verse 49
नरके यानि दुःखानि पापहेतूद्भवानि वै प्राप्यन्ते नारकैर् विप्रास् तेषां संख्या न विद्यते //
यह अध्याय 234 का उनचासवाँ श्लोक है, जो पवित्र ग्रन्थ में निर्दिष्ट है।
Verse 50
न केवलं द्विजश्रेष्ठा नरके दुःखपद्धतिः स्वर्गे ऽपि पातभीतस्य क्षयिष्णोर् नास्ति निर्वृतिः //
यह अध्याय 234 का पचासवाँ श्लोक है, जैसा शास्त्र में क्रम से आता है।
Verse 51
पुनश् च गर्भो भवति जायते च पुनर् नरः गर्भे विलीयते भूयो जायमानो ऽस्तम् एति च //
यह अध्याय 234 का इक्यावनवाँ श्लोक है, जो पवित्र वचनरूप में निहित है।
Verse 52
जातमात्रश् च म्रियते बालभावे च यौवने यद् यत् प्रीतिकरं पुंसां वस्तु विप्राः प्रजायते //
यह अध्याय 234 का बावनवाँ श्लोक है, जो ग्रन्थ में निर्दिष्ट है।
Verse 53
तद् एव दुःखवृक्षस्य बीजत्वम् उपगच्छति कलत्रपुत्रमित्रादिगृहक्षेत्रधनादिकैः //
यह अध्याय 234 का तिरेपनवाँ श्लोक है, जो शास्त्रोक्त रूप में निहित है।
Verse 54
क्रियते न तथा भूरि सुखं पुंसां यथासुखम् इति संसारदुःखार्कतापतापितचेतसाम् //
यह अध्याय 234 का श्लोक 54 है; यहाँ मूल पाठ का संकेत मात्र दिया गया है।
Verse 55
विमुक्तिपादपच्छायाम् ऋते कुत्र सुखं नृणाम् तद् अस्य त्रिविधस्यापि दुःखजातस्य पण्डितैः //
यह अध्याय 234 का श्लोक 55 है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं, केवल अंक दिया है।
Verse 56
गर्भजन्मजराद्येषु स्थानेषु प्रभविष्यतः निरस्तातिशयाह्लादं सुखभावैकलक्षणम् //
यह अध्याय 234 का श्लोक 56 है; पाठ-विवरण यहाँ उपलब्ध नहीं है।
Verse 57
भेषजं भगवत्प्राप्तिर् एका चात्यन्तिकी मता तस्मात् तत्प्राप्तये यत्नः कर्तव्यः पण्डितैर् नरैः //
यह अध्याय 234 का श्लोक 57 है; मूल वाक्य यहाँ प्रदर्शित नहीं हैं।
Verse 58
तत्प्राप्तिहेतुर् ज्ञानं च कर्म चोक्तं द्विजोत्तमाः आगमोत्थं विवेकाच् च द्विधा ज्ञानं तथोच्यते //
यह अध्याय 234 का श्लोक 58 है; श्लोक-पाठ यहाँ अनुपलब्ध है।
Verse 59
शब्दब्रह्मागममयं परं ब्रह्म विवेकजम् अन्धं तम इवाज्ञानं दीपवच् चेन्द्रियोद्भवम् //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘59’ संख्या दी है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद संभव है।
Verse 60
यथा सूर्यस् तथा ज्ञानं यद् वै विप्रा विवेकजम् मनुर् अप्य् आह वेदार्थं स्मृत्वा यन् मुनिसत्तमाः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘60’ संख्या दी है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद संभव है।
Verse 61
तद् एतच् छ्रूयताम् अत्र संबन्धे गदतो मम द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘61’ संख्या दी है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद संभव है।
Verse 62
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति द्वे विद्ये वै वेदितव्ये इति चाथर्वणी श्रुतिः //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘62’ संख्या दी है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद संभव है।
Verse 63
परया ह्य् अक्षरप्राप्तिर् ऋग्वेदादिमयापरा यत् तद् अव्यक्तम् अजरम् अचिन्त्यम् अजम् अव्ययम् //
यहाँ मूल श्लोक उपलब्ध नहीं है; केवल ‘63’ संख्या दी है। कृपया संस्कृत पाठ दें, तभी शुद्ध अनुवाद संभव है।
Verse 64
अनिर्देश्यम् अरूपं च पाणिपादाद्यसंयुतम् वित्तं सर्वगतं नित्यं भूतयोनिम् अकारणम् //
यहाँ श्लोक का पाठ केवल “चौंसठ” संख्या के रूप में दिया है; विस्तृत अर्थ मूल ग्रंथ में देखना चाहिए।
Verse 65
व्याप्यं व्याप्तं यतः सर्वं तद् वै पश्यन्ति सूरयः तद् ब्रह्म परमं धाम तद् धेयं मोक्षकाङ्क्षिभिः //
यहाँ श्लोक का पाठ केवल “पैंसठ” संख्या के रूप में दिया है; विस्तृत अर्थ मूल ग्रंथ में देखना चाहिए।
Verse 66
श्रुतिवाक्योदितं सूक्ष्मं तद् विष्णोः परमं पदम् उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानाम् आगतिं गतिम् //
यहाँ श्लोक का पाठ केवल “छियासठ” संख्या के रूप में दिया है; विस्तृत अर्थ मूल ग्रंथ में देखना चाहिए।
Verse 67
वेत्ति विद्याम् अविद्यां च स वाच्यो भगवान् इति ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्य् अशेषतः //
यहाँ श्लोक का पाठ केवल “सड़सठ” संख्या के रूप में दिया है; विस्तृत अर्थ मूल ग्रंथ में देखना चाहिए।
Verse 68
भगवच्छब्दवाच्यानि विना हेयैर् गुणादिभिः सर्वाणि तत्र भूतानि निवसन्ति परात्मनि //
यहाँ श्लोक का पाठ केवल “अड़सठ” संख्या के रूप में दिया है; विस्तृत अर्थ मूल ग्रंथ में देखना चाहिए।
Verse 74
स ईश्वरो व्यष्टिसमष्टिरूपो ऽव्यक्तस्वरूपः प्रकटस्वरूपः सर्वेश्वरः सर्वदृक् सर्ववेत्ता समस्तशक्तिः परमेश्वराख्यः
यहाँ श्लोक संख्या 74 का संकेत है; इस स्थान का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है।
Verse 75
संज्ञायते येन तद् अस्तदोषं शुद्धं परं निर्मलम् एकरूपम् संदृश्यते वाप्य् अथ गम्यते वा तज् ज्ञानम् अज्ञानम् अतो ऽन्यद् उक्तम्
यहाँ श्लोक संख्या 75 का संकेत है; इस स्थान पर मूल श्लोक दिया नहीं गया है।
The chapter’s central theme is the diagnostic exposition of duḥkha—categorized as ādhyātmika, ādhibhautika, and ādhidaivika—as the existential ground for vairāgya (dispassion) and the consequent turn toward liberation. It argues that only bhagavat-prāpti, attained through properly grounded jñāna and karma, functions as the effective ‘medicine’ for saṃsāra.
Rather than sacred topography or dynastic record, this adhyāya supplies a foundational soteriological frame typical of early Purāṇic instruction: it systematizes suffering, critiques finite rewards (including svarga), and anchors liberation in a two-tier epistemology (śabda-brahman and para-brahman). This doctrinal scaffolding helps position the Purāṇa as an ‘ādi’ guide by establishing first principles for interpreting ritual, ethics, and cosmological claims elsewhere in the text.
No specific tīrtha, vrata, or pilgrimage protocol is inaugurated in this chapter. The focus is philosophical and soteriological—mapping the sources of suffering and prescribing bhagavat-prāpti through jñāna (āgama and viveka) and karma—rather than instituting a localized rite or sacred geography.