अशुचिस्रस्तरे सुप्तः कीटदंशादिभिस् तथा भक्ष्यमाणो ऽपि नैवैषां समर्थो विनिवारणे //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।