विमुक्तिपादपच्छायाम् ऋते कुत्र सुखं नृणाम् तद् अस्य त्रिविधस्यापि दुःखजातस्य पण्डितैः //
यह अध्याय 234 का श्लोक 55 है; मूल श्लोक यहाँ उपलब्ध नहीं, केवल अंक दिया है।