Adhyaya 38
Sabha ParvaAdhyaya 3836 Verses

Adhyaya 38

Śiśupāla-vākya: Bhīṣma-nindā and the ‘Haṃsa’ Exemplum (शिशुपालवाक्यम् — भीष्मनिन्दा, हंसदृष्टान्तः)

Upa-parva: Rājasūya-parva (Imperial Consecration Episode) — Śiśupāla’s Censure of Bhīṣma

Chapter 38 presents Śiśupāla’s extended address in the royal assembly, directed primarily against Bhīṣma’s endorsement and praise of Kṛṣṇa. The discourse proceeds in layered rhetorical moves: (1) direct invective against Bhīṣma for allegedly intimidating kings and for speaking ‘apeta-dharma’ (departing from dharma); (2) systematic minimization and re-interpretation of Kṛṣṇa’s famed deeds, reframing them as non-extraordinary; (3) normative claims about non-violence toward protected categories (women, cows, brāhmaṇas, and those who provide food or seek refuge), used to argue that Kṛṣṇa is unworthy of praise; (4) a targeted moral impeachment of Bhīṣma via the Amba precedent and accusations regarding the coherence of Bhīṣma’s vow and ethical authority; (5) an illustrative exemplum: the tale of a ‘dharmavāg’ (one who speaks dharma) hamsa who secretly consumes others’ eggs, leading to collective retaliation—used as an analogy warning that rulers may similarly turn against a hypocritical moralizer. The chapter concludes by invoking a gāthā (traditional verse) that contrasts inner disposition with outward speech, emphasizing that impure action can exceed and invalidate proclamations of virtue.

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में शिशुपाल कृष्ण-पूजा पर कटु आक्षेप करता है; युधिष्ठिर उसे रोककर मर्यादा और नीति की सीमा याद दिलाते हैं। → शिशुपाल की वाणी ‘पारुष्य’ और ‘निरर्थक’ बनती जाती है; सभा में धर्म-निर्णय का प्रश्न उठता है—क्या भीष्म जैसे धर्मज्ञ ने भूल की है? युधिष्ठिर और फिर भीष्म, दोनों शिशुपाल के आरोपों को असंगत ठहराते हैं। → भीष्म कृष्ण की सर्वोच्चता का तर्क-स्तवन करते हैं—जगत की दिशाओं-विदिशाओं, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्रों और समस्त गतियों का ‘मुख’ केशव हैं; धर्म का सूक्ष्म विवेचन करने वाला बुद्धिमान वही देखता है जो शिशुपाल नहीं देख पाता। → भीष्म अपने अनुभव-श्रवण और सत्संग-प्रमाण से कृष्ण के अनन्त गुणों का प्रतिपादन करते हैं और शिशुपाल की आपत्ति को अधर्म, अज्ञान और दुराग्रह का फल बताते हैं; सभा में कृष्ण-पूजा का औचित्य दृढ़ होता है। → शिशुपाल का अपमान-क्रोध शांत नहीं होता; उसकी हठधर्मिता आगे टकराव की भूमिका बनाती है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ प्रात छा अर: अष्टात्रिशो& ध्याय: युधिष्ठिरका शिशुपालको समझाना और भीष्मजीका उसके आक्षेपोंका उत्तर देना वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्ठटिरो राजा शिशुपालमुपाद्रवत्‌ । उवाच चैन मधुरं सान्त्वपूर्वमिदं वच:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिर शिशुपालके समीप दौड़े गये और उसे शान्तिपूर्वक समझाते हुए मधुर वाणीमें बोले--

Vaiśampāyana said: Then King Yudhiṣṭhira hurried toward Śiśupāla. With gentle, conciliatory intent, he spoke these words in a sweet and calming tone—seeking to restrain harsh speech and preserve the dignity of the assembly.

Verse 2

नेदं युक्ते महीपाल यादृशं वै त्वमुक्तवान्‌ | अधर्मश्न परो राजन्‌ पारुष्यं च निरर्थकम्‌,“राजन! तुमने जैसी बात कह डाली है, वह कदापि उचित नहीं है। किसीके प्रति इस प्रकार व्यर्थ कठोर बातें कहना महान्‌ अधर्म है

Vaiśampāyana said: “O king, what you have spoken is by no means proper. To hurl pointless harsh words at another is a grave breach of dharma.”

Verse 3

न हि धर्म परं जातु नावबुध्येत पार्थिव: । भीष्म: शान्तनवस्त्वेनं मावमंस्थास्त्वमन्यथा,'शान्तनुनन्दन भीष्मजी धर्मके तत्त्वको न जानते हों ऐसी बात नहीं है, अतः तुम इनका अनादर न करो

Vaiśampāyana said: “A king devoted to dharma would never, at any time, be ignorant of what dharma truly is. Bhīṣma, the son of Śāntanu, understands it; therefore do not treat him with contempt or disregard—do not behave otherwise.”

Verse 4

पश्य चैतान्‌ महीपालांस्त्वत्तो वृद्धतरान्‌ बहून्‌ । मृष्यन्ते चार्हणां कृष्णे तद्वत्‌ त्वं क्षन्तुमहसि,“देखो! ये सभी नरेश, जिनमेंसे कई तो तुम्हारी अपेक्षा बहुत बड़ी अवस्थाके हैं, श्रीकृष्णकी अग्रपूजाको चुपचाप सहन कर रहे हैं, इसी प्रकार तुम्हें भी इस विषयमें कुछ नहीं बोलना चाहिये

“Look at these kings—many of them older and more senior than you. They are quietly enduring the honor of foremost worship being offered to Kṛṣṇa. In the same way, you too ought to bear it and refrain from speaking against it.”

Verse 5

वेद तत्त्वेन कृष्णं हि भीष्मश्वेदिपते भशम्‌ नहोन त्वं तथा वेत्थ यथैनं वेद कौरव:,“चेदिराज! भगवान्‌ श्रीकृष्णको यथार्थरूपसे हमारे पितामह भीष्मजी ही जानते हैं। कुरुनन्दन भीष्मजीको उनके तत्त्वका जैसा ज्ञान है, वैसा तुम्हें नहीं है!

Vaiśampāyana said: “O lord of the Śvetis (king of Cedi), Bhīṣma truly knows Kṛṣṇa in his real nature, and knows him deeply. You do not know him in that same way as the Kaurava (Bhīṣma) knows him.”

Verse 6

भीष्म उवाच नास्मै देयो हानुनयो नायमर्हति सान्त्वनम्‌ | लोकवृद्धतमे कृष्णे यो$र्हणां नाभिमन्यते,भीष्मजीने कहा--धर्मराज! भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्‌में सबसे बढ़कर हैं । वे ही परम पूजनीय हैं। जो उनकी अग्रपूजा स्वीकार नहीं करता है, उसकी अनुनय-विनय नहीं करनी चाहिये। वह सान्त्वना देने या समझाने-बुझानेके योग्य भी नहीं है

Bhishma said: “No conciliation or submissive entreaty should be offered to this man; he does not deserve to be soothed or persuaded. For when Krishna—the most eminent and venerable in all the world—is present, whoever does not acknowledge the honor due to him is unfit to be placated.”

Verse 7

क्षत्रिय: क्षत्रियं जित्वा रणे रणकृतां वर: । यो मुज्चति वशे कृत्वा गुरुर्भवति तस्य सः,जो योद्धाओंमें श्रेष्ठ क्षत्रिय जिसे युद्धमें जीतकर अपने वशमें करके छोड़ देता है, वह उस पराजित क्षत्रियके लिये गुरुतुल्य पूज्य हो जाता है

Bhīṣma said: “Among warriors, the finest is that kṣatriya who, having defeated another kṣatriya in battle and brought him under his power, then releases him. For the vanquished man, such a victor becomes worthy of reverence—like a teacher—because his strength is governed by restraint and dharma.”

Verse 8

अस्यां हि समितौ राज्ञामेकमप्यजितं युधि । न पश्यामि महीपाल सात्वतीपुत्रतेजसा,राजाओंके इस समुदायमें एक भी भूपाल ऐसा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें देवकीनन्दन श्रीकृष्णके तेजसे परास्त न हो चुका हो

Bhīṣma said: “In this assembly of kings, O lord of the earth, I do not see even a single ruler who has not been overcome in battle by the splendor and might of the Sātvata’s son (Kṛṣṇa).”

Verse 9

न हि केवलमस्माकमयमर्च्यतमो<च्युत: । त्रयाणामपि लोकानामर्चनीयो महाभुज:,महाबाहु श्रीकृष्ण केवल हमारे लिये ही परम पूजनीय हों, ऐसी बात नहीं है, ये तो तीनों लोकोंके पूजनीय हैं

Bhīṣma said: “It is not only for us that this Acyuta is the most worthy of worship. The mighty-armed one is to be revered by all the three worlds.”

Verse 10

कृष्णेन हि जिता युद्धे बहव: क्षत्रियर्षभा: । जगत्‌ सर्व च वार््ष्णेये निखिलेन प्रतिक्ठितम्‌,श्रीकृष्णके द्वारा संग्राममें अनेक क्षत्रियशिरोमणि परास्त हुए हैं | यह सम्पूर्ण जगत्‌ वृष्णिकुलभूषण भगवान्‌ श्रीकृष्णमें ही पूर्णरूपसे प्रतिष्ठित है

Bhīṣma said: “Indeed, in battle many bull-like leaders among the kṣatriyas have been conquered by Kṛṣṇa. And this entire world, without remainder, stands established in Vārṣṇeya (Kṛṣṇa)—as if resting upon him.”

Verse 11

तस्मात्‌ सत्स्वपि वृद्धेषु कृष्णमर्चाम नेतरान्‌ । एवं वक्तुं न चार्हस्त्वं मा ते भूद्‌ बुद्धिरीदृशी,इसीलिये हम दूसरे वृद्ध पुरुषोंके होते हुए भी श्रीकृष्णकी ही पूजा करते हैं, दूसरोंकी नहीं । राजन! तुम्हें श्रीकृष्णके प्रति वैसी बातें मुँहसे नहीं निकालनी चाहिये थीं। उनके प्रति तुम्हें ऐसी बुद्धि नहीं रखनी चाहिये

Therefore, even though venerable elders are present, we worship Kṛṣṇa alone and not others. O King, you ought not to have spoken such words about Kṛṣṇa; let not such a notion arise in your mind toward him.

Verse 12

ज्ञानवृद्धा मया राजन्‌ बहव: पर्युपासिता: । तेषां कथयतां शौरेरहं गुणवतो गुणान्‌

Bhīṣma said: “O King, I have long attended upon many elders rich in wisdom. From their accounts, I have heard and understood the virtues of Śauri—how the truly virtuous are known by their qualities.”

Verse 13

कर्माण्यपि च यान्यस्य जन्मप्रभूति धीमत:ः

Bhīṣma said: “And also the deeds of this wise one—those performed from the very time of his birth onward—are to be recounted and considered.”

Verse 14

न केवल वयं कामाच्चेदिराज जनार्दनम्‌,चेदिराज! हमलोग किसी कामनासे, अपना सम्बन्धी मानकर अथवा इन्होंने हमारा किसी प्रकारका उपकार किया है, इस दृष्टिसे श्रीकृष्णकी पूजा नहीं कर रहे हैं। हमारी दृष्टि तो यह है कि ये इस भूमण्डलके सभी प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाले हैं और बड़े-बड़े संत- महात्माओंने इनकी पूजा की है

Bhīṣma said: “O king of Cedi! We do not honor Janardana merely out of desire. Nor do we worship Śrī Kṛṣṇa because we regard him as a kinsman, or because he has done us some personal favor. Our view is this: he is a benefactor who brings well-being to all living beings upon this earth, and he has been revered by great sages and noble souls.”

Verse 15

न सम्बन्ध॑ पुरस्कृत्य कृतार्थ वा कथंचन । अर्चामहेअ<र्चितं सद्धिर्भुवि भूतसुखावहम्‌,चेदिराज! हमलोग किसी कामनासे, अपना सम्बन्धी मानकर अथवा इन्होंने हमारा किसी प्रकारका उपकार किया है, इस दृष्टिसे श्रीकृष्णकी पूजा नहीं कर रहे हैं। हमारी दृष्टि तो यह है कि ये इस भूमण्डलके सभी प्राणियोंको सुख पहुँचानेवाले हैं और बड़े-बड़े संत- महात्माओंने इनकी पूजा की है

Bhīṣma said: “O king of Chedi, we do not worship Kṛṣṇa because of any personal tie, nor because he has rendered us some favor in any way. We honor him because, on this earth, he is a source of well-being for all creatures, and because the noble and saintly have already revered him.”

Verse 16

यश: शौर्य जयं चास्य विज्ञायार्चा प्रयुड्ज्महे । न च कश्चिदिहास्माभि: सुबालो<प्यपरीक्षित:,हम इनके यश, शौर्य और विजयको भलीभाँति जानकर इनकी पूजा कर रहे हैं । यहाँ बैठे हुए लोगोंमेंसे कोई छोटा-सा बालक भी ऐसा नहीं है, जिसके गुणोंकी हमलोगोंने पूर्णतः परीक्षा न की हो

Knowing well his fame, valor, and victories, we offer him worship and honor. And here in this assembly there is no one—not even a little child—whose merits we have not fully tested.

Verse 17

गुणै्वद्धानतिक्रम्य हरिरच्यतमो मतः । ज्ञानवृद्धो द्विजातीनां क्षत्रियाणां बलाधिक:,श्रीकृष्णके गुणोंको ही दृष्टिमें रखते हुए हमने वयोवृद्ध पुरुषोंका उल्लंघन करके इनको ही परम पूजनीय माना है। ब्राह्मणोंमें वही पूजनीय समझा जाता है, जो ज्ञानमें बड़ा हो तथा क्षत्रियोंमें वही पूजाके योग्य हैं, जो बलमें सबसे अधिक हो

Considering his excellence in virtues, we have set aside mere seniority and regarded Hari (Śrī Kṛṣṇa) as the most worthy of honor. Among the twice-born, the one superior in knowledge is held most venerable; among kṣatriyas, the one surpassing others in strength is deemed most fit for reverence.

Verse 18

वैश्यानां धान्यधनवाउुछूद्राणामेव जन्मत: । पूज्यतायां च गोविन्दे हेतू द्वावपि संस्थितौ,वैश्योंमें वही सर्वमान्य है, जो धन-धान्यमें बढ़कर हो, केवल शूद्रोंमें ही जन्मकालको ध्यानमें रखकर जो अवस्थामें बड़ा हो, उसको पूजनीय माना जाता है । श्रीकृष्णके परम पूजनीय होनेमें दोनों ही कारण विद्यमान हैं

Among the Vaiśyas, the one who surpasses others in grain and wealth is regarded as most worthy of honor. Among the Śūdras, honor is accorded chiefly on the basis of birth—especially seniority by age. In Govinda’s supreme venerability, both grounds are present.

Verse 19

वेदवेदाड्भरविज्ञानं बल॑ चाभ्यधिकं तथा । नृणां लोके हि को<न्यो<स्ति विशिष्ट: केशवादृते,इनमें वेद-वेदांगोंका ज्ञान तो है ही, बल भी सबसे अधिक है। श्रीकृष्णके सिवा संसारके मनुष्योंमें दूसरा कौन सबसे बढ़कर है?

He possesses the weighty mastery of the Vedas and the Vedāṅgas, and his strength too is surpassing. Indeed, among men in this world, who else is pre-eminent—apart from Keśava (Kṛṣṇa)?

Verse 20

दान॑ दाक्ष्यं श्रुतं शौर्य ह्वी: कीर्तिबिद्धिरुत्तमा । सन्नति:ः श्रीर्ध॑तिस्तुष्टि: पुष्टिश्न नियताच्युते,दान, दक्षता; शास्त्रज्ञान, शौर्य, लज्जा, कीर्ति, उत्तम बुद्धि, विनय, श्री, धृति, तुष्टि और पुष्टि --ये सभी सदगुण भगवान्‌ श्रीकृष्णमें नित्य विद्यमान हैं

Charity, skill, learning of the sacred lore, valor, modesty, fame, highest wisdom, humility, splendor, steadfastness, contentment, and flourishing strength—all these noble virtues abide eternally in Acyuta (Śrī Kṛṣṇa).

Verse 21

तमिमं गुणसम्पन्नमार्य च पितरं गुरुम्‌ । अर्घ्यमर्चितमर्चहिं सर्वे संक्षन्तुमर्हथ,जो अर्घ्य पानेके सर्वथा योग्य और पूजनीय है, उन सकलगुणसम्पन्न, श्रेष्ठ पिता और गुरु भगवान्‌ श्रीकृष्णकी हमलोगोंने पूजा की है, अतः सब राजालोग इसके लिये हमें क्षमा करें

Bhīṣma said: “We have offered worship to this noble father and teacher, endowed with every virtue—one wholly worthy to receive the arghya and to be honored. Therefore, let all the kings forgive us for this act.”

Verse 22

ऋतच्विग्‌ गुरुस्तथा5<चार्य: स्नातको नृपति:ः प्रिय: । सर्वमेतद्धृषीकेशस्तस्मादशभ्यर्चितो<च्युत:,श्रीकृष्ण हमारे ऋत्विक्‌, गुरु, आचार्य, स्नातक, राजा और प्रिय मित्र सब कुछ हैं। इसीलिये हमने इनकी अग्रपूजा की है

Bhīṣma said: “Kṛṣṇa—Hṛṣīkeśa—is for us everything: the officiating priest, the venerable teacher, the preceptor, the learned graduate, the king, and the beloved friend. Therefore, O Acyuta, he has been honored by us with the foremost worship.”

Verse 23

कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्यय: । कृष्णस्य हि कृते विश्वमिदं भूतं चराचरम्‌,भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। यह सारा चराचर विश्व इन्हींके लिये प्रकट हुआ है

Bhīṣma declares that Kṛṣṇa alone is the source from which all worlds arise and the final refuge into which they dissolve. This entire moving and unmoving universe has manifested with Him as its ultimate purpose and ground.

Verse 24

एष प्रकृतिरव्यक्ता कर्ता चैव सनातन: । परश्न सर्वभूते भ्यस्तस्मात्‌ पूज्यतमो<च्युत:,ये ही अव्यक्त प्रकृति, सनातन कर्ता तथा सम्पूर्ण भूतोंसे परे हैं; अतः भगवान्‌ अच्युत ही सबसे बढ़कर पूजनीय हैं

Bhīṣma declares that the unmanifest Prakṛti is the primordial basis, and that there is also the eternal doer beyond it. Since the Supreme stands transcendent to all beings, Acyuta is therefore the most worthy of worship.

Verse 25

बुद्धिर्मनो महद्‌ वायुस्तेजो5म्भ: खं मही च या । चतुर्विधं च यद्‌ भूत॑ं सर्व कृष्णे प्रतेष्ठितम्‌,महत्तत्त्व, अहंकार, मनसहित ग्यारह इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी तथा जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्धिज्ज--ये चार प्रकारके प्राणी भगवान्‌ श्रीकृष्णमें ही प्रतिष्ठित हैं

Bhīṣma said: Intelligence, mind, the great principle, wind, fire, water, space, and earth—and all beings of the fourfold kinds—are all established in Kṛṣṇa.

Verse 26

आदित्यश्रन्द्रमाश्नैव नक्षत्राणि ग्रहाश्ष ये दिशश्न विदिशश्चैव सर्व कृष्णे प्रतेष्ठितम्‌,सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अनिनिहोत्रकर्म, हन्‍्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्‌के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं

Bhīṣma declares that the Sun and the Moon, the constellations and the planets, and all directions and intermediate directions are established in Kṛṣṇa. In ethical and devotional terms, he presents Kṛṣṇa as the supreme ground of order and excellence: just as certain realities are regarded as foremost within their own domains, so too among all supports of the worlds—above and below, to the right and left—Kṛṣṇa is the highest refuge and the greatest.

Verse 27

अग्निहोत्रमुखा वेदा गायत्री छन्दसां मुखम्‌ । राजा मुखं मनुष्याणां नदीनां सागरो मुखम्‌,सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अनिनिहोत्रकर्म, हन्‍्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्‌के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं

Bhīṣma said: “The Vedas have the Agnihotra as their foremost rite; among metres, Gāyatrī is foremost. Among men, the king is the chief; among rivers and waters, the ocean is the chief. The sun, the moon, the constellations, the planets, the directions and the intermediate directions—all are established within that cosmic order. Just as Agnihotra among Vedic acts, Gāyatrī among metres, the king among humans, the ocean among waters, the moon among the stars, the sun among luminous beings, Meru among mountains, and Garuḍa among birds are regarded as supreme—so too, in all worlds together with the realm of the gods, in every support of the universe in all orientations, Bhagavān Śrī Kṛṣṇa alone is the supreme.”

Verse 28

नक्षत्राणां मुखं चन्द्र आदित्यस्तेजसां मुखम्‌ । पर्वतानां मुखं मेरुर्गरुड: पततां मुखम्‌,सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अनिनिहोत्रकर्म, हन्‍्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्‌के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं

Bhīṣma said: “Among the stars, the Moon is foremost; among luminous beings, the Sun is foremost. Among mountains, Meru is foremost; among those that fly, Garuḍa is foremost.” By this chain of exemplars, he underscores a moral principle: in every class of beings there is a recognized summit, and likewise, across all worlds and supports of the cosmos, the Supreme Lord (identified here in the surrounding passage as Śrī Kṛṣṇa) is to be regarded as the highest refuge and excellence.

Verse 29

ऊर्ध्व॑ तिर्यगधश्चैव यावती जगतो गति: । सदेवकेषु लोकेषु भगवान्‌ केशवो मुखम्‌,सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, दिशा और विदिशा सब उन्हींमें स्थित हैं। जैसे वेदोंमें अनिनिहोत्रकर्म, हन्‍्दोंमें गायत्री, मनुष्योंमें राजा, नदियों (जलाशयों)-में समुद्र, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, तेजोमय पदार्थोंमें सूर्य, पर्वतोंमें मेरु और पक्षियोंमें गरुड श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार देवलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें ऊपर-नीचे, दायें-बायें, जितने भी जगत्‌के आश्रय हैं, उन सबमें भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही श्रेष्ठ हैं

Bhīṣma said: In whatever direction the world moves—upward, sideways, or downward—through all realms together with the gods, the Blessed Keśava stands as the foremost. The sun, the moon, the constellations and planets, the quarters and the intermediate directions—all are established in Him. Just as among Vedic rites the Agnihotra is eminent, among metres the Gāyatrī, among men the king, among waters the ocean, among the stars the moon, among luminous bodies the sun, among mountains Meru, and among birds Garuḍa—so too, in all worlds including the divine, among every support and refuge of existence in every direction, Śrī Kṛṣṇa alone is supreme.

Verse 30

[भगवान्‌ नारायणकी महिमा और उनके द्वारा मधु-कैटभका वध] (वैशग्पायन उवाच ततो भीष्मस्य तच्छुत्वा वच: काले युधिष्ठिर: । उवाच मतिमान्‌ भीष्म ततः कौरवनन्दन: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर भीष्मजीका वह समयोचित वचन सुनकर कौरवनन्दन बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरने उनसे इस प्रकार कहा। युधिछिर उवाच विस्तरेणास्य देवस्य कर्माणीच्छामि सर्वश: । श्रोतुं भगवतस्तानि प्रब्रवीहि पितामह ।। कर्मणामानुपूर्व्य च प्रादुर्भावांश्व॒ मे विभो: । यथा च प्रकृति: कृष्णे तन्मे ब्रूहि पितामह ।। युधिष्ठिर बोले--पितामह! मैं इन भगवान्‌ श्रीकृष्णके सम्पूर्ण चरित्रोंको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप उन्हें कृपापूर्वक बतावें। पितामह! भगवान्‌के अवतारों और चरित्रोंका क्रमश: वर्णन कीजिये। साथ ही मुझे यह भी बताइये कि श्रीकृष्णका शील- स्वभाव कैसा है? वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तदा भीष्म: प्रोवाच भरतर्षभम्‌ | युधिष्ठिरममित्रघ्नं तस्मिन्‌ क्षत्रसमागमे ।। समक्ष वासुदेवस्य देवस्येव शतक्रतो: । कर्माण्यसुकराण्यन्यैराचचक्षे जनाधिप ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर भीष्मने राजाओंके उस समुदायमें देवराज इन्द्रके समान सुशोभित होनेवाले भगवान्‌ वासुदेवके सामने ही शत्रुहन्ता भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिससे भगवान्‌ श्रीकृष्णके अलौकिक कर्मोका, जिन्हें दूसरा कोई कदापि नहीं कर सकता, वर्णन किया। शृण्वतां पार्थिवानां च धर्मराजस्य चान्तिके । इदं मतिमतां श्रेष्ठ: कृष्णं प्रति विशाम्पते ।। साम्नैवामन्त्र्य राजेन्द्र चेदिराजमरिंदमम्‌ | भीमकर्मा ततो भीष्मो भूय: स इदमब्रवीत्‌ ।। कुरूणां चापि राजानं युधिछिरमुवाच ह । धर्मराजके समीप बैठे हुए सम्पूर्ण नरेश उनकी यह बात सुन रहे थे। राजन! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भीमकर्मा भीष्मने शत्रुदमन चेदिराज शिशुपालको सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें ही समझाकर कुरुराज युधिष्ठिरसे पुनः: इस प्रकार कहना आरम्भ किया। भीष्म उवाच वर्तमानामतीतां च शृणु राजन्‌ युधिष्छिर । ईश्वरस्योत्तमस्यैनां कर्मणां गहनां गतिम्‌ । भीष्म बोले--राजा युधिष्ठिर! पुरुषोत्तम भगवान्‌ श्रीकृष्णके दिव्य कर्मोकी गति बड़ी गहन है। उन्होंने पूर्वकालमें और इस समय भी जो महान्‌ कर्म किये हैं, उन्हें बताता हूँ; सुनो। अव्यक्तो व्यक्तलिड्रस्थो य एष भगवान्‌ प्रभु: ।। पुरा नारायणो देव: स्वयम्भू: प्रपितामह: । ये सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ अव्यक्त होते हुए भी व्यक्त स्वरूप धारण करके स्थित हैं। पूर्वकालमें ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही नारायणरूपमें स्थित थे। ये ही स्वयम्भू एवं सम्पूर्ण जगतके प्रपितामह हैं। सहस्रशीर्ष: पुरुषो ध्रुवो5व्यक्त: सनातन: ।। सहस्राक्ष: सहस्रास्य: सहस्रचरणो विभु: । सहस्रबाहु: साहस्रो देवो नामसहस््रवान्‌ ।। इनके सहस्रों मस्तक हैं। ये ही पुरुष, ध्रुव, अव्यक्त एवं सनातन परमात्मा हैं। इनके सहसौरों नेत्र, सहस्रों मुख और सहस्रों चरण हैं। ये सर्वव्यापी परमेश्वर सहस्रों भुजाओं, सहसीरों रूपों और सहस्ौरों नामोंसे युक्त हैं। सहस्रमुकुटो देवो विश्वरूपो महाद्युति: । अनेकवर्णों देवादिरव्यक्ताद्‌ वै परे स्थित: ।। इनके मस्तक सहसोीरों मुकुटोंसे मण्डित हैं। ये महान्‌ तेजस्वी देवता हैं। सम्पूर्ण विश्व इन्हींका स्वरूप है। इनके अनेक वर्ण हैं। ये देवताओंके भी आदि कारण हैं और अव्यक्त प्रकृतिसे परे (अपने सच्चिदानन्दघन स्वरूपमें स्थित) हैं। असृजत्‌ सलिल पूर्व स च नारायण: प्रभु: । ततस्तु भगवांस्तोये ब्रह्माणमसृजत्‌ स्वयम्‌ ।। उन्हीं सामर्थ्यवान्‌ भगवान्‌ नारायणने सबसे पहले जलकी सृष्टि की है। फिर उस जलमें उन्होंने स्वयं ही ब्रह्माजीको उत्पन्न किया। ब्रह्मा चतुर्मुखो लोकान्‌ सर्वास्तानसृजत्‌ स्वयम्‌ । आदिकाले पुरा होवं॑ सर्वलोकस्य चोद्धव: ।। ब्रह्माजीके चार मुख हैं। उन्होंने स्वयं ही सम्पूर्ण लोकोंकी सृष्टि की है। इस प्रकार आदिकालमें समस्त जगत्‌की उत्पत्ति हुई। पुराथ प्रलये प्राप्ते नष्टे स्थावरजड़मे । ब्रह्मादिषु प्रलीनेषु नष्टे लोके चराचरे ।। फिर प्रलयकाल आनेपर, जैसा कि पहले हुआ था, समस्त स्थावर-जंगम सृष्टिका नाश हो जाता है एवं चराचर जगतका नाश होनेके पश्चात्‌ ब्रह्मा आदि देवता भी अपने कारणतत्त्वमें लीन हो जाते हैं। आभूतसम्प्लवे प्राप्ते प्रलीने प्रकृती महान्‌ । एकस्तिष्ठति सर्वात्मा स तु नारायण: प्रभु: ।। और समस्त भूतोंका प्रवाह प्रकृतिमें विलीन हो जाता है, उस समय एकमात्र सर्वात्मा भगवान्‌ महानारायण शेष रह जाते हैं। नारायणस्य चाज़नि सर्वदैवानि भारत | शिरस्तस्य दिव॑ राजन्‌ नाभि: खं चरणौ मही ।। भरतनन्दन! भगवान्‌ नारायणके सब अंग सर्वदेवमय हैं। राजन्‌! द्युलोक उनका मस्तक, आकाश नाभि और पृथ्वी चरण हैं। अश्विनौ प्राणयोददेवो चक्षुषी शशिभास्करौ । इन्द्रवैश्वानरी देवी मुखं तस्य महात्मन: ।। दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिकाबके स्थानमें हैं, चन्द्रमा और सूर्य नेत्र हैं एवं इन्द्र और अग्निदेवता उन परमात्माके मुख हैं। अन्यानि स्वदैवानि तस्याड्रानि महात्मन: । सर्व व्याप्य हरिस्तस्थौ सूत्र मणिगणानिव ।। इसी प्रकार अन्य सब देवता भी उन महात्माके विभिन्न अवयव हैं। जैसे गुँथी हुई मालाकी सभी मणियोंमें एक ही सूत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार भगवान्‌ श्रीहरि सम्पूर्ण जगतको व्याप्त करके स्थित हैं। आभूतसम्प्लवान्ते5थ दृष्टवा सर्व तमो5न्वितम्‌ । नारायणो महायोगी सर्वज्ञ: परमात्मवान्‌ ।। ब्रह्म भूतस्तदा$5त्मान॑ ब्रह्माणमसृजत्‌ स्वयम्‌ । प्रलयकालके अन्तमें सबको अन्धकारसे व्याप्त देख सर्वज्ञ परमात्मा ब्रह्मभूत महायोगी नारायणने स्वयं अपने-आपको ही ब्रह्मारूपमें प्रकट किया। सो<ध्यक्ष: सर्वभूतानां प्रभूत: प्रभवो<च्युत: ।। सनत्कुमारं रुद्रं च मनुं चैव तपोधनान्‌ । सर्वमेवासृजद्‌ ब्रह्मा ततो लोकान्‌ प्रजास्तथा ।। इस प्रकार अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले, सबकी उत्पत्तिके कारणभूत और सम्पूर्ण भूतोंके अध्यक्ष श्रीहरिने ब्रह्मारूपसे प्रकट हो सनत्कुमार, रुद्र, मनु तथा तपस्वी ऋषि-मुनियोंको उत्पन्न किया। सबकी सृष्टि उन्होंने ही की। उन्हींसे सम्पूर्ण लोकों और प्रजाओंकी उत्पत्ति हुई। ते च तद्‌ व्यसूजंस्तत्र प्राप्ते काले युधिष्ठिर । तेभ्यो5भवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम्‌ ।। युधिष्ठि!![ समय आनेपर उन मनु आदिने भी सृष्टिका विस्तार किया। उन सब महात्माओंसे नाना प्रकारकी सृष्टि प्रकट हुई। इस प्रकार एक ही सनातन ब्रह्म अनेक रूपोंमें अभिव्यक्त हो गया। कल्पानां बहुकोट्यश्व समतीता हि भारत । आभूतसम्प्लवाश्वैव बहुकोट्यो&तिचक्रमु: ।। भरतनन्दन! अबतक कई करोड़ कल्प बीत चुके हैं और कितने ही करोड़ प्रलयकाल भी गत हो चुके हैं। मन्वन्तरयुगेडजस्रं सकल्पा भूतसम्प्लवा । चक्रवत्‌ परिवर्तन्ते सर्व विष्णुमयं जगत्‌ ।। मन्वन्तर, युग, कल्प और प्रलय--ये निरन्तर चक्रकी भाँति घूमते रहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत्‌ विष्णुमय है। सृष्टवा चतुर्मुखं देवं देवो नारायण: प्रभु: । स लोकानां हितार्थाय क्षीरोदे वसति प्रभु: ।। देवाधिदेव भगवान्‌ नारायण चतुर्मुख भगवान्‌ ब्रह्माकी सृष्टि करके सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये क्षीरसागरमें निवास करते हैं। ब्रह्मा च सर्वदेवानां लोकस्य च पितामह: । ततो नारायणो देव: सर्वस्य प्रपितामह:ः ।। ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा लोकोंके पितामह हैं, इसलिये श्रीनारायणदेव सबके प्रपितामह हैं। अव्यक्तो व्यक्तलिड्रस्थो य एष भगवान्‌ प्रभु: । नारायणो जगच्चक्रे प्रभवाप्पययसंहित: ।। जो अव्यक्त होते हुए व्यक्त शरीरमें स्थित हैं, सृष्टि और प्रलयकालमें भी जो नित्य विद्यमान रहते हैं, उन्हीं सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ नारायणने इस जगत्‌की रचना की है। एष नारायणो भूत्वा हरिरासीद्‌ युधिष्छिर । ब्रह्माणं शशिसूर्यो च धर्म चैवासृजत्‌ स्वयम्‌ ।। युधिष्ठिर! इन भगवान्‌ श्रीकृष्णने ही नारायणरूपमें स्थित होकर स्वयं ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा और धर्मकी सृष्टि की है। बहुश: सर्वभूतात्मा प्रादुर्भवति कार्यत: । प्रादुर्भावांस्तु वक्ष्यामि दिव्यान्‌ देवगणैर्युतान्‌ ।। ये समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं और कार्यवश अनेक रूपोंमें अवतीर्ण होते रहते हैं। इनके सभी अवतार दिव्य हैं और देवगणोंसे संयुक्त भी हैं। मैं उन सबका वर्णन करता हूँ। सुप्त्वा युगसहसंत्रं स प्रादुर्भवति कार्यवान्‌ । पूर्णे युगसहस्रे5थ देवदेवो जगत्पतिः ।। ब्रह्माणं कपिल चैव परमेष्ठिनमेव च । देवान्‌ सप्त ऋषींश्वैव शड्करं च महायशा: ।। देवाधिदेव जगदीश्वर महायशस्वी भगवान्‌ श्रीहरि सहस्र युगोंतक शयन करनेके पश्चात्‌ कल्पान्तकी सहस्रयुगात्मक अवधि पूरी होनेपर प्रकट होते और सृष्टिकार्यमें संलग्न हो परमेष्ठी ब्रह्मा, कपिल, देवगणों, सप्तर्षियों तथा शंकरकी उत्पत्ति करते हैं। सनत्कुमारं भगवान्‌ मनुं चैव प्रजापतिम्‌ । पुरा चक्रेडथ देवादीन्‌ प्रदीप्ताग्निसमप्रभ: ।। इसी प्रकार भगवान्‌ श्रीहरि सनत्कुमार, मनु एवं प्रजापतिको भी उत्पन्न करते हैं। पूर्वकालमें प्रजजलित अग्निके समान तेजस्वी नारायणदेवने ही देवताओं आदिकी सृष्टि की है। येन चार्णवमध्यस्थौ नष्टे स्थावरजड्भमे । नष्टदेवासुरनरे प्रणष्टोरगराक्षसे ।। योद्धुकामौ सुदुर्धर्षोँ भ्रातरौ मधुकैटभौ । हतौ भगवता तेन तयोर्दत्त्वा वृतं वरम्‌ ।। पहलेकी बात है, प्रलयकालमें समस्त चराचर प्राणी, देवता, असुर, मनुष्य, नाग तथा राक्षस सभी नष्ट हो चुके थे। उस समय एकार्णव (महासागर)-की जलराशिमें दो अत्यन्त दुर्धर्ष दैत्य रहते थे, जिनके नाम थे--मधु और कैटभ। वे दोनों भाई युद्धकी इच्छा रखते थे। उन्हीं भगवान्‌ नारायणने उन्हें मनोवांछित वर देकर उन दोनों दैत्योंका वध किया था। भूमिं बद्ध्वा कृतौ पूर्व मृन्मयौ द्वौ महासुरौ । कर्णस्रोतोद्धवौ तौ तु विष्णोस्तस्य महात्मन: ।। कहते हैं, वे दोनों महान्‌ असुर महात्मा भगवान्‌ विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे। पहले भगवानने इस पृथ्वीको आबद्ध करके मिट्टीसे ही उनकी आकृति बनायी थी। महार्णवे प्रस्वघपत: शैलराजसमौ स्थितौ । तौ विवेश स्वयं वायु: ब्रह्मणा साधु चोदित: ।। वे पर्वतराज हिमालयके समान विशाल शरीर लिये महासागरके जलमें सो रहे थे। उस समय ब्रह्माजीकी प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया। तौ दिवं छादयित्वा तु ववृधाते महासुरौ । वायुप्राणौ तु तौ दृष्ट्‌वा ब्रह्मा पर्यामृशच्छनै: ।। फिर तो वे दोनों महान्‌ असुर सम्पूर्ण दुुलोकको आच्छादित करके बढ़ने लगे। वायुदेव ही जिनके प्राण थे, उन दोनों असुरोंको देखकर ब्रह्माजीने धीरे-धीरे उनके शरीरपर हाथ फेरा। एकं मृदुतरं बुद्ध्वा कठिन बुध्य चापरम्‌ । नामनी तु तयोश्वक्रे स विभु: सलिलोद्धव: ।। एकका शरीर उन्हें अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका अत्यन्त कठोर। तब जलसे उत्पन्न होनेवाले भगवान्‌ ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण किया। मृदुस्त्वयं मधुर्नाम कठिन: कैटभ: स्वयम्‌ | तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलगर्वितौ ।। यह जो मृदुल शरीरवाला असुर है, इसका नाम मधु होगा और जिसका शरीर कठोर है, वह कैटभ कहलायेगा। इस प्रकार नाम निश्चित हो जानेपर वे दोनों दैत्य बलसे उन्मत्त होकर सब ओर विचरने लगे। तौ पुराथ दिवं सर्वा प्राप्तौी राजन्‌ महासुरौ । प्रच्छाद्याथ दिवं सर्वा चेरतुर्मधुकैटभौ ।। राजन! सबसे पहले वे दोनों महादैत्य मधु और कैटभ झ्युलोकमें पहुँचे और उस सारे लोकको आच्छादित करके सब ओर विचरने लगे। सर्वमेकार्णवं लोक॑ योद्धुकामौ सुनिर्भयौ । तौ गतावसुरीौ दृष्टवा ब्रह्मा लोकपितामहः ।। एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवान्तरधीयत । उस समय सारा लोक जलमय हो रहा था। उसमें युद्धकी कामनासे अत्यन्त निर्भय होकर आये हुए उन दोनों असुरोंको देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी वहीं एकार्णवरूप जलराशिमें अन्तर्धान हो गये। स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिदेशात्‌ समुत्थिते ।। आसीदादौ स्वयंजन्म तत्‌ पड़कजमपड्कजम्‌ । पूजयामास वसतिं ब्रह्मा लोकपितामह: ।। वे भगवान्‌ पद्मनाभ (विष्णु)-की नाभिसे प्रकट हुए कमलमें जा बैठे। वह कमल वहाँ पहले ही स्वयं प्रकट हुआ था। कहनेको तो वह पंकज था, परंतु पंकसे उसकी उत्पत्ति नहीं हुई थी। लोकपितामह ब्रह्माने अपने निवासके लिये उस कमलको ही पसंद किया और उसकी भूरि-भूरि सराहना की। तावुभौ जलगर्भस्थौ नारायणचतुर्मुखो । बहून्‌ वर्षायुतानप्सु शयानौ न चकम्पतु: ।। अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ । आज म्मतुस्तौ त॑ देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थित: ।। भगवान्‌ नारायण और ब्रह्मा दोनों ही अनेक सहस्र वर्षोतक उस जलके भीतर सोते रहे; किंतु कभी तनिक भी कम्पायमान नहीं हुए। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात्‌ वे दोनों असुर मधु और कैटभ उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ ब्रह्माजी स्थित थे। तौ दृष्टवा लोकनाथस्तु कोपात्‌ संरक्तलोचन: । उत्पपाताथ शयनात्‌ पद्मनाभो महाद्युति: ।। तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं तयोस्तस्य च वै तदा । एकार्णवे तदा घोरे त्रैलोक्ये जलतां गते ।। तदभूत्‌ तुमुल॑ युद्ध वर्षमड्यान्‌ सहस्रशः । न च तावसुरौ युद्धे तदा श्रममवापतु: ।। उन दोनोंको आया देख महातेजस्वी लोकनाथ भगवान्‌ पद्मनाभ अपनी शय्यासे खड़े हो गये। क्रोधसे उनकी आँखें लाल हो गयीं। फिर तो उन दोनोंके साथ उनका बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। उस भयानक एकार्णवमें जहाँ त्रिलोकी जलरूप हो गयी थी, सहस्रों वर्षोतक उनका वह घमासान युद्ध चलता रहा; परंतु उस समय उस युद्धमें उन दोनों दैत्योंको तनिक भी थकावट नहीं होती थी। अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ । ऊचतुः: प्रीतमनसौ देवं नारायणं प्रभुम्‌ ।। प्रीतौ स्वस्तव युद्धेन श्लाघ्यस्त्वं मृत्युरावयो: । आवां जहि न यत्रोर्वी सलिलेन परिप्लुता ।। तत्पश्चात्‌ दीर्घकाल व्यतीत होनेपर वे दोनों रणोन्मत्त दैत्य प्रसन्न होकर सर्वशक्तिमान्‌ भगवान्‌ नारायणसे बोले--'सुरश्रेष्ठ! हम दोनों तुम्हारे युद्ध-कौशलसे बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमारे लिये स्पृहणीय मृत्यु हो। हमें ऐसी जगह मारो, जहाँकी भूमि पानीमें डूबी हुई न हो। हतौ च तव पुत्रत्व॑ प्राप्तुयाव सुरोत्तम । यो हावां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ ।। तयो: स वचन श्रुत्वा तदा नारायण: प्रभु: । तौ प्रगृह्म मृधे देत्यौ दोर्भ्या ता समपीडयत्‌ ।। ऊरुभ्यां निधनं चक्रे तावुभी मधुकैटभौ । “तथा मरनेके पश्चात्‌ हम दोनों तुम्हारे पुत्र हों। जो हमें युद्धमें जीत ले, हम उसीके पुत्र हों--ऐसी हमारी इच्छा है।। उनकी बात सुनकर भगवान्‌ नारायणने उन दोनों दैत्योंको युद्धमें पकड़कर उन्हें दोनों हाथोंसे दबाया और मधु तथा कैटभ दोनोंको अपनी जाँघोंपर रखकर मार डाला। तौ हतौ चाप्लुतौ तोये वपुभ्यामिकतां गतौ ।। मेदो मुमुचतुर्देत्यौ मथ्यमानौ जलोरमिभि: । मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यामन्तर्दथे तदा ।। नारायणश्न भगवानसृजद्‌ विविधा: प्रजा: । दैत्ययोमेंदसाच्छन्ना सर्वा राजन्‌ वसुन्धरा ।। तदा प्रभूृति कौन्तेय मेदिनीति स्मृता मही । प्रभावात्‌ पद्मनाभस्य शाश्वती च कृता नृणाम्‌ ।। मरनेपर उन दोनोंकी लाशें जलमें डूबकर एक हो गयीं। जलकी लहरोंसे मथित होकर उन दोनों दैत्योंने जो मेद छोड़ा, उससे आच्छादित होकर वहाँका जल अदृश्य हो गया। उसीपर भगवान्‌ नारायणने नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की। राजन्‌ कुन्तीकुमार! उन दोनों दैत्योंके मेदसे सारी वसुधा आच्छादित हो गयी, अतः तभीसे यह मही “मेदिनी” के नामसे प्रसिद्ध हुई। भगवान्‌ पद्मनाभके प्रभावसे यह मनुष्योंके लिये शाश्वत आधार बन गयी। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [वराह, नृसिंह, वामन, दत्तात्रेय, परशुराम, श्रीराम, श्रीकृष्ण तथा कल्कि अवतारोंकी संक्षिप्त कथा] भीष्म उवाच प्रादुर्भावसहस्राणि समतीतान्यनेकश: । यथाशक्ति तु वक्ष्यामि शृणु तान्‌ कुरुनन्दन ।। भीष्मजी कहते हैं--कुरुनन्दन! भगवान्‌के अब-तक कई सहसख्र अवतार हो चुके हैं। मैं यहाँ कुछ अवतारोंका यथाशक्ति वर्णन करूँगा। तुम ध्यान देकर उनका वृत्तान्त सुनो। पुरा कमलनाभस्य स्वपत: सागराम्भसि । पुष्करे यत्र सम्भूता देवा ऋषिगणै: सह ।। पूर्वकालमें जब भगवान्‌ पद्मनाभ समुद्रके जलमें शयन कर रहे थे, पुष्करमें उनसे अनेक देवताओं और महर्षियोंका प्रादुर्भाव हुआ। एष पौष्करिको नाम प्रादुर्भाव: प्रकीर्तित: । पुराण: कथ्यते यत्र वेदश्रुतिसमाहितः ।। “यह भगवानका “पौष्करिक” (पुष्करसम्बन्धी) पुरातन अवतार कहा गया है, जो वैदिक श्रुतियोंद्वारा अनुमोदित है। वाराहस्तु श्रुतिमुख: प्रादुर्भावो महात्मन: । यत्र विष्णु: सुरश्रेष्ठो वाराहं रूपमास्थित: ।। उज्जहार महीं तोयात्‌ सशैलवनकाननाम्‌ । महात्मा श्रीहरिका जो वराह नामक अवतार है, उसमें भी प्रधानतः वैदिक श्रुति ही प्रमाण है। उस अवतारके समय भगवानने वराहरूप धारण करके पर्वतों और वनोंसहित सारी पृथ्वीको जलसे बाहर निकाला था। वेदपादो यूपदंष्ट: क्रतुदन्तश्चितीमुख: ।। अग्निजिद्लो दर्भरोमा ब्रह्मशीर्षो महातपा: । चारों वेद ही भगवान्‌ वराहके चार पैर थे। यूप ही उनकी दाढ़ थे। क्रतु (यज्ञ) ही दाँत और “चिति” (इष्टिकाचयन) ही मुख थे। अग्नि जिह्ला, कुश रोम तथा ब्रह्म मस्तक थे। वे महान्‌ तपसे सम्पन्न थे। अहोरात्रेक्षणो दिव्यो वेदाड़: श्रुतिभूषण: ।। आज्यनास: खुवतुण्ड: सामघोषस्वनो महान्‌ । दिन और रात ही उनके दो नेत्र थे। उनका स्वरूप दिव्य था। वेदांग ही उनके विभिन्न अंग थे। श्रुतियाँ ही उनके लिये आभूषणका काम देती थीं। घी उनकी नासिका, खुवा उनकी थूथन और सामवेदका स्वर ही उनकी भीषण गर्जना थी। उनका शरीर बहुत बड़ा था। धर्मसत्यमय: श्रीमान्‌ कर्मविक्रमसस्कृत: ।। प्रायश्षित्तनखो धीर: पशुजानुर्महावृष: । धर्म और सत्य उनका स्वरूप था, वे अलौकिक तेजसे सम्पन्न थे। वे विभिन्न कर्मरूपी विक्रमसे सुशोभित हो रहे थे, प्रायश्चित्त उनके नख थे, वे धीर स्वभावसे युक्त थे, पशु उनके घुटनोंके स्थानमें थे और महान्‌ वृषभ (धर्म) ही उनका श्रीविग्रह था। औदगात्रहोमलिज्रोड्सौ फलबीजमहौषधि: ।। बाह्यान्तरात्मा मन्त्रास्थिविकृत: सौम्यदर्शन: । उदगाताका होमरूप कर्म उनका लिंग था, फल और बीज ही उनके लिये महान्‌ औषध थे, वे बाह्य और आभ्यन्तर जगत्‌के आत्मा थे, वैदिक मन्त्र ही उनके शारीरिक अस्थिविकार थे। देखनेमें उनका स्वरूप बड़ा ही सौम्य था। वेदिस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यादिवेगवान्‌ ।। प्राग्वंशकायो द्युतिमान्‌ नानादीक्षाभिराचित: । यज्ञकी वेदी ही उनके कंधे, हविष्य सुगन्ध और हव्य-कव्य आदि उनके वेग थे। प्राग्वंश (यजमानगृह एवं पत्नीशाला) उनका शरीर कहा गया है। वे महान्‌ तेजस्वी और अनेक प्रकारकी दीक्षाओंसे व्याप्त थे। दक्षिणाहदयो योगी महाशास्त्रमयो महान्‌ ।। उपाकर्मोष्ठरुचक: प्रवर्ग्यावर्त भूषण: । दक्षिणा उनके हृदयके स्थानमें थीं, वे महान्‌ योगी और महान शास्त्रस्वरूप थे। प्रीतिकारक उपाकर्म उनके ओछ्ठ और प्रवर्ग्य कर्म ही उनके रत्नोंके आभूषण थे। छायापत्नीसहायो वै मणिशुड्र इवोच्छित: ।। एवं यज्ञवराहो वै भूत्वा विष्णु: सनातन: । महीं सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम्‌ ।। एकार्णवजले भ्रष्टामेकार्णवगत: प्रभु: । मज्जितां सलिले तस्मिन्‌ स्वदेवीं पृथिवीं तदा ।। उज्जहार विषाणेन मार्कण्डेयस्य पश्यत: । जलमें पड़नेवाली छाया (परछाई) ही पत्नीकी भाँति उनकी सहायिका थी। वे मणिमय पर्वत-शिखरकी भाँति ऊँचे जान पड़ते थे। इस प्रकार यज्ञमय वराहरूप धारण करके एकार्णवके जलमें प्रविष्ट हो सर्वशक्तिमान्‌ सनातन भगवान्‌ विष्णुने उस जलमें गिरकर डूबी हुई पर्वत, वन और समुद्रोंसहित अपनी महारानी भूदेवीका (दाढ़ या) सींगकी सहायतासे मार्कण्डेय मुनिके देखते-देखते उद्धार किया। शृज्भेणेमां समुद्धृत्य लोकानां हितकाम्यया ।। सहस्रशीर्षो देवो हि निर्ममे जगतीं प्रभु: । सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित होनेवाले उन भगवानने सींग (या दाढ़)-के द्वारा सम्पूर्ण जगत्‌के हितके लिये इस पृथ्वीका उद्धार करके उसे जगत्‌का एक सुदृढ़ आश्रय बना दिया। एवं यज्ञवराहेण भूतभव्यभवात्मना ।। उद्धृता पृथिवी देवी सागराम्बुधरा पुरा | निहता दानवा: सर्वे देवदेवेन विष्णुना ।। इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानस्वरूप भगवान्‌ यज्ञवराहने समुद्रका जल हरण करनेवाली भूदेवीका पूर्वकालमें उद्धार किया था। उस समय उन देवाधिदेव विष्णुने समस्त दानवोंका संहार किया था। वाराह: कथितो होष नारसिंहमथो शृणु | यत्र भूत्वा मृगेन्द्रेण हिरण्यकशिपुर्हत: ।। यह वराह अवतारका वृत्तान्त बतलाया गया। अब नृसिंहावतारका वर्णन सुनो, जिसमें नरसिंहरूप धारण करके भगवानने हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वध किया था। दैत्येन्द्रो बलवान्‌ राजन्‌ सुरारिर्लगर्वित:ः । हिरण्यकशिपुर्नाम आसीत्‌ त्रैलोक्यकण्टक: ।। राजन! प्राचीन कालमें देवताओंका शत्रु हिरण्यकशिपु समस्त दैत्योंका राजा था। वह बलवान्‌ तो था ही, उसे अपने बलका घमंड भी बहुत था। वह तीनों लोकोंके लिये कण्टकरूप हो रहा था। दैत्यानामादिपुरुषो वीर्यवान्‌ धृतिमान्‌ बली | प्रविश्य स वन॑ राजंश्व॒कार तप उत्तमम्‌ ।। पराक्रमी हिरण्यकशिपु धीर और बलवान था। दैत्यकुलका आदिपुरुष वही था। राजन! उसने वनमें जाकर बड़ी भारी तपस्या की। दशवर्षसहस्राणि शतानि दश पठ्च च | जपोपवासैस्तस्यासीत्‌ स्थाणुर्मौनव्रतो दृढ़: ।। साढ़े ग्यारह हजार वर्षोतक पूर्वोक्त तपस्याके हेतुभूत जप और उपवासमें संलग्न रहनेसे वह ढूँठे काठके समान अविचल और दृढ़तापूर्वक मौनव्रतका पालन करनेवाला हो गया। ततो दमशमाभ्यां च ब्रह्मचर्येण चानघ । ब्रह्मा प्रीतमनास्तस्य तपसा नियमेन च ।। निष्पाप नरेश! उसके इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, ब्रह्मचर्य, तपस्या तथा शौच-संतोषादि नियमोंके पालनसे ब्रह्माजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। ततः स्वयम्भूर्भगवान्‌ स्वयमागम्य भूपते । विमानेनार्कवर्णेन हंसयुक्तेन भास्वता ।। भूपाल! तदनन्तर स्वयम्भू भगवान्‌ ब्रह्मा हंस जुते हुए सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा स्वयं वहाँ पधारे। आदित्यैर्वसुभि: साध्यै: मरुद्धिर्देवतेः सह । रद्रैरविश्वसहायैश्न यक्षराक्षसकिन्नरै: ।। दिशाभिविंदिशाभिश्नल नदीभि: सागरैस्तथा । नक्षत्रैश्व मुहूर्तैश्ष खेचरैश्वापरैर्ग्रहै: ।। देवर्षिभिस्तपोयुक्ते: सिद्धैः सप्तर्षिभिस्तथा । राजर्षिशि: पुण्यतमैर्गन्धर्वैरप्सरोगणै: ।। उनके साथ आदित्य, वसु, साध्य, मरुदगण, देवगण, रुद्रगण, विश्वेदेव, यक्ष, राक्षस, किन्नर, दिशा, विदिशा, नदी, समुद्र, नक्षत्र, मुहूर्त, अन्यान्‍न्य आकाशचारी ग्रह, तपस्वी देवर्षि, सिद्ध, सप्तर्षि, पुण्यात्मा राजर्षि, गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी थीं। चराचरगुरु: श्रीमान्‌ वृतः सर्वसुरैस्तथा । ब्रह्मा ब्रह्मविदां श्रेष्ठो दैत्यमागम्य चाब्रवीत्‌ ।। सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ चराचरगुरु श्रीमान्‌ ब्रह्मा उस दैत्यके पास आकर बोले। ब्रह्मोवाच प्रीतो5स्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत । वरं वरय भद्ठं ते यथेष्टं काममाप्रुहि ।। ब्रह्माजीने कहा--उत्तम व्रतका पालन करनेवाले दैत्यराज! तुम मेरे भक्त हो। तुम्हारी इस तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो और मनोवांछित वस्तु प्राप्त करो। हिरण्यकशिपुरुवाच न देवासुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसा: । न मानुषा: पिशाचाश्न हन्युर्मा देवसत्तम ।। हिरण्यकशिपु बोला--सुरश्रेष्ठ! मुझे देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच--कोई भी न मार सके। ऋषयो वा न मां शापै: क्रुद्धा लोकपितामह । शपेयुस्तपसा युक्ता वर एष वृतो मया ।। लोकपितामह! तपस्वी ऋषि-महर्षि कुपित होकर मुझे शाप भी न दें यही वर मैंने माँगा न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिणा पादपेन च । न शुष्केण न चार्द्रेण स्यान्न वान्येन मे वध: ।। न शस्त्रसे, न अस्त्रसे, न पर्वतसे, न वृक्षसे, न सूखेसे, न गीलेसे और न दूसरे ही किसी आयुधसे मेरा वध हो। नाकाशे वा न भूमौ वा रात्रौ वा दिवसे5पि वा । नान्तर्वा न बहिर्वापि स्याद्‌ वधो मे पितामह ।। पितामह! न आकाशगमें, न पृथ्वीपर, न रातमें, न दिनमें तथा न बाहर और न भीतर ही मेरा वध हो सके। पशुभिर्वा मगैर्न स्यात्‌ पक्षिभिर्वां सरीसूपै: । ददासि चेद्‌ वरानेतान्‌ देवदेव वृणोम्यहम्‌ ।। पशु या मृग, पक्षी अथवा सरीसूप (सर्प-बिच्छू) आदिसे भी मेरी मृत्यु न हो। देवदेव! यदि आप वर दे रहे हैं तो मैं इन्हीं वरोंको लेना चाहता हूँ। ब्रह्मोवाच एते देव्या वरास्तात मया दत्तास्तवाद्भुता: । सर्वकामान्‌ वरांस्तात प्राप्स्यसे त्वं न संशय: ।। ब्रह्माजीने कहा--तात! ये दिव्य और अद्भुत वर मैंने तुम्हें दे दिये। वत्स! इसमें संशय नहीं कि सम्पूर्ण कामनाओंसहित इन मनोवांछित वरोंको तुम अवश्य प्राप्त कर लोगे। भीष्म उवाच एवमुक्त्वा स भगवानाकाशेन जगाम ह । रराज ब्रह्मलोके स ब्रह्मर्षिगणसेवित: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! ऐसा कहकर भगवान्‌ ब्रह्मा आकाशमार्गसे चले गये और ब्रह्मलोकमें जाकर ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे। ततो देवाश्व नागाश्न गन्धर्वा मुनयस्तथा । वरप्रदान श्रुत्वा ते ब्रह्माणमुपतस्थिरे ।। तदनन्तर देवता, नाग, गन्धर्व और मुनि उस वरदानका समाचार सुनकर ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित हुए। देवा ऊचु वरेणानेन भगवन्‌ बाधिष्यति स नो5सुर: । तत्‌ प्रसीदस्व भगवत्‌ वधो<स्य प्रविचिन्त्यताम्‌ ।। देवता बोले--भगवन्‌! इस वरके प्रभावसे वह असुर हमलोगोंको बहुत कष्ट देगा, अतः आप प्रसन्न होइये और उसके वधका कोई उपाय सोचिये। भवान्‌ हि सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद्‌ विभु: । स््रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्धुव: ।। क्योंकि आप ही सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्यके निर्माता तथा अव्यक्त प्रकृति और ध्रुवस्वरूप हैं। भीष्म उवाच ततो लोकठितं वाक्य श्रुत्वा देव: प्रजापति: । प्रोवाच भगवान्‌ वाक्‍्यं सर्वदेवगणांस्तदा ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर देवताओोंका यह लोकहितकारी वचन सुनकर दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान्‌ प्रजापतिने उन सब देवगणोंसे इस प्रकार कहा। ब्रह्मोवाच अवश्यं त्रिदशास्तेन प्राप्तव्यं तपस: फलम्‌ | तपसोअन्‍्ते5स्य भगवान्‌ वध॑ कृष्ण: करिष्यति ।। ब्रह्माजीनी कहा--देवताओ! उस असुरको अपनी तपस्याका फल अवश्य प्राप्त होगा। फलभोगके द्वारा जब तपस्याकी समाप्ति हो जायगी, तब भगवान्‌ विष्णु स्वयं ही उसका वध करेंगे। भीष्म उवाच एकच्छुत्वा सुरा: सर्वे ब्रह्मणा तस्य वै वधम्‌ । स्वानि स्थानानि दिव्यानि जम्मुस्ते वै मुदान्विता: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर ब्रह्माजीके द्वारा इस प्रकार उसके वधकी बात सुनकर सब देवता प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धामको चले गये। लब्धमात्रे वरे चापि सर्वास्ता बाधते प्रजा: । हिरण्यकशिपुर्देत्यो वरदानेन दर्पित: ।। दैत्य हिरण्यकशिपु ब्रह्माजीका वर पाते ही समस्त प्रजाको कष्ट पहुँचाने लगा। वरदानसे उसका घमण्ड बहुत बढ़ गया था। राज्यं चकार दैत्येन्द्रो दैत्यसड्घै: समावृतः । सप्त द्वीपान्वशे चक्रे लोकान्‌ लोकान्तरान्‌ बलात्‌ ।। वह दैत्योंका राजा होकर राज्य भोगने लगा। झुंड-के-झुंड दैत्य उसे घेरे रहते थे। उसने सातों द्वीपों और अनेक लोक-लोकान्तरोंको बलपूर्वक अपने वशमें कर लिया। दिव्यलोकान्‌ समस्तान्‌ वै भोगान्‌ दिव्यानवाप सः । देवांस्त्रिभुवनस्थांस्तान्‌ पराजित्य महासुर: ।। उस महान्‌ असुरने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त देवताओंको जीतकर सम्पूर्ण दिव्य लोकों और वहाँके दिव्य भोगोंपर अधिकार प्राप्त कर लिया। त्रैलोक्यं वशमानीय स्वर्गे वसति दानव: । यदा वरमदोन्मत्तो न्यवसद्‌ दानवो दिवि ।। इस प्रकार तीनों लोकोंको अपने अधीन करके वह दैत्य स्वर्गलोकमें निवास करने लगा। वरदानके मदसे उन्मत्त हो दानव हिरण्यकशिपु देवलोकका निवासी बन बैठा। अथ लोकान्‌ समस्तांश्व विजित्य स महासुर: । भवेयमहमेवेन्द्र: सोमो 5ग्निर्मारुतो रवि: ।। सलिल चान्तरिक्षं च नक्षत्राणि दिशो दश | अहं क्रोधश्व॒ कामश्न॒ वरुणो वसवोड<र्यमा ।। धनदश्व धनाध्यक्षो यक्ष: किम्पुरुषाधिप: । एते भवेयमित्युक्त्वा स्वयं भूत्वा बलातू स च ।। तदनन्तर वह महान्‌ असुर अन्य समस्त लोकोंको जीतकर यह सोचने लगा कि मैं ही इन्द्र हो जाऊँ, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, सूर्य, जल, आकाश, नक्षत्र, दसों दिशाएँ, क्रोध, काम, वरुण, वसुगण, अर्यमा, धन देनेवाले धनाध्यक्ष, यक्ष और किम्पुरुषोंका स्वामी--ये सब मैं ही हो जाऊँ। ऐसा सोचकर उसने स्वयं ही बलपूर्वक उन-उन पदोंपर अधिकार जमा लिया। तेषां गृहीत्वा स्थानानि तेषां कार्याण्यवाप सः | इज्यश्लासीन्मखवरै: स तैदेंवर्षिसत्तमै: ।। नरकस्थान्‌ समानीय स्वर्गस्थांस्तांश्षकार सः । एवमादीनि कर्माणि कृत्वा दैत्यपतिर्बली ।। आश्रमेषु महाभागान्‌ मुनीन्‌ वै संशितव्रतान्‌ | सत्यधर्मपरान्‌ दान्तान्‌ पुरा धर्षितवांश्ष सः ।। उनके स्थान ग्रहण करके उन सबके कार्य वह स्वयं देखने लगा। उत्तम देवर्षिगण श्रेष्ठ यज्ञोंद्वार जिन देववाओंका यजन करते थे, उन सबके स्थानपर वह स्वयं ही यज्ञभागका अधिकारी बन बैठा। नरकमें पड़े हुए सब जीवोंको वहाँसे निकालकर उसने स्वर्गका निवासी बना दिया। बलवान्‌ दैत्यराजने ये सब कार्य करके मुनियोंके आश्रमोंपर धावा किया और कठोर व्रतका पालन करनेवाले सत्यधर्मपरायण एवं जितेन्द्रिय महाभाग मुनियोंको सताना आरम्भ किया। यज्ञीयान्‌ कृतवान्‌ दैत्यानयज्ञीयांश्व देवता: । यत्र यत्र सुरा जम्मुस्तत्र तत्र व्रजत्युत ।। स्थानानि देवतानां तु हृत्वा राज्यमपालयत्‌ । उसने दैत्योंको यज्ञका अधिकारी बनाया और देवताओंको उस अधिकारसे वंचित कर दिया। जहाँ-जहाँ देवता जाते थे, वहाँ-वहाँ वह उनका पीछा करता था। देवताओंके सारे स्थान हड़पकर वह स्वयं ही त्रिलोकीके राज्यका पालन करने लगा। पज्च कोट्यश्व वर्षाणि नियुतान्येकषष्टि च ।। षष्टिश्वैव सहस््राणां जग्मुस्तस्य दुरात्मन: । एतद्‌ वर्ष स दैत्येन्द्रो भोगैश्वर्यमवाप सः ।। उस दुरात्माके राज्य करते पाँच करोड़ इकसठ लाख साठ हजार वर्ष व्यतीत हो गये। इतने वर्षोतक दैत्यराज हिरण्यकशिपुने दिव्य भोगों और ऐश्वर्यका उपभोग किया। तेनातिबाध्यमानास्ते दैत्येन्द्रेण बलीयसा । ब्रहद्मलोक॑ सुरा जग्मु: सर्वे शक्रपुरोगमा: ।। पितामहं समासाद्य खिन्ना: प्राउजलयो<ब्रुवन्‌ । महाबली दैत्यराज हिरण्यकशिपुके द्वारा अत्यन्त पीड़ित हो इन्द्र आदि सब देवता ब्रह्मलोकमें गये और ब्रह्माजीके पास पहुँचकर खेदग्रस्त हो हाथ जोड़कर बोले। देवा ऊचु: भगवन्‌ भूतभव्येश नस्त्रायस्व इहागतान्‌ । भयं दितिसुताद्‌ घोरं भवत्यद्य दिवानिशम्‌ |। देवताओंने कहा--भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवान्‌ पितामह! हम यहाँ आपकी शरणमें आये हैं! आप हमारी रक्षा कीजिये। अब हमें उस दैत्यसे दिन-रात घोर भयकी प्राप्ति हो रही है। भगवन्‌ सर्वभूतानां स्वयम्भूरादिकृद्‌ विभु: । स्रष्टा त्वं हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिर्धुव: ।। भगवन्‌! आप सम्पूर्ण भूतोंके आदिस्रष्टा, स्वयम्भू, सर्वव्यापी, हव्य-कव्योंके निर्माता, अव्यक्त प्रकृति एवं नित्यस्वरूप हैं। ब्रह्मोवाच श्रूयतामापदेवं हि दुर्विज्ञेया मयापि च । नारायणस्तु पुरुषो विश्वरूपो महाद्युति: ।। अव्यक्त: सर्वभूतानामचिन्त्यो विभुरव्यय: । ब्रह्माजी बोले--देवताओ! सुनो, ऐसी विपत्तिको समझना मेरे लिये भी अत्यन्त कठिन है। अन्तर्यामी भगवान्‌ नारायण ही हमारी सहायता कर सकते हैं। वे विश्वरूप, महातेजस्वी, अव्यक्तस्वरूप, सर्वव्यापी, अविनाशी तथा सम्पूर्ण भूतोंके लिये अचिन्त्य हैं। ममापि स तु युष्माकं व्यसने परमा गति: ।। नारायण: परो&व्यक्तादहमव्यक्तसम्भव: । संकटकालमें मेरे और तुम्हारे वे ही परम गति हैं। भगवान्‌ नारायण अव्यक्तसे परे हैं और मेरा आविर्भाव अव्यक्तसे हुआ है। मत्तो जज्ञु: प्रजा लोका: सर्वे देवासुराश्न ते ।। देवा यथाहं युष्माकं तथा नारायणो मम । पितामहोऊहं सर्वस्य स विष्णु: प्रपितामह: ।। तमिमं विबुधा दैत्यं स विष्णु: संहरिष्यति । तस्य नास्ति हाशक्‍्यं च तस्माद्‌ ब्रजत मा चिरम्‌ ।। मुझसे समस्त प्रजा, सम्पूर्ण लोक तथा देवता और असुर भी उत्पन्न हुए हैं। देवताओ! जैसे मैं तुमलोगोंका जनक हूँ, उसी प्रकार भगवान्‌ नारायण मेरे जनक हैं। मैं सबका पितामह हूँ और वे भगवान्‌ विष्णु प्रपितामह हैं। देवताओ! इस हिरण्यकशिपु नामक दैत्यका वे विष्णु ही संहार करेंगे। उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है, अतः सब लोग उन्हींकी शरणमें जाओ, विलम्ब न करो। भीष्म उवाच पितामहवच: श्रुत्वा सर्वे ते भरतर्षभ । विबुधा ब्रह्मणा सार्ध जम्मु: क्षीरोदर्धि प्रति ।। भीष्मजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ! पितामह ब्रह्माका यह वचन सुनकर सब देवता उनके साथ ही क्षीरसमुद्रके तटपर गये। आदित्या मरुत: साध्या विश्वे च वसवस्तथा । रुद्रा महर्षयश्नैव अश्विनौ च सुरूपिणौ ।। अन्ये च दिव्या ये राजंस्ते सर्वे सगणा: सुरा: । चतुर्मुखं पुरस्कृत्य श्वेतद्वीपमुपस्थिता: ।। आदित्य, मरुद्गण, साध्य, विश्वेदेव, वसु, रुद्र, महर्षि, सुन्दर रूपवाले अश्विनीकुमार तथा अन्यान्य जो दिव्य योनिके पुरुष हैं, वे सब अर्थात्‌ अपने गणोंसहित समस्त देवता चतुर्मुख ब्रह्माजीको आगे करके श्वेतद्वीपमें उपस्थित हुए। गत्वा क्षीरसमुद्रं तं शाश्वतीं परमां गतिम्‌ अनन्तशयनं देवमनन्तं दीप्ततेजसम्‌ ।। शरण्यं त्रिदशा विष्णुमुपतस्थु: सनातनम्‌ । देवं ब्रह्ममयं यज्ञं ब्रह्मदेवं महाबलम्‌ ।। भूतं भव्यं भविष्यच्च प्रभुं लोकनमस्कृतम्‌ । नारायणं विभु देवं शरण्यं शरणं गता: ।। क्षीरसमुद्रके तटपर पहुँचकर सब देवता अनन्त नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले अनन्त एवं उद्दीप्त तेजसे प्रकाशभान उन शरणागतवत्सल सनातन देवता श्रीविष्णुके सम्मुख उपस्थित हुए, जो सबके सनातन परम गति हैं। वे प्रभु देवस्वरूप, वेदमय, यज्ञरूप, ब्राह्मणको देवता माननेवाले, महान्‌ बल और पराक्रमके आश्रय, भूत, वर्तमान और भविष्यरूप, सर्वसमर्थ, विश्ववन्दित, सर्वव्यापी, दिव्यशक्तिसम्पन्न तथा शरणागतरक्षक हैं। वे सब देवता उन्हीं भगवान्‌ नारायणकी शरणमें गये। देवा ऊचु त्रायस्व नोडद्य देवेश हिरण्यकशिपोर्वधात्‌ । त्वं हि नः परमो धाता ब्रह्मादीनां सुरोत्तम ।। देवता बोले--देवेश्वर! आज आप हिरण्यकशिपुका वध करके हमारी रक्षा कीजिये। सुरश्रेष्ठ आप ही हमारे और ब्रह्मा आदिके भी धारण-पोषण करनेवाले परमेश्वर हैं। उत्फुल्लपदपत्राक्ष शत्रुपक्षभयड्कर | क्षयाय दितिवंशस्य शरण्यस्त्वं भवाद्य न: ।। खिले हुए कमलदलके समान नेत्रोंवाले नारायण! आप शत्रुपक्षको भय प्रदान करनेवाले हैं। प्रभो! आज आप दैत्योंका विनाश करनेके लिये उद्यत हो हमारे शरणदाता होइये। भीष्म उवाच देवानां वचन श्रुत्वा तदा विष्णु: शुचिश्रवा: । अदृश्य: सर्वभूतानां वक्तुमेवोपचक्रमे ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि!! देवताओंकी यह बात सुनकर पवित्र कीर्तिवाले भगवान्‌ विष्णुने उस समय सम्पूर्ण भूतोंसे अदृश्य रहकर बोलना आरम्भ किया। श्रीभगवानुवाच भयं त्यजध्वममरा अभयं वो ददाम्यहम्‌ । तदेवं त्रिदिवं देवा: प्रतिपद्यत मा चिरम्‌ ।। श्रीभगवान्‌ बोले--देवताओ! भय छोड़ दो। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। देवगण! तुमलोग अविलम्ब स्वर्गलोकमें जाओ और पहलेकी ही भाँति वहाँ निर्भय होकर रहो। एषो<हं सगणं दैत्यं वरदानेन दर्पितम्‌ । अवध्यममरेन्द्राणां दानवेन्द्रं निहन्म्यहम्‌ ।। मैं वरदान पाकर घमंडमें भरे हुए दानवराज हिरण्यकशिपुको, जो देवेश्वरोंके लिये भी अवध्य हो रहा है, सेवकोंसहित अभी मार डालता हूँ। ब्रह्मोवाच भगवन्‌ भूतभव्येश खिन्ना होते भृशं सुरा: । तस्मात्‌ त्वं जहि दैत्येन्द्र क्षिप्रं कालो5स्य मा चिरम्‌ ।। ब्रद्माजीने कहा--भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी नारायण! ये देवता बहुत दुःखी हो गये हैं, अतः आप दैत्यराज हिरण्यकशिपुको शीघ्र मार डालिये। उसकी मृत्युका समय आ गया है, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। श्रीभगवानुवाच क्षिप्रं देवा: करिष्यामि त्वरया दैत्यनाशनम्‌ । तस्मात्‌ त्वं विबुधाश्नैव प्रतिपद्यत वै दिवम्‌ ।। श्रीभगवान्‌ बोले--ब्रह्मा तथा देवताओ! मैं शीघ्र ही उस दैत्यका नाश करूँगा, अतः तुम सब लोग अपने-अपने दिव्यलोकमें जाओ। भीष्म उवाच एवमुक्‍्त्वा स भगवान्‌ विसृज्य त्रिदिवेश्वरान्‌ । नरस्यार्धतनुं कृत्वा सिंहस्यार्धतनुं तथा ।। नारसिंहेन वपुषा पार्णिं निष्पिष्य पाणिना । भीमरूपो महातेजा व्यादितास्य इवान्तक: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भगवान्‌ विष्णुने देवेश्वरोंको विदा करके आधा शरीर मनुष्यका और आधा सिंहका-सा बनाकर नरसिंहविग्रह धारण करके एक हाथसे दूसरे हाथको रगड़ते हुए बड़ा भयंकर रूप बना लिया। वे महातेजस्वी नरसिंह मुँह बाये हुए कालके समान जान पड़ते थे। हिरण्यकशिपुं राजन्‌ जगाम हरिरीश्वर: । दैत्यास्तमागतं दृष्टवा नारसिंहं महाबलम्‌ ।। ववर्षु: शस्त्रवर्षस्ते सुसंक्रुद्धास्तदा हरिम्‌ राजन! तदनन्तर भगवान्‌ विष्णु हिरण्यकशिपुके पास गये। नृसिंहरूपधारी महाबली भगवान्‌ श्रीहरिको आया देख दैत्योंने कुपित होकर उनपर अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा आरम्भ की। तैर्विसृष्टानि शस्त्राणि भक्षयामास वै हरि: ।। जघान च रणे दैत्यान्‌ सहस्राणि बहून्यपि | उनके द्वारा चलाये हुए सभी शस्त्रोंको भगवान्‌ खा गये, साथ ही उन्होंने उस युद्धमें कई हजार दैत्योंका संहार कर डाला। तान्‌ निहत्य च दैत्येन्द्रान्‌ सर्वान्‌ क्रुद्धानू महाबलान्‌ ।। अभ्यधावत्‌ सुसंक्ुद्धो दैत्येन्द्रे बलगर्वितम्‌ । क्रोधमें भरे हुए उन सभी महाबलवान्‌, दैत्येश्वरोंका विनाश करके अत्यन्त कुपित हो भगवानने बलोन्मत्त दैत्यराज हिरण्यकशिपुपर धावा किया। जीमूतघनसंकाशो जीमूतघननि:स्वन: ।। जीमूत इव दीप्तौजा जीमूत इव वेगवान्‌ । भगवान्‌ नृसिंहकी अंगकान्ति मेघोंकी घटाके समान श्याम थी। वे मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान दहाड़ रहे थे। उनका उद्दीप्त तेज भी मेघोंके ही समान शोभा पाता था और वे मेघोंके ही समान महान्‌ वेगशाली थे। देवारिदिंतिजो दुष्टो नू्सिंहं समुपाद्रवत्‌ ।। भगवान्‌ नृसिंहको आया देख देवताओंसे द्वेष रखनेवाला दुष्ट दैत्य हिरण्यकशिपु उनकी ओर दौड़ा। दैत्यं सोडतिबल दृष्टवा क्रुद्धशार्टूलविक्रमम्‌ । दीप्तैर्देत्यगणैर्गुप्तं खरैर्नखमुखैरुत ।। ततः कृत्वा तु युद्ध वै तेन दैत्येन वै हरि: । कुपित सिंहके समान पराक्रमी उस अत्यन्त बलशाली, दर्पयुक्त एवं दैत्यगणोंसे सुरक्षित दैत्यको सामने आया देख महातेजस्वी भगवान्‌ नृसिंहने नखोंके तीखे अग्रभागोंके द्वारा उस दैत्यके साथ घोर युद्ध किया। संध्याकाले महातेजा: प्रधाणे च त्वरान्वित: ।। ऊरौ निधाय दैत्येन्द्र निर्बिभेद नर्खै्हिं तम्‌ फिर संध्याकाल आनेपर बड़ी उतावलीके साथ उसे पकड़कर वे राजभवनकी देहलीपर बैठ गये। तदनन्तर उन्होंने अपनी जाँघोंपर दैत्यायाजको रखकर नखोंसे उसका वक्ष:स्थल विदीर्ण कर डाला। महाबलं महावीर्य वरदानेन दर्पितम्‌ ।। दैत्यश्रेष्ठ सुरश्रेष्ठो जघान तरसा हरि: । सुरश्रेष्ठ श्रीहरिने वरदानसे घमंडमें भरे हुए महाबली महापराक्रमी दैत्यराजको बड़े वेगसे मार डाला। हिरण्यकशिपुं हत्वा सर्वदैत्यांश्व वै तदा ।। विबुधानां प्रजानां च हित॑ कृत्वा महाद्युति: । प्रमुमोद हरिरदेव: स्थाप्य धर्म तदा भुवि ।। इस प्रकार हिरण्यकशिपु तथा उसके अनुयायी सब दैत्योंका संहार करके महातेजस्वी भगवान्‌ श्रीहरिने देवताओं तथा प्रजाजनोंका हितसाधन किया और इस पृथ्वीपर धर्मकी स्थापना करके वे बड़े प्रसन्न हुए। एष ते नारसिंहो5त्र कथित: पाण्डुनन्दन । शृणु त्वं वामन॑ नाम प्रादुर्भावं महात्मन: ।। पाण्डुनन्दन! यह मैंने तुम्हें संक्षेपसे नूसिंहावतारकी कथा सुनायी है। अब तुम परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त सुनो। पुरा त्रेतायुगे राजन्‌ बलिवैंरोचनो5भवत्‌ | दैत्यानां पार्थिवो वीरो बलेनाप्रतिमो बली ।। राजन! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है; विरोचनकुमार बलि दैत्योंके राजा थे। बलमें उनके समान दूसरा कोई नहीं था। बलि अत्यन्त बलवान होनेके साथ ही महान्‌ वीर भी थे। तदा बलिमरहाराज दैत्यसड्घै: समावृतः । विजित्य तरसा शक्रमिन्द्रस्थानमवाप स: ।। महाराज! दैत्यसमूहसे घिरे हुए बलिने बड़े वेगसे इन्द्रपर आक्रमण किया और उन्हें जीतकर इन्द्रलोकपर अधिकार प्राप्त कर लिया। तेन वित्रासिता देवा बलिना55खण्डलादय: । ब्रह्माणं तु पुरस्कृत्य गत्वा क्षीरोद्धिं तदा ।। तुष्ठवुः सहिता: सर्वे देव॑ नारायण प्रभुम्‌ । राजा बलिके आक्रमणसे अत्यन्त त्रस्त हुए इन्द्र आदि देवता ब्रह्माजीको आगे करके क्षीरसागरके तटपर गये और सबने मिलकर देवाधिदेव भगवान्‌ नारायणका स्तवन किया। स तेषां दर्शन चक्रे विबुधानां हरि: स्तुतः ।। प्रसादजं हास्य विभोरदित्यां जन्म चोच्यते । देवताओंके स्तुति करनेपर श्रीहरिने उन्हें दर्शन दिया और कहा जाता है, उनपर कृपाप्रसाद करनेके फलस्वरूप भगवान्‌का अदितिके गर्भसे प्रादुर्भाव हुआ। अदितेरपि पुत्रत्वमेत्य यादवनन्दन: ।। एष विष्णुरिति ख्यात इन्द्रस्यावरजो5भवत्‌ | जो इस समय यदुकुलको आनन्दित कर रहे हैं, ये ही भगवान्‌ श्रीकृष्ण पहले अदितिके पुत्र होकर इन्द्रके छोटे भाई विष्णु (या उपेन्द्र)-के नामसे विख्यात हुए। तस्मिन्नेव च काले तु दैत्येन्द्रो वीर्यवान्‌ बलि: ।। अश्वमेधं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे । उन्हीं दिनों महापराक्रमी दैत्यराज बलिने क्रतुश्रेष्ठ अश्वमेधके अनुष्ठानकी तैयारी आरम्भ की। वर्तमाने तदा यज्ञे दैत्येन्द्रस्य युधिष्ठिर ।। स विष्णुर्वामनो भूत्वा प्रच्छन्नो ब्रह्म॒वेषधृक्‌ । मुण्डो यज्ञोपवीती च कृष्णाजिनधर: शिखी ।। पलाशदण्डं संगृह् वामनो<द्भुतदर्शन: । प्रविश्य स बलेयज्ञे वर्तमाने तु दक्षिणाम्‌ ।। देहीत्युवाच दैत्येन्द्र विक्रमांसत्रीन्‌ ममैव ह । युधिष्ठिर! जब दैत्यराजका यज्ञ आरम्भ हो गया, उस समय भगवान्‌ विष्णु ब्राह्मणवेषधारी वामन ब्रह्मचारीके रूपमें अपनेको छिपाकर सिर मुँड़ाये, यज्ञोपवीत, काला मृगचर्म और शिखा धारण किये, हाथमें पलाशका डंडा लिये उस यज्ञमें गये। उस समय भगवान्‌ वामनकी अद्भुत शोभा दिखायी देती थी। बलिके वर्तमान यज्ञमें प्रवेश करके उन्होंने दैत्यगाजसे कहा--“मुझे तीन पग भूमि दक्षिणारूपमें दीजिये।” दीयतां त्रिपदीमात्रमित्ययाचन्महासुरम्‌ ।। स तथेति प्रतिश्रुत्य प्रददौ विष्णवे तदा । “केवल तीन पग भूमि मुझे दे दीजिये।! ऐसा कहकर उन्होंने महान्‌ असुर बलिसे याचना की। बलिने भी “तथास्तु” कहकर श्रीविष्णुको भूमि दे दी। तेन लब्ध्वा हरिरभरूमिं जूम्भयामास वै भृशम्‌ । स शिशु: सदिवं खं च पृथिवीं च विशाम्पते ।। त्रिभिविक्रमणैरेतत्‌ सर्वमाक्रमताभि भू: । बलेबलवतो यज्ञे बलिना विष्णुना पुरा ।। विक्रमैस्त्रिभिरक्षोभ्या: क्षोभितास्ते महासुरा: । बलिसे वह भूमि पाकर भगवान्‌ विष्णु बड़े वेगसे बढ़ने लगे। राजन्‌! वे पहले तो बालक-जैसे लगते थे; किंतु उन्होंने बढ़कर तीन ही पगोंमें स्वर्ग, आकाश और पृथ्वी-- सबको माप लिया। इस प्रकार बलवान्‌ राजा बलिके यज्ञमें जब महाबली भगवान्‌ विष्णुने केवल तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको नाप लिया, तब किसीसे भी क्षुब्ध न किये जा सकनेवाले महान्‌ असुर क्षुब्ध हो उठे। विप्रचित्तिमुखा: क्रुद्धा दैत्यसड्घा महाबला: ।। नानावक्त्रा महाकाया नानावेषधरा नृप । राजन! उनमें विप्रचित्ति आदि दानव प्रधान थे। क्रोधमें भरे हुए उन महाबली दैत्योंके समुदाय अनेक प्रकारके वेष धारण किये वहाँ उपस्थित थे। उनके मुख अनेक प्रकारके दिखायी देते थे। वे सब-के-सब विशालकाय थे। नानाप्रहरणा रौद्रा नानामाल्यानुलेपना: ।। स्वान्यायुधानि संगृहा प्रदीप्ता इव तेजसा । क्रममाणं हरिं तत्र उपावर्तन्त भारत ।। उनके हाथोंमें भाँति-भाँतिके अस्त्र-शस्त्र थे। उन्होंने विविध प्रकारकी मालाएँ तथा चन्दन धारण कर रखे थे। वे देखनेमें बड़े भयंकर थे और तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे। भरतनन्दन! जब भगवान्‌ विष्णुने तीनों लोकोंको मापना आरम्भ किया, उस समय सभी दैत्य अपने-अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये। प्रमथ्य सर्वान्‌ दैतेयान्‌ पादहस्ततलैस्तु तान्‌ । रूप॑ कृत्वा महाभीमं जहाराशु स मेदिनीम्‌ ।। सम्प्राप्प पादमाकाशमादित्यसदने स्थित: । अत्यरोचत भूतात्मा भास्करं स्वेन तेजसा ।। भगवानने महाभयंकर रूप धारण करके उन सब दैत्योंको लातों-थप्पड़ोंसे मारकर भूमण्डलका सारा राज्य उनसे शीघ्र छीन लिया। उनका एक पैर आकाशगमें पहुँचकर आदित्य-मण्डलमें स्थित हो गया। भूतात्मा भगवान्‌ श्रीहरि उस समय अपने तेजसे सूर्यकी अपेक्षा बहुत बढ़-चढ़कर प्रकाशित हो रहे थे। प्रकाशयन्‌ दिश: सर्वा: प्रदिशश्ष॒ महाबल: । शुशुभे स महाबाहु: सर्वलोकान्‌ प्रकाशयन्‌ ।। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे । नभ: प्रक्रममाणस्य नाभ्यां किल तदा स्थितौ ।। महाबली महाबाहु भगवान्‌ विष्णु सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं तथा समस्त लोकोंको प्रकाशित करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे। जिस समय वे वसुधाको अपने पैरोंसे माप रहे थे, उस समय वे इतने बढ़े कि चन्द्रमा और सूर्य उनकी छातीके सामने आ गये थे। जब वे आकाशको लाँघने लगे, तब वे ही चन्द्रमा और सूर्य उनके नाभिदेशमें आ गये। परमाक्रममाणस्य जानुभ्यां तौ व्यवस्थितौ ।। विष्णोरमितवीर्यस्य वदन्त्येवं द्विजातय: । अथासाद्य कपालं स अण्डस्य तु युधिष्ठिर ।। तच्छिद्रात्‌ स्यन्दिनी तस्य पादाद्‌ भ्रष्टा तु निम्नगा । ससार सागरं सा55शु पावनी सागरजड्रमा ।। जब वे आकाश या स्वर्गलोकसे भी ऊपरको पैर बढ़ाने लगे, उस समय उनका रूप इतना विशाल हो गया कि सूर्य और चन्द्रमा उनके घुटनोंमें स्थित दिखायी देने लगे। इस प्रकार ब्राह्मगलोग अमितपराक्रमी भगवान्‌ विष्णुके उस विशाल रूपका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! भगवान्‌का पैर ब्रह्माण्डकपालतक पहुँच गया और उसके आघातसे कपालमें छिद्र हो गया, जिससे झर-झर करके एक नदी प्रकट हो गयी, जो शीघ्र ही नीचे उतरकर समुद्रमें जा मिली। सागरमें मिलनेवाली वह पावन सरिता ही गंगा है। जहार मेदिनीं सर्वा हत्वा दानवपुड्रवान्‌ | आसुरीं श्रियमाह्त्य त्रींललोकान्‌ स जनार्दन: ।। सपुत्रदारानसुरान्‌ पाताले तानपातयत्‌ । नमुचि: शम्बरश्रैव प्रह्मदश्चन महामना: ।। पादपाताभिनिर्धूता: पाताले विनिपातिता: । महाभूतानि भूतात्मा स विशेषेण वै हरि: ।। कालं च सकल राजन गात्रभूतान्यदर्शयत्‌ । भगवान्‌ श्रीहरिने बड़े-बड़े दानवोंको मारकर सारी पृथ्वी उनके अधिकारसे छीन ली और तीनों लोकोंके साथ सारी आसुरी-सम्पदाका अपहरण करके उन असुरोंको स्त्री- पुत्रोंसहित पातालमें भेज दिया। नमुचि, शम्बर और महामना प्रह्नाद भगवानके चरणोंके स्पर्शसे पवित्र हो गये। भगवान्‌ने उनको भी पातालमें भेज दिया। राजन! भूतात्मा भगवान्‌ श्रीहरिने अपने श्रीअंगोंमें विशेषरूपसे पंचमहाभूतों तथा भूत, भविष्य और वर्तमान--सभी कालोंका दर्शन कराया। तस्य गात्रे जगत्‌ सर्वमानीतमिव दृश्यते ।। न किंचिदस्ति लोकेषु यदव्याप्तं महात्मना । तद्धि रूप॑ महेशस्य देवदानवमानवा: ।। दृष्टवा तं मुमुहु: सर्वे विष्णुतेजो&भिपीडिता: । उनके शरीरमें सारा संसार इस प्रकार दिखायी देता था, मानो उसमें लाकर रख दिया गया हो। संसारमें कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो उन परमात्मासे व्याप्त न हो। परमेश्वर भगवान्‌ विष्णुके उस रूपको देखकर उनके तेजसे तिरस्कृत हो देवता, दानव और मानव सभी मोहित हो गये। बलिब॑द्धोडभिमानी च यज्ञवाटे महात्मना ।। विरोचनकुलं सर्व पाताले विनिपातितम्‌ ।। अभिमानी राजा बलिको भगवानने यज्ञमण्डपमें ही बाँध लिया और विरोचनके समस्त कुलको स्वर्गसे पातालमें भेज दिया। एवंविधानि कर्माणि कृत्वा गरुडवाहन: । न विस्मयमुपागच्छत्‌ पारमेष्ठ्येन तेजसा ।। गरुडवाहन भगवान्‌ विष्णुको अपने परमेश्वरीय तेजसे उपर्युक्त कर्म करके भी अहंकार नहीं हुआ। स सर्वममरैश्वर्य सम्प्रदाय शचीपते: । त्रैलोक्यं च ददौ शक्रे विष्णुर्दानवसूदन: ।। दानवसूदन श्रीविष्णुने शचीपति इन्द्रको समस्त देवताओंका आधिपत्य देकर त्रिलोकीका राज्य भी उन्हें दे दिया। एष ते वामनो नाम प्रादुर्भावो महात्मन: । वेदविद्धिर्द्धिजैरेतत्‌ कथ्यते वैष्णवं यश: ।। मानुषेषु यथा विष्णो: प्रादुर्भावं तथा शृणु ।। इस प्रकार परमात्मा श्रीहरिके वामन-अवतारका वृत्तान्त संक्षेपसे तुम्हें बताया गया। वेदवेत्ता ब्राह्मण भगवान्‌ विष्णुके इस सुयशका वर्णन करते हैं। युधिष्ठिर! अब तुम मनुष्योंमें श्रीहरिके जो अवतार हुए हैं, उनका वृत्तान्त सुनो। विष्णो: पुनर्महाराज प्रादुर्भावो महात्मन: । दत्तात्रेय इति ख्यात ऋषिरासीन्महायशा: ।। महाराज! अब मैं पुनः भगवान्‌ विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन करता हूँ। दत्तात्रेयजी महान्‌ यशस्वी महर्षि थे। तेन नष्टेषु वेदेषु क्रियासु च मखेषु च | चातुर्वण्यें च संकीर्णे धर्मे शिथिलतां गते ।। अभिवर्धति चाधर्मे सत्ये नष्टे स्थितेडनृते । प्रजासु क्षीयमाणासु धर्मे चाकुलतां गते ।। सयज्ञा: सक्रिया वेदा: प्रत्यानीताश्ष तेन वै । चातुर्वर्ण्यमसंकीर्ण कृतं तेन महात्मना ।। स एव वै यदा प्रादाद्धैहयाधिपतेरवरम्‌ । त॑ हैहयानामधिपस्त्वर्जुनो 5भिप्रसादयत्‌ ।। एक समयकी बात है, सारे वेद नष्ट-से हो गये। वैदिक कर्मों और यज्ञ-यागादिकोंका लोप हो गया। चारों वर्ण एकमें मिल गये और सर्वत्र वर्णसंकरता फैल गयी। धर्म शिथिल हो गया एवं अधर्म दिनोदिन बढ़ने लगा। सत्य दब गया और सब ओर असत्यने सिक्का जमा लिया। प्रजा क्षीण होने लगी और धर्मको अधर्मद्वारा हर तरहसे पीड़ा (हानि) पहुँचने लगी। ऐसे समयमें महात्मा दत्तात्रेयने यज्ञ और कर्मानुष्ठानकी विधिसहित सम्पूर्ण वेदोंका पुनरुद्धार किया और पुनः चारों वर्णोंकी पृथक्‌- पृथक्‌ अपनी-अपनी मर्यादामें स्थापित किया। इन्होंने ही हैहपराज अर्जुनको वर प्रदान किया था। हैहयराज अर्जुनने अपनी सेवाओंद्वारा दत्तात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया था। वने पर्यचरत्‌ सम्यक्‌ शुश्रूषुरनसूयक: । निर्ममो निरहंकारो दीर्घकालमतोषयत्‌ ।। आराध्य दत्तात्रेयं हि अगृह्नात्‌ स वरानिमान्‌ | आप्तादाप्ततराद्‌ विप्राद्‌ विद्वान्‌ विद्वन्निषेवितात्‌ ।। ऋते<मरत्वं विप्रेण दत्तात्रेयेण धीमता । वरैश्नतुर्भि: प्रवृत इमांस्तत्राभ्यनन्दत ।। वह अच्छी तरह सेवामें संलग्न हो वनमें मुनिवर दत्तात्रेयकी परिचर्यामें लगा रहता था। उसने दूसरोंका दोष देखना छोड़ दिया था। वह ममता और अहंकारसे रहित था। उसने दीर्घकालतक दत्तात्रेयजीकी आराधना करके उन्हें संतुष्ट किया। दत्तात्रेयजी आप्त पुरुषोंसे भी बढ़कर आप्त पुरुष थे। बड़े-बड़े विद्वान्‌ उनकी सेवामें रहते थे। विद्वान्‌ सहस्रबाहु अर्जुनने उन ब्रह्मर्षिसे ये निम्नांकित वर प्राप्त किये। अमरत्व छोड़कर उसके माँगे हुए सभी वर दिद्वान्‌ ब्राह्मण दत्तात्रेयजीने दे दिये। उसने चार वरोंके लिये महर्षिसे प्रार्थना की थी और उन चारोंका ही महर्षिने अभिनन्दन किया था। श्रीमान्‌ मनस्वी बलवान्‌ सत्यवागनसूयक: । सहस्रबाहुर्भूयासमेष मे प्रथमो वर: ।। जरायुजाण्डजं सर्व सर्व चैव चराचरम्‌ । प्रशास्तुमिच्छे धर्मेण द्वितीयस्त्वेष मे वर: ।। (वे वर इस प्रकार हैं--हैहयराज बोला--) “मैं श्रीमान्‌ु, मनस्वी, बलवान, सत्यवादी, अदोषदर्शी तथा सहस्रभुजाओंसे विभूषित होऊँ, यह मेरे लिये पहला वर है। “मैं जरायुज और अण्डज जीवोंके साथ-साथ समस्त चराचर जगतका धर्मपूर्वक शासन करना चाहता हूँ--मेरे लिये दूसरा वर यही हो। पितृन्‌ देवानृषीन्‌ विप्रान्‌ यजेयं विपुलैर्मखै: । अमित्रान्‌ निशितैर्बाणैर्घातयेयं रणाजिरे ।। दत्तात्रेयेह भगवंस्तृतीयों वर एष मे | यस्य नासीन्न भविता न चास्ति सदृश: पुमान्‌ ।। इह वा दिवि वा लोके स मे हन्ता भवेदिति ।। “मैं अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा ब्राह्मण अतिथियोंका यजन करूँ और जो लोग मेरे शत्रु हैं, उन्हें समरांगणमें तीखे बाणोंद्वारा मारकर यमलोक पहुँचा दूँ।/ भगवन्‌ दत्तात्रेय! मेरे लिये यही तीसरा वर हो। “जिसके समान इहलोक या स्वर्गलोकमें कोई पुरुष न था, न है और न होगा ही, वही मेरा वध करनेवाला हो” (यह मेरे लिये चौथा वर हो)। सोर्िडर्जुन: कृतवीर्यस्य वर: पुत्रो5भवद्‌ युधि । स सहस्र॑ सहस्राणां माहिष्मत्यामवर्धत ।। वह अर्जुन राजा कृतवीर्यका ज्येष्ठ पुत्र था और युद्धमें महान्‌ शौर्यका परिचय देता था। उसने माहिष्मती नगरीमें दस लाख वर्षोतक निरन्तर अभ्युदयशील होकर राज्य किया। पृथिवीमखिलां जिव्वा द्वीपांश्षापि समुद्रिण: । नभसीव ज्वलन्‌ सूर्य: पुण्यै: कर्मभिरर्जुन: ।। जैसे आकाशमें सूर्यदेव सदा प्रकाशमान होते हैं, उसी प्रकार कार्तवीर्य अर्जुन सारी पृथ्वी और समुद्री द्वीपोंको जीतकर इस भूतलपर अपने पुण्यकर्मोसे प्रकाशित हो रहा था। इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रद्वीपं गभस्तिमत्‌ । गान्धर्व वारुणं द्वीपं सौम्याक्षमिति च प्रभु: ।। पूर्वरजितपूर्वाश्च द्वीपानजयदर्जुन: ।। सौवर्ण सर्वमप्यासीद्‌ विमानवरमुत्तमम्‌ । चतुर्धाव्यभजदू राष्ट्र तद्‌ विभज्यान्वपालयत्‌ ।। शक्तिशाली सहसख्रबाहुने इन्द्रद्वीप, कशेरुद्वीप, ताम्रद्वीप, ग्स्तिमान्‌ द्वीप, गन्धर्वद्वीप, वरुणद्वीप और सौम्याक्षद्वीपको, जिन्हें उसके पूर्वजोंने भी नहीं जीता था, जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया। उसका श्रेष्ठ राजभवन बहुत ही सुन्दर और सारा-का-सारा सुवर्णमय था। उसने अपने राज्यकी आयको चार भागोंमें बाँट रखा था और इस विभाजनके अनुसार ही वह प्रजाका पालन करता था। एकांशेनाहरत्‌ सेनामेकांशेनावसद्‌ गृहान्‌ । यस्तु तस्य तृतीयांशो राजा55सीज्जनसंग्रहे ।। आप्त: परमकल्याणस्तेन यज्ञानकल्पयत्‌ ।। वह उस आयके एक अंशके द्वारा सेनाका संग्रह और संरक्षण करता था, दूसरे अंशके द्वारा गृहस्थीका खर्च चलाता था तथा उसका जो तीसरा अंश था, उसके द्वारा राजा अर्जुन प्रजाजनोंकी भलाईके लिये यज्ञोंका अनुष्ठान करता था। वह सबका विश्वासपात्र और परम कल्याणकारी था। ये दस्यवो ग्रामचरा अरण्ये च वसन्ति ये । चतुर्थेन च सों5शेन तान्‌ सर्वान्‌ प्रत्यषेधयत्‌ ।। सर्वेभ्यश्चान्तवासि भ्य: कार्तवीर्योडहरद्‌ बलिम्‌ । आद्तं स्वबलैर्यत्‌ तदर्जुनश्वाभिमन्यते ।। काको वा मूषिको वापि तं॑ तमेव न्यबर्हयत्‌ । द्वाराणि नापिधीयन्ते राष्ट्रेषु नगरेषु च ।। वह राजकीय आयके चौथे अंशके द्वारा गाँवों और जंगलोंमें डाकुओं और लुटेरोंको शासनपूर्वक रोकता था। कृतवीर्यकुमार अर्जुन उसी धनको अच्छा मानता था, जिसे उसने अपने बल-पराक्रमद्वारा प्राप्त किया हो। काक या मूषकवृत्तिसे जो लोग प्रजाके धनका अपहरण करते थे, उन सबको वह नष्ट कर देता था। उसके राज्यके भीतर गाँवों तथा नगरोंमें घरके दरवाजे बंद नहीं किये जाते थे। स एव राष्ट्रपालो< भूत्‌ स्त्रीपालो5भवदर्जुन: । स एवासीदजापाल: स गोपालो विशाम्पते ।। राजन! कार्तवीर्य अर्जुन ही समूचे राष्ट्रका पोषक, स्त्रियोंका संरक्षक, बकरियोंकी रक्षा करनेवाला तथा गौओंका पालक था। स स्मारण्ये मनुष्याणां राजा क्षेत्राणि रक्षति | इदं तु कार्तवीर्यस्य बभूवासदृशं जनै: ।। वही जंगलोंमें मनुष्योंके खेतोंकी रक्षा करता था। यह है कार्तवीर्यका अद्भुत कार्य, जिसकी मनुष्योंसे तुलना नहीं हो सकती। न पूर्वे नापरे तस्य गमिष्यन्ति गति नृपा: । यदर्णवे प्रयातस्य वस्त्र न परिषिच्यते ।। शतं वर्षसहस्राणामनुशिष्यार्जुनो महीम्‌ । दत्तात्रेयप्रसादेन एवं राज्यं चकार सः ।। न पहलेका कोई राजा कार्तवीर्यकी किसी महत्ताको प्राप्त कर सका और न भविष्यमें ही कोई प्राप्त कर सकेगा। वह जब समुद्रमें चलता था, तब उसका वस्त्र नहीं भीगता था। राजा अर्जुन दत्तात्रेयजीके कृपाप्रसादसे लाखों वर्षतक पृथ्वीपर शासन करते हुए इस प्रकार राज्यका पालन करता रहा। एवं बहूनि कर्माणि चक्रे लोकहिताय सः । दत्तात्रेय इति ख्यातः प्रादुर्भावस्तु वैष्णव: ।। कथितो भरतश्रेष्ठ शृणु भूयो महात्मन: ।। यदा भगुकुले जन्म यदर्थ च महात्मन: । जामदग्न्य इति ख्यात: प्रादुर्भावस्तु वैष्णव: ।। इस प्रकार उसने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य किये। भरतश्रेष्ठ! यह मैंने भगवान्‌ विष्णुके दत्तात्रेय नामक अवतारका वर्णन किया। अब पुनः उन महात्माके अन्य अवतारका वर्णन सुनो। भगवानका वह अवतार जामदग्न्य (परशुराम)-के नामसे विख्यात है। उन्होंने किसलिये और कब भृगुकुलमें अवतार ग्रहण किया, वह प्रसंग बतलाता हूँ; सुनो। जगदग्निसुतो राजन्‌ रामो नाम स वीर्यवान्‌ | हैहयान्तकरो राजन्‌ स रामो बलिनां वर: ।। कार्तवीर्यो महावीर्यों बलेनाप्रतिमस्तथा । रामेण जामदग्न्येन हतो विषममाचरन्‌ ।। महाराज युधिष्ठिर! महर्षि जमदग्निके पुत्र परशुराम बड़े पराक्रमी हुए हैं। बलवानोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने ही हैहयवंशका संहार किया था। महापराक्रमी कार्तवीर्य अर्जुन बलमें अपना सानी नहीं रखता था; किंतु अपने अनुचित बर्तावके कारण जमदग्निनन्दन परशुरामके द्वारा मारा गया। त॑ कार्तवीर्य राजानं हैहयानामरिंदमम्‌ | रथस्थं पार्थिवं राम: पातयित्वावधीद्‌ रणे ।। शत्रुसूदन हैहयराज कार्तवीर्य अर्जुन रथपर बैठा था, परंतु युद्धमें परशुरामजीने उसे नीचे गिराकर मार डाला। जम्भस्य मूर्थ्नि भेत्ता च हन्‍ता च शतदुन्दुभे: । स एष कृष्णो गोविन्दो जातो भृगुषु वीर्यवान्‌ ।। सहस्रबाहुमुद्धर्तत सहस्नजितमाहवे ।। क्षत्रियाणां चतुष्षष्टिमयुतानां महायशा: । सरस्वत्यां समेतानि एष वै धनुषाजयत्‌ ।। ब्रह्मद्विषां वधे तस्मिन्‌ सहस््राणि चतुर्दश । पुनर्जग्राह शूराणामन्तं चक्रे नरर्षभ: ।। ततो दशसहसतरस्य हन्ता पूर्वमरिंदम: । सहस्न॑ मुसलेनाहन्‌ सहस्रमुदकृन्तत ।। ये भगवान्‌ गोविन्द ही पराक्रमी परशुरामरूपसे भृगुवंशमें अवतीर्ण हुए। ये ही जम्भासुरका मस्तक विदीर्ण करनेवाले तथा शतदुन्दुभिके घातक हैं। इन्होंने सहस्रोंपर विजय पानेवाले सहस्रबाहु अर्जुनका युद्धमें संहार करनेके लिये ही अवतार लिया था। महायशस्वी परशुरामने केवल धनुषकी सहायतासे सरस्वती नदीके तटपर एकत्रित हुए छः लाख चालीस हजार क्षत्रियोंपर विजय पायी थी। वे सभी क्षत्रिय ब्राह्मणोंसे द्वेष करनेवाले थे। उनका वध करते समय नरश्रेष्ठ परशुरामने और भी चौदह हजार शूरवीरोंका अन्त कर डाला। तदनन्तर शत्रुदमन रामने दस हजार क्षत्रियोंका और वध किया। इसके बाद उन्होंने हजारों वीरोंको मूसलसे मारकर यमलोक पहुँचा दिया तथा सहस्रोंको फरसेसे काट डाला। चतुर्दश सहस््राणि क्षणमात्रमपातयत्‌ | शिष्टान्‌ ब्रह्मद्विषश्छित्त्वा ततो5स्नायत भार्गव: ।। राम रामेत्यभिक्रुष्टो ब्राह्मणै: क्षत्रियार्दितै: । न्यघ्नद्‌ दशसहस््राणि राम: परशुनाभि भू: ।। भृगुनन्दन परशुरामने चौदह हजार क्षत्रियोंको क्षणमात्रमें मार गिराया तथा शेष ब्रह्मद्रोहियोंका भी मूलोच्छेद करके स्नान किया। क्षत्रियोंसे पीड़ित होकर ब्राह्मणोंने 'राम- राम” कहकर आर्तनाद किया था; इसीलिये सर्वविजयी परशुरामने पुनः फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंका अन्त किया। न ह्मृष्यत तां वाचमार्ते र्भुशमुदीरिताम्‌ । भूगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन्‌ द्विजातय: ।। जिस समय द्विजलोग “भृगुनन्दन परशुराम! दौड़ो, बचाओ” इत्यादि बातें कहकर करुणक्रन्दन करते, उस समय उन पीड़ितोंद्वारा कही हुई वह आर्तवाणी परशुरामजी नहीं सहन कर सके। काश्मीरान्‌ दरदान्‌ कुन्तीन्‌ क्षुद्रकानू मालवाउ्छकान्‌ | चेदिकाशिकरूषांश्व ऋषिकान्‌ क्रथकैशिकान्‌ ।। अड्डान्‌ बड़ान्‌ कलिज्रांश्न मागधान्‌ काशिकोसलान्‌ । रात्रायणान्‌ वीतिहोत्रान्‌ किरातान्‌ मार्तिकावतान्‌ ।। एतानन्यांश्व राजेन्द्रान्‌ देशे देशे सहस्रश: । निकृत्त्य निशितैर्बाणै: सम्प्रदाय विवस्वते ।। उन्होंने काश्मीर, दरद, कुन्तिभोज, क्षुद्रक, मालव, शक, चेदि, काशि, करूष, ऋषिक, क्रथ, कैशिक, अंग, वंग, कलिंग, मागध, काशी, कोसल, रात्रायण, वीतिहोत्र, किरात तथा मार्तिकावत--इनको तथा अन्य सहसों राजेश्वरोंको प्रत्येक देशमें तीखे बाणोंसे मारकर यमराजके भेंट कर दिया। कीर्णा क्षत्रियकोटीभि: मेरुमन्दरभूषणा । त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी तेन नि:क्षत्रिया कृता ।। मेरु और मन्दर पर्वत जिसके आभूषण हैं, वह पृथ्वी करोड़ों क्षत्रियोंकी लाशोंसे पट गयी। एक-दो बार नहीं, इक्कीस बार परशुरामने यह पृथ्वी क्षत्रियोंसे सूनी कर दी। एवमिष्ट्वा महाबाहु: क्रतुभिर्भूरिदक्षिणै: । अन्यद्‌ वर्षशतं राम: सौभे शाल्वमयोधयत्‌ ।। ततः स भुगुशार्दूलस्तं सौभं योधयन्‌ प्रभु: । सुबन्धुरं रथं राजन्नास्थाय भरतर्षभ ।। नग्निकानां कुमारीणां गायन्तीनामुपाशृणोत्‌ । तदनन्तर महाबाहु परशुरामने प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके सौ वर्षोतक सौभ नामक विमानपर बैठे हुए राजा शाल्वके साथ युद्ध किया। भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर सुन्दर रथपर बैठकर सौभ विमानके साथ युद्ध करनेवाले शक्तिशाली वीर भृगुश्रेष्ठ परशुरामने गीत गाती हुई नग्निका- कुमारियोंके मुखसे यह सुना-- राम राम महाबाहो भृगूणां कीर्तिवर्धन । त्यज शस्त्राणि सर्वाणि न त्वं सौभं वधिष्यसि ।। चक्रहस्तो गदापाणिर्भीतानामभयंकर: । युधि प्रद्युम्नसाम्बा भ्यां कृष्ण: सौभं॑ वधिष्यति ।। “राम! राम! महाबाहो! तुम भृगुवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाले हो; अपने सारे अस्त्र-शस्त्र नीचे डाल दो। तुम सौभ विमानका नाश नहीं कर सकोगे। भयभीतोंको अभय देनेवाले चक्रधारी गदापाणि भगवान्‌ श्रीविष्णु प्रद्युम्म और साम्बको साथ लेकर युद्धमें सौभ विमानका नाश करेंगे'। तच्छुत्वा पुरुषव्याप्रस्तत एव वनं ययौ । न्यस्य सर्वाणि शस्त्राणि कालकाडक्षी महायशा: ।। रथं वर्मायुधं चैव शरान्‌ परशुमेव च । धनूंष्यप्सु प्रतिष्ठाप्य राज॑स्तेपे परं तप: ।। यह सुनकर पुरुषसिंह परशुराम उसी समय वनको चल दिये। राजन! वे महायशस्वी मुनि कृष्णावतारके समयकी प्रतीक्षा करते हुए अपने सारे अस्त्र-शस्त्र, रथ, कवच, आयुध बाण, परशु और धनुष जलमें डालकर बड़ी भारी तपस्यामें लग गये। द्वियं प्रज्ञां श्रियं कीर्ति लक्ष्मीं चामित्रकर्शन: । पज्चाधिष्ठाय धर्मात्मा तं रथं विससर्ज ह ।। शत्रुओंका नाश करनेवाले धर्मात्मा परशुरामने लज्जा, प्रज्ञा, श्री, कीर्ति और लक्ष्मी-- इन पाँचोंका आश्रय लेकर अपने पूर्वोक्त रथको त्याग दिया। आदिकाले प्रवृत्तं हि विभजन्‌ कालमीश्वर: । नाहनच्छुद्धबा सौभं न हाशक्तो महायशा: ।। जामदग्न्य इति ख्यातो यस्त्वसौ भगवानृषि: । सो<स्य भागस्तपस्तेपे भार्गवो लोकविश्रुत: ।। शृणु राजंस्तथा विष्णो: प्रादुर्भावं महात्मन: । चतुर्विशे युगे चापि विश्वामित्रपुर:सर: ।। आदिकालमें जिसकी प्रवृत्ति हुई थी, उस कालका विभाग करके भगवान्‌ परशुरामने कुमारियोंकी बातपर श्रद्धा होनेके कारण ही सौभ विमानका नाश नहीं किया, असमर्थताके कारण नहीं। जमदग्निनन्दन परशुरामके नामसे विख्यात वे महर्षि, जो विश्वविदित ऐश्वर्यशाली महर्षि हैं, वे इन्हीं श्रीकृष्णके अंश हैं, जो इस समय तपस्या कर रहे हैं। राजन! अब महात्मा भगवान्‌ विष्णुके साक्षात्‌ स्वरूप श्रीरामके अवतारका वर्णन सुनो, जो विश्वामित्र मुनिको आगे करके चलनेवाले थे। तिथौ नावमिके जज्ञे तथा दशरथादपि । कृत्वा55त्मानं महाबाहुश्नतुर्धा विष्णुरव्यय: ।। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नवमी तिथिको अविनाशी भगवान्‌ महाबाहु विष्णुने अपने- आपको चार स्वरूपोंमें विभक्त करके महाराज दशरथके सकाशसे अवतार ग्रहण किया था। लोके राम इति ख्यातस्तेजसा भास्करोपम: । प्रसादनार्थ लोकस्य विष्णुस्तस्य सनातन: ।। धर्मार्थमेव कौन्तेय जज्ञे तत्र महायशा: । वे भगवान्‌ सूर्यके समान तेजस्वी राजकुमार लोकमें श्रीरामके नामसे विख्यात हुए। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! जगत्‌को प्रसन्न करने तथा धर्मकी स्थापनाके लिये ही महायशस्वी सनातन भगवान्‌ विष्णु वहाँ प्रकट हुए थे। तमप्याहुर्मनुष्येन्द्रे सर्वभूतपतेस्तनुम्‌ ।। यज्ञविघ्नं तदा कृत्वा विश्वामित्रस्थ भारत । सुबाहुर्निहतस्तेन मारीचस्ताडितो भृशम्‌ ।। मनुष्योंके स्वामी भगवान्‌ श्रीरामको साक्षात्‌ सर्वभूतपति श्रीहरिका ही स्वरूप बतलाया जाता है। भारत! उस समय विश्वामित्रके यज्ञमें विघ्म डालनेके कारण राक्षस सुबाहु श्रीरामचन्द्रजीके हाथों मारा गया और मारीच नामक राक्षसको भी बड़ी चोट पहुँची। तस्मै दत्तानि शस्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता । वधार्थ देवशत्रूणां दुर्वाराणि सुरैरपि ।। परम बुद्धिमान विश्वामित्र मुनिने देवशत्रु राक्षमोंका वध करनेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको ऐसे-ऐसे दिव्यास्त्र प्रदान किये थे, जिनका निवारण करना देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन था। वर्तमाने तदा यज्ञे जनकस्य महात्मन: । भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया परम्‌ ।। ततो विवाहं सीताया: कृत्वा स रघुवललभ: । नगरीं पुनरासाद्य मुमुदे तत्र सीतया ।। उन्हीं दिनों महात्मा जनकके यहाँ धनुषयज्ञ हो रहा था, उसमें श्रीरामने भगवान्‌ शंकरके महान्‌ धनुषको खेल-खेलमें ही तोड़ डाला। तदनन्तर सीताजीके साथ विवाह करके रघुनाथजी अयोध्यापुरीमें लौट आये और वहाँ सीताजीके साथ आनन्दपूर्वक रहने लगे। कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य पित्रा तत्राभिचोदित: । कैकेय्या: प्रियमन्विच्छन्‌ वनमभ्यवपद्यत ।। कुछ कालके पश्चात्‌ पिताकी आज्ञा पाकर वे अपनी विमाता महारानी कैकेयीका प्रिय करनेकी इच्छासे वनमें चले गये। यः समा: सर्वधर्मज्ञश्षतुर्दश वने वसन्‌ | लक्ष्मणानुचरो राम: सर्वभूतहिते रत: ।। चतुर्दश वने तप्त्वा तपो वर्षाणि भारत । रूपिणी यस्य पार्श्रस्था सीतेत्यभिह्ििता जनै: ।। वहाँ सब धर्मोके ज्ञाता और समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके साथ चौदह वर्षोतक वनमें निवास किया। भरतवंशी राजन्‌! चौदह वर्षोतक उन्होंने वनमें तपस्यापूर्वक जीवन बिताया। उनके साथ उनकी अत्यन्त रूपवती धर्मपत्नी भी थीं, जिन्हें लोग सीता कहते थे। पूर्वोचितत्वात्‌ सा लक्ष्मीर्भतारिमनुगच्छति । जनस्थाने वसन्‌ कार्य त्रिदशानां चकार स: ।। मारीचं दूषणं हत्वा खरं त्रिशिरसं तथा । चतुर्दश सहस्राणि रक्षसां घोरकर्मणाम्‌ ।। जघान रामो धर्मात्मा प्रजानां हितकाम्यया । अवतारके पहले श्रीविष्णुरूपमें रहते समय भगवान्‌के साथ उनकी जो योग्यतमा भार्या लक्ष्मी रहा करती हैं, उन्होंने ही उपयुक्त होनेके कारण श्रीरामावतारके समय सीताके रूपमें अवतीर्ण हो अपने पतिदेवका अनुसरण किया था। भगवान्‌ श्रीराम जनस्थानमें रहकर देवताओंके कार्य सिद्ध करते थे। धर्मात्मा श्रीरामने प्रजाजनोंके हितकी कामनासे भयानक कर्म करनेवाले चौदह हजार राक्षसोंका वध किया। जिनमें मारीच, खर-दूषण और त्रिशिरा आदि प्रधान थे। विराधं च कबन्ध॑ च राक्षसौ क्रूरकर्मिणौ ।। जघान च तदा रामो गन्धर्वो शापविक्षतौ ।। उन्हीं दिनों दो शापग्रस्त गन्धर्व क्रूरकर्मा राक्षसोंके रूपमें वहाँ रहते थे, जिनके नाम विराध और कबन्ध थे। श्रीरामने उन दोनोंका भी संहार कर डाला। स रावणस्य भगिनीनासाच्छेद चकार ह । भार्यावियोगं तं॑ प्राप्प मृगयन्‌ व्यचरद्‌ वनम्‌ ।। ततस्तमृष्यमूकं स गत्वा पम्पामतीत्य च । सुग्रीवं॑ मारुतिं दृष्टवा चक्रे मैत्रीं तयो: स वै ।। उन्होंने रावणकी बहिन शूर्पणखाकी नाक भी लक्ष्मणके द्वारा कटवा दी; इसीके कारण (राक्षसोंके षड़यन्त्रसे) उन्हें पत्नीका वियोग देखना पड़ा। तब वे सीताकी खोज करते हुए वनमें विचरने लगे। तदनन्तर ऋष्यमूक पर्वतपर जा पम्पासरोवरको लाँघकर श्रीरामजी सुग्रीव और हनुमानूजीसे मिले और उन दोनोंके साथ उन्होंने मैत्री स्थापित कर ली। अथ गत्वा स किष्किन्धां सुग्रीवेण तदा सह । निहत्य वालिन युद्धे वानरेन्द्र महाबलम्‌ ।। अभ्यषिज्चत्‌ तदा राम: सुग्रीव॑ वानरेश्वरम्‌ । ततः स वीर्यवान्‌ राजंस्त्वरयन्‌ वै समुत्सुक: । विचित्य वायुपुत्रेण लड़्कादेशं निवेदितम्‌ ।। तत्पश्चात्‌ श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवके साथ किष्किन्धामें जाकर महाबली वानरराज बालीको युद्धमें मारा और सुग्रीवको वानरोंके राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया। राजन! तदनन्तर पराक्रमी श्रीराम सीताजीके लिये उत्सुक हो बड़ी उतावलीके साथ उनकी खोज कराने लगे। वायुपुत्र हनुमानूजीने पता लगाकर यह बतलाया कि सीताजी लंकामं हैं। सेतुं बद्ध्वा समुद्रस्य वानरै: सहितस्तदा । सीताया: पदमन्विच्छन्‌ रामो लड़कां विवेश ह ।। तब समुद्रपर पुल बाँधकर वानरोंसहित श्रीरामने सीताजीके स्थानका पता लगाते हुए लंकामें प्रवेश किया। देवोरगगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम्‌ | तत्रावध्य॑ राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम्‌ ।। युक्त राक्षसकोटीभिर्भिन्नाउ्जनचयोपमम्‌ । वहाँ देवता, नागगण, यक्ष, राक्षस तथा पक्षियोंके लिये अवध्य और युद्धमें दुर्जय राक्षसराज रावण करोड़ों राक्षसोंके साथ रहता था। वह देखनेमें खानसे खोदकर निकाले हुए कोयलेके ढेरके समान जान पड़ता था। दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर्वरदानेन दर्पितम्‌ । जघान सचिवै: सार्ध सान्वयं रावणं रणे । त्रैलोक्यकण्टकं वीर॑ महाकायं महाबलम्‌ ।। रावणं सगणं हत्वा रामो भूतपति: पुरा ।। लड्कायां त॑ महात्मान राक्षसेन्द्रे विभीषणम्‌ । अभिषिच्य च तत्रैव अमरत्वं ददौ तदा ।। देवताओंके लिये उसकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था। ब्रह्माजीसे वरदान मिलनेसे उसका घमंड बहुत बढ़ गया था। श्रीरामने त्रिलोकीके लिये कण्टकरूप महाबली विशालकाय वीर रावणको उसके मन्त्रियों और वंशजोंसहित युद्धमें मार डाला। इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी श्रीरघुनाथजीने प्राचीन कालमें रावणको सेवकोंसहित मारकर लंकाके राज्यपर राक्षसपति महात्मा विभीषणका अभिषेक करके उन्हें वहीं अमरत्व प्रदान किया। आरुह्म पुष्पकं॑ राम: सीतामादाय पाण्डव | सबल: स्वपुरं गत्वा धर्मराज्यमपालयत्‌ ।। दानवो लवणो नाम मधो: पुत्रो महाबल: । शत्रुघ्नेन हतो राजं॑स्ततो रामस्य शासनात्‌ ।। पाण्डुनन्दन! तत्पश्चात्‌ श्रीरामने पुष्पक विमानपर आरूढ़ हो सीताको साथ ले दलबलसहित अपनी राजधानीमें जाकर धर्मपूर्वक राज्यका पालन किया। राजन! उन्हीं दिनों मथुरामें मधुका पुत्र लवण नामक दानव राज्य करता था, जिसे रामचन्द्रजीकी आज्ञासे शत्रुघ्नने मार डाला। एवं बहूनि कर्माणि कृत्वा लोकहिताय सः । राज्यं चकार विधिवद्‌ रामो धर्मभूतां वर: ।। इस प्रकार धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने लोकहितके लिये बहुत-से कार्य करके विधिपूर्वक राज्यका पालन किया। दशाश्वमेधानाजद्टे जारुधिस्थान्‌ निरर्गलान्‌ ।। नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नात्यय: प्राणिनां तदा । न वित्तजं भयं चासीदू रामे राज्यं प्रशासति ।। प्राणिनां च भयं नासीज्जलानलविधानजम्‌ । पर्यदेवन्न विधवा नानाथा: काश्चननाभवन्‌ || उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया और सरयूतटके जारुधिप्रदेशको विघ्न- बाधाओंसे रहित कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीके शासनकालमें कभी कोई अमंगल-की बात नहीं सुनी गयी। उस समय प्राणियोंकी अकालमृत्यु नहीं होती थी और किसीको भी धनकी रक्षा आदिके निमित्त भय नहीं प्राप्त होता था। संसारके जीवोंको जल और अग्नि आदिसे भी भय नहीं होता था। विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना जाता था तथा स्त्रियाँ अनाथ नहीं होती थीं। सर्वमासीतू्‌ तदा तृप्तं रामे राज्यं प्रशासति । न संकरकरा वर्णा नाकृष्टकरकृज्जन: ।। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यशासनकालमें सम्पूर्ण जगत्‌ संतुष्ट था। किसी भी वर्णके लोग वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न करते थे। कोई भी मनुष्य ऐसी जमीनके लिये कर नहीं देता था, जो जोतने-बोनेके काममें न आती हो। नच सम वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ।। विश: पर्यचरन क्षत्र क्षत्र नापीडयद्‌ विश: । नरा नात्यचरन्‌ भार्या भार्या नात्यचरन्‌ पतीन्‌ ।। नासीदल्पकृषिल।के रामे राज्यं प्रशासति । आसन्‌ वर्षसहस््राणि तथा पुत्रसहस्रिण: । अरोगाः: प्राणिनो5प्यासन्‌ रामे राज्यं प्रशासति ।। बूढ़ेलोग बालकोंका अन्त्येष्टि-संस्कार नहीं करते थे (उनके सामने ऐसा अवसर ही नहीं आता था)। वैश्यलोग क्षत्रियोंकी परिचर्या करते थे और क्षत्रियलोग भी वैश्योंको कष्ट नहीं होने देते थे। पुरुष अपनी पत्नियोंकी अवहेलना नहीं करते थे और पत्नियाँ भी पतियोंकी अवहेलना नहीं करती थीं। श्रीरामचन्द्रजीके राज्य-शासन करते समय लोकमें खेतीकी उपज कम नहीं होती थी। लोग सहसतर पुत्रोंसे युक्त होकर सहस्रों वर्षोतक जीवित रहते थे। श्रीरामके राज्य-शासनकालमें सब प्राणी नीरोग थे। ऋषीणां देवतानां च मनुष्याणां तथैव च । पृथिव्यां सहवासो< भूद्‌ रामे राज्यं प्रशासति ।। सर्वे ह्यासंस्तृप्तरूपास्तदा तस्मिन्‌ विशाम्पते । धर्मेण पृथिवीं सर्वामनुशासति भूमिपे ।। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें इस पृथ्वीपर ऋषि, देवता और मनुष्य साथ-साथ रहते थे। राजन! भूमिपाल श्रीरघुनाथजी जिन दिनों सारी पृथ्वीका शासन करते थे, उस समय उनके राज्यमें सब लोग पूर्णतः तृप्तिका अनुभव करते थे। तपस्येवा भवन्‌ सर्वे सर्वे धर्ममनुव्रता: । पृथिव्यां धार्मिके तस्मिन्‌ रामे राज्यं प्रशासति ।। धर्मात्मा राजा रामके राज्यमें पृथ्वीपर सब लोग तपस्यामें ही लगे रहते थे और सब-के- सब धर्मानुरागी थे। नाधर्मिष्ठो नर: कश्चिद्‌ बभूव प्राणिनां क्वचित्‌ । प्राणापानौ समावास्तां रामे राज्यं प्रशासति ।। श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कोई भी मनुष्य अधर्ममें प्रवृत्त नहीं होता था। सबके प्राण और अपान समतृत्तिमें स्थित थे। गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जना: । श्यामो युवा लोहिताक्षो मातड्रानामिवर्षभ: ।। आजानुबाहु: सुमुख: सिंहस्कन्धो महाबल: । दश वर्षसहस्त्राणि दश वर्षशतानि च ।। राज्यं भोगं च सम्प्राप्प शशास पृथिवीमिमाम्‌ । जो पुराणवेत्ता विद्वान्‌ हैं, वे इस विषयमें निम्नांकित गाथा गाया करते हैं--“भगवान्‌ श्रीरामकी अंगकान्ति श्याम है, युवावस्था है, उनके नेत्रोंमें कुछ-कुछ लाली है। वे गजराज- जैसे पराक्रमी हैं। उनकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी हैं। मुख बहुत सुन्दर है। कंधे सिंहके समान हैं और वे महान्‌ बलशाली हैं। उन्होंने राज्य और भोग पाकर ग्यारह हजार वर्षोतक इस पृथ्वीका शासन किया। रामो रामो राम इति प्रजानामभवन्‌ कथा: ।। रामभूतं जगदिदं रामे राज्यं प्रशासति । ऋग्यजु:सामहीनाश्न न तदासन्‌ द्विजातय: ।। प्रजाजनोंमें 'राम राम राम” इस प्रकार केवल रामकी ही चर्चा होती थी। रामके राज्य- शासनकालमें यह सारा जगत्‌ राममय हो रहा था। उस समयके द्विज ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके ज्ञानसे शून्य नहीं थे। उषित्वा दण्डके कार्य त्रिदशानां चकार स: । पूर्वापकारिणं संख्ये पौलस्त्यं मनुजर्षभ: ।। देवगन्धर्वनागानामरिं स निजघान ह । सत्त्ववान्‌ गुणसम्पन्नो दीप्यमान: स्वतेजसा ।। एवमेव महाबाहुरिक्ष्वाकुकुलवर्धन: ।। इस प्रकार मनुष्योंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने दण्डकारण्यमें निवास करके देवताओंका कार्य सिद्ध किया और पहलेके अपराधी पुलस्त्यनन्दन रावणको, जो देवताओं, गन्धर्वों और नागोंका शत्रु था, युद्धमें मार गिराया। इक्ष्वाकुकुल॒का अभ्युदय करनेवाले महाबाहु श्रीराम महान्‌ पराक्रमी, सर्वगुणसम्पन्न और अपने तेजसे देदीप्यमान थे। रावणं सगणं हत्वा दिवमाक्रमताभिभू: । इति दाशरथे: ख्यात: प्रादुर्भावो महात्मन: ।। वे इसी प्रकार सेवकोंसहित रावणका वध करके राज्यपालनके पश्चात्‌ साकेतलोकमें पधारे। इस प्रकार परमात्मा दशरथनन्दन श्रीरामके अवतारका वर्णन किया गया। (कृष्णावतार:) ततः कृष्णो महाबाहुर्भीतानामभयड्कर: । अष्टाविंशे युगे राजन्‌ जज्ञे श्रीवत्सलक्षण: ।। राजन! तदनन्तर अब अद्धाईसवें द्वापरमें भय-भीतोंको अभय देनेवाले श्रीवत्सविभूषित महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णके रूपमें श्रीविष्णुका अवतार हुआ है। पेशलश्च वदान्यश्न लोके बहुमतो नृषु । स्मृतिमान्‌ देशकालज्ञ: शड्खचक्रगदासिधृक्‌ ।। ये इस लोकमें परम सुन्दर, उदार, मनुष्योंमें अत्यन्त सम्मानित, स्मरणशक्तिसे सम्पन्न, देशकालके ज्ञाता एवं शंख, चक्र, गदा और खड्ग आदि आयुध धारण करनेवाले हैं। वासुदेव इति ख्यातो लोकानां हितकृत्‌ सदा । वृष्णीनां च कुले जातो भूमे: प्रियचिकीर्षया ।। वासुदेवके नामसे इनकी प्रसिद्धि है। ये सदा सब लोगोंके हितमें संलग्न रहते हैं। भूदेवीका प्रिय कार्य करनेकी इच्छासे इन्होंने वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण किया है। स नृणामभयं दाता मधुहेति स विश्रुत: । शकटार्जुनरामाणां किल स्थानान्यसूदयत्‌ ।। ये ही मनुष्योंको अभयदान करनेवाले हैं। इन्हींकी मधुसूदन नामसे प्रसिद्धि है। इन्होंने ही शकटासुर, यमलार्जुन और पूतनाके मर्मस्थानोंमें आधात करके उनका संहार किया है। कंसादीन्‌ निजघानाजोौ दैत्यान्‌ मानुषविग्रहान्‌ । अयं लोकठितार्थाय प्रादुर्भावो महात्मन: ।। मनुष्य-शरीरमें प्रकट हुए कंस आदि दैत्योंको युद्धमें मार गिराया। परमात्माका यह अवतार भी लोकहितके लिये ही हुआ है। (कल्क्यवतार:) कलल्‍्की विष्णुयशा नाम भूयश्नोत्पत्स्यते हरि: । कलेयुगान्ते सम्प्राप्ते धर्मे शिथिलतां गते ।। पाखण्डिनां गणानां हि वधार्थ भरतर्षभ: । धर्मस्य च विवृद्धयर्थ विप्राणां हितकाम्यया ।। कलियुगके अन्तमें जब धर्म शिथिल हो जायगा, उस समय भगवान्‌ श्रीहरि पाखण्डियोंके वध तथा धर्मकी वृद्धिके लिये और ब्राह्मणोंके हितकी कामनासे पुनः: अवतार लेंगे। उनके उस अवतारका नाम होगा “कल्कि विष्णुयशा'। एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगणैर्युता: । प्रादुर्भावा: पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्म॒वादिभि: ।। भगवानके ये तथा और भी बहुत-से दिव्य अवतार देवगणोंके साथ होते हैं, जिनका ब्रह्मवादी पुरुष पुराणोंमें वर्णन करते हैं। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) पम्प बछ। अर: [श्रीकृष्णका प्राकट्य तथा श्रीकृष्ण-बलरामकी बाललीलाओंका वर्णन] वैशग्पायन उवाच एवमुक्तो5थ कौन्तेयस्तत: पौरवनन्दन: । आबभाषे पुनर्भष्मं धर्मराजो युधिष्ठिर: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीष्मजीके इस प्रकार कहनेपर पूरुवंशको आनन्दित करनेवाले कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः उनसे कहा। युधिछिर उवाच भूय एव मनुष्येन्द्र उपेन्द्रस्य यशस्विन: । जन्म वृष्णिषु विज्ञातुमिच्छामि वदतां वर ।। युधिष्ठिर बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेन्द्र! मैं यशस्वी भगवान्‌ विष्णुके वृष्णिवंशमें अवतार ग्रहण करनेका वृत्तान्त पुनः (विस्तारपूर्वक) जानना चाहता हूँ। यथैव भगवाज्जात: क्षिताविह जनार्दन: । माधवेषु महाबुद्धिस्तन्मे ब्रूहि पितामह ।। पितामह! परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ जनार्दन इस पृथ्वीपर मधुवंशमें जिस प्रकार उत्पन्न हुए, वह सब प्रसंग मुझसे कहिये। यदर्थ च महातेजा गास्तु गोवृषभेक्षण: । ररक्ष कंसस्य वधाल्लोकानामभिरक्षिता ।। बैलके समान विशाल नेत्रोंवाले लोकरक्षक महा-तेजस्वी श्रीकृष्णने किसलिये कंसका वध करके गौओंकी रक्षा की? क्रीडता चैव यद्‌ बाल्ये गोविन्देन विचेष्टितम्‌ । तदा मतिमतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ।। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! उस समय बाल्यावस्थामें बालकोचित क्रीड़ाएँ करते समय भगवान्‌ गोविन्दने क्या-क्या लीलाएँ कीं? यह सब मुझे बताइये। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्ततो भीष्म: केशवस्य महात्मन: । माधवेषु तदा जन्म कथयामास वीर्यवान्‌ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर महापराक्रमी भीष्मने मधुवंशमें भगवान्‌ केशवके अवतार लेनेकी कथा कहनी प्रारम्भ की। भीष्म उवाच हन्त ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथातथम्‌ । यतो नारायणस्येह जन्म वृष्णिषु कौरव ।। भीष्मजी बोले--कुरुरत्न युधिष्ठिर! अब मैं वृष्णिवंशमें भगवान्‌ नारायणके अवतार- ग्रहणका यथावत्‌ वृत्तान्त कहूँगा। अजातशत्रो जातस्तु यथैष भुवि भूमिप: । कीर्त्यमानं मया तात निबोध भरतर्षभ ।। भरतकुलभूषण तात अजातशत्रो! वसुधाकी रक्षा करनेवाले ये भगवान्‌ यहाँ किस प्रकार प्रकट हुए? यह मैं बतला रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो। सागरा: समकम्पन्त मुदा चेलुश्न पर्वता: । जज्वलुश्नाग्नय: शान्ता जायमाने जनार्दने ।। भगवानके जन्मके समय आनन्दोद्रेकके कारण समुद्रमें उत्ताल तरंगें उठने लगीं, पर्वत हिलने लगे और बुझी हुई अग्नियाँ भी सहसा प्रज्वलित हो उठीं। शिवा: सम्प्रववुर्वाता: प्रशान्‍्तमभवद्‌ रज: । ज्योतींषि सम्प्रकाशन्ते जायमाने जनार्दने ।। भगवान्‌ जनार्दनके जन्मकालमें शीतल, मन्द एवं सुखद वायु चलने लगी। धरतीकी धूल शान्त हो गयी और नक्षत्र प्रकाशित होने लगे। देवदुन्दुभयश्लापि सस्वनुर्भुशमम्बरे । अभ्यवर्षस्तदा55गम्य देवता: पुष्पवृष्टिभि: ।। आकाशमें देवलोकके नगाड़े जोर-जोरसे बजने लगे और देवगण आ-आकर वहाँ फूलोंकी वर्षा करने लगे। गीर्भिमड्रलयुक्ताभिरस्तुवन्‌ मधुसूदनम्‌ । उपतस्थुस्तदा प्रीता: प्रादुर्भावे महर्षय: ।। वे मंगलमयी वाणीद्वारा भगवान्‌ मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। भगवान्‌के अवतारका समय जान महर्षिगण भी अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ आ पहुँचे। ततस्तानभिसम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानूषीन्‌ । उपानृत्यन्नुपजगुर्गन्धर्वाप्सरसां गणा: ।। नारद आदि देवर्षियोंको उपस्थित देख गन्धर्व और अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं। उपतस्थे च गोविन्द सहस््राक्ष: शचीपति: । अभ्यभाषत तेजस्वी महर्षीन्‌ पूजयंस्तदा ।। उस समय सहस्न नेत्रोंवाले शचीवल्लभ तेजस्वी इन्द्र भगवान्‌ गोविन्दकी सेवामें उपस्थित हुए और महर्षियोंका आदर करते हुए बोले। इन्द्र रवाच कृत्यानि देवकार्याणि कृत्वा लोकहिताय च । स्वलोकं लोककृद्‌ देव पुनर्गच्छ स्वतेजसा ।। इन्द्रने कहा--देव! आप सम्पूर्ण जगतके स्रष्टा हैं। देवताओंके जो कर्तव्य कार्य हैं, उन सबको सम्पूर्ण जगतके हितके लिये सिद्ध करके आप अपने तेजसहित पुनः परमधामको पधारिये। भीष्म उवाच इत्युक्त्वा मुनिशभि: सार्ध जगाम त्रिदिवेश्वर: । भीष्मजी कहते हैं--ऐसा कहकर स्वर्गलोकके स्वामी इन्द्र देवर्षियोंके साथ अपने लोकको चले गये। वसुदेवस्ततो जातं बालमादित्यसंनिभम्‌ | नन्दगोपकुले राजन्‌ भयात्‌ प्राच्छादयद्धरिम्‌ ।। राजन्‌! तदनन्तर वसुदेवजीने कंसके भयसे सूर्यके समान तेजस्वी अपने नवजात बालक श्रीहरिको नन्दगोपके घरमें छिपा दिया। नन्दगोपकुले कृष्ण उवास बहुला: समा: । ततः कदाचित्‌ सुप्तं तं शकटस्य त्वथ: शिशुम्‌ ।। यशोदा सम्परित्यज्य जगाम यमुनां नदीम्‌ । श्रीकृष्ण बहुत वर्षोतक ननन्‍्दगोपके ही घरमें रहे। एक दिन वहाँ शिशु श्रीकृष्ण एक छकड़ेके नीचे सोये थे। माता यशोदा उन्हें वहीं छोड़कर यमुनाजीके तटपर चली गयीं। शिशुलीलां तत: कुर्वन्‌ स्वहस्तचरणोौ क्षिपन्‌ ।। रुरोद मधुरं कृष्ण: पादावूर्ध्व प्रसारयन्‌ पादाडुगुछ्ठेन शकटं धारयन्नथ केशव: ।। तत्राथैकेन पादेन पातयित्वा तथा शिशु: । उस समय श्रीकृष्ण शिशुलीलाका प्रदर्शन करते हुए अपने हाथ-पैर फेंक-फेंककर मधुर स्वरमें रोने लगे। पैरोंको ऊपर फेंकते समय भगवान्‌ केशवने अपने पैरके अंगूठेसे छकड़ेको धक्का दे दिया और इस प्रकार एक ही पाँवसे छकड़ेको उलटकर गिरा दिया। न्युब्ज: पयोधराकाड्क्षी चकार च रुरोद च ।। पातितं शकटं दृष्टवा भिन्नभाण्डघटीघटम्‌ | जनास्ते शिशुना तेन विस्मयं परमं ययु: ।। उसके बाद वे स्वयं औंधे मुँह हो गये और माताका स्तन पीनेकी इच्छासे जोर-जोरसे रोने लगे। शिशुके ही पदाघातसे छकड़ा उलटकर गिर गया तथा उसपर रखे हुए सभी मटके और घड़े आदि बर्तन चकनाचूर हो गये। यह देखकर सब लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रत्यक्ष शूरसेनानां दृश्यते महदद्भुतम्‌ । पूतना चापि निहता महाकाया महास्तनी ।। पश्यतां सर्वदेवानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! शूरसेनदेश (मथुरामण्डल)-के निवासियोंको यह अत्यन्त अद्भुत घटना प्रत्यक्ष दिखायी दी तथा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने (आकाशमें स्थित) सब देवताओं के देखते- देखते महाकाय एवं विशाल स्तनोंवाली पूतनाको भी पहले मार डाला था। ततः काले महाराज संसक्तौ रामकेशवौ ।। विष्णु: सड्कर्षणश्लोभौ रिक्षिणौ समपद्यताम्‌ | महाराज! तदनन्तर संकर्षण और विष्णुके स्वरूप बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाई कुछ कालके अनन्तर एक साथ ही घुटनोंके बल रेंगने लगे। अन्योन्यकिरण ग्रस्तौ चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ।। विसर्पयेतां सर्वत्र सर्पभोगभुजौ तदा । जैसे चन्द्रमा और सूर्य एक-दूसरेकी किरणोंसे बँधकर आकाशमें एक साथ विचरते हों, उसी प्रकार बलराम और श्रीकृष्ण सर्वत्र एक साथ चलते-फिरते थे। उनकी भुजाएँ सर्पके शरीरकी भाँति सुशोभित होती थीं। रेजतुः पांसुदिग्धाजड़ौ रामकृष्णौ तदा नृप ।। क्वचिच्च जानुभिर्घष्टी क्रीडमानौ क्वचिद्‌ वने । पिबन्तौ दधिकुल्याश्व मथ्यमाने च भारत ।। नरेश्वर! बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंके अंग धूलि-धूसरित होकर बड़ी शोभा पाते। भारत! कभी वे दोनों भाई घुटनोंके बल चलते थे, जिससे उनमें घट्ठटे पड़ गये थे। कभी वे वनमें खेला करते और कभी मथते समय दहीकी घोल लेकर पीया करते थे। ततः स बालो गोविन्दो नवनीतं तदा क्षये । ग्रसमानस्तु तत्रायं गोपीभिर्ददृशेडथ वै ।। एक दिन बालक श्रीकृष्ण एकान्त गृहमें छिपकर माखन खा रहे थे। उस समय वहाँ उन्हें कुछ गोपियोंने देख लिया। दाम्नाथोलूखले कृष्णो गोपस्त्रीभिश्न बन्धित: । तदाथ शिशुना तेन राजंस्तावर्जुनावुभौ ।। समूलविटपौ भग्नौ तदद्भधुतमिवा भवत्‌ । तब उन यशोदा आदि गोपांगनाओंने एक रस्सीसे श्रीकृष्णको ऊखलमें बाँध दिया। राजन्‌! उस समय उन्होंने उस ऊखलको यमलार्जुन वृक्षोंके बीचमें अड़ाकर उन्हें जड़ और शाखाओंसहित तोड़ डाला। वह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई। तत्रासुरौ महाकायौ गतप्राणौ बभूवतु: ।। उन वृक्षोंपर दो विशालकाय असुर रहा करते थे। वे भी वृक्षोंके टूटनेके साथ ही अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठे। ततस्तौ बाल्यमुत्तीर्णा कृष्णसड्कर्षणावुभौ । तस्मिन्नेव व्रजस्थाने सप्तवर्षों बभूवतुः: ।। तदनन्तर वे दोनों भाई श्रीकृष्ण और बलराम बाल्यावस्थाकी सीमाको पार करके उस व्रजमण्डलमें ही सात वर्षकी अवस्थावाले हो गये। नीलपीताम्बरधरौ पतिश्वेतानुलेपनौ । बभूवतुर्वत्सपालौ काकपक्षधरावुभौ ।। बलराम नीले रंगके और श्रीकृष्ण पीले रंगके वस्त्र धारण करते थे। एकके श्रीअंगोंपर पीले रंगका अंगराग लगता था और दूसरेके श्वेत रंगका। दोनों भाई काकपक्ष (सिरके पिछले भागमें बड़े-बड़े केश) धारण किये बछड़े चराने लगे। पर्णवाद्यं श्रुतिसुखं वादयन्तौ वराननौ । शुशुभाते वनगतावुदीर्णाविव पन्नगौ ।। उन दोनोंकी मुखच्छवि बड़ी मनोहारिणी थी। वे वनमें जाकर श्रवण-सुखद पर्णवाद्य (पत्तोंके बाजे--पिपिहरी आदि) बजाया करते थे। वहाँ दो तरुण नागकुमारोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी। मयूराज़जकर्णो तौ पल्‍लवापीडधारिणौ | वनमालापरिक्षिप्ती सालपोताविवोदगतौ ।। वे अपने कानोंमें मोरके पंख लगा लेते, मस्तकपर पल्लवोंके मुकुट धारण करते और गलेमें वनमाला डाल लेते थे। उस समय शालके नये पौधोंकी भाँति उन दोनोंकी बड़ी शोभा होती थी। अरविन्दकृतापीडौ रज्जुयज्ञोपवीतिनौ । शिक्यतुम्बधरौ वीरौ गोपवेणुप्रवादकौ ।। वे कभी कमलके फूलोंके शिरोभूषण धारण करते और कभी बछड़ोंकी रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति धारण कर लेते थे। वीरवर श्रीकृष्ण और बलराम छींके और तुम्बी लिये वनमें घूमते और गोपजनोचित वेणु बजाया करते थे। क्वचिद्‌ वसन्तावन्योन्यं क्रीडमानौ क्वचिद्‌ वने | पर्णशय्यासु संसुप्ती क्वचितन्निद्रान्तरैषिणौ ।। वे दोनों भाई कहीं ठहर जाते, कहीं वनमें एक-दूसरेके साथ खेलने लगते और कहीं पत्तोंकी शय्या बिछाकर सो जाते तथा नींद लेने लगते थे। तौ वत्सान्‌ पालयन्तौ हि शोभयन्तौ महद्‌ वनम्‌ | चज्चूर्यन्ती रमन्तौ सम राजन्नेवं तदा शुभौ ।। राजन! इस प्रकार वे मंगलमय बलराम और श्रीकृष्ण बछड़ोंकी रक्षा करते तथा उस महान्‌ वनकी शोभा बढ़ाते हुए सब ओर घूमते और भाँति-भाँतिकी क्रीड़ाएँ करते थे। ततो वृन्दावनं गत्वा वसुदेवसुतावुभौ । गोव्रजं तत्र कौन्तेय चारयन्तौ विजद्वतुः ।। कुन्तीनन्दन! तदनन्तर वे दोनों वसुदेवपुत्र वृन्दावनमें जाकर गौएँ चराते हुए लीला- विहार करने लगे। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [कालियमर्दन एवं धेनुकासुर, अरिष्टासुर और कंस आदिका वध, श्रीकृष्ण और बलरामका विद्याभ्यास तथा गुरुदक्षिणारूपसे गुरुजीको उनके मरे हुए पुत्रको जीवित करके देना] भीष्म उवाच ततः कदाचिद्‌ गोविन्दो ज्येष्ठं सड़कर्षणं विना । चचार तद्‌ू वन रम्यं रम्यरूपो वरानन:ः ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर एक दिन मनोहर रूप और सुन्दर मुखवाले भगवान्‌ गोविन्द अपने बड़े भाई संकर्षणको साथ लिये बिना ही रमणीय वृन्दावनमें चले गये और वहाँ इधर-उधर भ्रमण करने लगे। काकपक्षधर: श्रीमाउछलद्याम: पद्मनिभेक्षण: । श्रीवत्सेनोरसा युक्त: शशाड्क इव लक्ष्मणा ।। उन्होंने काकपक्ष धारण कर रखा था। वे परम शोभायमान, श्याम-वर्ण तथा कमलके समान सुन्दर नेत्रोंसे सुशोभित थे। जैसे चन्द्रमा कलंकसे युक्त होकर शोभा पाता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णका वक्षःस्थल श्रीवत्सचिह्नसे शोभा पा रहा था। रज्जुयज्ञोपवीती स पीताम्बरधरो युवा । श्वेतगन्धेन लिप्ताड़ो नीलकुज्चितमूर्थज: ।। राजता बर्लिपत्रेण मन्दमारुतकम्पिना । क्वचिद्‌ गायन्‌ क्वचित्‌ क्रीडन्‌ क्वचिचन्नृत्यन्‌ क्वचिद्धसन्‌ ।। गोपवेष: स मधुरं गायन्‌ वेणुं च वादयन्‌ | प्रह्मादनार्थ तु गवां क्वचिद्‌ वनगतो युवा ।। गोकुले मेघकाले तु चचार द्युतिमान्‌ प्रभु: । बहुरम्येषु देशेषु वनस्य वनराजिषु ।। तासु कृष्णो मुर्दे लेभे क्रीडया भरतर्षभ । स कदाचिद्‌ वने तस्मिन्‌ गोभि: सह परिव्रजन्‌ ।। उन्होंने रस्सियोंको यज्ञोपवीतकी भाँति पहन रखा था। उनके श्रीअंगोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। विभिन्न अंगोंमें श्वेत चन्द्का अनुलेप किया गया था। उनके मस्तकपर काले-घुँघराले केश सुशोभित थे। सिरपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता था, जो मन्द-मन्द वायुके झोंकोंसे लहरा रहा था। भगवान्‌ कहीं गीत गाते, कहीं क्रीड़ा करते, कहीं नाचते और कहीं हँसते थे। इस प्रकार गोपालोचित वेष धारण किये मधुर गीत गाते और वेणु बजाते हुए तरुण श्रीकृष्ण गौओंको आनन्दित करनेके लिये कभी-कभी वनमें घूमते थे। अत्यन्त कान्तिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण वर्षके समय गोकुलमें वहाँके अतिशय रमणीय प्रदेशों तथा वनश्रेणियोंमें विचरण करते थे। भरतश्रेष्ठ) उन वनश्रेणियोंमें भाँति-भाँतिके खेल करके श्यामसुन्दर बड़े प्रसन्न होते थे। एक दिन वे गौओंके साथ वनमें घूम रहे थे। भाण्डीरं नाम दृष्ट्वाथ न्यग्रोधं केशवो महान्‌ | तच्छायायां निवासाय मतिं चक्रे तदा प्रभु: ।। घूमते-घूमते महात्मा भगवान्‌ केशवने भाण्डीर नामक वटवृक्ष देखा और उसकी छायामें बैठनेका विचार किया। स तत्र वयसा तुल्यै: वत्सपालै: सहानघ । रेमे स दिवसान्‌ कृष्ण: पुरा स्वर्गपुरे तथा ।। निष्पाप युधिष्ठिर! वहाँ श्रीकृष्ण समान अवस्थावाले दूसरे गोपबालकोंके साथ बछड़े चराते थे, दिनभर खेल-कूद करते थे और पहले दिव्य धाममें जिस प्रकार वे आनन्दित होते थे, उसी प्रकार वनमें आनन्दपूर्वक दिन बिताते थे। त॑ क्रीडमानं गोपाला: कृष्णं भाण्डीरवासिन: । रमयन्ति सम बहवो मान्यै: क्रीडनकैस्तदा ।। अन्ये सम परिगायन्ति गोपा मुदितमानसा: । गोपाला: कृष्णमेवान्ये गायन्ति सम वनप्रिया: ।। भाण्डीरवनमें निवास करनेवाले बहुत-से ग्वाले वहाँ क्रीड़ा करते हुए श्रीकृष्णको अच्छे-अच्छे खिलौनोंद्वारा प्रसन्न रखते थे। दूसरे प्रसन्नचित्त रहनेवाले गोप, जिन्हें वनमें घूमना प्रिय था, सदा श्रीकृष्णकी महिमाका गान किया करते थे। तेषां संगायतामेव वादयामास केशव: । पर्णवद्यान्तरे वेणुं तुम्बं वीणां च तत्र वै ।। एवं क्रीडान्तरै: कृष्णो गोपालैरविजहार स: । जब वे गीत गाते, उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण पत्तोंके बाजोंके बीच-बीचमें वेणु, तुम्बी और वीणा बजाया करते थे। इस प्रकार विभिन्न लीलाओंद्वारा श्रीकृष्ण गोपबालकोंके साथ खेलते थे। तेन बालेन कौन्तेय कृतं लोकहितं तदा ।। पश्यतां सर्वभूतानां वासुदेवेन भारत । भरतनन्दन! उस समय बालक श्रीकृष्णने सम्पूर्ण भूतोंके देखते-देखते लोकहितके अनेक कार्य किये। हदे नीपवने तत्र क्रीडितं नागमूर्थनि ।। कालियं शासयित्वा तु सर्वलोकस्य पश्यत: । विजहार तत: कृष्णो बलदेवसहायवान्‌ ।। वृन्दावनमें कदम्बवबनके पास जो हृद (कुण्ड) था, उसमें प्रवेश करके उन्होंने कालियनागके मस्तक-पर नृत्यक्रीड़ा की थी। फिर सब लोगोंके सामने ही कालियनागको अन्यत्र जानेका आदेश देकर वे बलदेवजीके साथ वनमें इधर-उधर विचरण करने लगे। तदा तालवने राजन्‌ बलदेवेन वै हतः ।। राजन! तालवनमें धेनुक नामक भयंकर दैत्य निवास करता था, जो गधेका रूप धारण करके रहता था। उस समय वह बलदेवजीके हाथसे मारा गया। ततः कदाचित्‌ कौन्तेय रामकृष्णौ वनं गतौ | चारयन्तौ प्रवृद्धानि गोधनानि शुभाननौ ।। कुन्तीनन्दन! तदनन्तर किसी समय सुन्दर मुखवाले बलराम और श्रीकृष्ण अपने बढ़े हुए गोधनको चरानेके लिये वनमें गये। विहरन्तौ मुदा युक्तौ वीक्षमाणौ वनानि वै । क्ष्वेलयन्तौ प्रगायन्तौ विचिन्वन्तौ च पादपान्‌ ।। वहाँ वनकी शोभा निहारते हुए वे दोनों भाई घूमते, खेलते, गीत गाते और विभिन्न वृक्षोंकी खोज करते हुए बड़े प्रसन्न होते थे। नामभिव्याहरन्तौ च वत्सान्‌ गाश्न परंतपौ । चेरतुर्लोकसिद्धाभि: क्रीडाभिरपराजितौ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले वे दोनों अजेय वीर वहाँ गौओं और बछड़ोंको नाम ले-लेकर बुलाते और लोकप्रचलित बालोचित क्रीड़ाएँ करते रहते थे। तौ देवौ मानुषीं दीक्षां वहन्तौ सुरपूजितौ । तज्जातिगुणपयुक्ताभि: क्रीडाभिश्रेरतुर्वनम्‌ ।। वे दोनों देववन्दित देवता थे तो भी मानवी दीक्षा ग्रहण करनेके कारण मानव-जातिके अनुरूप गुणोंवाली क्रीड़ाएँ करते हुए वनमें विचरते थे। ततः कृष्णो महातेजास्तदा गत्वा तु गोव्रजम्‌ । गिरियज्ञं तमेवैष प्रकृतं गोपदारकै: ।। बुभुजे पायसं शौरिरीश्वर: सर्वभूतकृत्‌ । तत्पश्चात्‌ महातेजस्वी श्रीकृष्ण गौओंके व्रजमें जाकर गोपबालकोंद्वारा किये जानेवाले गिरियज्ञमें सम्मिलित हो वहाँ सर्वभूतस्रष्टा ईश्वरके रूपमें अपनेको प्रकट करके (गिरिराजके लिये समर्पित) खीरको स्वयं ही खाने लगे। त॑ दृष्टवा गोपका: सर्वे कृष्णमेव समर्चयन्‌ ।। पूज्यमानस्ततो गोपैर्दिव्यं वपुरधारयत्‌ । उन्हें देखकर सब गोप भगवदबुद्धिसे श्रीकृष्णके उस स्वरूपकी ही पूजा करने लगे। गोपालोंद्वारा पूजित श्रीकृष्णने दिव्य रूप धारण कर लिया। धृतो गोवर्धनो नाम सप्ताहं पर्वतस्तदा ।। शिशुना वासुदेवेन गवार्थमरिमर्दन । शत्रुमर्दन युधिष्ठिर! (जब इन्द्र वर्षा कर रहे थे, उस समय) बालक वासुदेवने गौओंकी रक्षाके लिये एक सप्ताहतक गोवर्धन पर्वतको अपने हाथपर उठा रखा था। क्रीडमानस्तदा कृष्ण: कृतवान्‌ कर्म दुष्करम्‌ ।। तददभुतमिवात्रासीत्‌ सर्वलोकस्य भारत । भरतनन्दन! उस समय श्रीकृष्णने खेल-खेलमें ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर डाला, जो सब लोगोंके लिये अत्यन्त अदभुत-सा था। देवदेव: क्षितिं गत्वा कृष्णं दृष्टवा मुदान्वित: ।। गोविन्द इति त॑ ह्ुकत्वा हाभ्यषिज्चत्‌ पुरंदर: । इत्युक्त्वा55श्लिष्य गोविन्द पुरुहृतो5भ्ययाद्‌ दिवम्‌ । देवाधिदेव इन्द्रने भूतलपर जाकर जब श्रीकृष्णको (गोवर्धन धारण किये) देखा, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्रीकृष्णको “गोविन्द” नाम देकर उनका (“गवेन्द्र” पदपर) अभिषेक किया। देवराज इन्द्र गोविन्दको हृदयसे लगाकर उनकी अनुमति ले स्वर्गलोकको चले गये। अथारिष्ट इति ख्यातं दैत्यं वृषभविग्रहम्‌ । जघान तरसा कृष्ण: पशूनां हितकाम्यया ।। तदनन्तर श्रीकृष्णने पशुओंके हितकी कामनासे वृषभरूपधारी अरिष्ट नामक दैत्यको वेगपूर्वक मार गिराया। केशिनं नाम दैतेयं राजन वै हयविग्रहम्‌ | तथा वनगतं पार्थ गजायुतबलं हयम्‌ ।। प्रहितं भोजपुत्रेण जघान पुरुषोत्तम: । राजन! व्रजमें केशी नामका एक दैत्य रहता था, जिसका शरीर घोड़ेके समान था। उसमें दस हजार हाथियोंका बल था। कुन्तीनन्दन! उस अश्वरूपधारी दैत्यको भोजकुलोत्पन्न कंसने भेजा था। वृन्दावनमें आनेपर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने उसे भी अरिष्टासुरकी भाँति मार दिया। आन्ध्र॑ मल्‍ल॑ च चाणूरं॑ निजघान महासुरम्‌ ।। कंसके दरबारमें एक आन्ध्रदेशीय मल्‍ल था, जिसका नाम था चाणूर। वह एक महान्‌ असुर था। श्रीकृष्णने उसे भी मार डाला। सुनामानममित्रघ्नं सर्वसैन्यपुरस्कृतम्‌ । बालरूपेण गोविन्दो निजघान च भारत ।। भरतनन्दन! (कंसका भाई) शत्रुनाशक सुनामा कंसकी सारी सेनाका अगुआ-- सेनापति था। गोविन्द अभी बालक थे, तो भी उन्होंने सुनामाको मार दिया। बलदेवेन चायत्त: समाजे मुष्टिको हत: । भारत! (दंगल देखनेके लिये जुटे हुए) जनसमाजमें युद्धके लिये तैयार खड़े हुए मुष्टिक नामक पहलवानको बलरामजीने अखाड़ेमें ही मार दिया। त्रासितश्न॒ तदा कंस: स हि कृष्णेन भारत ।। युधिष्ठिर! उस समय श्रीकृष्णने कंसके मनमें भारी भय उत्पन्न कर दिया। ऐरावतर युयुत्सन्तं मातड्रानामिवर्षभम्‌ | कृष्ण: कुवलयापीडं हतवांस्तस्य पश्यत: ।। हथियोंमें श्रेष्ठ कुवलयापीडको, जो ऐरावतकुलमें उत्पन्न हुआ था और श्रीकृष्णको कुचल देना चाहता था, श्रीकृष्णने कंसके देखते-देखते ही मार गिराया। हत्वा कंसममित्रघ्न: सर्वेषां पश्यतां तदा । अभिषिच्योग्रसेनं तं पित्रो: पादमवन्दत ।। फिर शत्रुनाशन श्रीकृष्णने सब लोगोंके सामने ही कंसको मारकर उग्रसेनको राजपदपर अभिषिक्त कर दिया और अपने माता-पिता देवकी-वसुदेवके चरणोंमें प्रणाम किया। एवमादीनि कर्माणि कृतवान्‌ वै जनार्दन: । उवास कतिचित्‌ तत्र दिनानि सहलायुध: ।। इस प्रकार जनार्दनने कितने ही अदभुत कार्य किये और कुछ दिनोंतक बलरामजीके साथ वे मथुरामें ही रहे। ततस्तौ जग्मतुस्तात गुरुं सान्दीपनिं पुनः । गुरुशुश्रूषया युक्तौ धर्मज्ञौ धर्मचारिणौ ।। तात युधिष्ठिर! तदनन्तर वे दोनों धर्मज्ञ भाई गुरु सान्दीपनिके यहाँ (उज्जयिनीपुरीमें) विद्याध्ययनके लिये गये। वहाँ वे गुरुसेवा-परायण हो सदा धर्मके ही अनुष्ठानमें लगे रहे। व्रतमुग्रं महात्मानौ विचरन्तावतिष्ठताम्‌ । अहोरात्रचतुष्षष्ट्या षडडूं वेदमापतु: ।। वे दोनों महात्मा कठोर व्रतका पालन करते हुए वहाँ रहते थे। उन्होंने चौंसठ दिन-रातमें ही छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर लिया। लेख्यं च गणितं चोभीौ प्राप्तुतां यदुनन्दनौ । गान्धर्ववेदं वैद्यं च सकल॑ समवापतु: ।। इतना ही नहीं, उन यदुकुलकुमारोंने लेख्य (चित्रकला), गणित, गान्धर्ववेद तथा सारे वेदको भी उतने ही समयके भीतर जान लिया। हस्तिशिक्षामश्चशिक्षां द्वादशाहेन चापतु: । तावुभौ जम्मतुर्वीरी गुरु सानदीपनिं पुन: ।। धनुर्वेदचिकीर्षार्थ धर्मज्ौ धर्मचारिणौ | गजशिक्षा तथा अश्वशिक्षाको तो उन्होंने कुल बारह दिनोंमें ही प्राप्त कर लिया। इसके बाद वे दोनों धर्मज्ञ एवं धर्मपरायण वीर धनुर्वेद सीखनेके लिये पुनः सान्दीपनि मुनिके पास गये। ताविष्वस्त्रवराचार्यमभिगम्य प्रणम्य च ।। तेन तौ सत्कृती राजन्‌ विचरन्ताववन्तिषु । राजन! थनुर्वेदके श्रेष्ठ आचार्य सान्दीपनिके पास जाकर उन दोनोंने प्रणाम किया। सान्दीपनिने उन्हें सत्कारपूर्वक अपनाया एवं वे फिर अवन्तीमें विचरते हुए वहाँ रहने लगे। पञ्चाशद्धिरहोरान्रैर्दशाडूं सुप्रतिष्ठितम्‌ ।। सरहस्यं धनुर्वेदे सकल॑ ताववापतु: । पचास दिन-रातमें ही उन दोनोंने दस अंगोंसे युक्त, सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित सम्पूर्ण धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया। दृष्टवा कृतास्त्रौ विप्रेन्द्रो गुर्वर्थे तावचोदयत्‌ ।। अयाचतार्थ गोविन्द ततः सान्दीपनिर्वि भु: । उन दोनों भाइयोंको अस्त्र-विद्यामें निपुण देखकर विप्रवर सान्दीपनिने उन्हें गुरुदक्षिणा देनेकी आज्ञा दी। सान्दीपनिजी सब विषयोंमें विद्वान थे। उन्होंने श्रीकृष्णसे अपने अभीष्ट मनोरथकी याचना इस प्रकार की। सान्दीपनिरुवाच मम पुत्र: समुद्रेडस्मिंस्तिमिना चापवाहित: ।। पुत्रमानय भद्ठं ते भक्षितं तिमिना मम । सान्दीपनिजी बोले--मेरा पुत्र इस समुद्रमें नहा रहा था, उस समय “तिमि' नामक जलजन्तु उसे पकड़कर भीतर ले गया और उसके शरीरको खा गया। तुम दोनोंका भला हो। मेरे उस मरे हुए पुत्रको जीवित करके यहाँ ला दो। भीष्म उवाच आर्ताय गुरवे तत्र प्रतिशुश्नाव दुष्करम्‌ ।। अशबव्यं त्रिषु लोकेषु कर्तुमन्येन केनचित्‌ । भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इतना कहते-कहते गुरु सान्दीपनि पुत्रशोकसे आर्त हो गये। यद्यपि उनकी माँग बहुत कठिन थी, तीनों लोकोंमें दूसरे किसी पुरुषके लिये इस कार्यका साधन करना असम्भव था, तो भी श्रीकृष्णने उसे पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा कर ली। यश्न सान्दीपने: पुत्र जघान भरतर्षभ ।। सो<सुर: समरे ताभ्यां समुद्रे विनिपातित: । भरतश्रेष्ठ! जिसने सान्दीपनिके पुत्रको मारा था, उस असुरको उन दोनों भाइयोंने युद्ध करके समुद्रमें मार गिराया। ततः सान्दीपने: पुत्र: प्रसादादमितौजस: ।। दीर्घकालं गत: प्रेतं पुनरासीच्छरीरवान्‌ । तदनन्तर अमिततेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णके कृपाप्रसादसे सान्दीपनिका पुत्र, जो दीर्घकालसे यमलोकमें जा चुका था, पुनः पूर्ववत्‌ शरीर धारण करके जी उठा। तदशक्यमचिन्त्यं च दृष्टवा सुमहदद्भुतम्‌ ।। सर्वेषामेव भूतानां विस्‍स्मयप: समजायत । वह अशक्य, अचिन्त्य और अत्यन्त अदभुत कार्य देखकर सभी प्राणियोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। ऐश्वर्याणि च सर्वाणि गवाश्वं व धनानि च ।। सर्व तदुपजह्वाते गुरवे रामकेशवौ । ततस्तं॑ पुत्रमादाय ददौ च गुरवे प्रभु: ।। बलराम और श्रीकृष्णने अपने गुरुको सब प्रकारके ऐश्वर्य, गाय, घोड़े और प्रचुर धन सब कुछ दिये। तत्पश्चात्‌ गुरुपुत्रको लेकर भगवानने गुरुजीको सौंप दिया। त॑ दृष्टवा पुत्रमायान्तं सान्दीपनिपुरे जना: । अशक्यमेतत्‌ सर्वेषामचिन्त्यमिति मेनिरे ।। कश्न नारायणावन्यश्विन्तयेदिदमद्भुतम्‌ । उस पुत्रको आया देख सान्दीपनिके नगरके लोग यह मान गये कि श्रीकृष्णके द्वारा यह ऐसा कार्य सम्पन्न हुआ है, जो अन्य सब लोगोंके लिये असम्भव और अचिन्त्य है। भगवान्‌ नारायणके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो इस अदभुत कार्यको सोच भी सके (करना तो दूरकी बात है)। गदापरिघयुद्धेषु सर्वास्त्रेषु च केशव: ।। परमां मुख्यतां प्राप्त: सर्वलोकेषु विश्रुत: । भगवान्‌ श्रीकृष्णने गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लिया। वे समस्त लोकोंमें विख्यात हो गये। भोजराजतनूजो<पि कंसस्तात युधिष्ठिर ।। अस्त्रज्ञाने बले वीर्ये कार्तवीर्यसमो5 भवत्‌ । तात युधिष्ठिर! भोजराजकुमार कंस भी अस्त्रज्ञान, बल और पराक्रममें कार्तवीर्य अर्जुनकी समानता करता था। तस्य भोजपते: पुत्राद्‌ भोजराज्यविवर्धनात्‌ ।। उद्विजन्ते सम राजान: सुपर्णादिव पन्नगा: । भोजवंशके राज्यकी वृद्धि करनेवाले भोजराजकुमार कंससे भूमण्डलके सब राजा उसी प्रकार उद्विग्न रहते थे, जैसे गरुड़से सर्प। चित्रकार्मुकनिस्त्रिंशविमलप्रासयोधिन: ।। शतं शतसहस््राणि पादातास्तस्य भारत | भरतनन्दन! उसके यहाँ धनुष, खड्ग और चमचमाते हुए भाले लेकर विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले एक करोड़ पैदल सैनिक थे। अष्टौ शतसहस्राणि शूराणामनिवर्तिनाम्‌ ।। अभवन्‌ भोजराजस्य जाम्बूनदमयध्वजा: । भोजराजके रथी सैनिक, जिनके रथोंपर सुवर्णमय ध्वज फहराते रहते थे तथा जो शूरवीर होनेके साथ ही युद्धमें कभी पीठ दिखलानेवाले नहीं थे, आठ लाखकी संख्यामें थे। स्फुरत्काज्चनकक्ष्यास्तु गजास्तस्य युधिष्ठिर ।। तावन्त्येव सहस्राणि गजानामनिवर्तिनाम्‌ | युधिष्ठिर! कंसके यहाँ युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले हाथीसवार भी आठ ही लाख थे। उनके हाथियोंकी पीठपर सुवर्णके चमकीले हौदे कसे होते थे। ते च पर्वतसड्काशाश्षित्रध्वजपताकिन: ।। बभूवुर्भोजराजस्य नित्यं प्रमुदिता गजा: । भोजराजके वे पर्वताकार गजराज विचित्र ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होते थे और सदा संतुष्ट रहते थे। स्वलड्कृतानां शीघ्राणां करेणूनां युधिष्ठिर । अभवद्‌ भोजराजस्य द्विस्तावद्धि महद्‌ बलम्‌ ।। युधिष्ठि!! भोजराज कंसके यहाँ आभूषणोंसे सजी हुई शीघ्रगामिनी हथिनियोंकी विशाल सेना गजराजोंकी अपेक्षा दूनी थी। षोडशाश्वसहस्राणि किंशुकाभानि तस्य वै | अपरस्तु महाव्यूह: किशोराणां युधिष्ठिर ।। आरोहवरसम्पन्नो दुर्धर्ष. केनचिद्‌ बलात्‌ | स च षोडशसाहस्र: कंसभ्रातृपुरस्सर: ।। उसके यहाँ सोलह हजार घोड़े ऐसे थे, जिनका रंग पलासके फूलकी भाँति लाल था। राजन! किशोर-अवस्थाके घोड़ोंका एक दूसरा दल भी मौजूद था, जिसकी संख्या सोलह हजार थी। इन अश्वोंके सवार भी बहुत अच्छे थे। इस अश्वसेनाको कोई भी बलपूर्वक दबा नहीं सकता था। कंसका भाई सुनामा इन सबका सरदार था। सुनामा सदृशस्तेन स कंसं पर्यपालयत्‌ । वह भी कंसके ही समान बलवान्‌ था एवं सदा कंसकी रक्षाके लिये तत्पर रहता था। य आसन सर्ववर्णस्तु हयास्तस्य युधिष्ठिर ।। स गणो मिश्रको नाम षष्टिसाहस््र उच्यते । युधिष्ठिर! कंसके यहाँ घोड़ोंका एक और भी बहुत बड़ा दल था, जिसमें सभी रंगके घोड़े थे। उस दलका नाम था मिश्रक। मिश्रकोंकी संख्या साठ हजार बतलायी जाती है। कंसरोषमहावेगां ध्वजानूपमहाद्रुमाम्‌ ।। मत्तद्विपमहाग्राहां वैवस्चतवशानुगाम्‌ । (कंसके साथ होनेवाला महान्‌ समर एक भयंकर नदीके समान था।) कंसका रोष ही उस नदीका महान्‌ वेग था। ऊँचे-ऊँचे ध्वज तटवर्ती वृक्षोंके समान जान पड़ते थे। मतवाले हाथी बड़े-बड़े ग्राहोंके समान थे। वह नदी यमराजकी आज्ञाके अधीन होकर चलती थी। शस्त्रजालमहाफेनां सादिवेगमहाजलाम्‌ ।। गदापरिघपाठीनां नानाकवचशैवलाम्‌ । अस्त्र-शस्त्रोंके समूह उसमें फेनका भ्रम उत्पन्न करते थे। सवारोंका वेग उसमें महान्‌ जलप्रवाह-सा प्रतीत होता था। गदा और परिघ पाठीन नामक मछलियोंके सदृश जान पड़ते थे। नाना प्रकारके कवच सेवारके समान थे। रथनागमहावर्ता नानारुधिरकर्दमाम्‌ ।। चित्रकार्मुककल्लोलां रथाश्वकलिलह्ददाम्‌ । रथ और हाथी उसमें बड़ी-बड़ी भँवरोंका दृश्य उपस्थित करते थे। नाना प्रकारका रक्त ही कीचड़का काम करता था। विचित्र धनुष उठती हुई लहरोंके समान जान पड़ते थे। रथ और अश्वोंका समूह हृदके समान था। महामृधनदीं घोरां योधावर्तननि:स्वनाम्‌ ।। को वा नारायणादन्य: कंसहन्ता युधिष्िर । योद्धाओंके इधर-उधर दौड़ने या बोलनेसे जो शब्द होता था, वही उस भयानक समर- सरिताका कलकल नाद था। युधिष्ठिर! भगवान्‌ नारायणके सिवा ऐसे कंसको कौन मार सकता था? एष शक्ररथे तिष्ठंस्तान्यनीकानि भारत || व्यधमद्‌ भोजपुत्रस्यथ महा भ्राणीव मारुत: । भारत! जैसे हवा बड़े-बड़े बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार इन भगवान्‌ श्रीकृष्णने इन्द्रके रथमें बैठकर कंसकी उपर्युक्त सारी सेनाओंका संहार कर डाला। त॑ सभास्थं सहामात्यं हत्वा कंसं सहान्वयम्‌ ।। मानयामास मानार्हा देवकीं ससुहद्गणाम्‌ । सभामें विराजमान कंसको मन्त्रियों और परिवारके साथ मारकर श्रीकृष्णने सुहृदोंसहित सम्माननीय माता देवकीका समादर किया। यशोदां रोहिणीं चैव अभिवाद्य पुन: पुनः ।। उग्रसेनं च राजानमभिषिच्य जनार्दन: । अर्चितो यदुमुख्यैश्व भगवान्‌ वासवानुज: ।। जनार्दनने यशोदा और रोहिणीको भी बारंबार प्रणाम करके उग्रसेनको राजाके पदपर अभिषिक्त किया। उस समय यदुकुलके प्रधान-प्रधान पुरुषोंने इन्द्रके छोटे भाई भगवान्‌ श्रीहरिका पूजन किया। ततः पार्थिवमायान्तं सहित॑ं सर्वराजभि: । सरस्वत्यां जरासंधमजयत्‌ पुरुषोत्तम: ।। तदनन्तर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने समस्त राजाओंके सहित आक्रमण करनेवाले राजा जरासंधको सरोवरों या हृदोंसे सुशोभित यमुनाके तटपर परास्त किया। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [नरकासुरका सैनिकोंसहित वध, देवता आदिकी सोलह हजार कन्याओंको पत्नीरूपमें स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना तथा इन्द्रलोकमें जाकर अदितिको कुण्डल अर्पणकर द्वारकापुरीमें वापस आना] भीष्म उवाच शूरसेनपुरं त्यक्त्वा सर्वयादवनन्दन: । द्वारकां भगवान्‌ कृष्ण: प्रत्यपद्यत केशव: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त यदुवंशियोंको आनन्दित करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण शूरसेनपुरी मथुराको छोड़कर द्वारकामें चले गये। प्रत्यपद्यत यानानि रत्नानि च बहूनि च । यथाहं पुण्डरीकाक्षो नै#तान्‌ प्रतिपालयन्‌ ।। कमलनयन श्रीकृष्णने असुरोंको पराजित करके जो बहुत-से रत्न और वाहन प्राप्त किये थे, उनका वे द्वारकामें यथोचितरूपसे संरक्षण करते थे। तत्र विधघ्नं चरन्ति सम दैतेया: सह दानवै: । ताञ्जघान महाबाहु: वरमत्तान्‌ महासुरान्‌ ।। उनके इस कार्यमें दैत्य और दानव विघ्न डालने लगे। तब महाबाहु श्रीकृष्णने वरदानसे उन्मत्त हुए उन बड़े-बड़े असुरोंको मार डाला। स विघ्नमकरोत्‌ _तत्र नरको नाम नैऋ#ऋत: । त्रासन: सुरसंघानां विदितो व: प्रभावतः ।। तत्पश्चात्‌ नरक नामक राक्षसने भगवानके कार्यमें विघ्म डालना आरम्भ किया। वह समस्त देवताओंको भयभीत करनेवाला था। राजन! तुम्हें तो उसका प्रभाव विदित ही है। स भूम्यां मूर्तिलिड्रस्थ: सर्वदेवासुरान्तक: । मानुषाणामृषीणां च प्रतीपमकरोत्‌ तदा ।। समस्त देवताओंके लिये अन्तकरूप नरकासुर इस धरतीके भीतर मूर्तिलिंगमें- स्थित हो मनुष्यों और ऋषियोंके प्रतिकूल आचरण किया करता था। त्वष्ट्दुहितरं भौम: कशेरुमगमत्‌ तदा । गजरूपेण जग्राह रुचिराड्डीं चतुर्दशीम्‌ ।। भूमिका पुत्र होनेसे नरकको भौमासुर भी कहते हैं। उसने हाथीका रूप धारण करके प्रजापति त्वष्टाकी पुत्री कशेरुके पास जाकर उसे पकड़ लिया। कशेरु बड़ी सुन्दरी और चौदह वर्षकी अवस्थावाली थी। प्रमथ्य च जहारैतां हृत्वा च नरकोडब्रवीत्‌ । नष्टशोकभयाबाध: प्राग्ज्योतिषपतिस्तदा ।। नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका राजा था। उसके शोक, भय और बाधाएँ दूर हो गयी थीं। उसने कशेरुको मूर्च्छित करके हर लिया और अपने घर लाकर उससे इस प्रकार कहा। नरक उवाच यानि देवमनुष्येषु रत्नानि विविधानि च । बिभर्ति च मही कृत्स्ना सागरेषु च यद्‌ वसु ।। अद्यप्रभृति तद्‌ देवि सहिता: सर्वनैर्ऋता: । तवैवोपहरिष्यन्ति दैत्याश्ष॒ सह दानवै: ।। नरकासुर बोला--देवि! देवताओं और मनुष्योंके पास जो नाना प्रकारके रत्न हैं, सारी पृथ्वी जिन रत्नोंको धारण करती है तथा समुद्रोंमें जो रत्न संचित हैं, उन सबको आजसे सभी राक्षस ला-लाकर तुम्हें ही अर्पित किया करेंगे। दैत्य और दानव भी तुम्हें उत्तमोत्तम रत्नोंकी भेंट देंगे। भीष्म उवाच एवमुत्तमरत्नानि बहूनि विविधानि च । स जहार तदा भौम: स्त्रीरत्नानि च भारत ।। भीष्मजी कहते हैं--भारत! इस प्रकार भौमासुरने नाना प्रकारके बहुत-से उत्तम रत्नों तथा स्त्री-रत्नोंका भी अपहरण किया। गन्धर्वाणां च या: कन्या जहार नरको बलात्‌ | याश्व देवमनुष्याणां सप्त चाप्सरसां गणा: ।। गन्धर्वोकी जो कन्याएँ थीं, उन्हें भी नरकासुर बलपूर्वक हर लाया। देवताओं और मनुष्योंकी कनन्‍्याओं तथा अप्सराओंके सात समुदायोंका भी उसने अपहरण कर लिया। चतुर्दशसहस्राणां चैकविंशच्छतानि च । एकवेणी धरा: सर्वा: सतां मार्गमनुव्रता: ।। इस प्रकार सोलह हजार एक सौ सुन्दरी कुमारियाँ उसके घरमें एकत्र हो गयीं। वे सब- की-सब सत्पुरुषोंके मार्गका अनुसरण करके व्रत और नियमके पालनमें तत्पर हो एक वेणी धारण करती थीं। तासामन्तःपुरं भौमो5कारयन्मणि पर्वते । ओऔदकायामदीनात्मा मुरस्य विषयं प्रति ।। उत्साहयुक्त मनवाले भौमासुरने उनके रहनेके लिये मणिपर्वतपर अन्तःपुरका निर्माण कराया। उस स्थानका नाम था औदका (जलकी सुविधासे सम्पन्न भूमि)। वह अन्तःपुर मुर नामक दैत्यके अधिकृत प्रदेशमें बना था। ताश्न प्राग्ज्योतिषो राजा मुरस्य दश चात्मजा: । नैर्नताश्न यथा मुख्या: पालयन्त उपासते ।। प्राग्ज्योतिषपुरका राजा भौमासुर, मुरके दस पुत्र तथा प्रधान-प्रधान राक्षस उस अन्तःपुरकी रक्षा करते हुए सदा उसके समीप ही रहते थे। स एव तपसां पारे वरदत्तो महीसुतः । अदितिं धर्षयामास कुण्डलार्थ युधिष्ठिर ।। युधिष्ठिर! पृथ्वीपुत्र भौमासुर तपस्याके अन्तमें वरदान पाकर इतना गर्वोन्मत्त हो गया था कि इसने कुण्डलके लिये देवमाता अदितितकका तिरस्कार कर दिया। न चासुरगणै: सर्व: सहितै: कर्म तत्‌ पुरा । कृतपूर्व महाघोरं यदकार्षीन्महासुर: ।। पूर्वकालमें समस्त महादैत्योंने एक साथ मिलकर भी वैसा अत्यन्त घोर पाप नहीं किया था, जैसा अकेले इस महान्‌ असुरने कर डाला था। यं मही सुषुवे देवी यस्य प्राग्ज्योतिषं पुरम्‌ । विषयान्तपालाश्ष॒त्वारो यस्यासन्‌ युद्धदुर्मदा: ।। पृथ्वीदेवीने उसे उत्पन्न किया था, प्राग्ज्योतिषपुर उसकी राजधानी थी तथा चार युद्धोन्‍्मत्त दैत्य उसके राज्यकी सीमाकी रक्षा करनेवाले थे। आदेवयानमावृत्य पन्थानं पर्यवस्थिता: । त्रासना: सुरसड्घानां विरूपै राक्षस: सह ।। वे पृथ्वीसे लेकर देवयानतकके मार्गको रोककर खड़े रहते थे। भयानक रूपवाले राक्षसोंके साथ रहकर वे देवसमुदायको भयभीत किया करते थे। हयग्रीवो निशुम्भश्न घोर: पठचजनस्तथा । मुर: पुत्रसहस्नैश्न॒ वरदत्तो महासुर: ।। उन चारों दैत्योंके नाम इस प्रकार हैं--हयग्रीव, निशुम्भ, भयंकर पंचजन तथा सहस्र पुत्रोंसहित महान्‌ असुर मुर, जो वरदान प्राप्त कर चुका था। तद्धधार्थ महाबाहुरेष चक्रगदासिधृक्‌ । जातो वृष्णिषु देवक्यां वासुदेवो जनार्दन: ।। उसीके वधके लिये चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले ये महाबाहु श्रीकृष्ण वृष्णिकुलमें देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए हैं। वसुदेवजीके पुत्र होनेसे ये जनार्दन “वासुदेव' कहलाते हैं। तस्यास्य पुरुषेन्द्रस्य लोकप्रथिततेजस: । निवासो द्वारका तात विदितो व: प्रधानत: ।। तात युधिष्ठिर! इनका तेज सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात है। इन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णका निवासस्थान प्रधानत: द्वारका ही है, यह तुम सब लोग जानते हो। अतीव हि पुरी रम्या द्वारका वासवक्षयात्‌ | अति वै राजते पृथ्व्यां प्रत्यक्ष ते युधिष्ठिर ।। द्वारकापुरी इन्द्रके निवासस्थान अमरावती पुरीसे भी अत्यन्त रमणीय है। युधिष्ठिर! भूमण्डलमें द्वारकाकी शोभा सबसे अधिक है। यह तो तुम प्रत्यक्ष ही देख चुके हो। तस्मिन्‌ देवपुरप्रख्ये सा सभा वृष्ण्युपाश्रया । या दाशाहीति विख्याता योजनायतविस्तृता ।। देवपुरीके समान सुशोभित द्वारका नगरीमें वृष्णिवंशियोंके बैठनेके लिये एक सुन्दर सभा है, जो दाशाहीके नामसे विख्यात है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक-एक योजनकी है। तत्र वृष्ण्यन्धका: सर्वे रामकृष्णपुरोगमा: । लोकयात्रामिमां कृत्स्नां परिरक्षन्त आसते ।। उसमें बलराम और श्रीकृष्ण आदि वृष्णि और अन्धकवंशके सभी लोग बैठते हैं और सम्पूर्ण लोक-जीवनकी रक्षामें दत्तचित्त रहते हैं। तत्रासीनेषु सर्वेषु कदाचिद्‌ भरतर्षभ । दिव्यगन्धा ववुर्वाता: कुसुमानां च वृष्टय: ।। भरतश्रेष्ठ] एक दिनकी बात है; सभी यदुवंशी उस सभामें विराजमान थे। इतनेमें ही दिव्य सुगन्धसे भरी हुई वायु चलने लगी और दिव्य कुसुमोंकी वर्षा होने लगी। ततः सूर्यसहस्राभस्तेजोराशिम॑हाद्भुत: । मुहूर्तमन्तरिक्षे5 भूत्‌ ततो भूमौ प्रतिष्ठित: ।। तदनन्तर दो ही घड़ीके अंदर आकाशमें सहस्रों सूर्योके समान महान्‌ एवं अद्भुत तेजोराशि प्रकट हुई। वह धीरे-धीरे पृथ्वीपर आकर खड़ी हो गयी। मध्ये तु तेजसस्तस्य पाण्डरं गजमास्थित: । वृतो देवगणै: सर्वैर्वासव: प्रत्यदृश्यत ।। उस तेजोमण्डलके भीतर श्वेत हाथीपर बैठे हुए इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंसहित दिखायी दिये। रामकृष्णौ च राजा च वृष्ण्यन्धकगणै: सह । उत्पत्य सहसा तस्मै नमस्कारमकुर्वत ।। बलराम, श्रीकृष्ण तथा राजा उग्रसेन वृष्णि और अन्धकवंशके अन्य लोगोंके साथ सहसा उठकर बाहर आये और सबने देवराज इन्द्रको नमस्कार किया। सो<वतीर्य गजात्‌ तूर्ण परिष्वज्य जनार्दनम्‌ | सस्वजे बलदेवं च राजानं च तमाहुकम्‌ ।। इन्द्रने हाथीसे उतरकर शीघ्र ही भगवान्‌ श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। फिर बलराम तथा राजा उग्रसेनसे भी उसी प्रकार मिले। उद्धवं वसुदेवं च विकद्रूं च महामतिम्‌ | प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं ससात्यकिम्‌ ।। गदं सारणमक्रूरं कृतवर्माणमेव च । चारुदेष्णं सुदेष्णं च अन्यानपि यथोचितम्‌ ।। परिष्वज्य च दृष्टवा च भगवान्‌ भूतभावन: । भूतभावन ऐश्वर्यशाली इन्द्रने वसुदेव, उद्धव, महामति विकढद्रु, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सात्यकि, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, चारुदेष्ण तथा सुदेष्ण आदि अन्य यादवोंका भी यथोचित रीतिसे आलिंगन करके उन सबकी ओर दृष्टिपात किया। वृष्ण्यन्धकमहामात्रान्‌ परिष्वज्याथ वासव: ।। प्रगृहय पूजां तैर्दत्तामुवाचावनतानन: । इस प्रकार उन्होंने वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान व्यक्तियोंको हृदयसे लगाकर उनकी दी हुई पूजा ग्रहण की तथा मुखको नीचेकी ओर झुकाकर वे इस प्रकार बोले-- इन्द्र बवाच अदित्या चोदित: कृष्ण तव मात्राहमागतः ।। कुण्डलेडपहते तात भौमेन नरकेण च । इन्द्रने कहा--भैया कृष्ण! तुम्हारी माता अदितिकी आज्ञासे मैं यहाँ आया हूँ। तात! भूमिपुत्र नरकासुरने उनके कुण्डल छीन लिये हैं। निदेशशब्दवाच्यस्त्वं लोकेडस्मिन्‌ मधुसूदन ।। तस्माज्जहि महाभाग भूमिपूुत्रं नरेश्वर । मधुसूदन! इस लोकमें माताका आदेश सुननेके पात्र केवल तुम्हीं हो। अतः महाभाग नरेश्वर! तुम भौमासुरको मार डालो। भीष्म उवाच तमुवाच महाबाहु: प्रीयमाणो जनार्दन: । निर्जित्य नरक॑ं भौममाहरिष्यामि कुण्डले ।। भीष्मजी कहते हैं--युथिष्ठि!! तब महाबाहु जनार्दन अत्यन्त प्रसन्न होकर बोले --देवराज! मैं भूमिपुत्र नरकासुरको पराजित करके माताजीके कुण्डल अवश्य ला दूँगा'। एवमुकक्‍्त्वा तु गोविन्दो राममेवाभ्यभाषत । प्रद्युम्नमनिरुद्धं च साम्बं चाप्रतिमं बले ।। एतांश्लोक्त्वा तदा तत्र वासुदेवो महायशा: । अथारुह्द सुपर्ण वै शड्खचक्रगदासिधृक्‌ ।। ययौ तदा हृषीकेशो देवानां हितकाम्यया । ऐसा कहकर भगवान्‌ गोविन्दने बलरामजीसे बातचीत की। तत्पश्चात्‌ प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और अनुपम बलवान साम्बसे भी इसके विषयमें वार्तालाप करके महायशस्वी इन्द्रियाधीश्वर भगवान्‌ श्रीकृष्ण शंख, चक्र, गदा और खड़्ग धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो देवताओंका हित करनेकी इच्छासे वहाँसे चल दिये। त॑ प्रयान्तममित्रघ्नं देवा: सहपुरन्दरा: ।। पृष्ठतो<नुययु: प्रीता: स्तुवन्तो विष्णुमच्युतम्‌ । शत्रुनाशन भगवान्‌ श्रीकृष्णको प्रस्थान करते देख इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता बड़े प्रसन्न हुए और अच्युत भगवान्‌ कृष्णकी स्तुति करते हुए उन्हींके पीछे-पीछे चले। सोअग्रयान्‌ रक्षोगणान्‌ हत्वा नरकस्य महासुरान्‌ ।। क्षुरान्‍्तान्‌ मौरवान्‌ पाशान्‌ षघट्सहस्रं ददर्श सः | भगवान्‌ श्रीकृष्णने नरकासुरके उन मुख्य-मुख्य राक्षसोंको मारकर मुर दैत्यके बनाये हुए छ: हजार पाशोंको देखा, जिनके किनारोंके भागोंमें छुरे लगे हुए थे। संच्छिद्य पाशांस्त्वस्त्रेण मुरं हत्वा सहान्वयम्‌ ।। शिलासड्घानतिक्रम्य निशुम्भभवपो थयत्‌ । भगवानने अपने अस्त्र (चक्र)-से मुर दैत्यके पाशोंको काटकर मुर नामक असुरको उसके वंशजों-सहित मार डाला और शिलाओंके समूहोंको लाँधकर निशुम्भको भी मार गिराया। यः सहस््रसमस्त्वेक: सर्वान्‌ देवानयोधयत्‌ ।। त॑ जघान महावीर्य हयग्रीवं महाबलम्‌ | तत्पश्चात्‌ जो अकेला ही सहस्रों योद्धाओंके समान था और सम्पूर्ण देवताओंके साथ अकेला ही युद्ध कर सकता था, उस महाबली एवं महापराक्रमी हयग्रीवको भी मार दिया। अपारतेजा दुर्धर्ष: सर्वयादवनन्दन: ।। मध्ये लोहितगज़ायां भगवान्‌ देवकीसुतः । औदकायां विरूपाक्षं जघान भरतर्षभ ।। पड्च पञ्चजनान्‌ घोरान्‌ नरकस्य महासुरान्‌ | भरतश्रेष्ठ! सम्पूर्ण यादवोंको आनन्दित करनेवाले अमित तेजस्वी दुर्धर्ष वीर भगवान्‌ देवकीनन्दनने औदकाके अन्तर्गत लोहितगंगाके बीच विरूपाक्षको तथा “पंचजन” नामसे प्रसिद्ध नरकासुरके पाँच भयंकर राक्षसोंको भी मार गिराया। ततः प्राग्ज्योतिषं नाम दीप्यमानमिव श्रिया ।। पुरमासादयामास तत्र युद्धमवर्तत । फिर भगवान्‌ अपनी शोभासे उद्दीप्त-से दिखायी देनेवाले प्राग्ज्योतिषपुरमें जा पहुँचे। वहाँ उनका दानवोंसे फिर युद्ध छिड़ गया। महद्‌ दैवासुरं युद्ध यद्‌ वृत्तं भरतर्षभ ।। युद्ध न स्थात्‌ समं तेन लोकविस्मयकारकम्‌ । भरतकुलभूषण! वह युद्ध महान्‌ देवासुर-संग्रामके रूपमें परिणत हो गया। उसके समान लोकविस्मयकारी युद्ध दूसरा कोई नहीं हो सकता। चक्रलाञउ्छनसंछिज्नञा: शक्तिखड्गहतास्तदा ।। निपेतुर्दानवास्तत्र समासाद्य जनार्दनम्‌ | चक्रधारी भगवान्‌ श्रीकृष्णसे भिड़कर सभी दानव वहाँ चक्रसे छिन्न-भिन्न एवं शक्ति तथा खड्गसे आहत होकर धराशायी हो गये। अष्टौ शतसहस्राणि दानवानां परंतप । निहत्य पुरुषव्यात्र: पातालविवरं ययौ ।। त्रासनं सुरसड्घानां नरकं पुरुषोत्तम: । योधयत्यतितेजस्वी मधुवन्मधुसूदन: ।। परंतप युधिष्ठिर! इस प्रकार आठ लाख दानवोंका संहार करके पुरुषसिंह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पातालगुफामें गये, जहाँ देवसमुदायको आतंकित करनेवाला नरकासुर रहता था। अत्यन्त तेजस्वी भगवान्‌ मधुसूदनने मधुकी भाँति पराक्रमी नरकासुरसे युद्ध प्रारम्भ किया। तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरं तेन भौमेन भारत । कुण्डलार्थे सुरेशस्य नरकेण महात्मना ।। भारत! देवमाता अदितिके कुण्डलोंके लिये भूमिपुत्र महाकाय नरकासुरके साथ छिड़ा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर था। मुहूर्त लालयित्वाथ नरकं॑ मधुसूदन: । प्रवृत्तचक्रं चक्रेण प्रममाथ बलादू बली ।। बलवान्‌ मधुसूदनने चक्र हाथमें लिये हुए नरकासुरके साथ दो घड़ीतक खिलवाड़ करके बलपूर्वक चक्रसे उसके मस्तकको काट डाला। चक्रप्रमथितं तस्य पपात सहसा भुवि । उत्तमाड़ं हताड़स्य वृत्रे वजहते यथा ।। चक्रसे छिन्न-भिन्न होकर घायल हुए शरीरवाले नरकासुरका मस्तक वज्के मारे हुए वृत्रासुरके सिरकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। भूमिस्तु पतितं दृष्टवा ते वै प्रादाच्च कुण्डले । प्रदाय च महाबाहुमिदं वचनमत्रवीत्‌ ।। भूमिने अपने पुत्रको रणभूमिमें गिरा देख अदितिके दोनों कुण्डल लौटा दिये और महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा। भूमिर्वाच सृष्टस्त्वयैव मधुहंस्त्वयैव निहतः प्रभो । यथेच्छसि तथा क्रीडन्‌ प्रजास्तस्थानुपालय ।। भूमि बोली--प्रभो मधुसूदन! आपने ही इसे जन्म दिया था और आपने ही इसे मारा है। आपकी जैसी इच्छा हो, वैसी ही लीला करते हुए नरकासुरकी संतानका पालन कीजिये। श्रीभगवानुवाच देवानां च मुनीनां च पितृणां च महात्मनाम्‌ | उद्वेजनीयो भूतानां ब्रह्मद्विट्‌ पुरुषाधम: ।। लोकद्विष्ट: सुतस्ते तु देवारिलोककण्टक: । श्रीभगवानने कहा--भामिनि! तुम्हारा यह पुत्र देवताओं, मुनियों, पितरों, महात्माओं तथा सम्पूर्ण भूतोंके उद्वेगका पात्र हो रहा था। यह पुरुषाधम ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाला, देवताओंका शत्रु तथा सम्पूर्ण विश्वका कण्टक था, इसलिये सब लोग इससे द्वेष रखते थे। सर्वलोकनमस्कार्यामदितिं बाधते बली ।। कुण्डले दर्पसम्पूर्णस्ततो 5सौ निहतो5सुर: । इस बलवान्‌ असुरने बलके घमंडमें आकर सम्पूर्ण विश्वके लिये वन्दनीय देवमाता अदितिको भी कष्ट पहुँचाया और उनके कुण्डल ले लिये। इन्हीं सब कारणोंसे यह मारा गया है। नैव मन्युस्त्वया कार्यो यत्‌ कृतं मयि भामिनि ।। मत्प्रभावाच्च ते पुत्रो लब्धवान्‌ गतिमुत्तमाम्‌ | तस्माद्‌ गच्छ महाभागे भारावतरणं कृतम्‌ ।। भामिनि! मैंने इस समय जो कुछ किया है, उसके लिये तुम्हें मुझपर क्षोभ नहीं करना चाहिये। महाभागे! तुम्हारे पुत्रने मेरे प्रभावसे अत्यन्त उत्तम गति प्राप्त की है; इसलिये जाओ, मैंने तुम्हारा भार उतार दिया है। भूमिका भगवान्‌को अदितिके कुण्डल देना भीष्म उवाच निहत्य नरक॑ भौम सत्यभामासहायवान्‌ | सहितो लोकपालैश्व ददर्श नरकालयम्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! भूमिपुत्र नरकासुरको मारकर सत्यभामासहित भगवान्‌ श्रीकृष्णने लोकपालोंके साथ जाकर नरकासुरके घरको देखा। अथास्य गृहमासाद्य नरकस्य यशस्विन: । ददर्श धनमक्षय्यं रत्नानि विविधानि च ।। यशस्वी नरकके घरमें जाकर उन्होंने नाना प्रकारके रत्न और अक्षय धन देखा। मणिमुक्ताप्रवालानि वैडूर्यविकृतानि च । अश्मसारानर्कमणीन्‌ विमलान्‌ स्फाटिकानपि ।। मणि, मोती, मूँगे, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वस्तुएँ, पुखराज, सूर्यकान्तमणि और निर्मल स्फटिकमणिकी वस्तुएँ भी वहाँ देखनेमें आयीं। जाम्बूनदमयान्येव शातकुम्भमयानि च । प्रदीप्तज्वलना भानि शीतरश्मिप्रभाणि च ।। जाम्बूनद तथा शातकुम्भसंज्ञक सुवर्णकी बनी हुई बहुत-सी ऐसी वस्तुएँ वहाँ दृष्टिगोचर हुईं, जो प्रजजलित अग्नि और शीतरश्मि चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रही थीं। हिरण्यवर्ण रुचिरं श्वेतम भ्यन्तरं गृहम्‌ । यदक्षयं गृहे दृष्टं नरकस्य धनं बहु ।। न हि राज्ञ: कुबेरस्थ तावद्‌ धनसमुच्छूय: । दृष्टपूर्व: पुरा साक्षान्महेन्द्रसदनेष्वपि ।। नरकासुरका भीतरी भवन सुवर्णके समान सुन्दर, कान्तिमान्‌ एवं उज्ज्वल था। उसके घरमें जो असंख्य एवं अक्षय धन दिखायी दिया, उतनी धनराशि राजा कुबेरके घरमें भी नहीं है। देवराज इन्द्रके भवनमें भी पहले कभी उतना वैभव नहीं देखा गया था। इन्द्र उवाच इमानि मणिरत्नानि विविधानि वसूनि च ।। हेमसूत्रा महाकक्ष्यास्तोमरैर्वीर्यशालिन: । भीमरूपाश्च मातड़ा: प्रवालविकृता: कुथा: ।। विमलाभि: पताकाभिववईसांसि विविधानि च | ते च विंशतिसाहस्रा द्विस्तावत्य: करेणव: ।। इन्द्र बोले--जनार्दन! ये जो नाना प्रकारके माणिक्य, रत्न, धन तथा सोनेकी जालियोंसे सुशोभित बड़े-बड़े हौदोंवाले, तोमरसहित पराक्रमशाली बड़े भारी गजराज एवं उनपर बिछानेके लिये मूँगेसे विभूषित कम्बल, निर्मल पताकाओंसे युक्त नाना प्रकारके वस्त्र आदि हैं, इन सबपर आपका अधिकार है। इन गजराजोंकी संख्या बीस हजार है तथा इससे दूनी हथिनियाँ हैं। अष्टौ शतसहस्राणि देशजाश्षोत्तमा हया: । गोभिश्चाविकृतैयनि: कामं तव जनार्दन ।। जनार्दन! यहाँ आठ लाख उत्तम देशी घोड़े हैं और बैल जुते हुए नये-नये वाहन हैं। इनमेंसे जिनकी आपको आवश्यकता हो, वे सब आपके यहाँ जा सकते हैं। आविकानि च सूक्ष्माणि शयनान्यासनानि च । कामव्याहारिणश्रैव पक्षिण: प्रियदर्शना: ।। चन्दनागुरुमिश्राणि यानानि विविधानि च । एतत्‌ ते प्रापयिष्यामि वृष्ण्यावासमरिंदम ।। शत्रुदमन! ये महीन ऊनी वस्त्र, अनेक प्रकारकी शय्याएँ, बहुत-से आसन, इच्छानुसार बोली बोलनेवाले देखनेमें सुन्दर पक्षी, चन्दन और अगुरुमिश्रित नाना प्रकारके रथ--ये सब वस्तुएँ मैं आपके लिये वृष्णियोंके निवासस्थान द्वारकामें पहुँचा दूँगा। भीष्म उवाच देवगन्धर्वरत्नानि दैतेयासुरजानि च । यानि सन्‍्तीह रत्नानि नरकस्य निवेशने ।। एतत्‌ तु गरुडे सर्व क्षिप्रमारोप्प वासव: । दाशार्हपतिना सार्थमुपायान्मणिपर्वतम्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! देवता, गन्धर्व, दैत्य और असुरसम्बन्धी जितने भी रत्न नरकासुरके घरमें उपलब्ध हुए, उन्हें शीघ्र ही गरुड़पर रखकर देवराज इन्द्र दाशार्ईवंशके अधिपति भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ मणिपर्वतपर गये। तत्र पुण्या ववुर्वाता: प्रभाश्षित्रा: समुज्ज्वला: । प्रेक्षतां सुरसड्चानां विस्मय: समपद्यत ।। वहाँ बड़ी पवित्र हवा बह रही थी तथा विचित्र एवं उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली हुई थी। यह सब देखकर देवताओंको बड़ा विस्मय हुआ। त्रिदशा ऋषयश्नैव चन्द्रादित्यौ यथा दिवि | प्रभया तस्य शैलस्य निर्विशेषमिवाभवत्‌ ।। आकाशमण्डलमें प्रकाशित होनेवाले देवता, ऋषि, चन्द्रमा और सूर्यकी भाँति वहाँ आये हुए देवगण उस पर्वतकी प्रभासे तिरस्कृत हो साधारण-से प्रतीत हो रहे थे। अनुज्ञातस्तु रामेण वासवेन च केशव: । प्रीयमाणो महाबाहुर्विवेश मणिपर्वतम्‌ ।। तदनन्तर बलरामजी तथा देवराज इन्द्रकी आज्ञासे महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णने नरकासुरके मणिपर्वतपर बने हुए अन्तःपुरमें प्रसन्नतापूर्वक प्रवेश किया। तत्र वैड्ूूर्यवर्णानि ददर्श मधुसूदन: । सतोरणपताकानि द्वाराणि शरणानि च ।। मधुसूदनने देखा; उस अन्तःपुरके द्वार और गृह वैदूर्यमणिके समान प्रकाशित हो रहे हैं। उनके फाटकोंपर पताकाएँ फहरा रही थीं। चित्रग्रथितमेघा भ: प्रबभौ मणिपर्वत: । हेमचित्रपताकैश्न प्रासादैरपशोभित: ।। सुवर्णमय विचित्र पताकाओंवाले महलोंसे सुशोभित वह मणिपर्वत चित्रलिखित मेघोंके समान प्रतीत होता था। हर्म्याणि च विशालानि मणिसोपानवन्ति च । तत्रस्था वरवर्णाभा ददृशुर्मधुसूदनम्‌ ।। गन्धर्वसुरमुख्यानां प्रिया दुहितरस्तदा । त्रिविष्टपसमे देशे तिष्ठन्तमपराजितम्‌ ।। उन महलोंमें विशाल अट्टालिकाएँ बनी थीं, जिनपर चढ़नेके लिये मणिनिर्मित सीढ़ियाँ सुशोभित हो रही थीं। वहाँ रहनेवाली प्रधान-प्रधान गन्धर्वों और सुरोंकी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंने उस स्वर्गके समान प्रदेशमें खड़े हुए अपराजित वीर भगवान्‌ मधुसूदनको देखा। परिवत्रुर्महाबाहुमेकवेणी धरा: स्त्रिय: । सर्वा: काषायवासिन्य: सर्वाश्च नियतेन्द्रिया: ।। देखते-देखते ही उन सबने महाबाहु श्रीकृष्णको घेर लिया। वे सभी स्त्रियाँ एक वेणी धारण किये गेरुए वस्त्र पहने इन्द्रियसंयमपूर्वक वहाँ तपस्या करती थीं। व्रतसंतापज: शोको नात्र काश्चिदपीडयत्‌ । अरजांसि च वासांसि बिश्रत्य: कौशिकान्यपि ।। समेत्य यदुसिंहस्य चक्रुरस्याञ्जलिं स्त्रिय: । ऊचुश्नैनं हृषीकेशं सर्वास्ता: कमलेक्षणा: ।। उस समय व्रत और संतापजनित शोक उनमेंसे किसीको पीड़ा नहीं दे सका। वे निर्मल रेशमी वस्त्र पहने हुए यदुवीर श्रीकृष्णके पास जा उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं। उन कमलनयनी कामिनियोंने अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी श्रीहरिसे इस प्रकार कहा। कन्यका ऊचु: नारदेन समाख्यातमस्माकं पुरुषोत्तम । आगमिष्यति गोविन्द: सुरकार्यार्थसिद्धये ।। कन्याएँ बोलीं--पुरुषोत्तम! देवर्षि नारदने हमसे कह रखा था कि “देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये भगवान्‌ गोविन्द यहाँ पधारेंगे। सो&सुरं नरकं हत्वा निशुम्भं मुरमेव च । भौमं॑ च सपरीवारं हयग्रीवं च दानवम्‌ ।। तथा पज्चजन चैव प्राप्स्यते धनमक्षयम्‌ । “एवं वे सपरिवार नरकासुर, निशुम्भ, मुर, दानव हयग्रीव तथा पंचजनको मारकर अक्षय धन प्राप्त करेंगे। सो<चिरेणैव कालेन युष्मन्मोक्ता भविष्यति ।। एवमुक्‍क्त्वागमद्‌ धीमान्‌ देवर्षिनारिदस्तथा | 'थोड़े ही दिनोंमें भगवान्‌ यहाँ पधारकर तुम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करेंगे।” ऐसा कहकर परम बुद्धिमान्‌ देवर्षि नारद यहाँसे चले गये। त्वां चिन्तयाना: सततं तपो घोरमुपास्महे ।। काले&तीते महाबाहुं कदा द्रक्ष्याम माधवम्‌ । हम सदा आपका ही चिन्तन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। हमारे मनमें यह संकल्प उठता रहता था कि कितना समय बीतनेपर हमें महाबाहु माधवका दर्शन प्राप्त होगा। इत्येवं हृदि संकल्पं कृत्वा पुरुषसत्तम ।। तपश्चराम सतत रक्ष्यमाणा हि दानवै: । पुरुषोत्तम! यही संकल्प लेकर दानवोंद्वारा सुरक्षित हो हम सदा तपस्या करती आ रही हैं। गान्धर्वेण विवाहेन विवाहं कुरु नः प्रियम्‌ ।। ततोअस्मत्प्रियकामार्थ भगवान्‌ मारुतो<ब्रवीत्‌ । यथोक्तं नारदेनाद्य न चिरात्‌ तद्‌ भविष्यति ।। भगवन! आप गान्धर्व विवाहकी रीतिसे हमारे साथ विवाह करके हमारा प्रिय करें। हमारे पूर्वोक्त मनोरथको जानकर भगवान्‌ वायुदेवने भी हम सबके प्रिय मनोरथकी सिद्धिके लिये कहा था कि *देवर्षि नारदजीने जो कहा है, वह शीघ्र ही पूर्ण होगा'। भीष्म उवाच तासां परमनारीणामृषभाक्षं पुरस्कृतम्‌ । ददृशुर्देवगन्धर्वा गृष्टीनामिव गोपतिम्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! देवताओं तथा ग्रन्धर्वोने देखा, वृषभके समान विशाल नेत्रोंवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण उन परम सुन्दरी नारियोंके समक्ष वैसे ही खड़े थे, जैसे नयी गायोंके आगे साँड़ हो। तस्य चन्द्रोपमं वक्‍्त्रमुदीक्ष्य मुदितेन्द्रिया: । सम्प्रहष्ट महाबाहुमिदं वचनमन्रुवन्‌ ।। भगवानके मुखचन्द्रको देखकर उन सबकी इन्द्रियाँ उललसित हो उठीं और वे हर्षमें भरकर महाबाहु श्रीकृष्णसे पुनः इस प्रकार बोलीं। कन्यका ऊचु: सत्यं बत पुरा वायुरिदमस्मानिहाब्रवीत्‌ | सर्वभूतकृतज्ञश्न महर्षिरपि नारद: ।। कन्याओंने कहा--बड़े हर्षकी बात है कि पूर्व-कालमें वायुदेवने तथा सम्पूर्ण भूतोंके प्रति कृतज्ञता रखनेवाले महर्षि नारदजीने जो बात कही थी, वह सत्य हो गयी। विष्णुर्नारायणो देव: शडखचक्रगदासिधृक्‌ । स भौम॑ नरकं हत्वा भर्ता वो भविता हाुत: ।। उन्होंने कहा था कि “शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले सर्वव्यापी नारायण भगवान्‌ विष्णु भूमिपुत्र नरकको मारकर तुमलोगोंके पति होंगे”। दिष्ट्या तस्यर्षिमुख्यस्य नारदस्य महात्मन: । वचन दर्शनादेव सत्यं भवितुमर्हति ।। ऋषियों में प्रधान महात्मा नारदका वह वचन आज आपके दर्शनमात्रसे सत्य होने जा रहा है, यह बड़े सौभाग्यकी बात है। यत्‌ प्रियं बत पश्याम वकत्रं चन्द्रोपमं तु ते । दर्शनेन कृतार्था: स्मो वयमद्य महात्मन: ।। तभी तो आज हम आपके परम प्रिय चन्द्रतुल्य मुखका दर्शन कर रही हैं। आप परमात्माके दर्शनमात्रसे ही हम कृतार्थ हो गयीं। भीष्म उवाच उवाच स यदुश्रेष्ठ: सर्वास्ता जातमन्मथा: । भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! भगवानके प्रति उन सबके हृदयमें कामभावका संचार हो गया था। उस समय यद्श्रेष्ठ श्रीकृष्णने उनसे कहा। श्रीभगवानुवाच यथा ब्रूत विशालाक्ष्यस्तत्‌ सर्व वो भविष्यति ।। श्रीभगवान्‌ बोले--विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरियो! जैसा तुम कहती हो, उसके अनुसार तुम्हारी सारी अभिलाषा पूर्ण हो जायगी। भीष्म उवाच तानि सर्वाणि रत्नानि गमयित्वाथ किड्करै: | स्त्रियश्व गमयित्वाथ देवतानूपकन्यका: ।। वैनतेयभुजे कृष्णो मणिपर्वतमुत्तमम्‌ । क्षिप्रमारोपयाउ्चक्रे भगवान्‌ देवकीसुत: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! सेवकोंद्वारा उन सब रत्नोंको तथा देवताओं एवं राजाओं आदिकी कन्याओंको द्वारका भेजकर देवकीनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने उस उत्तम मणिपर्वतको शीघ्र ही गरुड़की बाँह (पंख या पीठ)-पर चढ़ा दिया। सपक्षिगणमातऊुूं सव्यालमृगपन्नगम्‌ । शाखामृगगणैर्जुष्टं सप्रस्तरशिलातलम्‌ ।। न्यड्कुभिश्न वराहैश्न रुकुभिश्व निषेवितम्‌ सप्रपातमहासानुं विचित्रशिखिसंकुलम्‌ ।। त॑ महेन्द्रानुज: शौरिश्व॒कार गरुडोपरि । पश्यतां सर्वभूतानामुत्पाट्य मणिपर्वतम्‌ ।। केवल पर्वत ही नहीं, उसपर रहनेवाले जो पक्षियोंके समुदाय, हाथी, सर्प, मृग, नाग, बंदर, पत्थर, शिला, न्यंकु, वराह, रुरु मृग, झरने, बड़े-बड़े शिखर तथा विचित्र मोर आदि थे, उन सबके साथ मणिपर्वतको उखाड़कर इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने सब प्राणियोंके देखते-देखते गरुड़पर रख लिया। उपेन्द्र बलदेवं च वासवं च महाबलम्‌ । तं च रत्नौघमतुलं पर्वतं च महाबल: ।। वरुणस्यामृतं दिव्यं छत्र॑ चन्द्रोपमं शुभम्‌ स्वपक्षबलविक्षेपैरमहाद्रिशिखरोपम: ।। दिक्षु सर्वासु संरावं स चक्रे गरुडो वहन्‌ । महाबली गरुड़ श्रीकृष्ण, बलराम तथा महाबलवान्‌ इन्द्रको, उस अनुपम रत्नराशि तथा पर्वतको, वरुणदेवताके दिव्य अमृत तथा चन्द्रतुल्य उज्ज्वल शुभकारक छत्रको वहन करते हुए चल दिये। उनका शरीर विशाल पर्वतशिखरके समान था। वे अपनी पाँखोंको बलपूर्वक हिला-हिलाकर सब दिशाओंमें भारी शोर मचाते जा रहे थे। आरुजन्‌ पर्वताग्राणि पादपांश्व समुत्क्षिपन्‌ ।। संजहार महा भ्राणि वैश्वानरपथं गत: । उड़ते समय गरुड़ पर्वतोंके शिखर तोड़ डालते थे, पेड़ोंको उखाड़ फेंकते थे और ज्योतिष्पथ (आकाश)-में चलते समय बड़े-बड़े बादलोंको अपने साथ उड़ा ले जाते थे। ग्रहनक्षत्रताराणां सप्तर्षीणां स्वतेजसा ।। प्रभाजालमतिक्रम्य चन्द्रसूर्यप थं ययौ । वे अपने तेजसे ग्रह, नक्षत्र, तारों और सप्तर्षियोंके प्रकाशपुंजको तिरस्कृत करते हुए चन्द्रमा और सूर्यके मार्गपर जा पहुँचे। मेरो: शिखरमासाद्य मध्यमं मधुसूदन: ।। देवस्थानानि सर्वाणि ददर्श भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मधुसूदनने मेरुपर्वतके मध्यम शिखरपर पहुँचकर समस्त देवताओंके निवासस्थानोंका दर्शन किया। विश्वेषां मरुतां चैव साध्यानां च युधिष्ठिर ।। भ्राजमानान्यतिक्रम्य अश्रिनोश्न परंतप । प्राप्प पुण्यतमं स्थानं देवलोकमरिंदम: ।। युधिष्ठिर! उन्होंने विश्वेदवों, मरुदगणों और साध्योंके प्रकाशमान स्थानोंको लाँधकर अश्विनीकुमारोंके पुण्यतम लोकमें पदार्पण किया। परंतप! तत्पश्चात्‌ शत्रुहन्ता भगवान्‌ श्रीकृष्ण देवलोकमें जा पहुँचे। शक्रसझ समासाद्य चावरुह्य जनार्दन: । सो5भिवाद्यादिते: पादावर्चित: सर्वदैवतै: ।। ब्रह्मदक्षपुरोगैश्व प्रजापतिभिरेव च । इन्द्रभवनके निकट जाकर भगवान्‌ जनार्दन गरुड़परसे उतर पड़े। वहाँ उन्होंने देवमाता अदितिके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर ब्रह्मा और दक्ष आदि प्रजापतियोंने तथा सम्पूर्ण देवताओंने उनका भी स्वागत-सत्कार किया। अदिते: कुण्डले दिव्ये ददावथ तदा विभु: ।। रत्नानि च पराध्याणि रामेण सह केशव: । उस समय बलरामसहित भगवान्‌ केशवने माता अदितिको दोनों दिव्य कुण्डल और बहुमूल्य रत्न भेंट किये। प्रतिगृह्द च तत्‌ सर्वमदितिर्वासवानुजम्‌ ।। पूजयामास दाशार्ई रामं च विगतज्वरा । वह सब ग्रहण करके माता अदितिका मानसिक दुःख दूर हो गया और उन्होंने इन्द्रके छोटे भाई यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण और बलरामका बहुत आदर-सत्कार किया। शची महेन्द्रमहिषी कृष्णस्य महिषीं तदा ।। सत्यभामां तु संगृहा अदित्यै वै न्यवेदयत्‌ । इन्द्रकी महारानी शचीने उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णकी पटरानी सत्यभामाका हाथ पकड़कर उन्हें माता अदितिकी सेवामें पहुँचाया। सा तस्या: सत्यभामाया: कृष्णप्रियचिकीर्षया ।। वरं प्रादाद्‌ देवमाता सत्यायै विगतज्वरा । देवमाताकी सारी चिन्ता दूर हो गयी थी। उन्होंने श्रीकृष्णका प्रिय करनेकी इच्छासे सत्यभामाको उत्तम वर प्रदान किया। अदितिरुवाच जरां न यास्यसि वधूर्यावद्‌ वै कृष्णमानुषम्‌ ।। सर्वगन्धगुणोपेता भविष्यसि वरानने । अदिति बोलीं--सुन्दर मुखवाली बहू! जबतक श्रीकृष्ण मानव-शरीरमें रहेंगे, तबतक तू वृद्धावस्थाको प्राप्त न होगी और सब प्रकारकी दिव्य सुगन्ध एवं उत्तम गुणोंसे सुशोभित होती रहेगी। भीष्म उवाच विहृत्य सत्यभामा वै सह शच्या सुमध्यमा ।। शच्यापि समनुज्ञाता ययौ कृष्णनिवेशनम्‌ ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठि! सुन्दरी सत्यभामा शचीदेवीके साथ घूम-फिरकर उनकी आज्ञा ले भगवान्‌ श्रीकृष्णके विश्रामगृहमें चली गयीं। सम्पूज्यमानस्त्रिदशैर्महर्षिगणसेवित: । द्वारकां प्रययौ कृष्णो देवलोकादरिंदम: ।। तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण महर्षियोंसे सेवित और देवताओंद्वारा पूजित होकर देवलोकसे द्वारकाको चले गये। सो&तिपत्य महाबाहुर्दीर्धमध्वानमच्युत: । वर्धमानपुरद्वारमाससाद पुरोत्तमम्‌ ।। महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्ण लंबा मार्ग तय करके उत्तम द्वारका नगरीमें, जिसके प्रधान द्वारका नाम वर्धमान था, जा पहुँचे। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [द्वारकापुरी एवं रुक्मिणी आदि रानियोंके महलोंका वर्णन, श्रीबलराम और श्रीकृष्णका द्वारकामें प्रवेश] भीष्म उवाच तां पुरी द्वारकां दृष्टवा विभुर्नारायणो हरि: । हृष्ट: सर्वार्थसम्पन्नां प्रवेष्टमुपचक्रमे ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! सर्वव्यापी नारायणस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णने सब प्रकारके मनोवांछित पदार्थोंसे भरी-पूरी द्वारकापुरीको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उसमें प्रवेश करनेकी तैयारी की। सो<पश्यद्‌ वृक्षषण्डांश्व॒ रम्यानारामजान्‌ बहून्‌ । समन्ततो द्वारवत्यां नानापुष्पफलान्वितान्‌ ।। उन्होंने देखा, द्वारकापुरीके सब ओर बगीचोंमें बहुत-से रमणीय वृक्षसमूह शोभा पा रहे हैं, जिनमें नाना प्रकारके फल और फूल लगे हुए हैं। अर्कचन्द्रप्रतीकाशैमेरुकुटनि भैर्गृहि: द्वारका रचिता रम्यै: सुकृता विश्वकर्मणा ।। वहाँके रमणीय राजसदन सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशमान तथा मेरुपर्वतके शिखरोंकी भाँति गगनचुम्बी थे। उन भवनोंसे विभूषित द्वारकापुरीकी रचना साक्षात्‌ विश्वकर्माने की थी। पद्मषण्डाकुलाभिश्च हंससेवितवारिभि: | गड्जासिन्धुप्रकाशाभि: परिखाभिरलंकृता ।। उस पुरीके चारों ओर बनी हुई चौड़ी खाइयाँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें कमलके फूल खिले हुए थे। हंस आदि पक्षी उनके जलका सेवन करते थे। वे देखनेमें गंगा और सिन्धुके समान जान पड़ती थीं। प्राकारेणार्कवर्णेन पाण्डरेण विराजिता । वियन्मूर्थ्नि निविष्टेन द्यौरिवा भ्रपरिच्छदा ।। सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाली ऊँची गगनचुम्बिनी श्वेत चहारदीवारीसे सुशोभित द्वारकापुरी सफेद बादलोंसे घिरी हुई देवपुरी (अमरावती)-के समान जान पड़ती थी। नन्दनप्रतिमैश्नापि मिश्रकप्रतिमैर्वनै: | भाति चैत्ररथं दिव्यं पितामहवनं यथा ।। वैभ्राजप्रतिमैश्वैव सर्वर्तुकुसुमोत्कटै: । भाति तारापरिक्षिप्ता द्वारका द्यौरिवाम्बरे ।। ननन्‍्दन और मिश्रक-जैसे वन उस पुरीकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँका दिव्य चैत्ररथ वन ब्रह्माजीके अलौकिक उद्यानकी भाँति शोभित था। सभी ऋतुओंके फूलोंसे भरे हुए वैभ्राज नामक वनके सदृश मनोहर उपवनोंसे घिरी हुई द्वारकापुरी ऐसी जान पड़ती थी, मानो आकाशमें तारिकाओंसे व्याप्त स्वर्गपुरी शोभा पा रही हो। भाति रैवतक: शैलो रम्यसानुर्महाजिर: । पूर्वस्यां दिशि रम्यायां द्वारकायां विभूषणम्‌ ।। रमणीय द्वारकापुरीकी पूर्वदेशामें महाकाय रैवतक पर्वत, जो उस पुरीका आभूषणरूप था, सुशोभित हो रहा था। उसके शिखर बड़े मनोहर थे। दक्षिणस्यां लतावेष्ट: पञ्चवर्णो विराजते । इन्द्रकेतुप्रतीकाश: पश्चिमां दिशमाश्रित: ।। सुकक्षो राजत: शैलश्रित्रपुष्पमहावन: । उत्तरस्यां दिशि तथा वेणुमन्तो विराजते ।। मन्दराद्रिप्रतिकाश: पाण्डर: पाण्डवर्षभ । पुरीके दक्षिण भागमें लतावेष्ट नामक पर्वत शोभा पा रहा था, जो पाँच रंगका होनेके कारण इन्द्रध्वज-सा प्रतीत होता था। पश्चिमदिशामें सुकक्ष नामक रजत-पर्वत था, जिसके ऊपर विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित महान्‌ वन शोभा पा रहा था। पाण्डवश्रेष्ठ) इसी प्रकार उत्तरदिशामें मन्दराचलके सदृश श्वेत वर्णवाला वेणुमन्त पर्वत शोभायमान था। चित्रकम्बलवर्णाभं पाउ्चजन्यवनं तथा ।। सर्वर्तुकवनं चैव भाति रैवतकं प्रति । रैवतक पर्वतके पास चित्रकम्बलके-से वर्णवाले पांचजन्यवन तथा सर्वर्तुकवनकी भी बड़ी शोभा होती थी। लतावेष्टं समन्तात्‌ तु मेरुप्रभवनं महत्‌ ।। भाति तालवनं चैव पुष्पकं पुण्डरीकवत्‌ | लतावेष्ट पर्वतके चारों ओर मेरुप्रभ नामक महान्‌ वन, तालवन तथा कमलोंसे सुशोभित पुष्पकवन शोभा पा रहे हैं। सुकक्ष॑ परिवार्यन चित्रपुष्पं महावनम्‌ ।। शतपत्रवनं चैव करवीरकुसुम्भि च । सुकक्ष पर्वतको चारों ओरसे घेरकर चित्रपुष्प नामक महावन, शतपत्रवन, करवीरवन और कुसुम्भिवन सुशोभित होते हैं। भाति चैत्ररथं चैव नन्दनं च महावनम्‌ ।। रमणं भावनं चैव वेणुमन्तं समन्ततः । वेणुमन्त पर्वतके सब ओर चैत्ररथ, नन्दन, रमण और भावन नामक महान्‌ वन शोभा पाते हैं। भाति पुष्करिणी रम्या पूर्वस्यां दिशि भारत ।। धनु: शतपरीणाहा केशवस्य महात्मन: । भारत! महात्मा केशवकी उस पुरीमें पूर्विदिशाकी ओर एक रमणीय पुष्करिणी शोभा पाती है, जिसका विस्तार सौ धनुष है। महापुरीं द्वारवतीं पञ्चाशद्/िर्मुखैर्युताम्‌ । प्रविष्टी द्वारकां रम्यां भासयन्तीं समन्तत:ः ।। पचास दरवाजोंसे सुशोभित और सब ओरसे प्रकाशमान उस सुरम्य महापुरी द्वारकामें श्रीकृष्णने प्रवेश किया। अप्रमेयां महोत्सेधां महागाधपरिप्लवाम्‌ | प्रासादवरसम्पन्नां श्वेतप्रासादशालिनीम्‌ ।। वह कितनी बड़ी है, इसका कोई माप नहीं था। उसकी ऊँचाई भी बहुत अधिक थी। वह पुरी चारों ओर अत्यन्त अगाध जलराशिसे घिरी हुई थी। सुन्दर-सुन्दर महलोंसे भरी हुई द्वारका श्वेत अट्टालिकाओंसे सुशोभित होती थी। तीक्षणयन्त्रशतध्नीभिर्यन्त्रजालै: समन्विताम्‌ । आयसैश्व महाचक्रैर्ददर्श द्वारकां पुरीम्‌ ।। तीखे यन्त्र, शतघ्नी, विभिन्न यन्त्रोंके समुदाय और लोहेके बने हुए बड़े-बड़े चक्रोंसे सुरक्षित द्वारकापुरीको भगवानने देखा। अष्टौ रथसहस्राणि प्राकारे किडुकिणीकिन: । समुच्छितपताकानि यथा देवपुरे तथा ।। देवपुरीकी भाँति उसकी चहारदीवारीके निकट क्षुद्रधण्टिकाओंसे सुशोभित आठ हजार रथ शोभा पाते थे, जिनमें पताकाएँ फहराती रहती थीं। अष्टयोजनविस्तीर्णामचलां द्वादशायताम्‌ । द्विगुणोपनिवेशां च ददर्श द्वारकां पुरीम्‌ ।। द्वारकापुरीकी चौड़ाई आठ योजन है एवं लम्बाई बारह योजन है अर्थात्‌ वह कुल ९६ योजन विस्तृत है। उसका उपनिवेश (समीपस्थ प्रदेश) उससे दुगुना अर्थात्‌ १९२ योजन विस्तृत है। वह पुरी सब प्रकारसे अविचल है। श्रीकृष्णने उस पुरीको देखा। अष्टमार्गां महाकक्ष्यां महाषोडशचत्वराम्‌ । एवं मार्गपरिक्षिप्तां साक्षादुशनसा कृताम्‌ ।। उसमें जानेके लिये आठ मार्ग हैं, बड़ी-बड़ी ड्योढ़ियाँ हैं और सोलह बड़े-बड़े चौराहे हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गोंसे परिष्कृत द्वारकापुरी साक्षात्‌ शुक्राचार्यकी नीतिके अनुसार बनायी गयी है। व्यूहानामन्तरा मार्गा: सप्त चैव महापथा: । तत्र सा विहिता साक्षान्नगरी विश्वकर्मणा ।। व्यूहोंके बीच-बीचमें मार्ग बने हैं, सात बड़ी-बड़ी सड़कें हैं। साक्षात्‌ विश्वकर्माने इस द्वारकानगरीका निर्माण किया है। काउ्चनैर्मणिसोपानैरुपेता जनहर्षिणी । गीतघोषमहाघोषै: प्रासादप्रवरैः शुभा ।। सोने और मणियोंकी सीढ़ियोंसे सुशोभित यह नगरी जन-जनको हर्ष प्रदान करनेवाली है। यहाँ गीतके मधुर स्वर तथा अन्य प्रकारके घोष गूँजते रहते हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंके कारण वह पुरी परम सुन्दर प्रतीत होती है। तस्मिन्‌ पुरवरश्रेष्ठे दाशार्हाणां यशस्विनाम्‌ । वेश्मानि जहृषे दृष्टया भगवान्‌ पाकशासन: ।। नगरोंमें श्रेष्ठ उस द्वारकामें यशस्वी दशार्हवंशियोंके महल देखकर भगवान्‌ पाकशासन इन्द्रको बड़ी प्रसन्नता हुई। समुच्छितपताकानि पारिप्लवनिभानि च | काउ्चनाभानि भास्वन्ति मेरुकूटनिभानि च ।। उन महलोंके ऊपर ऊँची पताकाएँ फहरा रही थीं। वे मनोहर भवन मेघोंके समान जान पड़ते थे और सुवर्णमय होनेके कारण अत्यन्त प्रकाशमान थे। वे मेरुपर्वतके उत्तुंग शिखरोंके समान आकाशको चूम रहे थे। सुधापाण्डरश्‌ड्लैश्व शातकुम्भपरिच्छदै: । रत्नसानुगुहा शुज्जैः सर्वरत्नविभूषितै: ।। उन गृहोंके शिखर चूनेसे लिपे-पुते और सफेद थे। उनकी छतें सुवर्णकी बनी हुई थीं। वहाँके शिखर, गुफा और शृंग--सभी रत्नमय थे। उस पुरीके भवन सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित थे। सहरमम्यैं: सार्थचन्द्रैश्न सनिर्यूहै: सपअञ्जरै: । सयन्त्रगृहसम्बाधै: सधातुभिरिवाद्रिभि: ।। (भगवानने देखा) वहाँ बड़े-बड़े महल, अटारी तथा छज्जे हैं और उन छज्जोंमें लटकते हुए पक्षियोंके पिंजड़े शोभा पाते हैं। कितने ही यन्त्रगृह वहाँके महलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित होनेके कारण द्वारकाके भवन विविध धातुओंसे विभूषित पर्वतोंके समान शोभा धारण करते हैं मणिकाजञ्चनभौमैश्व सुधामृष्टतलैस्तथा । जाम्बूनदमयैद्वरिवैंडूर्यविकृतार्गलै: ।। कुछ गृह तो मणिके बने हैं, कुछ सुवर्णसे तैयार किये गये हैं और कुछ पार्थिव पदार्थों (ईंट, पत्थर आदि) द्वारा निर्मित हुए हैं। उन सबके निम्नभाग चूनेसे स्वच्छ किये गये हैं। उनके दरवाजे (चौखट-किंवाड़े) जाम्बूनद सुवर्णके बने हैं और अर्गलाएँ (सिटकनियाँ) वैदूर्यमणिसे तैयार की गयी हैं। सर्वर्तुसुखसंस्पर्शमहाधनपरिच्छदै: । रम्यसानुगुहाशज्जैविचित्रैरिव पर्वतैः ।। उन गृहोंका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुख देनेवाला है। वे सभी बहुमूल्य सामानोंसे भरे हैं। उनकी समतल भूमि, गुफा और शिखर सभी अत्यन्त मनोहर हैं। इससे उन भवनोंकी शोभा विचित्र पर्वतोंके समान जान पड़ती है। पज्चवर्णसुवर्णश्च पुष्पवृष्टिसमप्रभे: । तुल्यपर्जन्यनिर्घोषैर्नानावर्णरिवाम्बुदै: ।। उन मृहोंमें पाँच रंगोंके सुवर्ण मढ़े गये हैं। उनसे जो बहुरंगी आभा फैलती है, वह फुलझड़ी-सी जान पड़ती है। उन गृहोंसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान शब्द होते रहते हैं। वे देखनेमें अनेक वर्णॉंके बादलोंके समान जान पड़ते हैं। महेन्द्रशिखरप्रख्यैर्विह्वितैर्वि श्वकर्मणा । आलिखड्धिरिवाकाशमतिचन्द्रार्कभास्वरै: ।। विश्वकर्माके बनाये हुए वे (ऊँचे और विशाल) भवन महेन्द्र पर्वतके शिखरोंकी शोभा धारण करते हैं। उन्हें देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो वे आकाशमें रेखा खींच रहे हों। उनका प्रकाश चन्द्रमा और सूर्यसे भी बढ़कर है। तैर्दाशाहमहाभागैर्बभासे भवनह्दैः । चण्डनागाकुलैघोरिहदैभोंगवती यथा ।। जैसे भोगवती गंगा प्रचण्ड नागगणोंसे भरे हुए भयंकर कुण्डोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी दशा्हकुलके महान्‌ सौभाग्यशाली पुरुषोंसे भरे हुए उपर्युक्त भवनखरूपी हदोंके द्वारा शोभा पा रही है। कृष्णध्वजोपवाही श्व दाशार्हायुधरोहितै: । वृष्णिमत्तमयूरैश्व स्त्रीसहस्रप्रभाकुलै: ।। वासुदेवेन्द्रपर्जन्यैर्गुहमेघैरलड्कृता । ददृशे द्वारकातीव मेघैद्योरिव संवृता । जैसे आकाश मेघोंकी घटासे आच्छादित होता है, उसी प्रकार द्वारकापुरी मनोहर भवनरूपी मेघोंसे अलंकृत दिखायी देती है। ये भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही वहाँ इन्द्र एवं पर्जन्य (प्रमुख मेघ)-के समान हैं। वृष्णिवंशी युवक मतवाले मयूरोंके समान उन भवनरूपी मेघोंको देखकर हर्षसे नाच उठते हैं। सहस्ौरों स्त्रियोंकी कान्ति विद्युत॒की प्रभाके समान उनमें व्याप्त है। जैसे मेघ कृष्णध्वज (अग्नि या सूर्यकिरण)-के उपबाह (आधेय अथवा कार्य) हैं, उसी प्रकार द्वारकाके भवन भी कृष्णध्वजसे विभूषित उपबाहा[ (वाहनों)-से सम्पन्न हैं। यदुवंशियोंके विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्र उन मेघसदृश महलोंमें इन्द्रधनुषकी बहुरंगी छटा छिटकाते हैं। साक्षाद्‌ भगवतो वेश्म विहितं विश्वकर्मणा ।। ददृशुर्देवदेवस्य चतुर्योजनमायतम्‌ । तावदेव च विस्तीर्णमप्रमेयं महाधनै: ।। प्रासादवरसम्पन्नं युक्त जगति पर्वतैः । भारत! देवाधिदेव भगवान्‌ श्रीकृष्णका भवन, जिसे साक्षात्‌ विश्वकर्माने अपने हाथों बनाया है, चार योजन लम्बा और उतना ही चौड़ा दिखायी देता है। उसमें कितनी बहुमूल्य सामग्रियाँ लगी हैं! इसका अनुमान लगाना असम्भव है। उस विशाल भवनके भीतर सुन्दर- सुन्दर महल और अट्नालिकाएँ बनी हुई हैं। वह प्रासाद जगत्‌के सभी पर्वतीय दृश्योंसे युक्त है। श्रीकृष्ण, बलराम और इन्द्रने उस द्वारकाको देखा। यं चकार महाबाहुस्त्वष्टा वासवचोदित: ।। प्रासादं पद्मनाभस्य सर्वतो योजनायतम्‌ । मेरोरिव गिरे: शृड्रमुच्छितं काउचनायुतम्‌ । रुक्मिण्या: प्रवरो वासो विहित: सुमहात्मना ।। महाबाहु विश्वकर्माने इन्द्रकी प्रेरणासे भगवान्‌ पद्मगाभके लिये जिस मनोहर प्रासादका निर्माण किया है, उसका विस्तार सब ओरसे एक-एक योजनका है। उसके ऊँचे शिखरपर सुवर्ण मढ़ा गया है, जिससे वह मेरुपर्वतके उत्तुंग शृंगकी शोभा धारण कर रहा है। वह प्रासाद महात्मा विश्वकर्माने महारानी रुक्मिणीके रहनेके लिये बनाया है। यह उनका सर्वोत्तम निवास है। सत्यभामा पुनर्वेश्म सदा वसति पाण्डरम्‌ | विचित्रमणिसोपानं यं विदु: शीतवानिति ।। श्रीकृष्णकी दूसरी पटरानी सत्यभामा सदा श्वेत-रंगके प्रासादमें निवास करती हैं, जिसमें विचित्र मणियोंके सोपान बनाये गये हैं। उसमें प्रवेश करनेपर लोगोंको (ग्रीष्म-ऋतुमें भी) शीतलताका अनुभव होता है। विमलादित्यवर्णाभि: पताकाभिरलड्कृतम्‌ | व्यक्तबद्धं वनोद्देशे चतुर्दिशि महाध्वजम्‌ ।। निर्मल सूर्यके समान तेजस्विनी पताकाएँ उस मनोरम प्रासादकी शोभा बढ़ाती हैं। एक सुन्दर उद्यानमें उस भवनका निर्माण किया गया है। उसके चारों ओर ऊँची-ऊँची ध्वजाएँ फहराती रहती हैं। स च प्रासादमुख्यो<त्र जाम्बवत्या विभूषित: । प्रभया भूषणैश्रित्रैस्त्रलोक्यमिव भासयन्‌ ।। यस्तु पाण्डरवर्णाभस्तयोरन्तरमाश्रित: । विश्वकर्माकरोदेनं कैलासशिखरोपमम्‌ ।। इसके सिवा वह प्रमुख प्रासाद, जो रुक्मिणी तथा सत्यभामाके महलोंके बीचमें पड़ता है और जिसकी उज्ज्वल प्रभा सब ओर फैली रहती है, जाम्बवतीदेवीद्वारा विभूषित किया गया है। वह अपनी दिव्य प्रभा और विचित्र सजावटसे मानो तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रहा है। उसे भी विश्वकर्माने ही बनाया है। जाम्बवतीका वह विशाल भवन कैलास-शिखरके समान सुशोभित होता है। जाम्बूनदप्रदीप्ताग्र: प्रदीप्तज्वलनोपम: । सागरप्रतिमो5तिष्ठन्मेरुरित्यभिविश्रुत: ।। तस्मिन्‌ गान्धारराजस्य दुहिता कुलशालिनी । सुकेशी नाम विख्याता केशवेन निवेशिता ।। जिसका दरवाजा जाम्बूनद सुवर्णके समान उद्दीप्त होता है, जो देखनेमें प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता है। विशालतामें समुद्रसे जिसकी उपमा दी जाती है, जो मेरुके नामसे विख्यात है, उस महान्‌ प्रासादमें गान्धारराजकी कुलीन कन्या सुकेशीको भगवान्‌ श्रीकृष्णने ठहराया है। पद्मकूट इति ख्यातः पद्मवर्णो महाप्रभ: । सुप्रभाया महाबाहो निवास: परमार्चित: ।। महाबाहो! पद्मकूट नामसे विख्यात जो कमलके समान कान्तिवाला प्रासाद है, वह महारानी सुप्रभाका परम पूजित निवासस्थान है। यस्तु सूर्यप्रभो नाम प्रासादवर उच्यते । लक्ष्मणाया: कुरुश्रेष्ठ स दत्त: शार्जधन्चना ।। कुरुश्रेष्ठ! जिस उत्तम प्रासादकी प्रभा सूर्यके समान है, उसे शार्ड्रधन्वा श्रीकृष्णने महारानी लक्ष्मणाको दे रखा है। वैड्ूूर्यवरवर्णाभ: प्रासादो हरितप्रभ: । यं विदु: सर्वभूतानि हरिरित्येव भारत । वास: स मित्रविन्दाया देवर्षिगणपूजित: ।। महिष्या वासुदेवस्य भूषणं सर्ववेश्मनाम्‌ । भारत! वैदूर्यमणिके समान कान्तिमान्‌ हरे रंगका महल, जिसे देखकर सब प्राणियोंको 'श्रीहरि' ही हैं, ऐसा अनुभव होता है, वह मित्रविन्दाका निवासस्थान है। उसकी देवगण भी सराहना करते हैं। भगवान्‌ वासुदेवकी रानी मित्रविन्दाका यह भवन अन्य सब महलोंका आभूषणरूप है। यस्तु प्रासादमुख्यो5त्र विहित: सर्वशिल्पिभि: ।। अतीव रम्य: सो<प्यत्र प्रहसन्निव तिष्ठति । सुदत्ताया: सुवासस्तु पूजित: सर्वशिल्पिभि: ।। महिष्या वासुदेवस्य केतुमानिति विश्रुत: । युधिष्ठिर! द्वारकामें जो दूसरा प्रमुख प्रासाद है, उसे सम्पूर्ण शिल्पियोंने मिलकर बनाया है। वह अत्यन्त रमणीय भवन हँसता-सा खड़ा है। सभी शिल्पी उसके निर्माण-कौशलकी सराहना करते हैं। उस प्रासादका नाम है केतुमान। वह भगवान्‌ वासुदेवकी महारानी सुदत्तादेवीका सुन्दर निवासस्थान है। प्रासादो विरजो नाम विरजस्को महात्मन: ।। उपस्थानगृहं तात केशवस्य महात्मन: । वहीं “विरज” नामसे प्रसिद्ध एक प्रासाद है, जो निर्मल एवं रजोगुणके प्रभावसे शून्य है। वह परमात्मा श्रीकृष्णका उपस्थानगृह (खास रहनेका स्थान) है। यस्तु प्रासादमुख्योत्र य॑ं त्वष्टा व्यदधात्‌ स्वयम्‌ ।। योजनायतविष्कुम्भं सर्वरत्नमयं विभो: । इसी प्रकार वहाँ एक और भी प्रमुख प्रासाद है, जिसे स्वयं विश्वकर्माने बनाया है। उसकी लंबाई-चौड़ाई एक-एक योजनकी है। भगवान्‌का वह भवन सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्मित हुआ है। तेषां तु विहिता: सर्वे रुक्मदण्डा: पताकिन: । सदने वासुदेवस्य मार्गसंजनना ध्वजा: ।। वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके सुन्दर सदनमें जो मार्गदर्शक ध्वज हैं, उन सबके दण्ड सुवर्णमय बनाये गये हैं। उन सबपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। घण्टाजालानि तत्रैव सर्वेषां च निवेशने । आह्वत्य यदु्सिंहेन वैजयन्त्यचलो महान्‌ ।। द्वारकापुरीमें सभीके घरोंमें घंटा लगाया गया है। यदुसिंह श्रीकृष्णने वहाँ लाकर वैजयन्ती पताकाओंसे युक्त पर्वत स्थापित किया है। हंसकूटस्य यच्छूड्मिन्द्रद्युम्नसरो महत्‌ । षष्टितालसमुत्से धमर्धयोजनविस्तृतम्‌ ।। वहाँ हंसकूट पर्वतका शिखर है, जो साठ ताड़के बराबर ऊँचा और आधा योजन चौड़ा है। वहीं इन्द्रद्युम्नसरोवर भी है, जिसका विस्तार बहुत बड़ा है। सकिन्नरमहानादं तदप्यमिततेजस: । पश्यतां सर्वभूतानां त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ ।। वहाँ सब भूतोंके देखते-देखते किन्नरोंके संगीतका महान्‌ शब्द होता रहता है। वह भी अमिततेजस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्णका ही लीलास्थल है। उसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। आदित्यपथगं यत्‌ तन्मेरो: शिखरमुत्तमम्‌ | जाम्बूनदमयं दिव्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्‌ ।। तदप्युत्पाट्य कृच्छेण स्वं निवेशनमाहतम्‌ । भ्राजमानं पुरा तत्र सर्वौषधिवि भूषितम्‌ ।। मेरुपर्वतका जो सूर्यके मार्गतक पहुँचा हुआ जाम्बूनदमय दिव्य और त्रिभुवनविख्यात उत्तम शिखर है, उसे उखाड़कर भगवान्‌ श्रीकृष्ण कठिनाई उठाकर भी अपने महलमें ले आये हैं। सब प्रकारकी ओषधियोंसे अलंकृत वह मेरुशिखर द्वारकामें पूर्ववत्‌ प्रकाशित है। यमिन्द्रभवनाच्छौरिराजहार परंतप: । पारिजात: स तत्रैव केशवेन निवेशित: ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिसे इन्द्रभवनसे हर ले आये थे, वह पारिजातवृक्ष भी उन्होंने द्वारकामें ही लगा रखा है। विहिता वासुदेवेन ब्रह्म॒ुस्थलमहाद्रुमा: ।। शालतालाश्रकर्णाक्षशतशाखाश्ष रोहिणा: । भल्लातकक पित्थाश्न चन्द्रवृक्षा श्न चम्पका: ।। खर्जूरा: केतकाश्वैव समन्तात्‌ परिरोपिता: । भगवान्‌ वासुदेवने ब्रह्मलोकके बड़े-बड़े वृक्षोंको भी लाकर द्वारकामें लगाया है। साल, ताल, अश्वकर्ण (कनेर), सौ शाखाओंसे सुशोभित वटवृक्ष, भल्‍लातक (भिलावा), कपित्थ (कैथ), चन्द्र (बड़ी इलायचीके) वृक्ष, चम्पा, खजूर और केतक (केवड़ा)--ये वृक्ष वहाँ सब ओर लगाये गये थे। पद्माकुलजलोपेता रक्ता: सौगन्धिकोत्पला: ।। मणिमौक्तिकवालूका: पुष्करिण्य: सरांसि च । तासां परमकूलानि शोभयन्ति महाद्रुमा: ।। द्वारकामें जो पुष्करिणियाँ और सरोवर हैं, वे कमलपुष्पोंसे सुशोभित स्वच्छ जलसे भरे हुए हैं। उनकी आभा लाल रंगकी है। उनमें सुगन्धयुक्त उत्पल खिले हुए हैं। उनमें स्थित बालूके कण मणियों और मोतियोंके चूर्ण-जैसे जान पड़ते हैं। वहाँ लगाये हुए बड़े-बड़े वृक्ष उन सरोवरोंके सुन्दर तटोंकी शोभा बढ़ाते हैं। ये च हैमवता वृक्षा ये च नन्दनजास्तथा । आहत्य यदुसिंहेन तेडपि तत्र निवेशिता: ।। जो वृक्ष हिमालयपर उगते हैं तथा जो नन्दनवनमें उत्पन्न होते हैं, उन्हें भी यदुप्रवर श्रीकृष्णने वहाँ लाकर लगाया है। रक्तपीतारुणप्रख्या: सितपुष्पाश्न पादपा: । सर्वर्तुफलपूर्णास्ते तेषु काननसंधिषु ।। कोई वृक्ष लाल रंगके हैं, कोई पीत वर्णके हैं और कोई अरुण कान्तिसे सुशोभित हैं तथा बहुत-से वृक्ष ऐसे हैं, जिनमें श्वेत रंगके पुष्प शोभा पाते हैं। द्वारकाके उपवनोंमें लगे हुए पूर्वोक्त सभी वृक्ष सम्पूर्ण ऋतुओंके फलोंसे परिपूर्ण हैं। सहस्रपत्रपगश्च मन्दराश्व सहस्रश: । अशोका: कर्णिकाराक्ष॒ तिलका नागमल्लिका: ।। कुरवा नागपुष्पाश्न चम्पकास्तृणगुल्मका: । सप्तपर्णा: कदम्बाश्न॒ नीपा: कुरबकास्तथा ।। केतक्य: केसराश्रैव हिनन्‍्तालतलताटका: । ताला: प्रियज्भुवकुला: पिण्डिका बीजपूरका: ।। द्राक्षामलकरखर्जूरा मृद्वीका जम्बुकास्तथा । आम्रा: पनसवृक्षाश्च॒ अड्कोलास्तिलतिन्दुका: ।। लिकुचाम्रातकाश्रैव क्षीरिका कण्टकी तथा । नालिकेरेड्डुदाश्वैव उत्क्रोशकवनानि च ।। वनानि च कदल्याक्ष जातिमल्लिकपाटला: । भल्लातकक पित्थाश्न तैतभा बन्धुजीवका: ।। प्रवालाशोककाश श्यमर्य: प्राचीनाश्रैव सर्वश: । - कक कक श्र यवैः स्पन्दनचन्दनै: ।। ३ शैक्ष पाटलावटपिप्पलै: । उदुम्बरैश्न द्विदलै: पालाशै: पारिभद्रकै: ।। इन्द्रवृक्षार्जुनैश्वैव अश्वत्थैश्विरिबिल्वकै: । सौभगज्जनकवृक्षैश्न॒ भल्लटैरश्वसाह्यै: ।। सर्जैस्ताम्बूलवल्लीभिललवज्जै: क्रमुकैस्तथा । वंशैश्व विविधैस्तत्र समन्तात्‌ परिरोपितै: ।। सहस्रदल कमल, सहस्रों मन्दार, अशोक, कर्णिकार, तिलक, नागमल्लिका, कुरव (कटसरैया), नागपुष्प, चम्पक, तृण, गुल्म, सप्तपर्ण (छितवन), कदम्ब, नीप, कुरबक, केतकी, केसर, हिंताल, तल, ताटक, ताल, प्रियंगु, वकुल (मौलसिरी), पिण्डिका, बीजपूर (बिजौरा), दाख, आँवला, खजूर, मुनक्का, जामुन, आम, कटहल, अंकोल, तिल, तिन्दुक, लिकुच (लीची), आमड़ा, क्षीरिका (काकोली नामकी जड़ी या पिंडखजूर), करटकी (बेर), नारियल, इंगुद (हिंगोट), उत्क्रोशकवन, कदलीवन, जाति (चमेली), मल्लिका (मोतिया), पाटल, भल्लातक, कपित्थ, तैतभ, बन्धुजीव (दुपहरिया), प्रवाल, अशोक और काश्मरी (गाँभारी) आदि सब प्रकारके प्राचीन वृक्ष, प्रियंगुलता, बेर, जौ, स्पन्दन, चन्दन, शमी, बिल्व, पलाश, पाटला, बड़, पीपल, गूलर, द्विदल, पालाश, पारिभद्रक, इन्द्रवृक्ष, अर्जुनवृक्ष, अश्वत्थ, चिरिबिल्व, सौभंजन, भल्लट, अभ्वपुष्प, सर्ज, ताम्बूललता, लवंग, सुपारी तथा नाना प्रकारके बाँस--ये सब द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णभवनके चारों ओर लगाये हैं। ये च नन्दनजा वृक्षा ये च चैत्ररथे वने । सर्वे ते यदुनाथेन समन्तात्‌ परिरोपिता: ।। नन्दनवनमें और चैत्ररथवनमें जो-जो वृक्ष होते हैं, वे सभी यदुपति भगवान्‌ श्रीकृष्णने लाकर यहाँ सब ओर लगाये हैं। कुमुदोत्पलपूर्णाश्न वाप्य: कूपा: सहस्रश: । समाकुलमहावाप्य: पीता लोहितवालुका: ।। भगवान्‌ श्रीकृष्णके गृहोद्यानमें कुमुदु और कमलोंसे भरी हुई कितनी ही छोटी बावलियाँ हैं। सहस्रों कुएँ बने हुए हैं। जलसे भरी हुई बड़ी-बड़ी वापिकाएँ भी तैयार करायी गयी हैं, जो देखनेमें पीत वर्णकी हैं और जिनकी बालुकाएँ लाल हैं। तस्मिन्‌ गृहवने नद्यः प्रसन्नसलिला हृदा: । फुल्लोत्पलजलोपेता नानाद्रुमसमाकुला: ।। उनके गृहोद्यानमें स्वच्छ जलसे भरे हुए कुण्डवाली कितनी ही कृत्रिम नदियाँ प्रवाहित होती रहती हैं, जो प्रफुल्ल उत्पलयुक्त जलसे परिपूर्ण हैं तथा जिन्हें दोनों ओरसे अनेक प्रकारके वृक्षोंने घेर रखा है। तस्मिन्‌ गृहवने नद्यो मणिशर्करवालुका: । मत्तबर्हिणसड्घाश्न॒ कोकिलाश्न मदोद्वहा: ।। उस भवनके उद्यानकी सीमामें मणिमय कंकड़ और बालुकाओंसे सुशोभित नदियाँ निकाली गयी हैं, जहाँ मतवाले मयूरोंके झुंड विचरते हैं और मदोन्मत्त कोकिलाएँ कुहू-कुहू किया करती हैं। बभूवु: परमोपेता: सर्वे जगतिपर्वता: । तत्रैव गजयूथानि तत्र गोमहिषास्तथा ।। निवासाश्च कृतास्तत्र वराहमृगपक्षिणाम्‌ | उस गृहोद्यानमें जगत्‌के सभी श्रेष्ठ पर्वत अंशतः संगृहीत हुए हैं। वहाँ हाथियोंके यूथ तथा गाय-भैंसोंके झुंड रहते हैं। वहीं जंगली सूअर, मृग और पक्षियोंके रहनेयोग्य निवासस्थान भी बनाये गये हैं। विश्वकर्मकृत: शैल: प्राकारस्तस्य वेश्मन: ।। व्यक्त किष्कुशतोद्याम: सुधाकरसमप्रभ: । विश्वकर्मद्वारा निर्मित पर्वतमाला ही उस विशाल भवनकी चहारदीवारी है। उसकी ऊँचाई सौ हाथकी है और वह चन्द्रमाके समान अपनी श्वेत छटा छिटकाती रहती है। तेन ते च महाशैला: सरितक्ष सरांसि च ।। परिक्षिप्तानि हर्म्यस्य वनान्युपवनानि च | पूर्वोक्त बड़े-बड़े पर्वत, सरिताएँ, सरोवर और प्रासादके समीपवर्ती वन-उपवन इस चहारदीवारीसे घिरे हुए हैं। एवं तच्छिल्पिवर्येण विहित॑ विश्वकर्मणा ।। प्रविशन्नेव गोविन्दो ददर्श परितो मुहुः । इस प्रकार शिल्पियोंमें श्रेष्ठ विश्वकर्माद्वारा बनाये हुए द्वारकानगरमें प्रवेश करते समय भगवान्‌ श्रीकृष्णने बारंबार सब ओर दृष्टिपात किया। इन्द्र: सहामरै: श्रीमांस्तत्र तत्रावलोकयत्‌ । देवताओंके साथ श्रीमान्‌ इन्द्रने वहाँ द्वारकाको सब ओर दृष्टि दौड़ाते हुए देखा। एवमालोकयांचक्रुर्द्धवारकामृषभास्त्रय: । उपेन्द्रबलदेवौ च वासवश्च महायशा: ।। इस प्रकार उपेन्द्र (श्रीकृष्ण), बलराम तथा महायशस्वी इन्द्र इन तीनों श्रेष्ठ महापुरुषोंने द्वारकापुरीकी शोभा देखी। ततस्तं पाण्डरं शौरिरमूर्ध्नि तिष्ठन्‌ गरुत्मतः ।। प्रीत: शड्खमुपादध्मौ विद्विषां रोमहर्षणम्‌ । तदनन्तर गरुडके ऊपर बैठे हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक श्वेतवर्णवाले अपने उस पांचजन्य शंखको बजाया, जो शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला है। तस्य शड्खस्य शब्देन सागरश्नुक्षुभे भृशम्‌ ।। ररास च नभ: सर्व तच्चित्रमभवत्‌ तदा । उस घोर शंखध्वनिसे समुद्र विक्षुब्ध हो उठा तथा सारा आकाशमण्डल गूँजने लगा। उस समय वहाँ यह अदभुत बात हुई। पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं निशम्य कुकुरान्धका: ।। विशोका: समपद्यन्त गरुडस्य च दर्शनात्‌ | पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर और गरुडका दर्शन कर कुकुर और अन्धकवंशी यादव शोकरहित हो गये। शड्खचक्रगदापार्णिं सुपर्णशिरसि स्थितम्‌ ।। दृष्टवा जहृषिरे कृष्णं भास्करोदयतेजसम्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्णके हाथोंमें शंख, चक्र और गदा आदि आयुध सुशोभित थे। वे गरुडके ऊपर बैठे थे। उनका तेज सूर्योदयके समान नूतन चेतना और उत्साह पैदा करनेवाला था। उन्हें देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। ततस्तूर्यप्रणादश्च॒ भेरीनां च महास्वन: ।। सिंहनादश्न सण्जज्ञे सर्वेषां पुरवासिनाम्‌ । तदनन्तर तुरही और भेरियाँ बज उठीं। उनकी आवाज बहुत दूरतक फैल गयी। समस्त पुरवासी भी सिंहनाद कर उठे। ततस्ते सर्वदाशार्हा: सर्वे च कुकुरान्धका: ।। प्रीयमाणा: समाजग्मुरालोक्य मधुसूदनम्‌ । उस समय दाशा्ह, कुकुर और अन्धकवंशके सब लोग भगवान्‌ मधुसूदनका दर्शन करके बड़े प्रसन्न हुए और सभी उनकी अगवानीके लिये आ गये। वासुदेवं पुरस्कृत्य वेणुशंखरवै: सह ।। उग्रसेनो ययौ राजा वासुदेवनिवेशनम्‌ | राजा उग्रसेन भगवान्‌ वासुदेवको आगे करके वेणुनाद और शंखध्वनिके साथ उनके महलतक उन्हें पहुँचानेके लिये गये। आनन्दितुं पर्यचरन्‌ स्वेषु वेश्मसु देवकी ।। रोहिणी च यथोद्देशमाहुकस्य च या: स्त्रिय: । देवकी, रोहिणी तथा उग्रसेनकी स्त्रियाँ अपने-अपने महलोंमें भगवान्‌ श्रीकृष्णका अभिनन्दन करनेके लिये यथास्थान खड़ी थीं। पास आनेपर उन सबने उनका यथावत्‌ सत्कार किया। हता ब्रद्माद्विष: सर्वे जयन्त्यन्धकवृष्णय: ।। एवमुक्त: स ह स्त्रीभिरीक्षितो मधुसूदन: । वे आशीर्वाद देती हुई इस प्रकार बोलीं--“समस्त ब्राह्मणद्वेषी असुर मारे गये; अन्धक और वृष्णिवंशके वीर सर्वत्र विजयी हो रहे हैं।' स्त्रियोंने भगवान्‌ मधुसूदनसे ऐसा कहकर उनकी ओर देखा। ततः शौरि: सुपर्णेन स्वं निवेशनम भ्ययात्‌ ।। चकाराथ यथोद्देशमी श्वरो मणिपर्वतम्‌ । तदनन्तर श्रीकृष्ण गरुडके द्वारा ही अपने महलमें गये। वहाँ उन परमेश्वरने एक उपयुक्त स्थानमें मणिपर्वतको स्थापित कर दिया। ततो धनानि रत्नानि सभायां मधुसूदन: ।। निधाय पुण्डरीकाक्ष: पितुर्दर्शनलालस: । इसके बाद कमलनयन मधुसूदनने सभाभवनमें धन और रत्नोंको रखकर मन-ही-मन पिताके दर्शनकी अभिलाषा की। ततः सान्दीपनिं पूर्वमुपस्पृष्टवा महायशा: ।। ववन्‍्दे पृथुताम्राक्ष: प्रीयमाणो महाभुज: । फिर विशाल एवं कुछ लाल नेत्रोंवाले उन महायशस्वी महाबाहुने पहले मन-ही-मन गुरु सान्दीपनिके चरणोंका स्पर्श किया। तथाश्रुपरिपूर्णाक्षमानन्दगतचेतसम्‌ ।। ववन्दे सह रामेण पितरं वासवानुज: । तत्पश्चात्‌ भाई बलरामजीके साथ जाकर श्रीकृष्णने प्रसन्नतापूर्वक पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। उस समय पिता वसुदेवके नेत्रोंमें प्रेमके आँसू भर आये और उनका हृदय आनन्दके समुद्रके निमग्न हो गया। रामकृष्णौ समाश्शलिष्य सर्वे चान्धकवृष्णय: ।। अन्धक और वृष्णिवंशके सब लोगोंने बलराम और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया। त॑ तु कृष्ण: समाहृत्य रत्नौचधनसंचयम्‌ ।। व्यभजत्‌ सर्ववृष्णिभ्य आदध्वमिति चाब्रवीत्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्णने रतन और धनकी उस राशिको एकत्र करके अलग-अलग बाँट दिया और सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंसे कहा--“यह सब आपलोग ग्रहण करें'। यथाश्रेष्ठमुपागम्य सात्वतान्‌ यदुनन्दन: ।। सर्वेषां नाम जग्राह दाशार्हाणामधोक्षज: । ततः सर्वाणि वित्तानि सर्वरत्नमयानि च ।। व्यभजत्‌ तानि तेभ्यो5थ सर्वेभ्यो यदुनन्दन: । तदनन्तर यदुनन्दन श्रीकृष्णने यदुवंशियोंमें जो श्रेष्ठ पुरुष थे, उन सबसे क्रमशः मिलकर सब यादवोंको नाम ले-लेकर बुलाया और उन सबको वे सभी रत्नमय धन पृथक्‌- पृथक्‌ बाँट दिये। सा केशवमहामान्रैम॑हेन्द्रप्रमुखै: सह ।। शुशुभे वृष्णिशार्दूलै: सिंहैरिव गिरेग्गुहा । जैसे पर्वतकी कन्दरा सिंहोंसे सुशोभित होती है, उसी प्रकार द्वारकापुरी उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्ण, देवराज इन्द्र तथा वृष्णिवंशी वीर पुरुषसिंहोंसे अत्यन्त शोभा पा रही थी। अथासनगतान्‌ सर्वनुवाच विबुधाधिप: ।। शुभया हर्षयन्‌ वाचा महेन्द्रस्तानू महायशा: । कुकुरान्धकमुख्यां श्व॒ तं च राजानमाहुकम्‌ ।। जब सभी यदुवंशी अपने-अपने आसनोंपर बैठ गये, उस समय देवताओंके स्वामी महायशस्वी महेन्द्र अपनी कल्याणमयी वाणीद्वारा कुकुर और अन्धक आदि यादवों तथा राजा उग्रसेनका हर्ष बढ़ाते हुए बोले। इन्द्र रवाच यदर्थ जन्म कृष्णस्य मानुषेषु महात्मन: । यत्‌ कृतं वासुदेवेन तद्‌ वक्ष्यामि समासत: ।। इन्द्रने कहा--यदुवंशी वीरो! परमात्मा श्रीकृष्णका मनुष्य-योनिमें जिस उद्देश्यको लेकर अवतार हुआ है और भगवान्‌ वासुदेवने इस समय जो महान्‌ पुरुषार्थ किया है, वह सब मैं संक्षेपमें बताऊँगा। अयं शतसहस्राणि दानवानामरिंदम: | निहत्य पुण्डरीकाक्ष: पातालविवरं ययौ ।। यच्च नाधिगतं पूर्व: प्रह्मलादबलिशम्बरै: । तदिदं शौरिणा वित्त प्रापितं भवतामिह ।। शत्रुओंका दमन करनेवाले कमलनयन श्रीहरिने एक लाख दानवोंका संहार करके उस पाताल-विवरमें प्रवेश किया था, जहाँ पहलेके प्रह्लाद, बलि और शम्बर आदि दैत्य भी नहीं पहुँच सके थे। भगवान्‌ आपलोगोंके लिये यह धन वहींसे लाये हैं। सपाशं मुरमाक्रम्य पाउ्चजन्यं च धीमता । शिलासड्घानतिक्रम्य निशुम्भ: सगणो हतः । बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने पाशसहित मुर नामक दैत्यको कुचलकर पंचजन नामवाले राक्षसोंका विनाश किया और शिला-समूहोंको लाँधघकर सेवकगणोंसहित निशुम्भको मौतके घाट उतार दिया। हयग्रीवश्न विक्रान्तो निहतो दानवो बली ।। मथितश्न मृथे भौम: कुण्डले चाहते पुन: । प्राप्त च दिवि देवेषु केशवेन महद्‌ यश: ।। तत्पश्चात्‌ इन्होंने बलवान्‌ एवं पराक्रमी दानव हयग्रीवपर आक्रमण करके उसे मार गिराया और भौमासुरका भी युद्धमें संहार कर डाला। इसके बाद केशवने माता अदितिके कुण्डल प्राप्त करके उन्हें यथास्थान पहुँचाया और स्वर्गलोक तथा देवताओंमें अपने महान्‌ यशका विस्तार किया। वीतशोकभयाबाधा: कृष्णबाहुबलाश्रया: । यजन्तु विविधै: सोमैर्मखैरन्धकवृष्णय: ।। अन्धक और वृष्णिवंशके लोग श्रीकृष्णके बाहुबलका आश्रय लेकर शोक, भय और बाधाओंसे मुक्त हैं। अब ये सभी नाना प्रकारके यज्ञों तथा सोमरसद्वारा भगवानका यजन करें। पु]नर्बाणवधे शौरिमादित्या वसुभि: सह | मन्मुखा हि गमिष्यन्ति साध्याश्व मधुसूदनम्‌ ।। अब पुनः बाणासुरके वधका अवसर उपस्थित होनेपर मैं तथा सब देवता, वसु और साध्यगण मधुसूदन श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित होंगे। भीष्म उवाच एवमुक्‍क्त्वा तत: सर्वानामन्त्रय कुकुरान्धकान्‌ | सस्वजे रामकृष्णौ च वसुदेवं॑ च वासव: ।। भीष्मजी कहते हैं--युधिष्ठिर! समस्त कुकुर और अन्धकवंशके लोगोंसे ऐसा कहकर सबसे विदा ले देवराज इन्द्रने बलराम, श्रीकृष्ण और वसुदेवको हृदयसे लगाया। प्रद्युम्नसाम्बनिशठाननिरुद्धं च सारणम्‌ । बभरुं झल्लिं गदं भानुं चारुदेष्णं च वृत्रहा ।। सत्कृत्य सारणाक्रूरी पुनराभाष्य सात्यकिम्‌ | सस्वजे वृष्णिराजानमाहुकं कुकुराधिपम्‌ ।। प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, अनिरुद्ध, सारण, बश्रु, झल्लि, गद, भानु, चारुदेष्ण, सारण और अक्रूरका भी सत्कार करके वृत्रासुरनिषुदन इन्द्रने पुनः सात्यकिसे वार्तालाप किया। इसके बाद वृष्णि और कुकुरवंशके अधिपति राजा उग्रसेनको गले लगाया। भोजं च कृतवर्माणमन्यांश्वान्धकवृष्णिषु । आमन्त्रय देवप्रवरो वासवो वासवानुजम्‌ ।। तत्पश्चात्‌ भोज, कृतवर्मा तथा अन्य अन्धकवंशी एवं वृष्णिवंशियोंका आलिंगन करके देवराजने अपने छोटे भाई श्रीकृष्णसे विदा ली। ततः श्वेताचलप्रख्यं गजमैरावतं प्रभु: । पश्यतां सर्वभूतानामारुरोह शचीपति: ।। तदनन्तर शचीपति भगवान्‌ इन्द्र सब प्राणियोंके देखते-देखते श्वेतपर्वतके समान सुशोभित ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हुए। पृथिवीं चान्तरिक्षं च दिवं च वरवारणम्‌ | मुखाडम्बरनिर्घोषै: पूरयन्तमिवासकृत्‌ ।। वह श्रेष्ठ गजराज अपनी गम्भीर गर्जनासे पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्गलोकको बारंबार निनादित-सा कर रहा था। हैमयन्त्रमहाकक्ष्यं हिरण्मयविषाणिनम्‌ । मनोहरकुथास्तीर्ण सर्वरत्नविभूषितम्‌ ।। उसकी पीठपर सोनेके खंभोंसे युक्त बहुत बड़ा हौदा कसा हुआ था। उसके दाँतोंमें सोना मढ़ा गया था। उसके ऊपर मनोहर झूल पड़ी हुई थी। वह सब प्रकारके रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित था। अनेकशतरत्नाभि: पताकाभिरलड्कृतम्‌ | नित्यस्रुतमदस्रावं क्षरन्तमिव तोयदम्‌ ।। सैकड़ों रत्नोंसे अलंकृत पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं। उसके मस्तकसे निरन्तर मदकी धारा इस प्रकार बहती रहती थी, मानो मेघ पानी बरसा रहा हो। दिशागजं महामात्र॑ काउचनस्त्रजमास्थित: । प्रब॒भौ मन्दराग्रस्थ: प्रतपन्‌ भानुमानिव ।। वह विशालकाय दिग्गज सोनेकी माला धारण किये हुए था। उसपर बैठे हुए देवराज इन्द्र मन्दराचलके शिखरपर तपते हुए सूर्यदेवकी भाँति उद्धासित हो रहे थे। ततो वज्रमयं भीम॑ प्रगृह् परमाड्कुशम्‌ | ययौ बलवता सार्ध पावकेन शचीपति: ।। तदनन्तर शचीपति इन्द्र वज्रमय भयंकर एवं विशाल अंकुश लेकर बलवान अग्निदेवके साथ स्वर्गलोकको चल दिये। तं॑ करेणुगजव्रातैर्विमानैश्व मरुदगणा: । पृष्ठतो$नुययु: प्रीता: कुबेरवरुणग्रहा: ।। उनके पीछे हाथी-हथिनियोंके समुदायों और विमानोंद्वारा मरूदूगण, कुबेर तथा वरुण आदि देवता भी प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े। स वायुपथमास्थाय वैश्वानरपथं गत: । प्राप्प सूर्यपर्थं देवस्तत्रैवान्तरधीयत ।। इन्द्रदेव पहले वायुपथमें पहुँचकर वैश्वानरपथ (तेजोमय लोक)-में जा पहुँचे। तत्पश्चात्‌ सूर्यदेवके मार्गमें जाकर वहाँ अन्तर्धान हो गये। ततः सर्वदशार्हाणामाहुकस्य च या: स्त्रिय: । नन्दगोपस्य महिषी यशोदा लोकविश्वुता ।। रेवती च महाभागा रुक्मिणी च पतिव्रता । सत्या जाम्बवती चोभे गान्धारी शिंशुमापि वा ।। विशोका लक्ष्मणा साध्वी सुमित्रा केतुमा तथा । वासुदेवमहिष्यो नया: श्रिया सार्ध ययुस्तदा ।। विभूतिं द्रष्टमनस: केशवस्य वराड़ना: । प्रीयमाणा: सभां जग्मुरालोकयितुमच्युतम्‌ ।। तदनन्तर सब दशार्हकुलकी स्त्रियाँ, राजा उग्रसेनकी रानियाँ, नन्‍्दगोपकी विश्वविख्यात रानी यशोदा, महाभागा रेवती (बलभद्र-पत्नी) तथा पतिव्रता रुक्मिणी, सत्या, जाम्बवती, गान्धारराजकन्या शिंशुमा, विशोका, लक्ष्मणा, साध्वी सुमित्रा, केतुमा तथा भगवान्‌ वासुदेवकी अन्य रानियाँ--वे सब-की-सब श्रीजीके साथ भगवान्‌ केशवकी विभूति एवं नवागत सुन्दरी रानियोंको देखनेके लिये और श्रीअच्युतका दर्शन करनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ सभाभवनमें गयीं। देवकी सर्वदेवीनां रोहिणी च पुरस्कृता । ददृशुर्देवमासीनं कृष्णं हलभूता सह ।। देवकी तथा रोहिणीजी सब रानियोंके आगे चल रही थीं। सबने वहाँ जाकर श्रीबलरामजीके साथ बैठे हुए श्रीकृष्णको देखा। तौ तु पूर्वमुपक्रम्य रोहिणीमभिवाद्य च । अभ्यवादयतां देवौ देवकी रामकेशवौ ।। देवकीं सप्तदेवीनां यथाश्रेष्ठं च मातर: । उन दोनों भाई बलराम और श्रीकृष्णने उठकर पहले रोहिणीजीको प्रणाम किया। फिर देवकीजीकी तथा सात देवियोंमेंसे श्रेष्ठताके क्रमसे अन्य सभी माताओंकी चरणवन्दना की। ववन्दे सह रामेण भगवान्‌ वासवानुज: ।। अथासनवरमे ॑ प्राप्य वृष्णिदारपुरस्कृता ।। उभावड्कगतौ चक्रे देवकी रामकेशवौ । बलरामसहित भगवान्‌ उपेन्द्रने जब इस प्रकार मातृचरणोंमें प्रणाम किया, तब वृष्णिकूल॒की महिलाओंमें अग्रणी माता देवकीजीने एक श्रेष्ठ आसनपर बैठकर बलराम और श्रीकृष्ण दोनोंको गोदमें ले लिया। सा ताभ्यामृषभाक्षाभ्यां पुत्राभ्यां शुशुभे तदा ।। देवकी देवमातेव मित्रेण वरुणेन च । वृषभके सदृश विशाल नेत्रोंवाले उन दोनों पुत्रोंक साथ उस समय माता देवकीकी वैसी ही शोभा हुई, जैसी मित्र और वरुणके साथ देवमाता अदितिकी होती है। ततः प्राप्ता यशोदाया दुहिता वै क्षणेन हि ।। जाज्वल्यमाना वपुषा प्रभयातीव भारत । इसी समय यशोदाजीकी पुत्री क्षणभरमें वहाँ आ पहुँची। भारत! उसके श्रीअंग दिव्य प्रभासे प्रज्वलित-से हो रहे थे। एकानज्ञेति यामाहु: कन्यां तां कामरूपिणीम्‌ ।। यत्कृते सगणं कंसं जघान पुरुषोत्तम: । उस कामरूपिणी कन्याका नाम था “एकानंगा'। जिसके निमित्तसे पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने सेवकोंसहित कंसका वध किया था। ततः स भगवान्‌ समस्तामुपाक्रम्य भामिनीम्‌ ।। मूर्थ््युपाच्राय सव्येन परिजग्राह पाणिना । दक्षिणेन कराग्रेण परिजग्राह माधव: ।। तब भगवान्‌ बलरामने आगे बढ़कर उस मानिनी बहिनको बायें हाथसे पकड़ लिया और वात्सल्य-स्नेहसे उसका मस्तक सूँघा। तदनन्तर श्रीकृष्णने भी उस कन्याको दाहिने हाथसे पकड़ लिया। ददृशुस्तां सभामध्ये भगिनीं रामकृष्णयो: ।। रुक्मपद्मशयां पद्मां श्रीमिवोत्तमनागयो: । लोगोंने उस सभामें बलराम और श्रीकृष्णकी इस बहिनको देखा; मानो दो श्रेष्ठ गजराजोंके बीचमें सुवर्गणमय कमलके आसनपर विराजमान भगवती लक्ष्मी हों। अथाक्षतमहावृष्ट्या लाजपुष्पघृतैरपि ।। वृष्णयो5वाकिरन्‌ प्रीता: संकर्षणजनार्दनौ । तत्पश्चात्‌ वृष्णिवंशी पुरुषोंने प्रसन्न होकर बलराम और श्रीकृष्णपर लाजा (खील), फूल और घीसे युक्त अक्षतकी वर्षा की। सबाला: सहवृद्धाश्व सज्ञातिकुलबान्धवा: ।। उपोपविविशु: प्रीता वृष्णयो मधुसूदनम्‌ | उस समय बालक, वृद्ध, ज्ञाति, कुल और बन्धु-बान्धवोंसहित समस्त वृष्णिवंशी प्रसन्नतापूर्वक भगवान्‌ मधुसूदनके समीप बैठ गये। पूज्यमानो महाबाहु: पौराणां रतिवर्धन: ।। विवेश पुरुषव्याप्र: स्ववेश्म मधुसूदन: । इसके बाद पुरवासियोंकी प्रीति बढ़ानेवाले पुरुषसिंह महाबाहु मधुसूदनने सबसे पूजित हो अपने महलनमें प्रवेश किया। रुक्मिण्या सहितो देव्या प्रमुमोद सुखी सुखम्‌ | अनन्तरं च सत्याया जाम्बवत्याश्व भारत । सर्वासां च यदुश्रेष्ठ: सर्वकालविहारवान्‌ ।। वहाँ सदा प्रसन्न रहनेवाले श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके साथ बड़े सुखका अनुभव करने लगे। भारत! तत्पश्चात्‌ सदा लीला-विहार करनेवाले यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण क्रमश: सत्यभामा तथा जाम्बवती आदि सभी देवियोंके निवास-स्थानों में गये। जगाम च हृषीकेशो रुक्मिण्या: स्व॑ं निवेशनम्‌ | फिर अन्तमें श्रीकृष्ण रुक्मिणीदेवीके महलमें पधारे। एष तात महाबाहो विजय: शार््धन्वन: ।। एतदर्थ च जन्माहुमनुषेषु महात्मन: । तात! महाबाहु युधिष्ठिर! शार्ड नामक धनुष धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह विजयगाथा कही गयी है। इसीके लिये महात्मा श्रीकृष्णका मनुष्योंमें अवतार हुआ बताया जाता है। (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त) [भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा बाणासुरपर विजय और भीष्मके द्वारा श्रीकृष्ण- माहात्म्यका उपसंहार] भीष्म उवाच द्वारकायां ततः कृष्ण: स्वदारेषु दिवानिशम्‌ | सुखं लब्ध्वा महाराज प्रमुमोद महायशा: ।। भीष्मजी कहते हैं--महाराज युधिष्ठिर! तदनन्तर महायशस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी रानियोंके साथ दिन-रात सुखका अनुभव करते हुए द्वारकापुरीमें आनन्दपूर्वक रहने लगे। पौत्रस्य कारणाच्चक्रे विबुधानां हितं तदा | सवासवी: सुरै: सर्वर्दुष्करं भरतर्षभ ।। भरतश्रेष्ठ! उन्होंने अपने पौत्र अनिरुद्धको निमित्त बनाकर देवताओंका जो हित-साधन किया, वह इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये अत्यन्त दुष्कर था। बाणो नामाभवदू राजा बलेज्येछसुतो बली । वीर्यवान्‌ भरतश्रेष्ठ स च बाहुसहस्रवान्‌ ।। भरतकुलभूषण! बाण नामक एक राजा हुआ था, जो बलिका ज्येष्ठ पुत्र था। वह महान्‌ बलवान्‌ और पराक्रमी होनेके साथ ही सहस्र भुजाओंसे सुशोभित था। ततश्नक्रे तपस्तीव्रं सत्येन मनसा नृप । रुद्रमाराधयामास स च बाण: समा बहू: ।। राजन! बाणासुरने सच्चे मनसे बड़ी कठोर तपस्या की। उसने बहुत वर्षोतक भगवान्‌ शंकरकी आराधना की। तस्मै बहुवरा दत्ता: शड्करेण महात्मना | तस्माल्लब्ध्वा वरान्‌ बाणो दुर्लभान्‌ ससुरैरपि ।। स शोणितपुरे राज्यं चकाराप्रतिमो बली | महात्मा शंकरने उसे अनेक वरदान दिये। भगवान्‌ शंकरसे देवदुर्लभ वरदान पाकर बाणासुर अनुपम बलशाली हो गया और शोणितपुरमें राज्य करने लगा। त्रासिताश्न सुरा: सर्वे तेन बाणेन पाण्डव ।। विजित्य विबुधान्‌ सर्वान्‌ सेन्द्रानू बाण: समा बहू: । अशासत महद्‌ राज्यं कुबेर इव भारत ।। भरतवंशी पाण्डुनन्दन! बाणासुरने सब देवताओंको आतंकित कर रखा था। उसने इन्द्र आदि सब देवताओंको जीतकर कुबेरकी भाँति दीर्घकालतक इस भूतलपर महान्‌ राज्यका शासन किया। ऋद्धयर्थ कुरुते यत्नं तस्य चैवोशना कवि: । ज्ञानी विद्वान्‌ शुक्राचार्य उसकी समृद्धि बढ़ानेके लिये प्रयत्न करते रहते थे। ततो राजन्नुषा नाम बाणस्य दुहिता तथा ।। रूपेणाप्रतिमा लोके मेनकाया: सुता यथा । राजन! बाणासुरके एक पुत्री थी, जिसका नाम उषा था। संसारमें उसके रूपकी तुलना करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी। वह मेनका अप्सराकी पुत्री-सी प्रतीत होती थी। अथोपायेन कौन्तेय अनिरुद्धो महाद्युति: ।। प्राद्युम्निस्तामुषां प्राप्य प्रच्छन्न: प्रमुमोद ह । कुन्तीनन्दन! महान्‌ तेजस्वी प्रद्युम्नपुत्र अनिरुद्ध किसी उपायसे उषातक पहुँचकर छिपे रहकर उसके साथ आनन्दका उपभोग करने लगे। अथ बाणो महातेजास्तदा तत्र युधिष्ठिर ।। त॑ गुहानिलयं ज्ञात्वा प्राद्युम्निंसुतया सह । गृहीत्वा कारयामास वस्तुं कारागृहे बलात्‌ ।। युधिष्ठिर! महातेजस्वी बाणासुरने गुप्तरूपसे छिपे हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धका अपनी पुत्रीके साथ रहना जान लिया और उन्हें अपनी पुत्रीसहित बलपूर्वक कारागारमें ठूँस देनेके लिये बंदी बना लिया। सुकुमार: सुखाहों5थ तदा दुःखमवाप स: । बाणेन खेदितो राजन्ननिरुद्धो मुमोह च ।। राजन! वे सुकुमार एवं सुख भोगनेके योग्य थे, तो भी उन्हें उस समय दुःख उठाना पड़ा। बाणासुरके द्वारा भाँति-भाँतिके कष्ट दिये जानेपर अनिरुद्ध मूर्च्छित हो गये। एतस्मिन्नेव काले तु नारदो मुनिपुड्रवः । द्वारकां प्राप्प कौन्तेय कृष्णं दृष्टवा वचो<ब्रवीत्‌ ।। कुन्तीकुमार! इसी समय मुनिप्रवर नारदजी द्वारकामें आकर श्रीकृष्णसे मिले और इस प्रकार बोले। नारद उवाच कृष्ण कृष्ण महाबाहो यदूनां कीर्तिवर्धन । त्वत्पौत्रो बाध्यमानो5थ बाणेनामिततेजसा ।। कृच्छूं प्राप्तोडनिरुद्धों वै शेते कारागृहे सदा । नारदजीने कहा--महाबाहु श्रीकृष्ण! आप यदुवंशियोंकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। इस समय अमित-तेजस्वी बाणासुर आपके पौत्र अनिरुद्धको बहुत कष्ट दे रहा है। वे संकटमें पड़े हैं और सदा कारागारमें निवास कर रहे हैं। भीष्म उवाच एवमुकक्‍्त्वा सुरषिर्वि बाणस्याथ पुरं ययौ ।। नारदस्य वच: श्रुत्वा ततो राजन्‌ जनार्दन: | आहूय बलदेदवं वै प्रद्युम्नं च महाद्युतिम्‌ ।। आरुरोह गरुत्मन्तं ताभ्यां सह जनार्दन: । भीष्मजी कहते हैं-राजन! ऐसा कहकर देवर्षि नारद बाणासुरकी राजधानी शोणितपुरको चले गये। नारदजीकी बात सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने बलरामजी तथा महातेजस्वी प्रद्युम्मको बुलाया और उन दोनोंके साथ वे गरुड़पर आरूढ़ हुए। ततः सुपर्णमारुहय[ त्रयस्ते पुरुषर्षभा: ।। जम्मुः क्रुद्धा महावीर्या बाणस्य नगर प्रति । तदनन्तर वे तीनों महापराक्रमी पुरुषरत्न गरुड़पर आरूढ़ हो क्रोधमें भरकर बाणासुरके नगरकी ओर चल दिये। अथासाद्य महाराज तत्पुरी ददृशुश्व ते ।। ताम्रप्राकारसंवीतां रूप्यद्वारैश्ष शोभिताम । महाराज! वहाँ जाकर उन्होंने बाणासुरकी पुरीको देखा, जो ताँबेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी। चाँदीके बने हुए दरवाजे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। हेमप्रासादसम्बाधां मुक्तामणिविचित्रताम्‌ ।। उद्यानवनसम्पन्नां नृत्तगीतैश्व शोभिताम्‌ । वह पुरी सुवर्णमय प्रासादोंसे भरी हुई थी और मुक्तामणियोंसे उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसमें स्थान-स्थानपर उद्यान और वन शोभा पा रहे थे। वह नगरी नृत्य और गीतोंसे सुशोभित थी। तोरणै: पक्षिभ्रि: कीर्णा पुष्करिण्या च शोभिताम्‌ ।। तां पुरी स्वर्गसंकाशां हृष्टपुष्टजनाकुलाम्‌ । दृष्टवा मुदा युतां हैमां विस्मयं परमं ययु: ।। वहाँ अनेक सुन्दर फाटक बने थे। सब ओर भाँति-भाँतिके पक्षी चहचहाते थे। कमलोंसे भरी हुई पुष्करिणी उस पुरीकी शोभा बढ़ाती थी। उसमें हृष्ट-पुष्ट स्त्री-पुरुष निवास करते थे और वह पुरी स्वर्गके समान मनोहर दिखायी देती थी। प्रसन्नतासे भरी हुई उस सुवर्णमयी नगरीको देखकर श्रीकृष्ण, बलराम और प्रद्युम्न तीनोंको बड़ा विस्मय हुआ। तस्य बाणपुरस्यासन्‌ द्वारस्था देवता: सदा । महेश्वरो गुहश्वैव भद्रकाली च पावक: ।। एता वै देवता राजन्‌ ररक्षुस्तां पुरीं सदा । बाणासुरकी राजधानीमें कितने ही देवता सदा द्वारपर बैठकर पहरा देते थे। राजन! भगवान्‌ शंकर, कार्तिकेय, भद्रकालीदेवी और अग्नि--ये देवता सदा उस पुरीकी रक्षा करते थे। अथ कृष्णो बलाज्जित्वा द्वारपालान्‌ युधिष्ठिर ।। सुसंक्रुद्धो महातेजा: शड्खचक्रगदाधर: । आससादीत्तरद्वारं शड़करेणाभिपालितम्‌ ।। युधिष्ठिर! शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महातेजस्वी श्रीकृष्णने अत्यन्त कुपित हो पूर्वद्वारके रक्षकोंको बलपूर्वक जीतकर भगवान्‌ शंकरके द्वारा सुरक्षित उत्तरद्वारपर आक्रमण किया। तत्र तस्थौ महातेजा: शूलपाणिमेहिश्वर: । पिनाकं सशरं गृह बाणस्य हितकाम्यया ।। ज्ञात्वा तमागतं कृष्णं व्यादितास्यमिवान्तकम्‌ । महेश्वरो महाबाहु: कृष्णाभिमुखमाययौ ।। वहाँ महान्‌ तेजस्वी भगवान्‌ महेश्वर हाथमें त्रिशूल लिये खड़े थे। जब उन्हें मालूम हुआ कि भगवान्‌ श्रीकृष्ण मुँह बाये कालकी भाँति आ रहे हैं, तब वे महाबाहु महेश्वर बाणासुरके हित-साधनकी इच्छासे बाणसहित पिनाक नामक धनुष हाथमें लेकर श्रीकृष्णके सम्मुख आये। ततस्तौ चक्रतुर्युद्धं वासुदेवमहे श्वरौ । तद्‌ युद्धमभवद्‌ घोरमचिन्त्यं रोमहर्षणम्‌ ।। तदनन्तर भगवान्‌ वासुदेव और महेश्वर परस्पर युद्ध करने लगे। उनका वह युद्ध अचिन्त्य, रोमांचकारी तथा भयंकर था। अन्योन्यं तौ ततक्षाते अन्योन्यजयकाड्क्षिणौ । दिव्यास्त्राणि च तौ देवी क्रुद्धौं मुमुचतुस्तदा ।। वे दोनों देवता एक-दूसरेपर विजय पानेकी इच्छासे परस्पर प्रहार करने लगे। दोनों ही क्रोधमें भरकर एक-दूसरेपर दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करते थे। ततः कृष्णो रण कृत्वा मुहूर्त शूलपाणिना । विजित्य त॑ महादेवं ततो युद्धे जनार्दन: ।। अन्यांश्व जित्वा द्वारस्थान्‌ प्रविवेश पुरोत्तमम्‌ तदनन्तर भगवान्‌ श्रीकृष्णने शूलपाणि भगवान्‌ शंकरके साथ दो घड़ीतक युद्ध करके महादेवजीको जीत लिया तथा द्वारपर खड़े हुए अन्य शिवगणोंको भी परास्त करके उस उत्तम नगरमें प्रवेश किया। प्रविश्य बाणमासाद्य स तत्राथ जनार्दन: ।। चक्रे युद्ध महाक्रुद्धस्तेन बाणेन पाण्डव । पाण्डुनन्दन! पुरीमें प्रवेश करके अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए श्रीजनार्दनने बाणासुरके पास पहुँचकर उसके साथ युद्ध छेड़ दिया। बाणो<पि सर्वशस्त्राणि शितानि भरतर्षभ ।। सुसंक्रुद्धस्तदा युद्धे पातयामास केशवे । भरतश्रेष्ठ) बाणासुर भी क्रोधसे आगबबूला हो रहा था। उसने भी युद्धमें भगवान्‌ केशवपर सभी तीखे-तीखे अस्त्र-शस्त्र चलाये। पुनरुद्यम्य शस्त्राणां सहस्न॑ सर्वबाहुभि: ।। मुमोच बाण: संक्रुद्ध: कृष्णं प्रति रणाजिरे । फिर उसने उद्योगपूर्वक अपनी सभी भुजाओंसे उस समरांगणमें कुपित हो श्रीकृष्णपर सहसोौं शस्त्रोंका प्रहार किया। ततः कृष्णस्तु सज्छिद्य तानि सर्वाणि भारत ।। कृत्वा मुहूर्त बाणेन युद्ध राजन्नधोक्षज: । चक्रमुद्यम्य राजन वै दिव्यं शस्त्रोत्तमं तत: ।। सहस्रबाहुंश्चिच्छेद बाणस्यामिततेजस: । भारत! परंतु श्रीकृष्णने वे सभी शस्त्र काट डाले। राजन्‌! तदनन्तर भगवान्‌ अधोक्षजने दो घड़ीतक बाणासुरके साथ युद्ध करके अपना दिव्य उत्तम शस्त्र चक्र हाथमें उठाया और अमिततेजस्वी बाणासुरकी सहस्र भुजाओंको काट दिया। ततो बाणो महाराज कृष्णेन भृूशपीडित: ।। छिन्नबाहु: पपाताशु विशाख इव पादप: । महाराज! तब श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त पीड़ित होकर बाणासुर भुजाएँ कट जानेपर शाखाहीन वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़ा। स पातयित्वा बालेयं बाणं कृष्णस्त्वरान्वित: ।। प्राद्युम्निं मोक्षयामास क्षिप्तं कारागृहे तदा । इस प्रकार बलिपुत्र बाणासुरको रणभूमिमें गिराकर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ कैदमें पड़े हुए प्रद्युम्नकुमार अनिरुद्धको छुड़ा लिया। मोक्षयित्वाथ गोविन्द: प्राद्युम्निंसह भार्यया । बाणस्य सर्वरत्नानि असंख्यानि जहार स: ।। पत्नीसहित अनिरुद्धको छुड़ाकर भगवान्‌ गोविन्दने बाणासुरके सभी प्रकारके असंख्य रत्न हर लिये। गोधनान्यथ सर्वस्वं स बाणस्यालये बलात्‌ । जहार च हृषीकेशो यदूनां कीर्तिवर्धन: ।। ततः स सर्वरत्नानि चाहृत्य मधुसूदन: । क्षिप्रमारोपयाउ्चक्रे तत्‌ सर्व गरुडोपरि ।। उसके घरमें जो भी गोधन अथवा अन्य किसी प्रकारके धन मौजूद थे, उन सबको भी यदुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भगवान्‌ हृषीकेशने हर लिया। फिर वे सब रत्न लेकर मधुसूदनने शीघ्रतापूर्वक गरुड़पर रख लिये। त्वरयाथ स कौन्तेय बलदेवं महाबलम्‌ | प्रद्युम्नं च महावीर्यमनिरुद्ध॑ महाद्युतिम्‌ ।। उषां च सुन्दरीं राजन्‌ भृत्यदासीगणै: सह । सवनितान्‌ समारोप्य रत्नानि विविधानि च ।। कुन्तीनन्दन! तत्पश्चात्‌ उन्होंने महाबली बलदेव, अमितपराक्रमी प्रद्युम्न, परम कान्तिमान्‌ अनिरुद्ध तथा सेवकों और दासियोंसहित सुन्दरी उषा--इन सबको और नाना प्रकारके रत्नोंको भी गरुड़पर चढ़ाया। मुदा युक्तो महातेजा: पीताम्बरधरो बली । दिव्याभरणचित्राड़: शड्खचक्रगदासि भृत्‌ ।। आरुरोह गरुत्मन्तमुदयं भास्करो यथा । इसके बाद शंख, चक्र, गदा और खड्ग धारण करनेवाले, पीताम्बरधारी, महाबली एवं महातेजस्वी श्रीकृष्ण बड़ी प्रसन्नताके साथ स्वयं भी गरुड़पर आरूढ़ हुए, मानो भगवान्‌ भास्कर उदयाचलपर आसीन हुए हों। उस समय भगवानके श्रीअंग दिव्य आभूषणोंसे विचित्र शोभा धारण कर रहे थे। अथारुह्द[ सुपर्ण स प्रययौ द्वारकां प्रति ।। प्रविश्य स्वपुरं कृष्णो यादवै: सहितस्तत: । प्रमुमोद तदा राजन्‌ स्वर्गस्थो वासवो यथा ।। गरुड़पर आरूढ़ हो श्रीकृष्ण द्वारकाकी ओर चल दिये। राजन! अपनी पुरी द्वारकामें पहुँचकर वे यदुवंशियोंके साथ ठीक वैसे ही आनन्दपूर्वक रहने लगे, जैसे इन्द्र स्वर्गलोकमें देवताओंके साथ रहते हैं। सूदिता मौरवा: पाशा निशुम्भनरकौ हतौ । कृतक्षेम: पुनः पन्था: पुरं प्राग्ज्योतिषं प्रति ।। शौरिणा पृथिवीपालास्त्रासिता भरतर्षभ । धनुषश्च प्रणादेन पाउ्चजन्यस्वनेन च ।। भरतश्रेष्ठ! भगवान्‌ श्रीकृष्णने मुरदैत्यके पाश काट दिये, निशुम्भ और नरकासुरको मार डाला और प्राग्ज्योतिषपुरका मार्ग सब लोगोंके लिये निष्कण्टक बना दिया। इन्होंने अपने धनुषकी टंकार और पांचजन्य शंखके हुंकारसे समस्त भूपालोंको आतंकित कर दिया है। मेघप्रख्यैरनीकैश्व दाक्षिणात्यै: सुसंवृतम्‌ । रुक्मिणं त्रासयामास केशवो भरतर्षभ ।। भरतकुलभूषण! भगवान्‌ केशवने उस रुक्मीको भी भयभीत कर दिया, जिसके पास मेघोंकी घटाके समान असंख्य सेनाएँ हैं और जो दाक्षिणात्य सेवकोंसे सदा सुरक्षित रहता है। ततः पर्जन्यघोषेण रथेनादित्यवर्चसा । उवाह महिषीं भोज्यामेष चक्रगदाधर: ।। इन चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवानने रुक्मीको हराकर सूर्यके समान तेजस्वी तथा मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले रथके द्वारा भोजकुलोत्पन्ना रुक्मिणीका अपहरण किया, जो इस समय इनकी महारानीके पदपर प्रतिष्ठित हैं। जारूथ्यामाहुति: क्राथ: शिशुपालश्च निर्जित: । वक्रश्न सह शैब्येन शतधन्वा च क्षत्रिय: ।। ये जारूथी नगरीमें वहाँके राजा आहुतिको तथा क्राथ एवं शिशुपालको भी परास्त कर चुके हैं। इन्होंने शैब्य, दन्‍्तवक्र तथा शतधन्वा नामक क्षत्रियोंको भी हराया है। इन्द्रद्युम्नो हत: क्रोधाद्‌ यवनश्न॒ कशेरुमान्‌ । इन्होंने इन्द्रद्युम्न, कालयवन और कशेरुमानका भी क्रोधपूर्वक वध किया है। पर्वतानां सहस्नं च चक्रेण पुरुषोत्तम: ।। विभियद्य पुण्डरीकाक्षो द्युमत्सेनमयोधयत्‌ । कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने चक्रद्वारा सहस्रों पर्वतोंको विदीर्ण करके द्युमत्सेनके साथ युद्ध किया। महेन्द्रशिखरे चैव निमेषान्तरचारिणौ ।। जग्राह भरतश्रेष्ठ वरुणस्याभिततक्षुरौ । इरावत्यामुभौ चैतावग्निसूर्यसमौ बले ।। गोपतिस्तालकेतुश्न निहतौ शार््र्धन्वना । भरतश्रेष्ठ] जो बलमें अग्नि और सूर्यके समान थे और वरुणदेवताके उभय पार्श्चमें विचरण करते तथा जिनमें पलक मारते-मारते एक स्थानसे दूसरे स्थानमें पहुँच जानेकी शक्ति थी, वे गोपति और तालकेतु भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा महेन्द्र पर्वतके शिखरपर इरावती नदीके किनारे पकड़े और मारे गये। अक्षप्रपतने चैव नेमिहंसपथेषु च ।। उभौ तावपि कृष्णेन स्वराष्ट्रे विनिपातितौ । अक्षप्रपतनके अन्तर्गत नेमिहंसपथ नामक स्थानमें, जो उनके अपने ही राज्यमें पड़ता था, उन दोनोंको भगवान्‌ श्रीकृष्णने मारा था। प्राग्ज्योतिषं पुरश्रेष्ठमसुरैर्बहुभिर्वृतम्‌ । प्राप्प लोहितकूटानि कृष्णेन वरुणो जित: ।। अजेयो दुष्प्रधर्षश्ष लोकपालो महाद्युति: । बहुतेरे असुरोंसे घिरे हुए पुरश्रेष्ठ प्राग्ज्योतिषमें पहुँचकर वहाँकी पर्वतमालाके लाल शिखरोंपर जाकर श्रीकृष्णने उन लोकपाल वरुणदेवतापर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्धर्ष, अजेय एवं अत्यन्त तेजस्वी हैं। इन्द्रद्वीपो महेन्द्रेण गुप्तो मघवता स्वयम्‌ ।। पारिजातो हृत:ः पार्थ केशवेन बलीयसा | पार्थ! यद्यपि इन्द्र पारिजातके लिये द्वीप (रक्षक) बने हुए थे, स्वयं ही उसकी रक्षा करते थे, तथापि महाबली केशवने उस वृक्षका अपहरण कर लिया। पाण्ड्यं पौण्डूं च मात्स्यं च कलिड्ुं च जनार्दन: ।। जघान सहितान्‌ सर्वानजड्वराजं च माधव: । लक्ष्मीपति जनार्दनने पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिंग और अंग आदि देशोंके समस्त राजाओंको एक साथ पराजित किया। एष चैकशतं हत्वा रथेन क्षत्रपुड़वान्‌ ।। गान्धारीमवहत्‌ कृष्णो महिषीं यादवर्षभ: । यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्णने केवल एक रथपर चढ़कर अपने विरोधमें खड़े हुए सौ क्षत्रियनरेशोंकों मौतके घाट उतारकर गान्धारराजकुमारी शिंशुमाको अपनी महारानी बनाया। बश्नोक्ष प्रियमन्विच्छन्नेष चक्रगदाधर: ।। वेणुदारिहतां भार्यामुन्ममाथ युधिष्छिर । युधिष्ठिर! चक्र और गदा धारण करनेवाले इन भगवानने बभ्रुका प्रिय करनेकी इच्छासे वेणुदारिके द्वारा अपहृत की हुई उनकी भार्याका उद्धार किया था। पर्याप्तां पृथिवीं सर्वा साश्वां सरथकुञ्जराम्‌ ।। वेणुदारिवशे युक्तां जिगाय मधुसूदन: । इतना ही नहीं; मधुसूदनने वेणुदारिके वशमें पड़ी हुई घोड़ों, हाथियों एवं रथोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको भी जीत लिया। अवाप्य तपसा वीर्य बलमोजश्षू भारत ।। त्रासिता: सगणा: सर्वे बाणेन विबुधाधिपा: । वज्राशनिगदापाशैस्त्रासयद्धिरनेकश: ।। तस्य नासीद्‌ रणे मृत्युर्देवेरपि सवासवै: । सोऊ5भिभूतश्न कृष्णेन निहतश्न महात्मना ।। छित्त्वा बाहुसहस्र॑ं तद्‌ गोविन्देन महात्मना । भारत! जिस बाणासुरने तपस्याद्वारा बल, वीर्य और ओज पाकर समस्त देवेश्वरोंको उनके गणोंसहित भयभीत कर दिया था, इन्द्र आदि देवताओंके द्वारा बारंबार वज्र, अशनि, गदा और पाशोंका प्रहार करके त्रास दिये जानेपर भी समरांगणमें जिसकी मृत्यु न हो सकी, उसी दैत्यराज बाणासुरको महामना भगवान्‌ गोविन्दने उसकी सहस्र भुजाएँ काटकर पराजित एवं क्षत-विक्षत कर दिया। एष पीठं महाबाहु: कंसं च मधुसूदन: ।। पैठकं॑ चातिलोमानं निजघान जनार्दन: | मधु दैत्यका विनाश करनेवाले इन महाबाहु जनार्दनने पीठ, कंस, पैठक और अतिलोमा नामक असुरोंको भी मार दिया। जम्भमैरावतं चैव विरूपं च महायशा: ।। जघान भरतश्रेष्ठ शम्बरं चारिमर्दनम्‌ | भरतश्रेष्ठस इन महायशस्वी श्रीकृष्णने जम्भ, ऐरावत, विरूप और शभत्रुमर्दन शम्बरासुरको भी (अपनी विभूतियों-द्वारा) मरवा डाला। एष भोगवती गत्वा वासुकिं भरतर्षभ ।। निर्जित्य पुण्डरीकाक्षो रोौहिणेयममोचयत्‌ | भरतकुलभूषण! इन कमलनयन श्रीहरिने भोगवती-पुरीमें जाकर वासुकि नागको हराकर रोहिणीनन्दनको- बन्धनसे छुड़ाया। एवं बहूनि कर्माणि शिशुरेव जनार्दन: ।। कृतवान्‌ पुण्डरीकाक्ष: संकर्षणसहायवान्‌ | इस प्रकार संकर्षणसहित कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णने बाल्यावस्थामें ही बहुत-से अद्भुत कर्म किये थे। एवमेषो5सुराणां च सुराणां चापि सर्वश: ।। भयाभयकर: कृष्ण: सर्वलोकेश्वर: प्रभु: । ये ही देवताओं और असुरोंको सर्वथा अभय तथा भय देनेवाले हैं। भगवान्‌ श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण लोकोंके अधीश्वर हैं। एवमेष महाबाहु: शास्ता सर्वदुरात्मनाम्‌ ।। कृत्वा देवार्थममितं स्वस्थान प्रतिपत्स्यते । इस प्रकार सम्पूर्ण दुष्टोंका दमन करनेवाले ये महाबाहु भगवान्‌ श्रीहरि अनन्त देवकार्य सिद्ध करके अपने परमधामको पधारेंगे। एष भोगवती रम्यामृषिकान्तां महायशा: ।। द्वारकामात्मसात्‌ कृत्वा सागरं गमयिष्यति । ये महायशस्वी श्रीकृष्ण मुनिजनवांछित एवं भोगोंसे सम्पन्न रमणीय द्वारकापुरीको आत्मसात्‌ करके समुद्रमें विलीन कर देंगे। बहुपुण्यवतीं रम्यां चैत्ययूपवर्ती शुभाम्‌ ।। द्वारकां वरुणावासं प्रवेक्ष्यति सकाननाम्‌ | ये चैत्य और यूपोंसे सम्पन्न, परम पुण्यवती, रमणीय एवं मंगलमयी द्वारकाको वन- उपवनोंसहित वरुणालयमें डुबा देंगे। तां सूर्यससदनप्रख्यां मनोज्ञां शार्डधन्वना ।। विश्लिष्टां वासुदेवेन सागर: प्लावयिष्यति । सूर्यलोकके समान कान्तिमती एवं मनोरम द्वारकापुरीको जब शार्ड्रधन्वा वासुदेव त्याग देंगे, उस समय समुद्र इसे अपने भीतर ले लेगा। सुरासुरमनुष्येषु नाभून्न भविता क्वचित्‌ ।। यस्तामध्यवसद्‌ राजा अन्यत्र मधुसूदनात्‌ | भगवान्‌ मधुसूदनके सिवा देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें ऐसा कोई राजा न हुआ और न होगा ही, जो द्वारकापुरीमें रहनेका संकल्प भी कर सके। भ्राजमानास्तु शिशवो वृष्ण्यन्धकमहारथा: ।। तज्जुष्टं प्रतिपत्स्यन्ते नाकपृष्ठं गतासव: । उस समय वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी एवं उनके कान्तिमान्‌ शिशु भी प्राण त्यागकर भगवत्सेवित परमधामको प्राप्त करेंगे। एवमेव दशार्हाणां विधाय विधिना विधिम्‌ ।। विष्णुर्नारायण: सोम: सूर्यश्ष सविता स्वयम्‌ । इस प्रकार ये दशार्हवंशियोंके सब कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे। ये स्वयं ही विष्णु, नारायण, सोम, सूर्य और सविता हैं। अप्रमेयो5नियोज्यश्नल यत्रकामगमो वशी ।। मोदते भगवान्‌ भूतैर्बाल: क्रीडनकैरिव । ये अप्रमेय हैं। इनपर किसीका नियन्त्रण नहीं चल सकता। ये इच्छानुसार चलनेवाले और सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। जैसे बालक खिलौनेसे खेलता है, उसी प्रकार ये भगवान्‌ सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ आनन्दमयी क्रीड़ा करते हैं। नैष गर्भत्वमापेदे न योन्यामवसत्‌ प्रभु: ।। आत्मनस्तेजसा कृष्ण: सर्वेषां कुरुते गतिम्‌ | ये प्रभु न तो किसीके गर्भमें आते हैं और न किसी योनिविशेषमें ही इनका आवास हुआ है अर्थात्‌ ये अपने-आप ही प्रकट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण अपने ही तेजसे सबकी सदगति करते हैं। यथा बुद्बुद उत्थाय तत्रैव प्रविलीयते ।। चराचराणि भूतानि तथा नारायणे सदा । जैसे बुदुबुद पानीसे उठकर फिर उसीमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार समस्त चराचर भूत सदा भगवान्‌ नारायणसे प्रकट होकर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं। न प्रमातुं महाबाहु: शक्यो भारत केशव: ।। परं हापरमेतस्माद विश्वरूपान्न विद्यते | भारत! इन महाबाहु केशवकी कोई इतिश्री नहीं बतायी जा सकती। इन विश्वरूप परमेश्वरसे भिन्न पर और अपर कुछ भी नहीं है। अयं तु पुरुषो बाल: शिशुपालो न बुध्यते । सर्वत्र सर्वदा कृष्णं तस्मादेवं प्रभाषते,यह शिशुपाल मूढ़बुद्धि पुरुष है, यह भगवान्‌ श्रीकृष्णको सर्वत्र व्यापक तथा सर्वदा स्थिर नहीं जानता है, इसीलिये उनके सम्बन्धमें ऐसी बातें कहता है

Bhīṣma said: “O King Yudhiṣṭhira, listen to the profound and difficult-to-fathom course of the deeds of the Supreme Lord—those performed in the present as well as those in the past. The Lord’s actions are not measured by ordinary standards; they unfold from sovereignty and for the ordering of the world.”

Verse 31

यो हि धर्म विचिनुयादुत्कृष्टं मतिमान्‌ नर: । स वै पश्येद्‌ यथा धर्म न तथा चेदिराडयम्‌,जो बुद्धिमान्‌ मनुष्य उत्तम धर्मकी खोज करता है, वह धर्मके स्वरूपको जैसा समझता है, वैसा यह चेदिराज शिशुपाल नहीं समझता

Bhīṣma said: A discerning man who investigates dharma in its highest form comes to see dharma as it truly is. But this king of Cedi—Śiśupāla—does not understand dharma in that way.

Verse 32

सवृद्धबालेष्वथवा पार्थिवेषु महात्मसु । को ना मन्यते कृष्णं को वाप्येनं न पूजयेत्‌ ।। अथवा वृद्धों और बालकोंसहित यहाँ बैठे हुए समस्त महात्मा राजाओंमें ऐसा कौन है, जो श्रीकृष्ण-को पूज्य न मानता हो या कौन है, जो इनकी पूजा न करता हो?

Bhīṣma said: “Among these great-souled kings assembled here—together with elders and children—who would not regard Kṛṣṇa as worthy of honor? Or who, indeed, would fail to worship and revere him?”

Verse 33

अथीनां दुष्कृतां पूजां शिशुपालो व्यवस्यति । दुष्कृतायां यथान्यायं तथायं कर्तुमहति,यदि शिशुपाल इस पूजाको अनुचित मानता है, तो अब उस अनुचित पूजाके विषयमें उसे जो उचित जान पड़े, वैसा करे

Bhīṣma said: “Śiśupāla has resolved to oppose this act of honoring those he deems unworthy or wrongly honored. If he considers this worship improper, then let him proceed in the manner he believes to be just and appropriate regarding that improper honor.”

Verse 38

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि भीष्मवाक्ये अष्टात्रिंशो5 ध्याय: ।। ३८ || इस प्रकार श्रीमयह्या भारत सभापवकिे अन्तर्गत अर्घाभिद्टरणपर्वमें भीष्मवाक्य नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Sabhā Parva, in the section called the Arghābhiharaṇa Parva, the thirty-eighth chapter—known as Bhīṣma’s discourse—comes to an end.

Verse 126

समागतानामश्रौष॑ बहुन्‌ बहुमतान्‌ सताम्‌ | मैंने बहुत-से ज्ञानवृद्ध महात्माओंका संग किया है। अपने यहाँ पधारे हुए उन संतोंके मुखसे अनन्तगुणशाली भगवान्‌ श्रीकृष्णके असंख्य बहुसम्मत गुणोंका वर्णन सुना है

Bhīṣma said: “From many virtuous and widely respected sages who had gathered and visited our court, I have heard. Having kept the company of numerous elders in wisdom, I listened from those saints’ own mouths to the countless, universally acclaimed excellences of Bhagavān Śrī Kṛṣṇa—whose qualities are without end.”

Verse 136

बहुश: कथ्यमानानि नरैर्भूय: श्रुतानि मे । जन्मकालसे लेकर अबतक इन बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णके जो-जो चरित्र बहुधा बहुतेरे मनुष्योंद्वारा कहे गये हैं, उन सबको मैंने बार-बार सुना है

Bhīṣma said: “Many times—again and again—I have heard from various people the oft-recounted accounts: the deeds and episodes (carita) of the wise Śrī Kṛṣṇa, from the time of his birth onward.”

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns moral authority in public institutions: whether an elder’s endorsement and praise can be trusted when opponents argue that past conduct and inner disposition contradict proclaimed dharma.

The chapter frames a cautionary principle: ethical discourse (dharma-vākya) is socially binding only when aligned with conduct; otherwise, speech becomes a tool of domination or deception and invites collective repudiation.

No explicit phalaśruti is stated. The meta-commentary is implicit through the gāthā and exemplum: inner intention and action determine the credibility and karmic-social consequences of moral instruction.