
अक्षरब्रह्मयोगः | Akṣara-Brahma-Yoga (The Yoga of the Imperishable Brahman)
Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-upākhyāna within Bhīṣma-parva)
This chapter opens with Arjuna’s technical inquiries into core categories: brahman, adhyātma (the inner self-nature), karma, adhibhūta (perishable phenomena), adhidaiva (the cosmic-person principle), and adhiyajña (the sacrificial principle within embodied life). Kṛṣṇa answers by defining brahman as the imperishable (akṣara), adhyātma as svabhāva, and karma as the generative act that produces states of being. He identifies the adhiyajña as present within the body and prescribes a practical soteriology centered on remembrance at the time of death: the final mental orientation conditions the subsequent trajectory. The discourse then outlines yogic concentration (sense-restraint, mind placed in the heart, prāṇa directed upward), the use of Oṃ as a single-syllable brahman for focused departure, and the accessibility of the supreme for the consistently integrated practitioner. The chapter further distinguishes cyclic cosmology (day/night of Brahmā, manifestation and dissolution) from the higher, unperishing reality, and closes with the two ‘paths’ (bright/dark) associated with non-return and return, concluding that knowledge of these prevents confusion and that yoga surpasses ritual merit in reaching the primordial highest station.
Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-तट पर, शंखनाद और रथों की धूल के बीच, श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध से पहले भीतर के युद्ध का मार्ग दिखाते हैं—संन्यास और योग का वास्तविक अर्थ क्या है? → अर्जुन के मन में शंका उठती है: यदि कर्म करते हुए फल का आश्रय न लिया जाए तो वह संन्यास कैसे हुआ, और योग कैसे? श्रीकृष्ण बताते हैं कि योग की आरम्भिक सीढ़ी निष्काम कर्म है, और योग में आरूढ़ होने पर शम (मन-निग्रह) ही साधन बनता है। मन की चंचलता, संकल्पों की बाढ़, और विषयों की खींच—यही साधक की परीक्षा बनती है। → ध्यानयोग की चरम विधि उद्घाटित होती है: ‘शनैः शनैरुपरमेत् बुद्ध्या धृतिगृहीतया—आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्।’ संकल्पजन्य कामनाओं का सर्वथा त्याग, धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को आत्मा में स्थिर करना, और उसी स्थिति में ‘ब्रह्म-संस्पर्श’ से ‘अत्यन्त सुख’ का अनुभव—यही अध्याय का शिखर है; जहाँ ‘सुखमात्यन्तिकं… बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्’ का स्वाद मिलता है और साधक तत्त्वतः विचलित नहीं होता। → श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि असंयत मन से योग दुष्प्राप्य है; पर वश में किए मन से वह सुलभ हो जाता है। फिर वे योगी की श्रेष्ठता घोषित करते हैं—तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मियों से भी ऊपर—और अर्जुन को योगी बनने का आदेश देते हैं। → योगी को सर्वश्रेष्ठ कह देने के बाद अगला प्रश्न स्वाभाविक बनता है: अनेक साधनों (ज्ञान, ध्यान, भक्ति, कर्म) में अंतिम आश्रय कौन-सा है—और ‘श्रेष्ठ योगी’ वास्तव में किसे कहा जाए?
Verse 1
६) अर्थात् “वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है।। इसीको परम शान्तिकी प्राप्ति, अक्षय सुखकी प्राप्ति, ब्रह्मप्राप्ति, मोक्षप्राप्ति और परमगतिकी प्राप्ति कहते हैं। ३. इस जन्म और जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार, राग-द्वेषादि दोष तथा उनकी वृत्तियोंके पुंज, जो मनुष्यके अन्तःकरणमें इकट्ठे रहते हैं, बन्धनमें हेतु होनेके कारण सभी कल्मष--पाप हैं। परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर इन सबका नाश हो जाता है। फिर उस पुरुषके अन्तःकरणमें दोषका लेशमात्र भी नहीं रहता। ४. यहाँ “कामक्रोधवियुक्तानाम' से मलदोषका, “यतचेतसाम्' से विक्षेपदोषका और “विदितात्मनाम्' से आवरणदोषका सर्वथा अभाव दिखलाकर परमात्माके पूर्ण ज्ञानकी प्राप्ति बतलायी गयी है। इसलिये “यति” शब्दका अर्थ यहाँ सांख्ययोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त आत्मसंयमी तत्त्वज्ञानी मानना उचित है। ५. परमात्माको प्राप्त ज्ञानी महापुरुषोंके अनुभवमें ऊपर-नीचे, बाहर-भीतर, यहाँ-वहाँ, सर्वत्र नित्य-निरन्तर एक विज्ञानानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही विद्यमान हैं--एक अद्वितीय परमात्माके सिवा अन्य किसी भी पदार्थकी सत्ता ही नहीं है, इसी अभिप्रायसे कहा गया है कि उनके लिये सभी ओरसे परमात्मा ही परिपूर्ण हैं। ६. विवेक और वैराग्यके बलसे सम्पूर्ण बाह्रुविषयोंको क्षणभंगुर, अनित्य, दुःखमय और दुःखोंके कारण समझकर उनके संस्काररूप समस्त चित्रोंको अन्तःकरणसे निकाल देना--उनकी स्मृतिको सर्वथा नष्ट कर देना ही बाहरके विषयोंको बाहर निकाल देना है। ७. नेत्रोंके द्वारा चारों ओर देखते रहनेसे तो ध्यानमें स्वाभाविक ही विघष्न--विक्षेप होता है और उन्हें बंद कर लेनेसे आलस्य और निद्राके वश हो जानेका भय है। इसीलिये नेत्रोंकी दृष्टिको भूकुटीके बीचमें स्थिर करनेको कहा गया है। ८. प्राण और अपानकी स्वाभाविक गति विषम है। कभी तो वे वाम नासिकामें विचरते हैं और कभी दक्षिण नासिकामें। वाममें चलनेको इडानाडीमें चलना और दक्षिणमें चलनेको पिंगलामें चलना कहते हैं। ऐसी अवस्थामें मनुष्यका चित्त चंचल रहता है। इस प्रकार विषमभावसे विचरनेवाले प्राण और अपानकी गतिको दोनों नासिकाओंमें समानभावसे कर देना उनको सम करना है। यही उनका सुषुम्णामें चलना है। सुषुम्णा नाड़ीपर चलते समय प्राण और अपानकी गति बहुत ही सूक्ष्म और शान्त रहती है। तब मनकी चंचलता और अशान्ति अपने-आप ही नष्ट हो जाती है और वह सहज ही परमात्माके ध्यानमें लग जाता है। $. इन्द्रियाँ चाहे जब, चाहे जिस विषयमें स्वच्छन्द चली जाती हैं, मन सदा चंचल रहता है और अपनी आदतको छोड़ना ही नहीं चाहता एवं बुद्धि एक परम निश्चयपर अटल नहीं रहती--यही इनका स्वतन्त्र या उच्छृंखल हो जाना है। विवेक और वैराग्यपूर्वक अभ्यारुद्वारा इन्हें सुशृंखल, आज्ञाकारी और अन्तर्मुखी या भगवन्निष्ठ बना लेना ही इनको जीतना है। २. “मुनि” मननशीलको कहते हैं, जो पुरुष ध्यानकालकी भाँति व्यवहारकालमें भी परमात्माकी सर्वव्यापकताका दृढ निश्चय होनेके कारण सदा परमात्माका ही मनन करता रहता है, वही “मुनि” है। ३. जो महापुरुष उपर्युक्त साधनोंद्वारा इच्छा, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह ध्यानकालमें या व्यवहारकालमें, शरीर रहते या शरीर छूट जानेपर, सभी अवस्थाओंमें सदा मुक्त ही है--संसारबन्धनसे सदाके लिये सर्वथा छूटकर परमात्माको प्राप्त हो चुका है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। ४. अहिंसा, सत्य आदि धर्मोंका पालन, देवता, ब्राह्मण, माता-पिता आदि गुरुजनोंका सेवन-पूजन, दीन-दुःखी, गरीब और पीड़ित जीवोंकी स्नेह और आदरयुक्त सेवा और उनके दुःखनाशके लिये किये जानेवाले उपर्युक्त साधन एवं यज्ञ, दान आदि जितने भी शुभ कर्म हैं, सभीका समावेश “यज्ञ” और “तप' शब्दोंमें समझना चाहिये। भगवान् सबके आत्मा हैं (गीता १०२०) अतएव देवता, ब्राह्मण, दीन-दु:खी आदिके रूपमें स्थित होकर भगवान् ही समस्त सेवा-पूजादि ग्रहण कर रहे हैं। इसलिये वे ही समस्त यज्ञ और तपोंके भोक्ता हैं (गीता ९।२४)। इस प्रकार समझना ही भगवान्को “यज्ञ और तपोंका भोगनेवाला” समझना है। ५, इन्द्र, वरुण, कुबेर, यमराज आदि जितने भी लोकपाल हैं तथा विभिन्न ब्रह्माण्डोंमें अपने-अपने ब्रह्माण्डका नियन्त्रण करनेवाले जितने भी ईश्वर हैं, भगवान् उन सभीके स्वामी और महान् ईश्वर हैं। इसीसे श्रुतिमें कहा है --तमीश्वराणां परम महेश्वरम” “उन ईश्वरोंके भी परम महेश्वरको” (श्वेताश्बतर उप० ६।७)। अपनी अनिर्वचनीय मायाशक्तिद्वारा भगवान् अपनी लीलासे ही सम्पूर्ण अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हुए सबको यथायोग्य नियन्त्रणमें रखते हैं और ऐसा करते हुए भी वे सबसे ऊपर ही रहते हैं। इस प्रकार भगवान्को सर्वशक्तिमान्, सर्वनियन्ता, सर्वाध्यक्ष और सर्वेश्वरेश्वर समझना ही उन्हें 'सर्वलोकमहेश्वर” समझना है। ६. भगवान् स्वाभाविक ही सबपर अनुग्रह करके सबके हितकी व्यवस्था करते हैं और बार-बार अवतीर्ण होकर नाना प्रकारके ऐसे विचित्र चरित्र करते हैं, जिन्हें गा-गाकर ही लोग तर जाते हैं। उनकी प्रत्येक क्रियामें जगत्का हित भरा रहता है। भगवान् जिनको मारते या दण्ड देते हैं, उनपर भी दया ही करते हैं, उनका कोई भी विधान दया और प्रेमसे रहित नहीं होता। इसीलिये भगवान् सब भूतोंके सुहृद् हैं। ७. जो पुरुष इस बातको जान लेता है और विश्वास कर लेता है कि “भगवान् मेरे अहैतुक प्रेमी हैं, वे जो कुछ भी करते हैं, मेरे मंगलके लिये ही करते हैं", वह प्रत्येक अवस्थामें जो कुछ भी होता है, उसको दयामय परमेश्वरका प्रेम और दयासे ओततप्रोत मंगलविधान समझकर सदा ही प्रसन्न रहता है। इसलिये उसे अटल शान्ति मिल जाती है। उसकी शान्तिमें किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित होनेका कोई कारण ही नहीं रह जाता। त्रिशोड्थ्याय: (श्रीमद्धगवदगीतायां षष्ठो5ध्याय:) निष्काम कर्मयोगका प्रतिपादन करते हुए आत्मोद्धारके लिये प्रेरणा तथा मनोनिग्रहपूर्वक ध्यानयोग एवं योगभ्रष्टकी गतिका वर्णन सम्बन्ध-- पाँचवें अध्यायके आरम्भमें अजुनने 'कर्मसंन्यास” (सांख्ययोग) और “कर्मयोग“--इन दोनोंगेंसे कौन-सा एक साधन मेरे लिये युनिश्चित कल्याणप्रद है? यह बतलानेके लिये भगवानूसे प्रार्था की थी। इसपर भगवान्ने दोनों साधनोंको कल्याणप्रद बतलाया और फलमें दोनोंकी समानता होनेपर भी साधनमें सुगगता होनेके कारण “कर्मसंन्यास” की अपेक्षा 'कर्मयोग-की श्रेष्ठताका प्रतिपादन किया। तदनन्तर दोनों साधनोंके स्वरूप, उनकी विधि और उनके फलका भलीभाँति निरूपण करके दोनोंके लिये ही अत्यन्त उपयोगी एवं परमात्माकी प्राप्तिका प्रधान उपाय समझकर संक्षेप्ें ध्यानयोगका भी वर्णन किया; परंतु दोनोंमेंसे कौन-सा साधन करना चाहिये, इस बातको न तो जअर्जुनको स्पष्ट शब्दोंमें आज्ञा ही की गयी और न ध्यानयोयका ही अंग- प्रत्यंगोंसाहित विस्तारसे वर्ण हुआ। इसलिये अब ध्यानयोगका अंगोंसहित विस्तृत वर्णन करनेके लिये छठे अध्यायका आरम्भ करते हुए सबसे पहले अर्जुनको भक्तियुक्त कर्मयोगर्ें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे कर्मयोगकी प्रशंया करते हैं-- श्रीभगवानुवाच अनाश्रित: कर्मफलं कार्य कर्म करोति य:ः । स संनन््यासी च योगी च न निरमन्निर्न चाक्रिय:,श्रीभगवान् बोले--जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह संन््यासी तथा योगी है? और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं हैः तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं +
Arjuna said: (Here Arjuna begins to speak, seeking clarity on the right path of practice and renunciation amid the moral pressure of impending war. His question frames the ethical dilemma: whether liberation is better pursued through withdrawal from action or through disciplined action offered without attachment.)
Verse 2
ह सम्बन्ध-- पहले शलोकमें भगवान्ने कर्मफलका आश्रय न लेकर कर्म करनेवालेको संन्यासी और योगी बतलाया। उसपर यह शंका हो सकती है कि यदि संन्यास” और 'योग' दोनों भिन्न-भिन्न स्थिति हैं तो उपर्युक्त साधक दोनोंसे सम्पन्न कैसे हो सकता है। अतः इस शंकाका निराकरण करनेके लिये दूसरे *्लोकमें 'संन्न्याय” और 'योग” की एकताका प्रतिपादन करते हैं-- यं संन्यासमिति प्राहुयोंगं तं विद्धि पाण्डव । न हासंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्षन,हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसीको तू योग जान; क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता
The Lord taught that one who acts without taking refuge in the fruits of action is called both a renunciant and a yogin. Therefore, O Pāṇḍava, know that what the wise call “renunciation” is the very same as “yoga.” For no one becomes a true yogin while still clinging to self-centered intentions and plans; inner renunciation of ego-driven resolve is indispensable.
Verse 3
आररक्षोर्मुनेयोंगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शम: कारणमुच्यते,योगमें आरूढ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुष-के लिये योगकी प्राप्तिमें निष्कामभावसे कर्म करना ही हेतु कहा जाता है: और योगारूढ हो जानेपर उस योगारूढ पुरुषका जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है* वही कल्याणमें हेतु कहा जाता है
For the reflective seeker who wishes to ascend to yoga, disciplined action is declared to be the means. But for the same person, once established in yoga, inner quietude—cessation of restless willing and planning—is declared to be the means to well-being and stability.
Verse 4
भी्न्आ+ () असजमना ३. “सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनके अभिमानसे रहित होकर ऐसा समझना कि गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, (गीता ३।२८) तथा निरन्तर परमात्माके स्वरूपमें एकीभावसे स्थित रहना और सर्वदा सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि रखना (गीता ४॥२४)'-यही ज्ञानयोग है--यही कर्मसंन्यास है। गीताके चौथे अध्यायमें इसी प्रकारके ज्ञानयोगकी प्रशंसा की गयी है और उसीके आधारपर अर्जुनका यह प्रश्न है। २. मन, वाणी और शरीरद्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानका और शरीर तथा समस्त संसारमें अहंता-ममताका पूर्णतया त्याग ही संन्यास” शब्दका अर्थ है। चौथे और पाँचवें श्लोकोंमें 'संन्यास” को ही “सांख्य' कहकर भलीभाँति स्पष्टीकरण भी कर दिया है। अतएव यहाँ 'संन्यास” शब्दका अर्थ 'सांख्ययोग' ही मानना युक्त है। ३. कर्मयोगी कर्म करते हुए भी सदा संन्यासी ही है, वह सुखपूर्वक अनायास ही संसारबन्धनसे छूट जाता है (गीता ५। ३)। उसे शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है (गीता ५।६)। प्रत्येक अवस्थामें भगवान् उसकी रक्षा करते हैं (गीता ९। २२) और कर्मयोगका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मरणरूप महान् भयसे उद्धार कर देता है (गीता २।४०)। किंतु ज्ञानयोगका साधन क्लेशयुक्त है (गीता १२।५), पहले कर्मयोगका साधन किये बिना उसका होना भी कठिन है (गीता ५। ६)। इन्हीं सब कारणोंसे ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बतलाया गया है। ४. कर्मयोगी न किसीसे द्वेष करता है और न किसी वस्तुकी आकांक्षा करता है, वह द्वद्धोंसे सर्वया अतीत हो जाता है। वास्तवमें संन्यास भी इसी स्थितिका नाम है। जो राग-द्वेषसे रहित है, वही सच्चा संन्यासी है; क्योंकि उसे न तो संन्यास- आश्रम ग्रहण करनेकी आवश्यकता है और न सांख्ययोगकी ही। अतएव यहाँ कर्मयोगीको “नित्यसंन्यासी” कहकर भगवान् उसका महत्त्व प्रकट करते हैं कि समस्त कर्म करते हुए भी वह सदा संन्यासी ही है और सुखपूर्वक अनायास ही कर्मबन्धनसे छूट जाता है। ३. 'सांख्ययोग” और “कर्मयोग' दोनों ही परमार्थतत्त्वके ज्ञानद्वारा परमपदरूप कल्याणकी प्राप्तिमें हेतु हैं। इस प्रकार दोनोंका फल एक होनेपर भी जो लोग कर्मयोगका दूसरा फल मानते हैं और सांख्ययोगका दूसरा, वे फलभेदकी कल्पना करके दोनों साधनोंको पृथक्-पृथक् माननेवाले लोग बालक हैं; क्योंकि दोनोंकी साधनप्रणालीमें भेद होनेपर भी फलमें एकता होनेके कारण वस्तुत: दोनोंमें एकता ही है। दोनों निष्ठाओंका फल एक ही है, अतएव यह कहना उचित ही है कि एकमें पूर्णतया स्थित पुरुष दोनोंके फलको प्राप्त कर लेता है। गीताके तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने दोनोंको ही आत्मसाक्षात्कारके स्वतन्त्र साधन माना है। २. जैसे किसी मनुष्यको भारतवर्षसे अमेरिकाको जाना है, तो वह यदि ठीक रास्तेसे होकर यहाँसे पूर्व-ही-पूर्व दिशामें जाता रहे तो भी अमेरिका पहुँच जायगा और पश्चिम-ही-पश्चिमकी ओर चलता रहे तो भी अमेरिका पहुँच जायगा। वैसे ही सांख्ययोग और कर्मयोगकी साधनप्रणालीमें परस्पर भेद होनेपर भी जो मनुष्य किसी एक साधनमें दृढ़तापूर्वक लगा रहता है, वह दोनोंके ही एकमात्र परम लक्ष्य परमात्मातक पहुँच ही जाता है। ३. जो मुमुक्षु पुरुष यह मानता है कि “समस्त दृश्य-जगत् स्वप्नके सदृश मिथ्या है, एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है; यह सारा प्रपंच मायासे उसी ब्रह्ममें अध्यारोपित है, वस्तुतः दूसरी कोई सत्ता है ही नहीं; परंतु उसका अन्त:करण शुद्ध नहीं है, उसमें राग-द्वेष तथा काम-क्रोधादि दोष वर्तमान हैं, वह यदि अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्ममोगका आचरण न करके केवल अपनी मान्यताके भरोसेपर ही सांख्ययोगके साधनमें लगना चाहेगा तो उसे “सांख्यनिष्ठा' सहज ही नहीं प्राप्त हो सकेगी। ४. जो सब कुछ भगवान्का समझकर सिद्धि-असिद्धिमें समभाव रखते हुए आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करके भगवदाज्ञानुसार समस्त कर्तव्यकर्मोका आचरण करता है और श्रद्धा- भक्तिपूर्वक नाम, गुण और प्रभावसहित श्रीभगवानके स्वरूपका चिन्तन करता है, वह भक्तियुक्त कर्मयोगका साधक मुनि भगवान्की दयासे परमार्थज्ञानके द्वारा शीघ्र ही परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। ५. मन और इन्द्रियाँ यदि साधकके वशमें न हों तो उनकी स्वाभाविक ही विषयोंमें प्रवृत्ति होती है और अन्त:करणमें जबतक राग-द्वेषादि मल रहता है, तबतक सिद्धि और असिद्धिमें समभाव रहना कठिन होता है। अतएव जबतक मन और इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें न हो जायँ और अन्त:करण पूर्णरूपसे परिशुद्ध न हो जाय, तबतक साधकको वास्तविक कर्मयोगी नहीं कहा जा सकता। इसीलिये यह कहा गया है कि जिसमें ये सब बातें हों वही पूर्ण कर्मयोगी है और उसीको शीघ्र ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। ३. सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच क्षणभंगुर और अनित्य होनेके कारण मृगतृष्णाके जल या स्वप्नके संसारकी भाँति मायामय है, केवल एक सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही सत्य है; उसीमें यह सारा प्रपंच मायासे अध्यारोपित है--इस प्रकार नित्यानित्य वस्तुके तत््वको समझकर जो पुरुष निरन्तर निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मामें अभिन्नभावसे स्थित रहता है, वही तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी है। २. जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य समझता है कि स्वप्रकालमें स्वप्रके शरीर, मन, प्राण और इन्द्रियोंद्वारा मुझे जिन क्रियाओंके होनेकी प्रतीति होती थी, वास्तवमें न तो वे क्रियाएँ होती थीं और न मेरा उनसे कुछ भी सम्बन्ध ही था; वैसे ही तत्त्वको समझकर निर्विकार अक्रिय परमात्मामें अभिन्नभावसे स्थित रहनेवाले सांख्ययोगीको भी ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय प्राण और मन आदिके द्वारा लोकदृष्टिसे की जानेवाली देखने-सुनने आदिकी समस्त क्रियाओंको करते समय यही समझना चाहिये कि ये सब मायामय मन, प्राण और इन्द्रिय ही अपने-अपने मायामय विषयोंमें विचर रहे हैं। वास्तवमें न तो कुछ हो रहा है और न मेरा इनसे कुछ सम्बन्ध ही है। ३. ईश्वरकी भक्ति, देवताओंका पूजन, माता-पितादि गुरुजनोंकी सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रमानुकूल अर्थोपार्जनसम्बन्धी और खान-पानादि शरीरनिर्वाहसम्बन्धी जितने भी शास्त्रविहित कर्म हैं, उन सबको ममताका सर्वथा त्याग करके, सब कुछ भगवान्का समझकर, उन्हींके लिये उन्हींकी आज्ञा और इच्छाके अनुसार, जैसे वे करावें वैसे ही, कठपुतलीकी भाँति करना--परमात्मामें सब कर्मोका अर्पण करना है। ४. कर्मप्रधान कर्मयोगी मन, बुद्धि, शरीर और इन्द्रियोंमें ममता नहीं रखते और लौकिक स्वार्थसे सर्वथा रहित होकर निष्कामभावसे ही समस्त कर्तव्यकर्म करते रहते हैं। ५. सकामभावसे किये हुए कर्मोंके फलस्वरूप बार-बार देव-मनुष्यादि योनियोंमें भटकना ही बन्धन है। &. स्वरूपसे सब कर्मोका त्याग कर देनेपर मनुष्यकी शरीरयात्रा भी नहीं चल सकती। इसलिये मनसे--विवेकबुद्धिके द्वारा कर्तृत्व-कारयितृत्वका त्याग करना ही सांख्ययोगीका त्याग है। ३. मनुष्योंका जो कर्मोमें कर्तापन है, वह भगवान्का बनाया हुआ नहीं है। अज्ञानी मनुष्य अहंकारके वशमें होकर अपनेको उनका कर्ता मान लेते हैं (गीता ३।२७)। मनुष्योंके कर्मोंकी रचना भगवान् नहीं करते, इस कथनका यह भाव है कि अमुक शुभ या अशुभ कर्म अमुक मनुष्यको करना पड़ेगा, ऐसी रचना भगवान् नहीं करते; क्योंकि ऐसी रचना यदि भगवान् कर दें तो विधि-निषेधशास्त्र ही व्यर्थ हो जाय--उसकी कोई सार्थकता ही नहीं रहे। कर्मफलके संयोगकी रचना भी भगवान् नहीं करते, इस कथनका यह भाव है कि कर्मोके साथ सम्बन्ध मनुष्योंका ही अज्ञानवश जोड़ा हुआ है। कोई तो आसक्तिवश उनका कर्ता बनकर और कोई कर्मफलमें आसक्त होकर अपना सम्बन्ध कर्मोके साथ जोड़ लेते हैं। यदि इन तीनोंकी रचना भगवान्की की हुई होती तो मनुष्य कर्मबन्धनसे छूट ही नहीं सकता, उसके उद्धारका कोई उपाय ही नहीं रह जाता। अत: साधक मनुष्यको चाहिये कि कर्मोंका कर्तापन पूर्वोक्त प्रकारसे प्रकृतिके अर्पण करके (गीता ५।८, ९) या भगवानके अर्पण करके (गीता ५।१०) अथवा कर्मोके फल और आसक्तिका सर्वथा त्याग करके (गीता ५।१२) कर्मोंसे अपना सम्बन्धविच्छेद कर ले (गीता ४।२०)। यही सब भाव दिखलानेके लिये यह कहा है कि परमेश्वर मनुष्योंके कर्तापन, कर्म और कर्मफलकी रचना नहीं करते। २. इस कथनका यह अभिप्राय है कि सत्त्व, रज और तम तीनों गुण, राग-द्वेष आदि समस्त विकार, शुभाशुभ कर्म और उनके संस्कार, इन सबके रूपमें परिणत हुई प्रकृति अर्थात् स्वभाव ही सब कुछ करता है। प्राकृत जीवोंके साथ इसका अनादिसिद्ध संयोग है। इसीसे उनमें कर्तृत्वभाव उत्पन्न हो रहा है अर्थात् अहंकारसे मोहित होकर वे अपनेको उनका कर्ता मान लेते हैं (गीता ३।२७) तथा इसीसे कर्म और कर्मफलसे भी उनका सम्बन्ध हो जाता है और वे उनके बन्धनमें पड़ जाते हैं। वास्तवमें आत्माका इनसे कोई सम्बन्ध नहीं है। 3. सबके हृदयमें रहनेवाले (गीता १३।१७; १५।१५: १८।६१) और सम्पूर्ण जगत्का अपने संकल्पद्वारा संचालन करनेवाले सर्वशक्तिमान् सगुण निराकार परमेश्वर किसीके पुण्य-पापोंको ग्रहण नहीं करते। यद्यपि समस्त कर्म उन्हींकी शक्तिसे मनुष्योंद्वारा किये जाते हैं, सबको शक्ति, बुद्धि और इन्द्रियाँ आदि उनके कर्मानुसार वे ही प्रदान करते हैं; तथापि वे उनके द्वारा किये हुए कर्मोको ग्रहण नहीं करते अर्थात् स्वयं उन कर्मोंके फलके भागी नहीं बनते। ४. यहाँ यह शंका होती है कि यदि वास्तवमें मनुष्योंका या परमेश्वरका कर्मोंसे और उनके फलसे सम्बन्ध नहीं है तो फिर संसारमें जो मनुष्य यह समझते हैं कि “अमुक कर्म मैंने किया है', “यह मेरा कर्म है', 'मुझे इसका फल मिलेगा”, यह क्या बात है? इसी शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं कि अनादिसिद्ध अज्ञानद्वारा सब जीवोंका यथार्थ ज्ञान ढका हुआ है। इसीलिये वे अपने और परमेश्वरके स्वरूपको तथा कर्मके तत्त्वको न जाननेके कारण अपनेमें और ईश्वरमें कर्ता, कर्म और कर्मफलके सम्बन्धकी कल्पना करके मोहित हो रहे हैं। ५, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारका सर्वथा नाश करके दृश्यमात्रको प्रकाशित कर देता है, वैसे ही यथार्थ ज्ञान भी अज्ञानका सर्वथा नाश करके परमात्माके स्वरूपको भलीभाँति प्रकाशित कर देता है। जिनको यथार्थ ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है, वे कभी, किसी भी अवस्थामें मोहित नहीं होते। ३. सांख्ययोग (ज्ञानयोग)-का अभ्यास करनेवालेको चाहिये कि आचार्य और शास्त्रके उपदेशसे सम्पूर्ण जगत्को मायामय और एक सच्चिदानन्दघन परमात्माको ही सत्य वस्तु समझकर तथा सम्पूर्ण अनात्मवस्तुओंके चिन्तनको सर्वथा छोड़कर, मनको परमात्माके स्वरूपमें निश्चल स्थित करनेके लिये उनके आनन्दमय स्वरूपका चिन्तन करे। बार-बार आनन्दकी आवृत्ति करता हुआ ऐसी धारणा करे कि पूर्ण आनन्द, अपार आनन्द, शान्त आनन्द, घन आनन्द, अचल आनन्द, ध्रुव आनन्द, नित्य आनन्द, बोधस्वरूप आनन्द, ज्ञानस्वरूप आनन्द, परम आनन्द, महान् आनन्द, अनन्त आनन्द, सम आनन्द, अचिन्त्य आनन्द, चिन्मय आनन्द, एकमात्र आनन्द-ही-आनन्द परिपूर्ण है, आनन्दसे भिन्न अन्य कोई वस्तु ही नहीं है इस प्रकार निरन्तर मनन करते-करते सच्चिदानन्दघन परमात्मामें मनका अभिन्नभावसे निश्चल हो जाना मनका तट्भूप होना है। २. उपर्युक्त प्रकारसे मनके तद्रूप हो जानेपर बुद्धिमें सच्चिदानन्दघन परमात्माके स्वरूपका प्रत्यक्षके सदृश निश्चय हो जाता है, उस निश्चयके अनुसार निदिध्यासन (ध्यान) करते-करते जो बुद्धिकी भिन्न सत्ता न रहकर उसका सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकाकार हो जाना है, वही बुद्धिका तद्भरूप हो जाना है। 3. मन-बुद्धिके परमात्मामें एकाकार हो जानेके बाद साधककी दृष्टिसे आत्मा और परमात्माके भेदभ्रमका नाश हो जाना एवं ध्याता, ध्यान और ध्येयकी त्रिपुटीका अभाव होकर केवलमात्र एक वस्तु सच्चिदानन्दधन परमात्माका ही रह जाना तन्निष्ठ होना अर्थात् परमात्मामें एकीभावसे स्थित होना है। ४. उपर्युक्त प्रकारसे आत्मा और परमात्माके भेदभ्रमका नाश हो जानेपर जब परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसीकी सत्ता नहीं रहती, तब मन, बुद्धि, प्राण आदि सब कुछ परमात्मरूप ही हो जाते हैं। इस प्रकार सच्चिदानन्दघन परमात्माके साक्षात् अपरोक्ष ज्ञानद्वारा उनमें एकता प्राप्त कर लेना ही तत्परायण हो जाना है। ५. उपर्युक्त प्रकारके साधनसे प्राप्त यथार्थ ज्ञानके द्वारा जिनके मल, विक्षेप और आवरणरूप समस्त पाप भलीभाँति नष्ट हो गये हैं, जिनमें उन पापोंका लेशमात्र भी नहीं रहा है, जो सर्वथा पापरहित हो गये हैं, वे 'ज्ञानके द्वारा पापरहित हुए पुरुष' हैं। ६. जिस पदको प्राप्त होकर योगी पुनः नहीं लौटता, जिसको सोलहवें श्लोकमें “तत्परम्” के नामसे कहा है, गीतामें जिनका वर्णन कहीं “अक्षय सुख', कहीं “निर्वाण ब्रह्म', कहीं “उत्तम सुख”, कहीं “परम गति", कहीं “परमधाम', कहीं “अव्ययपद” और कहीं “दिव्य परमपुरुष” के नामसे आया है, उस यथार्थ ज्ञानके फलरूप परमात्माको प्राप्त होना ही अपुनरावृत्तिको प्राप्त होना है। ७. तत्त्वज्ञानी सिद्ध पुरुषोंका विषमभाव सर्वथा नष्ट हो जाता है। उनकी दृष्टिमें एक सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मासे अतिरिक्त अन्य किसीकी सत्ता नहीं रहती, इसलिये उनका सर्वत्र समभाव हो जाता है। इसी बातको समझानेके लिये मनुष्योंमें उत्तम-से-उत्तम श्रेष्ठ ब्राह्मण, नीच-से-नीच चाण्डाल एवं पशुओंमें उत्तम गौ, मध्यम हाथी और नीच-से-नीच कुत्तेका उदाहरण देकर उनके समत्वका दिग्दर्शन कराया गया है। इन पाँचों प्राणियोंके साथ व्यवहारमें विषमता सभीको करनी पड़ती है। जैसे गौका दूध सभी पीते हैं, पर कुतियाका दूध कोई भी मनुष्य नहीं पीता। वैसे ही हाथीपर सवारी की जा सकती है, कुत्तेपर नहीं की जा सकती। जो वस्तु शरीरनिर्वाहार्थ पशुओंके लिये उपयोगी होती है, वह मनुष्योंके लिये नहीं हो सकती। श्रेष्ठ ब्राह्मणके पूजन-सत्कारादि करनेकी शास्त्रोंकी आज्ञा है, चाण्डालके नहीं। अतः इनका उदाहरण देकर भगवानने यह बात समझायी है कि जिनमें व्यावहारिक विषमता अनिवार्य है, उनमें भी ज्ञानी पुरुषोंका समभाव ही रहता है। कभी किसी भी कारणसे कहीं भी उनमें विषमभाव नहीं होता। जैसे मनुष्य अपने मस्तक, हाथ और पैर आदि अंगोंके साथ भी बर्तावमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रादिके सदृश भेद रखता है, जो काम मस्तक और मुखसे लेता है, वह हाथ और पैरोंसे नहीं लेता; जो हाथ-पैरोंका काम है, वह सिरसे नहीं लेता और सब अंगोंके आदर, मान एवं शौचादिमें भी भेद रखता है, तथापि उनमें आत्मभाव-अपनापन समान होनेके कारण वह सभी अंगोंके सुख-दुःखका अनुभव समानभावसे ही करता है और सारे शरीरमें उसका प्रेम एक-सा ही रहता है, प्रेम और आत्मभावकी दृष्टिसे कहीं विषमता नहीं रहती; वैसे ही तत्त्वज्ञानी महापुरुषकी सर्वत्र ब्रह्मदृष्टि हो जानेके कारण लोकदृष्टिसे व्यवहारमें यथायोग्य भेद रहनेपर भी उसका आत्मभाव और प्रेम सर्वत्र सम रहता है। $. तत्त्वज्ञानी तीनों गुणोंसे अतीत हो जाता है। अत: उसके राग, द्वेष, मोह, ममता, अहंकार आदि समस्त अवगुणोंका और विषमभावका सर्वथा नाश होकर उसकी स्थिति समभावमें हो जाती है। समभाव ब्रह्मका ही स्वरूप है; इसलिये जिनका मन समभागवमें स्थित है, वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं। २. जो पदार्थ मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरके अनुकूल होता है, उसे लोग “प्रिय” कहते हैं; उन अनुकूल पदार्थोका संयोग होनेपर वह हर्षित नहीं होता। इसी प्रकार जो पदार्थ मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीरके प्रतिकूल होता है, उसे लोग “अप्रिय” कहते हैं; उन प्रतिकूल पदार्थोंका संयोग होनेपर भी वह उद्विग्न यानी दुःखी नहीं होता। 3. शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि जो इन्द्रियोंके विषय हैं, उनको “बाह्य[-स्पर्श! कहते हैं; जिस पुरुषने विवेकके द्वारा अपने मनसे उनकी आसक्तिको बिलकुल नष्ट कर डाला है, जिसका समस्त भोगोंमें पूर्ण वैराग्य है और जिसकी उन सबमें उपरति हो गयी है, वह पुरुष बाहरके विषयोंमें आसक्तिरहित अन्त:करणवाला है। ४. इन्द्रियोंक भोगोंको ही सुखरूप माननेवाले मनुष्यको यह ध्यानजनित सुख नहीं मिल सकता। बाहरके भोगोंमें वस्तुतः सुख है ही नहीं; सुखका केवल आभासमात्र है। उसकी अपेक्षा वैराग्यका सुख कहीं बढ़कर है और वैराग्यसुखकी अपेक्षा भी उपरतिका सुख तो बहुत ऊँचा है; परंतु परमात्माके ध्यानमें अटल स्थिति प्राप्त होनेपर जो सुख प्राप्त होता है, वह तो इन सबसे बढ़कर है। ऐसे सुखको प्राप्त होना ही आत्मामें स्थित आनन्दको पाना है। ५. उपर्युक्त प्रकारसे जो पुरुष इन्द्रियोंके समस्त विषयोंमें आसक्तिरहित होकर उपरतिको प्राप्त हो गया है तथा परमात्माके ध्यानकी अटल स्थितिसे उत्पन्न महान् सुखका अनुभव करता है, उसे परब्रह्म परमात्माके ध्यानरूप योगमें अभिन्नभावसे स्थित कहते हैं। ६. सदा एकरस रहनेवाला परमानन्दस्वरूप अविनाशी परमात्मा ही “अक्षय सुख” है और नित्य-निरन्तर ध्यान करते- करते उस परमात्माको जो अभिन्नभावसे प्रत्यक्ष कर लेना है, यही उसका अनुभव करना है। ७. जैसे पतंग अज्ञानवश परिणाम न सोचकर दीपककी लौको सुखका कारण समझसते हैं और उसे प्राप्त करनेके लिये उड़-उड़कर उसकी ओर जाते तथा उसमें पड़कर भयानक ताप सहते और अपनेको दग्ध कर डालते हैं, वैसे ही अज्ञानी मनुष्य भोगोंको सुखके कारण समझकर तथा उनमें आसक्त होकर उन्हें भोगनेकी चेष्टा करते हैं और परिणाममें महान् दुःखोंको प्राप्त होते हैं। विषयोंको सुखके हेतु समझकर उन्हें भोगनेसे उनमें आसक्ति बढ़ती है, आसक्तिसे काम-क्रोधादि अनर्थोंकी उत्पत्ति होती है और फिर उनसे भाँति-भाँतिके दुर्गुण और दुराचार आ-आकर उन्हें चारों ओरसे घेर लेते हैं। परिणाम यह होता है कि उनका जीवन पापमय हो जाता है और उसके फलस्वरूप उन्हें इस लोक और परलोकमें नाना प्रकारके भयानक ताप और यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। विषयभोगके समय मनुष्य भ्रमवश जिन स्त्री-प्रसंगादि भोगोंको सुखका कारण समझता है, वे ही परिणाममें उसके बल, वीर्य, आयु तथा मन, बुद्धि, प्राण और इन्द्रियोंकी शक्तिका क्षय करके और शास्त्रविरुद्ध होनेपर तो परलोकमें भीषण नरकयन्त्रणादिकी प्राप्ति कराकर महान् दुःखके हेतु बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त एक बात यह है कि अज्ञानी मनुष्य जब दूसरेके पास अपनेसे अधिक भोग-सामग्री देखता है, तब उसके मनमें ईष्यॉकी आग जल उठती है और वह उससे जलने लगता है। सुखरूप समझकर भोगे हुए विषय कहीं प्रारब्धवश नष्ट हो जाते हैं तो उनके संस्कार बार-बार उनकी स्मृति कराते हैं और मनुष्य उन्हें याद कर-करके शोकमग्न होता, रोता-बिलखता और पछताता है। इन सब बातोंपर विचार करनेसे यही सिद्ध होता है कि विषयोंके संयोगसे प्राप्त होनेवाले भोग वास्तवमें सर्वथा दुःखके ही कारण हैं, उनमें सुखका लेश भी नहीं है। अज्ञानवश भ्रमसे ही वे सुखरूप प्रतीत होते हैं (गीता १८।३८)। ३. विषय-भोग वास्तवमें अनित्य, क्षणभंगुर और दुःखरूप ही हैं, परंतु विवेकहीन अज्ञानी पुरुष इस बातको न जान- मानकर उनमें रमता है और भाँति-भाँतिके क्लेश भोगता है; किंतु बुद्धिमान् विवेकी पुरुष उनकी अनित्यता और क्षणभंगुरतापर विचार करता है तथा उन्हें काम-क्रोध, पाप-ताप आदि अनर्थोंमें हेतु समझता है और उनकी आसक्तिके त्यागको अक्षय सुखकी प्राप्तिमें कारण समझता है, इसलिये वह उनमें नहीं रमता। २. इससे यह बतलाया गया है कि शरीर नाशवान् है--इसका वियोग होना निश्चित है और यह भी पता नहीं कि यह किस क्षणमें नष्ट हो जायगा; इसलिये मृत्युकाल उपस्थित होनेसे पहले-पहले ही काम-क्रोधपर विजय प्राप्त कर लेनी चाहिये। 3. (पुरुषके लिये) स्त्री, (स्त्रीके लिये) पुरुष, (दोनोंहीके लिये) पुत्र, धन, मकान या स्वर्गादि जो कुछ भी देखे-सुने हुए मन और इन्द्रियोंके विषय हैं, उनमें आसक्ति हो जानेके कारण उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा होती है, उसका नाम “काम' है और उसके कारण अन्तःकरणमें होनेवाले नाना प्रकारके संकल्प-विकल्पोंका जो प्रवाह है, वह कामसे उत्पन्न होनेवाला “वेग” है। इसी प्रकार मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके प्रतिकूल विषयोंकी प्राप्ति होनेपर अथवा इष्ट-प्राप्तिकी इच्छापूर्तिमें बाधा उपस्थित होनेपर उस स्थितिके कारणभूत पदार्थ या जीवोंके प्रति द्वेषभाव उत्पन्न होकर अन्तःकरणमें जो “उत्तेजना” का भाव आता है, उसका नाम “क्रोध” है और उस क्रोधके कारण होनेवाले नाना प्रकारके संकल्प- विकल्पोंका जो प्रवाह है, वह क्रोधसे उत्पन्न होनेवाला “वेग” है। इन वेगोंको शान्तिपूर्वक सहन करनेकी अर्थात् इन्हें कार्यान्वित न होने देनेकी शक्ति प्राप्त कर लेना ही इनको सहन करनेमें समर्थ होना है। ४. यहाँ “अन्त:” शब्द सम्पूर्ण जगत्के अन्त:स्थित परमात्माका वाचक है, अन्त:करणका नहीं। इसका यह अभिप्राय है कि जो पुरुष बाह्य विषयभोगरूप सांसारिक सुखोंको स्वप्नकी भाँति अनित्य समझ लेनेके कारण उनको सुख नहीं मानता, किंतु इन सबके अन्तःस्थित परम आनन्दस्वरूप परमात्मामें ही “सुख” मानता है, वही “अन्तःसुख” अर्थात् अन्तरात्मामें ही सुखवाला है। ५. जो बाह्य विषय-भोगोंमें सत्ता और सुख-बुद्धि न रहनेके कारण उनमें रमण नहीं करता, इन सबमें आसक्तिरहित होकर केवल परमात्मामें ही रमण करता है अर्थात् परमानन्दस्वरूप परमात्माका ही निरन्तर अभिन्नभावसे चिन्तन करता रहता है, वह “अन्तराराम'” अर्थात् आत्मामें ही रमण करनेवाला कहलाता है। ६. परमात्मा समस्त ज्योतियोंकी भी परम ज्योति है (गीता १३।१७)। सम्पूर्ण जगत् उसीके प्रकाशसे प्रकाशित है। जो पुरुष निरन्तर अभिन्नभावसे ऐसे परम ज्ञानस्वरूप परमात्माका अनुभव करता हुआ उसीमें स्थित रहता है, जिसकी दृष्टिमें एक विज्ञानानन्दस्वरूप परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसी भी बाहा दृश्य वस्तुकी भिन्न सत्ता ही नहीं रही है, वही “अन्तर्ज्योति' अर्थात् आत्मामें ही ज्ञानवाला है। ३. सांख्ययोगका साधन करनेवाला योगी अहंकार, ममता और काम-क्रोधादि समस्त अवगुणोंका त्याग करके निरन्तर अभिन्नभावसे परमात्माका चिन्तन करते-करते जब ब्रह्मरूप हो जाता है--उसका ब्रह्मके साथ किंचिन्मात्र भी भेद नहीं रहता, तब इस प्रकारकी अन्तिम स्थितिको प्राप्त सांख्ययोगी “ब्रह्मभूत” अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त कहलाता है। २. 'शान्त ब्रह्म (ब्रह्मनिर्वाण)” सच्चिदानन्दघन, निर्गुण, निराकार, निर्विकल्प एवं शान्त परमात्माका वाचक है और अभिन्नभावसे प्रत्यक्ष हो जाना ही उसकी प्राप्ति है। सांख्ययोगीकी जिस अन्तिम अवस्थाका “ब्रह्मभूत' शब्दसे निर्देश किया गया है, यह उसीका फल है। श्रुतिमें भी कहा है--'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्पेति' (बृहदारण्यक उप० ४,यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते जिस कालमें न तो इन्द्रियोंके भोगोंमें और न कर्मोमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पोंका त्यागी< पुरुष योगारूढ कहा जाता है
When a person no longer clings either to sense-objects or to actions, having renounced all self-centered intentions and mental projections, that person is said to have “mounted” Yoga—steadied in disciplined inner integration. In the Gītā’s ethical frame, this is not escapism from duty but freedom from attachment and ego-driven motive, enabling action (or restraint) to be guided by clarity and dharma rather than craving.
Verse 5
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद््गीतोपनिषद्: श्रीकृष्णाजुनसंवादमें कर्मसंन्यासयोग नामक पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ,सम्बन्ध-- परमपदकी प्राप्तिगें हेतुरूप योगारूढ-अवस्थाका वर्णन करके अब उसे प्राप्त करनेके लिये उत्साहित करते हुए भगवान् मनुष्यका कर्तव्य बतलाते हैं-- उद्धरेदात्मना$5त्मानं नात्मानमवसादयेत् | आत्मैव ह्ात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:
Let a person lift oneself up by one’s own self; one should not degrade oneself. For the self alone is the friend of the self, and the self alone is the enemy of the self.
Verse 6
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे* और अपनेको अधोगतिमें न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।। बन्धुरात्मा55त्मनस्तस्थ येनात्मैवात्मना जित: । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्,जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है,* उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियोंसहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है? इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्धगवदगीतापर्वणि श्रीमद्भधगवद्गीतासूपनिषत्तसु ब्रह्मुविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोडध्याय:
For the person who has conquered the self by the self, the very self becomes a true ally. But for one who has not mastered the self, that same self behaves like an enemy—standing in hostility, as though it were an external foe.
Verse 7
सम्बन्ध--जिसने मन और इन्द्रियॉंसहित शरीरको जीत लिया है, वह आप ही अपना मित्र क्यों है, इस बातको स्पष्ट करनेके लिये अब शरीर इन्द्रिय और मनरूप आत्माको वशमें करनेका फल बतलाते हैं-- जितात्मन: प्रशान्तस्य परमात्मा समाहित: । शीतोष्णसुखदु:खेषु तथा मानापमानयो:,सरदी-गरमी और सुख-दुःखादिमें तथा मान और अपमानमें जिसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ भली-भाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघधन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं
For the person who has mastered the self—whose inner life is stilled and disciplined—the Supreme Self (Paramātman) stands firmly established. In cold and heat, in pleasure and pain, and likewise in honor and dishonor, such a one remains inwardly composed, and thus abides in steady spiritual integration rather than being driven by circumstance.
Verse 8
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थोः विजितेन्द्रिय: । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाउ्चन:,जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है
One whose inner self is satisfied through true knowledge and realized insight (jñāna–vijñāna), who remains unshaken and changeless, who has fully mastered the senses, and for whom a clod of earth, a stone, and gold are all the same—such a person is called a disciplined yogin, “yukta”, one who is truly united (with the Divine).
Verse 9
सुहन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु । साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते,सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य/४ और बन्धुगणोंमें, धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समानभाव रखनेवाला” अत्यन्त श्रेष्ठ है
One is considered especially excellent who maintains an even-minded attitude toward well-wishers and friends, toward the noble and the indifferent, toward neutrals, the hostile, and even one’s own relatives; and who remains the same in regard to the virtuous as well as the sinful.
Verse 10
सम्बन्ध-- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जितात्मा पुरुषको परमात्माकी प्राप्तिके लिये क्या करना चाहिये, वह किस साधनसे परमात्माको शीतघ्र प्राप्त कर सकता है, इसलिये ध्यानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हैं-- योगी युज्जीत सततमात्मानं रहसि स्थित: । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रह:*,मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखनेवाला, आशारहित और संग्रहहहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मामें लगावे
Arjuna asks about the practical means to attain the Supreme Self swiftly; therefore the teaching on meditation-yoga (dhyāna-yoga) begins: A yogin should continually discipline and unite the self in the Supreme, dwelling in a secluded place. Remaining alone, with mind and body restrained, free from craving and without possessiveness, he should steadily fix the self in the Divine.
Verse 11
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्प स्थिरमासनमात्मन: । नात्युच्छितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्,शुद्ध भूमिमें,/ जिसके ऊपर क्रमश: कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके “7
In a clean and pure place, one should set up a firm seat for oneself—neither too high nor too low—prepared with kuśa grass, a deer-skin, and a cloth laid in proper order. Thus established, the practitioner begins the discipline with steadiness and reverence.
Verse 12
तत्रैकाग्रं मन: कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रिय: । उपविश्यासने युगठ्ज्याद् योगमात्मविशुद्धये,उस आसनपर बैठकर, चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्त:ःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे
There, having seated oneself on a proper seat, one should restrain the movements of mind and senses and make the mind one-pointed; for the purification of the inner self, one should then apply oneself to the discipline of yoga.
Verse 13
सम॑ कायशिशरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिर: । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्वानवलोकयन्,काया, सिर और गलेको समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकरः अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ -
Holding the body, head, and neck aligned and motionless, steady and unmoving, he fixes his gaze upon the tip of his own nose, not looking toward any other directions.
Verse 14
प्रशान्तात्मा विगतभीर्रह्मचारित्रते स्थित: । मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर:,ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थितः), भयरहित*ँ तथा भलीभाँति शान्त अन्त:ःकरणवाला“ सावधान योगी मनको रोककर मुझमें चित्तवाला* और मेरे परायणः होकर स्थित होवे
With inner serenity and free from fear, established in the vow and discipline of brahmacarya, let the vigilant practitioner restrain the mind, fix the heart on Me, remain steadily integrated in yoga, and abide with Me as the supreme goal.
Verse 15
युज्जन्नेवं सदा$5त्मानं योगी नियतमानस: । शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति,वशमें किये हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्माको निरन्तर मुझ परमेश्वरके स्वरूपमें लगाता हुआःं मुझमें रहनेवाली परमानन्दकी पराकाष्ठारूप शान्तिको प्राप्त होता है?
A yogin who has brought the mind under discipline and thus continually yokes the self to the Divine attains the supreme peace whose culmination is liberation—abiding in Me.
Verse 16
नात्यश्षतस्तु योगो$स्ति न चैकान्तमनश्रतः । न चाति स्वप्रशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन
O Arjuna, yoga is not attainable for one who eats to excess, nor for one who does not eat at all. It is not for one given to too much sleep, nor for one who keeps awake without measure.
Verse 17
हे अर्जुन! यह योग< न तो बहुत खानेवालेका, न बिलकुल न खानेवालेका, न बहुत शयन करनेके स्वभाव-वालेका और न सदा जागनेवालेका ही सिद्ध होता है? ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्रावबोधस्य योगो भवति दुःखहा,दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करनेवालेका,* कर्मोमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका* और यथायोग्य सोने तथा जागनेवालेका* ही सिद्ध होता है
O Arjuna! This discipline of Yoga does not succeed for one who eats to excess, nor for one who refuses food altogether; it does not succeed for one given to too much sleep, nor for one who keeps awake without rest. Yoga—the destroyer of sorrow—arises for the person who is balanced in food and recreation, measured in effort while performing duties, and regulated in sleep and wakefulness.
Verse 18
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृह: सर्वकामे भ्यो युक्त इत्युच्यते तदा,अत्यन्त वशमें किया हुआ चित्त जिस कालमें परमात्मामें ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस कालमें सम्पूर्ण भोगोंसे स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है
When the mind, fully disciplined, comes to rest steadily in the Self alone, and one becomes free from craving for all objects of desire, then—at that time—such a person is said to be ‘yoked’ (established in Yoga).
Verse 19
यथा दीपो निवातस्थो नेड़ते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युझज्जतो योगमात्मन:,जिस प्रकार वायुरहित स्थानमें स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्माके ध्यानमें लगे हुए योगीके जीते हुए चित्तकी कही गयी हैः
Just as a lamp placed in a windless spot does not flicker, so this simile is taught for the yogin whose mind is restrained—steadily applying himself to the yoga of inner union.
Verse 20
सम्बन्ध-- इस प्रकार ध्यानयोगकी अन्तिम स्थितिको प्राप्त हुए पुरुषके और उसके जीते हुए वित्तके लक्षण बतला देनेके बाद अब तीन श्लोकोमें ध्यानयोगद्वारा सच्चिदानन्द परमात्माको प्राप्त पुरुषकी स्थितिका वर्णन करते हैं यत्रोपरमते चित्त निरुद्धं योगसेवया । यत्र चैवात्मना$5त्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति,योगके अभ्याससे निरुद्ध चित्त जिस अवस्थामें उपराम हो जाता है? और जिस अवस्थामें परमात्माके ध्यानसे शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धिद्वारा परमात्माको साक्षात् करता हुआः सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही संतुष्ट रहता है
In what state does the mind, restrained through sustained practice of yoga, come to complete quietude? And in what state does one, beholding the Self by the Self, find contentment in the Self alone?
Verse 21
इन्द्रियोंसे अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि-द्वारा ग्रहण करनेयोग्य जो अनन्त आनन्द है;* उसको जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस अवस्थामें स्थित यह योगी परमात्माके स्वरूपसे विचलित होता ही नहीं
That infinite bliss which lies beyond the senses and can be apprehended only by a purified, subtle intellect—when one experiences it, and when established in that state, this yogin does not waver from the very nature of the Supreme Self.
Verse 22
य॑ं लब्ध्वा चापरं लाभं॑ मन्यते नाधिकं तत: । यस्मिन् स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते,परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता5 और परमात्मप्राप्तिरूप जिस अवस्थामें स्थित योगी बड़े भारी दुःखसे भी चलायमान नहीं होता;5
Having gained that attainment, one deems no other gain greater than it. Established in that state, the yogin is not shaken even by the heaviest sorrow—for it is the gain of reaching the Supreme Self, the Paramātman.
Verse 23
सम्बन्ध-- बीसवें; इक्कीसवें और बाईसवें श्लोकोंगें परमात्माकी प्राप्तिरूप जिस स्थितिके महत्त्व और लक्षणोंका वर्णन किया गया, अब उस स्थितिका नाम योग" बतलाते हुए उसे प्राप्त करनेके लिये प्रेरणा करते हैं-- तं॑ विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोअनिर्विण्णचेतसा,जो दुःखरूप संसारके संयोगसे रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिये5। वह योग न उकताये हुए अर्थात् धैर्य और उत्साहयुक्त चित्तसेडं निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है?
Know that state called “Yoga” to be the severance from the painful conjunction with worldly suffering. That Yoga must be practiced with firm resolve, with a mind that does not sink into dejection—steadfast, patient, and energetic.
Verse 24
सम्बन्ध-- अब दो श्लोकोर्में उसी स्थितिकी प्राप्तिके लिये अभेदरूपसे परमात्माके ध्यानयोगका साधन करनेकी रीति बतलाते हैं-- संकल्पप्रभवान् कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषत: । मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः,संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको नि:ःशेषरूपसे त्यागकर्रा और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर£४। क्रम- क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
Having completely abandoned all desires that arise from mental projections, and restraining on every side the whole host of senses by the mind alone, one should enter upon the path of inner discipline.
Verse 25
शनै: शनैरुपरमेद् बुद्धया धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनःकृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्,संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको नि:ःशेषरूपसे त्यागकर्रा और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर£४। क्रम- क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे
Let one withdraw little by little, guided by an intellect steadied by resolve. Establishing the mind in the Self, one should not think of anything at all apart from that.
Verse 26
सम्बन्ध-- यदि किसी साधकका चित्त पूर्वाभ्यासवश बलात् विषयोंकी और चला जाय तो उसे क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहते हैं-- यतो यतो निश्चरति मनश्नज्चलमस्थिरम् । ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्,यह स्थिर न रहनेवाला और चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है, उस-उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार- बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे:
Whenever the mind—restless and unsteady—wanders out toward sense-objects, from each such object one should draw it back again and again, bringing it under control and settling it in the Self alone.
Verse 27
प्रशान्तमनसंः होनं योगिनं सुखमुत्तमम् । उपैति शान्तरजसंए ब्रह्मभूतमकल्मषम्*,क्योंकि जिसका मन भली प्रकार शान्त है, जो पापसे रहित है और जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्दघन ब्रह्मके साथ एकीभाव हुए योगीको उत्तम आनन्द प्राप्त होता है
Arjuna said: Supreme happiness comes to that yogin whose mind is thoroughly pacified, who is free from sin and inner taint, whose passion (rajas) has been stilled, and who has become one with Brahman. In the ethical frame of the Gītā’s teaching, this joy is not a reward of conquest but the fruit of inner purification and steady self-mastery amid the pressures of duty.
Verse 28
युज्जन्नेवं सदा55त्मानं योगी विगतकल्मष: । सुखेन ब्रह्म॒संस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते,वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक* परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका* अनुभव करता है
The yogin, ever yoking the self in this way and freed from moral taint, attains with ease the touch of Brahman—experiencing the unsurpassed, ultimate happiness that comes from union with the Supreme.
Verse 29
भीष्मपर्वणि तु एकोनत्रिंशो ध्याय:,भीष्मपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ सम्बन्ध-- इस प्रकार अभेदभावसे साधन करनेवाले सांख्ययोगीके ध्यानका और उसके फलका वर्णन करके अब उस साधकके व्यवह्ारकालकी स्थितिका वर्णन करते हैं-- सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन: सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावालाः तथा सबमें समभावसे देखनेवालाः योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखता है?
Arjuna said: The yogin whose inner self is yoked to yoga and whose vision is equal everywhere perceives the Self as abiding in all beings, and all beings as abiding in the Self. In the midst of action and conflict, this teaching grounds ethical conduct in non-separative awareness: seeing the same inner reality in friend and foe alike, one acts without hatred, partiality, or egoistic claim.
Verse 30
सम्बन्ध-- इस प्रकार सांख्ययोगका साधन करनेवाले योगीका और उसकी सर्वत्र समदर्शनरूप अन्तिम स्थितिका वर्णन करनेके बाद, अब भक्तियोगका साधन करनेवाले योगीकी अन्तिम स्थितिका और उसके सर्वत्र भगवद्र्शनका वर्णन करते हैं-- यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति | तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति,जो पुरुष सम्पूर्ण भूतोंमें सबके आत्मरूप मुझ वासुदेवको ही व्यापक देखता है और सम्पूर्ण भूतोंको मुझ वासुदेवके अन्तर्गत देखता है* उसके लिये मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिये अदृश्य नहीं होता5
Arjuna said: “Whoever sees Me everywhere, and sees everything as abiding in Me— for that person I am never lost from sight, and that person is never lost from My sight.” In the ethical frame of the Gītā, this vision dissolves alienation and hostility: the devotee’s awareness becomes steady, inclusive, and anchored in the Divine presence within all beings, even amid the pressures of war and duty.
Verse 31
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित: । सर्वथा वर्तमानो5पि स योगी मयि वर्तते,जो पुरुष एकीभावमें स्थित होकर" सम्पूर्ण भूतोंमें आत्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदानन्दघन वासुदेवको भजता है,* वह योगी सब प्रकारसे बरतता हुआ भी मुझमें ही बरतता हैः
Whoever, established in the vision of oneness, worships Me as abiding in all beings—such a yogin, even while acting in every possible way, truly lives and moves in Me. The ethical force of the teaching is that right devotion is inseparable from universal regard: seeing the Divine in all, one’s conduct remains inwardly anchored in the Supreme even amid worldly duties.
Verse 32
सम्बन्ध--इस प्रकार भ्क्तियोगद्वाय भगवान्कों प्राप्त हुए पुरुषके महत्त्वका प्रतिपादन करके अब सांख्ययोगद्वारा परमात्माको प्राप्त हुए पुरुषके समदर्शनका और गहत्त्वका प्रतिपादन करते हैं-- आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योअर्जुन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मत:,हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता हैः और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है
O Arjuna, the highest yogin is held to be the one who, taking oneself as the measure, sees all beings everywhere with equal regard, and sees pleasure and pain alike in all; such a yogin is deemed supreme.
Verse 33
अजुन उवाच योअ<यं योगस्त्वया प्रोक्त: साम्येन मधुसूदन । एतस्याहं न पश्यामि चड्चलत्वात् स्थितिं स्थिराम्,अर्जुन बोले--हे मधुसूदन! जो यह योग* आपने समभावसे कहा है, मनके चंचल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ
Arjuna said: O Madhusūdana, this yoga you have taught as equanimity—I do not see how it can be established in steady, lasting firmness, for the mind is restless and unsteady.
Verse 34
चज्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद् दृढम् | तस्याहं निग्रहं मनन््ये वायोरिव सुदुष्करम्,क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाववाला,* बड़ा दृढ़* और बलवान” है। इसलिये उसका वशमें करना मैं वायुके रोकनेकी भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ
Arjuna said: For, O Kṛṣṇa, the mind is indeed restless—turbulent in its impulses, powerful, and stubbornly firm. Therefore I consider its restraint exceedingly difficult, like trying to hold back the wind.
Verse 35
श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहृते,श्रीभगवान् बोले--हे महाबाहो! नि:संदेह मन चंचल और कठिनतासे वशमें होनेवाला है; परंतु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन] यह अभ्यासः और वैराग्यसेर वशमें होता है
The Blessed Lord said: Undoubtedly, O mighty-armed one, the mind is restless and hard to restrain. Yet, O son of Kuntī, it is brought under control through steady practice and through dispassion.
Verse 36
सम्बन्ध-- यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मनको वशमें न किया जाय, तो क्या हानि है; इसपर भगवान् कहते हैं-- असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति: । वश्यात्मना तु यतता शक््यो<वाप्तुमुपायत:,जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्प है< और वशमें किये हुए मनवाले” प्रयत्नशील पुरुषद्वारा"* साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है--यह मेरा मत है
The Blessed Lord said: In my view, for one whose mind is undisciplined, the attainment of yoga is exceedingly difficult. But for the one who has brought the mind under control and strives with proper means, it can indeed be attained.
Verse 37
सम्बन्ध-- योगसिद्धिके लिये मनको वशमें करना परम आवश्यक बतलाया गया। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि जियका मन वशर्में नहीं है; किंतु योगमों श्रद्धा होनेके कारण जो भगवत्प्राप्तिके लिये साधन करता है, उसकी मरनेके बाद क्या गति होती है; इसीके लिये अर्जुन पूछते हैं-- अजुन उवाच अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस: । अप्राप्य योगसंसिद्धि कां गतिं कृष्ण गच्छति,अर्जुन बोले--हे श्रीकृष्ण! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है,* ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है?
Arjuna said: “O Krishna, what destiny does a person attain who, though endowed with faith, lacks self-mastery and whose mind strays from yoga—failing to reach the full perfection of yoga (God-realization)?”
Verse 38
कच्चिन्नो भय वि भ्रष्टश्छिन्ना भ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मण: पथि
Arjuna said: “Has he not, having fallen away through fear, perished like a severed cloud—left without any footing, O mighty-armed one, bewildered on the path of Brahman?”
Verse 39
है महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्गमें मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?४ |। एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषत: । त्वदन्य: संशयस्यास्य छेत्ता न ह्मुपपद्यते
Arjuna said: “O mighty-armed one, does not such a man—deluded on the path to the Divine and without refuge—fall away on both sides and perish like a shattered cloud? Kṛṣṇa, you must dispel this doubt of mine completely. For no one other than you can rightly be the remover of this uncertainty.”
Verse 40
३९ ।। श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते । न हि कल्याणकृत् कश्रिद् दुर्गतिं तात गच्छति,श्रीभगवान् बोले--हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही; क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होताः
The Blessed Lord said: “O Pārtha, for one who strives toward the good, there is no ruin—neither in this world nor in the next. Indeed, dear one, a person who acts for inner uplift and for attaining the Divine never falls into a wretched end.”
Verse 41
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वती: समा: । शुचीनां श्रीमतां गेहे योग भ्रष्टोईभिजायते,योगश्रष्ट पुरुष? पुण्यवानोंके लोकोंको अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है
Having attained the worlds won by the doers of merit, and having dwelt there for many long years, one who has fallen from Yoga is born again in the home of the pure and the prosperous.
Verse 42
सम्बन्ध-- साधारण योगश्रष्ट पुरुषोंकी गति बतलाकर अब आसक्तिरहित उच्च श्रेणीके योगश्रष्ट पुरुषोंकी विशेष गतिका वर्णन करते हैं-- अथवाः योगिनामेव कुले भवति धीमताम् । एतद्ि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्
Or else, he is born into the family-line of wise yogins. Such a birth is exceedingly rare in the world—one that places a person among disciplined, discerning seekers, where the path of yoga is naturally supported and the pull of attachment is weaker.
Verse 43
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है; परंतु इस प्रकारका जो यह जन्म है सो संसारमें नि:संदेह अत्यन्त दुर्लभ हैः ।। तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् । यतते च ततो भूय: संसिद्धौ कुरुनन्दन,वहाँ उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है
Or again, the man of dispassion does not go to those worlds, but is born into the lineage of wise, knowing yogins; and such a birth is, beyond doubt, exceedingly rare. There he regains without strain the union with steady discernment he had gathered in a former body—the impressions of yoga as even-mindedness. And from that point onward, O joy of the Kurus, he strives more intensely than before toward complete fulfillment: the attainment of the Supreme Self.
Verse 44
सम्बन्ध--अब पवित्र श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाले योगश्रष्ट पुरुषकी परिस्थितिका वर्णन करते हुए योगको जाननेकी इच्छाका महत्त्व बतलाते हैं-- पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्वियते हवशो5पि सः । जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मयातिवर्तते,वह श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगगश्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निस्संदेह भगवानकी ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धिरूप योगका जिकज्ञासु भी वेदमें कहे हुए सकामकर्मोंके फलको उल्लंघन कर जाता हैः
By the force of that very practice from a former life, he is drawn onward—indeed, even against his will. And even one who merely longs to understand Yoga rises beyond the realm of śabda-brahman, the Vedic word concerned with ritual and reward-seeking action.
Verse 45
प्रयत्नादू यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिष: । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्,परंतु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी< तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर* सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है
But the yogin who strives with deliberate effort—purified of sin—having been perfected through the accumulated discipline of many births, thereafter attains the supreme goal.
Verse 46
तपस्विभ्यो5धिको योगी ज्ञानिभ्योडपि मतो5धिक: । कर्मिभ्यश्वाधिको योगी तस्माद् योगी भवार्जुन,योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकामकर्म करनेवालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है,' इससे हे अर्जुन! तू योगी हो
The yogin is held to be superior to ascetics, superior even to those devoted to scriptural knowledge, and superior as well to those engaged in action for results. Therefore, O Arjuna, become a yogin.
Verse 47
सम्बन्ध-- पूर्वश्लोकमें योगीको सर्वश्रेष्ठ बतलाकर भगवान्ने अ्जुनिको योगी बननेके लिये कहा; किंतु ज्ञानयोग, ध्यानयोयग, भ्क्तियोंग और कर्मयोग आदि साधनोंगेंसे अर्जुनको कौन-सा साधन करना चाहिये? इस बातका स्पष्टीकरण नहीं किया। अतः अब भगवान् अपनेगें अनन्यप्रेम करनेवाले भक्त योगीकी प्रशंसा करते हुए अर्जुनकों अपनी ओर आकर्षित करते हैं-- योगिनामपि सर्वेषां5 मद्गतेनान्तरात्मनाए | श्रद्धावान्भजतेः * यो मां" स मे युक्ततमो मत:,सम्पूर्ण योगियोंमें भी जो श्रद्धावान् योगी मुझमें लगे हुए अन्तरात्मासे मुझको निरन्तर भजता है, वह योगी मुझे परम श्रेष्ठ मान्य हैः
Even among all practitioners of yoga, the one whose inner self is absorbed in Me, who worships Me continually with faith, is regarded by Me as the most perfectly united—the highest yogin.
Verse 231
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्म॒मतीन्द्रियम् । वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्षलति तत्त्वत:
Arjuna said: That happiness which is ultimate—apprehended by the purified intellect and beyond the reach of the senses—wherein one truly knows the Self; and, established in that state, one does not waver from reality.
The chapter reframes the dilemma as a problem of inner orientation under unavoidable duty: how an agent engaged in mandated action can maintain a disciplined, non-distracted consciousness aimed at the highest principle, especially at life’s final transition.
Continuous practice and focused remembrance determine stability and trajectory: the mind’s habitual formation (abhyāsa) shapes the final cognition, and devotion with disciplined concentration is presented as a direct means to the imperishable, beyond cyclical return.
Yes in functional form: it asserts that knowing these doctrines and paths prevents confusion for the yogin, and that such knowledge-and-yoga surpasses the merit attributed to Vedic rites, austerities, and gifts, culminating in attainment of the highest station (paramaṃ sthānam).