
Āstravidyā-Pradarśana: The Kuru Princes’ Public Demonstration of Arms (आस्त्रविद्या-प्रदर्शनम्)
Upa-parva: Āstravidyā-Pradarśana (Demonstration of Martial Training) — within Ādi Parva
Vaiśaṃpāyana recounts that Droṇa, having completed the martial education of the Dhārtarāṣṭras and Pāṇḍavas, addresses King Dhṛtarāṣṭra in the presence of senior figures (including Kṛpa, Somadatta, Bāhlīka, Bhīṣma, Vyāsa, and Vidura). With royal consent, Droṇa arranges a formal public exhibition: a level, open ground is measured; offerings and auspicious observances are performed; artisans construct a large, well-appointed viewing pavilion and seating. On the appointed day the king arrives with ministers and elders; Gāndhārī, Kuntī, and royal women take their places; the city’s populace assembles amid music and excitement. Droṇa enters the arena with ritual decorum, performs the prescribed rites, and summons the princes equipped with armor, bows, and weapons. The princes display archery, chariot maneuvers, mounted and elephant combat skills, and sword-and-shield technique; the crowd reacts with astonishment and acclaim. The sequence culminates in the prominent emergence of Duryodhana and Bhīma with maces, circling in measured stances, while Vidura reports the proceedings to Dhṛtarāṣṭra and Gāndhārī, emphasizing the princes’ conduct and capabilities.
Chapter Arc: वन-एकान्त में पाण्डु का मन वंश-रक्षा और पितरों के पिण्ड-नाश के भय से काँप उठता है; वह कुन्ती से ऐसा कर्म चाहने लगता है जो असम्भव-सा दीखता है—देव-सम्बन्ध से संतान। → कुन्ती अपने पतिव्रत-धर्म और लोक-लज्जा के बीच डोलती है, पर पाण्डु उसे समझाता है कि यह कुल-हित, लोक-हित और यश-हित के लिये है; वह गान्धारी के पुत्रशत की बात सुनकर अपने दुःख को तौलता है और संतान-प्राप्ति की तीव्र आवश्यकता को और तीखा कर देता है। → पाण्डु एकान्त में कुन्ती से स्पष्ट याचना करता है—‘मेरे, पूर्वजों के और कुल के कल्याण हेतु’ देवों का आवाहन कर संतान उत्पन्न करो; कुन्ती पति की सम्मति जानकर प्रतिज्ञा करती है कि अब वह प्रयत्न करेगी और उसका वचन अवश्य सिद्ध होगा। → कुन्ती का संकोच पिघलता है; वह पति की आज्ञा को धर्म-आदेश मानकर स्वीकार करती है और देव-आह्वान की दिशा में आगे बढ़ने का निश्चय करती है—कुल की संतान-रेखा पुनः चलने को तैयार होती है। → कुन्ती किस देव का आवाहन करेगी, और प्रथम पुत्र के रूप में कौन-सा तेज पृथ्वी पर उतरेगा—यह रहस्य अगले प्रसंग के लिये छोड़ दिया जाता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १०३ श्लोक मिलाकर कुल ८८६ “लोक हैं) नशा (0) आल अस+- - यहाँ आदित्योंके तेरह नाम हैं। जान पड़ता है, बारह महीनोंके बारह आदित्य और अधिमास या मलमासके प्रकाशक तेरहवें विष्णु हैं। इसीलिये उसे पुरुषोत्तममास कहते हैं। अधिमासकी पृथक् गणना न होनेसे बारह मासोंके प्रकाशक आदित्य बारह ही कहे गये हैं। त्रयोविशर्त्याधिकशततमो< ध्याय: नकुल और सहदेवकी उत्पत्ति तथा पाण्डु-पुत्रोंके नामकरण-संस्कार वैशम्पायन उवाच कुन्तीपुत्रेषु जातेषु धृतराष्ट्रात्मजेषु च । मद्रराजसुता पाण्डुं रहो वचनमबत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! जब कुन्तीके तीन पुत्र उत्पन्न हो गये और धृतराष्ट्रके भी सौ पुत्र हो गये, तब माद्रीने पाण्डुसे एकान्तमें कहा--
Vaiśampāyana said: “O Janamejaya, when Kuntī’s three sons had been born, and when Dhṛtarāṣṭra’s sons (a hundred of them) had also been born, then Mādrī—the daughter of the king of Madra—spoke to Pāṇḍu in private.”
Verse 2
न मे$स्ति त्वयि संतापो विगुणे5पि परंतप । नावरत्वे वरार्हाया: स्थित्वा चानघ नित्यदा,'शत्रुओंको संताप देनेवाले निष्पाप कुरुनन्दन! आप संतान उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित हो गये, आपकी इस न्यूनता या दुर्बलताको लेकर मेरे मनमें कोई संताप नहीं है। यद्यपि मैं सदा कुन्तीदेवीकी अपेक्षा श्रेष्ठ होनेके कारण पटरानीके पदपर बैठनेकी अधिकारिणी थी, तो भी जो सदा मुझे छोटी बनकर रहना पड़ता है, इसके लिये भी मुझे कोई दुःख नहीं है। राजन! गान्धारी तथा राजा धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र हुए हैं, वह समाचार सुनकर भी मुझे वैसा दुःख नहीं हुआ था
Vaiśampāyana said: “O scorcher of foes, I feel no anguish on your account even though you are deficient (in the power to beget offspring). Nor, O sinless one, do I grieve that—though I was worthy of the status of chief queen—I must always remain in a subordinate position. Even when I heard that Gāndhārī and King Dhṛtarāṣṭra had a hundred sons, I did not feel such sorrow.”
Verse 3
गान्धार्याश्विव नृपते जात॑ पुत्रशतं तथा । श्रुत्वा न मे तथा दुःखमभवत् कुरुनन्दन,'शत्रुओंको संताप देनेवाले निष्पाप कुरुनन्दन! आप संतान उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित हो गये, आपकी इस न्यूनता या दुर्बलताको लेकर मेरे मनमें कोई संताप नहीं है। यद्यपि मैं सदा कुन्तीदेवीकी अपेक्षा श्रेष्ठ होनेके कारण पटरानीके पदपर बैठनेकी अधिकारिणी थी, तो भी जो सदा मुझे छोटी बनकर रहना पड़ता है, इसके लिये भी मुझे कोई दुःख नहीं है। राजन! गान्धारी तथा राजा धृतराष्ट्रके जो सौ पुत्र हुए हैं, वह समाचार सुनकर भी मुझे वैसा दुःख नहीं हुआ था
Vaiśampāyana said: “O king, and O delight of the Kurus, even on hearing that a hundred sons had been born to Gāndhārī, I did not feel sorrow of that kind.”
Verse 4
इदं तु मे महद् दुःखं तुल्यतायामपुत्रता । दिष्ट्या व्विदानीं भर्तुर्मे कुन्त्यामप्यस्ति संतति:,'परंतु इस बातका मेरे मनमें बहुत दुःख है कि मैं और कुन्तीदेवी दोनों समानरूपसे आपकी पत6ििनियाँ हैं, तो भी उन्हें तो पुत्र हुआ और मैं संतानहीन ही रह गयी। यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय मेरे प्राणनाथको कुन्तीके गर्भसे पुत्रकी प्राप्ति हो गयी है
“Yet this is a great sorrow for me: though Kuntī and I are equal in status as your wives, she has borne a son while I remain without offspring. Still, it is a blessing that now my lord has obtained progeny through Kuntī.”
Verse 5
यदि त्वपत्यसंतानं कुन्तिराजसुता मयि । कुर्यादनुग्रहो मे स्थात् तव चापि हित॑ भवेत्,“यदि कुन्तिराजकुमारी मेरे गर्भसे भी कोई संतान उत्पन्न करा सकें, तो यह उनका मेरे ऊपर महान् अनुग्रह होगा और इससे आपका भी हित हो सकता है
Vaiśaṃpāyana said: “If the daughter of the King of Kuntī could bring forth offspring and a line of descendants through me, it would be a great favor to me—and it could also serve your welfare.”
Verse 6
संरम्भो हि सपत्नीत्वाद् वक्तुं कुन्तिसुतां प्रति । यदि तु त्व॑ं प्रसन्नो मे स्वयमेनां प्रचोदय,“सौत होनेके कारण मेरे मनमें एक अभिमान है, जो कुन्तीदेवीसे कुछ निवेदन करनेमें बाधक हो रहा है; अत: यदि आप मुझपर प्रसन्न हों तो आप स्वयं ही मेरे लिये कुन्तीदेवीको प्रेरित कीजिये”
Vaiśampāyana said: “Because of the rivalry that comes from being a co-wife, a proud resentment rises in me and prevents me from speaking directly to Kuntī’s son. Therefore, if you are pleased with me, then you yourself should urge him on my behalf.”
Verse 7
पाण्डुरुवाच ममाप्येष सदा माद्रि हृद्यर्थ: परिवर्तते । नतु॒त्वां प्रसहे वक्तुमिष्टानिष्टविवक्षया,पाण्डु बोले--माद्री! यह बात मेरे मनमें भी निरन्तर घूमती रहती है, किंतु इस विषयमें तुमसे कुछ कहनेका साहस नहीं होता था; क्योंकि पता नहीं, तुम यह प्रस्ताव सुनकर प्रसन्न होओगी या बुरा मान जाओगी। यह संदेह बराबर बना रहता था
Pāṇḍu said: “Mādrī, this very thought has been constantly turning over in my heart as well. Yet I have not been able to bring myself to speak to you about it, for I remain uncertain whether, on hearing this proposal, you would welcome it or take offense.”
Verse 8
तव व्विदं मतं मत्वा प्रयतिष्याम्यतः परम् | मन्ये ध्रुवं मयोक्ता सा वचन प्रतिपत्स्यते,परंतु आज इस विषयमें तुम्हारी सम्मति जानकर अब मैं इसके लिये प्रयत्न करूँगा। मुझे विश्वास है, मेरे कहनेपर कुन्तीदेवी निश्चय ही मेरी बात मान लेंगी
“Having understood your considered opinion, I shall strive all the more from this point onward. I am confident that, when I speak, Kuntī Devī will surely accept my words—she will consent.”
Verse 9
वैशम्पायन उवाच ततः कुन्तीं पुन: पाण्डुविंविक्त इदमब्रवीत् | कुलस्य मम संतानं लोकस्य च कुरु प्रियम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा पाण्डुने एकान्तमें कुन्तीसे यह बात कही--“कल्याणि! मेरी कुलपरम्पराका विच्छेद न हो और सम्पूर्ण जगत्का प्रिय हो, ऐसा कार्य करो। मेरे तथा अपने पूर्वजोंके लिये पिण्डका अभाव न हो और मेरा भी प्रिय हो, इसके लिये तुम परम उत्तम कल्याणमय कार्य करो
Vaiśampāyana said: Then Pāṇḍu, once again, in private, spoke these words to Kuntī: “Ensure that my lineage is continued, and do what will be dear to the world as well.”
Verse 10
मम चापिण्डनाशाय पूर्वेषामपि चात्मन: । मत्प्रियार्थ च कल्याणि कुरु कल्याणमुत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा पाण्डुने एकान्तमें कुन्तीसे यह बात कही--“कल्याणि! मेरी कुलपरम्पराका विच्छेद न हो और सम्पूर्ण जगत्का प्रिय हो, ऐसा कार्य करो। मेरे तथा अपने पूर्वजोंके लिये पिण्डका अभाव न हो और मेरा भी प्रिय हो, इसके लिये तुम परम उत्तम कल्याणमय कार्य करो
Vaiśampāyana said: Then King Pāṇḍu, in private, spoke to Kuntī: “O auspicious lady, act so that our lineage is not cut off, and so that the deed is pleasing to the world. Let there be no lack of piṇḍa—the funeral offerings—for my forefathers and for me as well; therefore, for my sake, accomplish the highest and most beneficent course of action.”
Verse 11
यशसोर्थाय चैव त्वं कुरु कर्म सुदुष्करम् । प्राप्पाधिपत्यमिन्द्रेण यज्ञैरिष्टं यशो<र्थिना,“अपने यशका विस्तार करनेके लिये तुम अत्यन्त दुष्कर कर्म करो, जैसे इन्द्रने स्वर्गका साम्राज्य प्राप्त कर लेनेके बाद भी केवल यशकी कामनासे अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया था
“For the sake of fame as well, you should undertake deeds that are exceedingly difficult. Even Indra—after attaining sovereign lordship—performed many sacrifices, driven by the desire to expand his renown.”
Verse 12
तथा मन्त्रविदो विप्रास्तपस्तप्त्वा सुदुष्करम् । गुरूनभ्युपगच्छन्ति यशसो<र्थाय भाविनि,'भामिनि! मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण अत्यन्त कठोर तपस्या करके भी यशके लिये गुरुजनोंकी शरण ग्रहण करते हैं
Vaiśampāyana said: “So too, O future-minded lady, Brahmins skilled in sacred formulas—having undertaken extremely difficult austerities—still approach their teachers for the sake of true renown. Even severe self-discipline is not treated as a substitute for humble recourse to the guru; lasting honor is grounded in disciplined learning and reverent dependence on rightful authority.”
Verse 13
तथा राजर्षय: सर्वे ब्राह्मणाश्व तपोधना: । चक्रुरुच्चावचं कर्म यशसोअर्थाय दुष्करम्,“सम्पूर्ण राजर्षियों तथा तपस्वी ब्राह्मणोंने भी यशके लिये छोटे-बड़े कठिन कर्म किये हैं
Vaiśampāyana said: “In the same way, all the royal sages, and the Brahmins rich in ascetic power, undertook deeds of many kinds—high and low—performing arduous acts for the sake of fame.”
Verse 14
सा त्वं माद्रीं प्लवेनैव तारयैनामनिन्दिते । अपत्यसंविभागेन परां कीर्तिमवाप्रुहि,“अनिन्दिते! इसी प्रकार तुम भी इस माद्रीको नौकापर बिठाकर पार लगा दो; इसे भी संतति देकर उत्तम यश प्राप्त करो”
Vaiśampāyana said: “O blameless lady, you too should ferry Mādrī across in a boat—carry her safely over. By sharing in the gift of offspring, attain the highest renown.”
Verse 15
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वाब्रवीन्माद्री सकृच्चिन्तय दैवतम् । तस्मात् ते भवितापत्यमनुरूपमसंशयम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाराज पाण्डुके यों कहनेपर कुन्तीने माद्रीसे कहा--“तुम एक बार किसी देवताका चिन्तन करो, उससे तुम्हें योग्य संतानकी प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है”
Vaiśampāyana said: Having spoken thus, Kuntī addressed Mādrī: “Just once, contemplate and invoke a deity. From that, you will surely obtain offspring suited to you—of this there is no doubt.”
Verse 16
ततो माद्री विचार्यव जगाम मनसाश्रिनौ । तावागम्य सुतौ तस्यां जनयामासतुर्यमौ,तब माद्रीने मन-ही-मन कुछ विचार करके दोनों अश्विनीकुमारोंका स्मरण किया। तब उन दोनोंने आकर माद्रीके गर्भसे दो जुड़वें पुत्र उत्पन्न किये
Then Mādrī, after reflecting inwardly, mentally invoked the two Aśvin twins. Responding to her remembrance, they came and caused two twin sons to be born from Mādrī’s womb.
Verse 17
नकुल॑ सहदेवं च रूपेणाप्रतिमौ भुवि । तथैव तावपि यमौ वागुवाचाशरीरिणी,उनमेंसे एकका नाम नकुल था और दूसरेका सहदेव। पृथ्वीपर सुन्दर रूपमें उन दोनोंकी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं था। पहलेकी तरह उन दोनों यमल संतानोंके विषयमें भी आकाशवाणीने कहा--
Vaiśampāyana said: “And (she bore) Nakula and Sahadeva—both incomparable in beauty upon the earth. Concerning those twin-born sons as well, just as before, a bodiless voice proclaimed (their significance).”
Verse 18
सत्त्वरूपगुणोपेतौ भवतोत्यश्विनाविति । भासतस्तेजसात्यर्थ रूपद्रविणसम्पदा,'ये दोनों बालक अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर बुद्धि, रूप और गुणोंसे सम्पन्न होंगे। अपने तेज तथा बढ़ी-चढ़ी रूप-सम्पत्तिके द्वारा ये दोनों सदा प्रकाशित रहेंगे”
Vaiśampāyana said: “These two will be endowed with excellence of character, beauty, and virtues—indeed surpassing even the Aśvinīkumāras. By their extraordinary radiance and their abundant splendor of form and prosperity, they will ever shine forth.”
Verse 19
नामानि चक्रिरे तेषां शतशूड्रनिवासिन: । भक्त्या च कर्मणा चैव तथाशीर्भिविशाम्पते,तदनन्तर शतशुंगनिवासी ऋषियोंने उन सबके नामकरण-संस्कार किये। उन्हें आशीर्वाद देते हुए उनकी भक्ति और कर्मके अनुसार उनके नाम रखे
Vaiśaṃpāyana said: The sages dwelling in Śataśūḍra performed the naming rites for them. Best of kings, while bestowing blessings, they assigned names in accordance with each one’s devotion and conduct.
Verse 20
ज्येष्ठ युधिष्ठिरेत्येवे भीमसेनेति मध्यमम् । अर्जुनेति तृतीयं च कुन्तीपुत्रानकल्पयन्,कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्रका नाम युधिष्ठिर, मझलेका नाम भीमसेन और तीसरेका नाम अर्जुन रखा गया
Vaiśampāyana said: They bestowed names upon Kuntī’s sons—calling the eldest “Yudhiṣṭhira,” the middle one “Bhīmasena,” and the third “Arjuna.”
Verse 21
पूर्वजं नकुलेत्येवं सहदेवेति चापरम् । माद्रीपुत्रावक थयंस्ते विप्रा: प्रीतमानसा:,उन प्रसन्नचित्त ब्राह्मणोंने माद्रीपुत्रोंमेंसे जो पहले उत्पन्न हुआ, उसका नाम नकुल और दूसरेका सहदेव निश्चित किया
Vaiśampāyana said: With delighted hearts, those brāhmaṇas declared the elder son of Mādrī to be named “Nakula,” and the other “Sahadeva.”
Verse 22
अनुसंवत्सरं जाता अपि ते कुरुसत्तमा: । पाण्डुपुत्रा व्यराजन्त पञज्च संवत्सरा इव,वे कुरुश्रेष्ठ पाण्डवगण प्रतिवर्ष एक-एक करके उत्पन्न हुए थे, तो भी देवस्वरूप होनेके कारण पाँच संवत्सरोंकी भाँति एक-से सुशोभित हो रहे थे
Vaiśampāyana said: Although those best of the Kurus—the sons of Pāṇḍu—were born year after year, they nevertheless shone with equal splendor, as if they were all of the same age, like five years appearing as one.
Verse 23
महासत्त्वा महावीर्या महाबलपराक्रमा: । पाण्ड््दष्टवा सुतांस्तांस्तु देवरूपान् महौजस:,वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंकोी देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशुंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया
Vaiśampāyana said: Those sons were of great nobility of spirit, great valor, great strength, and mighty prowess. Seeing those radiant, godlike, splendidly powerful sons, King Pāṇḍu was filled with joy and became absorbed in happiness.
Verse 24
मुर्दं परमिकां लेभे ननन्द च नराधिप: । ऋषीणामपि सर्वेषां शतशुड्शनिवासिनाम्,वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंकोी देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशुंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया
Vaiśampāyana said: The king attained the highest joy and was filled with delight. Those children were dear even to all the sages dwelling at Śataśṛṅga. Seeing such radiant, godlike sons—steadfast, mighty, and valorous—King Pāṇḍu rejoiced; and thereafter he again urged Kuntī to procure offspring for Mādrī as well.
Verse 25
प्रिया बभूवुस्तासां च तथैव मुनियोषिताम् । कुन्तीमथ पुन: पाण्डुर्माद्रयर्थे समचोदयत्,वे सभी महान् धैर्यशाली, अधिक वीर्यवान, महाबली और पराक्रमी थे। उन देवस्वरूप महान् तेजस्वी पुत्रोंकोी देखकर महाराज पाण्डुको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे आनन्दमें मग्न हो गये। वे सभी बालक शतशुंगनिवासी समस्त मुनियों और मुनिपत्नियोंके प्रिय थे। तदनन्तर पाण्डुने माद्रीसे संतानकी उत्पत्ति करानेके लिये कुन्तीको पुनः प्रेरित किया
Vaiśampāyana said: Those sons became dear to the sages, and likewise to the sages’ wives. Thereafter King Pāṇḍu again urged Kuntī—this time for Mādrī’s sake—so that offspring might be obtained.
Verse 26
तमुवाच पृथा राजन् रहस्युक्ता तदा सती । उक्ता सकृद् द्न्ड्यमेषा लेभे तेनास्मि वज्चिता,राजन्! जब एकान्तमें पाण्डुने कुन्तीसे वह बात कही, तब सती कुन्ती पाण्डुसे इस प्रकार बोली--“महाराज! मैंने इसे एक पुत्रके लिये नियुक्त किया था, किंतु इसने दो पा लिये। इससे मैं ठगी गयी
Vaiśampāyana said: Then Pṛthā (Kuntī), being a virtuous woman, spoke to the king in confidence. She said, “O King! I had appointed this (mantra/means) for obtaining a single son, but it has yielded two. By this I have been deceived, O King.”
Verse 27
बिभेम्यस्या: परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी । नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्धाह्माने फलद्धयम्,“अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अत: राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।” इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था
Vaiśampāyana said: “I fear that I may be humiliated by her; such is the fate that befalls women of questionable conduct. In my folly I did not understand that by invoking two deities one obtains a twofold fruit in the form of two sons. Therefore, O King, do not appoint me to this act again; this is the boon I ask of you.” Thus were born to Pāṇḍu five mighty sons granted by the gods—glorious, increasing the Kuru line, endowed with excellent marks; like the moon, their very sight was dear to all.
Verse 28
तस्मान्नाहं नियोक्तव्या त्वयैषो5स्तु वरो मम । एवं पाण्डो: सुता: पञज्च देवदत्ता महाबला:,“अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अत: राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।” इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था
Vaiśampāyana said: “Therefore you should not appoint me again for this act; let this be the boon I ask of you. Thus were born to Pāṇḍu five sons, bestowed by the gods and mighty in strength—renowned, increasing the glory of the Kuru line, and endowed with excellent marks. Like the moon, the sight of them was pleasing to all.”
Verse 29
सम्भूता: कीर्तिमन्तश्न॒ कुरुवंशविवर्धना: । शुभलक्षणसम्पन्ना: सोमवत् प्रियदर्शना:,“अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अत: राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।” इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था
Vaiśampāyana said: Thus were born the sons—renowned, increasing the Kuru lineage, endowed with auspicious marks, and pleasing to behold like the moon.
Verse 30
सिंहदर्पा महेष्वासा: सिंहविक्रान्तगामिन: । सिंहग्रीवा मनुष्येन्द्रा ववृधुर्देवविक्रमा:,उनका अभिमान सिंहके समान था, वे बड़े-बड़े धनुष धारण करते थे। उनकी चाल- ढाल भी सिंहके ही समान थी। देवताओंके समान पराक्रमी तथा सिंहकी-सी गर्दनवाले वे नरश्रेष्ठ बढ़ने लगे। उस पुण्यमय हिमालयके शिखरपर पलते और पुष्ट होते हुए वे पाण्डुपुत्र वहाँ एकत्र होनेवाले महर्षियोंको आश्वर्यचकित कर देते थे
Vaiśampāyana said: Proud as lions, bearing mighty bows, and moving with a lion’s stride, those best of men—lion-necked and possessing valor like the gods—continued to grow in strength and stature. Nurtured and flourishing upon the sacred peaks of the Himālaya, the sons of Pāṇḍu there astonished the assembled great seers who gathered at that holy place.
Verse 31
विवर्धमानास्ते तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ । विस्मयं जनयामासुर्महर्षीणां समेयुषाम्,उनका अभिमान सिंहके समान था, वे बड़े-बड़े धनुष धारण करते थे। उनकी चाल- ढाल भी सिंहके ही समान थी। देवताओंके समान पराक्रमी तथा सिंहकी-सी गर्दनवाले वे नरश्रेष्ठ बढ़ने लगे। उस पुण्यमय हिमालयके शिखरपर पलते और पुष्ट होते हुए वे पाण्डुपुत्र वहाँ एकत्र होनेवाले महर्षियोंको आश्वर्यचकित कर देते थे
Vaiśampāyana said: There, on that holy Himalayan mountain, as they steadily grew and flourished, they became a cause of wonder to the great seers who had gathered. Nurtured on that sacred peak, the sons of Pāṇḍu—strengthening in body and spirit—astonished the assembled ṛṣis by the very radiance of their growth and the promise of their future prowess.
Verse 32
(जातमात्रानुपादाय शतशूज्शनिवासिन: । पाण्डो: पुत्रानमन्यन्त तापसा: स्वानिवात्मजान् ।। ततस्तु वृष्णय: सर्वे वसुदेवपुरोगमा: । पाण्डु: शापभयाद् भीत: शतशुड्रमुपेयिवान् | तत्रैव मुनिभि: सार्थ तापसो5 भूत् तपश्चरन् ।। शाकमूलफलाहारस्तपस्वी नियतेन्द्रिय: । ध्यानयोगपरो राजा बभूवेति च वादका: ।। प्रब्न॒ुवन्ति सम बहवस्तच्छुत्वा शोककर्शिता: । पाण्डो: प्रीतिसमायुक्ता: कदा श्रोष्याम सत्कथा: ।। इत्येवं कथयन्तस्ते वृष्णय: सह बान्धवै: । पाण्डो: पुत्रागमं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमन्विता: ।। सभाजयन्तस्ते<न्योन्यं वसुदेवं वचो<ब्रुवन् शतशुंगनिवासी तपस्वी मुनि पाण्डुके पुत्रोंको जन्मकालसे ही संरक्षणमें लेकर अपने औरस पुत्रोंकी भाँति उनका लाड़-प्यार करते थे। उधर द्वारकामें वसुदेव आदि सब वृष्णिवंशी राजा पाण्डुके विषयमें इस प्रकार विचार कर रहे थे--“अहो! राजा पाण्डु किंदम मुनिके शापसे भयभीत हो शतशंग पर्वतपर चले गये हैं और वहीं ऋषि-मुनियोंके साथ तपस्यामें तत्पर हो पूरे तपस्वी बन गये हैं। वे शाक, मूल और फल भोजन करते हैं, तपमें लगे रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं और सदा ध्यानयोगका ही साधन करते हैं। ये बातें बहुत-से संदेशवाहक मनुष्य बता रहे थे।” यह समाचार सुनकर प्राय: सभी यदुवंशी उनके प्रेमी होनेके नाते शोकमग्न रहते थे। वे सोचते थे--“कब हमें महाराज पाण्डुका शुभ संवाद सुननेको मिलेगा।' एक दिन अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर सब वृष्णिवंशी जब इस प्रकार पाण्डुके विषयमें कुछ बातें कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पाण्डुके पुत्र होनेका समाचार सुना। सुनते ही सब-के-सब हर्षविभोर हो उठे और परस्पर सद्भाव प्रकट करते हुए वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले-- वृष्णय ऊचु: न भवेरन् क्रियाहीना: पाण्डो: पुत्रा महायश: । पाण्डो: प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम् ।। वृष्णियोंने कहा--महायशस्वी वसुदेवजी! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डुके पुत्र संस्कारहीन न हों; अत: आप पाण्डुके प्रिय और हितकी इच्छा रखकर उनके पास किसी पुरोहितको भेजिये। वैशम्पायन उवाच वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम् । युक्तानि च कुमाराणां पारिबहण्यनेकश: ।। कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम् । गाश्न रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब “बहुत अच्छा” कहकर वसुदेवजीने पुरोहितको भेजा; साथ ही उन कुमारोंके लिये उपयोगी अनेक प्रकारकी वस्त्राभूषण- सामग्री भी भेजी। कुन्ती और माद्रीके लिये भी दासी, दास, वस्त्राभूषण आदि आवश्यक सामान, गौएँ, चाँदी और सुवर्ण भिजवाये। तानि सर्वाणि संगृहा[ प्रययौ स पुरोहित: । तमागतं द्विजश्रेष्ठ काश्यपं वै पुरोहितम् ।। पूजयामास विधिवत् पाण्डु: परपुरञण्जय: । पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेव॑ प्रशंसताम् ।। उन सब सामग्रियोंको एकत्र करके अपने साथ ले पुरोहितने वनको प्रस्थान किया। शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले राजा पाण्डुने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यपके आनेपर उनका विधिपूर्वक पूजन किया। कुन्ती और माद्रीने प्रसन्न होकर वसुदेवजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। ततः पाण्डुः क्रिया: सर्वा: पाण्डवानामकारयत् | गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च ।। काश्यप: कृतवान् सर्वमुपाकर्म च भारत । चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विन: ।। वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगा: । तब पाण्डुने अपने पुत्रोंके गर्भाधानसे लेकर चूडाकरण और उपनयनतक सभी संस्कार-कर्म करवाये। भारत! पुरोहित काश्यपने उनके सब संस्कार सम्पन्न किये। बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वे यशस्वी पाण्डव चूडाकरण और उपनयनके पश्चात् उपाकर्म करके वेदाध्ययनमें लगे और उसमें पारंगत हो गये। शर्याते: पृषतः पुत्र: शुको नाम परंतप: ।। येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही । अश्वमेधशतैरिष्टवा स महात्मा महामखै: ।। आराध्य देवता: सर्वा: पितृनपि महामति: । शतशज्रे तपस्तेपे शाकमूलफलाशन: ।। तेनोपकरणमश्रेष्ठीै: शिक्षया चोपबंहिता: । तत्प्रसादाद् थनुर्वेदे समपद्यन्त पारगा: ।। भारत! शर्यातिवंशजके एक पुत्र पृषत् थे, जिनका नाम था शुक। वे अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे। उन शुकने किसी समय अपने धनुषके बलसे जीतकर समुद्रपर्यनत सारी पृथ्वीपर अधिकार कर लिया था। अश्वमेध-जैसे सौ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान एवं सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंकी आराधना करके परम बुद्धिमान् महात्मा राजा शुक शतशुंग पर्ववपर आकर शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्या करने लगे। उन्हीं तपस्वी नरेशने श्रेष्ठ उपकरणों और शिक्षाके द्वारा पाण्डवोंकी योग्यता बढ़ायी। राजर्षि शुकके कृपा-प्रसादसे सभी पाण्डव धरनुर्वेदमें पारंगत हो गये। गदायां पारगो भीमस्तोमरेषु युधिष्िर: । असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सच्त्ववतां वरौ ।। धनुर्वेदे गत: पारं सव्यसाची परंतप: । शुकेन समनुज्ञातो मत्समो5यमिति प्रभो । अनुज्ञाय ततो राजा शक्ति खड्गं तथा शरान् ।। धनुश्न ददतां श्रेष्स्तालमात्र महाप्रभम् । विपाठक्षुरनाराचान् गृध्रपत्रानलंकृतान् ।। ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान् । अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मज: ।। मेने सर्वान् महीपालान् अपर्याप्तान् स्वतेजस: । भीमसेन गदा-संचालनमें पारंगत हुए और युधिष्छिर तोमर फेंकनेमें। धैर्यवान् और शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ दोनों माद्रीपुत्र ढाल-तलवार चलानेकी कलामें निपुण हुए। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेदके पारगामी विद्वान् हुए। राजन्! जब दाताओंमें श्रेष्ठ शुकने जान लिया कि अर्जुन मेरे समान धरनुर्वेदके ज्ञाता हो गये, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर शक्ति, खड्ग, बाण, ताड़के समान विशाल अत्यन्त चमकीला धनुष तथा विपाठ, क्षुर एवं नाराच अर्जुनको दिये। विपाठ आदि सभी प्रकारके बाण गीधकी पाँखोंसे युक्त तथा अलंकृत थे। वे देखनेमें बड़े-बड़े सर्पोके समान जान पड़ते थे। इन सब अस्त्र-शस्त्रोंको पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे यह अनुभव करने लगे कि भूमण्डलके कोई भी नरेश तेजमें मेरी समानता नहीं कर सकते। (एकवर्षनन्तरास्त्वेवं परस्परमरिंदमा: । अन्ववर्धन्त पार्थाश्न माद्रीपुत्रौ तथैव च ।।) शत्रुदमन पाण्डवोंकी आयुमें परस्पर एक-एक वर्षका अन्तर था। कुन्ती और माद्री दोनों देवियोंके पुत्र दिन-दिन बढ़ने लगे। ते च पञज्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धना: । सर्वे ववृधुरल्पेन कालेनाप्स्विव नीरजा:,फिर तो जैसे जलमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले जो एक सौ पाँच बालक हुए थे, वे सब थोड़े ही समयमें बढ़कर सयाने हो गये
Vaiśaṃpāyana said: The ascetics dwelling on Mount Śataśṛṅga took up Pāṇḍu’s newborn sons and regarded them as their own children, cherishing and protecting them. Meanwhile, all the Vṛṣṇis, led by Vasudeva, spoke among themselves: “Pāṇḍu, frightened by the curse, has gone to Śataśṛṅga. There, in the company of sages, he lives as an ascetic, practicing austerities—subsisting on greens, roots, and fruits, restraining his senses, and devoted to meditation and yogic discipline.” Many messengers reported these things, and hearing them the Vṛṣṇis—bound to Pāṇḍu by affection—were worn with sorrow, thinking, “When shall we hear auspicious news of King Pāṇḍu?” As they conversed with their kinsmen in this way, they heard that sons had been born to Pāṇḍu. At once they were filled with joy, greeted one another warmly, and addressed Vasudeva with words of celebration—implying that the children should not be left without proper rites and guidance.
Verse 122
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डवोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus ends the one hundred and twenty-second chapter of the Sambhava-parvan, within the Ādi-parvan of the Śrī Mahābhārata, dealing with the origin and birth of the Pāṇḍavas.
Verse 123
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डवोत्पत्तौ त्रयोविंशत्यधिकशततमो<ध्याय:
Thus, in the revered Mahābhārata, within the Ādi Parva—specifically the Sambhava Parva—this concludes the one-hundred-and-twenty-third chapter, concerning the birth and origin of the Pāṇḍavas.
The chapter stages an implicit dharma-tension between education as a unifying royal investment and education as a competitive ranking mechanism: public validation strengthens the dynasty yet simultaneously amplifies rivalry and factional perception.
Competence and authority are socially constructed through disciplined practice, procedural transparency, and communal witnessing; the chapter illustrates how institutions (court, elders, ritual) convert individual skill into recognized legitimacy.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is structural—this adhyāya operates as a reputational hinge that contextualizes later political tensions by documenting how skill, acclaim, and comparison were publicly established.