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Shloka 32

Āstravidyā-Pradarśana: The Kuru Princes’ Public Demonstration of Arms (आस्त्रविद्या-प्रदर्शनम्)

(जातमात्रानुपादाय शतशूज्शनिवासिन: । पाण्डो: पुत्रानमन्यन्त तापसा: स्वानिवात्मजान्‌ ।। ततस्तु वृष्णय: सर्वे वसुदेवपुरोगमा: । पाण्डु: शापभयाद्‌ भीत: शतशुड्रमुपेयिवान्‌ | तत्रैव मुनिभि: सार्थ तापसो5 भूत्‌ तपश्चरन्‌ ।। शाकमूलफलाहारस्तपस्वी नियतेन्द्रिय: । ध्यानयोगपरो राजा बभूवेति च वादका: ।। प्रब्न॒ुवन्ति सम बहवस्तच्छुत्वा शोककर्शिता: । पाण्डो: प्रीतिसमायुक्ता: कदा श्रोष्याम सत्कथा: ।। इत्येवं कथयन्तस्ते वृष्णय: सह बान्धवै: । पाण्डो: पुत्रागमं श्रुत्वा सर्वे हर्षसमन्विता: ।। सभाजयन्तस्ते<न्योन्यं वसुदेवं वचो<ब्रुवन्‌ शतशुंगनिवासी तपस्वी मुनि पाण्डुके पुत्रोंको जन्मकालसे ही संरक्षणमें लेकर अपने औरस पुत्रोंकी भाँति उनका लाड़-प्यार करते थे। उधर द्वारकामें वसुदेव आदि सब वृष्णिवंशी राजा पाण्डुके विषयमें इस प्रकार विचार कर रहे थे--“अहो! राजा पाण्डु किंदम मुनिके शापसे भयभीत हो शतशंग पर्वतपर चले गये हैं और वहीं ऋषि-मुनियोंके साथ तपस्यामें तत्पर हो पूरे तपस्वी बन गये हैं। वे शाक, मूल और फल भोजन करते हैं, तपमें लगे रहते हैं, इन्द्रियोंको काबूमें रखते हैं और सदा ध्यानयोगका ही साधन करते हैं। ये बातें बहुत-से संदेशवाहक मनुष्य बता रहे थे।” यह समाचार सुनकर प्राय: सभी यदुवंशी उनके प्रेमी होनेके नाते शोकमग्न रहते थे। वे सोचते थे--“कब हमें महाराज पाण्डुका शुभ संवाद सुननेको मिलेगा।' एक दिन अपने भाई-बन्धुओंके साथ बैठकर सब वृष्णिवंशी जब इस प्रकार पाण्डुके विषयमें कुछ बातें कर रहे थे, उसी समय उन्होंने पाण्डुके पुत्र होनेका समाचार सुना। सुनते ही सब-के-सब हर्षविभोर हो उठे और परस्पर सद्भाव प्रकट करते हुए वसुदेवजीसे इस प्रकार बोले-- वृष्णय ऊचु: न भवेरन्‌ क्रियाहीना: पाण्डो: पुत्रा महायश: । पाण्डो: प्रियहितान्वेषी प्रेषय त्वं पुरोहितम्‌ ।। वृष्णियोंने कहा--महायशस्वी वसुदेवजी! हम चाहते हैं कि राजा पाण्डुके पुत्र संस्कारहीन न हों; अत: आप पाण्डुके प्रिय और हितकी इच्छा रखकर उनके पास किसी पुरोहितको भेजिये। वैशम्पायन उवाच वसुदेवस्तथेत्युक्त्वा विससर्ज पुरोहितम्‌ । युक्तानि च कुमाराणां पारिबहण्यनेकश: ।। कुन्तीं माद्रीं च संदिश्य दासीदासपरिच्छदम्‌ । गाश्न रौप्यं हिरण्यं च प्रेषयामास भारत ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! तब “बहुत अच्छा” कहकर वसुदेवजीने पुरोहितको भेजा; साथ ही उन कुमारोंके लिये उपयोगी अनेक प्रकारकी वस्त्राभूषण- सामग्री भी भेजी। कुन्ती और माद्रीके लिये भी दासी, दास, वस्त्राभूषण आदि आवश्यक सामान, गौएँ, चाँदी और सुवर्ण भिजवाये। तानि सर्वाणि संगृहा[ प्रययौ स पुरोहित: । तमागतं द्विजश्रेष्ठ काश्यपं वै पुरोहितम्‌ ।। पूजयामास विधिवत्‌ पाण्डु: परपुरञण्जय: । पृथा माद्री च संहृष्टे वसुदेव॑ प्रशंसताम्‌ ।। उन सब सामग्रियोंको एकत्र करके अपने साथ ले पुरोहितने वनको प्रस्थान किया। शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले राजा पाण्डुने पुरोहित द्विजश्रेष्ठ काश्यपके आनेपर उनका विधिपूर्वक पूजन किया। कुन्ती और माद्रीने प्रसन्न होकर वसुदेवजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। ततः पाण्डुः क्रिया: सर्वा: पाण्डवानामकारयत्‌ | गर्भाधानादिकृत्यानि चौलोपनयनानि च ।। काश्यप: कृतवान्‌ सर्वमुपाकर्म च भारत । चौलोपनयनादूर्ध्वमृषभाक्षा यशस्विन: ।। वैदिकाध्ययने सर्वे समपद्यन्त पारगा: । तब पाण्डुने अपने पुत्रोंके गर्भाधानसे लेकर चूडाकरण और उपनयनतक सभी संस्कार-कर्म करवाये। भारत! पुरोहित काश्यपने उनके सब संस्कार सम्पन्न किये। बैलोंके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले वे यशस्वी पाण्डव चूडाकरण और उपनयनके पश्चात्‌ उपाकर्म करके वेदाध्ययनमें लगे और उसमें पारंगत हो गये। शर्याते: पृषतः पुत्र: शुको नाम परंतप: ।। येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही । अश्वमेधशतैरिष्टवा स महात्मा महामखै: ।। आराध्य देवता: सर्वा: पितृनपि महामति: । शतशज्रे तपस्तेपे शाकमूलफलाशन: ।। तेनोपकरणमश्रेष्ठीै: शिक्षया चोपबंहिता: । तत्प्रसादाद्‌ थनुर्वेदे समपद्यन्त पारगा: ।। भारत! शर्यातिवंशजके एक पुत्र पृषत्‌ थे, जिनका नाम था शुक। वे अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करनेवाले थे। उन शुकने किसी समय अपने धनुषके बलसे जीतकर समुद्रपर्यनत सारी पृथ्वीपर अधिकार कर लिया था। अश्वमेध-जैसे सौ बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान एवं सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंकी आराधना करके परम बुद्धिमान्‌ महात्मा राजा शुक शतशुंग पर्ववपर आकर शाक और फल-मूलका आहार करते हुए तपस्या करने लगे। उन्हीं तपस्वी नरेशने श्रेष्ठ उपकरणों और शिक्षाके द्वारा पाण्डवोंकी योग्यता बढ़ायी। राजर्षि शुकके कृपा-प्रसादसे सभी पाण्डव धरनुर्वेदमें पारंगत हो गये। गदायां पारगो भीमस्तोमरेषु युधिष्िर: । असिचर्मणि निष्णातौ यमौ सच्त्ववतां वरौ ।। धनुर्वेदे गत: पारं सव्यसाची परंतप: । शुकेन समनुज्ञातो मत्समो5यमिति प्रभो । अनुज्ञाय ततो राजा शक्ति खड्गं तथा शरान्‌ ।। धनुश्न ददतां श्रेष्स्तालमात्र महाप्रभम्‌ । विपाठक्षुरनाराचान्‌ गृध्रपत्रानलंकृतान्‌ ।। ददौ पार्थाय संहृष्टो महोरगसमप्रभान्‌ । अवाप्य सर्वशस्त्राणि मुदितो वासवात्मज: ।। मेने सर्वान्‌ महीपालान्‌ अपर्याप्तान्‌ स्वतेजस: । भीमसेन गदा-संचालनमें पारंगत हुए और युधिष्छिर तोमर फेंकनेमें। धैर्यवान्‌ और शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ दोनों माद्रीपुत्र ढाल-तलवार चलानेकी कलामें निपुण हुए। परंतप सव्यसाची अर्जुन धनुर्वेदके पारगामी विद्वान्‌ हुए। राजन्‌! जब दाताओंमें श्रेष्ठ शुकने जान लिया कि अर्जुन मेरे समान धरनुर्वेदके ज्ञाता हो गये, तब उन्होंने अत्यन्त प्रसन्न होकर शक्ति, खड्ग, बाण, ताड़के समान विशाल अत्यन्त चमकीला धनुष तथा विपाठ, क्षुर एवं नाराच अर्जुनको दिये। विपाठ आदि सभी प्रकारके बाण गीधकी पाँखोंसे युक्त तथा अलंकृत थे। वे देखनेमें बड़े-बड़े सर्पोके समान जान पड़ते थे। इन सब अस्त्र-शस्त्रोंको पाकर इन्द्रपुत्र अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे यह अनुभव करने लगे कि भूमण्डलके कोई भी नरेश तेजमें मेरी समानता नहीं कर सकते। (एकवर्षनन्तरास्त्वेवं परस्परमरिंदमा: । अन्ववर्धन्त पार्थाश्न माद्रीपुत्रौ तथैव च ।।) शत्रुदमन पाण्डवोंकी आयुमें परस्पर एक-एक वर्षका अन्तर था। कुन्ती और माद्री दोनों देवियोंके पुत्र दिन-दिन बढ़ने लगे। ते च पञज्च शतं चैव कुरुवंशविवर्धना: । सर्वे ववृधुरल्पेन कालेनाप्स्विव नीरजा:,फिर तो जैसे जलमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले जो एक सौ पाँच बालक हुए थे, वे सब थोड़े ही समयमें बढ़कर सयाने हो गये

jātamātrānupādāya śataśṛṅganivāsinaḥ | pāṇḍoḥ putrān amanyanta tāpasāḥ svān ivātmajān ||

tatas tu vṛṣṇayaḥ sarve vasudevapurogamāḥ | pāṇḍuḥ śāpabhayād bhītaḥ śataśṛṅgam upeyivān ||

tatraiva munibhiḥ sārthaṃ tāpaso 'bhūt tapaścaran | śākamūlaphalāhāras tapasyī niyatendriyaḥ ||

dhyānayogaparo rājā babhūveti ca vādakāḥ | prabrūvanti samaṃ bahavas tac chrutvā śokakarśitāḥ ||

pāṇḍoḥ prītisamāyuktāḥ kadā śroṣyāma satkathāḥ | ityevaṃ kathayantas te vṛṣṇayaḥ saha bāndhavaiḥ ||

pāṇḍoḥ putrāgamaṃ śrutvā sarve harṣasamanvitāḥ | sabhājayantas te 'nyonyaṃ vasudevaṃ vaco 'bruvan ||

Vaiśaṃpāyana said: The ascetics dwelling on Mount Śataśṛṅga took up Pāṇḍu’s newborn sons and regarded them as their own children, cherishing and protecting them. Meanwhile, all the Vṛṣṇis, led by Vasudeva, spoke among themselves: “Pāṇḍu, frightened by the curse, has gone to Śataśṛṅga. There, in the company of sages, he lives as an ascetic, practicing austerities—subsisting on greens, roots, and fruits, restraining his senses, and devoted to meditation and yogic discipline.” Many messengers reported these things, and hearing them the Vṛṣṇis—bound to Pāṇḍu by affection—were worn with sorrow, thinking, “When shall we hear auspicious news of King Pāṇḍu?” As they conversed with their kinsmen in this way, they heard that sons had been born to Pāṇḍu. At once they were filled with joy, greeted one another warmly, and addressed Vasudeva with words of celebration—implying that the children should not be left without proper rites and guidance.

जातमात्रान्newborn (ones)
जातमात्रान्:
Karma
TypeNoun
Rootजातमात्र
FormMasculine, Accusative, Plural
उपादायhaving taken up / having taken (into care)
उपादाय:
TypeVerb
Rootउप-आ-दा
FormAbsolutive (Gerund)
शतशृङ्गनिवासिनःdwellers of Śataśṛṅga (mountain)
शतशृङ्गनिवासिनः:
Karta
TypeNoun
Rootशतशृङ्ग-निवासिन्
FormMasculine, Nominative, Plural
पाण्डोःof Pāṇḍu
पाण्डोः:
TypeNoun
Rootपाण्डु
FormMasculine, Genitive, Singular
पुत्रान्sons
पुत्रान्:
Karma
TypeNoun
Rootपुत्र
FormMasculine, Accusative, Plural
अमन्यन्तthey considered / thought
अमन्यन्त:
TypeVerb
Rootमन्
FormImperfect, 3, Plural
तापसाःascetics
तापसाः:
Karta
TypeNoun
Rootतापस
FormMasculine, Nominative, Plural
स्वान्their own
स्वान्:
TypeAdjective
Rootस्व
FormMasculine, Accusative, Plural
इवas if / like
इव:
TypeIndeclinable
Rootइव
आत्मजान्own-born sons
आत्मजान्:
TypeNoun
Rootआत्मज
FormMasculine, Accusative, Plural

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśaṃpāyana
P
Pāṇḍu
P
Pāṇḍu’s sons (the Pāṇḍavas, implied)
A
Ascetics (tāpasas)
M
Mount Śataśṛṅga
V
Vṛṣṇis
V
Vasudeva
S
Sages (munis)
M
Messengers/informants (vādakāḥ)