राजधर्म-त्याग-भक्ति की देहरी: यह सोपान ‘घर’ (अयोध्या/लोक-व्यवस्था) से ‘वन’ (वैराग्य/आत्मसमर्पण) की ओर संक्रमण है। यहाँ मुक्ति-सीढ़ी का मुख्य पायदान यह है कि ईश्वर-इच्छा (राम-रजाइ) के आगे निजी अधिकार, शोक, और राजनीति का आग्रह गल कर ‘सेवा-धर्म’ बनता है। निषाद-किरात-भिल्ल जैसे ‘सीमान्त’ जन भी प्रेम-भक्ति द्वारा उसी सोपान पर चढ़ते हैं—भक्ति का लोकतंत्रीकरण।
অযোধ্যাকাণ্ডের রস-কেন্দ্র করুণা ও শান্তির মাঝখানে দোল খায়; কিন্তু এ করুণা হতাশা নয়—ধর্ম-দীপ্ত করুণা। এই খণ্ডে করুণ-রসের ভূমিতে ভক্তি-রসের অঙ্কুর ফেটে উঠতে দেখা যায়: কোল-কিরাত-ভিল্ল বনবাসীরা ফল-মূল-অঙ্কুর অর্পণ করে ‘দাস্য-ভক্তি’র আদর্শ স্থাপন করে, আর রামের ‘কৃপালু’ স্বরূপ সামাজিক দূরত্ব মুছে দেয়। তারপর কাহিনি সভা-নীতি-পর্বে প্রবেশ করে: ভরত-এর ব্যাকুলতা (নিদ্রা-ক্ষুধার লোপ) এবং গুরু/মুনির নীতি-বাণী ‘রাম-রজাই’কে সর্বোচ্চ নীতি করে তোলে। ভরত-এর ত্যাগ-সঙ্কল্প—বনবাসকেই নিজের লাভ জ্ঞান করা—কাণ্ডের তত্ত্বে নির্ণায়ক: রাজধর্মের সর্বোচ্চ রূপ ‘স্ব’-এর বিসর্জন। এইভাবে অযোধ্যাকাণ্ড-সোপানে ‘অনাসক্তি’ ও ‘আজ্ঞাপালন’ মুক্তি-মার্গের অপরিহার্য সিঁড়ি হয়ে ওঠে।
চৌপাই 250.1-4
कोल किरात भिल्ल बनबासी।मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।
भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी।कंद मूल फल अंकुर जूरी।।
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा।कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं।फेरत राम दोहाई देहीं।।
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी।मानत साधु पेम पहिचानी।।
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा।पावा दरसनु राम प्रसादा।।
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा।जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
राम कृपाल निषाद नेवाजा।परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।
kola kirāta bhilla banabāsī |madhu suci suṁdara svādu sudhā sī ||
bhari bhari parana puṭīṁ raci rurī |kaṁda mūla phala aṁkura jūrī ||
sabahi dehiṁ kari binaya pranāmā |kahi kahi svāda bheda guna nāmā ||
dehiṁ loga bahu mola na lehīṁ |pherata rāma dohāī dehīṁ ||
kahahiṁ saneha magana mṛdu bānī |mānata sādhu pema pahicānī ||
tumha sukṛtī hama nīca niṣādā |pāvā darasanu rāma prasādā ||
hamahi agama ati darasu tumhārā |jasa maru dharani devadhuni dhārā ||
rāma kṛpāla niṣāda nevājā |parijana prajau cahia jasa rājā ||
কোল, কিরাত, ভিল ও বনবাসীরা মধু আনিল, যা পবিত্র, সুন্দর ও সুস্বাদু, অমৃতের ন্যায়। দক্ষতায় তৈরি করা পত্রের ছোট পাত্রে ভরে ভরে সাজাল কন্দ, মূল, ফল ও অঙ্কুর, গুচ্ছে বাঁধা। বিনয়ের সাথে প্রণাম করে সকলকে দিল, বারবার বলতে লাগল প্রতিটির স্বাদ, প্রকার, গুণ ও নাম। লোকেরা বহু মূল্য দিতে চাইল, কিন্তু তারা নিল না; রামের দোহাই দিয়ে তা ফিরিয়ে দিল। প্রেমে মগ্ন হয়ে কোমল ভাষায় বলল: সাধু ব্যক্তিরা প্রেমের পরিচয় পেয়ে যা দেওয়া হয় তা গ্রহণ করেন। তোমরা পুণ্যবান, আমরা নীচ নিষাদ; রামের কৃপায় আমরা তোমাদের দর্শন পেয়েছি। তোমাদের দর্শন আমাদের পক্ষে অত্যন্ত দুর্লভ, যেমন মরুভূমিতে স্বর্গীয় গঙ্গার ধারা প্রবাহিত হওয়া। রাম কৃপালু ও নিষাদদের রক্ষক; যেমন রাজা, তেমনই তাঁর পরিজন ও প্রজা হওয়া উচিত।
দোহা 250
यह जियँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।
yaha jiyã jāni sãkocu taji karia chohu lakhi nehu |hamahi kṛtāratha karana lagi phala tṛna aṁkura lehu ||250||
এই কথা মনে জেনে সংকোচ ত্যাগ করো, আমাদের প্রেম বুঝে কৃপা করো। আমাদের কৃতার্থ করার জন্য ফল, ঘাস ও অঙ্কুর গ্রহণ করো।
চৌপাই 251.1-4
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे।सेवा जोगु न भाग हमारे।।
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई।ईधनु पात किरात मिताई।।
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई।लेहि न बासन बसन चोराई।।
हम जड़ जीव जीव गन घाती।कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।
पाप करत निसि बासर जाहीं।नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
सपनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ।यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे।मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।
बचन सुनत पुरजन अनुरागे।तिन्ह के भाग सराहन लागे।।
tumha priya pāhune bana pagu dhāre |sevā jogu na bhāga hamāre ||
deba kāha hama tumhahi gosā̃ī |īdhanu pāta kirāta mitāī ||
yaha hamāri ati baṛi sevakāī |lehi na bāsana basana corāī ||
hama jaṛa jīva jīva gana ghātī |kuṭila kucālī kumati kujātī ||
pāpa karata nisi bāsara jāhīṁ |nahiṁ paṭa kaṭi nahi peṭa aghāhīṁ ||
sapanehũ dharama buddhi kasa kāū |yaha raghunaṁdana darasa prabhāū ||
jaba teṁ prabhu pada paduma nihāre |miṭe dusaha dukha doṣa hamāre ||
bacana sunata purajana anurāge |tinha ke bhāga sarāhana lāge ||
আপনি আমাদের প্রিয় অতিথি, যিনি এই বনে পদ রেখেছেন; আপনাদের সেবা করার মতো ভাগ্য আমাদের নেই। আমরা আপনাকে কী দেব হে প্রভু? কিরাতদের বন্ধুত্বে ইন্ধন ও পাতাই সম্পূর্ণ। এটাই আমাদের শ্রেষ্ঠ সেবা যে আমরা আপনাদের বাসন ও বস্ত্র চুরি করি না। আমরা মূর্খ প্রাণী ও জীবহন্তা, কুটিল, দুরাচারী, কুবুদ্ধি ও কুজাত। রাত দিন পাপ করে যাই, অথচ কোমে পরিধানের কাপড় নেই, পেট কখনো ভরে ওঠে না। স্বপনেও ধর্মের বুদ্ধি আমাদের কেমনে আসবে? এই রঘুনন্দনের দর্শনের প্রভাব। যখন থেকে প্রভুর পদপদ্ম দেখলাম, তখন থেকে আমাদের সহ্য করা কঠিন দুঃখ ও দোষ মিটে গেল। এই কথা শুনে নগরবাসীরা অনুরাগে আপ্লুত হলেন এবং তাঁদের ভাগ্য প্রশংসা করতে লাগলেন।
ছন্দ 251
लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं।बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।।
नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा।तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।
lāge sarāhana bhāga saba anurāga bacana sunāvahīṁ |bolani milani siya rāma carana sanehu lakhi sukhu pāvahīṁ ||
nara nāri nidarahiṁ nehu nija suni kola bhillani kī girā |tulasī kṛpā raghubaṁsamani kī loha lai laukā tirā ||
তাঁরা সকলে কোল ও ভীলদের ভাগ্য প্রশংসা করতে লাগলেন এবং তাদের প্রতি অনুরাগভরে বাক্য বললেন। সীতা ও রামের চরণে তাদের বাক্যে ও মিলনে এমন স্নেহ দেখে তাঁরা সুখ প্রাপ্ত হলেন। পুরুষ ও নারী সকলেই কোল ও ভীল নারীদের কথা শুনে নিজেদের প্রেমকে তুচ্ছ মনে করলেন। তুলসী বলেন: রঘুবংশমণির কৃপায় লৌহও লাউযের ন্যায় ভেসে ওঠে।
সোরঠা 251
बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब।जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।251।।
biharahiṁ bana cahu ora pratidina pramudita loga saba |jala jyoṁ dādura mora bhae pīna pāvasa prathama ||251||
প্রতিদিন সকল লোক আনন্দে চারিদিকে বনে বিহার করে, যেমন প্রথম বর্ষার জলে পুষ্ট ও আনন্দিত হয়েছে ব্যাঙ ও ময়ূর।
চৌপাই 252.1-4
पुर जन नारि मगन अति प्रीती।बासर जाहिं पलक सम बीती।।
सीय सासु प्रति बेष बनाई।सादर करइ सरिस सेवकाई।।
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ।माया सब सिय माया माहूँ।।
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं।तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई।कुटिल रानि पछितानि अघाई।।
अवनि जमहि जाचति कैकेई।महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं।राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।
यहु संसउ सब के मन माहीं।राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।
pura jana nāri magana ati prītī |bāsara jāhiṁ palaka sama bītī ||
sīya sāsu prati beṣa banāī |sādara karai sarisa sevakāī ||
lakhā na maramu rāma binu kāhū̃ |māyā saba siya māyā māhū̃ ||
sīyã sāsu sevā basa kīnhīṁ |tinha lahi sukha sikha āsiṣa dīnhīṁ ||
lakhi siya sahita sarala dou bhāī |kuṭila rāni pachitāni aghāī ||
avani jamahi jācati kaikeī |mahi na bīcu bidhi mīcu na deī ||
lokahũ beda bidita kabi kahahīṁ |rāma bimukha thalu naraka na lahahīṁ ||
yahu saṁsau saba ke mana māhīṁ |rāma gavanu bidhi avadha ki nāhīṁ ||
নগরের নর-নারী গভীর প্রেমে মগ্ন ছিল, দিনগুলো পলকের মতো কেটে গেল। সীতা প্রত্যেক শাশুড়ির জন্য আলাদা রূপ ধারণ করে, সমভাবে শ্রদ্ধার সঙ্গে তাঁদের সেবা করতেন। রাম ছাড়া আর কেউ এই রহস্য বুঝতে পারেনি, কারণ সীতা সম্পূর্ণই মায়া, আর মায়ার মধ্যেই এই ঘটনা ঘটেছিল। সীতা সেবার দ্বারা শাশুড়িদের মন জয় করলেন, তাঁরা সুখ পেয়ে তাঁকে উপদেশ ও আশীর্বাদ দিলেন। সীতা সহ দুই নিষ্কপট ভ্রাতাকে দেখে কুটিল রানি পরম অনুতাপ করলেন। কৈকেয়ী পৃথিবী ও যমের কাছে প্রার্থনা করলেন, কিন্তু পৃথিবী তাঁকে কোনো ফাঁক দিল না, আর বিধাতা তাঁকে মৃত্যু দান করলেন না। লোকে ও বেদে প্রসিদ্ধ, কবিরা ঘোষণা করেন, রাম থেকে মুখ ফিরিয়ে নেওয়া ব্যক্তিরা নরকেও স্থান পায় না। সকলের মনে এই সন্দেহ ছিল, বিধাতার ইচ্ছায় রাম অযোধ্যায় ফিরে যাবেন কি না।
দোহা 252
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।
nisi na nīda nahiṁ bhūkha dina bharatu bikala suci soca |nīca kīca bica magana jasa mīnahi salila sãkoca ||252||
রাতে নিদ্রা নেই, দিনে ক্ষুধা নেই, ভরত শুদ্ধ চিন্তায় ব্যাকুল, যেমন নিচু কাদায় মগ্ন মাছ জলের অভাবে সংকুচিত।
চৌপাই 253.1-4
कीन्ही मातु मिस काल कुचाली।ईति भीति जस पाकत साली।।
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू।मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी।मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ।राम जननि हठ करबि कि काऊ।।
मोहि अनुचर कर केतिक बाता।तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू।हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।
एकउ जुगुति न मन ठहरानी।सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई।बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।
kīnhī mātu misa kāla kucālī |īti bhīti jasa pākata sālī ||
kehi bidhi hoi rāma abhiṣekū |mohi avakalata upāu na ekū ||
avasi phirahiṁ gura āyasu mānī |muni puni kahaba rāma ruci jānī ||
mātu kahehũ bahurahiṁ raghurāū |rāma janani haṭha karabi ki kāū ||
mohi anucara kara ketika bātā |tehi mahã kusamau bāma bidhātā ||
jauṁ haṭha karaũ ta nipaṭa kukaramū |haragiri teṁ guru sevaka dharamū ||
ekau juguti na mana ṭhaharānī |socata bharatahi raini bihānī ||
prāta nahāi prabhuhi sira nāī |baiṭhata paṭhae riṣayã bolāī ||
ভাগ্য আমার মাতাকে অজুহাত করে এই দুষ্ট চাল চেলেছে, যেমন পাকা ধানের ক্ষেতে অনিষ্ট ও ভয় আছড়ে পড়ে। কীভাবে রামের অভিষেক হবে? আমি একটি উপায়ও ভাবতে পারি না। গুরুর আজ্ঞা মেনে তিনি অবশ্যই ফিরে আসবেন, কিন্তু মুনি রামের ইচ্ছা জেনে তবেই পুনরায় বলবেন। মাতা যদি বলেন, রঘুরাজ হয়তো ফিরে আসবেন, কিন্তু রামের মাতা কি কখনো হঠ করবেন? আমি তো কেবল এক অনুচর, আর তার মধ্যে সময়টাও অশুভ এবং বিধাতা আমার বিপক্ষে। যদি আমি হঠ করি, তবে তা সম্পূর্ণ অন্যায় হবে, কারণ গুরুর সেবকের ধর্ম কৈলাস পর্বতের চেয়েও ভারী। একটি উপায়ও মনে স্থির হল না, ভরত চিন্তা করতে করতে রাত কেটে গেল। প্রাতঃকালে স্নান করে প্রভুর শ্রীচরণে মাথা নত করে বসতেই মুনি তাঁকে ডেকে পাঠালেন।
দোহা 253
गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।
gura pada kamala pranāmu kari baiṭhe āyasu pāi |bipra mahājana saciva saba jure sabhāsada āi ||253||
গুরুর চরণকমলে প্রণাম করে আজ্ঞা লাভ করে বসলেন; ব্রাহ্মণ, মহাজন, মন্ত্রী এবং সভার সকল সদস্য এসে সেখানে একত্রিত হলেন।
চৌপাই 254.1-4
बोले मुनिबरु समय समाना।सुनहु सभासद भरत सुजाना।।
धरम धुरीन भानुकुल भानू।राजा रामु स्वबस भगवानू।।
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू।राम जनमु जग मंगल हेतू।।
गुर पितु मातु बचन अनुसारी।खल दलु दलन देव हितकारी।।
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु।कोउ न राम सम जान जथारथु।।
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला।माया जीव करम कुलि काला।।
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई।जोग सिद्धि निगमागम गाई।।
करि बिचार जियँ देखहु नीकें।राम रजाइ सीस सबही कें।।
bole munibaru samaya samānā |sunahu sabhāsada bharata sujānā ||
dharama dhurīna bhānukula bhānū |rājā rāmu svabasa bhagavānū ||
satyasaṁdha pālaka śruti setū |rāma janamu jaga maṁgala hetū ||
gura pitu mātu bacana anusārī |khala dalu dalana deva hitakārī ||
nīti prīti paramāratha svārathu |kou na rāma sama jāna jathārathu ||
bidhi hari haru sasi rabi disipālā |māyā jīva karama kuli kālā ||
ahipa mahipa jahã lagi prabhutāī |joga siddhi nigamāgama gāī ||
kari bicāra jiyã dekhahu nīkeṁ |rāma rajāi sīsa sabahī keṁ ||
শ্রেষ্ঠ মুনি যথাসময়ে কথা বললেন: শোনো সভাসদরা এবং হে জ্ঞানী ভরত। রাজা রাম সূর্যবংশের সূর্য, ধর্মের ভার বহন করেন; তিনি স্বয়ং ভগবান, স্বেচ্ছাধীন ও অন্যের উপর নির্ভরশীল নন। তিনি প্রতিজ্ঞাপালক এবং বেদের রক্ষক ও সেতু। রামের জন্ম জগতের মঙ্গলের নিমিত্ত। তিনি গুরু, পিতা ও মাতার বাক্য অনুসরণ করেন; দুষ্টদের দল নিপাত করেন এবং দেবতাদের হিত সাধন করেন। নীতিতে, প্রেমে, পরমার্থে ও স্বার্থে কেউ রামের মতো যথার্থ জানে না। ব্রহ্মা, বিষ্ণু ও শিব, চন্দ্র, সূর্য ও দিকপালেরা, মায়া, জীব, কর্ম ও কাল সকল রূপে, নাগদের অধিপতি ও ভূদের অধিপতি, যতদূর প্রভুত্ব বিস্তৃত, এবং যোগ ও সিদ্ধি যা বেদ ও আগম গায়: হৃদয়ে বিচার করে সুন্দরভাবে দেখো: রামের আজ্ঞা সকলের মস্তকে অধিষ্ঠিত।
দোহা 254
राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।
rākheṁ rāma rajāi rukha hama saba kara hita hoi |samujhi sayāne karahu aba saba mili saṁmata soi ||254||
রামের আজ্ঞা ও ইচ্ছা মেনে চললে আমাদের সকলেরই মঙ্গল হবে। বিচার করে দেখুন, বিদ্বানরা, এবং এখন সকলে মিলে সেই পথেই সম্মত হোন।
চৌপাই 255.1-4
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू।मंगल मोद मूल मग एकू।।
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ।कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।
सब सादर सुनि मुनिबर बानी।नय परमारथ स्वारथ सानी।।
उतरु न आव लोग भए भोरे।तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।
भानुबंस भए भूप घनेरे।अधिक एक तें एक बड़ेरे।।
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता।करम सुभासुभ देइ बिधाता।।
दलि दुख सजइ सकल कल्याना।अस असीस राउरि जगु जाना।।
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी।सकइ को टारि टेक जो टेकी।।
saba kahũ sukhada rāma abhiṣekū |maṁgala moda mūla maga ekū ||
kehi bidhi avadha calahiṁ raghurāū |kahahu samujhi soi karia upāū ||
saba sādara suni munibara bānī |naya paramāratha svāratha sānī ||
utaru na āva loga bhae bhore |taba siru nāi bharata kara jore ||
bhānubaṁsa bhae bhūpa ghanere |adhika eka teṁ eka baṛere ||
janamu hetu saba kahã pitu mātā |karama subhāsubha dei bidhātā ||
dali dukha sajai sakala kalyānā |asa asīsa rāuri jagu jānā ||
so gosāĩ bidhi gati jehiṁ cheṁkī |sakai ko ṭāri ṭeka jo ṭekī ||
রামের অভিষেক সকলের সুখদায়ক; এটিই একমাত্র পথ যা মঙ্গল ও আনন্দের মূল। কীভাবে রঘুরাজকে অযোধ্যায় ফিরিয়ে আনা যায়? ভেবে বলুন, সেই উপায় আমরা করি। সকলেই শ্রদ্ধার সঙ্গে মুনিবরের বাণী শুনলেন, যা নীতি, পরমার্থ ও স্বার্থে পূর্ণ। কোনো উত্তর এল না; লোকেরা হতবুদ্ধি হল। তখন ভরত মস্তক নত করে হাত জোড় করে বললেন। সূর্যবংশে অনেক রাজা হয়েছেন, একেক জন আগের জনের চেয়ে শ্রেষ্ঠ। সকলের জন্মের হেতু পিতা-মাতা, কিন্তু কর্ম ভাল-মন্দ বিধাতা দান করেন। আপনার আশীর্বাদ দুঃখ নাশ করে সকল কল্যাণ সাধন করে, এরকমই সারা জগতে পরিচিত। কিন্তু আপনি সেই স্বামী যিনি বিধির গতি রুদ্ধ করেছেন। আপনি যে সংকল্প দৃঢ় করেছেন তা কে নাকচ করতে পারে?
দোহা 255
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।
būjhia mohi upāu aba so saba mora abhāgu |suni sanehamaya bacana gura ura umagā anurāgu ||255||
আমাকে এখন উপায় জিজ্ঞাসা করা, এ সবই আমার দুর্ভাগ্য। স্নেহময় বাক্য শুনে গুরুর হৃদয়ে অনুরাগ উমগিত হল।
চৌপাই 256.1-4
तात बात फुरि राम कृपाहीं।राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।
सकुचउँ तात कहत एक बाता।अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई।फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता।भे प्रमोद परिपूरन गाता।।
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा।जनु जिय राउ रामु भए राजा।।
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी।सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे।फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।
कानन करउँ जनम भरि बासू।एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।
tāta bāta phuri rāma kṛpāhīṁ |rāma bimukha sidhi sapanehũ nāhīṁ ||
sakucaũ tāta kahata eka bātā |aradha tajahiṁ budha sarabasa jātā ||
tumha kānana gavanahu dou bhāī |pheriahiṁ lakhana sīya raghurāī ||
suni subacana haraṣe dou bhrātā |bhe pramoda paripūrana gātā ||
mana prasanna tana teju birājā |janu jiya rāu rāmu bhae rājā ||
bahuta lābha loganha laghu hānī |sama dukha sukha saba rovahiṁ rānī ||
kahahiṁ bharatu muni kahā so kīnhe |phalu jaga jīvanha abhimata dīnhe ||
kānana karaũ janama bhari bāsū |ehiṁ teṁ adhika na mora supāsū ||
হে পুত্র, তোমার কথা সত্য, এ সবই রামের কৃপায়। রাম বিমুখ হয়ে কেউ স্বপ্নেও সিদ্ধি লাভ করে না। হে পুত্র, আমি একটি কথা বলতে সঙ্কুচিত হই: যখন সব হারাতে বসে, তখন বুদ্ধিমান অর্ধেক ত্যাগ করে অবশিষ্ট রক্ষা করেন। তোমরা দুই ভাই বনে যাও, তারপর লক্ষ্মণ, সীতা ও রঘুরাজকে ফিরিয়ে আনা যাবে। এই সুবচন শুনে দুই ভ্রাতা আনন্দিত হলেন, তাঁদের সমস্ত দেহ আনন্দে পরিপূর্ণ হল। মন প্রসন্ন হল, দেহে তেজ বিরাজমান হল, যেন রাজা জীবিত হলেন এবং রাম রাজা হলেন। লোকেরা বহু লাভ ও সামান্য হানি দেখল, কিন্তু রানিরা সকলেই কাঁদলেন, তাঁদের দুঃখ ও সুখ সমান ছিল। ভরত বললেন: মুনি যা বলেছেন তা সম্পন্ন হওয়ার সমান, তিনি জগতের প্রাণীদের কাঙ্ক্ষিত ফল দান করেছেন। আমি জন্মভর বনে বাস করব, এর চেয়ে অধিক আমার আর কোনো সুখ নেই।
দোহা 256
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।
ãtarajāmī rāmu siya tumha sarabagya sujāna |jo phura kahahu ta nātha nija kījia bacanu pravāna ||256||
অন্তর্যামী রাম ও সীতা, আর আপনি, প্রভু, সর্বজ্ঞ ও জ্ঞানী। যদি যথার্থ বলেন, তবে হে নাথ, নিজের বাক্য সত্য করুন।
চৌপাই 257.1-4
भरत बचन सुनि देखि सनेहू।सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।
भरत महा महिमा जलरासी।मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।
गा चह पार जतनु हियँ हेरा।पावति नाव न बोहितु बेरा।।
औरु करिहि को भरत बड़ाई।सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए।सहित समाज राम पहिं आए।।
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु।बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।
बोले मुनिबरु बचन बिचारी।देस काल अवसर अनुहारी।।
सुनहु राम सरबग्य सुजाना।धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।
bharata bacana suni dekhi sanehū |sabhā sahita muni bhae bidehū ||
bharata mahā mahimā jalarāsī |muni mati ṭhāṛhi tīra abalā sī ||
gā caha pāra jatanu hiyã herā |pāvati nāva na bohitu berā ||
auru karihi ko bharata baṛāī |sarasī sīpi ki siṁdhu samāī ||
bharatu munihi mana bhītara bhāe |sahita samāja rāma pahiṁ āe ||
prabhu pranāmu kari dīnha suāsanu |baiṭhe saba suni muni anusāsanu ||
bole munibaru bacana bicārī |desa kāla avasara anuhārī ||
sunahu rāma sarabagya sujānā |dharama nīti guna gyāna nidhānā ||
ভরতের কথা শুনে এবং তাঁর স্নেহ দেখে, মুনি সভাসহ দেহাতীত হলেন। ভরতের মহান মহিমা বিশাল জলরাশির ন্যায়, আর মুনির মন তীরে দাঁড়ানো অসহায় নারীর মতো। সে পার হতে চায়, মনে মনে উপায় খোঁজে, কিন্তু নৌকা, জাহাজ বা ভেলা কিছুই পায় না। তবে ভরতের বড়াই অন্য কে করবে? পুকুর বা শঙ্খে কি সিন্ধু সমাতে পারে? ভরত মুনির মনের ভেতর গেলেন, আর মুনি সমাজসহ রামের কাছে এলেন। প্রভু প্রণাম করে উত্তম আসন দিলেন, সবাই মুনির আজ্ঞায় বসলেন। মুনিবর দেশ, কাল ও অবসর অনুসারে কথা বিবেচনা করে বললেন। "শোনো রাম, সর্বজ্ঞ ও সুজ্ঞান, ধর্ম, নীতি, গুণ ও জ্ঞানের নিধান।
দোহা 257
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।
saba ke ura aṁtara basahu jānahu bhāu kubhāu |purajana jananī bharata hita hoi so kahia upāu ||257||
সবার হৃদয়ে বাস করো এবং ভালো-মন্দ ভাব জানো। নগরবাসী, মাতৃগণ এবং ভরতের হিতে যা হবে, সেই উপায় বলো।
চৌপাই 258.1-4
आरत कहहिं बिचारि न काऊ।सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ।नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।
सब कर हित रुख राउरि राखें।आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई।माथें मानि करौ सिख सोई।।
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं।सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा।भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी।भरत भगति बस भइ मति मोरी।।
मोरें जान भरत रुचि राखि।जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
ārata kahahiṁ bicāri na kāū |sūjha jūārihi āpana dāū ||
suni muni bacana kahata raghurāū |nātha tumhārehi hātha upāū ||
saba kara hita rukha rāuri rākheṁ |āyasu kiẽ mudita phura bhāṣeṁ ||
prathama jo āyasu mo kahũ hoī |mātheṁ māni karau sikha soī ||
puni jehi kahã jasa kahaba gosāīṁ |so saba bhā̃ti ghaṭihi sevakāīṁ ||
kaha muni rāma satya tumha bhāṣā |bharata sanehã bicāru na rākhā ||
tehi teṁ kahaũ bahori bahorī |bharata bhagati basa bhai mati morī ||
moreṁ jāna bharata ruci rākhi |jo kījia so subha siva sākhī ||
দুঃখী ব্যক্তিরা বিবেচনা করে কথা বলে না, এবং জুয়াড়ি কেবল নিজের চালই দেখে। মুনির কথা শুনে রঘুরাজ রাম বললেন: নাথ, উপায় আপনার নিজের হাতে। সকলের হিত আপনার ইচ্ছা রক্ষাতেই নিহিত। আপনার আজ্ঞা পালিত হলে সকলে আনন্দিত হবে, এবং আমি সত্য কথা বলছি। প্রথমে আমাকে যে আজ্ঞা দেওয়া হবে, তা আমি মাথায় গ্রহণ করে মানব। তারপর গোসাই, আপনি যাকে যা বলবেন, সে সেই সেবা সর্বপ্রকারে যথাযথভাবে পালন করবে। মুনি বললেন: রাম, তুমি সত্য বলেছ, কিন্তু ভরতের প্রেমে বিচারের কোনো অবকাশ নেই। সেই জন্য আমি বারবার বলছি যে ভরতের ভক্তির বশীভূত হয়েছে আমার বুদ্ধি। আমার মতে ভরতের ইচ্ছা অনুসারে যা কিছু করা হবে তা মঙ্গলজনক হবে, শিব সাক্ষী।
দোহা 258
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।
bharata binaya sādara sunia karia bicāru bahori |karaba sādhumata lokamata nṛpanaya nigama nicori ||258||
ভরতের বিনতি শ্রদ্ধার সঙ্গে শুনুন, তারপর বিচার করুন। তারপর সাধুদের মত, লোকমত, রাজনীতি এবং বেদের সার গ্রহণ করে কার্য করুন।
চৌপাই 259.1-4
गुरु अनुराग भरत पर देखी।राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
भरतहि धरम धुरंधर जानी।निज सेवक तन मानस बानी।।
बोले गुर आयस अनुकूला।बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई।भयउ न भुअन भरत सम भाई।।
जे गुर पद अंबुज अनुरागी।ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।
राउर जा पर अस अनुरागू।को कहि सकइ भरत कर भागू।।
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई।करत बदन पर भरत बड़ाई।।
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई।अस कहि राम रहे अरगाई।।
guru anurāga bharata para dekhī |rāma hdayã ānaṁdu biseṣī ||
bharatahi dharama dhuraṁdhara jānī |nija sevaka tana mānasa bānī ||
bole gura āyasa anukūlā |bacana maṁju mṛdu maṁgalamūlā ||
nātha sapatha pitu carana dohāī |bhayau na bhuana bharata sama bhāī ||
je gura pada aṁbuja anurāgī |te lokahũ bedahũ baṛabhāgī ||
rāura jā para asa anurāgū |ko kahi sakai bharata kara bhāgū ||
lakhi laghu baṁdhu buddhi sakucāī |karata badana para bharata baṛāī ||
bharatu kahahīṁ soi kiẽ bhalāī |asa kahi rāma rahe aragāī ||
গুরুর ভরতের প্রতি অনুরাগ দেখে রামের হৃদয় বিশেষ আনন্দে পরিপূর্ণ হল। ভরতকে ধর্মের ধারক এবং দেহ, মন ও বাক্যে নিজের সেবক বলে জেনে, তিনি গুরুর আদেশের অনুকূল কথা বললেন, মৃদু, কোমল এবং মঙ্গলের মূল। প্রভু, আপনার এবং পিতার চরণের শপথ নিই, পৃথিবীতে ভরতের সমান কোনো ভাই হয়নি। যারা গুরুর পদ্মপদের প্রতি অনুরাগী, তারা লোকে ও বেদে অত্যন্ত ভাগ্যবান। আপনি যার প্রতি এমন অনুরাগ করেন, সেই ভরতের ভাগ্য কে বলতে পারে? ছোট ভাইকে দেখে আমার বুদ্ধি লজ্জিত হয়, ভরতের মুখের সামনে তার প্রশংসা করতে। ভরত যা বলে, ঠিক তাই করা আমাদের কল্যাণের জন্য হবে। এই বলে রাম নীরব হয়ে রইলেন।
দোহা 259
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।
taba muni bole bharata sana saba sãkocu taji tāta |kṛpāsiṁdhu priya baṁdhu sana kahahu hṛdaya kai bāta ||259||
তখন মুনি ভরতকে বললেন, "হে প্রিয় পুত্র, সমস্ত সংকোচ ত্যাগ করে কৃপাসিন্ধু প্রিয় বন্ধুর কাছে তোমার হৃদয়ের কথা বলো।"
परंपरागत मान्यता अनुसार इस खंड का पाठ ‘दास्य-भाव’ और ‘राम-रजाइ’ की स्वीकृति दृढ़ करता है; शोक-व्याकुल मन को शान्ति देता है और सेवा-धर्म की प्रेरणा से ‘सत्संग-लाभ’ तथा गृह-कलह/अहंकार-क्षय का फल माना जाता है—विशेषतः भरत-चरित्र के श्रवण से त्याग-बुद्धि प्रबल होती है।
सामान्य रूप से राम-नाम-सम्पुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम रामाय नमः’ का जप-सम्पुट प्रचलित है; भरत-त्याग/आज्ञापालन भाव में ‘राम-रजाइ’ पर टिकने हेतु ‘राम’ नाम-सम्पुट को ही सर्वोत्तम माना जाता है।
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