Adhyaya 47
Anushasana ParvaAdhyaya 4756 Verses

Adhyaya 47

Dāyavibhāga (Inheritance Apportionment) and Household Precedence — Dialogue of Yudhiṣṭhira and Bhīṣma

Upa-parva: Dāyavibhāga–Niyama (Rules of Inheritance and Apportionment) — Anuśāsana-parva Discourses

Chapter 47 presents a technical dharma inquiry: Yudhiṣṭhira requests clarification on how inheritance should be apportioned when a householder has multiple wives recognized in a graded order, and when sons are born from those unions. Bhīṣma answers by laying out ranked shares and conditional entitlements, repeatedly emphasizing that certain portions—especially for the son born from the lowest-recognized union—are to be taken only if explicitly given by the father, while still recommending provision on grounds of non-cruelty (ānṛśaṃsya). The chapter further explains the rationale for unequal division by appealing to precedence within the household: the senior wife’s ritual and domestic roles are treated as determinative of status, and this precedence is used to justify differential shares among offspring. The discourse then extends the same logic to other social categories, specifying different division schemes (e.g., tenfold, eightfold, fivefold) and restating that among sons of the same category, shares are equal, with an additional senior portion for the eldest. Overall, the chapter functions as casuistic guidance intended to minimize disputes by defining hierarchy, conditions of transfer, and a bounded ethic of provision.

Chapter Arc: युधिष्ठिर धर्मराज भीष्म से पूछते हैं—सब धर्मों में सबसे अधिक विचारणीय यह प्रश्न है कि कन्या किस प्रकार के पुरुष को दी जाए। → भीष्म विवाह-धर्म के सूक्ष्म मानदण्ड खोलते हैं—वर के शील-वृत्त, विद्या, कुल/योनि, कर्म और गुणों की जाँच; कन्या की सहमति/अभिप्राय का स्थान; मातृ-सपिण्ड और पितृ-गोत्र निषेध; और यह भी कि आभूषण-उपहार लेकर किया गया कन्यादान ‘मूल्य’ या ‘विक्रय’ नहीं है। मतभेद उभरते हैं कि पाणिग्रहण से पहले/बीच का ‘अन्तर’ क्या अर्थ रखता है और किस बिन्दु पर विवाह-बंधन अटल होता है। → विवाह-संस्कार की निर्णायक रेखा स्थापित होती है—सप्तपदी के सातवें पद पर पाणिग्रहण-मन्त्रों की निष्ठा/पूर्णता मानी जाती है; वहीं से स्त्री ‘भार्या’ के रूप में निश्चित होती है। → भीष्म समन्वय करते हैं—जहाँ उत्तम पात्र मिले वहीं कन्या देनी चाहिए; जीवित रहते हुए भी कुल-परिवार को विचार करना चाहिए; सत्यवचन और विधि-पालन अनिवार्य है; और अनुकूल, वंशानुरूप, विधिपूर्वक अग्नि के सम्मुख परिक्रमा आदि से विवाह की मर्यादा पूर्ण होती है। → कन्या की ‘इच्छा’ (गान्धर्व-धर्म) और कुल-परिवार की ‘विचारणा’ के बीच, व्यवहार में किसे कितना प्रधान माना जाए—यह प्रश्न अगले उपदेशों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २९ श्लोक हैं) ऑपनआक्राता छा अर: चतुश्नत्वारिशो< ध्याय: कन्या-विवाहके सम्बन्धमें पात्रविषयक विभिन्न विचार युधिछिर उवाच यन्मूलं सर्वधधर्माणां स्वजनस्य गृहस्य च । पितृदेवातिथीनां च तनमे ब्रूहि पितामह

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ, যে কর্ম সকল ধর্মের মূল, স্বজন ও গৃহের ভিত্তি, এবং পিতৃগণ, দেবতা ও অতিথিদের সৎকারেরও অবলম্বন—সেই কন্যাদান সম্বন্ধে আমাকে বলুন।

Verse 2

अयं हि सर्वधर्माणां धर्मश्चिन्त्यतमो मतः । कीदृशस्य प्रदेया स्थात्‌ कन्येति वसुधाधिप,पृथ्वीनाथ! सब धर्मोंसे बढ़कर यही चिन्तन करने योग्य धर्म माना गया है कि कैसे पात्रको कन्या देनी चाहिये?

যুধিষ্ঠির বললেন— হে পৃথিবীপতি! সকল ধর্মের মধ্যে এই ধর্মই সর্বাধিক চিন্তনীয়— কেমন পুরুষকে কন্যা বিবাহে দান করা উচিত?

Verse 3

भीष्म उवाच शीलवृत्ते समाज्ञाय विद्यां योनिं च कर्म च । सद्/रिरेवं प्रदातव्या कन्या गुणयुते वरे

ভীষ্ম বললেন— বৎস! প্রথমে বরপ্রার্থীর শীল-স্বভাব ও আচরণ, বিদ্যা, বংশ এবং কর্মধারা ভালো করে যাচাই করতে হবে। সর্বদিক থেকে গুণসম্পন্ন বলে প্রতীয়মান হলে তবেই কন্যাকে তার হাতে সমর্পণ করা উচিত।

Verse 4

ब्राह्मणानां सतामेष ब्राह्मो धर्मो युधिष्ठिर । आवाह्गामावहेदेवं यो दद्यादनुकूलत:

ভীষ্ম বললেন— হে যুধিষ্ঠির! সদাচারী ব্রাহ্মণদের এই ব্রাহ্ম ধর্ম— যাকে সম্মানসহকারে আহ্বান করে যথাযোগ্য অভ্যর্থনা করা হয়, তাকে তার মঙ্গল ও অনুকূলতা অনুযায়ী দান করা উচিত।

Verse 5

आत्माभिप्रेतमुत्सूज्य कन्याभिप्रेत एव यः:

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি নিজের অভিপ্রায় ত্যাগ করে কেবল কন্যার অভিপ্রায় অনুসারেই চলে…

Verse 6

अभिप्रेता च या यस्य तस्मै देया युधिष्ठिर । गान्धर्वमिति तं॑ धर्म प्राहुरवेदविदो जना:

ভীষ্ম বললেন— হে যুধিষ্ঠির! যে নারী ও যে পুরুষ পরস্পরকে কামনা করে ও গ্রহণ করে, সেই নারীকে সেই পুরুষকেই দেওয়া উচিত। বেদজ্ঞ জনেরা এই বিবাহধর্মকে ‘গান্ধর্ব’ বলে অভিহিত করেন।

Verse 7

युधिष्ठिर! जब कन्याके माता-पिता अपने पसंद किये हुए वरको छोड़कर जिसे कन्या पसंद करती हो तथा जो कन्याको चाहता हो ऐसे वरके साथ उस कन्याका विवाह करते हैं, तब वेदवेत्ता पुरुष उस विवाहको गान्धर्व धर्म (गान्धर्व विवाह) कहते हैं ।।

Bhishma said: “Yudhishthira, when a maiden’s parents set aside the suitor they themselves had chosen and instead marry her to the man she prefers—who also desires her—learned men of the Vedas call that form of marriage the Gandharva mode. But when, O king, her kinsmen are enticed and won over, and the maiden is in effect ‘purchased’ by giving abundant wealth, the wise declare that to be the Asura mode of marriage.”

Verse 8

हत्वा छित्त्वा च शीर्षाणि रुदतां रुदतीं गृहात्‌ । प्रसहम हरणं तात राक्षसो विधिरुच्यते

Bhishma said: “After killing and even severing the heads of her weeping protectors, and then forcibly carrying away the girl—herself in tears—from her home: this, dear one, is declared to be the ‘Rākṣasa’ mode (of marriage).” The verse frames the act as a named social category while simultaneously exposing its violent, adharma-leaning character through the imagery of grief, coercion, and bloodshed.

Verse 9

पज्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यों युधिष्ठिर । पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यो कथंचन

Bhīṣma said: “Of the five forms of marriage, O Yudhiṣṭhira, three are in accordance with dharma, while two are contrary to dharma. The Paiśāca and the Āsura forms should never be practiced under any circumstances.”

Verse 10

ब्राह्मः क्षात्रो5थ गान्धर्व एते धर्म्या नरर्षभ । पृथग्‌ वा यदि वा मिश्रा: कर्तव्या नात्र संशय:

Bhīṣma said: “O bull among men, the Brāhma, the Kṣātra, and the Gāndharva—these are declared to be marriages in accordance with dharma. Whether performed separately in their distinct forms or combined in mixed forms, they are to be undertaken; there is no doubt about this.”

Verse 11

तिस्रो भार्या ब्राह्मणस्य द्वे भायें क्षत्रियस्य तु । वैश्य: स्वजात्यां विन्देत तास्वपत्यं समं भवेत्‌

Bhīṣma said: “For a Brāhmaṇa, three wives are prescribed; for a Kṣatriya, two. A Vaiśya should marry only within his own varṇa. The children born from these wives are regarded as equal and as belonging to the father’s varṇa—no hierarchy is to be drawn among them on account of the mothers’ lineage.”

Verse 12

ब्राह्मणी तु भवेज्ज्येष्ठा क्षत्रिया क्षत्रियस्य तु रत्यर्थमपि शूद्रा स्यान्नेत्याहुरपरे जना:

ভীষ্ম বললেন—স্ত্রীদের মধ্যে ব্রাহ্মণীর স্থান সর্বাগ্রে; ক্ষত্রিয়ের জন্য ক্ষত্রিয়াই শ্রেষ্ঠ। কেউ কেউ বলেন, রতির উদ্দেশ্যে শূদ্রাকেও গ্রহণ করা যায়; কিন্তু অন্যেরা তা মানেন না।

Verse 13

अपत्यजन्म शूद्रायां न प्रशंसन्ति साधव: । शूद्रायां जनयन्‌ वि्र: प्रायश्चित्ती विधीयते

ভীষ্ম বললেন—শূদ্রা নারীর গর্ভে সন্তান উৎপাদনকে সাধুগণ প্রশংসা করেন না। কোনো ব্রাহ্মণ যদি শূদ্রার গর্ভে সন্তান জন্ম দেন, তবে তাঁর জন্য প্রায়শ্চিত্ত নির্ধারিত।

Verse 14

श्रेष्ठ पुरुष ब्राह्मणका शूद्र-कन्याके गर्भसे संतान उत्पन्न करना अच्छा नहीं मानते। शूद्राके गर्भसे संतान उत्पन्न करनेवाला ब्राह्मण प्रायश्चित्तका भागी होता है ।।

ভীষ্ম বললেন—শ্রেষ্ঠজনেরা মনে করেন, ব্রাহ্মণের পক্ষে শূদ্র-কন্যার গর্ভে সন্তান উৎপন্ন করা প্রশস্ত নয়; শূদ্রার গর্ভে সন্তান উৎপন্নকারী ব্রাহ্মণ প্রায়শ্চিত্তের অধিকারী হয়। ত্রিশ বছরের পুরুষ দশ বছরের, এখনও ঋতুমতী না হওয়া কন্যাকে স্ত্রীরূপে গ্রহণ করুক; অথবা একুশ বছরের পুরুষ সাত বছরের কন্যাকে বিবাহে গ্রহণ করুক।

Verse 15

यस्यास्तु न भवेद्‌ भ्राता पिता वा भरतर्षभ । नोपयच्छेत तां जातु पुत्रिकाधर्मिणी हि सा

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে কন্যার পিতা বা ভ্রাতা নেই, তাকে কখনও বিবাহে গ্রহণ করা উচিত নয়; কারণ তাকে পুত্রিকা-ধর্মিণী বলে গণ্য করা হয়।

Verse 16

त्रीणि वर्षाण्युदी क्षेत्र कन्या ऋतुमती सती । चतुर्थे त्वथ सम्प्राप्ते स्वयं भर्तारमर्जयेत्‌

ভীষ্ম বললেন—ঋতুমতী হওয়ার পর কন্যা তিন বছর পর্যন্ত বিবাহের অপেক্ষা করবে। চতুর্থ বছর উপস্থিত হলে সে নিজেই স্বীয় পতি গ্রহণ করতে পারে।

Verse 17

प्रजा न हीयते तस्या रतिश्ष भरतर्षभ । अतोडन्‍्यथा वर्तमाना भवेद्‌ वाच्या प्रजापते:

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! এইরূপ হলে সেই কন্যার ঐ পুরুষের সঙ্গে সংযোগ দোষরূপ গণ্য হয় না, এবং তার গর্ভজাত সন্তানও মর্যাদায় হীন বলে বিবেচিত হয় না। কিন্তু যে নারী এই বিধির বিপরীতে আচরণ করে, সে প্রজাপতির দৃষ্টিতে নিন্দনীয়—কারণ সে ধর্মনিয়ম লঙ্ঘন করে।

Verse 18

असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितु: । इत्येतामनुगच्छेत तं धर्म मनुरब्रवीत्‌,जो कन्या माताकी सपिण्ड और पिताके गोत्रकी न हो, उसीका अनुगमन करे। इसे मनुजीने धर्मानुकूल बताया है?

ভীষ্ম বললেন—যে কন্যা মাতৃপক্ষে সপিণ্ড-সম্পর্কের নয় এবং পিতৃপক্ষে একই গোত্রের নয়, তাকেই বিবাহে গ্রহণ করা উচিত। মনু একেই ধর্মের বিধান বলেছেন।

Verse 19

युधिछिर उवाच शुल्कमन्येन दत्तं स्याद्‌ ददानीत्याह चापर: । बलादन्य: प्रभाषेत धनमन्य: प्रदर्शयेत्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! যদি একজন কন্যাশুল্ক দিয়ে বিবাহ স্থির করে, আরেকজন ‘আমি দেব’ বলে প্রতিশ্রুতি দিয়ে স্থির করে, তৃতীয়জন বলপ্রয়োগে কন্যাকে নিয়ে যাওয়ার কথা বলে, চতুর্থজন অধিক ধন দেখিয়ে তার আত্মীয়স্বজনকে প্রলুব্ধ করে, আর পঞ্চমজন ইতিমধ্যে পাণিগ্রহণ সম্পন্ন করে—তবে ধর্মতঃ সেই কন্যা কার স্ত্রী বলে গণ্য হবে? আমরা এই বিষয়ে তত্ত্ব জানতে চাই; আপনি আমাদের চক্ষু ও পথপ্রদর্শক হোন।

Verse 20

पाणिग्रहीता चान्य: स्यात्‌ कस्य भार्या पितामह | तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! আর যদি অন্য কেউ পাণিগ্রহণও সম্পন্ন করে থাকে, তবে ধর্মতঃ সেই কন্যা কার স্ত্রী বলে গণ্য হবে? আমরা তত্ত্ব জানতে চাই; আপনি আমাদের চক্ষু হোন।

Verse 21

भीष्म उवाच यत्‌ किंचित्‌ कर्म मानुष्यं संस्थानाय प्रदृश्यते । मन्त्रवन्मन्त्रितं तस्थ मृषावादस्तु पातक:

ভীষ্ম বললেন—মানুষের যে কোনো কর্ম যদি শৃঙ্খলা ও স্থিতি প্রতিষ্ঠার জন্যই করা হয়, তা পরামর্শের মতো গোপনে ও বিচক্ষণতায় সম্পন্ন হলেও—মিথ্যা বাক্য তবু পাপ।

Verse 22

भीष्मजीने कहा--भारत! मनुष्योंके हितसे सम्बन्ध रखनेवाला जो कोई भी कर्म है

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত! মানুষের কল্যাণের সঙ্গে যুক্ত যে কোনো কর্মই শৃঙ্খলা ও ব্যবস্থার রক্ষার্থে নির্ধারিত হয়। সকল বিচক্ষণ পুরুষ একত্র হয়ে যখন স্থির করেন—“অমুক কন্যাকে অমুক পুরুষের হাতে দেওয়া উচিত”—তখন সেই ব্যবস্থাই বিবাহের সিদ্ধান্ত স্থাপন করে। যে মিথ্যা বলে সেই স্থির ব্যবস্থাকে উল্টে দেয়, সে পাপের ভাগী হয়। স্ত্রী, স্বামী, ঋত্বিক, আচার্য, শিষ্য ও উপাধ্যায়—এরাও যদি উক্ত ব্যবস্থার বিরুদ্ধে মিথ্যা বলে, তবে দণ্ডের যোগ্য বলে কেউ কেউ মনে করেন; কিন্তু অন্যেরা বলেন, এদের দণ্ড দেওয়া উচিত নয়।

Verse 23

न हाकामेन संवासं मनुरेवं प्रशंसति । अयशस्यथमधर्म्य च यन्मृषा धर्मकोपनम्‌

ভীষ্ম বললেন—মনু এমন সহবাসকে প্রশংসা করেন না, যা পারস্পরিক ইচ্ছাবিহীন। অতএব সর্বসম্মতিতে স্থির হওয়া বিবাহকে মিথ্যা প্রমাণ করতে উদ্যত হওয়া অপযশ ও অধর্মের কারণ; একে ধর্মবিধ্বংসী কর্ম বলে গণ্য করা হয়।

Verse 24

नैकान्तो दोष एकस्मिंस्तदा केनोपपद्यते | धर्मतो यां प्रयच्छन्ति यां च क्रीणन्ति भारत

ভীষ্ম বললেন—দোষ এক পক্ষেই একান্তভাবে স্থির হয় না; তবে এমন ক্ষেত্রে দোষ স্থাপনই বা কীভাবে হবে? হে ভারত, যে কন্যাকে তার ভ্রাতা-বন্ধুরা ধর্মানুযায়ী পাণিগ্রহণ-বিধিতে দান করে, অথবা মূল্য গ্রহণ করে প্রদান করে—তাকে যে পুরুষ বিধিপূর্বক বিবাহ করে, কিংবা মূল্য দিয়ে অর্জন করে, নিজ গৃহে নিয়ে যায়, তার কোনো দোষ হয় না। সে অবস্থায় দোষের উদ্ভবই বা কীভাবে বলা যায়?

Verse 25

बन्धुभि: समनुज्ञाते मन्त्रहोमौ प्रयोजयेत्‌ । तथा सिद्धयन्ति ते मन्त्रा नादत्ताया: कथंचन

ভীষ্ম বললেন—কন্যার আত্মীয়স্বজনের অনুমতি পাওয়ার পরেই বিবাহ-মন্ত্র ও হোম প্রয়োগ করা উচিত; তবেই সেই মন্ত্রগুলি সিদ্ধ হয়। যে কন্যাকে তার অভিভাবকরা বিধিপূর্বক দান করেননি, তার জন্য করা মন্ত্রপ্রয়োগ কোনোভাবেই সফল হয় না; এমন মিলনকে বৈদিক রীতিতে সংস্কৃত বিবাহ বলা হয় না।

Verse 26

यस्त्वत्र मन्त्रसमयो भारयपत्योर्मिथ: कृत: । तमेवाहुर्गरीयांसं यश्चासौ ज्ञातिभि: कृत:

ভীষ্ম বললেন—স্বামী ও স্ত্রীর মধ্যে পরস্পর পবিত্র মন্ত্রোচ্চারণসহ যে প্রতিজ্ঞা স্থাপিত হয়, তাকেই সর্বাধিক গুরুতর ও শ্রেষ্ঠ বলা হয়। আর সেই বন্ধনকে যদি আত্মীয়-স্বজনও স্বীকার করে সমর্থন দেন, তবে তা আরও প্রশংসনীয়—কারণ এতে ব্যক্তিগত শপথের সঙ্গে সামাজিক অনুমোদন ও স্থিতিও যুক্ত হয়।

Verse 27

देवदत्तां पतिर्भा्या वेत्ति धर्मस्य शासनात्‌ । स दैवीं मानुषी वाचमनृतां पर्युदस्यति

ভীষ্ম বললেন—ধর্মশাস্ত্রের বিধান অনুসারে যে নারী ন্যায়সঙ্গতভাবে স্বামীর কাছে আসে, স্বামী তাকে দেবদত্তার মতো নিজের স্ত্রী বলে জানে। অতএব তিনি তাকে ভাগ্যপ্রদত্ত জেনে গ্রহণ করেন এবং সেই বিবাহকে অযোগ্য বলে যে মানুষের মিথ্যা কথাবার্তা, তা পরিত্যাগ করেন।

Verse 28

युधिछिर उवाच कन्यायां प्राप्तशुल्कायां ज्यायांश्वैदाव्रजेद्‌ वर: । धर्मकामार्थसम्पन्नो वाच्यमत्रानृतं न वा

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! যদি এক বরকে কন্যা দেওয়া স্থির করে তার মূল্য গ্রহণ করা হয়ে থাকে, আর পরে তার চেয়েও শ্রেষ্ঠ—ধর্ম, অর্থ ও কামে সম্পন্ন—অত্যন্ত যোগ্য বর উপস্থিত হয়, তবে এ বিষয়ে কি অসত্য বলা উচিত, না নয়? অর্থাৎ পূর্বতন প্রার্থীককে অস্বীকার করে কন্যা না দেওয়া কি বৈধ?

Verse 29

तस्मिन्नुभयतोदोषे कुर्वन्‌ श्रेय: समाचरेत्‌ । अयं नः सर्वधर्माणां धर्मश्षिन्त्यतमो मत:

যেখানে উভয় দিকেই দোষের আশঙ্কা থাকে, সেখানে যা অধিক কল্যাণকর তাই করা উচিত। আমাদের মতে সকল ধর্মের মধ্যে কন্যাদান-সংক্রান্ত এই ধর্মই সর্বাধিক চিন্তনীয়।

Verse 30

तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान्‌ | तदेतत्‌ सर्वमाचक्ष्व न हि तृप्पामि कथ्यताम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—আমরা এ বিষয়ে প্রকৃত তত্ত্ব জানতে চাই; অতএব আপনি আমাদের পথপ্রদর্শক চক্ষু হোন। এ সব কথা স্পষ্ট করে সম্পূর্ণভাবে বলুন। অল্প শুনে আমার তৃপ্তি হয় না; তাই অনুগ্রহ করে ব্যাখ্যা করুন।

Verse 31

भीष्य उवाच नैव निष्ठाकरं शुल्कं ज्ञात्वा5डसीत्‌ तेन नाहतम्‌ | न हि शुल्कपरा: सन्त: कनन्‍्यां ददति कहिचित्‌

ভীষ্ম বললেন—রাজন! কেবল শুল্ক প্রদানেই বিবাহ অপরিবর্তনীয়ভাবে স্থির হয় না। এ কথা জেনেই দাতা শুল্ক দেয়; অতএব সে প্রতারিত হয় না। সজ্জনরা কেবল শুল্কের বশে সর্বাবস্থায় কন্যাদান করেন না।

Verse 32

अन्यैर्गुणैरुपेतं तु शुल्क॑ याचन्ति बान्धवा: । अलंकृत्वा वहस्वेति यो दद्यादनुकूलत:

ভীষ্ম বললেন—কন্যা যদি অন্য (অপ্রতিকূল) গুণ বা অবস্থায় ভারাক্রান্ত হয়, তখনই তার আত্মীয়েরা কন্যাশুল্ক দাবি করে। কিন্তু বরকে ডেকে যদি বলা হয়—“একে অলংকৃত করে স্ত্রীরূপে গ্রহণ করো,” এবং বর যদি তার জন্য অলংকার দিয়ে বিবাহ করে, তবে তা ধর্মসম্মত।

Verse 33

यच्च तां च ददत्येवं न शुल्क विक्रयो न सः । प्रतिगृह्म भवेद्‌ देयमेष धर्म: सनातन:

আর এভাবে কন্যা দান করলে তা কন্যাশুল্কের বিনিময়ে বিক্রয় নয়—দাতা কোনো ব্যবসায়ী নয়। যা দেওয়া হয়, তা দানরূপে গ্রহণ করা উচিত; এটাই সনাতন ধর্ম।

Verse 34

क्योंकि इस प्रकार जो कन्याके लिये आभूषण लेकर कन्यादान किया जाता है, वह न तो मूल्य है और न विक्रय ही; इसलिये कन्याके लिये कोई वस्तु स्वीकार करके कन्याका दान करना सनातन धर्म है ।।

ভীষ্ম বললেন—কন্যাদানের সময় যে অলংকার গ্রহণ করা হয়, তা না মূল্য, না বিক্রয়; অতএব কন্যার জন্য প্রথাগত কোনো উপহার গ্রহণ করে কন্যাদান করাই সনাতন ধর্ম বলে মানা হয়। কিন্তু “আমি তোমাকে আমার কন্যা দেব”—এ কথা আগেভাগে বাধ্যতামূলক বলে গণ্য নয়; কেউ বিভিন্ন পাত্রকে বলে “দেব”, কেউ বলে “দেব না”, কেউ বলে “অবশ্যই দেব”—কন্যাদান সম্পন্ন হওয়ার আগে পর্যন্ত এ সব কথাই প্রকৃত অর্থে বাঁধা নয়।

Verse 35

तस्मादा ग्रहणात्‌ पाणेर्याचयन्ति परस्परम्‌ । कन्यावर: पुरा दत्तो मरुद्धिरिति न: श्रुतम्‌

ভীষ্ম বললেন—অতএব পাণিগ্রহণ সম্পন্ন হওয়ার আগে পর্যন্ত বর ও কন্যা পরস্পরকে চাইতে পারে, একে অপরের কাছে প্রার্থনা করতে পারে। আমরা শুনেছি, প্রাচীনকালে মরুদ্গণ কন্যা ও বর-এর এই ‘পারস্পরিক নির্বাচন’-কে অধিকাররূপে অনুমোদন করেছিলেন। সুতরাং পাণিগ্রহণ না হওয়া পর্যন্ত পারস্পরিক অনুরোধ বৈধ।

Verse 36

नानिष्टाय प्रदातव्या कन्या इत्यूषिचोदितम्‌ | तन्मूलं काममूलस्य प्रजनस्येति मे मति:

ঋষিরা বলেছেন—অযোগ্য পাত্রকে কন্যা দেওয়া উচিত নয়; কারণ যোগ্য পুরুষকে কন্যাদানই কামসুখের ভিত্তি এবং সুসন্তানের উৎপত্তির কারণ—এটাই আমার মত।

Verse 37

समीक्ष्य च बहून्‌ दोषान्‌ संवासाद्‌ विद्धि पाणयो: । यथा निष्ठाकरं शुल्क न जात्वासीत्‌ तथा शूणु

ভীষ্ম বললেন—বিবাহকে কেবল সহবাস ও মূল্যদানের দ্বারা স্থির বলে মানলে বহু দোষ জন্মায়; তা ভালো করে বিচার করো। শুধু ‘শুল্ক’ দিলেই বিবাহের চূড়ান্ত নিশ্চয়তা হয় না। প্রাচীন কালে এ প্রথা কখনও স্থির নিয়ম ছিল না—শোনো, আমি ব্যাখ্যা করছি।

Verse 38

अहं विचित्रवीर्यस्य द्वे कन्‍ये समुदावहम्‌ । जित्वा च मागधान्‌ सर्वान्‌ काशीनथ च कोसलान्‌

ভীষ্ম বললেন—বিচিত্রবীর্যের বিবাহের জন্য আমি মগধের সকল বীরকে, কাশীর অধিপতিকে এবং কোসলের যোদ্ধাদের পরাজিত করে কাশীরাজের দুই কন্যাকে হরণ করে এনেছিলাম।

Verse 39

गृहीतपाणिरेका5<सीत्‌ _प्राप्तशुल्का पराभवत्‌ | कन्या गृहीता तत्रैव विसर्ज्या इति मे पिता

ভীষ্ম বললেন—তাদের মধ্যে একজনের পাণিগ্রহণ ইতিমধ্যেই হয়ে গিয়েছিল; আর অন্যজনের বিষয়ে কাশীরাজ শুল্ক গ্রহণ করেছিলেন। তখন আমার পিতা (বংশের জ্যেষ্ঠ) সেখানেই বললেন—“যার পাণিগ্রহণ হয়েছে তাকে এখানেই মুক্ত করে দাও; আর অন্যজনকে বিবাহ করো।” কিন্তু এ কথায় আমার সন্দেহ জাগল; তাই আমি অন্যদের কাছেও ধর্মসম্মত সিদ্ধান্ত জিজ্ঞাসা করলাম।

Verse 40

अब्रवीदितरां कन्यामावहेति स कौरव: । अप्यन्याननुपप्रच्छ शड्कमान: पितुर्वच:

ভীষ্ম বললেন—সেই কৌরব (আমাদের জ্যেষ্ঠ) বললেন, “অন্য কন্যাকে বিবাহ করো।” কিন্তু পিতার কথার যথার্থতা নিয়ে সন্দেহ হওয়ায় আমি অন্যদের কাছেও জিজ্ঞাসা করলাম।

Verse 41

अतीव हास्य धर्मेच्छा पितुर्मेडभ्यधिका भवत्‌ । ततो5हमन्रुवं राजन्नाचारेप्सुरिदं वच: । आचार ं तत्त्वतो वेत्तुमिच्छामि च पुन: पुन:

ভীষ্ম বললেন—ধর্ম পালনের বিষয়ে আমার পিতৃব্যের আকাঙ্ক্ষা অত্যন্ত প্রবল ছিল, পিতার থেকেও অধিক। তখন, হে রাজন, আচারের সত্য রূপ জানতে ইচ্ছুক হয়ে আমি বললাম—“পিতা, এই বিষয়ে প্রথাগত আচারের তত্ত্ব আমি বারবার করে যথার্থভাবে জানতে চাই।”

Verse 42

ततो मयैवमुक्ते तु वाक्ये धर्मभृतां वर: । पिता मम महाराज बाह्लीको वाक्यमब्रवीत्‌,महाराज! मेरे ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ मेरे चाचा बाह्नीक इस प्रकार बोले --

আমি এই কথা বলার পর, ধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ আমার পিতৃব্য বাহ্লীক, হে মহারাজ, প্রত্যুত্তরে আমাকে এই বাক্য বললেন।

Verse 43

शिष्टानां क्षत्रियाणां च धर्म एब सनातन: । युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्याहने योग्य वरको बुलाकर उसके साथ कन्याका विवाह करना उत्तम ब्राह्मणोंका धर्म-ब्राह्मविवाह है। जो धन आदिके द्वारा वरपक्षको अनुकूल करके कन्यादान किया जाता है

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির! শিষ্টজন ও ক্ষত্রিয়দের এই সনাতন ধর্ম—যোগ্য বরকে আহ্বান করে কন্যার বিবাহ তাকে দেওয়া; এটাই ব্রাহ্ম বিবাহ, যা শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের দ্বারা প্রশংসিত। আর যখন ধনাদি দ্বারা বরপক্ষকে অনুকূল করে কন্যাদান করা হয়, সেটিও শিষ্ট ব্রাহ্মণ ও ক্ষত্রিয়দের প্রাচীন আচরণ; একে প্রাজাপত্য বিবাহ বলা হয়। স্মৃতিতে বলা আছে—যাদের স্থিরতা পাণিগ্রহণে নয়, কেবল শুল্কে, তারা অন্য বর অন্বেষণ করুক; তারা ‘প্রাপ্ত-শুল্ক’ নামে স্মৃত।

Verse 44

“यदि तुम्हारे मतमें मूल्य देनेमात्रसे ही विवाहका पूर्ण निश्चय हो जाता है, पाणिग्रहणसे नहीं, तब तो स्मृतिका यह कथन ही व्यर्थ होगा कि कन्‍्याका पिता एक वरसे शुल्क ले लेनेपर भी दूसरे किसी गुणवान्‌ वरका आश्रय ले सकता है। अर्थात्‌ पहलेको छोड़कर दूसरे गुणवान्‌ वरसे अपनी कन्याका विवाह कर सकता है ।।

ভীষ্ম বললেন—যদি তোমার মতে কেবল শুল্ক দেওয়াতেই বিবাহ সম্পূর্ণ স্থির হয়, পাণিগ্রহণে নয়, তবে স্মৃতির সেই বিধান অর্থহীন হয়ে পড়ে যে কন্যার পিতা এক বর থেকে শুল্ক গ্রহণ করেও অধিক গুণবান অন্য বরকে আশ্রয় নিতে পারে—অর্থাৎ প্রথমকে ত্যাগ করে শ্রেষ্ঠ বরকে কন্যা দিতে পারে। কারণ যাদের স্থিরতা পাণিগ্রহণে নয়, কেবল শুল্কে, তাদের এই বক্তব্যকে ধর্মজ্ঞেরা প্রমাণ বলে মানেন না।

Verse 45

प्रसिद्ध भाषितं दाने नैषां प्रत्यायकं पुन: । ये मन्यन्ते क्रयं शुल्क न ते धर्मविदो नरा:

ভীষ্ম বললেন—দানের বিষয়ে (বিশেষত কন্যাদানে) লোকের মধ্যে এই কথাই প্রসিদ্ধ—‘কন্যাদান’ হয়েছে। অতএব যারা শুল্ক বা ক্রয়মূল্যকেই বিবাহের স্থাপন বলে মানে, তাদের কথাকে প্রতিষ্ঠা করার মতো নির্ভরযোগ্য প্রমাণ নেই। যারা ক্রয় ও শুল্ককে মান্য করে, তারা ধর্মজ্ঞ নয়।

Verse 46

न चैतेभ्य: प्रदातव्या न वोढव्या तथाविधा । न होव भार्या क्रेतव्या न विक्रय्या कथंचन

এমন লোকদের কাছে কন্যা দেওয়া উচিত নয়, আর যে কন্যাকে এভাবে ‘বিক্রি’ করা হচ্ছে, তার সঙ্গে বিবাহও করা উচিত নয়; কারণ স্ত্রী কোনো অবস্থাতেই কেনা-বেচার বস্তু নয়।

Verse 47

ये च क्रीणन्ति दासीं च विक्रीणन्ति तथैव च । भवेत्‌ तेषां तथा निष्ठा लुब्धानां पापचेतसाम्‌

যারা দাসীকে ক্রয় করে এবং তদ্রূপ বিক্রয়ও করে, তারা লোভে আচ্ছন্ন ও পাপবুদ্ধিসম্পন্ন। তাদের মধ্যে এমনই স্থির প্রবৃত্তি জন্মায় যে তারা স্ত্রীকেও ক্রয়-বিক্রয়ের বস্তু বলে গণ্য করে।

Verse 48

अस्मिन्नर्थे सत्यवन्तं पर्यपृच्छन्त वै जना: । कन्याया: प्राप्तशुल्काया: शुल्कद: प्रशमं गत:

এই বিষয়ে প্রাচীনকালের লোকেরা সত্যবানকে জিজ্ঞাসা করেছিল—“হে মহাপ্রাজ্ঞ! কন্যার জন্য নির্ধারিত শুল্ক (বধূমূল্য) যদি গ্রহণ করা হয়ে থাকে এবং শুল্কদাতা পুরুষটি পরে মৃত্যুবরণ করে, তবে কি অন্য কেউ তার পাণিগ্রহণ করতে পারে, না পারে? আমাদের ধর্মবিষয়ে সংশয় হয়েছে; আপনি তা দূর করুন, কারণ আপনি জ্ঞানীদের দ্বারা সম্মানিত।”

Verse 49

पाणिग्रहीता वान्य: स्यादत्र नो धर्मसंशय: । तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसम्मत:

“এই বিষয়ে আমাদের ধর্মসংশয়—যে বর শুল্ক স্থির করে কন্যাকে গ্রহণ করতে চেয়েছিল সে মারা গেলে, অন্য কেউ কি পাণিগ্রাহীতা (বৈধ স্বামী) হতে পারে? হে মহাপ্রাজ্ঞ, আমাদের এই সংশয় ছেদন করুন; কারণ আপনি জ্ঞানীদের দ্বারা স্বীকৃত।”

Verse 50

तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान्‌ | तानेवं ब्रुवत: सर्वान्‌ सत्यवान्‌ वाक्‍्यमब्रवीत्‌

“আমরা এই বিষয়ে যথার্থ তত্ত্ব জানতে চাই; আপনি আমাদের পথপ্রদর্শক চক্ষু হোন।” তারা সকলেই এভাবে বললে সত্যবান উত্তর দিলেন।

Verse 51

यत्रेष्ट तत्र देया स्याज्नात्र कार्या विचारणा । कुर्वते जीवतो<प्येवं मृते नैवास्ति संशय:

যেখানে উৎকৃষ্ট ও যোগ্য বর পাওয়া যায়, সেখানেই কন্যাদান করা উচিত; এর বিপরীত কোনো চিন্তা করা উচিত নয়। শুল্কদাতা জীবিত থাকলেও সজ্জনরা যোগ্য বর উপস্থিত হলে তার সঙ্গেই কন্যার বিবাহ সম্পন্ন করে; আর সে যদি মৃত হয়, তবে অন্যত্র দেওয়ায় তো কোনো সংশয়ই নেই।

Verse 52

देवरं प्रविशेत्‌ कन्या तप्येद्‌ वापि तप: पुन: । तमेवानुगता भूत्वा पाणिग्राहस्य काम्यया

ভীষ্ম বললেন—যে বর কন্যাশুল্ক প্রদান করেছিল, সে যদি মারা যায়, তবে কন্যা তার কনিষ্ঠ ভ্রাতাকে (দেবরকে) স্বামীরূপে গ্রহণ করবে; অথবা সেই বরকেই অন্য জন্মেও লাভ করার বাসনায়, মননে তারই অনুগতা হয়ে, আজীবন কুমারী থেকে পুনরায় তপস্যা করবে।

Verse 53

लिखन्त्येव तु केषांचिदपरेषां शनैरपि । इति ये संवदन्त्यत्र त एतं॑ निश्चयं विदु:

ভীষ্ম বললেন—কেউ কেউ একে তৎক্ষণাৎ লিখিত বিধানরূপে স্থির করে, আর অন্যেরা ধীরে ধীরে (পরম্পরায়) তা গ্রহণ করে। যারা এখানে এ বিষয়ে তর্ক করে, তারা শেষ পর্যন্ত এই স্থির সিদ্ধান্তেই উপনীত হয়।

Verse 54

तत्पाणिग्रहणात्‌ पूर्वमन्तरं यत्र वर्तते । सर्वमड्रलमन्त्रं वै मृषावादस्तु पातक:

ভীষ্ম বললেন—পাণিগ্রহণের পূর্বে যদি কোথাও বিরতি বা বাধা ঘটে—যদিও সমস্ত মঙ্গলাচার ও মন্ত্রপ্রয়োগ সম্পন্ন হয়ে থাকে—এবং তখন কন্যাকে অন্য যোগ্য বরকে দেওয়া হয়, তবে দাতার কেবল মিথ্যাবচনের পাপই হয়।

Verse 55

पाणिग्रहणमन्त्राणां निष्ठा स्यात्‌ सप्तमे पदे । पाणिग्रहस्य भार्या स्याद्‌ यस्य चाद्ि: प्रदीयते । इति देयं वदन्त्यत्र त एन॑ निश्चयं विदु:

ভীষ্ম বললেন—সপ্তপদীর সপ্তম পদে পাণিগ্রহণ-মন্ত্রের সিদ্ধি সম্পূর্ণ হয়; তখনই দাম্পত্য-বন্ধন স্থির হয়। জল দিয়ে সংকল্প করে যাকে কন্যা দান করা হয়, সেই-ই তার পাণিগ্রাহী স্বামী, এবং সে-ই তার স্ত্রী বলে গণ্য হয়। পণ্ডিতেরা এখানে কন্যাদানের বিধি এভাবেই বলেন; তারা এই স্থির সিদ্ধান্তই জানেন।

Verse 56

अनुकूलामनुवंशां क्रात्रा दत्तामुपाग्निकाम्‌ । परिक्रम्य यथान्यायं भार्या विन्देद्‌ द्विजोत्तम:

ভীষ্ম বললেন—যে নারী স্বভাবে অনুকূল, বংশের উপযুক্ত, ভ্রাতার দ্বারা বিধিপূর্বক দত্ত, এবং প্রজ্বলিত অগ্নির নিকটে উপবিষ্ট—এমন স্ত্রীকে শ্রেষ্ঠ দ্বিজ শাস্ত্রবিধি অনুসারে অগ্নি পরিক্রমা করে গ্রহণ করবে।

Frequently Asked Questions

How patrimonial wealth should be divided when household relationships are ranked, including how to assign shares among sons from different unions while preventing unjust seizure and minimizing domestic conflict.

Define inheritance rules in advance, respect household precedence tied to duties, and treat some claims as conditional on explicit transfer—while still ensuring humane provision to reduce social grievance.

Yes: it invokes ānṛśaṃsya (non-cruelty) as a higher framing ethic, recommending limited provision even where entitlement is constrained, thereby balancing rule-based order with humane obligation.