Mahabharata Adhyaya 184
Drona ParvaAdhyaya 18449 Versesकर्ण की परमा शक्ति के व्यय से पाण्डव-पक्ष का दीर्घकालिक लाभ; तात्कालिक रूप से रात्रि-युद्ध शोक और उथल-पुथल से भरा।

Adhyaya 184

Chapter Arc: रात्रि-युद्ध की धधकती पृष्ठभूमि में धृतराष्ट्र का प्रश्न उठता है—कर्ण ने अर्जुन-वध के लिए संचित अपनी ‘परमा शक्ति’ अभी तक क्यों नहीं छोड़ी, जबकि अर्जुन के गिरते ही पाण्डव-सृञ्जय सेना स्वतः ढह जाती? → संजय धृतराष्ट्र को युद्ध-नीति और मनोविज्ञान का सूत्र समझाता है: अर्जुन का व्रत है कि बुलाए जाने पर वह पीछे नहीं हटता; अतः कर्ण को अर्जुन तक पहुँचने के लिए उसे स्वयं खोजकर चुनौती देनी होगी। उधर श्रीकृष्ण सात्यकि को रहस्य बतलाते हैं—कर्ण की वही दिव्य शक्ति, जो विजय का आधार थी, वासुदेव ने घटोत्कच पर ‘व्यय’ करवा दी; इसी चिंता में कृष्ण को न नींद आती थी, न हर्ष। → कृष्ण का निर्णायक उद्घाटन—घटोत्कच को कर्ण के सामने भेजना एक सोची-समझी युक्ति थी, क्योंकि रात्रि-समर में कर्ण को पीड़ित/विवश करने वाला दूसरा कोई नहीं; लक्ष्य यह था कि कर्ण की अर्जुन-वधिनी शक्ति अर्जुन पर नहीं, घटोत्कच पर खर्च हो जाए। → संजय के कथन से धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर स्पष्ट होता है: कर्ण की शक्ति अब अर्जुन के लिए शेष नहीं; कृष्ण की दूरदृष्टि ने पाण्डव-पक्ष को उस एक प्राणघाती संकट से उबार दिया, भले ही इसकी कीमत घटोत्कच के रूप में चुकानी पड़ी। → कर्ण की शक्ति-क्षय के बाद भी रात्रि-युद्ध की दिशा क्या होगी—और कर्ण-अर्जुन का अनिवार्य सामना अब किस शर्त पर घटेगा?

Shlokas

Verse 1

नील ()) आ+_अस+- दयशीत्याधिकशततमो<् ध्याय: कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्‍यों नहीं छोड़ी

قال دِهْرِتَراشْتْرَ: «يا سانجيا، إن كان السلاح الإلهي الذي كان لدى كارنا، ابن السائق، مقدَّرًا أن يبطل بعد قتل بطلٍ واحد، فلماذا ترك الجميع ولم يقذفه على بارثا (أرجونا)؟»

Verse 2

तस्मिन्‌ हते हता हि स्यु: सर्वे पाण्डवसृञ्जया: । एकवीरवथधे कस्माद्‌ युद्धे न जयमादथे

قال فايُو: «لو قُتل هو (أرجونا) لكان جميع الباندافا والسِرِنْجَيا كأنهم قد هلكوا. فلماذا إذن لم يظفر بالنصر في الحرب بقتل ذلك البطل الواحد؟»

Verse 3

आहूतो न निवर्तेयमिति तस्य महाव्रतम्‌ । स्वयं मार्गयितव्य: स सूतपुत्रेण फाल्गुन:

قال فايُو: «ذلك عهده العظيم: “إذا دُعيتُ فلن أرتدّ.” لذلك، في مثل هذه الحال، كان ينبغي لابن السائق (كارنا) أن يطلب فالغونا (أرجونا) بنفسه.»

Verse 4

ततो द्वैरथमानीय फाल्गुनं शक्रदत्तया । जघान न वृष: कस्मात्‌ तन्‍्ममाचक्ष्व संजय

ثمّ إنّه، بعدما استدرج فالغونا (أرجونا) إلى مبارزةٍ مباشرةٍ عربةً لعربة، لِمَ لَمْ يُسقِطْهُ ڤṛṣa (كارنا)—مع أنّه يلتزم بدَهرمَه الخاص—بقوّة السلاح التي منحها له شَكرا (إندرا)؟ أخبرني بذلك يا سنجيا.

Verse 5

नूनं बुद्धिविहीनश्चवाप्पसहायश्व मे सुतः । शत्रुभिव्य॑सित: पाप: कथं नु स जयेदरीन्‌

قال ڤايو: «لا ريب أنّ ابني قد خَلَا من التمييز، وهو الآن قائمٌ بلا سند. وقد خُدِعَ وأُحكِمَت عليه حِيَلُ أعدائه؛ فكيف لذاك الآثم أن يظفر بالنصر على خصومه؟»

Verse 6

या हास्य परमा शक्तिर्जयस्य च परायणम्‌ | सा शक्तिर्वासुदेवेन व्यंसिता च घटोत्कचे,जो इसकी सबसे बड़ी शक्ति और विजयका आधार-स्तम्भ थी, उस दिव्य शक्तिको घटोत्कचपर चलवाकर श्रीकृष्णने व्यर्थ कर दिया

تلك السلاح، التي كانت قوّته العظمى وعماد ظفره، جعلها ڤاسوديفا تُنفَق على غَطوتكَتشا، فغدت تلك القوّة الإلهيّة باطلةً عن غايتها المقصودة.

Verse 7

कुणेर्यथा हस्तगतं हियेत्‌ फलं बलीयसा । तथा शक्तिरमोघा सा मोघी भूता घटोत्कचे

وكما ينتزع رجلٌ أقوى ثمرةً قد استقرّت في يد ضعيفٍ أو مُقعَد، كذلك جُعِلَت تلك الحربة التي لا تُخطئ أن تقع عبثًا على غَطوتكَتشا؛ فقد دبّر كريشنا أن تُستنفَد تلك القوّة «التي لا تُخيب» هناك، فتصير عديمة الأثر لأيّ هدفٍ آخر.

Verse 8

यथा वराहस्य शुनश्च युध्यतो- स्तयोरभावे श्वपचस्य लाभ: । मन्ये विद्वन्‌ वासुदेवस्य तद्धद्‌ युद्धे लाभ: कर्णहैडिम्बयोर्व

قال شري ڤايو ديڤا: «أيّها العالِم، كما أنّ الخنزير البريّ والكلب إذا اقتتلا، فإن هلاك أحدهما يكون ربحًا في النهاية لآكل الجيف (منبوذٍ) ينتفع بالجثة؛ كذلك في قتال كارنا وغَطوتكَتشا أرى أنّ المستفيد الحقّ هو ابن ڤاسوديفا، شري كريشنا.»

Verse 9

घटोत्कचो यदि हन्याद्धि कर्ण परो लाभ: स भवेत्‌ पाण्डवानाम्‌ | वैकर्तनो वा यदि त॑ निहन्यात्‌ तथापि कृत्यं शक्तिनाशात्‌ कृतं स्यात्‌

قال فايُو: «إنْ قتلَ كَرْنَةُ غَطوتكَجَةَ كان في ذلك نفعٌ عظيمٌ للباندَفَة. وإنْ كان فايكرتَنَةُ (كَرْنَة) هو الذي يقتله، فالغرضُ كذلك مُنجَز—إذ إن فناءَ الرمحِ الذي وهبه إندرا هو بعينه يُتمّ ما لا بدّ من إتمامه.»

Verse 10

इति प्राज्ञ: प्रज़्॒यैतद्‌ विचिन्त्य घटोत्कचं सूतपुत्रेण युद्धे । अघातयद्‌ वासुदेवो नृसिंह: प्रियं कुर्वन्‌ पाण्डवानां हितं च

وهكذا فإن فاسوديفا الحكيم—أسدُ الناس—بعد أن تفكّر في الأمر بتمييزٍ جليّ، دبّر في ساحة القتال أن يُقتَل غَطوتكَجَة على يد ابن السائق (كَرْنَة)، صانعًا ما هو عزيزٌ على الباندَفَة وما فيه صلاحُهم.

Verse 11

संजय उवाच एतच्चिकीर्षितं ज्ञात्वा कर्णस्य मधुसूदन: । नियोजयामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम्‌

قال سَنْجَيا: لما علم مدهوسودَنَة (كريشنا) بهذه النية من كَرْنَة، دفعَ حينئذٍ سيّدَ الرّاكشَسَة إلى مبارزة العربات، لكي تُستنفَدَ سلاحُ كَرْنَة الذي لا يخطئ ويُجعلَ عديمَ الأثر.

Verse 12

घटोत्कचं महावीर्य महाबुद्धिर्जनार्दन: । अमोघाया विघातार्थ राजन दुर्मन्त्रिते तव

قال سَنْجَيا: أيها الملك، إن جاناردَنَة (كريشنا) بالغَ الذكاء قد دفعَ غَطوتكَجَةَ ذا البأس العظيم بقصدٍ محدّد: إبطالُ السلاحِ الذي لا يخطئ. وهذا، أيها الملك، ثمرةُ مشورتك السوء.

Verse 13

तदैव कृतकार्या हि वयं स्याम कुरूद्वह । न रक्षेद्‌ यदि कृष्णस्तं पार्थ कर्णान्महारथात्‌,कुरुश्रेष्ठ! यदि श्रीकृष्ण महारथी कर्णसे कुन्तीकुमार अर्जुनकी रक्षा न करते तो हमलोग उसी समय कृतकार्य हो गये होते

قال سَنْجَيا: «يا فحلَ الكورو، لكنا أنجزنا غايتنا في تلك اللحظة بعينها—لو لم يحمِ كريشنا بارثا (أرجونا) من كَرْنَة، ذلك المقاتل العظيم على العربة.»

Verse 14

साश्वध्वजरथ: संख्ये धृतराष्ट्र पतेद्‌ भुवि । विना जनार्दन॑ पार्थो योगानामीश्वरं प्रभुम्‌

قال سنجيا: «يا دِهريتاراشترا، في لُجَّةِ القتال يسقط بارثا (أرجونا) لا محالة إلى الأرض مع خيله ورايته وعربته، لو كان بغير جناردانا—شري كريشنا، ربّ اليوغا وسيدها، المولى المتصرف.»

Verse 15

तैस्तैरुपायैर्बहुभी रक्ष्यमाण: स पार्थिव । जयत्यभिमुख: शत्रून्‌ पार्थ: कृष्णेन पालित:

قال سنجيا: «أيها الملك، إن بارثا (أرجونا)، وقد حماه كريشنا بشتى الحيل والتدابير، يلاقي الأعداء وجهاً لوجه ويظفر بهم.»

Verse 16

स विशेषात्‌ त्वमोघाया: कृष्णो5रक्षत पाण्डवम्‌ | हन्यात्‌ क्षिप्रं हि कौन्तेयं शक्तिवृक्षमिवाशनि:

قال سنجيا: «وبجهدٍ خاصٍّ حمى كريشنا الباندڤا (أرجونا) من ذلك السلاح الذي لا يخطئ. فلقد كان سيقتل ابن كونتي سريعاً، كما تحرق الصاعقةُ الشجرةَ إذا أصابتها.»

Verse 17

धृतराष्ट उवाच विरोधी च कुमन्त्री च प्राज्ञममानी ममात्मज: । यस्यैव समतिक्रान्तो वधोपायो जयं प्रति

قال دِهريتاراشترا: «يا سنجيا، إن ابني خصِمٌ معاند، سيّئُ المشورة، يتوهّم في كبريائه أنه حكيم. ولهذا أفلت من يده ذلك التدبيرُ الذي لا يخطئ—المفضي إلى الظفر—والذي كان به يمكن قتل أرجونا.»

Verse 18

सवा कर्णो महाबुद्धि: सर्वशस्त्रभूतां वर: । न मुक्तवान्‌ कथं सूत ताममोघां धनंजये,सूत! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण तो बड़ा बुद्धिमान्‌ है; उसने स्वयं ही उस अमोघ शक्तिको अर्जुनपर कैसे नहीं छोड़ा?

قال دِهريتاراشترا: «يا سوتا، كيف لم يُطلِق كارنا—وهو عظيمُ الذكاء، المتقدّمُ على جميع حملة السلاح—تلك القوّةَ التي لا تُخطئ على دهننجايا (أرجونا)؟»

Verse 19

तवापि समतिक्रान्तमेतद्‌ गावल्गणे कथम्‌ | एतमर्थ महाबुद्धे यत्‌ त्वया नावबोधित:,परम बुद्धिमान्‌ गवल्गणकुमार! तुम्हारे ध्यानसे यह बात कैसे निकल गयी कि तुमने कर्णको इसके विषयमें कुछ नहीं समझाया

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «كيف فاتك هذا الأمر حتى أنت أيضًا، يا غافالغَنَة؟ يا ذا الفهم العظيم، كيف لم تدرك هذه النقطة؟»

Verse 20

संजय उवाच दुर्योधनस्य शकुनेर्मम दुःशासनस्य च । रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव समर्थना

قال سَنْجَايَا: «أيها الملك، ليلة بعد ليلة لا يكون إلا هذا الإلحاح بعينه—من دُريودْهَنَة، وشَكُني، ودُحْشاسَنَة، وحتى مني أنا أيضًا.»

Verse 21

श्वः सर्वसैन्यान्युत्सूज्य जहि कर्ण धनंजयम्‌ । प्रेष्यवत्‌ पाण्डुपज्चालानुपभोक्ष्यामहे तत:

قال سَنْجَايَا: «أيها الملك، يومًا بعد يوم كان دُريودْهَنَة وشَكُني ودُحْشاسَنَة—وأنا أيضًا—يضغطون على كَرْنَة بالطلب نفسه: “يا كَرْنَة، غدًا اترك سائر المواجهات كلها واقتل دَهنَنْجَيَة (أرجونا). فإذا أُزيل أرجونا عاملنا الباندافا والبَنْتشالا معاملة الخدم، وتمتعنا بالسيادة عليهم كما نشاء.”»

Verse 22

अथवा निहते पार्थे पाण्डवान्यतमं ततः । स्थापयेद्‌ यदि वार्ष्णेयस्तस्मात्कृष्णो हि हन्यताम्‌

قال سَنْجَايَا: «أو إن كنت تظن أنه إذا قُتل بارثا (أرجونا) فإن كِرِشْنَة من آل فِرِشْنِي سيقيم باندافًا آخر ليواصل القتال—فلأجل ذلك بعينه يجب قتل كِرِشْنَة نفسه.»

Verse 23

कृष्णो हि मूलं पापडूनां पार्थ: स्कन्ध इवोद्गत:ः । शाखा इवेतरे पार्था: पञ्चाला: पत्रसंज्ञिता:

قال سَنْجَايَا: «إن كِرِشْنَة هو حقًّا جذرُ الباندافا، وأرجونا (بارثا) يبرز كالجذع الصاعد. وسائر أبناء بريثا كالأغصان، وأما البَنْتشالا فيُعَدّون كالأوراق.»

Verse 24

कृष्णाश्रया: कृष्णबला: कृष्णनाथाश्न पाण्डवा: । कृष्ण: परायणं चैषां ज्योतिषामिव चन्द्रमा:

قال سنجيا: إنّ الباندافا يتّكئون على كريشنا؛ وقوّتهم كريشنا؛ وحاميهم وربّهم كريشنا. وكريشنا لهم هو الملجأ الأعلى، كما أنّ القمر هو السند الأسمى والنور الهادي بين أنوار السماء.

Verse 25

तस्मात्‌ पर्णानि शाखाश्व स्कन्ध॑ चोत्सृज्य सूतज । कृष्णं हि विद्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा

قال سنجيا: «لذلك، يا ابن السائق، دعْ الأوراقَ والأغصانَ وحتى الجذعَ جانبًا، واضربْ الجذرَ نفسه. واعلمْ أنّ كريشنا وحده، في كل مكانٍ وكل زمان، هو جذرُ الباندافا.»

Verse 26

हन्याद्‌ यदि हि दाशाह कर्णो यादवनन्दनम्‌ | कृत्स्ना वसुमती राजन्‌ वशे तस्य न संशय:,राजन! यदि कर्ण यादवनन्दन श्रीकृष्णको मार डालता, तो यह सारी पृथ्वी उसके वशमें हो जाती, इसमें संशय नहीं है

قال سنجيا: «يا أيها الملك، لو أن كارنا قتل دَاشَارْهَا—كريشنا، بهجةَ آل يادو—لخضعت الأرضُ كلُّها لسلطان كارنا يقينًا؛ ولا شكّ في ذلك.»

Verse 27

यदि हि स निहतः शयीत भूमौ यदुकुलपाण्डवनन्दनो महात्मा । ननु तव वसुधा नरेन्द्र सर्वा सगिरिसमुद्रवना वशं व्रजेत

قال سنجيا: لو أنّ كريشنا العظيم النفس—مُفرِحَ سلالة يادو والباندافا—ضُرِبَ صريعًا فاضطجع في ساحة القتال، لآلت إليك، أيها الملك، هذه الأرضُ كلُّها، بما فيها جبالُها وبحارُها وغاباتُها، خضوعًا وسلطانًا لا محالة.

Verse 28

सातु बुद्धि: कृताप्येवं जाग्रति त्रिदशेश्वरे । अप्रमेये हृषीकेशे युद्धकालेडप्यमुहयुत

قال سنجيا: ومع أنّه كان قد عقد عزمه على ذلك، فإنّه حين جاء وقت القتال واقترب من هريشيكيشا—ربّ الآلهة الذي لا يُقاس، الدائم اليقظة والحراسة—عاد ذهنه فوقع في الوهم والضلال.

Verse 29

अर्जुन चापि राधेयात्‌ सदा रक्षति केशव: । न होनमैच्छत्‌ प्रमुखे सौते: स्थापयितुं रणे

قال سنجيا: إن كيشافا يحمي أرجونا على الدوام من رادهيَة. لذلك لم يُرِد، في مقدّمة القتال نفسها، أن يضع ابن السوتا في موضعٍ يَغلب به في المعركة.

Verse 30

भगवान्‌ श्रीकृष्ण अर्जुनको सदा राधानन्दन कर्णसे बचाये रखते थे। उन्होंने रणभूमिमें अर्जुनको सूतपुत्र कर्णके सम्मुख खड़ा करनेकी कभी इच्छा नहीं की ।।

قال سنجيا: إن الربّ المبارك شري كريشنا كان يلازم حماية أرجونا من كَرْنَ، ابن رادها. ولم يرد قطّ أن يضع أرجونا وجهاً لوجه أمام كَرْنَ في ساحة القتال. لذلك كان أتشيوتا يرسل تباعاً محاربي المركبات العظام إلى كَرْنَ، وهو يفكّر: «كيف أجعل تلك السلاح الذي لا يخطئ يُنفَق سُدى؟»—ليُستنزَف بأسه القاتل قبل أن يُستعمَل على أرجونا.

Verse 31

यश्चैवं रक्षते पार्थ कर्णात्‌ कृष्णो महामना: । आत्मानं स कथं राजन्‌ न रक्षेत्‌ पुरुषोत्तम:

قال سنجيا: «يا أيها الملك، إذا كان كريشنا العظيم الهمة يحمي بارثا من كَرْنَ على هذا النحو، فكيف لا يحمي ذلك الشخص الأسمى نفسه؟»

Verse 32

परिचिन्त्य तु पश्यामि चक्रायुधमरिंदमम्‌ । न सोस्ति त्रिषु लोकेषु यो जयेत जनार्दनम्‌

قال سنجيا: «إني بعد تأمّلٍ عميق أرى الأمر جليّاً: ليس في العوالم الثلاثة من يستطيع أن يغلب جناردانا—كريشنا حامل القرص، قاهر الأعداء.»

Verse 33

ततः कृष्णं महाबाहुं सात्यकि: सत्यविक्रम: । पप्रच्छ रथशार्दूल: कर्ण प्रति महारथ:

قال سنجيا: ثم إن ساتياكي—الصادق في بأسه، المحارب العظيم، والنمر بين فرسان المركبات—سأل كريشنا عظيم الساعدين عن كَرْنَ.

Verse 34

अयं च प्रत्यय: कर्णे शक्तिश्चलामितविक्रमा । किमर्थ सूतपुत्रेण न मुक्ता फाल्गुने तु सा

“يا مولاي! لقد كان كارنا واثقًا من أثر تلك الـ«شاكتي». وكانت تلك القوة الإلهية ذات البأس الذي لا يُحدّ في يده أيضًا. ومع ذلك، فلماذا لم يُطلق ابن السُّوتا (كارنا) تلك الشاكتي على فالغونا (أرجونا)؟”

Verse 35

श्रीवायुदेव उवाच दुःशासनश्व कर्णश्र शकुनिश्च ससैन्धव: । सतत मन्त्रयन्ति सम दुर्योधनपुरोगमा:

قال شري فايوديفا: «كان دُحشاسانا، وكارنا، وشكوني، وسايندهافا (جايدراثا)—ودوريودانا على رأسهم—يواظبون على التشاور بلا انقطاع.»

Verse 36

कर्ण कर्ण महेष्वास रणेडमितपराक्रम । नान्यस्य शक्तिरेषा ते मोक्तव्या जयतां वर

قال فايُو: «يا كارنا، يا عظيم القوس، يا من لا تُقاوَم شدته في ساحة القتال! إن هذه الـ«شاكتي» التي لك لا ينبغي أن تُطلَق على أحدٍ سواه. يا خير الظافرين، احتفظ بها لمن قُدِّرت له حقًّا.»

Verse 37

ऋते महारथात्‌ कर्ण कुन्तीपुत्राद्‌ धनंजयात्‌ । भगवान्‌ श्रीकृष्ण बोले--सात्यके! दुःशासन

قال فايُو: «ليس لأحدٍ نظيرٌ—إلا كارنا، المقاتل العظيم على العربة، ودهننجايا (أرجونا) ابن كونتي. فإن شهرته بينهم تفوق الجميع، كما يفوق فاسافا (إندرا) سائر الآلهة.»

Verse 38

तस्मिन्‌ विनिहते पार्थे पाण्डवा: सृञज्जयै: सह । भविष्यन्ति गतात्मान: सुरा इव निरग्नय:

إذا قُتِل ذلك البارثا (أرجونا)، فإن الباندافا مع السرينجاياس سيغدون كأنهم سُلبوا الروح والعزم—كحال الآلهة حين يُحرَمون من النار المقدسة.

Verse 39

३७-३८ ।। तथेति च प्रतिज्ञातं कर्णेन शिनिपुड्भव । ह्ृदि नित्यं च कर्णस्य वधो गाण्डीवधन्वचन:

قال كَرْنَةُ: «ليكن كذلك»، يا سليلَ شِينِي. غير أنّ في قلب كَرْنَة ظلّت، بلا انقطاع، فكرةُ قتلِ حاملِ غانديفا. وقد انعقد عزمه على صرعِ أرجونا—نذرٌ باطنيّ يكشف كيف أنّ العداوةَ الشخصيةَ والكِبْرَ في الحرب قد يتصلّبان ليصيرا غايةً واحدةً لا تلتفت إلى مطالب الدَّرْمَا الأوسع.

Verse 40

शिनिप्रवर! कर्णने वैसा ही करनेकी उनके सामने प्रतिज्ञा भी की थी। कर्णके हृदयमें नित्य-निरन्तर गाण्डीवधारी अर्जुनके वधका संकल्प उठता रहता था ।।

قال فايُو: «يا أكرمَ الشِّينِيّين! لقد نذر كَرْنَةُ ذلك النذرَ بعينه جهارًا أمامهم. وفي قلب كَرْنَة كانت عزيمةُ قتلِ أرجونا، حاملِ غانديفا، تنهض مرارًا بلا انقطاع. غير أنّي أنا الذي أبقيتُ رادهيَةَ (كَرْنَة) في غشاوة الوهم، يا خيرَ المحاربين؛ فلذلك لم يقذف تلك الرمحَ الإلهيَّ على أرجونا، الباندَفيَّ ذي الجياد البيضاء.»

Verse 41

फाल्गुनस्य हि सा मृत्युरिति चिन्तयतो5निशम्‌ | ननिद्रा न च मे हर्षो मनसो<स्ति युधां वर

قال فايُو: «إذ لا أزال أفكّر بلا انقطاع: “إنها حقًّا ستكون موتَ فالغونا”، فلا يأتيني نومٌ، ولا ينهض في نفسي فرحٌ، يا خيرَ المحاربين.»

Verse 42

वीरवर! वह शक्ति अर्जुनके लिये मृत्युस्वरूप है, इस चिन्तामें निरन्तर डूबे रहनेके कारण न तो मुझे नींद आती थी और न मेरे मनमें कभी हर्षका उदय होता था ।।

يا خيرَ الأبطال! إنّ ذلك السلاحَ الإلهيَّ كان لأرجونا كالموتِ بعينه. ولأنّي ظللتُ غارقًا في ذلك القلق على الدوام، لم يأتني نومٌ، ولم يطلع في قلبي فرحٌ قطّ. ولكن الآن، يا ثورَ الشِّينِيّين—إذ أرى السلاحَ نفسه قد أُطلق على غَطوتكَجَة—أفهم اليوم أنّ دهنَنْجَيا قد أُعتق من فمِ الموتِ نفسه، يا جوهرةَ تاجِ سلالةِ شِينِي.

Verse 43

नपिता न च मे माता न यूयं॑ भ्रातरस्तथा । न च प्राणास्तथा रक्ष्या यथा बीभत्सुराहवे

قال فايُو: «ليس أبي ولا أمي، ولا أنتم—إخوتي—بحاجةٍ عندي إلى حمايةٍ كهذه؛ ولا حتى حياتي أنا تُصان على هذا النحو، كما يجب أن يُحمى بيبهتسو (أرجونا) في ساحة القتال.»

Verse 44

त्रैलोक्यराज्याद्‌ यत्‌ किंचिद्‌ भवेदन्यत्‌ सुदुर्लभम्‌ । नेच्छेयं सात्वताहं तद्‌ विना पार्थ धनंजयम्‌

قال إله الريح فايُو: «ولو وُجد شيءٌ أندرُ وأعظمُ من سيادة العوالم الثلاثة، لما رغبتُ فيه من دون بارثا دهننْجَيا (أرجونا)، يا ساتيَكي!»

Verse 45

अतः प्रहर्ष: सुमहान्‌ युयुधानाद्य मे5भवत्‌ | मृतं प्रत्यागतमिव दृष्टवा पार्थ धनंजयम्‌,युयुधान! इसीलिये जैसे कोई मरकर लौट आया हो उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुनको देखकर आज मुझे बड़ा भारी हर्ष हुआ था

لذلك، يا يُيُوذانا، قامت في نفسي اليوم فرحةٌ عظيمة. إن رؤية بارثا دهننْجَيا (أرجونا) كانت كمن يرى ميتًا قد عاد؛ هكذا كان مقدار ارتياحي وابتهاجي.

Verse 46

अततश्र प्रहितो युद्धे मया कर्णाय राक्षस: । न हान्यः समरे रात्रौ शक्त: कर्ण प्रबाधितुम्‌

قال فايُو-ديفا: «في خضمّ القتال أرسلتُ الراكشسا أَتَتَشْرَا إلى كارنا. غير أنّه في قتال الليل لا أحد يقدر على قتله، ولا حتى على كبح تقدّم كارنا كبحًا مؤثرًا.»

Verse 47

इसी उद्देश्यसे मैंने युद्धमें कर्णका सामना करनेके लिये उस राक्षसको भेजा था। उसके सिवा दूसरा कोई रात्रिके समय समरांगणमें कर्णको पीड़ित नहीं कर सकता था ।।

ولهذا الغرض بعينه أرسلتُ ذلك الراكشسا إلى الحرب ليلاقي كارنا. فليس غيره من يستطيع أن يُؤلم كارنا في ساحة القتال ليلًا. وقال سنجيا: «يا مولاي الملك! هكذا، في ذلك الحين، تكلّم كيشافا، ابن ديفكي (كريشنا)—الملازم دائمًا لمصلحة دهننْجَيا، المواظب على ما هو محبوبٌ لأرجونا—بهذه الكلمات إلى ساتيَكي.»

Verse 182

इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृष्णवाक्ये द्ववशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «درونا بارفا»—في قسم مقتل غَطوتكچا—يُختَتم هنا الفصل المتعلق بقتال الليل وكلمات كريشنا: الفصل الثاني بعد المئة والثمانين.

Verse 1819

इस प्रकार श्रीमह्माभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रि-युद्धके समय श्रीकृष्णणा कथनविषयक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا انتهى الفصل الحادي والثمانون بعد المئة من «دروṇa پرفا» من «المهابهارتا» المباركة، ضمن قسم مقتل غهاṭوتكچا، في زمن قتال الليل، والمتمحور حول الكلمات التي نطقت بها السيدة شري كṛṣṇā. وتُشير خاتمة الفصل إلى انتقالٍ في مجرى السرد: فقد دخلت الحرب طورًا ليليًّا مثقلًا بالإشكال الأخلاقي، وجُعل خطاب كṛṣṇā توجيهًا ذا شأن وسط الفوضى وضغط الضمير في قتال الظلام.

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