Mahabharata Adhyaya 17
Drona ParvaAdhyaya 1749 Versesकौरव पक्ष के लिए अनुकूल—अर्जुन को अलग मोर्चे पर खींचकर युधिष्ठिर पर दबाव बढ़ता है, और मुख्य रणक्षेत्र में कौरव-सेना उत्साह से टूट पड़ती है।

Adhyaya 17

Saṃśaptakas in Candrārdha-vyūha; Arjuna’s Devadatta and the Traigarta Rout (Chapter 17)

Upa-parva: Saṃśaptaka–Traigarta Engagement (Candrārdha-vyūha episode)

Saṃjaya reports that the Saṃśaptakas/Traigartas take position on level ground and array their chariot host in a candrārdha (“crescent”) formation, rejoicing at Arjuna’s approach. Their loud cries fill the directions, producing an enveloping din. Observing their exuberance, Arjuna addresses Kṛṣṇa with ironic appraisal, interpreting their joy as premature and connected to their impending death in battle. He then advances and blows the gold-adorned Devadatta conch, whose sound startles the opposing ranks and even disturbs their horses, described as rigid and panicked. Regaining composure, the Traigartas launch massed arrows; Arjuna intercepts volleys mid-flight with swift shafts, answers repeated attacks, and exchanges targeted strikes. Subāhu pierces Arjuna’s crown with numerous hard arrows, making the diadem appear like an elevated post; Arjuna severs Subāhu’s weapon-hand and overwhelms him with arrow-rain, leading to Subāhu’s death and the flight of his followers. Arjuna, angered, further breaks the host with continuous arrow-nets. Fear spreads; the Traigarta king rebukes the warriors, invoking their terrible oaths made before the army and warning against public disgrace. The Saṃśaptakas then shout anew, blow conches, and return to the engagement, reaffirming a death-facing resolve.

Chapter Arc: युद्ध से सेनाओं को लौटा कर द्रोणाचार्य भीतर-ही-भीतर ग्लानि और चिंता से भर उठते हैं; वे दुर्योधन की ओर देखकर लज्जित-सा होकर कहते हैं कि अर्जुन के रहते युधिष्ठिर को संग्राम में बाँधना या पकड़ना असंभव है। → द्रोण की असफलता-स्वीकृति के बीच त्रिगर्तों के संशप्तक वीर (सुशर्मा आदि) आगे आते हैं और कठोर प्रतिज्ञा करते हैं—आज या तो अर्जुन को मारेंगे, या स्वयं मारे जाएँगे; यदि लौटे तो उन्हें अग्निदाहियों, गौहन्ताओं और ब्रह्मद्वेषियों जैसे पापियों के लोक प्राप्त हों—ऐसी शपथ से वे अपने लिए वापसी का मार्ग बंद कर देते हैं। → संशप्तक वीर युद्धभूमि में अर्जुन को ललकारते हुए पितृलोक-दिशा की ओर उसे खींच ले जाते हैं; अर्जुन धर्मराज से त्वरित वचन-विनिमय कर उन्हें रोकने के लिए अलग होता है और भूखे सिंह की तरह मृग-समूह पर टूट पड़ने को तत्पर होकर त्रिगर्तों की ओर बढ़ता है। → अर्जुन के हटते ही दुर्योधन की सेना हर्षित होकर युधिष्ठिर के निग्रह के लिए उग्र हो उठती है; दोनों सेनाएँ प्रचण्ड वेग से टकराती हैं—मानो वर्षा-ऋतु की उफनती धाराएँ एक-दूसरे से भिड़ गई हों। → अर्जुन को दूर फँसाकर कौरव-सेना का मुख्य धक्का अब युधिष्ठिर पर पड़ता है—क्या द्रोण की योजना सफल होगी, या पाण्डव-सेना इस संकट को रोक लेगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० श्लोक मिलाकर कुल ६४ श्लोक हैं।) ऑपनआक्रात बछ। अकाल (संशप्तकवधपर्व) सप्तदशो< ध्याय: सुशर्मा आदि संशप्तकवीरोंकी प्रतिज्ञा तथा अर्जुनका युद्धके लिये उनके निकट जाना संजय उवाच ते सेने शिबिरं गत्वा न्‍्यविशेतां विशाम्पते । यथाभागं यथान्यायं यथागुल्मं च सर्वश:

قال سنجيا: يا سيدَ الناس، إن الجيشين كليهما رجعا إلى معسكريهما وأخذا مواضعهما. فاستقرّت كلُّ فرقةٍ في المكان اللائق بها في كل ناحية، بحسب ما قُسِّم لها، وبحسب القاعدة والنظام، وبحسب السَّرية والتشكيل المعيَّن لها.

Verse 2

कृत्वावहारं सैन्यानां द्रोण: परमदुर्मना: । दुर्योधनमभिप्रेक्ष्य सब्रीडमिदमब्रवीत्‌,सेनाओंको युद्धसे लौटाकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन अत्यन्त दुःखी हो दुर्योधनकी ओर देखते हुए लज्जित होकर बोले--

قال سنجيا: بعدما استدعى درونا الجيوشَ من القتال، كان شديدَ الكمد في قلبه. فنظر إلى دوريودhana، وبشيءٍ من الخجل، قال هذه الكلمات.

Verse 3

उक्तमेतन्मया पूर्व न तिष्ठति धनंजये । शक्यो ग्रहीतु संग्रामे देवेरपि युधिष्ठिर:,“राजन! मैंने पहले ही कह दिया था कि अर्जुनके रहते हुए सम्पूर्ण देवता भी युद्धमें युधिष्ठिरको पकड़ नहीं सकते हैं

قال سنجيا: «أيها الملك، لقد قلتُ لك من قبل: ما دام دهننجايا (أرجونا) ثابتًا، فلن يُؤسَر يودهيشتِهيرا في ساحة القتال—حتى الآلهة لا تقدر على ذلك.»

Verse 4

इति तद्‌ व: प्रयततां कृतं पार्थेन संयुगे । मा विशड्कीर्वचो मह[मजेयौ कृष्णपाण्डवौ

«ومع أنكم بذلتم جهدكم، فقد جعل بارثا (أرجونا) في ساحة القتال كلامي السابق حقيقةً واقعة. فلا تشكّوا في قولي. إن شري كريشنا وأرجونا الباندفي، في حقّي، لا يُغلَبان.»

Verse 5

अपनीते तु योगेन केनचिच्छवेतवाहने । तत एष्यति मे राजन्‌ वशमेष युधिष्ठिर:,“राजन्‌! यदि किसी उपायसे श्वेतवाहन अर्जुन दूर हटा दिये जाय॑ँ तो ये राजा युधिष्छिर मेरे वशमें आ जायँगे

قال سانجيا: «أيها الملك، إن أمكن بحيلةٍ ما إبعادُ صاحب الخيل البيضاء (أرجونا)، فإن يودهيشتيرا هذا سيقع تحت سلطاني».

Verse 6

कश्चिदाहूय त॑ं संख्ये देशमन्यं प्रकर्षतु । तमजित्वा न कौन्तेयो निवर्तेत कथंचन

قال سانجيا: «إن دعا أحدُ الأبطال أرجونا إلى المبارزة في ساحة القتال وجذبه إلى موضعٍ آخر، فلن يرجع ابنُ كونتي بحالٍ حتى يهزم ذلك الخصم أولًا».

Verse 7

एतस्मिन्नन्तरे शून्ये धर्मराजमहं नृप । ग्रहीष्यामि चमूं भित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य पश्यत:

قال سانجيا: «أيها الملك، في هذه الفُرجة الخالية سأخترق الجيش وأقبض على دارماراجا يودهيشتيرا، وذريشتاديومنَة ينظر بعينيه».

Verse 8

अर्जुनेन विहीनस्तु यदि नोत्सूजते रणम्‌ । मामुपायान्तमालोक्य गृहीतं विद्धि पाण्डवम्‌

قال سانجيا: «إن كان الباندڤا (يودهيشتيرا) بلا أرجونا، ولم يترك ساحة القتال حين يراني أتقدّم نحوه، فاعلموا يقينًا أنه سيُقبَض عليه ويقع في قبضتي».

Verse 9

एवं ते5हं महाराज धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । समानेष्यामि सगणं वशमद्य न संशय:

قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، هكذا سأجلب اليوم دارمابوترا يودهيشتيرا، مع أتباعه، تحت سلطانك؛ لا شك في ذلك».

Verse 10

यदि तिष्ठति संग्रामे मुहूर्तमपि पाण्डव: । अथापयाति संग्रामाद्‌ विजयात्‌ तद्‌ विशिष्यते

قال سنجيا: «إن ثبتَ الباندَفيّ في ساحة القتال ولو مُهورتا واحدة، (فإني سأفعل ما يقتضيه ذلك). أمّا إن انسحب من ميدان الحرب، فذلك—أعظم حتى من نصرنا—هو العاقبة الأجلّ.»

Verse 11

संजय उवाच द्रोणस्य तद्‌ वच:ः श्रुत्वा त्रिगर्ताधिपतिस्तदा । भ्रातृभि: सहितो राजन्निदं वचनमब्रवीत्‌

قال سنجيا: أيها الملك، لما سمعَ حاكمُ التريغارتا—سوشَرمان—كلامَ درونا ذاك، قال هذه الكلمات وهو مع إخوته.

Verse 12

वयं विनिकृता राजन्‌ सदा गाण्डीवधन्चना । अनाग:स्वपि चागस्तत्‌ कृतमस्मासु तेन वै

«أيها الملك، إن أرجونا حامل قوس غانديفا قد أذلّنا على الدوام. ومع أننا بلا ذنب، فقد ظلّ يكرر الإساءة إلينا مرارًا.»

Verse 13

ते वयं स्मरमाणास्तान्‌ विनिकारान्‌ पृथग्विधान्‌ । क्रोधाग्निना दह्ममाना न शेमहि सदा निशि

«وإذ نذكر تلك المظالم المتنوعة، كلٌّ على وجهه، نحترق بنار الغضب؛ وفي الليل لا نجد راحة—فلا يأتينا النوم أبدًا.»

Verse 14

स नो दिष्टयास्त्रसम्पन्नश्नक्षु्िषयमागत: । कर्तार: सम वयं कर्म यच्चिकीर्षाम हृदूगतम्‌

«والآن، بحسن طالعنا، قد أقبل أرجونا—مكتمل السلاح—حتى صار أمام أعيننا. فسنُنجز حقًّا الفعل الذي عزمنا عليه في سرائرنا منذ زمن.»

Verse 15

भवतश्च प्रियं यत्‌ स्थादस्माकं च यशस्करम्‌ । वयमेनं हनिष्यामो निकृष्यायोधनाद्‌ बहि:

قال سنجيا: «سيكون هذا مُرضيًا لك، وسيزيد أيضًا من صيتنا. سنجرّه خارج ساحة القتال ثم نقتله».

Verse 16

अद्यास्त्वनर्जुना भूमिरत्रिगर्ताथ वा पुन: । सत्यं ते प्रतिजानीमो नैतन्मिथ्या भविष्यति

«اليوم، أمامك، نُقِرّ لك قَسَمًا بالحق: إمّا أن تُصبح هذه الأرض خالية من أرجونا، وإمّا ألا يبقى أحدٌ من التريغارتا على وجهها. إن قولي هذا لن يكون كذبًا.»

Verse 17

एवं सत्यरथश्नोक्त्वा सत्यवर्मा च भारत | सत्यव्रतश्न सत्येषु: सत्यकर्मा तथैव च

قال سنجيا: «يا بهاراتا، لما قال ساتياراثا ذلك، أجابه ساتيافارما أيضًا. وكذلك فعل ساتيافراتا، وساتييشو، وساتياكارما.» والمعنى: بعد إعلان ساتياراثا كرّر إخوته القسم نفسه، مُقيّدين أنفسهم بالصدق والعزم على العودة إلى القتال.

Verse 18

सहिता भ्रातर: पञजच रथानामयुतेन च । न्यवर्तन्त महाराज कृत्वा शपथमाहवे

قال سنجيا: «أيها الملك العظيم، يا بهجة آل بهاراتا، لقد عاد ومعه إخوته الخمسة وقوة من عشرة آلاف من مقاتلي العربات، بعد أن أخذوا قَسَمًا جليلًا للقتال.»

Verse 19

मालवास्तुण्डिकेराश्न रथानामयुतैस्त्रिभि: । सुशर्मा च नरव्याप्रस्त्रिगर्त: प्रस्थलाधिप:

قال سنجيا: «إن المَالَفَةَ والتُونْدِيكِيرَةَ، مع سوشَرْما—نمرٍ بين الرجال، ملك التريغارتا وسيد برَسْثَلا—قد تقدّموا بعد أن نذروا نذرًا، ومعهم ثلاثون ألفًا من مقاتلي العربات.»

Verse 20

मावेल्लकैललित्थैश्न सहितो मद्रकैरपि । रथानामयुतेनैव सो5गमद्‌ भ्रातृभि: सह

قال سانجيا: أيها الملك العظيم، بعدما قطع سوشَرما—ملك التريغارتا وأسد سادة براسثالا—مثل ذلك النذر، خرج مع إخوته ليؤدّي قسم الحرب، ترافقه قبائل المافيلّكا والكيلاليتا وكذلك المادراكا، مسنودًا بقوة قوامها عشرة آلاف عربة حربية.

Verse 21

नानाजनपदेभ्यश्व रथानामयुतं पुनः । समुत्थितं विशिष्टानां शपथार्थमुपागमत्‌,विभिन्न देशोंसे आये हुए दस हजार श्रेष्ठ महारथी भी वहाँ शपथ लेनेके लिये उठकर गये

قال سانجيا: ومن ممالك شتّى نهض أيضًا عشرة آلاف من المقاتلين المميّزين—سادة الفروسية وقيادة العربات—وتقدّموا ليؤدّوا القسم.

Verse 22

ततो ज्वलनमानर्च्य हुत्वा सर्वे पृथक्‌ पृथक्‌ । जगृहु: कुशचीराणि चित्राणि कवचानि च,उन सबने पृथक्‌-पृथक्‌ अग्निदेवकी पूजा करके हवन किया तथा कुशके चीर और विचित्र कवच धारण कर लिये

قال سانجيا: ثم إنّ كلَّ واحدٍ منهم على حدةٍ عبد إله النار المتّقد وقدّم القرابين. فلما تمّت الشعائر، أخذوا ألبسةً من عشب الكوشا وارتدوا دروعًا ملوّنة متنوّعة.

Verse 23

ते च बद्धतनुत्राणा घृताक्ता: कुशचीरिण: । मौर्वीमेखलिनो वीरा: सहस्रशतदक्षिणा:

قال سانجيا: وبعد أن أحكموا ربط الدروع ولبسوا ألبسة الكوشا، دهنوا أجسادهم بالسمن المصفّى وشدّوا على أوساطهم أحزمةً من عشب يُدعى «مورفي». وكان أولئك الأبطال قد أقاموا من قبلُ القرابين ووزّعوا عطايا عظيمة بوصفها دكشِنا (أجور الشعائر).

Verse 24

यज्वान: पुत्रिणो लोक्या: कृतकृत्यास्तनुत्यज: । योक्ष्यमाणास्तदा55त्मानं यशसा विजयेन च

قال سانجيا: لقد أقاموا القرابين في الأزمنة الماضية؛ وكانوا رجالًا رُزقوا أبناءً ويستحقّون بلوغ العوالم ذات الفضل. وبعد أن أدّوا واجبهم، كانوا آنذاك—بقلوبٍ فرِحة—مستعدّين لبذل أجسادهم في ساحة القتال، يلتمسون أن يقترنوا بالمجد والنصر.

Verse 25

ब्रह्मचर्यश्रुतिमुखै: क्रतुभिश्नाप्तदक्षिणै: । प्राप्पॉल्लोकान्‌ सुयुद्धेन क्षिप्रमेव यियासव:

قال سنجيا: كانوا يتوقون إلى بلوغ تلك العوالم ذات الثواب سريعًا، بوسيلة القتال النبيل نفسه؛ وهي عوالم تُنال عادةً بمراتب من الانضباط مثل حفظ البراهماتشاريا، ودراسة الفيدا والعلم المقدّس، وإقامة القرابين المزوّدة بالدكشِنا الواجبة للكهنة.

Verse 26

ब्राह्मणांस्तर्पयित्वा च निष्कान्‌ दत्त्वा पृथक्‌ पृथक्‌ । गाश्न वासांसि च पुन: समाभाष्य परस्परम्‌

قال سنجيا: وبعد أن أرضَوا البراهمة على الوجه اللائق، وأعطوا كلَّ واحدٍ على حدة نِشْكَةً (حُليًّا من ذهب)، ثم وزّعوا مرةً أخرى الأبقار والكسوة، أخذوا يتشاورون فيما بينهم ويتحادثون.

Verse 27

(द्विजमुख्यै: समुदितैः कृतस्वस्त्ययनाशिष: । मुदिताश्ष प्रहृष्टाश्न॒ जल॑ संस्पृश्य निर्मलम्‌ ।।) प्रज्वाल्य कृष्णवर्त्मानमुपागम्य रणव्रतम्‌ । तस्मिन्नग्नौ तदा चक्र: प्रतिज्ञां दृढनिश्चया:

قال سنجيا: ولمّا اجتمع سادةُ ذوي الميلادين وتلوا أدعية السلامة والبركات، مسّوا—وهم فرحون مبتهجون—ماءً طاهرًا للتطهير الطقسي. ثم أوقدوا النار المقدّسة ذات المسار الدخانيّ الأسود، واقتربوا من المحارب المقيّد بنذر القتال؛ وهناك، أمام تلك النار، قطعوا عهدًا بعزمٍ راسخ.

Verse 28

ब्राह्मगोंको भोजन आदिसे तृप्त करके उन्हें अलग-अलग स्वर्णमुद्राओं

قال سنجيا: وبينما كانت الكائنات كلّها تسمع، نطقوا بأصواتٍ عالية. وجميعهم، بعزمٍ ثابت، عقدوا أيضًا نذرًا على قتل دهننجايا (أرجونا).

Verse 29

ये वै लोकाश्चाव्रतिनां ये चैव ब्रह्मघातिनाम्‌ । मद्यपस्य च ये लोका गुरुदाररतस्य च

قال سنجيا: «إن عدنا دون أن نقتل أرجونا في القتال، أو إن—وقد جُرحنا بسهامه—أعرضنا عن المعركة خوفًا، فسنسقط في تلك العوالم الآثمة نفسها التي تنتظر من لا يلتزم نذرًا، وقاتلَ براهميّ، والسكّير، ومن ينتهك حرمة زوجة معلّمه».

Verse 30

ब्रह्मस्वहारिणश्रैव राजपिण्डापहारिण: | शरणागतं च त्यजतो याचमानं तथा घ्नत:

قال سنجيا: «إن عدنا من غير أن نقتل أرجونا في ساحة القتال، أو إن عذّبتنا سهامه فارتددنا عن المعركة خوفًا، فسنقع في تلك العوالم الآثمة التي ينالها من يسرق ما نُذر للبراهمة، ومن يغتصب القوت الذي خصّه الملك، ومن يهجر من لجأ طالبًا الحماية، ومن يقتل المتضرّع السائل.»

Verse 31

अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि । अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्धिषामपि

قال سنجيا: «إن عدنا من غير أن نقتل أرجونا في القتال، أو إن جُرحنا بسهامه فارتددنا عن المعركة خوفًا، فسنبلغ تلك العوالم الآثمة نفسها التي تؤول إلى محرقي البيوت، وقاتلي البقر، ومرتكبي الأذى، بل وإلى من يبغضون البراهمة.»

Verse 32

स्वभार्यामृतुकालेषु मोहाद्‌ वै नाभिगच्छताम्‌ । श्राद्धमैथुनिकानां च ये चाप्यात्मापहारिणाम्‌

قال سنجيا: «من لا يقرب زوجته في أوانها اللائق عن ضلالٍ ووهم، ومن يجامع في يوم شعائر الشرادها (śrāddha)، ومن يسرق ذاته أو يهلكها—فهؤلاء يُعدّون من عِظام المذنبين.»

Verse 33

न्यासापहारिणां ये च श्रुतं नाशयतां च ये । क्लीबेन युध्यमानानां ये च नीचानुसारिणाम्‌

قال سنجيا: «فلتصبنا تلك العوالم الآثمة نفسها—المقدّرة لمن يختلس الوديعة (نياسا)، ولمن يطمس العلم المقدّس، ولمن يقاتل خصمًا عاجزًا، ولمن يخالط السفلة—إن عدنا من غير أن نقتل أرجونا، أو إن عذّبتنا سهامه فارتددنا عن القتال خوفًا.»

Verse 34

नास्तिकानां च ये लोका येडग्निमातृपितृत्यजाम्‌ । (सस्यमाक्रमतां ये च प्रत्यादित्यं प्रमेहताम्‌ ।) तानाप्नुयामहे लोकान्‌ ये च पापकृतामपि

قال سنجيا: «إن عدنا من غير أن نقتل أرجونا في القتال، أو إن—وقد جُرحنا بسهامه—ارتددنا عن المعركة خوفًا، فليكن نصيبنا تلك العوالم الآثمة نفسها: عوالم أهل الإلحاد والجحود، ومن يهجرون خدمة النار المقدّسة، وخدمة الأم والأب؛ وكذلك عوالم من يدوسون الزرع النامي فيتلفونه، ومن يبولون مستقبلين الشمس—إنها حقًا العوالم التي يبلغها فاعلو الشر.»

Verse 35

यद्यहत्वा वयं युद्धे निवर्तेम धनंजयम्‌ | तेन चाभ्यर्दितास्त्रासादू भवेम हि पराड्मुखा:

قال سانجايا: «إن نحن عدنا من ساحة القتال من غير أن نقتل دهننْجيا (أرجونا)، أو إن نحن أُرهِقنا بسهامه فدبّ فينا الخوف فانصرفنا عن المعركة—فإننا حقًّا سنسقط في العوالم الآثمة المخصّصة لمرتكبي الكبائر. أي إن التراجع عن الواجب خوفًا بعد الدخول في حربٍ عادلة يُعدّ انهيارًا أخلاقيًّا يُقاس بأشدّ انتهاكات النظام المقدّس والاجتماعي.»

Verse 36

यदि त्वसुकरं लोके कर्म कुर्याम संयुगे । इष्टॉल्लोकान प्राप्रुयामो वयमद्य न संशय:

قال سانجايا: «إن نحن أنجزنا اليوم في ساحة القتال فعلًا يراه الناس شبه مستحيل—أي قتل أرجونا—فإننا سنبلغ يقينًا عوالم الثواب التي نبتغيها. لا شك في ذلك.»

Verse 37

एवमुकक्‍्त्वा तदा राजंस्ते<भ्यवर्तन्त संयुगे । आह्वयन्तोडर्जुनं वीरा: पितृजुष्टां दिशं प्रति,राजन! ऐसा कहकर वे वीर संशप्तकगण उस समय अर्जुनको ललकारते हुए युद्धस्थलमें दक्षिण दिशाकी ओर जाकर खड़े हो गये

قال سانجايا: «فلما قالوا ذلك، أيها الملك، عاد أولئك الأبطال إلى قلب المعمعة. وهم ينادون أرجونا ويتحدّونه باسمه، اتخذ السَّمْشَبْتَكَة موقفهم متجهين نحو الجنوب—الجهة المكرّسة للآباء الأسلاف—عازمين على إمضاء نذرهم بالسيف والقتال.»

Verse 38

आहूतस्तैर्नरिव्याप्रै: पार्थ: परपुरंजय: । धर्मराजमिदं वाक्यमपदान्तरमब्रवीत्‌

قال سانجايا: «ولما ناداه أولئك المحاربون الشداد كالنمور وتحدّوه، قال بارثا (أرجونا)، قاهر حصون الأعداء، من غير إبطاء، هذه الكلمات لدارماراجا (يودهيشثيرا).»

Verse 39

आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम्‌ । संशप्तकाश्न मां राजन्नाह्नयन्ति महामूथे

قال سانجايا: «أيها الملك، لقد عقدت نذرًا ثابتًا: إذا دُعيتُ إلى القتال فلن أتراجع. وهؤلاء السَّمْشَبْتَكَة يدعونني الآن إلى المعركة العظمى.»

Verse 40

एष च भ्रातृभि: सार्थ सुशर्मा55ह्वयते रणे । वधाय सगणपस्यास्य मामनुज्ञातुमरहसि

قال سَنجايا: «ها هو سوشَرما، ومعه إخوته، يتحدّاني في ساحة القتال. فامنحني الإذن أن أقتل سوشَرما مع أتباعه جميعًا».

Verse 41

नैतच्छक्नोमि संसोदुमाद्दानं पुरुषर्षभ । सत्यं ते प्रतिजानामि हतान्‌ विद्धि परान्‌ युधि

قال سَنجايا: «يا ثور الرجال، لا أطيق احتمال هذا التحدّي الوقح. أتعهد لك بالحق—فاعلم أن هؤلاء الأعداء كأنهم قد قُتلوا في ساحة الحرب.»

Verse 42

युधिषछ्िर उवाच श्रुतं ते तत्त्वतस्तात यद्‌ द्रोणस्य चिकीर्षितम्‌ । यथा तदनृतं तस्य भवेत्‌ तत्‌ त्वं समाचर

قال يودهيشثيرا: «يا عزيزي، لقد سمعت على وجه الحقيقة ما ينوي درونا أن يفعله. فاعمل على نحوٍ يجعل عزمه باطلًا—حتى يُحبط ما أراد بلوغه.»

Verse 43

द्रोणो हि बलवाउछूर: कृतास्त्रश्न जितश्रम: । प्रतिज्ञातं च तेनैतद्‌ ग्रहणं मे महारथ

قال يودهيشثيرا: «أيها البطل المَهارَثا، إن المعلّم درونا قويٌّ جسورٌ متقنٌ لفنون السلاح؛ قد غلب الإعياء، وقد نذر أن يقبض عليّ ويسوقني إلى دوريوذانا.»

Verse 44

अजुन उवाच अयं वै सत्यजिद्‌ राजन्नद्य त्वां रक्षिता युधि | प्रियमाणे च पाज्चाल्ये नाचार्य: काममाप्स्यति

قال أرجونا: «أيها الملك، إن ساتياجيت، أمير بانچالا، سيحميك اليوم في ساحة القتال. ما دام البانچالي ثابتًا غالبًا، فلن ينال المعلّم درونا مُراده.»

Verse 45

हते तु पुरुषव्याप्रे रणे सत्यजिति प्रभो । सर्वैरपि समेतैर्वा न स्थातव्यं कथंचन

قال أرجونا: «يا مولاي، إن قُتِلَ ساتياجيت—أسدُ الرجال—في ساحة القتال، فحتى لو اجتمعتم كلكم معًا فلا تمكثوا في ميدان الحرب على أي حال. انسحبوا في الحال.»

Verse 46

संजय उवाच अनुज्ञातस्ततो राज्ञा परिष्वक्तश्व फाल्गुन: | प्रेम्णा दृष्टश्च॒ बहुधा ह्याशिषश्चास्य योजिता:

قال سنجيا: «أيها الملك، حين أذن له الملك، عانق فالغونا (أرجونا). وكان الملك ينظر إليه مرارًا بمحبة، ويستدعي له البركات—مُرسِلًا إيّاه بودٍّ وتمنياتٍ ميمونة وسط مقتضيات الحرب.»

Verse 47

विहायैनं ततः पार्थस्त्रिगर्तान्‌ प्रत्ययाद्‌ बली । क्षुधित: क्षुद्विघातार्थ सिंहो मृगगणानिव

قال سنجيا: «ثم إن ابن برِثا الجبار (أرجونا)، وقد تركه هناك، تقدّم لملاقاة التريغارتا—كأسدٍ جائعٍ يمضي نحو قطيعٍ من الظباء ليُسكِت جوعه.»

Verse 48

ततो दौर्योधनं सैन्यं मुदा परमया युतम्‌ | ऋतेडर्जुनं भृशं क्रुद्धं धर्मराजस्य निग्रहे

قال سنجيا: «عندئذٍ شرع جيش دوريودانا، وقد امتلأ بأقصى الفرح،—في غياب أرجونا—في السعي إلى أسر دارماراجا (يودهيشثيرا). وبغضبٍ عارمٍ حاولوا قهر الملك والقبض عليه.»

Verse 49

ततोडचन्योन्येन ते सैन्ये समाजग्मतुरोजसा । गड्भासरय्वौ वेगेन प्रावषीवोल्बणोदके

قال سنجيا: «ثم إن الجيشين، مدفوعين بسطوة القوة، اندفعا فالتقيا واصطدما أحدهما بالآخر—كنهري الغانغا والسرايو وقد انتفخا بمياه موسم الأمطار الغزيرة، يندفعان ليلتقيا في ملتقى عاصفٍ عنيف.»

Frequently Asked Questions

The chapter juxtaposes warrior exhilaration with the reality of lethal consequence, raising the tension between valor as duty and the moral disquiet of celebrating an outcome that entails widespread harm.

It demonstrates that battlefield outcomes depend not only on weapons but on perception-management: signaling can destabilize cohesion, while leadership rhetoric can temporarily restore collective purpose—though not necessarily alter strategic imbalance.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as narrative-analytic material illustrating how oath, morale, and tactical skill operate as causal forces within the wider war-book.

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