Saṃśaptakas in Candrārdha-vyūha; Arjuna’s Devadatta and the Traigarta Rout
Chapter 17
अगारदाहिनां चैव ये च गां निघ्नतामपि । अपकारिणां च ये लोका ये च ब्रह्मद्धिषामपि,“यदि हमलोग अर्जुनको युद्धमें मारे बिना लौट आवें अथवा उनके बाणोंसे पीड़ित हो भयके कारण युद्धसे पराड्मुख हो जायेँ तो हमें वे ही पापमय लोक प्राप्त हों, जो व्रतका पालन न करनेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्य पीनेवाले, गुरुस्त्रीगामी, ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेवाले, राजाकी दी हुई जीविकाको छीन लेनेवाले, शरणागतको त्याग देनेवाले, याचकको मारनेवाले, घरमें आग लगानेवाले, गोवध करनेवाले, दूसरोंकी बुराईमें लगे रहनेवाले, ब्राह्मणोंसे द्वेष रखनेवाले, ऋतुकालमें भी मोहवश अपनी पत्नीके साथ समागम न करनेवाले, श्राद्धके दिन मैथुन करनेवाले, अपनी जाति छिपानेवाले, धरोहरको हड़प लेनेवाले, अपनी प्रतिज्ञा तोड़नेवाले, नपुंसकके साथ युद्ध करनेवाले, नीच पुरुषोंका संग करनेवाले, ईश्वर और परलोकपर विश्वास न करनेवाले, अग्नि, माता और पिताकी सेवाका परित्याग करनेवाले, खेतीको पैरोंसे कुचलकर नष्ट कर देनेवाले, सूर्यकी ओर मुँह करके मूत्र॒त्याग करनेवाले तथा पापपरायण पुरुषोंको प्राप्त होते हैं
agāradāhināṁ caiva ye ca gāṁ nighnatām api | apakāriṇāṁ ca ye lokā ye ca brahmadviṣām api ||
قال سنجيا: «إن عدنا من غير أن نقتل أرجونا في القتال، أو إن جُرحنا بسهامه فارتددنا عن المعركة خوفًا، فسنبلغ تلك العوالم الآثمة نفسها التي تؤول إلى محرقي البيوت، وقاتلي البقر، ومرتكبي الأذى، بل وإلى من يبغضون البراهمة.»
संजय उवाच
Retreating from a righteous battle out of fear—especially without accomplishing the stated martial objective—is portrayed as a grave moral failure, likened to notorious sins (arson, cow-slaughter, harming others, hostility to Brahmins) that lead to degraded post-mortem realms.
Sañjaya reports a severe warning voiced within the Kaurava camp: if they fail to kill Arjuna and instead withdraw, broken by his arrows and fear, they believe they will incur the same dreadful fate as major sinners.