
Ghaṭotkaca Slays Alāyudha (Night Battle and Māyā Countermeasures) / घटोत्कचेन अलायुधवधः
Upa-parva: Ghaṭotkaca–Alāyudha Yuddha Episode (Night Engagement) within Droṇa Parva
Sañjaya reports that Krishna, observing Bhīma seized and endangered by a nearby rākṣasa, instructs Ghaṭotkaca to suspend his pursuit of Karṇa and immediately eliminate Alāyudha, promising that Karṇa can be addressed afterward. Complying, Ghaṭotkaca engages Alāyudha (identified with Baka’s kin), while other fronts continue: Arjuna disperses hostile kṣatriya forces with arrows, and Karṇa pressures Pāñcāla leaders as Bhīma moves toward him. The rākṣasa duel intensifies when Alāyudha strikes Ghaṭotkaca with a massive iron club, briefly stunning him; Ghaṭotkaca retaliates by hurling a gold-adorned mace that destroys Alāyudha’s chariot, horses, and charioteer. Alāyudha adopts rākṣasa māyā, generating blood-rain, lightning, darkness, and thunderous impacts; Ghaṭotkaca counters by neutralizing the illusion and withstands a storm of stones with a dense arrow-shower. The fight expands into reciprocal barrages using weapons, iron clubs, blades, and uprooted trees and rock masses, likened to the ancient Vāli–Sugrīva contest in ferocity. After close-quarters grappling, Ghaṭotkaca overpowers Alāyudha and severs his head, then roars and triggers celebration among Pāṇḍava and Pāñcāla forces with drums and conches. He throws Alāyudha’s head before Duryodhana, who becomes visibly alarmed, recalling Alāyudha’s vow to kill Bhīmasena; Dhṛtarāṣṭra’s side recognizes Bhīma’s vow as effectively fulfilled through his son’s act.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, जयद्रथ और भूरिश्रवा के वध का समाचार सुनकर संजय से पूछते हैं—उस घड़ी कौरव-सेना और दुर्योधन के मन में कैसी उथल-पुथल उठी? → संजय बताता है कि जयद्रथ-वध ने कौरव-सैन्य का धैर्य तोड़ दिया; साथ ही विदुर के पूर्व उपदेश और दुर्योधन द्वारा किए गए अपमान का स्मरण होकर ‘वैशसं’ (भयानक अनर्थ) का बोध गहराता है। दुर्योधन अपने पक्ष के बचे हुए स्तंभों—विशेषतः कृप—की ओर आशा से देखता है, पर भीष्म-पतन और दुःशासन के दुष्कर कर्मों की स्मृति उसे और दहला देती है। → द्रोण का कठोर, ब्राह्मण-धर्म और क्षत्रिय-तेज से दीप्त वचन-प्रवाह—जहाँ वह मर्यादा, ब्राह्मण-पूजा और नीति की बात कहकर भी युद्ध के लिए प्रस्थान करता है—और फिर ‘सूर्य की भाँति नक्षत्रों का तेज हरते हुए’ पाण्डव-सेना पर टूट पड़ता है। → अध्याय का अंत द्रोण के प्रस्थान और उसके द्वारा पाण्डवों के क्षात्र-तेज को दबाने वाले आक्रमण के वर्णन पर टिकता है—कौरव पक्ष को क्षणिक संबल मिलता है कि सेनापति अभी भी रण में प्रचंड है। → द्रोण के इस घोर प्रहार के सामने पाण्डव-सेना कैसे टिकेगी, और कौन-सा नया संहार-चक्र खुलेगा?
Verse 1
/ भीकम (2 अमान एकपज्चाशर्दाधकशततमो< ध्याय: द्रोणाचार्यका दुर्योधनको उत्तर और युद्धके लिये प्रस्थान धृतराष्ट उवाच सिन्धुराजे हते तात समरे सव्यसाचिना । तथैव भूरिश्रवसि किमासीद् वो मनस्तदा
قال دِهْرِتَرَاشْتْرَ: «يا بُنَيّ، حين قُتِلَ ملكُ السِّندهو، جَيَدْرَثَ، في ساحة القتال على يدِ سَفْيَسَاتْشِي أَرْجُونَ، وكذلك حين سقطَ بُهُورِي شْرَفَسَ، كيف كانت حالُ قلوبِكم في ذلك الوقت؟»
Verse 2
धृतराष्ट्रने कहा--तात! समरांगणमें सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सिंधुराज जयद्रथके तथा सात्यविद्दारा भूरिश्रवाके मारे जानेपर उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ।।
قال دِهْرِتَرَاشْتْرَ: «وحين خاطبَ دُرْيُوذَنَ دْرُونَ في مجلسِ الكُرُو على ذلك النحو، فبماذا أجابه دْرُونَ بعد ذلك؟ أخبرني يا سَنْجَيَ.»
Verse 3
संजय उवाच निष्टानको महानासीत् सैन्यानां तव भारत । सैन्धवं निहतं दृष्टवा भूरिश्रवसमेव च,संजयने कहा--भारत! सिंधुराज जयद्रथ तथा भूरिश्रवाको मारा गया देखकर आपकी सेनाओंमें महान् आर्तनाद होने लगा
قال سَنْجَيَ: «يا بَهَارَتَ (دِهْرِتَرَاشْتْرَ)، لما رأت جموعُك جَيَدْرَثَ ملكَ السِّندهو صريعًا، وبُهُورِي شْرَفَسَ كذلك، ارتفع في جيشك عويلٌ عظيمٌ من الكمد.»
Verse 4
मन्त्रितं तव पुत्रस्य ते सर्वमवमेनिरे । येन मन्त्रेण निहता: शतश: क्षत्रियर्षभा:,वे सब लोग आपके पुत्र दुर्योधनकी उस सारी मन्त्रणाका अनादर करने लगे, जिससे सैकड़ों क्षत्रिय-शिरोमणि कालके गालमें चले गये
قال سَنْجَيَ: «فأخذوا جميعًا يزدرون مشورةَ ابنِك كلَّها، لأن بتلك الحيلةِ عينِها قُتِلَ مئاتٌ من أبطالِ الكْشَتْرِيَة، أشدّاءَ كالثيران.»
Verse 5
द्रोणस्तु तद् वच: श्रुत्वा पुत्रस्य तव दुर्मना: । मुहूर्तमिव तद् ध्यात्वा भृशमार्तोडभ्यभाषत
قال سَنْجَيَ: «فلما سمع دْرُونَ كلامَ ابنِك ثَقُلَ قلبُه. ثم لبث هنيهةً يتفكّر، وبعدها—وهو شديدُ الكرب—نطقَ بالجواب.»
Verse 6
आपके पुत्रका पूर्वोक्त वचन सुनकर द्रोणाचार्य मन-ही-मन दुःखी हो उठे। उन्होंने दो घड़ीतक कुछ सोच-विचारकर अत्यन्त आर्तभावसे इस प्रकार कहा ।।
قال سانجيا: لما سمع درونا الكلمات التي قالها ابنك من قبل، اعتراه حزنٌ عميق في باطنه. وبعد أن تفكّر هنيهة، تكلّم بوجعٍ شديد. قال درونا: «يا دوريودhana، لِمَ تجرحني هكذا بسهامٍ مصنوعةٍ من الكلام؟ لقد كنتُ على الدوام أؤكد أن أرجونا—الرامي الذي يُحسن الرمي بكلتا يديه—لا يُقهَر في ساحة القتال».
Verse 7
एतेनैवार्जुनं ज्ञातुमलं कौरव संयुगे । यच्छिखण्ड्यवधीदू भीष्मं पाल्यमान: किरीटिना
قال سانجيا: «هذا وحده كان كافيًا ليُدرك أرجونا، يا منحدرَ كورو، في القتال مع الكاورافا: أن شيخَنْدي لم يستطع إسقاط بهيشما في ساحة المعركة إلا وهو في حماية أرجونا ذي التاج. فالحادثة نفسها تُظهر مدى حسم حراسة أرجونا وضبطه الاستراتيجي في إسقاط الجدّ الأكبر.»
Verse 8
अवध्यं निहतं दृष्टवा संयुगे देवदानवै: । तदैवाज्ञासिषमहं नेयमस्तीति भारती
قال سانجيا: لما رأيتُ في القتال أن من كان يُعدّ غير قابلٍ للقتل حتى عند الآلهة والدانافا قد قُتل، أدركتُ في تلك اللحظة أن جيش الكاورافا هذا لن يصمد—فقد صار سقوطه حتميًا.
Verse 9
य॑ पुंसां त्रिषु लोकेषु सर्वशूरममंस्महि । तस्मिन् निपतिते शूरे कि शेषं पर्युपास्महे
قال سانجيا: «ذاك الذي حسبناه أشجع الرجال في العوالم الثلاثة—إذا كان ذلك المحارب الجبار قد سقط، فأيُّ اعتمادٍ يبقى لنا على أحدٍ ممن بقي؟»
Verse 10
यान् सम तान् ग्लहते तात शकुनि: कुरुसंसदि । अक्षान् न ते$क्षा निशिता बाणास्ते शत्रुतापना:
قال سانجيا: في زمن لعبة النرد، كان فيدورا قد حذّرك قائلاً: «يا بُنيّ! في مجلس الكورو، لا تظنّ أن النرد الذي يرميه شكوني نردٌ فحسب؛ فقد يصير يومًا سهامًا حادّة تُذيق الأعداء لهيب العذاب.»
Verse 11
त एते घ्नन्ति नस्तात विशिखा: पार्थचोदिता: । तांस्तदा55ख्यायमानस्त्वं विदुरेण न बुद्धवान्
قال سانجيا: «يا أبتِ الحبيب، إن هذه السهام—التي يدفعها بارثا (أرجونا)—تصرع رجالنا. ومع أن فيدورا كان يبيّنها لك بوضوح في ذلك الحين، فإنك لم تفهم.»
Verse 12
परंतु वत्स! उस समय विदुरजीकी कही हुई बातोंको तुमने कुछ नहीं समझा। तात! वे ही पासे ये अर्जुनके चलाये हुए बाण बनकर हमें मार रहे हैं ।।
قال سانجيا: «ولكن يا بُنيّ، في ذلك الحين لم تفهم شيئًا مما قاله فيدورا. يا سيدي—تلك النرود نفسها صارت اليوم تضربنا، وقد تحولت إلى سهام أطلقها أرجونا. يا دوريودhana، إن فيدورا ثابتٌ عظيمُ النفس. الكلمات المباركة التي قالها لخيرك—وقد تجاهلتها في سُكر الظفر—قد عادت عليك؛ وبازدرائك لتلك المشورة جلبتَ على نفسك هذا الدمار الرهيب الواسع.»
Verse 13
तदिदं वर्तते घोरमागतं वैशसं महत् । तस्यावमानाद्ू वाक्यस्य दुर्योधन कृते तव
قال سانجيا: «لقد وقع عليك الآن هذا البلاء الرهيب—هذا الدمار العظيم الوحشي—يا دوريودhana، لأنك ازدرَيتَ تلك المشورة يومًا. وبإهمالك الكلمات النافعة التي قيلت لخيرك، في سُكر النصر الذي توهّمتَه، جلبتَ على نفسك هذا القتل الفظيع.»
Verse 14
यो5वमन्य वच: पथ्यं सुहृदामाप्तकारिणाम् | स्वमतं कुरुते मूढ: स शोच्यो नचिरादिव
قال سانجيا: إن الأحمق الذي يزدرِي المشورة النافعة من الأصدقاء المحسنين والموثوقين الذين يعملون للخير، ثم يتبع هواه، لا يلبث أن يصير موضعًا للرثاء.
Verse 15
यच्च न: प्रेक्षमाणानां कृष्णामानाय्य तत्सभाम् | अनर्हन्तीं कुले जातां सर्वधर्मानुचारिणीम्
قال سانجيا: «وفوق ذلك، أمام أعيننا نحن، أمرتَ بإحضار كṛṣṇā (دراوبدي) إلى تلك القاعة—وهي التي لا تستحق مثل هذا الصنيع، مولودة في سلالة نبيلة وثابتة على اتباع جميع واجبات الدارما. يا ابن غاندھاري، إن ثمرة ذلك الفعل الآثم—إذلالك لدراوبدي—قد نضجت إلى هذه العاقبة العظمى: هلاك جندك. ولو لم يُستوفَ جزاؤه هنا، لاضطررتَ إلى احتمال عقاب أشدّ على تلك الخطيئة في العالم الآخر.»
Verse 16
तस्याधर्मस्य गान्धारे फल प्राप्तमिदं महत् । नो चेत् पापं परे लोके त्वमर्च्छेथास्ततो5घिकम्
يا ابنَ غاندھاري، لقد أينعت الآن العاقبة العظيمة لذلك الفعل المناقض للدارما الذي اقترفتَه. ولو لم يُؤتِ ذلك الإثمُ ثمرته هنا، لكان عليك أن تذوق في العالم الآخر عقابًا أشدَّ منه.
Verse 17
यच्च तान् पाण्डवान् द्यूते विषमेण विजित्य ह । प्राव्राजयस्तदारण्ये रौरवाजिनवासस:
قال سنجيا: «وفوق ذلك، إنك غلبتَ الباندافا في لعبة النرد بوسائل جائرة، ثم دفعتَهم إلى المنفى في الغابة، وألبستَهم ثيابًا من جلد الأيل. وإن عبءَ ذلك الفعل المناقض للدارما هو أيضًا قد نضج الآن عاقبةً عليك.»
Verse 18
पुत्राणामिव चैतेषां धर्ममाचरतां सदा । द्रहोत् को नु नरो लोके मदन्यो ब्राह्मणब्रुव:
قال سنجيا: «إن الباندافا عندي كأبنائي، وهم دائمًا يسلكون سبيل الدارما. ففي هذا العالم، من—غيري—يبلغ به الخسّة أن يُدعى برهمنًا ثم يغدر بهم؟»
Verse 19
पाण्डवानामयं कोपस्त्वया शकुनिना सह | आह्तो धृतराष्ट्रस्य सम्मते कुरुसंसदि,तुमने राजा धृतराष्ट्रकी सम्मतिसे कौरवोंकी सभामें शकुनिके साथ बैठकर पाण्डवोंका यह क्रोध मोल लिया है
قال سنجيا: «إن هذا الغضبَ الذي في صدور الباندافا قد جلبتَه على نفسك—مع شكوني—حين جلستَ في مجلس الكورو بموافقة دريتاراشترا، واخترتَ السبيل الذي أثارهم. وهكذا، إذ رضيتَ بتلك المشورة وبذلك الجور في البلاط، فقد اشتريتَ عداوةً تنضج الآن حربًا.»
Verse 20
दुःशासनेन संयुक्त: कर्णेन परिवर्धित: । क्षत्तर्वाक्यमनादृत्य त्वयाभ्यस्त: पुनः पुन:
قال سنجيا: «في هذا الأمر كان دوحشاسانا شريكك، وكان كارنا يزيده اشتعالًا. وقد تجاهلتَ مرارًا نصحَ فيدورا (الكشتر/الوزير)، وكنتَ مرةً بعد مرة تمنح الفرصة لغضب الباندافا أن ينمو. لذلك فالغضب الذي يؤتي ثماره اليوم حربًا لم يكن وليد لحظة—بل غذّته اختياراتك أنت.»
Verse 21
यत्ता: सर्वे पराभूता: पर्यवारयतार्डर्जुनम् । सिन्धुराजानमश्रित्य स वो मध्ये कथं हतः
قال سانجيا: «مع أنكم كنتم جميعًا في غاية التيقّظ وقد أحطتم بأرجونا من كل جانب، فكيف انتهيتم مع ذلك إلى الهزيمة؟ ثم إذ احتمى بملك السِّند، كيف قُتل في وسطكم؟»
Verse 22
कथं त्वयि च कर्णे च कृपे शल्ये च जीवति । अश्वत्थाम्नि च कौरव्य निधनं सैन्धवो5गमत्
قال سانجيا: «كيف لقي ملك السِّند حتفه، يا مُبهِج آل كورو، وأنتم أنت وكَرْنَة ما زلتما أحياء، وكِرِبا وشَلْيَة أحياء، وأشْوَتْثامَن كذلك حيّ؟ ومع حضور مثل هؤلاء الأبطال، لِمَ سقط جَيَدْرَثَة؟»
Verse 23
युध्यन्त: सर्वराजानस्तेजस्तिग्ममुपासते । सिन्धुराजं परित्रातुं स वो मध्ये कथं हत:
قال سانجيا: «إن جميع الملوك، وهم يقاتلون بضراوة، قد احتموا ببأسٍ حادٍّ متّقدٍ ليحموا ملك السِّند. فكيف إذن قُتل في وسطكم؟»
Verse 24
मय्येव हि विशेषेण तथा दुर्योधन त्वयि । आशंसत परित्राणमर्जुनातू स महीपति:
قال سانجيا: «إن ذلك الملك (دوريودهانا) كان يرجو النجاة على وجه الخصوص مني—وكذلك منك، يا دوريودهانا—آملاً أن يُنقَذ من أرجونا.»
Verse 25
दुर्योधन! राजा जयद्रथ विशेषतः मुझपर और तुमपर ही अर्जुनसे अपनी जीवन- रक्षाका भरोसा किये बैठा था ।।
قال سانجيا: «يا دوريودهانا، إن الملك جَيَدْرَثَة قد وضع ثقته لحماية حياته ذاتها—وخاصةً فيّ وفيك—ضد أرجونا. ولكن إذ لم تُنال له الحماية من فالغونا (أرجونا)، فإني الآن لا أرى ملجأً البتة، حتى لبقائي أنا.»
Verse 26
मज्जन्तमिव चात्मानं धृष्टद्युम्नस्य किल्बिषे | पश्याम्यहत्वा पज्चालान् सह तेन शिखण्डिना
قال سانجيا: «أرى نفسي كأنني أغرق في العزم الآثم لِدْهْرِشْتَديومْنا—لأنني لم أقتل البانچالا، معه ومع شيخانْدين».
Verse 27
तन्मां किमभितप्यन्तं वाकृशरैरेव कृन्तसि । अशक्त: सिन्धुराजस्य भूत्वा त्राणाय भारत
قال سانجيا: «لِمَ تطعنني بسهام الكلام وأنا محترقٌ بالحزن من قبل؟ يا بهاراتا، وقد عجزتَ عن حماية ملك السِّندهو، فلماذا تمزّقني الآن بكلماتٍ قاسية؟»
Verse 28
सौवर्ण सत्यसंधस्य ध्वजमक्लिष्टकर्मण: । अपश्यन् युधि भीष्मस्य कथमाशंससे जयम्
قال سانجيا: «إذا كنتَ لا ترى بعدُ في ساحة القتال الراية الذهبية لِبهيشما—الثابت على الصدق، الذي لا يكلّ في الفعل—فكيف لا تزال ترجُو النصرَ بهذه السهولة؟»
Verse 29
मध्ये महारथानां च यत्राहन्यत सैन्धव: । हतो भूरिश्रवाश्वैव कि शेषं तत्र मन्यसे,जहाँ बड़े-बड़े महारथियोंके बीच सिंधुराज जयद्रथ और भूरिश्रवा मारे गये, वहाँ तुम किसके बचनेकी आशा करते हो?
قال سانجيا: «في قلب صفوف المَهارَثيين—حيث قُتل السَّيْندهافا (جايادراثا)، وقُتل بهوريشرافا أيضًا—فمَن تظنّه سيبقى هناك؟»
Verse 30
कृप एव च दुर्धर्षो यदि जीवति पार्थिव । यो नागात् सिन्धुराजस्य वर्त्म तं पूजयाम्यहम्
قال سانجيا: «أيها الملك، إن كان كِرْپا الذي لا يُقهر ما يزال حيًّا—إن لم يسلك الطريق الذي سلكه ملك السِّندهو—فإني أُجِلّه. أُثني على بأسه وحُسن طالعِه، يا سيّد الأرض.»
Verse 31
यत्रापश्यं हतं भीष्म॑ पश्यतस्ते5नुजस्य वै । दुःशासनस्य कौरव्य कुर्वाणं कर्म दुष्करम्
قال سانجيا: «يا كاورافيا، حين رأيتُ بهيشما صريعًا—وأخوك الأصغر دوشّاسانا ينظر بعينيه—بهيشما صانع الأعمال العسيرة، الذي ما كان لآلهة السماء جميعًا مع إندرا أن يقتلوه في ساحة الحرب؛ منذ تلك اللحظة وأنا أفكّر: إن هذه الأرض لن تبقى بعد اليوم تحت سلطانك.»
Verse 32
अवध्यकल्पं संग्रामे देवेरपि सवासवै: । न ते वसुन्धरास्तीति तदाहं चिन्तये नूप
قال سانجيا: «أيها الملك، يا بهجة الكورو، يا سيّد الرجال—منذ أن رأيتُ بهيشما، صانع الأفعال المروّعة، صريعًا في المعركة أمام عيني أخيك الأصغر دوشّاسانا—بهيشما الذي كان حتى الآلهة، وإندرا فيهم، ليعسر عليهم قتله في الحرب—وأنا أفكّر في هذا: إن الأرض، أي سلطانك عليها، لن تبقى بعد اليوم في قبضتك.»
Verse 33
इमानि पाण्डवानां च सृज्जयानां च भारत । अनीकान्याद्रवन्ते मां सहितान्यद्य भारत,भारत! वह देखो, पाण्डवों और सूंजयोंकी सेनाएँ एक साथ मिलकर इस समय मुझपर चढ़ी आ रही हैं
قال سانجيا: «يا بهاراتا، انظر—إن تشكيلات القتال للپاندافا والسِرِنْجَيَة، وقد اتحدت اليوم، تندفع نحوي اندفاعًا مباشرًا.»
Verse 34
नाहत्वा सर्वपञ्चालान् कवचस्य विमोक्षणम् | कर्तास्मि समरे कर्म धार्तराष्ट्र हितं तव
قال سانجيا: «يا دوريوذانا، لن أخلع درعي حتى أقتل جميع البانچالا. وفي ساحة القتال لن آتي إلا بما فيه منفعتك، نصرةً لآل دِهرتراشترا.»
Verse 35
राजन ब्रूया: सुतं मे त्वमश्व॒त्थामानमाहवे । न सोमकाः: प्रमोक्तव्या जीवितं परिरक्षता
قال سانجيا: «أيها الملك، اذهب وبلّغ ابني أشوَتّھاما في ساحة القتال: ‘حتى وأنت تصون حياتك، لا تدع أحدًا من السومَكَة يفلت حيًّا.’»
Verse 36
यच्च पित्रानुशिष्टोडसि तद् वच: परिपालय । आनृशंस्ये दमे सत्ये चार्जवे च स्थिरो भव,यह भी कहना कि पिताने जो तुम्हें उपदेश दिया है, उसका पालन करो। दया, दम, सत्य और सरलता आदि सदगुणोंमें स्थिर रहो
وأيُّ وصيّةٍ تلقيتَها من أبيك—فاحفظ تلك الكلمة وعِشْ بها. واثبتْ على الرحمة وترك القسوة، وعلى كبح النفس، وعلى الصدق، وعلى الاستقامة الواضحة النزيهة.
Verse 37
धर्मार्थकामकुशलो धर्मार्थावप्यपीडयन् । धर्मप्रधानकार्याणि कुर्यश्विति पुनः पुन:
قال سنجيا: «إنك حاذقٌ في مسالك الدَّرما والأرثا والكاما. فلهذا، من غير أن تُلحق أذًى بالدَّرما ولا بالأرثا، أقدِم مرارًا وتكرارًا على الأعمال التي تكون الدَّرما فيها هي المقدَّمة.»
Verse 38
चक्षुर्मनो भ्यां संतोष्या विप्रा: पूज्याश्न॒ शक्तित: । नचैषां विप्रियं कार्य ते हि वल्लेशिखोपमा:
قال سنجيا: «بعينٍ خاشعةٍ وقلبٍ مؤمن، أرضِ البراهمة وكرّمهم قدر استطاعتك. ولا تفعل ما يسوؤهم؛ فإنهم متلألئون مهيبون—كألسنة النار ذاتها.»
Verse 39
एष त्वहमनीकानि प्रविशाम्यरिसूदन । रणाय महते राजंस्त्वया वाकुशरपीडित:,राजन! शत्रुसूदन! अब मैं तुम्हारे वाग्बाणोंसे पीड़ित हो महान् युद्धके लिये शत्रुओंकी सेनामें प्रवेश करता हूँ
قال سنجيا: «يا أيها الملك، يا قاهر الأعداء! لقد اخترقتني سهامُ كلامك الحادّة وأوجعتني، وها أنا الآن أدخل صفوف العدوّ واستعدادًا للقتال العظيم.»
Verse 40
त्वं च दुर्योधन बल॑ यदि शक्तोडसि पालय । रात्रावपि च योत्स्यन्ते संरब्धा: कुरुसृञज्जया:
قال سنجيا: «وأنت أيضًا يا دوريودhana—إن كانت لك قدرة—فاحمِ الجيش. فإن الكورو والسِرِنْجَيا، وقد اشتعلوا غضبًا، سيقاتلون حتى في الليل.»
Verse 41
एवमुक्त्वा ततः प्रायाद् द्रोण: पाण्डवसृज्जयान् | मुष्णन् क्षत्रियतेजांसि नक्षत्राणामिवांशुमान्
قال سانجيا: لما قال ذلك، انطلق درونا لملاقاة الباندافا والسِرِنْجَيَة. وكما تطغى الشمس على ضياء النجوم، كذلك بدا، ببأسه المتقد، كأنه ينتزع عن الكشاتريا بهاءهم الحربي وهو يتقدم إلى ساحة القتال.
Verse 150
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका अनुतापविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ
وهكذا، في «المهابهاراتا» الجليلة، ضمن «دروṇa پرفا»—وخاصة في قسم «قتل جَيدَرَثا»—يُختَتم الفصل المئة والخمسون، المتعلق بندم دُريودhana.
Verse 151
इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि द्रोणवाक्ये एकपज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهاراتا» الموقرة، ضمن «دروṇa پرفا»—في القسم المتعلق بقتل جَيدَرَثا—يُختَتم الفصل المئة والحادي والخمسون، المعروف باسم «خطاب درونا».
The dilemma is whether to pursue a high-status adversary (Karṇa) or to address an immediate life-threatening situation (Bhīma seized by Alāyudha). Krishna’s instruction frames the ethical choice as a duty of protection and proportional response under time constraint.
The chapter models dharma as context-sensitive: right action may require reprioritizing goals, resisting distraction by prestige, and using appropriate means to neutralize imminent harm—especially when collective welfare and ally-protection are at stake.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-significance is conveyed narratively through consequences—public validation of vows, morale shifts marked by instruments and acclamation, and strategic psychological impact on opposing leadership.
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