Adhyaya 63
Bhishma ParvaAdhyaya 63152 Versesदिवस के मध्य-उत्तरार्ध में भीष्म के आतंक से पाण्डव-पक्ष में विचलन/भगदड़, पर अर्जुन के प्रत्याक्रमण से संतुलन और दिनांत पर पाण्डव-शिविर में संगठित वापसी।

Adhyaya 63

Vāsudeva-Māhātmya: Duryodhana’s Inquiry and Bhīṣma’s Theological Account of Keśava

Upa-parva: Vāsudeva-Māhātmya (Praise of Vāsudeva) — Bhīṣma’s discourse to Duryodhana

The chapter opens with Duryodhana questioning Bhīṣma about Vāsudeva’s celebrated status, requesting clarification of his origin (āgama) and foundation (pratiṣṭhā). Bhīṣma answers by presenting Vāsudeva/Govinda as unsurpassed (beyond Puṇḍarīkākṣa none is seen), citing the tradition associated with Mārkaṇḍeya. The discourse then outlines a cosmogonic sequence: the supreme being arranges the elements (waters, wind, fire/tejas), creates earth and rests upon the waters in yogic absorption, and emits sacrificial-cosmological constituents (fire, wind), as well as Sarasvatī and the Vedas from mind. He is described as origin of worlds, gods, sages, and also of mortality as a cosmic condition. The chapter assigns him attributes of dharma, boons, and self-luminosity, and credits him with ordering time (past/present/future), directions, space, and rules. It narrates the slaying of the asura Madhu, grounding epithets such as Madhusūdana, and associates him with avatāra motifs (Varāha, Siṃha, Trivikrama). A sociological cosmogony follows with the emergence of the four varṇas. The closing verses function as practical instruction and phalaśruti: service to Keśava, recitation, and taking refuge in fear bring welfare; those who surrender do not fall into confusion, and Yudhiṣṭhira is cited as having embraced Krishna as Jagadīśvara and lord of yogas.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, अपने पुत्रों के भय और आशा के बीच झूलते हुए, संजय से पूछते हैं—उस भयंकर संग्राम में पितामह भीष्म ने पाण्डवों के विरुद्ध क्या किया। → संजय बताता है कि दिन का पूर्वाह्न बीतते-बीतते सूर्य पश्चिमाभिमुख होने लगा, पर रणभूमि की ज्वाला शांत न हुई। चारों ओर ‘ठहरो—मैं ठहरा हूँ’, ‘बींध डालो’, ‘लौटो’ जैसे युद्ध-घोष गूँजते हैं; रथों के यंत्र कटते हैं, ध्वज गिरते हैं, हाथी-बाणों से तपते हैं, और धनंजय के बाण-प्रहार से शत्रु-सेना की पंक्तियाँ टूटती-बिखरती हैं। → भीष्म, काल के समान मुख बाए खड़े दिखाई देते हैं; उन्हें देखकर युधिष्ठिर की ओर के अनेक राजा सिंह से भयभीत मृगों की भाँति भागने लगते हैं। इसी उग्र क्षण में भीष्म का गर्जन-सा संकल्प उभरता है—जो भी मुझे युद्ध में ललकारेगा, मैं द्रोण आदि सहित धार्तराष्ट्र-सेना के उन सबको ‘सानुबन्ध’ (समर्थकों सहित) नष्ट कर दूँगा। → दिन ढलते-ढलते भीषण संहार के बाद, धनंजय शत्रुओं को दबाकर, यश-कीर्ति प्राप्त कर, भाइयों और राजाओं के साथ रात्रि में शिविर लौटते हैं; रण का कोलाहल थमता है, पर भय और प्रतिज्ञाएँ शेष रहती हैं। → अर्जुन भीष्म के गौरव के कारण रण में ‘कर्तव्य’ को लेकर डगमगाता-सा दिखता है—यह संकेत देता है कि भीष्म-वध का प्रश्न अगले प्रसंगों में और तीखा होकर लौटेगा।

Shlokas

Verse 1

/ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका हई “लोक मिलाकर कुछ ४६ ३ “लोक हैं] नसजआा न (0) आज अन+- एकोनषशष्टितमो< ध्याय: भीष्मका पराक्रम, श्रीकृष्णका भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना, अर्जुनकी प्रतिज्ञा और उनके द्वारा कौरव- सेनाकी पराजय, तृतीय दिवसके युद्धकी समाप्ति ध्ृतराष्र उवाच प्रतिज्ञाते ततस्तस्मिन्‌ युद्धे भीष्मेण दारुणे । क्रोधितो मम पुत्रेण दु:खितेन विशेषत:,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! उस भयंकर युद्धमें जब भीष्मने मेरे विशेष दुःखी हुए पुत्रके क्रोध दिलानेपर प्रतिज्ञा कर ली, तब उन्होंने उस युद्धस्थलमें पाण्डवोंके प्रति क्या किया? तथा पांचाल योद्धाओंने पितामह भीष्मके प्रति क्या किया? इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तीसरे दिन येनाके विश्रामके लिये लौटनेसे सम्बन्ध रखनेवाला उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५९ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ “लोक मिलाकर कुल १४० ६ “लोक हैं।] भी्न्म+ज (2) अमसना - सेई जन्तु, जिसके बदनमें काँटे होते हैं । षष्टितमो< ध्याय: चौथे दिन--दोनों सेनाओंका व्यूह-निर्माण तथा भीष्म और अर्जुनका द्वैरथ-युद्ध संजय उवाच व्युष्टां निशां भारत भारताना- मनीकिनीनां प्रमुखे महात्मा । ययौ सपत्नान्‌ प्रति जातकोपो वृतः समग्रेण बलेन भीष्म:

قال دِهْرِتَراشْتْرَا: «يا سانجيا، في تلك المعركة الرهيبة، حين نذر بهيشما نذره—وقد أُثير غضبه بسبب ابني الذي كان أشدَّ الناس كمدًا—فماذا صنع بهيشما في ساحة القتال تجاه أبناء باندو؟»

Verse 2

भीष्म: किमकरोत्‌ तत्र पाण्डवेयेषु संयुगे । पितामहे वा पञ्चालास्तन्ममाचक्ष्व संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! उस भयंकर युद्धमें जब भीष्मने मेरे विशेष दुःखी हुए पुत्रके क्रोध दिलानेपर प्रतिज्ञा कर ली, तब उन्होंने उस युद्धस्थलमें पाण्डवोंके प्रति क्या किया? तथा पांचाल योद्धाओंने पितामह भीष्मके प्रति क्या किया?

قال دِهْرِتَراشْتْرَا: «يا سانجيا، أخبرني: في تلك المعركة، ماذا فعل بهيشما هناك ضد أبناء باندو؟ وماذا فعل البانشالا ضد الجدّ بهيشما؟»

Verse 3

संजय उवाच गतपूर्वाह्नभूयिष्ठे तस्मिन्नहनि भारत । पश्चिमां दिशमास्थाय स्थिते चापि दिवाकरे,संजयने कहा--भारत! उस दिन जब पूर्वह्नकालका अधिक भाग व्यतीत हो गया, सूर्यदेव पश्चिम दिशामें जाकर स्थित हुए और विजयको प्राप्त हुए महामना पाण्डव खुशी मनाने लगे, उस समय सब धर्मोके विशेषज्ञ आपके ताऊ भीष्मजीने वेगशाली अअश्रोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया। उनके साथ विशाल सेना चली और आपके पुत्र सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे

قال سنجيا: يا بهاراتا، في ذلك اليوم، حين مضى معظمُ وقتِ الضحى، ومالت الشمسُ نحوَ جهةِ الغرب واستقرّت هناك، انتقل زخمُ القتال إلى مرحلته المتأخرة. وفي تلك الساعة—حين كان يمكن أن ينهض في معسكر الباندافا شعورُ الظفر والابتهاج—اندفع بهيشما، جدُّك الأكبر، العارفُ بالدارما، يضغط الهجومَ بمقذوفاتٍ سريعة، بينما احتشد أبناؤك من كل جانبٍ ليحموه. ويُبرز هذا المشهد كيف تتقلب الثقةُ واليأسُ مع مرور الزمن في الحرب، غير أن القادة المقيّدين بالواجب يمضون في أدوارهم المقرّرة مهما تبدّلت الحظوظ.

Verse 4

जयं प्राप्तेषु हृष्टेु पाण्डवेषु महात्मसु । सर्वधर्मविशेषज्ञ: पिता देवव्रतस्तव,संजयने कहा--भारत! उस दिन जब पूर्वह्नकालका अधिक भाग व्यतीत हो गया, सूर्यदेव पश्चिम दिशामें जाकर स्थित हुए और विजयको प्राप्त हुए महामना पाण्डव खुशी मनाने लगे, उस समय सब धर्मोके विशेषज्ञ आपके ताऊ भीष्मजीने वेगशाली अअश्रोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया। उनके साथ विशाल सेना चली और आपके पुत्र सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे

قال سنجيا: لما نال الباندافا ذوو الهمم العُليا الظفرَ وأخذوا يفرحون، تقدّم دِيفَفْرَتَة (بهِيشما)، عمُّ أبيك—العالِمُ بفروق الدارما الدقيقة—فاندفع على معسكر الباندافا بمقذوفاتٍ سريعةٍ قوية. وسارت معه جموعٌ عظيمة، بينما كان أبناؤك يحيطون به حراسةً من كل جانب. ويُبرز هذا المشهد التوترَ بين بصيرة الدارما (dharma-jñāna) وضرورات الحرب القاتمة، حيث إن الشيخَ الأعلم بالدارما لا بدّ أن يعمل قائداً في ساحة القتال.

Verse 5

अभ्ययाज्जवनैरश्वैः पाण्डवानामनीकिनीम्‌ । महत्या सेनया गुप्तस्तव पुत्रैश्न सर्वश:,संजयने कहा--भारत! उस दिन जब पूर्वह्नकालका अधिक भाग व्यतीत हो गया, सूर्यदेव पश्चिम दिशामें जाकर स्थित हुए और विजयको प्राप्त हुए महामना पाण्डव खुशी मनाने लगे, उस समय सब धर्मोके विशेषज्ञ आपके ताऊ भीष्मजीने वेगशाली अअश्रोंद्वारा पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण किया। उनके साथ विशाल सेना चली और आपके पुत्र सब ओरसे उनकी रक्षा करने लगे

قال سنجيا: ثم إن بهيشما، وقد أحاط به أبناؤك حمايةً من كل جانب، وتسانده جموعٌ عظيمة، اندفع بخيلٍ سريعة فوقع على جيش الباندافا. ويُظهر هذا البيت كيف تتعاظم البأسُ الحربيّة بالحماية الجماعية والقوة المنسّقة، وكيف يدور مجرى القتال على القيادة والسند المنضبط.

Verse 6

प्रावर्तत ततो युद्ध तुमुलं लोमहर्षणम्‌ । अस्माकं पाण्डवै: सार्थमनयात्‌ तव भारत,भारत! तदनन्तर आपके अन्यायसे हमलोगोंका पाण्डवोंके साथ रोमांचकारी भयंकर संग्राम होने लगा

قال سنجيا: ثم اندلعت معركةٌ صاخبةٌ تقشعرّ لها الأبدان بين قواتنا وقوات الباندافا—لقاءٌ، يا بهاراتا، نشأ بوصفه ثمرةً للمسار الذي سلكته. لقد انتقلت الحرب من مجال المشورة والادّعاء إلى صدامٍ مباشرٍ مُرعب، حاملةً معها الثقلَ الأخلاقي لمسؤولية الظلم الذي أفضى إليها.

Verse 7

धनुषां कूजतां तत्र तलानां चाभिहन्यताम्‌ । महान्‌ समभवच्छब्दो गिरीणामिव दीर्यताम्‌,उस समय वहाँ धनुषोंकी टंकार तथा हथेलियोंके आघातसे पर्वतोंके विदीर्ण होनेके समान बड़े जोरसे शब्द होता था

قال سنجيا: هناك، إذ كانت الأقواسُ تطنّ، وكانت الأكفُّ تُصفَق ضرباً—تحدّياً وتصفيقاً—ارتفع دويٌّ عظيم، كأن الجبال تتصدّع وتنشقّ، مُعلِناً عن احتدام الحماسة القتالية التي كانت تتعاظم في ساحة الوغى.

Verse 8

तिष्ठ स्थितो5स्मि विद्धोनं निवर्तस्व स्थिरो भव | स्थिरो5स्मि प्रहरस्वेति शब्दो5श्रूयत सर्वश:,उस समय “खड़े रहो, खड़ा हूँ, इसे बींध डालो, लौटो, स्थिर भावसे रहो, हाँ-हाँ स्थिरभावसे ही हूँ, तुम प्रहार करो” ऐसे शब्द सब ओर सुनायी पड़ते थे

قال سنجيا: من كل جانب، في خِضَمِّ المعمعة، ارتفعت صيحاتُ المحاربين—«اثبتوا! أنا ثابت! اطعنه واخترقه! لا ترتدّ! كن راسخًا! نعم—أنا راسخ—اضرب!» وهكذا دوّى الميدان بالأوامر وعهود العزم، كاشفًا عن الانضباط الصارم والإرادة التي لا تلين التي تقتضيها حربٌ تُخاض على نهج الدharma.

Verse 9

काउ्चनेषु तनुत्रेषु किरीटेषु ध्वजेषु च । शिलानामिव शैलेषु पतितानामभूद्‌ ध्वनि:,जब सोनेके कवचों, किरीटों और ध्वजोंपर योद्धाओं-के अस्त्र-शस्त्र टकराते, तब उनसे पर्वतोंपर गिरकर टकरानेवाली शिलाओंके समान भयानक शब्द होता था

قال سنجيا: حين كانت الأسلحة تصطدم بدروع المحاربين وعتادهم الواقي وتيجانهم وراياتهم، ارتفع دويٌّ مروّع—كاصطدام صخورٍ هوت على الجبال—معلنًا زخم المعركة العنيف الذي لا يعرف محاباة، حيث يُمتحَن الكبرياء كما تُمتَحَن وسائل الوقاية.

Verse 10

पतितान्युत्तमाज़ानि बाहवश्न विभूषिता: । व्यचेष्टन्त महीं प्राप्प शतशो5थ सहस्रश:,सैनिकोंके सैकड़ों-हजारों मस्तक तथा स्वर्ण-भूषित भुजाएँ कट-कटकर पृथ्वीपर गिरने और तड़पने लगीं

قال سنجيا: مئاتٌ وآلافٌ من الرؤوس الساقطة والأذرع المزيّنة، قُطِعت في القتال، ارتطمت بالأرض وما زالت تتلوّى هناك—صورةٌ لعنف الحرب الذي لا يرحم، وللثمن الفادح الذي يحمله المحاربون من كلا الجانبين.

Verse 11

ह्वतोत्तमाज़ा: केचित्‌ तु तथैवोद्यतकार्मुका: । प्रगृहीतायुधाश्चापि तस्थु: पुरुषसत्तमा:,कितने ही पुरुषशिरोमणि वीरोंके मस्तक तो कट गये, परंतु उनके धड़ पूर्ववत्‌ धनुष- बाण एवं अन्य आयुध लिये खड़े ही रह गये

قال سنجيا: إن بعض أولئك الأبطال الأجلّاء قُطِعت رؤوسهم؛ ومع ذلك، والأقواس ما تزال مرفوعة والأسلحة ما تزال مقبوضًا عليها، ظلّت أجسادهم قائمة—مشهدٌ مهيب من ضراوة الميدان، حيث يبقى البأس حتى والروح تفارق.

Verse 12

प्रावर्तत महावेगा नदी रुधिरवाहिनी । मातड्ाड्रशिला रौद्रा मांसशोणितकर्दमा,रणक्षेत्रमें बड़े वेगसे रक्तकी नदी बह चली, जो देखनेमें बड़ी भयानक थी। हाथियोंके शरीर उसके भीतर शिलाखण्डोंके समान जान पड़ते थे। खून और मांस कीचड़के समान प्रतीत होते थे। बड़े-बड़े हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंसे ही वह नदी निकली थी और परलोकरूपी समुद्रकी ओर प्रवाहित हो रही थी। वह रक्त-मांसकी नदी गीधों और गीदड़ोंको आनन्द प्रदान करनेवाली थी

قال سنجيا: اندفع نهرٌ من الدم بقوةٍ هائلة. كان منظره مفزعًا؛ كأن أجساد الفيلة فيه صخورٌ مبعثرة، ووحله لحمٌ ودمٌ متخثّر. وُلد من جثث الفيلة والخيول والرجال الساقطين، واندفع كأنه يسير إلى محيط العالم الآخر—صورةٌ مروّعة لكلفة الحرب الأخلاقية، حيث يغدو الذبح وليمةً للسباع والطيور الجارحة لا ميدانَ شرف.

Verse 13

वराश्चनरनागानां शरीरप्रभवा तदा | परलोकार्णवमुखी गृध्रगोमायुमोदिनी,रणक्षेत्रमें बड़े वेगसे रक्तकी नदी बह चली, जो देखनेमें बड़ी भयानक थी। हाथियोंके शरीर उसके भीतर शिलाखण्डोंके समान जान पड़ते थे। खून और मांस कीचड़के समान प्रतीत होते थे। बड़े-बड़े हाथी, घोड़े और मनुष्योंके शरीरोंसे ही वह नदी निकली थी और परलोकरूपी समुद्रकी ओर प्रवाहित हो रही थी। वह रक्त-मांसकी नदी गीधों और गीदड़ोंको आनन्द प्रदान करनेवाली थी

قال سنجيا: عندئذٍ اندفع نهرٌ وُلد من أجساد الخنازير البرّية والرجال والفيلة، جارياً نحو محيط العالم الآخر. وكان يبهج النسور والضباع. ففي ساحة القتال سال نهر الدم بعنفٍ شديد، منظرُه مُروِّع؛ وكانت جثث الفيلة في جوفه كأنها صخورٌ عظيمة، والدم واللحم كأنهما وحل. ومن أجساد الفيلة والخيول والناس نشأ ذلك النهر، ثم اندفع إلى بحر الآخرة، لا يسرّ إلا آكلي الجيف.

Verse 14

नदृष्ट न श्रुतं वापि युद्धमेतादृशं नृप । यथा तव सुतानां च पाण्डवानां च भारत,भारत! नरेश्वर! पाण्डवों और आपके पुत्रोंका उस दिन जैसा भयानक युद्ध हुआ, वैसा न कभी देखा गया है और न सुना ही गया है

قال سنجيا: أيها الملك، ما رُئي قطّ ولا سُمِع بمثل هذه المعركة—كمثل التي وقعت بين أبنائك وبين الباندافا، يا بهاراتا.

Verse 15

नासीद्‌ रथपथस्तत्र योधैर्युधि निपातितै: । गजैश्न पतितैर्नीलैर्गिरिशूज्ैरिवावृत:,वहाँ युद्धस्थलमें गिराये हुए योद्धाओं तथा पर्वतके श्याम शिखरोंके समान पड़े हुए हाथियोंसे अवरुद्ध हो जानेके कारण रथोंके आने-जानेके लिये रास्ता नहीं रह गया था

قال سنجيا: لم يبقَ هناك ممرٌّ للعربات، إذ انسدّت ساحة القتال بالمحاربين الذين سقطوا في الوغى وبالفيلة الداكنة التي انهارت، كأنها قمم جبال سوداء مطروحة.

Verse 16

विकीर्णै: कवचैश्षित्रै: शिरस्त्राणैश्न मारिष । शुशुभे तद्‌ रणस्थानं शरदीव नभस्तलम्‌,माननीय महाराज! इधर-उधर बिखरे हुए विचित्र कवचों तथा शिरस्त्राणों (लोहेके टोपों)-से वह रणभूमि शरद-ऋतुमें तारिकाओंसे विभूषित आकाशकी भाँति शोभा पाने लगी

قال سنجيا: أيها الموقَّر، إن ساحة القتال تلك، وقد تناثرت في كل ناحية الدروع المتنوعة والخُوَذ، كانت تلمع كسماء الخريف المزدانة بالنجوم.

Verse 17

विनिर्भिन्ना: शरै: केचिदन्त्रापीडप्रकर्षिण: । अभीता: समरे शत्रूनभ्यधावन्त दर्पिता:,कुछ वीर बाणोंसे विदीर्ण होकर आँतोंमें उठनेवाली पीड़ासे अत्यन्त कष्ट पानेपर भी समरभूमिमें निर्भय तथा दर्पयुक्त भावसे शत्रुओंकी ओर दौड़ रहे थे

قال سنجيا: كان بعض الأبطال قد مُزِّقت أجسادهم بالسهام، وعُذِّبوا بألمٍ مبرّح كأنه يجذب أحشاءهم جذباً؛ ومع ذلك اندفعوا نحو العدو في غمرة القتال—لا خوف في قلوبهم، تحركهم كبرياء المحارب وحميّته.

Verse 18

तात भ्रात: सखे बन्धो वयस्यथ मम मातुल । मा मां परित्यजेत्यन्ये चुक़ुशु: पतिता रणे,कितने ही योद्धा रणभूमिमें गिरकर इस प्रकार आर्तभावसे स्वजनोंको पुकार रहे थे --तात! भ्रातः! सखे! बन्धो! मेरे मित्र! मेरे मामा! मुझे छोड़कर न जाओ”

قال سنجيا: «يا أبتِ! يا أخي! يا صديقي! يا ذا القُربى! يا رفيق الصِّبا! يا خالي! لا تتركني!»—هكذا كان كثيرٌ من المحاربين، إذ يسقطون في ساحة القتال، يصرخون بمرارةٍ إلى ذويهم.

Verse 19

अथाभ्येहित्वमागच्छ कि भीतो$सि क्व यास्यसि । स्थितो5हं समरे मा भैरिति चान्ये विचुक्रुशु:,दूसरे सैनिक यों चिल्ला रहे थे--“अरे आओ, मेरे पास आओ, क्‍यों डरे हुए हो? कहाँ जाओगे? मैं संग्राममें डटा हुआ हूँ। तुम भय न करो”

قال سنجيا: ثم صاح آخرون: «تعالَ إلى هنا—لا تفرّ! لِمَ الخوف؟ إلى أين تمضي؟ إنني ثابتٌ في المعركة؛ فلا تخشَ!»

Verse 20

तत्र भीष्म: शान्तनवो नित्यं मण्डलकार्मुक: । मुमोच बाणान्‌ दीप्ताग्रानहीनाशीविषानिव,वहाँ शान्तनुनन्दन भीष्म अपने धनुषको मण्डलाकार करके विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं प्रज्वलित बाणोंकी निरन्तर वर्षा कर रहे थे

قال سنجيا: هناك كان بهيشما ابن شانتانو، يُدير قوسه في حركةٍ دائريةٍ لا تنقطع، ويُطلق سهامًا ذات رؤوسٍ متقدة—مروِّعة كالأفاعي السامّة.

Verse 21

शरैरेकायनीकुर्वन्‌ दिश: सर्वा यतव्रतः । जघान पाण्डवरथानादिश्य भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! उत्तम व्रतका पालन करनेवाले भीष्म सम्पूर्ण दिशाओंको बाणोंसे व्याप्त करते हुए पाण्डव-पक्षीय रथियोंको अपना नाम सुना-सुनाकर मारने लगे

قال سنجيا: يا ثورَ آلِ بهاراتا! إن بهيشما، الثابت على انضباط نذره، ملأ الجهات كلها بسهامه؛ ثم—وهو يهتف باسمه هو إعلانًا وتحدّيًا—أخذ يضرب فرسان العربات من جيش الباندافا صرعى.

Verse 22

स उत्पन्‌ वै रथोपस्थे दर्शयन्‌ पाणिलाघवम्‌ | अलातचक्रवद्‌ राजंस्तत्र तत्र सम दृश्यते,राजन्‌! उस समय भीष्म अपने हाथकी फुर्ती दिखाते हुए रथकी बैठकपर नृत्य-सा कर रहे थे। घूमते हुए अलातचक्रकी भाँति वे यत्र-तत्र सर्वत्र दिखायी देने लगे

قال سنجيا: «أيها الملك! عندئذٍ نهض بهيشما على مقعد العربة، مُظهرًا خِفّة يديه وسرعتهما. وكالشعلة المشتعلة إذا دارت بدت كعجلةٍ من نار، كان كأنه يظهر في كل مكان—هنا وهناك—بمحض السرعة وإتقان القتال.»

Verse 23

तमेक॑ समरे शूरं पाण्डवा: सूंजयै: सह । अनेकशतसाहसं समपश्यन्त लाघवात्‌,युद्धमें शूरवीर भीष्म यद्यपि अकेले थे, तथापि सूंजयोंसहित पाण्डवोंको वे अपनी फुर्तीके कारण कई लाख व्यक्तियोंके समान दिखायी दिये

قال سنجيا: في لُجَّةِ القتال، وإن كان بهيشما واقفًا وحده بطلاً، فإن أبناء باندو—مع السِّرِنْجَيَة—أبصروه، لفرط سرعته وبأسه، كأنه مئاتُ الألوف.

Verse 24

मायाकृतात्मानमिव भीष्म तत्र सम मेनिरे । पूर्वस्यां दिशि त॑ दृष्टवा प्रतीच्यां ददृशुर्जना:

قال سنجيا: هناك ظنّ الناس أن بهيشما كأنه كائن صيغ بسحر المايا. رأوه في جهة المشرق ثم أبصروه ثانية في جهة المغرب؛ هكذا كان ظهوره وحركته عجيبَين مُحيِّرَين وسط ضجيج الحرب.

Verse 25

लोगोंको ऐसा मालूम हो रहा था कि रफणक्षेत्रमें भीष्मजीने मायासे अपनेको अनेक रूपोंमें प्रकट कर लिया है। जिन लोगोंने उन्हें पूर्वदिशामें देखा था, उन्हीं लोगोंको अखि फिरते ही वे पश्चिममें दिखायी दिये ।। उदीच्यां चैवमालोक्य दक्षिणस्यां पुनः प्रभो । एवं स समरे शूरो गाड़्जेय: प्रत्यदृश्यत,प्रभो! बहुतोंने उन्हें उत्तर दिशामें देखकर तत्काल ही दक्षिण दिशामें भी देखा। इस प्रकार समरभूमिमें वे शूरवीर गंगानन्दन भीष्म सब ओर दिखायी दे रहे थे

قال سنجيا: «يا مولاي، بعدما رُئي هكذا في جهة الشمال، رُئي ثانيةً في جهة الجنوب. وهكذا، في قلب المعركة، بدا بهيشما البطل—ابن الغانغا—كأنه ظاهرٌ من كل جانب.»

Verse 26

नचैवं पाण्डवेयानां कश्चिच्छकनोति वीक्षितुम्‌ | विशिखानेव पश्यन्ति भीष्मचापच्युतान्‌ बहून्‌ू,पाण्डवोंमेंसे कोई भी उन्हें देख नहीं पाता था। सब लोग भीष्मजीके धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंको ही देखते थे

قال سنجيا: لم يستطع أحدٌ من أبناء باندو أن ينظر إليه مباشرة؛ إنما كان يُرى فقط سيلُ السهام التي لا تُحصى المنطلقة من قوس بهيشما، تلمع كالرماح الحادّة.

Verse 27

कुर्वाणं समरे कर्म सूदयानं च वाहिनीम्‌ | व्याक्रोशन्त रणे तत्र नरा बहुविधा बहु

قال سنجيا: وبينما كان يُنجز أفعاله في لُجَّة القتال ويشرع في حصد الجيش المقابل، كان رجالٌ كثيرون على اختلافهم في ساحة المعركة يصرخون صراخًا عاليًا من الكرب، مرة بعد مرة، وقد غمرتهم وحشية الحرب.

Verse 28

शलभा इव राजान: पतन्ति विधिचोदिता:

قال سنجيا: مدفوعين بقوة القدر، يسقط الملوك—كالفراش يندفع إلى اللهيب—مشدودين على غير اختيار إلى الهلاك وسط أتون الحرب الملتهم.

Verse 29

न हि मोघ: शर: कश्चिदासीद्‌ भीष्मस्य संयुगे

قال سنجيا: في تلك المعركة لم تُهدر لبهيشما سهـمٌ واحد؛ فكل رمية أصابت هدفها، دلالةً على انضباطه القتالي الذي لا يُجارى وعلى حتمية عواقب الحرب القاتمة.

Verse 30

(प्रच्छादयन्‌ शरान्‌ भीष्मो निशितान्‌ कड्कपत्रिण: ।) भिनत्त्येकेन बाणेन सुमुखेन पतत्त्रिणा

(قال سنجيا:) كان بهيشما يكسو الميدان بسهامٍ حادّةٍ ريشُها كريش البلشون، ثم يشقّها—سهمًا فسهمًا—بسهمٍ واحد، يطلقه من قوسه المحكم السريع الطيران.

Verse 31

गजकण्टकसंनद्धं वज्ेणेव शिलोच्चयम्‌ । भीष्म कंकपत्रसे युक्त बहुसंख्यक तीखे बाणोंको युद्धमें बिखेर रहे थे। वे एक ही पंखयुक्त सीधे बाणसे लोहेकी झूलसे युक्त हाथीको भी विदीर्ण कर डालते थे। जैसे इन्द्र महान्‌ पर्वतको अपने वज्ञसे विदीर्ण कर देते हैं || ३० हू ।। दौ त्रीनपि गजारोहान्‌ पिण्डितान्‌ वर्मितानपि

قال سنجيا: كان بهيشما يذرّ في القتال سهامًا حادّةً كالعاصفة، فيصيب حتى الفيل الحربي المصفّح بالحديد والمزوّد بالمهاويز والقيود. وبسهمٍ واحدٍ مستقيمٍ ذي ريش كان يشقّ مثل ذلك الفيل—كما يشقّ إندرا الجبل العظيم بڤَجْرَته، صاعقته.

Verse 32

यो यो भीष्म॑ नरव्याप्रमभ्येति युधि कश्चन

قال سنجيا: «أيًّا كان—أيَّ محاربٍ كان—يتقدّم في ساحة القتال ليواجه بهيشما، ذلك الجبّار محرّك الرجال، …»

Verse 33

मुहूर्तदृष्टः स मया पतितो भुवि दृश्यते । जो कोई भी योद्धा नरश्रेष्ठ भीष्मके सम्मुख आ जाता, वह मुझे एक ही मुहूर्तमें खड़ा दिखायी देकर उसी क्षण धरतीपर लोटता दिखायी देता था | ३२ ह ।। एवं सा धर्मराजस्य वध्यमाना महाचमू:

قال سنجيا: «لم أره إلا لبرهةٍ يسيرة، ثم ما لبث أن شوهد صريعًا على الأرض. فما من محاربٍ يواجه بهيشما وجهًا لوجه إلا بدا لي قائمًا لحظةً واحدة، ثم في اللحظة نفسها يُرى مطروحًا يتقلب على التراب».

Verse 34

भीष्मेणातुलवीर्येण व्यशीर्यत सहस्रधा । इस प्रकार अतुल पराक्रमी भीष्मके द्वारा मारी जाती हुई धर्मराज युधिष्ठिरकी वह विशाल वाहिनी सहस्रों भागोंमें बिखर गयी ।। ३३ ह ।। प्राकम्पत महासेना शरवर्षेण तापिता

قال سنجيا: «إذ ضربها بهيشما ذو البأس الذي لا يُجارى، تكسّر ذلك الجيش العظيم وتبعثر إلى ألف شظية. وقد لُهِبت بسيل سهامه، فأخذت الجموع الكبرى ترتجف.»

Verse 35

पश्यतो वासुदेवस्य पार्थस्याथ शिखण्डिन: । उनकी बाण-वर्षासे संतप्त हो पाण्डवोंकी वह महती सेना श्रीकृष्ण, अर्जुन और शिखण्डीके देखते-देखते काँपने लगी || ३४ इ ।। वर्तमाना5पि ते वीरा द्रवमाणान्‌ महारथान्‌

قال سنجيا: «وأمام نظر فاسوديفا (كريشنا) وبارثا (أرجونا) وشيخاندين، أخذ جيش الباندافا العظيم—وقد لُهِب بوابل السهام—يرتجف؛ ورُئي أولئك الأبطال، فرسان المركبات العظام، وقد انكسروا وولّوا هاربين.»

Verse 36

महेन्द्रसमवीर्येण वध्यमाना महाचमू:

قال سنجيا: «كان الجيش العظيم يُفنى على يد من تساوي بأسه بأس إندرا.»

Verse 37

आविद्धनरनागाश्चं पतितध्वजकूबरम्‌

قال سنجيا: «وكان هناك رجالٌ وفيلةٌ قد أُصيبوا فسقطوا، وكانت العربة مطروحةً وقد سقط لواؤها وعمودها.»

Verse 38

जघानात्र पिता पुत्र पुत्रश्न पितरं तथा

قال سَنجايا: في هذه المعركة ضرب أبٌ ابنه فأرداه، وكذلك ضرب ابنٌ أباه فأرداه—مُظهِرًا كيف يقلب هياجُ الحرب روابطَ الفطرة، ويدفع الرجال إلى أفعالٍ تنتهك ما تألفه النفوس من شعورٍ أخلاقيٍّ معتاد.

Verse 39

विमुच्य कवचान्यन्ये पाण्डुपुत्रस्य सैनिका:

قال سَنجايا: إنّ بعض جنود ابنِ پاندو، في زحمة القتال، ألقَوا دروعهم—وذلك علامةُ إعياءٍ واضطرابٍ تحت وطأة مطالب الحرب القاسية.

Verse 40

तद्‌ गोकुलमिवोदशभ्रान्तमुद्‌भ्रान्तरथयूथपम्‌,उवाच पार्थ बीभत्सुं निगृहा रथमुत्तमम्‌ उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी वह सेना व्याकुल होकर भटकती हुई गौओंके समूहकी भाँति आर्तस्वरसे हाहाकार करती हुई देखी गयी। कितने ही रथयूथपति भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर घूम रहे थे। अपनी सेनामें इस प्रकार भगदड़ मची हुई देख यदुकुलनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको खड़ा करके कुन्तीपुत्र अर्जुनसे कहा --

قال سَنجايا: لقد شوهد جيشُ ابنِ پاندو في اضطرابٍ عظيم، يتخبّط كقطيعٍ من البقر، ويعلو فيه الصراخُ بصوتِ الكرب. وكان كثيرٌ من قادةِ كتائبِ المركبات يدورون حائرين لا يدرون ما يصنعون. فلمّا رأى بهاگَفان شري كريشنا، بهجةَ سلالةِ يادو، هذا الهرجَ والفرارَ في صفوفهم، شدَّ اللجامَ وأوقف مركبته الممتازة، ثم خاطب أرجونا ابنَ كونتي—بيبهاتسو، الذي لا يهاب.

Verse 41

ददृशे पाण्डुपुत्रस्य सैन्यमार्तस्वरं तदा । प्रभज्यमान सैन्यं तु दृष्टवा यादवनन्दन:

قال سَنجايا: عندئذٍ شوهد جيشُ ابنِ پاندو يرفع صرخاتِ الضيق. ولمّا أبصر محبوبُ اليادو (كريشنا) ذلك الحشدَ وهو يتصدّع ويتحطّم، دلّ المشهدُ على منعطفٍ خطيرٍ في القتال—حيث يبدأ الخوفُ والاضطرابُ باختبار العزمِ والانضباطِ وتمسّكِ المحاربين بالواجب الذي اختاروه.

Verse 42

अयं स काल: सम्प्राप्त: पार्थ यस्तेडभिकाड्क्षित:

قال سَنجايا: «يا پارثا، لقد أتى الآن الزمانُ الذي طالما انتظرته.»

Verse 43

प्रहरस्व नरव्याप्र न चेन्मोहाद विमुहा[से । 'पुरुषसिंह! जिसकी तुम दीर्घकालसे अभिलाषा करते थे, वही यह अवसर प्राप्त हुआ है। यदि तुम मोहसे किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं हो गये हो तो पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो ।। ४२ -॥] यत्‌ त्वया कथितं वीर पुरा राज्ञां समागमे,“वीर! पहले राजाओंकी मण्डलीमें तुमने जो यह कहा था कि “जो मेरे साथ संग्रामभूमिमें उतरकर युद्ध करेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि समस्त सैनिकोंको मैं सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।” शत्रुसूदन कुन्तीनन्दन! अपनी उस बातको सत्य कर दिखाओ। अर्जुन! देखो, तुम्हारी सेना इधर-उधर भाग रही है

قال سنجيا: «اضربْ، يا نمرَ الرجال! فإن لم تُصَبْ بالحيرة من وَهْمٍ مُضلّ، فابذلْ جهدك كلَّه وقاتِلْ.»

Verse 44

भीष्मद्रोणमुखान्‌ सर्वान्‌ धार्तराष्ट्रस्य सैनिकान्‌ । सानुबन्धान्‌ हनिष्यामि ये मां योत्स्यन्ति संयुगे,“वीर! पहले राजाओंकी मण्डलीमें तुमने जो यह कहा था कि “जो मेरे साथ संग्रामभूमिमें उतरकर युद्ध करेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि समस्त सैनिकोंको मैं सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।” शत्रुसूदन कुन्तीनन्दन! अपनी उस बातको सत्य कर दिखाओ। अर्जुन! देखो, तुम्हारी सेना इधर-उधर भाग रही है

قال سنجيا: «أيها البطل، لقد قلتَ من قبل في مجمع الملوك: “من ينزل إلى ساحة القتال ليبارزني، فسأقتل جميع محاربي دَھرتَراشْترا—وعلى رأسهم بهيشما ودرونا—مع حلفائهم وأنصارهم.”»

Verse 45

इति तत्‌ कुरु कौन्तेय सत्यं वाक्यमरिंदम । बीभत्सो पश्य सैन्यं स्वं भज्यमानं ततस्ततः,“वीर! पहले राजाओंकी मण्डलीमें तुमने जो यह कहा था कि “जो मेरे साथ संग्रामभूमिमें उतरकर युद्ध करेंगे, दुर्योधनके उन भीष्म, द्रोण आदि समस्त सैनिकोंको मैं सगे-सम्बन्धियोंसहित मार डालूँगा।” शत्रुसूदन कुन्तीनन्दन! अपनी उस बातको सत्य कर दिखाओ। अर्जुन! देखो, तुम्हारी सेना इधर-उधर भाग रही है

قال سنجيا: «فإذن، يا ابنَ كونتي، يا قاهرَ الأعداء، اجعلْ قولك صدقًا واقعًا. يا بيبهاتسو، انظرْ—إن جيشك نفسه يُكسَر ويتبدّد هنا وهناك.»

Verse 46

द्रवतश्न महीपालान्‌ पश्य यौधिष्ठिरे बले । दृष्टवा हि भीष्म समरे व्यात्ताननमिवान्तकम्‌

قال سنجيا: «انظرْ، يا يودهيشثيرا، إلى الملوك في جيشك وهم يفرّون مذعورين؛ إذ إنهم حين يرون بهيشما في خِضَمّ القتال—وفاه كأنه مفتوح كفم الموت نفسه—تخور عزائمهم ويتفرّقون.»

Verse 47

एवमुक्त: प्रत्युवाच वासुदेव॑ धनंजय:,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्‌! इन घोड़ोंको हाँककर वहीं ले चलिये, जहाँ भीष्म मौजूद हैं। इस सेनारूपी समुद्रमें प्रवेश कीजिये। आज मैं कुरुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको रथसे नीचे गिरा दूँगा!

قال سنجيا: فلما خوطب هكذا، أجاب دهننجايا (أرجونا) فاسوديفا (كريشنا): «يا ربّ، قدْ هذه الخيول وخذْنا إلى حيث يقف بهيشما. ادخلْ بهذا المركب في بحر الجيوش. اليوم سأُسقِطُ من عربته جدَّ الكورو الشيخ، البطلَ الذي لا يُقهَر، بهيشما!»

Verse 48

नोदयाश्वान्‌ यतो भीष्मो विगाहैतद्‌ बलार्णवम्‌ | पातयिष्यामि दुर्धर्ष वृद्धं कुकपितामहम्‌,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया--“भगवन्‌! इन घोड़ोंको हाँककर वहीं ले चलिये, जहाँ भीष्म मौजूद हैं। इस सेनारूपी समुद्रमें प्रवेश कीजिये। आज मैं कुरुलके वृद्ध पितामह दुर्धर्ष वीर भीष्मको रथसे नीचे गिरा दूँगा!

قال سنجيا: إن أرجونا، مخاطبًا كريشنا، حثَّه أن يسوق الخيل مباشرةً إلى حيث يقف بهيشما، وأن يقتحم ذلك البحرَ من الجند. ثم أعلن عزمه قائلاً إنه في ذلك اليوم نفسه سيُسقط من عربته الجدَّ الأكبر لقبيلة الكورو—بهيشما—الشيخَ المهيبَ الذي لا يُقهر بسهولة.

Verse 49

संजय उवाच ततो<श्चवान्‌ रजतप्रख्यान्‌ नोदयामास माधव: । यतो भीष्मरथो राजन दुष्प्रेक्ष्यो रश्मिवानिव,संजय कहते हैं--राजन्‌! तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने अर्जुनके चाँदीके समान सफेद घोड़ोंको उसी दिशाकी ओर हाँका, जिस ओर भीष्मजीका रथ विद्यमान था। सूर्यकी भाँति उस रथकी ओर आँख उठाकर देखना भी कठिन था

قال سنجيا: عندئذٍ ساق ماذافا (كريشنا) خيل أرجونا البيضاء كالفِضّة نحو الجهة التي كان فيها مركب بهيشما. أيها الملك، كان ذلك المركب عسيرَ النظر إليه، متلألئًا كأنه الشمس ذاتها.

Verse 50

ततस्तत्‌ पुनरावृत्तं युधिष्ठिरबलं महत्‌ | दृष्टवा पार्थ महाबाहुं भीष्मायोद्यतमाहवे,उस समय महाबाहु अर्जुनको समरभूमिमें भीष्मसे लोहा लेनेके लिये उद्यत देख युधिष्ठिरकी वह विशाल सेना पुनः: लौट आयी

قال سنجيا: عندئذٍ عاد جيش يودهشثيرا العظيم أدراجه مرةً أخرى، لأنهم رأوا بارثا (أرجونا) ذا الذراعين القويتين واقفًا في ساحة القتال مستعدًّا لمنازلة بهيشما.

Verse 51

ततो भीष्म: कुरुश्रेष्ठ सिंहवद्‌ विनदन्‌ मुहुः । धनंजयरथं शीघ्र॑ शरवर्षरवाकिरत्‌,कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर भीष्म सिंहके समान बारंबार गर्जना करते हुए अर्जुनके रथपर शीघ्रतापूर्वक बाणोंकी वर्षा करने लगे

قال سنجيا: يا خيرَ الكورو! ثم إن بهيشما، وهو يزأر مرارًا كالأسد، أسرع فغطّى مركبة دهننجايا (أرجونا) بوابلٍ مدوٍّ من السهام كالمطر.

Verse 52

क्षणेन स रथस्तस्य सहय: सहसारथि: । शरवर्षेण महता संछन्नो न प्रकाशते,उस महान्‌ बाण-वर्षासे एक ही क्षणमें घोड़े और सारथिसहित आच्छादित होकर अर्जुनका रथ किसीकी दृष्टिमें नहीं आता था

قال سنجيا: وفي لحظةٍ واحدة غُطّيت عربته—بخيلها وسائقها—بوابلٍ عظيم من السهام حتى لم تعد تُرى.

Verse 53

वासुदेवस्त्वसम्भ्रान्तो धैर्यमास्थाय सत्त्ववान्‌ | चोदयामास तानश्वान्‌ विचितान्‌ भीष्मसायकै:,परंतु शक्तिशाली भगवान्‌ श्रीकृष्ण तनिक भी घबराहटमें न पड़कर धैर्यका सहारा ले उन घोड़ोंको हाँकते रहे। यद्यपि भीष्मके बाण उन अभश्वोंके सभी अंगोंमें धँसे हुए थे

حينئذٍ كان فاسوديفا (شري كريشنا) ثابت الجأش، قوي العزم، لم يداخله اضطرابٌ قطّ؛ فاستند إلى الصبر وواصل حثَّ تلك الخيول على التقدّم، وإن كانت سهامُ بهيشما قد انغرست في جميع أعضائها.

Verse 54

ततः पार्थो धनुर्गृह्ा दिव्यं जलदनि:स्वनम्‌ । पातयामास भीष्मस्य धनुश्कछित्त्वा त्रिभि: शरै:,तब अर्जुनने मेघके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य धनुषको हाथमें लेकर तीन बाणोंसे भीष्मके धनुषको काट गिराया

قال سنجيا: ثم إن بارثا (أرجونا) تناول قوسه الإلهي الذي يدوّي كالرعد في السحاب، فأسقط قوسَ بهيشما قاطعًا إياه بثلاثة سهام.

Verse 55

स च्छिन्नधन्वा कौरव्य: पुनरन्यन्महद्‌ धनु: । निमिषान्तरमात्रेण सज्यं चक्रे पिता तव,धनुष कट जानेपर आपके ताऊ कुरुनन्दन भीष्मने पलक मारते-मारते पुनः दूसरे विशाल धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ा दी

فلما قُطع قوسه، يا سليل الكورو، أخذ أبوك بهيشما في الحال قوسًا عظيمًا آخر، وفي مقدار رمشة عين شدَّه وأوتره من جديد.

Verse 56

विचकर्ष ततो दोर्भ्या धनुर्जलदनि:स्वनम्‌ | अथास्य तदपि क्रुद्धश्चिच्छेद धनुरजुन:,फिर मेघके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उस धनुषको दोनों हाथोंसे खींचा। इतनेहीमें कुपित हुए अर्जुनने उनके उस धनुषको भी काट डाला

ثم جذب القوس الذي يدوّي كالرعد بكلتا ذراعيه؛ غير أن أرجونا، وقد استبدّ به الغضب، قطع ذلك القوس أيضًا.

Verse 57

तस्य तत्‌ पूजयामास लाघवं शान्तनो: सुतः । साधु पार्थ महाबाहो साधु भो: पाण्डुनन्दन,अर्जुनकी इस फुर्तीको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने बड़ी प्रशंसा की और कहा --“महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम्हें साधुवाद। पाण्डुनन्दन! धन्यवाद। बेटा! तुम्हारी इस फुर्तीसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। धनंजय! यह महान्‌ कर्म तुम्हारे ही योग्य है। तुम मेरे साथ युद्ध करो”

فلما رأى تلك الخِفّة، أثنى بهيشما ابن شانتانو قائلاً: «أحسنت يا بارثا، يا عظيم الذراعين! أحسنت يا ابن باندو!»

Verse 58

इस प्रकार श्रीमह्या भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें तृतीय युद्धदिवसमें भीष्म और दुर्योधनका संवादविषयक अटद्ठावनवाँ अध्याय पूरा हुआ,त्वय्येवैतद्‌ युक्तरूपं महत्‌ कर्म धनंजय । प्रीतो5स्मि सुभुशं पुत्र कुरु युद्ध मया सह अर्जुनकी इस फुर्तीको देखकर शान्तनुनन्दन भीष्मने बड़ी प्रशंसा की और कहा --“महाबाहु कुन्तीकुमार! तुम्हें साधुवाद। पाण्डुनन्दन! धन्यवाद। बेटा! तुम्हारी इस फुर्तीसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ। धनंजय! यह महान्‌ कर्म तुम्हारे ही योग्य है। तुम मेरे साथ युद्ध करो”

قال سنجيا: «إن هذا الفعل العظيم لا يليق إلا بك وحدك، يا دهننجايا. يا بُنيّ، إني لَشديد السرور. قاتِلْني». ولمّا رأى بهيشما—ابن شانتانو—خِفّة أرجونا وبأسه السريع، أثنى عليه ثناءً حارًّا، مؤكِّدًا أن مثل هذه البطولة إنما تليق بمحاربٍ من مقام أرجونا، وداعيًا إيّاه إلى قتالٍ مباشر، حيث تُجعل الشجاعة والواجب (دهرما الكشترية) مقياسَ التفوّق في ساحة الوغى.

Verse 59

इति पार्थ प्रशस्याथ प्रगृह्मान्यन्महद्‌ धनु: । मुमोच समरे वीर: शरान्‌ पार्थरथं प्रति,इस प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुनकी प्रशंसा करके फिर दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर वीर भीष्मने युद्धस्थलमें उनके रथकी ओर बाण बरसाना आरम्भ किया इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि तृतीयदिवसावहारे एकोनषछष्टितमो5 ध्याय:

قال سنجيا: وبعد أن أثنى على بارثا (أرجونا) على هذا النحو، تناول بهيشما البطل قوسًا عظيمًا آخر، وفي خضمّ المعركة أخذ يُطلق وابلًا من السهام نحو مركبة أرجونا. ويُبرز المشهد شريعة المحارب: قد يجتمع الإعجاب بفضل الخصم مع أداء الواجب القتالي بلا تردّد—تكريمٌ بالقول، ومضاءٌ في الفعل.

Verse 60

अदर्शयद्‌ वासुदेवो हययाने परं बलम्‌ | मोघान्‌ कुर्वन्‌ शरांस्तस्य मण्डलान्याचरल्लघु,भगवान्‌ श्रीकृष्णने घोड़ोंको हाँकनेकी कलामें अपने उत्तम बलका परिचय दिया। वे भीष्मके बाणोंको व्यर्थ करते हुए बड़ी फुर्तीक साथ रथको मण्डलाकार चलाने लगे

قال سنجيا: أظهر فاسوديفا (كريشنا) براعته العليا في فنّ قيادة الخيل. فكان يدير المركبة سريعًا في دوائر ضيّقة، مُبطِلًا سهام بهيشما وجاعلًا إياها هباءً. ويُبرز المشهد مهارةً منضبطة وحضورَ ذهنٍ في ساحة القتال: فالقوة ليست عنفًا طائشًا، بل سيادةً مُحكَمة تُستعمل للحماية وإقامة الواجب.

Verse 61

तथा भीष्मस्तु सुदृढ वासुदेवधनंजयौ । विव्याध निशितैर्बाणै: सर्वगात्रेषु भारत,भारत! तथापि भीष्मने श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्पूर्ण अंगोंमें अपने पैने बाणोंसे गहरे आघात किये

قال سنجيا: ومع ذلك، فإن بهيشما، ثابتًا لا يتزعزع، طعن فاسوديفا (كريشنا) ودهننجايا (أرجونا) بسهامٍ حادّة، فأصابهم في جميع أطرافهم، يا بهاراتا. ويُبرز المشهد حياد الحرب القاتم: فالبأس والواجب يدفعان المحارب إلى المضيّ قدمًا حتى في مواجهة الموقَّرين، فتشتدّ المعضلة الأخلاقية بين المحبة والقرابة ودهرما الكشترية (kṣatriya-dharma).

Verse 62

शुशुभाते नरव्याप्रौ तौ भीष्मशरविक्षतौ । गोवृषाविव संरब्धौ विषाणैलिखिताड्कितौ,भीष्मके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो वे नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुन क्रोधमें भरे हुए उन दो साँड़ोंके समान सुशोभित हुए, जिनके सम्पूर्ण शरीरमें सींगोंके आघातसे बहुत-से घाव हो गये हों

وقد تَمزَّق جسداهما بجراح سهام بهيشما، فإذا بكريشنا وأرجونا—وهما من خيرة الرجال—يزدادان بهاءً في غضبهما، كأنهما ثوران هائجـان، قد امتلأت أجسادهما كلّها بجراحٍ كثيرة من صدمات القرون.

Verse 63

पुनश्चापि सुसंरब्ध: शरै: शतसहसख्रश: । कृष्णयोर्युधि संरब्धो भीष्मो5थावारयद्‌ दिश:,तत्पश्चात्‌ रोषावेशमें भरे हुए भीष्मने सैकड़ों-हजारों बाणोंकी वर्षा करके युद्धभूमिमें श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित एवं अवरुद्ध कर दिया

قال سنجيا: ثم إنَّ بهيشما، وقد استبدَّ به الغضب، عاد فأمطر مئاتٍ وآلافًا من السهام. وفي لُجَّة القتال ضيَّق على كريشنا وأرجونا حتى بدا كأنه يُغشي الجهات من حولهما ويَسُدُّها، مُحاصرًا إيّاهما بعاصفةٍ من المقذوفات.

Verse 64

वार्ष्णेयं च शरैस्तीक्ष्पै: कम्पयामास रोषित: । मुहुर॒भ्यर्दयन्‌ भीष्म: प्रहस्य स्वनवत्‌ तदा,इतना ही नहीं, रोषमें भरे हुए भीष्मने जोर-जोरसे हँसकर अपने तीखे बाणोंसे बारंबार पीड़ित करते हुए वृष्णिकुलभूषण श्रीकृष्णको कम्पित-सा कर दिया

قال سنجيا: وقد امتلأ بهيشما غضبًا، جعل وارشنيَّا (شري كريشنا) يهتزّ تحت سهامه الحادّة، يضغط عليه مرارًا بلا فتور؛ وفي تلك اللحظة ضحك بهيشما ضحكًا مدوّيًا، رنّانًا كزئير الأسد.

Verse 65

ततस्तु कृष्ण: समरे दृष्टवा भीष्मपराक्रमम्‌ । सम्प्रेक्ष्य च महाबाहु: पार्थस्य मृदुयुद्धताम्‌,तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने उस समरांगणमें भीष्मका पराक्रम देखकर यह विचार किया कि अर्जुन तो कोमलतापूर्वक युद्ध कर रहा है और भीष्म युद्धस्थलमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये दोनों सेनाओंके बीचमें आकर तपते हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित होते और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अच्छे-अच्छे सैनिकोंको चुन-चुनकर मार रहे हैं। युधिष्ठिरकी सेनामें भीष्मने प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर दिया है

قال سنجيا: ثم إنَّ كريشنا، عظيمَ الساعدين، لما رأى بأسَ بهيشما المهيب في ساحة القتال، ولاحظ أن بارثا (أرجونا) يقاتل برفقٍ زائد، أخذ يتأمّل توتّر الواجب في تلك اللحظة: كيف إنّ ضبط النفس المولود من التبجيل، إذا وُضع في غير موضعه زمنَ الحسم، قد يتيح لخرابٍ أعظم أن يستشري في صفّ المرء نفسه.

Verse 66

भीष्मं च शरवर्षाणि सृजन्तमनिशं युधि । प्रतपन्तमिवादित्यं मध्यमासाद्य सेनयो:,तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने उस समरांगणमें भीष्मका पराक्रम देखकर यह विचार किया कि अर्जुन तो कोमलतापूर्वक युद्ध कर रहा है और भीष्म युद्धस्थलमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये दोनों सेनाओंके बीचमें आकर तपते हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित होते और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अच्छे-अच्छे सैनिकोंको चुन-चुनकर मार रहे हैं। युधिष्ठिरकी सेनामें भीष्मने प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर दिया है

قال سنجيا: «وأمّا بهيشما—فكان لا يفتأ يطلق وابل السهام في القتال—واقفًا بين الجيشين، متوهّجًا كالشمس. وكانت بأسه تحرق ساحة الحرب، إذ كان يصرع أبرَزَ مقاتلي جيش يودهيشتيرا، حتى بدت صفوف الباندافا كأنها مشهدُ انحلالٍ وفناء.»

Verse 67

वरान्‌ वरान्‌ विनिष्नन्तं पाण्डुपुत्रस्य सैनिकान्‌ | युगान्तमिव कुर्वाणं भीष्म॑ यौधिष्ठिरे बले,तदनन्तर महाबाहु श्रीकृष्णने उस समरांगणमें भीष्मका पराक्रम देखकर यह विचार किया कि अर्जुन तो कोमलतापूर्वक युद्ध कर रहा है और भीष्म युद्धस्थलमें निरन्तर बाणोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये दोनों सेनाओंके बीचमें आकर तपते हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित होते और पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके अच्छे-अच्छे सैनिकोंको चुन-चुनकर मार रहे हैं। युधिष्ठिरकी सेनामें भीष्मने प्रलयकालका-सा दृश्य उपस्थित कर दिया है

قال سنجيا: «كان بهيشما يصرع خيارَ مقاتلي ابنِ باندو واحدًا بعد واحد. وفي جيش يودهيشتيرا كان يصنع مشهدًا كأنه نهايةُ عصر—خرابًا جارفًا يكاد يكون قياميًّا—فتزداد حدّةُ التوتّر الأخلاقي في المعركة: إذ إنّ جانبَ الحق قد يتلقّى أفدحَ الخسائر حين تلاقي الرِّقّةُ والاحترازُ بأسًا لا يلين.»

Verse 68

अमृष्यमाणो भगवान्‌ केशव: परवीरहा । अचिन्तयदमेयात्मा नास्ति यौधिष्ठिरं बलम्‌,यह सब देख और सोचकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहन न कर सके। उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि युधिष्ठिरकी सेनाका अस्तित्व मिटना चाहता है। भीष्म रणभूमिमें एक ही दिनमें सम्पूर्ण देवताओं और दानवोंका नाश कर सकते हैं। फिर सेना और सेवकोंसहित पाण्डवोंको युद्धमें परास्त करना इनके लिये कौन बड़ी बात है?

قال سنجيا: لما عجز كيشافا المبارك—قاتل أبطال الأعداء—عن احتمال ما كان يراه، أخذ يتفكّر في باطنه. وتأمّل الربّ الذي لا يُقاس أن جيش يودهيشتيرا قد صار على شفا الاستئصال.

Verse 69

एकाह्वा हि रणे भीष्मो नाशयेद्‌ देवदानवान्‌ । कि नु पाण्डुसुतान्‌ युद्धे सबलान्‌ सपदानुगान्‌,यह सब देख और सोचकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अप्रमेयस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहन न कर सके। उन्होंने मन-ही-मन विचार किया कि युधिष्ठिरकी सेनाका अस्तित्व मिटना चाहता है। भीष्म रणभूमिमें एक ही दिनमें सम्पूर्ण देवताओं और दानवोंका नाश कर सकते हैं। फिर सेना और सेवकोंसहित पाण्डवोंको युद्धमें परास्त करना इनके लिये कौन बड़ी बात है?

قال سنجيا: «إنّ بهيشما، إن دُعي إلى النزال في ساحة الحرب، لقدر في يوم واحد أن يُهلك حتى الآلهة والدانَفَة. فكيف لا يَسهل عليه إذن أن يقهر أبناء باندو في القتال، ومعهم جيوشهم وأتباعهم؟»

Verse 70

द्रवते च महासैन्यं पाण्डवस्य महात्मन: । एते च कौरवास्तूर्ण प्रभग्नान्‌ वीक्ष्य सोमकान्‌,महात्मा पाए्डुपुत्र युधिष्ठिरकी यह विशाल सेना भागी जा रही है और ये कौरवलोग रणक्षेत्रमें सोमकोंको शीघ्रतापूर्वक भागते देख पितामहका हर्ष बढ़ाते हुए उन्हें खदेड़ रहे हैं; अतः आज पाण्डवोंके लिये कवच धारण किया हुआ मैं स्वयं ही भीष्मको मारे डालता हूँ

قال سنجيا: «إنّ الجيش العظيم لذلك الباندَفيّ النبيل يفرّ هاربًا. وهؤلاء الكورو، إذ رأوا السومَكَة قد انهزموا، أسرعوا يطاردونهم.»

Verse 71

प्राद्रवन्ति रणे दृष्टवा हर्षयन्त: पितामहम्‌ । सो5हं भीष्म निहन्म्यद्य पाण्डवार्थाय दंशित:,महात्मा पाए्डुपुत्र युधिष्ठिरकी यह विशाल सेना भागी जा रही है और ये कौरवलोग रणक्षेत्रमें सोमकोंको शीघ्रतापूर्वक भागते देख पितामहका हर्ष बढ़ाते हुए उन्हें खदेड़ रहे हैं; अतः आज पाण्डवोंके लिये कवच धारण किया हुआ मैं स्वयं ही भीष्मको मारे डालता हूँ

قال سنجيا: «إذ رأوا ذلك في قلب المعركة اندفعوا إلى الأمام، مُفرِحين الجدّ الأكبر (بهيشما). لذلك، ومن أجل الباندَفَة، فإنّي—لابسًا الدرع وثابت العزم—سأصرع بهيشما اليوم بيدي.»

Verse 72

भारमेतं विनेष्यामि पाण्डवानां महात्मनाम्‌ | अर्जनो हि शरैस्तीक3्षणैर्वध्यमानो5पि संयुगे

قال سنجيا: «سأرفع هذا العبء الذي يثقل كاهل الباندَفَة ذوي النفوس العظيمة. فإن أرجونا، وإن أُصيب في القتال بسهام حادّة، يظل ثابتًا في المعمعة.»

Verse 73

तथा चिन्तयतस्तस्य भूय एव पितामह:ः । प्रेषयामास संक़ुद्ध: शरान्‌ पार्थरथं प्रति,भगवान्‌ श्रीकृष्णके इस प्रकार चिन्तन करते समय अत्यन्त कुपित हुए पितामह भीष्मने अर्जुनके रथपर पुनः बहुत-से बाण चलाये

قال سانجيا: وبينما كان شري كريشنا يتأمل على هذا النحو، إذا بالجدّ الأكبر بهيشما—وقد اشتعل غضبًا من جديد مرارًا—يمطر عربة أرجونا بوابلٍ من السهام. ويُبرز هذا المشهد كيف أنّ لهيب حرب الدارما قد يدفع حتى الشيوخ الموقّرين إلى إطلاق قوةٍ ضارية حين يرونها لازمةً لواجب جانبهم، فيشتدّ الضغط الأخلاقي على كريشنا وأرجونا.

Verse 74

तेषां बहुत्वात्‌ तु भृशं शराणां दिशश्व सर्वा: पिहिता बभूवु: । न चान्तरिक्षं न दिशो न भूमि- न भास्करो<दृश्यत रश्मिमाली । वयुश्न वातास्तुमुला: सधूमा दिशश्न सर्वा: क्षुभिता बभूवु:,उन बाणोंकी अत्यधिकताके कारण उनसे सम्पूर्ण दिशाएँ आच्छादित हो गयीं। न आकाश दिखायी देता था, न दिशाएँ; न तो भूमि दिखायी देती थी और न मरीचिमाली भगवान्‌ भास्करका ही दर्शन होता था। उस समय धूमयुक्त भयंकर हवा चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाएँ क्षुब्ध हो उठीं

قال سانجيا: لكثرة السهام الهائلة احتُجبت الجهات كلها حجبًا تامًّا. فلا السماء تُرى ولا تُعرف الجهات، ولا الأرض تبدو، ولا حتى الشمس المتألقة المكللة بالأشعة. ثم هبّت ريح عاتية محمّلة بالدخان، واضطربت الجهات جميعًا—صورةٌ لحربٍ من الشدة بحيث تكاد تُكسف نظام العالم نفسه.

Verse 75

द्रोणो विकर्णो5थ जयद्रथश्न भूरिश्रवा: कृतवर्मा कृपश्च । श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्न राजा विन्दानुविन्दौ च सुदक्षिणश्व,तब द्रोण, विकर्ण, जयद्रथ, भूरिश्रवा, कृतवर्मा, कृपाचार्य, श्रुतायु, राजा अम्बष्ठपति, विन्द, अनुविन्द, सुदक्षिण, पूर्वीय नरेशगण, सौवीरदेशीय क्षत्रियगण, वसाति, क्षुद्रक और मालवगण--ये सभी शानानुनन्दन भीष्मकी आज्ञाके अनुसार चलते हुए तुरंत ही किरीटधारी अर्जुनका सामना करनेके लिये निकट चले आये

قال سانجيا: دْرونا، وفيكارنا، وجايادراثا، وبھوريشرافا، وكريتافَرما، وكريبا؛ وشروتايو، ملك الأمبَشْتَة، وكذلك فيندا وأنوفيندا مع سودكشِنا—هؤلاء المحاربون، طاعةً لأمر بهيشما، تقدموا سريعًا لملاقاة أرجونا حامل التاج. ويُبرز المقطع انضباط سلسلة القيادة في الحرب: فالبأس الفردي يُخضع لأمر القائد العام، وثقل اللحظة الأخلاقي قائمٌ على كيفية توجيه القادة للقوة وكيف يختار المحاربون الطاعة.

Verse 76

प्राच्याश्न सौवीरगणाश्ष सर्वे वसातय: क्षुद्रकमालवाश्नव । किरीटिनं त्वरमाणा5भिसखु- निदिशगा: शान्तनवस्य राज्ञ:,तब द्रोण, विकर्ण, जयद्रथ, भूरिश्रवा, कृतवर्मा, कृपाचार्य, श्रुतायु, राजा अम्बष्ठपति, विन्द, अनुविन्द, सुदक्षिण, पूर्वीय नरेशगण, सौवीरदेशीय क्षत्रियगण, वसाति, क्षुद्रक और मालवगण--ये सभी शानानुनन्दन भीष्मकी आज्ञाके अनुसार चलते हुए तुरंत ही किरीटधारी अर्जुनका सामना करनेके लिये निकट चले आये

قال سانجيا: ملوك الشرق، ومحاربو بلاد ساويرا، والڤاساتي، والكشودراكا، والمالافا—جميعهم، في انسجامٍ سريع، تحركوا فورًا في الاتجاه المُشار إليه تحت إمرة الملك بهيشما ابن شانتانو—مسرعين لمواجهة أرجونا، البطل المتوَّج بالديادِم. ويُبرز المشهد طاعة قوات الحلفاء المنضبطة لقائدهم في توتر الحرب الأخلاقي، حيث يدفع واجب المرء تجاه جانبه إلى فعلٍ عاجل ضد خصمٍ ذائع الصيت.

Verse 77

त॑ वाजिपादातरथौघजालै- रनेकसाहस्रशतैर्ददर्श किरीटिनं सम्परिवार्यमाणं शिनेर्नप्ता वारणयूथपैश्वल

قال سانجيا: ثم رأى حفيد كريشنا—أرجونا صاحب التاج—وقد أُحيط من كل جانب بشبكةٍ هائلة من الفرسان والعربات وقادة الفيلة، بالمئات والآلاف. ويُبرز المشهد أنّه في العاصفة الأخلاقية للحرب، يُمتحَن حتى أسبق الأبطال بقوةٍ طاغية وبثقل الجموع المتراكمة من جيوش الخصم.

Verse 78

सात्यकिने दूरसे देखा, किरीटधारी अर्जुन घोड़े, पैदल तथा रथियोंसहित कई लाख सैनिकोंसे घिर गये हैं, गजराजयूथपतियोंने भी उन्हें सब ओरसे घेर रखा है ।। ततस्तु दृष्टवार्जुनवासुदेवौ पदातिनागाश्चरथै: समन्तात्‌ | अभिद्रुतौ शस्त्रभृतां वरिष्ठौ शिनिप्रवीरोडभिससार तूर्णम्‌,तत्पश्चात्‌ पैदल, हाथी, घोड़े और रथोंद्वारा चारों ओरसे आक्रान्त हुए शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण और अर्जुनको देखकर शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकि तुरंत वहाँ आ पहुँचे

قال سانجيا: ثمّ رأى ساتياكي كريشنا وأرجونا—وهما أبرع حملة السلاح—وقد أُحيطا بهجومٍ عاصف من كل جانب من المشاة والفيلة والعربات؛ فاندفع ساتياكي، بطل سلالة الشيني ورأس فرسانها، مسرعًا نحوهما.

Verse 79

स तान्यनीकानि महाथनुष्मा- ज्शिनिप्रवीर: सहसाभिपत्य । चकार साहाय्यमथार्जुनस्य विष्णुर्यथा वृत्रनिष्‌्दनस्य,महाधनुर्धर शिनिवीर सात्यकिने सहसा उन सेनाओंके समीप पहुँचकर अर्जुनकी उसी प्रकार सहायता की, जैसे भगवान्‌ विष्णु वृत्रविनाशक इन्द्रकी सहायता करते हैं

فاندفع ساتياكي، بطل الشيني وصاحب القوس العظيم، فجأةً إلى تلك الكتائب، وقدّم العون لأرجونا، كما يعين فيشنو إندرا قاتل فريترا.

Verse 80

विशीर्णनागाश्चवरथध्वजौघं भीष्मेण वित्रासितसर्वयोधम्‌ । युधिषछ्टिरानीकमभि द्रवन्तं प्रोवाच संदृश्य शिनिप्रवीर:,युधिष्ठिरकी सेनाके हाथी, घोड़े, रथ और ध्वजाओंके समूह तितर-बितर हो गये थे। भीष्मने उनके सम्पूर्ण योद्धाओंको भयभीत कर दिया था। इस प्रकार युधिष्ठिरके सैनिकोंको भागते देख शिनिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिने उनसे कहा--

قال سانجيا: لما حطّم بهيشما حشود الفيلة والعربات الفاخرة والرايات، وبثّ الرعب في قلوب جميع المقاتلين، أخذ جيش يودهيشتيرا يفرّ. وإذ رأى ساتياكي، بطل الشيني الأبرز، تلك الجموع منهزمة، خاطبهم قائلاً—

Verse 81

क्व क्षत्रिया यास्यथ नैष धर्म: सतां पुरस्तात्‌ कथित: पुराणै: । मा स्वां प्रतिज्ञां त्यजत प्रवीरा: स्व वीरधर्म परिपालयध्वम्‌,'क्षत्रियो! कहाँ जा रहे हो? प्राचीन महापुरुषों-द्वारा यह श्रेष्ठ क्षत्रियोंका धर्म नहीं बताया गया है। वीरो! अपनी प्रतिज्ञा न छोड़ो, अपने वीर धर्मका पालन करो”

«يا معشر الكشاتريا، إلى أين تمضون؟ ليس هذا هو الدَّرما الذي أعلنه النبلاء من القدماء أمام أهل الصلاح. أيها الأبطال، لا تهجروا نذركم؛ احفظوا شريعة المحارب واثبتوا على بأسكم!»

Verse 82

तान्‌ वासवानन्तरजो निशाम्य नरेन्द्रमुख्यान्‌ द्रवत: समन्तात्‌ । पार्थस्य दृष्टवा मृदुयुद्धतां च भीष्म च संख्ये समुदीर्यमाणम्‌,इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन श्रेष्ठ राजाओंको सब ओर भागते देखा और इस बातपर भी लक्ष्य किया कि अर्जुन तो कोमलताके साथ युद्ध कर रहा है और भीष्म इस संग्राममें अधिकाधिक प्रचण्ड होते जा रहे हैं। यह सब देखकर सम्पूर्ण यदुकुलका भरण- पोषण करनेवाले महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहन न कर सके। उन्होंने समस्त कौरवोंको सब ओरसे आक्रमण करते देख यशस्वी वीर सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए कहा --

قال سانجيا: إذ رأى شري كريشنا، أخا فاسافا الأصغر (إندرا)، أولئك الملوك الأجلّاء يفرّون في كل اتجاه، ولاحظ أن بارثا (أرجونا) يقاتل بضبطٍ للنفس بينما بهيشما في قلب المعمعة يُستثار إلى شراسةٍ أشد فأشد، لم يعد يحتمل. ولما رأى الكورافا يشنّون الهجوم من كل جانب، أثنى على البطل ذائع الصيت ساتياكي وتكلّم قائلاً—

Verse 83

अमृष्यमाण: स ततो महात्मा यशस्विनं सर्वदशार्हभर्ता । उवाच शैनेयमभिप्रशंसन्‌ दृष्टवा कुरूनापतत: समग्रान्‌,इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्णने उन श्रेष्ठ राजाओंको सब ओर भागते देखा और इस बातपर भी लक्ष्य किया कि अर्जुन तो कोमलताके साथ युद्ध कर रहा है और भीष्म इस संग्राममें अधिकाधिक प्रचण्ड होते जा रहे हैं। यह सब देखकर सम्पूर्ण यदुकुलका भरण- पोषण करनेवाले महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण सहन न कर सके। उन्होंने समस्त कौरवोंको सब ओरसे आक्रमण करते देख यशस्वी वीर सात्यकिकी प्रशंसा करते हुए कहा --

قال سنجيا: عندئذٍ تكلّم ذلك الربّ العظيم النفس—حامي سلالة فِرِشْني–داشارها بأسرها—إذ لم يَعُد يطيق ما رأى، فخاطبَ مُثنياً على «شَيْنَيَة» (ساتياكي) حين أبصر الكورُو يندفعون دفعةً واحدةً كالسيل. وتُبرز هذه الأبيات إلحاح كريشنا الأخلاقي: فإذا غُلِب أهل الحق واشتدّت ضراوة القتال، انقلبت المهابة إلى تدخّلٍ حاسمٍ صوناً للدارما وحمايةً للحلفاء.

Verse 84

ये यान्ति ते यान्तु शिनिप्रवीर येडपि स्थिता: सात्वत ते5पि यान्तु । भीष्म रथात्‌ पश्य निपात्यमानं द्रोणं च संख्ये सगणं मयाद्य,'शिनिवंशके प्रमुख वीर! सात्वतरत्न! जो भाग रहे हैं, वे भाग जायँ। जो खड़े हैं, वे भी चले जायाँ। (मैं इन लोगोंका भरोसा नहीं करता।) तुम देखो, मैं अभी संग्राम भूमिमें सहायकगणोंके साथ भीष्म और द्रोणाचार्यको रथसे मार गिराता हूँ

قال سنجيا: «يا بطلَ سلالةِ شِني الأوّل، يا جوهرةَ الساتفَتة—فليذهبِ الفارّون؛ بل حتى الثابتون فليذهبوا كذلك. (إني لا أضع ثقةً في هؤلاء الرجال.) انظر: اليوم، في لُجّة القتال، سأقذفُ بهيشما عن عربته، وكذلك درونا—مع أعوانه وجنده المساند.»

Verse 85

न मे रथी सात्वत कौरवाणां क्रुद्धस्य मुच्येत रणेड्द्य कश्चित्‌ । तस्मादहं गृहा रथाड्रमुग्रं प्राणं हरिष्यामि महाव्रतस्य,'सात्वत वीर! आज कौरव-सेनाका कोई भी रथी क्रोधमें भरे हुए मुझ कृष्णके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता। मैं अपना भयंकर चक्र लेकर महान्‌ व्रतधारी भीष्मके प्राण हर लूँगा

قال سنجيا: «يا بطلَ الساتفَتة! اليوم، حين أكون أنا (كريشنا) متّقداً بالغضب، لن يفلت منّي حيّاً على ساحة القتال أيُّ مقاتلٍ على عربةٍ من الكورُو. لذلك، آخذُ السلاح الأشدَّ رهبةً في عربتي—الچَكرا—وأزهقُ روحَ صاحب النذر العظيم (بهيشما).»

Verse 86

निहत्य भीष्मं सगणं तथा55जौ द्रोणं च शैनेय रथप्रवीरौ । प्रीतिं करिष्यामि धनंजयस्य राज्ञक्ष॒ भीमस्य तथाश्रिनोक्ष,'सात्यके! सहायकगणोंसहित भीष्म और द्रोण--इन दोनों वीर महारथियोंको युद्धमें मारकर मैं अर्जुन, राजा युधिष्ठिर, भीमसेन तथा नकुल-सहदेवको प्रसन्न करूँगा

قال سنجيا: «يا ساتياكي (شَيْنَيَة)! إذا قتلتُ في هذا القتال بهيشما مع أعوانه، وكذلك درونا—وهما من عظماء المَهارَثَة—فإني سأُدخل السرور على دهننجايا (أرجونا)، والملك يودهشثيرا، وبهيمسينا، وكذلك ناكولا وسهاديفا.»

Verse 87

निहत्य सर्वान्‌ धृतराष्ट्रपुत्रां- स्तत्पक्षिणो ये च नरेन्द्रमुख्या: । राज्येन राजानमजातश््रुं सम्पादयिष्याम्यहमद्य हृष्ट:

قال سنجيا: «بعد أن أقتلَ جميعَ أبناءِ دِهرتَراشترا، وأولئك الملوكَ الأعلام الذين يقفون في صفّهم، فسأؤمّن اليوم—مسروراً—المملكةَ للملك أجاتاشاترو.»

Verse 88

“धृतराष्ट्रके सभी पुत्रों तथा उसके पक्षमें आये हुए सभी श्रेष्ठ नरेशोंको मारकर मैं प्रसन्नतापूर्वक आज अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरको राज्यसे सम्पन्न कर दूँगा” ।। संजय उवाच (इतीदमुक्त्वा स महानुभाव: सस्मार चक्र निशितं पुराणम्‌ | सुदर्शन चिन्तितमात्रमेव तस्याग्रहस्तं स्वयमारुरोह ।।) संजय कहते हैं--ऐसा कहकर महानुभाव श्रीकृष्णने अपने पुरातन एवं तीक्षण आयुध सुदर्शनचक्रका स्मरण किया। उनके चिन्तन करनेमात्रसे ही वह स्वयं उनके हाथके अग्रभागमें प्रस्तुत हो गया। ततः सुनाभं वसुदेवपुत्र: सूर्यप्रभं वज़समप्रभावम्‌ । क्षुरान्तमुद्यम्य भुजेन चक्र रथादवप्लुत्य विसृज्य वाहान्‌,उस चक्रकी नाभि बड़ी सुन्दर थी। उसका प्रकाश सूर्यके समान और प्रभाव वज्रके तुल्य था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे। वसुदेवनन्दन महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण घोड़ोंकी लगाम छोड़कर हाथमें उस चक्रको घुमाते हुए रथसे कूद पड़े और जिस प्रकार सिंह बढ़े हुए घमंडवाले मदान्ध एवं उन्मत्त गजराजको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर झपटे, उसी प्रकार वे भी अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाते हुए युद्धस्थलमें भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े

قال سَنجايا: «بعد أن أقتل جميع أبناء دِهرتَراشْترا وكلَّ الملوك الأجلّاء الذين انضمّوا إلى جانبه، فسأُقيمُ بسرورٍ في هذا اليوم نفسه الملكَ يُدْهِشْتِهيرا—أجاتَشَترو—ثابتًا في السيادة». ولمّا قال ذلك، تذكّر شري كريشنا العظيمُ النفس سلاحَه العتيقَ الحادَّ كحدِّ الموسى: قرصَ سُودَرْشَنَة. وما إن خطر بباله حتى ظهر من تلقاء نفسه على مقدَّم كفّه. ثم رفع ابنُ فاسوديفا ذلك القرص—ومحورُه بديعُ الصنع، وشعاعُه كالشمس، وبأسُه كالصاعقة، وحافتُه قاطعةٌ كالنصل. فأرخى كريشنا زمام الخيل وقفز من العربة، وأخذ يُدوِّر القرص بذراعه ثم اندفع نحو بِهيشما عبر ساحة القتال، حتى ارتجّت الأرضُ من وقع قدميه—كأسدٍ يثبُ ليصرع سيّدَ الفيلة، سكرانَ الهياج، متضخّمَ الكِبر في غمرة المعركة.

Verse 89

संकम्पयन्‌ गां चरणैर्महात्मा वेगेन कृष्ण: प्रससार भीष्मम्‌ । मदान्धमाजौ समुदीर्णदर्प सिंहो जिघांसन्निव वारणेन्द्रम्‌ू,उस चक्रकी नाभि बड़ी सुन्दर थी। उसका प्रकाश सूर्यके समान और प्रभाव वज्रके तुल्य था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे। वसुदेवनन्दन महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण घोड़ोंकी लगाम छोड़कर हाथमें उस चक्रको घुमाते हुए रथसे कूद पड़े और जिस प्रकार सिंह बढ़े हुए घमंडवाले मदान्ध एवं उन्मत्त गजराजको मार डालनेकी इच्छासे उसकी ओर झपटे, उसी प्रकार वे भी अपने पैरोंकी धमकसे पृथ्वीको कँपाते हुए युद्धस्थलमें भीष्मकी ओर बड़े वेगसे दौड़े

قال سَنجايا: إن كريشنا العظيمَ النفس، وهو يُرجِف الأرضَ تحت قدميه، اندفع نحو بِهيشما اندفاعًا هائل السرعة. وكأسدٍ يريد قتلَ سيّدِ الفيلة، سكرانَ الهياج، متورّمَ الكِبر في لُجّة القتال—هكذا اندفع إلى الأمام.

Verse 90

सो$भिद्रवन्‌ भीष्ममनीकम ध्ये क्रुद्धों महेन्द्रावरज: प्रमाथी । व्यालम्बिपीतान्तपटकश्षुकाशे घनो यथा खे तडितावनद्ध:,देवराज इन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण समस्त शत्रुओंको मथ डालनेकी शक्ति रखते थे। वे उस सेनाके मध्यभागमें कुपित होकर जिस समय भीष्मकी ओर झपटे, उस समय उनके श्याम विग्रहपर लटककर हवाके वेगसे फहराता हुआ पीताम्बरका छोर उन्हें ऐसी शोभा दे रहा था, मानो आकाशगमें बिजलीसे आवेष्टित हुआ श्याम मेघ सुशोभित हो रहा हो

قال سَنجايا: ثم اندفع كريشنا—أخو إندرا الأصغر، القاهرُ الجبّار للأعداء—غاضبًا نحو بِهيشما، مخترقًا قلبَ الجيش. وبينما كان يهاجم، كان طرفُ ثوبه الأصفر (بيتا أمبارا) يتدلّى ويرفرف مع الريح على هيئته الداكنة، فيكسوه بهاءً كبهاء سحابةٍ سوداء في السماء قد لُفَّت بالبرق.

Verse 91

सुदर्शन चास्य रराज शौरे- स्तच्चक्रपगद्म॑ सुभुजोरुनालम्‌ । यथादिपद्म तरुणार्कवर्ण रराज नारायणनाभिजातम्‌,श्रीकृष्णकी सुन्दर भुजारूपी विशाल नालसे सुशोभित वह सुदर्शनचक्र कमलके समान शोभा पा रहा था, मानो भगवान्‌ नारायणके नाभिसे प्रकट हुआ प्रात:कालीन सूर्यके समान कान्तिवाला आदिकमल प्रकाशित हो रहा हो

قال سَنجايا: وعلى شَوري (كريشنا) لمعَ سُودَرْشَنَة لمعانًا باهرًا—كأن قرصه زهرةُ لوتسٍ ذاتُ ساقٍ قويٍّ سامق، وساقُها إنما هو ذراعاه الجميلتان. وكان يتلألأ كزهرة اللوتس الأولى، المولودة من سُرّة نارايَنا، مشعّةً بلون شمس الصباح الفتيّة.

Verse 92

तत्‌ कृष्णकोपोदयसूर्यबुद्धं क्षुरान्ततीक्ष्णाग्रसुजातपत्रम्‌ । तस्यैव देहोरुसर: प्ररूढं रराज नारायणबाहुनालम्‌,श्रीकृष्णके क्रोधरूपी सूर्योदयसे वह कमल विकसित हुआ था। उसके किनारे छूरेके समान तीक्ष्ण थे। वे ही मानो उसके सुन्दर दल थे। भगवानके श्रीविग्रहरूपी महान्‌ सरोवरमें ही वह बढ़ा हुआ था और नारायणस्वरूप श्रीकृष्णकी बाहुरूपी नाल उसकी शोभा बढ़ा रही थी

قال سَنجايا: «تلك الزهرة—وقد أيقظها شروقُ شمسِ غضبِ كريشنا—انفتحت، ببتلاتٍ حوافُّها حادّةٌ كحدِّ الموسى. ولم تنمُ إلا في البحيرة الواسعة التي هي جسده الإلهي نفسه، وزاد جمالَها ساقٌ هو ذراعُ نارايَنا—أي ذراعُ شري كريشنا ذاته.»

Verse 93

तमात्तचक्रं प्रणदन्तमुच्चैः क्रुद्धं महेन्द्रावरजं समीक्ष्य । सर्वाणि भूतानि भुशं विनेदु: क्षयं कुरूणामिव चिन्तयित्वा,महेन्द्रके छोटे भाई श्रीकृष्ण कुपित हो हाथमें चक्र उठाये बड़े चोरसे गरज रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर कौरवोंके संहारका विचार करके सभी प्राणी हाहाकार करने लगे

قال سانجيا: لما رأى كريشنا—أخا إندرا الأصغر—وقد استبدّ به الغضب، قابضًا على قرصه ومزمجرًا بصوت عالٍ، صاحت الكائنات كلها فزعًا شديدًا، كأنها تستشرف فناء الكورو.

Verse 94

स वासुदेव: प्रगृहीतचक्र: संवर्तयिष्यन्निव सर्वलोकम्‌ | अभ्युत्पतल्‍लोकगुरुर्ब भासे भूतानि थक्ष्यन्निव धूमकेतु:,वे जगदगुरु वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण हाथमें चक्र ले मानो सम्पूर्ण जगत्‌का संहार करनेके लिये उद्यत थे और समस्त प्राणियोंको जलाकर भस्म कर डालनेके लिये उठी हुई प्रलयाग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे

قال سانجيا: بدا فاسوديفا، والقرص مرفوع في يده، كأنه سيطوي العالم كله ويذيبه. وإذ اندفع إلى الأمام، تلألأ معلّم العوالم كالمذنب، كأنه على وشك أن يحرق جميع الكائنات حتى تصير رمادًا.

Verse 95

तमाद्रवन्तं प्रगृहीतचक्रं दृष्टवा देवं शान्तनवस्तदानीम्‌ | असम्भ्रमं तद्‌ विचकर्ष दोर्भ्या महाभनुर्गाण्डिवतुल्यघोषम्‌,भगवानको चक्र लिये अपनी ओर वेगपूर्वक आते देख शान्तनुनन्दन भीष्म उस समय तनिक भी भय अथवा घबराहटका अनुभव न करते हुए दोनों हाथोंसे गाण्डीव धनुषके समान गम्भीर घोष करनेवाले अपने महान्‌ धनुषको खींचने लगे

قال سانجيا: لما رأى الإله مندفعًا نحوه والقرص مرفوع، لم يشعر بهيشما ابن شانتانو في تلك اللحظة بخوف ولا اضطراب. بل بهدوء شدّ بقوّتي ذراعيه قوسه العظيم، ذي الدويّ العميق كدويّ غانديفا.

Verse 96

उवाच भीष्मस्तमनन्तपौरुषं गोविन्दमाजावविमूढचेता: । एह्ोहि देवेश जगन्निवास नमोस्तु ते माधव चक्रपाणे,उस समय युद्ध स्थलमें भीष्मके चित्तमें तनिक भी मोह नहीं था। वे अनन्त पुरुषार्थशाली भगवान्‌ श्रीकृष्णका आह्वान करते हुए बोले--“आइये, आइये, देवेश्वर! जगन्निवास! आपको नमस्कार है। हाथमें चक्र लिये आये हुए माधव! सबको शरण देनेवाले लोकनाथ! आज युद्धभूमिमें बलपूर्वक इस उत्तम रथसे मुझे मार गिराइये

قال سانجيا: عندئذٍ خاطب بهيشما، وعقله غير مُلبَّسٍ حتى في ساحة القتال، جوفيندا ذا البأس الذي لا حدّ له، وصاح: «تعالَ، تعالَ، يا ربّ الآلهة، يا مسكن العالم! لك السجود، يا مادهافا، يا حامل القرص!»

Verse 97

प्रसहम मां पातय लोकनाथ रथोत्तमात्‌ सर्वशरण्य संख्ये,उस समय युद्ध स्थलमें भीष्मके चित्तमें तनिक भी मोह नहीं था। वे अनन्त पुरुषार्थशाली भगवान्‌ श्रीकृष्णका आह्वान करते हुए बोले--“आइये, आइये, देवेश्वर! जगन्निवास! आपको नमस्कार है। हाथमें चक्र लिये आये हुए माधव! सबको शरण देनेवाले लोकनाथ! आज युद्धभूमिमें बलपूर्वक इस उत्तम रथसे मुझे मार गिराइये

«يا لوكناثا، يا ملجأ الجميع، اصرعني قسرًا من هذه العربة الفاخرة في قلب المعركة!»

Verse 98

त्वया हतस्यापि ममाद्य कृष्ण श्रेय: परस्मिन्निह चैव लोके । सम्भावितो<स्म्यन्धकवृष्णिनाथ लोकैस्त्रिभिवीर तवाभियानात्‌,“श्रीकृष्ण! आज आपके हाथसे यदि मैं मारा जाऊँगा तो इहलोक और परलोकमें भी मेरा कल्याण होगा। अन्धक और वृष्णिकुलकी रक्षा करनेवाले वीर! आपके इस आक्रमणसे तीनों लोकोंमें मेरा गौरव बढ़ गया”

قال سنجيا: «يا كريشنا، حتى لو قُتلتُ اليوم على يديك لكان في ذلك خيرٌ لي في هذه الدنيا وفي الآخرة. يا بطلَ الأندهاكا والڤرِشني، يا سيدَهم وحاميهم، إن مجرد تقدّمك نحوي قد زاد شرفي ورفع ذكري في العوالم الثلاثة».

Verse 99

रथादवप्लुत्य ततस्त्वरावान्‌ पार्थोप्यनुद्र॒ुत्य यदुप्रवीरम्‌ । जग्राह पीनोत्तमलम्बबाहुं बा्वदोर्हरिं व्यायतपीनबाहु:,मोटी, लंबी और उत्तम भुजाओंवाले यदुकुलके श्रेष्ठ वीर भगवान्‌ श्रीकृष्णको आगे बढ़ते देख अर्जुन भी बड़ी उतावलीके साथ रथसे कूदकर उनके पीछे दौड़े और निकट जाकर भगवान्‌की दोनों बाहें पकड़ लीं। अर्जुनकी भुजाएँ भी मोटी और विशाल थीं

قال سنجيا: ثم إن بارثا (أرجونا) قفز من العربة في عَجَلةٍ شديدة، واندفع وراء بطل اليادو الأوّل. ولما دنا، أمسك أرجونا—وذراعاه عريضتان قويتان—بهاري (شري كريشنا) بكلتا ذراعيه، وكريشنا يتقدّم بذراعين طويلتين شديدتين كريمتي الشأن.

Verse 100

निगृहमाणश्न तदा5<दिदेवो भृशं सरोष: किल चात्मयोगी । आदाय वेगेन जगाम विष्णु- जिंष्णुं महावात इवैकवृक्षम्‌,आदिदेव आत्मयोगी भगवान्‌ श्रीकृष्ण बहुत रोषमें भरे हुए थे। वे अर्जुनके पकड़नेपर भी रुक न सके। जैसे आँधी किसी वृक्षको खींचे लिये चली जाय, उसी प्रकार वे भगवान्‌ विष्णु अर्जुनको लिये हुए ही बड़े वेगसे आगे बढ़ने लगे

قال سنجيا: ومع أنه كان يُكفّ حينئذٍ، فإن الربّ الأزلي—المتمكّن من يوغا الباطن—كان حقًّا مستعرَ الغضب. فأمسك ڤِشنو بجِشنو (أرجونا) واندفع إلى الأمام اندفاعًا عظيمًا، كما تحمل الريح العاتية شجرةً منفردة.

Verse 101

पार्थस्तु विष्टभ्य बलेन पादौ भीष्मान्तिकं तूर्णमभिद्रवन्तम्‌ । बलान्निजग्राह हरिं किरीटी पदे5थ राजन्‌ दशमे कथज्चित्‌,राजन! तब किरीटथारी अर्जुनने भीष्मके निकट बड़े वेगसे जाते हुए श्रीहरिके चरणोंको बलपूर्वक पकड़ लिया और किसी प्रकार दसवें कदमपर पहुँचते-पहुँचते उन्हें रोका

قال سنجيا: عندئذٍ ثبّت بارثا (أرجونا) قدميه بقوة، وأمسك هاري (كريشنا) من قدميه وهو يندفع مسرعًا نحو بهيشما. وبمحض القوة كبحه أرجونا ذو التاج، وتمكّن على نحوٍ ما من إيقافه قبل أن يخطو الخطوة العاشرة، أيها الملك.

Verse 102

अवस्थितं च प्रणिपत्य कृष्णं प्रीतो$र्जुन: काउ्चनचित्रमाली । उवाच कोपं प्रतिसंहरेति गतिर्भवान्‌ केशव पाण्डवानाम्‌,जब श्रीकृष्ण खड़े हो गये, तब सुवर्णका विचित्र हार पहने हुए अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न हो उनके चरणोंमें प्रणाम करके कहा--“केशव! आप अपना क्रोध रोकिये। प्रभो! आप ही पाण्डवोंके परम आश्रय हैं

فلما نهض كريشنا ووقف، انحنى أرجونا—وعليه إكليلٌ ذهبيّ بديع متنوّع—فسجد عند قدميه فرِحًا وقال: «يا كيشافا، اكبح غضبك. يا ربّ، أنت الملجأ والاعتماد الأوثق لآل باندافا».

Verse 103

न हास्यते कर्म यथाप्रतिज्ञं पुत्रै: शपे केशव सोदरैश्न । अन्तं करिष्यामि यथा कुरूणां त्वयाहमिन्द्रानुज सम्प्रयुक्त:,“केशव! अब मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार कर्तव्यका पालन करूँगा, उसका त्याग कभी नहीं करूँगा। यह बात मैं अपने पुत्रों और भाइयोंकी शपथ खाकर कहता हूँ। उपेन्द्र! आपकी आज्ञा मिलनेपर मैं समस्त कौरवोंका अन्त कर डालूँगा”

قال سنجيا: «يا كيشافا، لن أتخلى عن الواجب الذي نذرتُ القيام به. أقسم بأبنائي وبإخوتي. يا إندرانوچا (أوبندرا)، متى ما حرّكتني بإذنك—ومتى ما نلتُ تصديقك—فسأُبلغ الكاورافا نهايتهم».

Verse 104

ततः प्रतिज्ञां समयं च तस्य जनार्दन: प्रीतमना निशम्य । स्थित: प्रिये कौरवसत्तमस्य रथं सचक्र: पुनरारुरोह,अर्जुनकी यह प्रतिज्ञा और कर्तव्य-पालनका यह निश्चय सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णका मन प्रसन्न हो गया। वे कुरुश्रेष्ठ अर्जुनका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो पुनः चक्र लिये रथपर जा बैठे

ثم إن جناردانا (كريشنا)، لما سمع نذر أرجونا وعزمه الراسخ على الوفاء بالواجب الذي تعهّد به، انشرح قلبه. وإرادةً منه أن يفعل ما يسرّ خيرَ آل كورو (أرجونا)، صعد إلى العربة مرة أخرى، قابضًا على العجلة—مستعدًا لنصرة الدارما وتثبيت عهد مُحبّه.

Verse 105

स तानभीषून्‌ पुनराददान: प्रगृह्द शड्खं द्विषतां निहन्ता । निनादयामास ततो दिशश्व स पाउ्चजन्यस्य रवेण शौरि:,शत्रुओंका संहार करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णने पुनः घोड़ोंकी बागडोर सँभाली और पांचजन्य शंख लेकर उसकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित कर दिया

وأخذ كريشنا، قاهر الأعداء، زمام الخيل من جديد، وقبض على صدفة «بانتشاجانيا». ثم نفخها شوري، فارتجّت الجهات كلها بدويّها.

Verse 106

व्याविद्धनिष्काड्गदकुण्डलं त॑ रजोविकीर्णाञ्चितपदमनेत्रम्‌ । विशुद्धदंष्ट॑ प्रगृहीतशड्खं विचुक्रुशु: प्रेक्ष्य कुरुप्रवीरा:,उस समय उनके कण्ठका हार, भुजाओंके बाजू-बन्द और कानोंके कुण्डल हिलने लगे थे। उनके कमलके समान सुन्दर नेत्रोंपर सेनासे उठी हुई धूल बिखरी थी। उनकी दन्तावली शुद्ध एवं स्वच्छ थी और उन्होंने अपने हाथमें शंख ले रखा था। उस अवस्थामें श्रीकृष्णको देखकर कौरवपक्षके प्रमुख वीर कोलाहल कर उठे

قال سنجيا: لما رأوه—وعقده وأساوره وأقراطه تهتز مع الحركة؛ وعيناه كزهرتي لوتس قد نثر عليهما غبارٌ أثارته الجموع؛ وأسنانُه ناصعةٌ صافية؛ والصدفة ممسوكةٌ بإحكام في يده—انفجر أبطال جيش كورو الأوائل في جلبةٍ مدوّية.

Verse 107

मृदड़भेरीपणवप्रणादा नेमिस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्व । ससिंहनादाश्न बभूवुरुग्रा: सर्वेष्वनीकेषु ततः कुरूणाम्‌,तत्पश्चात्‌ कौरवोंके सम्पूर्ण सैन्यदलोंमें मृदंग, भेरी पणव तथा दुन्दुभिकी ध्वनि होने लगी। रथके पहियोंकी घरघराहट सुनायी देने लगी। वे सभी शब्द वीरोंके सिंहनादसे मिलकर अत्यन्त उग्र प्रतीत हो रहे थे

قال سنجيا: ثم في جميع كتائب جيش كورو ارتفعت أصواتٌ عاتية—دويّ المِردنغا، والبهيري، والپَنَڤا، ورنين طبول الدُندُبي، مع قعقعة عجلات العربات. وحين امتزجت بزئير الأبطال كزئير الأسود، تضخّمت إلى جلبةٍ مرعبة.

Verse 108

गाण्डीवधोष: स्तनयित्नुकल्पो जगाम पार्थस्य नभो दिशक्ष । जग्मुश्न॒ बाणा विमला: प्रसन्ना: सर्वा दिश: पाण्डवचापमुक्ता:,अर्जुनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष मेघकी गर्जनाके समान आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल गया तथा उनके धनुषके छूटे हुए निर्मल एवं स्वच्छ बाण सम्पूर्ण दिशाओंमें बरसने लगे

قال سنجيا: إنَّ دويَّ «غانديفا» قوسِ بارثا—كزئير سحابةٍ ممطرة—انتشر في السماء وعبر الجهات الأربع. ثم انطلقت السهام الصافية اللامعة التي أطلقها الباندفي من قوسه، فملأت كل ناحية، إذ كان زخم المعركة يميل إلى فعلٍ حاسم.

Verse 109

त॑ कौरवाणामधिपो जवेन भीष्मेण भूरिश्रवसा च सार्धथम्‌ | अभ्युद्ययावुद्यतबाणपाणि: कक्ष दिधक्षन्निव धूमकेतु:,उस समय कौरवराज दुर्योधन हाथमें धनुष-बाण लिये बड़े वेगसे अर्जुनके सामने आया, मानो घास-फूँसको जलानेके लिये प्रज्वलित आग बढ़ती चली आ रही हो। भीष्म और भूरिश्रवाने भी दुर्योधनका साथ दिया

قال سنجيا: عندئذٍ تقدّم سيّد الكورو، دوريوذَنَة، مسرعًا نحو أرجونا وسهامه مرفوعة في يده، ومعه بهيشما وبھوريشرافاس—كشعلةٍ متّقدة تندفع إلى الأمام كأنها تريد أن تُحرق غيضةً بأسرها.

Verse 110

अथार्जुनाय प्रजिघाय भल्लान्‌ भूरिश्रवा: सप्त सुवर्णपुड्खान्‌ । दुर्योधनस्तोमरमुग्रवेगं शल्यो गदां शान्तनवश्व शक्तिम्‌,तदनन्तर भूरिश्रवाने सोनेके पंखसे युक्त सात भल्ल अर्जुनपर चलाये। दुर्योधनने भयंकर वेगशाली तोमरका प्रहार किया। शल्यने गदा और शान्तनुनन्दन भीष्मने शक्ति चलायी

قال سنجيا: ثم قذف بھوريشرافا على أرجونا سبعة سهامٍ من نوع «بهلّا»، مزوّدة بريشٍ من ذهب. وألقى دوريوذَنَة «تومارا» (رمحًا مقذوفًا) بسرعةٍ مهولة؛ وأطلق شاليا هراوةً؛ ورمى بهيشما، ابن شانتانو، «شَكتي» (رمحًا).

Verse 111

स सप्तभि: सप्त शरप्रवेकान्‌ संवार्य भूरिश्रवसा विसृष्टान्‌ । शितेन दुर्योधनबाहुमुक्तं क्षुरेण तत्‌ तोमरमुन्ममाथ,अर्जुनने सात बाणोंसे भूरिश्रवाके छोड़े हुए सातों भललोंको काटकर तीखे छूरेसे दुर्योधनकी भुजाओंसे मुक्त हुए उस तोमरको भी नष्ट कर दिया

قال سنجيا: إن أرجونا، بسبعة سهام، صدَّ وقطع السبعة المقذوفات المختارة التي أطلقها بھوريشرافاس؛ وبسهمٍ حادٍّ ذي نصلٍ كالموسى (كشورا) حطّم كذلك ذلك التومارا الذي قُذف من ذراع دوريوذَنَة.

Verse 112

ततः शुभामापततीं स शर््तित विद्युत्प्रभां शान्तनवेन मुक्ताम्‌ । गदां च मद्राधिपबाहुमुक्तां द्वाभ्यां शराभ्यां निचकर्त वीर:,तत्पश्चात्‌ वीर अर्जुनने शान्तनुनन्दन भीष्मकी छोड़ी हुई बिजलीके समान चमकीली और शोभामयी शक्तिको तथा मद्रराज शल्यकी भुजाओंसे मुक्त हुई गदाको भी दो बाणोंसे काट डाला

قال سنجيا: ثم إن البطل قطع بسهمين الرمحَ «شَكتي» الميمون اللامع كالبَرق، الذي قذفه بهيشما ابن شانتانو وهو يندفع نحوه؛ وقطع كذلك بسهمين الهراوة التي أطلقها شاليا، سيّد مادرا، من ذراعيه.

Verse 113

ततो भुजाभ्यां बलवद्‌ विकृष्य चित्र धनुर्गाण्डिवमप्रमेयम्‌ । माहेन्द्रमस्त्रं विधिवत्‌ सुघोरं प्रादुश्षकाराद्भुतमन्तरिक्षे,तदनन्तर अप्रमेय शक्तिशाली विचित्र गाण्डीव धनुषको दोनों भुजाओंसे बलपूर्वक खींचकर अर्जुनने विधिपूर्वक अत्यन्त भयंकर माहेन्द्र अस्त्रको प्रकट किया। वह अदभुत अस्त्र अन्तरिक्षमें चमक उठा

قال سانجيا: ثم إن أرجونا شدَّ بقوةٍ عظيمةٍ بكلتا ذراعيه القوسَ العجيبَ الذي لا يُقاس، «غانْديفا»، وأظهر على وجهٍ مشروعٍ وفق سنن القتال السلاحَ «ماهيندرا» بالغَ الهول. فتلألأ ذلك المقذوف العجيب في جوف السماء.

Verse 114

तेनोत्तमास्त्रेण ततो महात्मा सर्वाण्यनीकानि महाथनुष्मान्‌ | शरौघजालैरविंमलाग्निवर्ण- निवारयामास किरीटमाली,फिर किरीटधारी महामना महाधनुर्धर अर्जुनने उस उत्तम अस्त्रद्वारा निर्मल एवं अग्निके समान प्रज्वलित बाणोंका जाल-सा बिछाकर कौरवोंके समस्त सैनिकोंको आगे बढ़नेसे रोक दिया

ثم إن عظيمَ النفس، رامِيَ القوسِ الجبار—أرجونا لابسَ التاج—بذلك السلاحِ الأسمى بسط سيلًا من السهام كالشبكة، صافيًا متوهجًا كالنار، فصدَّ به جميعَ صفوفِ الكوروَفَة عن التقدّم.

Verse 115

शिलीमुखा: पार्थधनु:प्रमुक्ता रथान्‌ ध्वजाग्राणि धनूंषि बाहून्‌ । निकृत्य देहान्‌ विविशु: परेषां नरेन्द्रनागेन्द्रतुरज़्माणाम्‌,अर्जुनके धनुषसे छूटे हुए बाण शत्रुओंके रथ, ध्वजाग्र, धनुष और बाहु काटकर नरेशों, गजराजों तथा घोड़ोंके शरीरोंमें घुसने लगे

قال سانجيا: إن السهامَ الحادّة المنطلقة من قوسِ بارثا قطعتِ العرباتِ ورؤوسَ الراياتِ والأقواسَ والأذرع؛ ثم بعد أن بترتها اندفعت لتغوص في أجسادِ ملوكِ العدوّ، وفيلةِ السادة، والخيول.

Verse 116

ततो दिश: सो<नुदिशकश्न पार्थ: शरै: सुधारै: समरे वितत्य । गाण्डीवशब्देन मनांसि तेषां किरीटमाली व्यथयाञज्चकार,तदनन्तर तीखी धारवाले बाणोंसे युद्धस्थलमें सम्पूर्ण दिशाओं और कोणोंको आच्छादित करके किरीटधारी अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकारसे कौरवोंके मनमें भारी व्यथा उत्पन्न कर दी

قال سانجيا: ثم إن بارثا بسط سهامَه الحادّة في ساحة القتال، فغطّت الجهات كلَّها وما بينَها. وبطنينِ قوسِ «غانْديفا» المدوّي ألقى صاحبُ التاجِ كربًا شديدًا في قلوبِ أولئك الأعداء.

Verse 117

तस्मिंस्तथा घोरतमे प्रवृत्ते शड्खस्वना दुन्दुभिनिःस्वनाश्न । अन्तर्तिता गाण्डिवनि:स्वनेन बभूवुरुग्राश्चरथप्रणादा:,इस प्रकारके उस अत्यन्त भयंकर युद्धमें शंख-ध्वनि, दुन्दुभि-ध्वनि तथा घोड़ों और रथके पहियोंके भयंकर शब्द गाण्डीव धनुषकी टंकारके सामने दब गये

وفي ذلك القتالِ بالغِ الهول، خفتت أصواتُ الأصدافِ وأصواتُ طبولِ الدُّندُبي، وضجيجُ الخيلِ وعجلاتِ العرباتِ العنيف، إذ غلبها طنينُ قوسِ «غانْديفا» المدوّي.

Verse 118

गाण्डीवशब्दं तमथो विदित्वा विराटराजप्रमुखा: प्रवीरा: । पाज्चालराजो द्रुपदश्न वीर- स्‍्तं देशमाजग्मुरदीनसत्त्वा:,तब उस गाण्डीवके शब्दको पहचानकर राजा विराट आदि प्रमुख वीर और वीरवर पांचालराज ट्रपद--ये सभी उदारचित्त नरेश उस स्थानपर आ गये

قال سنجيا: لما عرفوا ذلك الصوت أنه رنين وتر قوس «غانديفا»، أقبل أبطال القوم الأوائل يتقدمهم الملك فيرَاطا، ومعهم دروبادا ملك البانچالا، جميعهم ثابتو العزم غير هيّابين، فقدموا من فورهم إلى ذلك الموضع بعينه.

Verse 119

सर्वाणि सैन्यानि तु तावकानि यतो यतो गाण्डिवज: प्रणाद: । ततस्तत: संनतिमेव जग्मु- न त॑ प्रतीपोडभिससार कश्चित्‌,जहाँ-जहाँ गाण्डीव धनुषकी टंकार होती, वहाँ-वहाँ आपके सारे सैनिक मस्तक टेक देते थे। कोई भी उनके प्रतिकूल आक्रमण नहीं करता था

قال سنجيا: حيثما دوّى رنين قوس «غانديفا» كالرعد، كانت جموع جيشك هناك تطأطئ الرؤوس خضوعًا. ولم يجرؤ أحد من أي ناحية أن يندفع عليه بهجمة معادية.

Verse 120

तस्मिन्‌ सुघोरे नृपसम्प्रहारे हताः प्रवीरा: सरथाश्चसूता: । गजाश्न नाराचनिपाततप्ता महापताका: शुभरुक्मकक्ष्या:,राजाओंके उस भयानक संग्राममें रथ, घोड़े और सारथिसहित बड़े-बड़े वीर मारे गये। सुन्दर सुनहरे रस्सोंसे कसे हुए, बड़ी-बड़ी पताकाओंवाले हाथी नाराचोंकी मारसे पीड़ित हो शक्ति और चेतना खोकर सहसा धराशायी हो गये। कुन्तीकुमार अर्जुनके भयंकर वेगवाले तीखे एवं पंखयुक्त निर्मल भल्लोंसे गहरी चोट पड़नेपर कवच और शरीर दोनोंके विदीर्ण हो जानेसे कौरव सैनिक सहसा प्राणशून्य होकर गिर जाते थे

قال سنجيا: في ذلك الاصطدام الرهيب بين الملوك قُتل كثير من أبرع المحاربين—مع مركباتهم وسُوّاقها. وكانت الفيلة ذات الرايات العظيمة والمشدودة بأحزمة ذهبية بهية تُحرقها السهام الهابطة؛ فإذا بها تفقد القوة والوعي وتخرّ فجأة على الأرض.

Verse 121

परीतसतत्त्वा: सहसा निपेतु: किरीटिना भिन्नतनुत्रकाया: । दृढं हता: पत्रिभिरुग्रवेगै: पार्थेन भल्लैविमलै: शिताग्रै:,राजाओंके उस भयानक संग्राममें रथ, घोड़े और सारथिसहित बड़े-बड़े वीर मारे गये। सुन्दर सुनहरे रस्सोंसे कसे हुए, बड़ी-बड़ी पताकाओंवाले हाथी नाराचोंकी मारसे पीड़ित हो शक्ति और चेतना खोकर सहसा धराशायी हो गये। कुन्तीकुमार अर्जुनके भयंकर वेगवाले तीखे एवं पंखयुक्त निर्मल भल्लोंसे गहरी चोट पड़नेपर कवच और शरीर दोनोंके विदीर्ण हो जानेसे कौरव सैनिक सहसा प्राणशून्य होकर गिर जाते थे

قال سنجيا: سقط المحاربون دفعة واحدة—وقد شُقّت دروعهم وأجسادهم على يد أرجونا ذي التاج. قُتلوا قتلًا محكمًا بسهام «بهلّا» الطاهرة الحادّة الرؤوس، المجنّحة، المنطلقة بسرعة رهيبة من بارثا، فانهاروا في ذلك الاصطدام المروّع.

Verse 122

निकृत्तयन्त्रा निहतेन्द्रकीला ध्वजा महान्तो ध्वजिनीमुखेषु । पदातिसड्घाश्न रथाश्न संख्ये हयाश्न नागाश्व धनंजयेन,युद्धके मुहानेपर जिनके यन्त्र कट गये और इन्द्रकील नष्ट हो गये थे, ऐसे बड़े-बड़े ध्वज छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे। उस संग्राममें अर्जुनके बाणोंसे घायल पैदलोंके समूह, रथी, घोड़े और हाथी शीघ्र ही सत्त्वशून्य होकर अपने अंगोंको पकड़े हुए पृथ्वीपर गिरने लगे। राजन्‌! उस महान ऐन्द्रास्त्रसे समरभूमिमें सभी सैनिकोंके शरीर और कवच छिज्न- भिन्न हो गये

قال سنجيا: في مقدمة الصفوف سقطت الرايات العظيمة—وقد قُطعت حبالها وتكسّر «إندرا-كيلا» (المسمار المركزي للتثبيت)—فتمزقت وانهوت. وفي ذلك القتال، بسهام دهننْجيا سقطت جموع المشاة ومقاتلو العربات والخيول والفيلة سريعًا، وخرّوا إلى الأرض حين خذلتهم الأجساد.

Verse 123

बाणाहतास्तूर्णमपेतसत्त्वा विष्ट भ्य गात्राणि निपेतुरुव्याम्‌ । ऐन्द्रेण तेनास्त्रवरेण राजन्‌ महाहवे भिन्नतनुत्रदेहा:,युद्धके मुहानेपर जिनके यन्त्र कट गये और इन्द्रकील नष्ट हो गये थे, ऐसे बड़े-बड़े ध्वज छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे। उस संग्राममें अर्जुनके बाणोंसे घायल पैदलोंके समूह, रथी, घोड़े और हाथी शीघ्र ही सत्त्वशून्य होकर अपने अंगोंको पकड़े हुए पृथ्वीपर गिरने लगे। राजन्‌! उस महान ऐन्द्रास्त्रसे समरभूमिमें सभी सैनिकोंके शरीर और कवच छिज्न- भिन्न हो गये

قال سنجيا: لما أُصيبوا بالسهام سُرعان ما خارت قواهم، وأخذوا يتشبثون بأطرافهم ثم سقطوا على الأرض. أيها الملك، في تلك المعركة العظمى، وبذلك السلاح الأسمى المولود من إندرا، تكسّرت أجساد المحاربين ودروعهم وتمزّقت—وكانت قوته طاغية حتى حطّمت كل مقاومة وألقت الرجال صرعى في أكوام، كاشفةً الثمن المروّع للحرب وإن جرت في قلب المآثر والفروسية.

Verse 124

ततः शरौघैर्निशितै: किरीटिना नृदेहशस्त्रक्षतलोहितोदा । नदी सुघोरा नरमेदफेना प्रवर्तिता तत्र रणाजिरे वै,उस समय समरांगणमें किरीटधारी अर्जुनने अपने तीखे बाणसमूहोंद्वारा योद्धाओंके शरीरमें लगे हुए आघातसे निकलनेवाले रक्तकी एक भयंकर नदी बहा दी; जिसमें मनुष्योंके मेदे फेनके समान जान पड़ते थे

قال سنجيا: ثم في ساحة القتال، أطلق أرجونا ذو التاج وابلًا من السهام الحادّة، فأجرى نهرًا مروّعًا: ماؤه دمٌ يفيض من جراح السلاح في أجساد البشر، وزَبَده كأنه شحمٌ آدمي. إنها صورة تفضح الثمن الأخلاقي الفادح للحرب، وإن جرت في قلب البطولة.

Verse 125

वेगेन सातीव पृथुप्रवाहा परेतनागाश्वशरीररोधा । नरेन्द्रमज्जोच्छितमांसपड्का प्रभूतरक्षोगणभूतसेविता,वह नदी बड़े वेगसे बह रही थी। उसका प्रवाह पुष्ट था। मरे हुए हाथी, घोड़ोंके शरीर तटोंके समान प्रतीत होते थे। राजाओंके मज्जा और मांस कीचड़के समान थे। बहुत-से राक्षत और भूतगण उसका सेवन करते थे

قال سنجيا: اندفع ذلك النهر بسرعة هائلة، عريضَ المجرى شديدَ التيار. وكانت جثث الفيلة والخيول الميتة تقوم حواجز كأنها ضفاف على امتداد مجراه. وصارت نخاعات الملوك ولحومهم طينَه، وازدحم حوله كثير من الرّاكشاسا والبهوتا يشربون منه. إن الصورة تكشف رعب الحرب الأخلاقي: فكبرياء المُلك وسلطان الدنيا يذوبان في وحل واحدٍ مقيت، وتغدو ساحة القتال مأوى لقوى مظلمة تتغذّى على العنف.

Verse 126

शिर:कपालाकुलकेशशाद्धला शरीरसड्घातसहस््रवाहिनी । विशीर्णनानाकवचोर्मिसंकुला नराश्वनागास्थिनिकृत्तशर्करा,मुर्दोकी खोपड़ियोंके केश सेवारका भ्रम उत्पन्न करते थे। सहस्रों शरीर उसमें जल- जन्तुओंके समान बह रहे थे। छिन्न-भिन्न होकर बिखरे हुए कवच लहरोंके समान उसमें सर्वत्र व्याप्त थे। मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी कटी हुई हड्डियाँ छोटे-छोटे कंकड़- पत्थरोंका काम दे रही थीं

قال سنجيا: «كان كأنه نهرٌ مروّع: ضفافه بساطٌ من شعرٍ متشابك وجماجم؛ وفيه كانت آلافُ أكوام الأجساد تجري كأنها كائناتٌ حية في الماء. وشظايا الدروع المتنوعة، وقد تكسّرت، انتشرت في كل مكان كالأمواج، وكانت عظامُ البشر والخيول والفيلة المقطوعة تقوم مقام الحصى والحجارة». في هذه الرؤيا لساحة القتال، يُجبر الشعر السامع على مواجهة الثمن الأخلاقي للحرب—كيف تُحوِّل العنفُ الإنسانَ والبأسَ معًا إلى حطام—فتشتدّ ضرورة الدارما الأخلاقية وسط الكارثة.

Verse 127

श्वरकड़्कशालावृकगृध्रकाकै: क्रव्यादसड्घैश्न तरक्षुभिश्न । उपेतकूलां ददृशुर्मनुष्या: क्रूरां महावैतरणीप्रकाशाम्‌,उसके दोनों किनारोंपर कुत्ते, कौवे, भेड़िये, गीध, कंक, तरक्षु- तथा अन्यान्य मांसभक्षी जन्तु निवास करते थे। उस भयानक नदीको लोगोंने महावैतरणीके समान देखा

قال سنجيا: رأى الناس نهرًا قاسيًا، وقد ازدحمت ضفافه بقطعان من آكلات اللحم—الكلاب والغربان والذئاب والنسور وطيور الكنكا والضباع—كأنه نهر فايتارَني العظيم. وتستحضر الرؤيا رعب الحرب الأخلاقي: أرضًا تجتذب فيها العنفُ القمّامين، وتغدو الحدود بين ساحة القتال والجحيم غير مميّزة.

Verse 128

प्रवर्तितामर्जुनबाणसड्चै- मेंदोवसासृक्‌प्रवहां सुभीमाम्‌ । हतप्रवीरां च तथैव दृष्ट्‌वा सेनां कुरूणामथ फाल्गुनेन

قال سانجيا: لما رأى جيش الكورو وقد اندفع وتُرك في حالٍ مروّعة تحت وابل سهام أرجونا—تسيل منه الشحوم والنخاع والدماء، وقد حُرم من أبطالِه الأوائل—اهتزّ (قلب الملك) لما أبصر ما صنعه فالغونا.

Verse 129

ते चेदिपाउ्चालकरूषमत्स्या: पार्थाश्च सर्वे सहिता: प्रणेदु: । जयप्रगल्भा: पुरुषप्रवीरा: संत्रासयन्त: कुरुवीरयोधान्‌

قال سانجيا: عندئذٍ أطلق أهل تشيدي والبَانْتشالا والكَروشا والمَتسيا—ومعهم جميع أبناء بريثا مجتمعين—صيحةً مدوّية. واثقين بالنصر، جريئين، أولئك الأفذاذ من الرجال ألقوا الرعب في قلوب فرسان الكورو، وبصيحتهم الواحدة أعلنوا العزم وثِقَلَ الحُجّة الأخلاقية لقضيتهم إذ كان زخم المعركة يتعاظم.

Verse 130

अर्जुनके बाणसमूहोंसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था। वह चर्बी, मज्जा तथा रक्त बहानेके कारण बड़ी भयंकर जान पड़ती थी। इस प्रकार कौरवसेनाके प्रधान-प्रधान वीर अर्जुनके द्वारा मारे गये। यह देखकर चेदि, पांचाल, करूष और मत्स्यदेशके क्षत्रिय तथा कुन्तीके पुत्र--ये सभी नरवीर विजय पानेसे निर्भय हो कौरवयोद्धाओंको भयभीत करते हुए एक साथ सिंहनाद करने लगे ।। हतप्रवीराणि बलानि दृष्टवा किरीटिना शत्रुभयावहेन । वित्रास्य सेनां ध्वजिनीपतीनां सिंहो मृगाणामिव यूथसड्घान्‌

قال سانجيا: من كثرة سهام أرجونا تجلّى ذلك «النهر»؛ وكان يبدو بالغ الفظاعة إذ يُسيل الشحوم والنخاع والدماء. وهكذا قُتل كبار أبطال جيش الكاورافا على يد أرجونا. فلما رأى ذلك مقاتلو الكشترية من تشيدي وبانتشالا وكروشا ومَتسيا، ومعهم أبناء كونتي جميعًا—وقد زال خوفهم لرجاء الظفر—أرهبوا محاربي الكاورافا وأطلقوا معًا زئيرًا كزئير الأسد. وإذ رأوا الجموع وقد خلت من أبطالها، صرعى بسيف أرجونا ذي التاج، باعث الرعب في الأعداء، أفزعوا قادة الكاورافا وكتائبهم، كما يبدّد الأسد قطعان الظباء.

Verse 131

विनेदतुस्तावतिहर्षयुक्तौ गाण्डीवधन्वा च जनार्दनश्न । शत्रुओंको भय देनेवाले किरीटधारी अर्जुनके द्वारा कौरवसेनाके प्रमुख वीरोंको मारे गये देख पाण्डवपक्षके वीरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई थी। गाण्डीवधारी अर्जुन तथा भगवान्‌ श्रीकृष्ण मृगोंके यूथोंकों भयभीत करनेवाले सिंहके समान कौरवसेनापतियोंकी सारी सेनाको संत्रस्त करके अत्यन्त हर्षमें भरकर गर्जना करने लगे ।। १३० ह ।। ततो रविं संवृतरश्मिजालं दृष्टवा भृशं शस्त्रपरिक्षताड्ा:

قال سانجيا: ثم إن أرجونا حامل قوس غانديڤا، وجناردانا (كريشنا)، وقد امتلآ ابتهاجًا، أطلقا زئيرًا عاليًا. ولما رأى أبطال الباندافا كبارَ فرسان جيش الكاورافا صرعى بسهم أرجونا ذي التاج—مُلهِم الرعب في الأعداء—غمرتهم فرحة عظيمة. وكما يُفزع الأسدُ قطعانَ الظباء، ألقى أرجونا والرب كريشنا الذعر في جيش قادة الكاورافا كله، وفي ذروة الظفر أطلقا صرخةً مدوّية. ثم بعد ذلك، إذ رأى الشمس وقد حُجبت شبكةُ أشعتها، ورأى جسده ممزقًا تمزيقًا شديدًا بالسلاح…

Verse 132

तदैन्द्रमस्त्रं विततं च घोर- मसह्ामुद्वीक्ष्य युगान्तकल्पम्‌ । अथापयानं कुरव: सभीष्मा: सद्रोणदुर्योधनबाह्िकाश्न

قال سانجيا: لما رأى سلاحَ إندرا الرهيب وقد أُطلق كاملًا—مفزعًا ككارثةٍ في نهاية عصر—بدأ الكورو يتراجعون خوفًا؛ حتى بهيشما نفسه، ومعه درونا ودوريودانا وباهليكا.

Verse 133

चक्रुर्निशां संधिगतां समीक्ष्य विभावसोलेंहितरागयुक्ताम्‌ । तदनन्तर शस्त्रोंके आघातसे अत्यन्त क्षत-विक्षत अंगोंवाले भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, बाह्लिक तथा अन्य कौरवयोद्धाओंने सूर्यदेवको अपनी किरणोंको समेटते देख और उस भयंकर ऐन्द्रास्त्रको प्रलयंकर अग्निके समान सर्वत्र व्याप्त एवं असह हुआ जानकर सूर्यकी लालीसे युक्त संध्या एवं निशाके आरम्भकालका अवलोकन कर सेनाको युद्धभूमिसे लौटा लिया ।। १३१-१३२ ह ।। अवाप्य कीर्ति च यशश्ष लोके विजित्य शत्रूंक्ष धनंजयोडपि

قال سنجيا: لما رأوا أن الليل قد أقبل، مشوبًا بحمرة الشمس عند الغروب، وأن إله الشمس قد جمع أشعته وضمّها، أدرك أبطال الكورو—بيشما، ودرونا، ودوريودhana، وباهليكا، وغيرهم—وقد تمزقت أبدانهم بجراحٍ بالغة من ضربات السلاح، أن سلاح إندرا المهيب (الإندراسترا) قد انتشر في كل مكان كَنارِ الفناء الكوني، وصار لا يُطاق. فلما لاح لهم ابتداء الشفق وبداية الليل، سحبوا الجيش من ساحة القتال.

Verse 134

ततः प्रजज्ञे तुमुलः कुरूणां निशामुखे घोरतम: प्रणाद:

قال سنجيا: ثم عند مطلع الليل، ارتفع بين الكورو صخبٌ عظيم، وصيحةٌ هي أشدّ ما يكون فزعًا.

Verse 135

रणे रथानामयुतं निहत्य हता गजा: सप्तशतार्जुनेन । प्राच्याश्न सौवीरगणाश्ष सर्वे निपातिता: क्षुद्रकमालवाश्व

قال سنجيا: في أتون القتال قتل أرجونا عشرة آلاف من مقاتلي العربات، وأسقط سبعمائة فيل. وكذلك صُرِعَتْ جميعُ الكتائب الشرقية وجماعاتُ السوفيـرا، وسقط أيضًا الكشودراكا والمالافا.

Verse 136

महत्‌ कृतं कर्म धनंजयेन कर्तु यथा नाहति कश्चिदन्य: । उस समय रात्रिके आरम्भमें कौरवोंके दलमें बड़ा भयंकर कोलाहल होने लगा। वे आपसमें कहने लगे--“आज अर्जुनने रणक्षेत्रमें दस हजार रथियोंका विनाश करके सात सौ हाथी मार डाले हैं। प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव सभी क्षत्रियगणोंको मार गिराया है। धनंजयने जो महान्‌ पराक्रम किया है, उसे दूसरा कोई वीर नहीं कर सकता' ।। १३४-१३५ - श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्न राजा तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ

قال سنجيا: «لقد أنجز دهننجايا (أرجونا) عملاً جليلاً لا يطيق مثله أحدٌ سواه.» وعند مطلع الليل اضطربت صفوف الكورو بضجيجٍ مرعب. وكانوا يقولون فيما بينهم: «اليوم دمّر أرجونا في ساحة القتال عشرة آلاف من مقاتلي العربات، وقتل سبعمائة فيل. وقد صرع كشاتريا البراتشيا والسوفيـرا والكشودراكا والمالافا جميعًا. إن البأس العظيم الذي أظهره دهننجايا لا يبلغه بطلٌ آخر.»

Verse 137

द्रोण: कृप: सैन्धवबाह्विकौ च भूरिश्रवा: शल्यशलौ च राजन्‌ | अन्ये च योधा: शतश: समेता: क्रुद्धेन पार्थेन रणस्य मध्ये

قال سنجيا: أيها الملك، إن درونا وكريپا وسيندهافا وباهليكا، وبھوريشرافاس، وشاليا وشالا—ومعهم مئاتٌ من المقاتلين المجتمعين—وقفوا في قلب المعركة، يواجهون غضب بارثا (أرجونا).

Verse 138

स्वबाहुवीर्येण जिता: सभीष्मा: किरीटिना लोकमहारथेन । “श्रुतायु, राजा अम्बष्ठपति, दुर्मर्षण, चित्रसेन, द्रोण, कृप, जयद्रथ, बाह्लिक, भूरिश्रवा, शल्य और शल--ये तथा और भी सैकड़ों योद्धा क्रोधमें भरे हुए लोकमहारथी, किरीटधारी कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा रणभूमिमें अपनी ही भुजाओंके पराक्रमसे भीष्मसहित परास्त किये गये हैं! | १३६-१३७ ह ।। इति ब्रुवन्त: शिवबिराणि जमग्मुः सर्वे गणा भारत ये त्वदीया:,भारत! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई मसालें तथा प्रकाशमान दीपोंके उजालेमें अपने-अपने शिबिरमें गये। कौरवसेनाके सम्पूर्ण सैनिकोंपर अर्जुनका त्रास छा रहा था। इसी अवस्थामें उस सेनाने रातमें विश्राम किया

قال سنجيا: «بقوة ذراعيه وحدهما، هزم أرجونا ذو التاج (كيريطين)—أعظم فرسان العربات في العالم—الجميع، وفيهم بهيشما. ‘شروتايو، والملك أمبشثابتي، ودورمارشانا، وتشيتراسينا، ودرونا، وكريبا، وجيادَرَثا، وباهليكا، وبهوريشرافاس، وشاليا، وشالا—ومئات غيرهم—أبطال عظام اشتعلوا غضبًا—قد قُهروا في ساحة القتال على يد أرجونا ابن كونتي، المتوَّج بتاجه، ببأسه هو، حتى وبهِيشما قائمٌ بينهم.’ وبينما كانوا يقولون ذلك، عاد جميع جنودك، يا بهاراتا، إلى معسكراتهم. وفي ضوء آلاف المشاعل المتقدة والمصابيح اللامعة انسحبوا، وسرى الرعب من أرجونا في جيش الكورافا كله. وعلى تلك الحال استراح الجيش ليلته.

Verse 139

उल्कासहसै श्व सुसम्प्रदीप्तै- विभ्राजमानैश्न तथा प्रदीपै: । किरीटिवित्रासितसर्वयोधा चक्रे निवेशं ध्वजिनी कुरूणाम्‌,भारत! उपर्युक्त बातें कहते हुए आपके समस्त सैनिक सहस्रों जलती हुई मसालें तथा प्रकाशमान दीपोंके उजालेमें अपने-अपने शिबिरमें गये। कौरवसेनाके सम्पूर्ण सैनिकोंपर अर्जुनका त्रास छा रहा था। इसी अवस्थामें उस सेनाने रातमें विश्राम किया

قال سنجيا: «بآلاف المشاعل المتقدة وبالمصابيح المتلألئة، أقام جيش الكورُو معسكره ليلًا، يا بهاراتا. وقد استولى الخوف على جميع المحاربين، لأن كيريطين (أرجونا) ألقى الرعب في قلوبهم».

Verse 276

अमानुषेण रूपेण चरन्तं पितरं तव । उस समय रणक्षेत्रमें अद्भुत कर्म करते हुए आपके ताऊ भीष्म अमानुषरूपसे विचरते तथा पाण्डव-सेनाका संहार करते थे। वहाँ अनेक प्रकारके मनुष्य उनके सम्बन्धमें नाना प्रकारकी बातें कर रहे थे

قال سنجيا: «إن كبيركم الموقَّر—بهيشما—كان يجول في ساحة القتال في هيئةٍ تبدو فوق مألوف البشر، يصنع أفعالًا مدهشة وهو يقطع صفوف جيش الباندافا. وإذ رأى الناس ذلك، أخذ كثيرون هناك يتحدثون عنه على وجوه شتى، وكلٌّ يدلي بملاحظةٍ وتأويلٍ مختلف.»

Verse 286

भीष्माग्निमभिसंक्रुद्धं विगाशाय सहस्रश: । वहाँ विधातासे प्रेरित होकर पतंगोंके समान सहस्रों राजा क्रोधमें भरे हुए भीष्मरूपी प्रचण्ड अग्निमें अपने विनाशके लिये स्वयं ही आ गिरते थे

قال سنجيا: «هناك، مدفوعين بقضاء المُدبِّر، اندفع آلاف الملوك—كالفراش يهرع إلى اللهب—فسقطوا من تلقاء أنفسهم في بهيشما، وهو يتوهّج كالنار الضارية. وقد اشتعلوا غضبًا، فاقتحموا ذلك الحريق المهيب، ولم يلقوا فيه إلا هلاكهم.»

Verse 296

नरनागाश्वकायेषु बहुत्वाल्लघुयोधिन: । युद्धमें मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंके शरीरोंपर चलाया हुआ भीष्मका कोई भी बाण व्यर्थ नहीं होता था। एक तो उनके पास बाण बहुत थे और दूसरे वे बड़ी फुर्तीसे चलाते थे

قال سنجيا: «بين أجساد الرجال والفيلة والخيول، لم تكن سهام بهيشما تذهب سدى قط. فازدحام الأهداف التي لا تُحصى، مع رميه السريع الذي لا يعرف الكلال، جعل كل سهمٍ يصيب ويُجدي—صورةً لكفاءة الحرب القاتمة حيث تتحول المهارة وكثرة السلاح إلى ذبحٍ لا يرحم.»

Verse 316

नाराचेन सुमुक्तेन निजघान पिता तव । आपके ताऊ भीष्म अच्छी तरहसे छोड़े हुए एक ही नाराचके द्वारा एक जगह बैठे हुए दो-तीन हाथी-सवारोंको कवच धारण किये होनेपर भी छेद डालते थे

قال سانجيا: بسهم «ناراجا» أُطلق بإتقان، صرع أبوك خصمه. ويُبرز هذا المقطع الكفاءة القاتمة لمهارة ساحة القتال—كيف يمكن لمقذوف واحد، إذا أُحسن إطلاقه، أن يخترق حتى المحاربين المدرّعين—مُظهِرًا توتر الحرب الأخلاقي: البأس والواجب من جهة، وثِقَل الأرواح المهدورة من جهة أخرى.

Verse 356

नाशवनुवन्‌ वारयितुं भीष्मबाणप्रपीडितान्‌ । वे सब वीर वहाँ मौजूद होते हुए भी भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर भागते हुए अपने महारथियोंको रोकनेमें समर्थ न हो सके

قال سانجيا: لم يستطيعوا كبح أولئك المحاربين الذين كانت سهام بهيشما تسحقهم. وعلى الرغم من حضور أبطال كثيرين هناك، فإنهم إذ غمرتهم شدة رماح بهيشما وفرّوا في هلعٍ وألم، لم يقدروا على إيقاف حتى «المهاراثا»—عظماء مقاتلي العربات—من جانبهم. ويُظهر المقطع كيف يذيب الخوف وضغط الميدان الانضباط والواجب، حتى عند المشهورين.

Verse 366

अभज्यत महाराज न च द्वौ सह धावत: । महाराज! महेन्द्रके समान पराक्रमी भीष्मकी मार खाकर वह विशाल सेना इस प्रकार तितर-बितर हुई कि उसके दो-दो सैनिक भी एक साथ नहीं भाग सकते थे

قال سانجيا: أيها الملك، لقد تكسّر ذلك الجيش؛ وفي هزيمته لم يقدر حتى رجلان أن يفرّا معًا. إذ ضُرب بيد بهيشما—الذي كانت بأسه كبأس مهيندرا (إندرا)—تفرّق الجمع العظيم في ذعر، وكل امرئ لا يفكر إلا في نجاته، حين تراجع نظام القتال الأخلاقي أمام الخوف تحت قوةٍ طاغية.

Verse 376

अनीकं पाण्दुपुत्राणां हाहाभूतमचेतनम्‌ | मनुष्य, हाथी और घोड़े सभी बाणोंसे छिद गये थे। रथके ध्वज और कूबर टूटकर गिर चुके थे। इस प्रकार पाण्डवोंकी सेना अचेत-सी होकर हाहाकार कर रही थी

قال سانجيا: لقد صار صفّ أبناء باندو مشهدًا من العويل الهائج، كأنه فاقدٌ للوعي. فالناس والفيلة والخيول جميعًا خُرِّقت بالسهام؛ وانكسرت رايات العربات ومحاور نيرها وسقطت. وهكذا ارتفع من جيش الباندافا—وهو مذهول مضطرب—صراخٌ عظيم من الكرب، مُبيّنًا كيف تطغى وحشية الحرب حتى على الجيوش المنضبطة، فتقلب النظام فوضى.

Verse 386

प्रियं सखाय॑ चाक्रन्दे सखा दैवबलात्कृत: । इस युद्धमें दैवके वशीभूत होकर पिताने पुत्रको, पुत्रने पिताको और मित्रने प्रिय मित्रको मार डाला

قال سانجيا: «بكى صديقٌ على صديقه الحبيب—غير أنّ قوة القدر القاهرة جعلت الصديق يُساق إلى معاداة الصديق. وفي هذه الحرب، وقد استُعبدوا للمصير، قتل الآباء أبناءهم، وقتل الأبناء آباءهم، وضرب الرفاقُ رفاقَهم الأعزّ إليهم.»

Verse 396

विमुक्तकेशा धावन्त: प्रत्यदृश्यन्त भारत । भारत! पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके बहुत-से सैनिक कवच खोलकर बाल बिखेरे इधर-उधर दौड़ते दिखायी देते थे

قال سنجيا: يا بهارتا، لقد شوهدوا يركضون وشعورهم منفلِتة. حقًّا إن كثيرًا من جنود يودهيشثيرا—ابن باندو—قد ألقوا دروعهم وتركوا شعورهم مبعثرة، فبدوا فارّين في جهات شتّى؛ علامة صارخة على الفزع وانهيار النظام وسط صدمة المعركة الجسدية والأخلاقية.

Verse 416

उवाच पार्थ बीभत्सुं निगृहा रथमुत्तमम्‌ उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी वह सेना व्याकुल होकर भटकती हुई गौओंके समूहकी भाँति आर्तस्वरसे हाहाकार करती हुई देखी गयी। कितने ही रथयूथपति भी किंकर्तव्यविमूढ़ होकर घूम रहे थे। अपनी सेनामें इस प्रकार भगदड़ मची हुई देख यदुकुलनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने अपने उत्तम रथको खड़ा करके कुन्तीपुत्र अर्जुनसे कहा --

قال سنجيا: في ذلك الحين، يا ابن باندو، شوهد جيش يودهيشثيرا وقد أُلقي في الاضطراب—يهيم كقطيع من البقر، ويطلق عويلاً بصيحات مكروبة. وكثير من قادة سرايا العربات كذلك، وقد أذهلتهم الحيرة عمّا ينبغي فعله، كانوا يطوفون بلا هدى. وإذ رأى الرب شري كريشنا—بهجة سلالة يادو—مثل هذا الانهيار في صفوفهم، أوقف عربته الممتازة وخاطب أرجونا ابن كونتي—

Verse 466

भयार्ता: प्रपलायन्ते सिंहात्‌ क्षुद्रमृगा इव । “समरभूमिमें मुँह बाये हुए कालके समान भीष्मको देखकर युधिष्ठिरकी सेनामें भागते हुए इन राजाओंकी ओर दृष्टिपात करो। ये सिंहसे डरे हुए क्षुद्र मृगोंकी भाँति भयसे आतुर होकर पलायन कर रहे हैं!

قال سنجيا: مذعورين يفرّون—كغزلانٍ صغيرة أمام أسد. انظر إلى أولئك الملوك في جيش يودهيشثيرا يركضون هلعًا حين يرون بهيشما قائمًا في ساحة القتال كأنه «كالا»؛ الموت ذاته، فاغرًا فاه مستعدًّا للالتهام. إن منظر بأس الجدّ العظيم يحطم شجاعتهم ويدفعهم إلى الفرار.

Verse 726

कर्तव्यं नाभिजानाति रणे भीष्मस्य गौरवात्‌ | महामना पाण्डवोंके इस भारी भारको मैं ही दूर करूँगा। अर्जुन इस युद्धमें तीखे बाणोंकी मार खाकर भी भीष्मके प्रति गौरवबुद्धि रखनेके कारण अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहा है

قال سنجيا: «في غمار القتال لا يدرك أرجونا ما ينبغي فعله، إذ تكبّله هيبته وإجلاله لبهِيشما. ويبدو أن الباندافي عظيم النفس يحدّث نفسه: “أنا وحدي سأرفع هذا العبء الساحق.” غير أنه، مع أنه يتلقى في هذه الحرب ضربات السهام الحادّة، فإن أرجونا—لأن ذهنه معلّق بتوقير بهِيشما—يعجز عن تمييز واجبه هو.»

Verse 1336

ययौ नरेन्द्रे: सह सोदरैश्न समाप्तकर्मा शिबिरं निशायाम्‌ | धनंजय भी शत्रुओंको जीतकर एवं लोकमें सुयश और सुकीर्ति पाकर भाइयों तथा राजाओंके साथ सारा कार्य समाप्त करके निशाके आरम्भमें अपने शिविरको लौट गये

قال سنجيا: لما انقضى عمل ذلك اليوم، عاد دهننجيا (أرجونا)—بعد أن قهر الأعداء فنال في العالم سمعة حسنة ومجدًا باقياً—إلى معسكره في مطلع الليل، ومعه إخوته والملوك. وتبرز هذه الآية واجب المحارب حين يُؤدَّى حتى تمامه، والثقل الأخلاقي لسمعة تُكتسب بفعلٍ منضبط في ساحة القتال.

Frequently Asked Questions

The tension is between viewing Krishna as a political-military factor versus recognizing him as a normative theological authority; the chapter resolves this by subordinating strategic calculation to a cosmic-ethical framework centered on dharma and refuge.

The chapter instructs disciplined remembrance and surrender to Keśava—especially under fear—as a method for clarity (non-delusion), stability, and right orientation of action within uncertainty.

Yes. It states that one who takes Keśava as refuge in fearful situations and recites/reads this discourse becomes auspicious and happy, and that Janārdana continually protects those who surrender.