
Mokṣa-dharma Yoga-Upadeśa: Equanimity, Sense-Restraint, and Vision of the Ātman (आत्मदर्शन-योगोपदेशः)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Yoga-Upadeśa episode within Āśvamedhika Parva)
A Brahmin speaker outlines a liberation-oriented profile: the practitioner becomes non-initiating (nirārambha), friendly to all, forbearing, self-controlled, pure in conduct, free from pride and fear, and equal toward life/death, pleasure/pain, gain/loss, and the dear/hostile. Detachment (vairāgya) and the relinquishing of mental constructions lead gradually to nirvāṇa-like quiescence, likened to a fire extinguished without fuel. The discourse then turns technical: yoga is taught as sense-withdrawal and mind-fixation in the self, practiced in solitude and silence, with stepwise interior attention to the ‘city’ (pura) of embodiment—moving from external orientation to dwelling within the body’s ‘abode.’ Metaphors clarify self-extraction: like drawing a reed from muñja grass, the yogin discerns the self distinct from the body. The realized practitioner is described as unshaken by distress, unafraid amid worldly dissolution, and oriented to Brahman beyond sensory grasp, apprehended by the ‘lamp’ of mind. A student then asks physiological questions (digestion, breath, growth, wastes, locus of self), prompting the teacher’s response: the mind is placed within the body through controlled ‘gates’ (dvāras), seeking the self without negligence. Vāsudeva reports the teaching to Arjuna, stresses its esoteric status, and concludes with a practical claim: for one constantly disciplined, yoga becomes effective within six months.
Chapter Arc: एक ब्राह्मण-गुरु शिष्य को ‘एकायन’ (एक-निष्ठ) साधना का रहस्य खोलते हैं—कैसे तुष्णीम्, अल्पचिन्तन, और आत्म-स्थापन से मोक्ष का द्वार खुलता है। → उपदेश सूक्ष्म होता जाता है: ‘सर्वमित्र, सर्वसह, शम-रत, जितेन्द्रिय’ बनने की कठिन शर्तें; सब प्राणियों में आत्मवत् व्यवहार; और निर्जन वन में इन्द्रिय-ग्राम को संनियम्य कर भीतर-ही-भीतर काय-चिन्तन। साधक के सामने सबसे बड़ा शत्रु बाह्य विषय नहीं, भीतर का चंचल मन है—जो ‘कोष’ में वस्तुएँ रख देने पर भी उन्हीं का ध्यान करता रहता है। → गुरु ‘सर्वरहस्य’ का सार बाँध देते हैं: इन्द्रियों का निर्घोष-निग्रह, एकाग्रता, और मन को ‘पुर के भीतर’ स्थिर करना—बाह्य में नहीं। यही वह निर्णायक बिन्दु है जहाँ साधना का मार्ग कर्म-आचरण से आगे बढ़कर अन्तःकरण-शासन में परिणत होता है। → गुरु शिष्य को रहस्य कहकर विदा करते हैं—‘यथासुखं गच्छ’; और साथ ही संकेत देते हैं कि स्वधर्म-रत (यहाँ तक कि क्षत्रिय भी) यदि नित्य ब्रह्मलोक-परायण हों तो वही परमगति के अधिकारी हैं। → शिष्य (या जिज्ञासु) आगे जीवात्मा के शरीर-भार-वहन और नये शरीर-धारण (कैसे, किस प्रकार/‘किस रंग’ के) जैसे गूढ़ प्रश्न उठाता है—और कथावाचक कहता है कि उसने ‘यथाश्रुत’ उत्तर दिया, जिससे आगे के अध्यायों में सूक्ष्म देह-तत्त्व का विस्तार होने का संकेत मिलता है।
Verse 1
प्याज बछ। जज: एकोनविशो< ध्याय: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन ब्राह्मण उवाच यः स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किंचिदचिन्तयन् । पूर्व पूर्व परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद् भवेत्,सिद्ध ब्राह्मणने कहा--काश्यप! जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंमेंसे क्रमश:) पूर्व-पूर्वका अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौनभावसे रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान--परत्रह्म परमात्मामें लीन रहता है, वही संसार-वन्धनसे मुक्त होता है
婆罗门说道:“噫,迦叶波啊!若有人沉入唯一归依处——至上我——寂然无言,不起一念;并且循序渐进,舍弃对先前诸状态(具身自我的层层形态)的认同;此人便能渡越系缚,脱离世间枷锁而得自由。”
Verse 2
सर्वमित्र: सर्वसह: शमे रक्तो जितेन्द्रिय: । व्यपेतभयमन्युश्च॒ आत्मवान् मुच्यते नर:,जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, मनोनिग्रहमें तत्पर, जितेन्द्रिय, भय और क्रोधसे रहित तथा आत्मवान् है, वह मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:凡为众生之友,能忍一切,乐于寂静,制伏诸根,离怖畏与嗔怒,并能自持者——此人便从系缚中解脱。
Verse 3
आत्मवत् सर्वभूतेषु यश्नरेन्नियत: शुचि: । अमानी निरभीमान: सर्वतो मुक्त एव सः,जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियोंके प्रति अपने-जैसा बर्ताव करता है, जिसके भीतर सम्मान पानेकी इच्छा नहीं है तथा जो अभिमानसे दूर रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है
婆罗门说道:若有人持戒清净,以己度物,待一切众生如待自身;不求名誉,不怀我慢——此人于一切处皆已全然解脱。
Verse 4
जीवितं मरणं चोभे सुखदु:खे तथैव च । लाभालाभे प्रियद्वेष्पे य: सम: स च मुच्यते,जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय-अप्रिय आदि द्वन्धोंको समभावसे देखता है, वह मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:若有人以平等心观生与死、乐与苦、得与失,以及爱与憎等诸对待——此人便得解脱。
Verse 5
न कस्यचित् स्पृहयते नावजानाति किंचन । निर्दचन्दो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः,जो किसीके द्रव्यका लोभ नहीं रखता, किसीकी अवहेलना नहीं करता, जिसके मनपर द्न्द्दोंका प्रभाव नहीं पड़ता और जिसके चित्तकी आसक्ति दूर हो गयी है, वह सर्वथा मुक्त ही है
婆罗门说道:不贪求他人财物,不轻蔑任何众生,其心不为对待之相(苦乐、得失等)所牵引,内在自性远离执著——如此之人,于一切方面皆是真正解脱者。
Verse 6
अनमित्रश्न निर्बन्धुरनपत्यश्न यः क्वचित् । त्यक्तधर्मार्थकामश्न निराकाड्क्षी च मुच्यते,जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या संतान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:无论何种境遇,都不将任何人认作“我的朋友”“我的亲族”或“我的孩子”;舍弃由欲望驱使而求取的法、利与欲;并且远离一切渴求——如此之人便得解脱。
Verse 7
नैव धर्मी न चाधर्मी पूर्वोपचितहायक: । धातुक्षयप्रशान्तात्मा निर्दन्दः स विमुच्यते,जिसकी न धर्ममें आसक्ति है न अधर्ममें, जो पूर्वसंचित कर्मोको त्याग चुका है, वासनाओंका क्षय हो जानेसे जिसका चित्त शान्त हो गया है तथा जो सब प्रकारके द्वन्धोंसे रहित है, वह मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:不执于法,亦不执于非法;已抛却往昔积聚之业的重担;因诸界(及其所系之欲)渐次耗尽而内心澄寂;并且超越一切对待之相——如此之人便得释放。
Verse 8
अकर्मवान् विकाडृक्षश्न पश्येज्जगदशाश्वतम् । अश्वत्थसदृशं नित्यं जन्ममृत्युजरायुतम्,जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्को अभश्वत्थके समान अनित्य--कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है
婆罗门说道:不自认是任何行为之作者,心中无所欲求;观此世间如阿湿婆他树一般无常不住、不能久存;并恒知其常与生、死、老相随——如此之人便能摧毁自身的系缚。
Verse 9
वैराग्यबुद्धि: सततमात्मदोषव्यपेक्षक: । आत्मबन्धविनिर्मोक्षं स करोत्यचिरादिव,जो किसी भी कर्मका कर्ता नहीं बनता, जिसके मनमें कोई कामना नहीं है, जो इस जगत्को अभश्वत्थके समान अनित्य--कलतक न टिक सकनेवाला समझता है तथा जो सदा इसे जन्म, मृत्यु और जरासे युक्त जानता है, जिसकी बुद्धि वैराग्यमें लगी रहती है और जो निरन्तर अपने दोषोंपर दृष्टि रखता है, वह शीघ्र ही अपने बन्धनका नाश कर देता है
婆罗门说道:其慧恒住离贪,并常自省其过者,便能迅速成就自我之缚的解脱。此人不执“我为作者”,不怀渴求,了知世间动摇败坏——恒为生、死、老所印记——故能不久斩断系缚之根。
Verse 10
अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम् । अरूपमनभिश्ञेयं दृष्टवा$5त्मानं विमुच्यते,जो आत्माको गन्ध, रस, स्पर्श, शब्द, परिग्रह, रूपसे रहित तथा अज्ञेय मानता है, वह मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:若人真实观见自我超越香、味、触与声——无所执取、无所占有,无形无相,亦非寻常识知之对象——便得解脱。
Verse 11
पजञ्चभूतगुणैहीनममूर्तिमदहेतुकम् । अगुणं गुणभोक्तारं यः पश्यति स मुच्यते,जिसकी दृष्टिमें आत्मा पाउ्चभौतिक गुणोंसे हीन, निराकार, कारणरहित तथा निर्मुण होते हुए भी (मायाके सम्बन्धसे) गुणोंका भोक्ता है, वह मुक्त हो जाता है
婆罗门说道:凡真实见自我离于五大所生诸质,非形非相、无物质因;而又了知因与摩耶相系,遂似为诸“德”(guṇa)之受用者者,彼即解脱。
Verse 12
विहाय सर्वसंकल्पान् बुद्ध्या शारीरमानसान् | शनैर्निर्वाणमाप्रोति निरिन्धन इवानल:,जो बुद्धिसे विचार करके शारीरिक और मानसिक सब संकल्पोंका त्याग कर देता है, वह बिना ईंधनकी आगके समान धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हो जाता है
婆罗门说道:若人以明辨之慧舍弃一切意向与心造——或依于身,或起于意——便渐次证得寂静与解脱;如无薪之火,缓缓熄灭而归于安宁。
Verse 13
सर्वसंस्कारनिर्मुक्तो निर्द्धन्द्रो निष्परिग्रह: । तपसा इन्द्रियग्रामं यश्नरेन्मुक्त एव सः,जो सब प्रकारके संस्कारोंसे रहित, द्वद्ध और परिग्रहसे रहित हो गया है तथा जो तपस्याके द्वारा इन्द्रिय-समूहको अपने वशमें करके (अनासक्त) भावसे विचरता है, वह मुक्त ही है
婆罗门说道:若人脱离一切行(saṃskāra)与习气,不为对待二相所缚,亦无占有之心;又以苦行制御诸根之群,行住坐卧皆无所著——此人当知已是解脱者。
Verse 14
विमुक्त: सर्वसंस्कारैस्ततो ब्रह्म सनातनम् । परमाप्रोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम्,जो सब प्रकारके संस्कारोंसे मुक्त होता है, वह मनुष्य शान्त, अचल, नित्य, अविनाशी एवं सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
婆罗门说道:脱离一切行与习气者,便得至永恒之梵(Brahman)——至上实在——寂然、安住、不动、常恒而不坏。
Verse 15
अतः पर प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् । युञ्जन्तः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिन:,अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्रका वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग-साधन करनेवाले योगी पुरुष अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं
因此,我现在将宣说无上之瑜伽之学;依此法门,持戒精进、专注修习的行者,终能亲见圆满真实的自我(ātman)。此教重在内证:以正当的方法与恒常的努力,瑜伽行者得以直接洞见我性(ātman)的真实本质。
Verse 16
तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत् तन्निबोध मे । यैद्वरिश्षारयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि,मैं उसका यथावत् उपदेश करता हूँ। मनोनिग्रहके जिन उपायोंद्वारा चित्तको इस शरीरके भीतर ही वशीभूत एवं अन्तर्मुख करके योगी अपने नित्य आत्माका दर्शन करता है, उन्हें मुझसे श्रवण करो
婆罗门说道:“我现在将如理宣说此教诫——你当细听。凭借那些恒常的内持与制御之法,瑜伽行者常勤修习,使心转向内里,于此身之中摄伏其意,并在自我之中亲见永恒的我(ātman)。”
Verse 17
इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत् | तीव्र तप्त्वा तप: पूर्व मोक्षयोगं समाचरेत्,इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर मनमें और मनको आत्मामें स्थापित करे। इस प्रकार पहले तीव्र तपस्या करके फिर मोक्षोपयोगी उपायका अवलम्बन करना चाहिये
婆罗门说道:既已收摄诸根,使其离于外境,当令其心内住,并安立此心于我(ātman)之中。先当行猛烈苦行(tapas),以净化并调伏自身;然后修习趋向解脱之道——舍离感官之乐的牵引,选择出离之路。
Verse 18
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अद्ठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,तपस्वी सतत युक्तो योगशास्त्रमथाचरेत् । मनीषी मनसा विद्र: पश्यन्नात्मानमात्मनि मनीषी ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा तपसयामें प्रवृत्त एवं यत्नशील होकर योगशास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करे। इससे वह मनके द्वारा अन्त:ःकरणमें आत्माका साक्षात्कार करता है
婆罗门说道:智者当恒常自律,坚住苦行,修习瑜伽之学所教诸法。由内观沉思,他得以在内心之中亲证自我(ātman)——此乃道德上的劝诫:以长久的自制与专注的修行,作为通向真实知见之路。
Verse 19
स चेच्छक्नोत्ययं साधुर्योक्तुमात्मानमात्मनि । तत एकान्तशील: स पश्यत्यात्मानमात्मनि,एकान्तमें रहनेवाला साधक पुरुष यदि अपने मनको आत्मामें लगाये रखनेमें सफल हो जाता है तो वह अवश्य ही अपनेमें आत्माका दर्शन करता है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि एकोनविंशोडध्याय:
若有贤善行者能以自身(心与内在诸机能)系于我(ātman),则其人——独居寂静、内摄专一——必定在自我之中亲见自我。此颂以解脱为伦理与观照之成就:由有纪律的内向收摄,终至直接的自知,而非外在的炫示。
Verse 20
संयतः सतत युक्त आत्मवान् विजितेन्द्रिय: । तथा य आत्मना55त्मानं सम्प्रयुक्त: प्रपश्यति
婆罗门说道:“凡能自制,恒常修持,内心安定,且已降伏诸根者——此人唯凭自我(Ātman),便能清明地观见那已完全系于内修之‘我’。”
Verse 21
जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मनको वशमें करनेवाला और जितेन्द्रिय है, वही आत्मासे प्रेरित होकर बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार कर सकता है ।। यथा हि पुरुष: स्वप्ने दृष्टवा पश्यत्यसाविति । तथा रूपमिवात्मानं साधुयुक्त: प्रपश्यति
婆罗门说道:“唯有那恒常归依自制、安住于瑜伽、能摄伏其心并主宰诸根的修行者——在自我(Ātman)由内推动之下,方能凭辨慧之力证知‘彼’。正如人于梦中见物,醒时似仍见其‘在那里’,同样,善加调御的瑜伽行者观自我如若有相——此相不过指向超越其相的直接证悟。”
Verse 22
जैसे मनुष्य सपनेमें किसी अपरिचित पुरुषको देखकर जब पुनः उसे जाग्रत् अवस्थामें देखता है, तब तुरंत पहचान लेता है कि “यह वही है।” उसी प्रकार साधन-परायण योगी समाधि-अवस्थामें आत्माको जिस रूपमें देखता है, उसी रूपमें उसके बाद भी देखता रहता है ।। इषीकां च यथा मुञ्जात् वक्षिन्रिष्कृष्य दर्शयेत् | योगी निष्कृष्य चात्मानं तथा पश्यति देहत:,जैसे कोई मनुष्य मूँजसे सींकको अलग करके दिखा दे, वैसे ही योगी पुरुष आत्माको इस देहसे पृथक् करके देखता है
婆罗门说道:“譬如有人在梦中见到一位陌生男子,后来在清醒时再见,便立刻认出:‘正是此人’;同样,专志修持的瑜伽行者在三昧中以何种方式见自我,出定之后亦复如是而见。又如从茅草(muñja)茎中抽出并示人其内的细纤维,瑜伽行者亦如是‘抽离’自我,见其与此身相别。”
Verse 23
मुछ्जं शरीरमित्याहुरिषीकामात्मनि श्रिताम् । एतन्निदर्शनं प्रोक्तं योगविद्धिरनुत्तमम्,यहाँ शरीरको मूँज कहा गया है और आत्माको सींक। योगवेत्ताओंने देह और आत्माके पार्थक्यको समझनेके लिये यह बहुत उत्तम दृष्टान्त दिया है
婆罗门说道:“他们宣说:身如茅草(muñja),而自我如其中所依的内芯之芦。此譬喻为瑜伽知者所传,乃辨明身与我之差别的至上方便。”
Verse 24
यदा हि युक्तमात्मानं सम्यक् पश्यति देहभूृत् । न तस्येहेश्वरः कश्चित् त्रैलोक्यस्यापि यः प्रभु:,देहधारी जीव जब योगके द्वारा आत्माका यथार्थ-रूपसे दर्शन कर लेता है, उस समय उसके ऊपर त्रिभुवनके अधीश्वरका भी आधिपत्य नहीं रहता
当具身之众生凭由调御的瑜伽,真实观见自我(Ātman)之正体时,则在此世间再无任何主宰能制伏于他——纵是统御三界的至尊亦不能。
Verse 25
अन्यान्याश्षैव तनवो यशथेष्टं प्रतिपद्यते । विनिवृत्य जरां मृत्युंन शोचति न हृष्पति,वह योगी अपनी इच्छाके अनुसार विभिन्न प्रकारके शरीर धारण कर सकता है, बुढ़ापा और मृत्युको भी भगा देता है, वह न कभी शोक करता है न हर्ष
婆罗门说道:“如此的瑜伽行者,能随其所欲取受他身。既已令衰老与死亡退却,他既不哀伤,也不狂喜。”
Verse 26
देवानामपि देवत्व॑ युक्त: कारयते वशी । ब्रह्म चाव्ययमाप्रोति हित्वा देहमशाश्व॒तम्,अपनी इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला योगी पुरुष देवताओंका भी देवता हो सकता है। वह इस अनित्य शरीरका त्याग करके अविनाशी ब्रह्मको प्राप्त होता है
婆罗门说道:“能制御诸根、自在作主的瑜伽行者,甚至能在诸天之中成就神性。舍弃此无常之身,他证得不坏的梵(Brahman)。”
Verse 27
विनश्यत्सु च भूतेषु न भयं तस्य जायते । क्लिश्यमानेषु भूतेषु न स क्लिश्यति केनचित्,सम्पूर्ण प्राणियोंका विनाश होनेपर भी उसे भय नहीं होता। सबके क्लेश उठानेपर भी उसको किसीसे क्लेश नहीं पहुँचता
婆罗门说道:“纵使一切众生皆在败亡,恐惧亦不于他心中生起。纵使众生受苦受恼,亦无人能令他受扰;他不为他人的动荡与痛楚所触。”
Verse 28
दुःखशोकमयैघोरै: सड़स्नेहसमुद्धवै: । न विचाल्यति युक्तात्मा निःस्पृह: शान्तमानस:,शान्ताचित्त एवं निःस्पृह योगी आसक्ति और स्नेहसे प्राप्त होनेवाले भयंकर दुःख-शोक तथा भयसे विचलित नहीं होता
心已调御、寂静无求的瑜伽行者,不为由执著与爱恋所生的可怖苦痛与忧悲之浪所动摇。
Verse 29
नैनं शस्त्राणि विध्यन्ते न मृत्युश्नास्य विद्यते । नात: सुखतरं किंचिल्लोके क्वचन दृश्यते,उसे शस्त्र नहीं बींध सकते, मृत्यु उसके पास नहीं पहुँच पाती, संसारमें उससे बढ़कर सुखी कहीं कोई नहीं दिखायी देता
婆罗门说道:“刀兵不能穿刺于他,死亡也不能近其身。此世间无处可见有谁比他更为安乐。”
Verse 30
सम्यग्युक्त्वा स आत्मानमात्मन्येव प्रतिष्ठते । विनिवृत्तजरादु:ख: सुखं स्वपिति चापि स:,वह मनको आत्मामें लीन करके उसीमें स्थित हो जाता है तथा बुढ़ापाके दु:खोंसे छुटकारा पाकर सुखसे सोता--अक्षय आनन्दका अनुभव करता है
当他善加调御并融摄自身之心识,便唯住于真我之中而安立不动。既脱离随老迈而来的忧苦,他安然歇息——恬然入睡,如住于不减不尽的内在喜乐者。
Verse 31
देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम् निर्वेदस्तु न कर्तव्यों भुज्जानेन कथंचन,वह इस मानव-शरीरका त्याग करके इच्छानुसार दूसरे बहुत-से शरीर धारण करता है। योगजनित ऐश्वर्यका उपभोग करनेवाले योगीको योगसे किसी तरह विरक्त नहीं होना चाहिये
既舍此人身,他便随其意愿而得诸多他身。是故,享受由瑜伽所生神通者,切不可于任何情形对瑜伽生厌离与背弃之心。
Verse 32
सम्यग्युक्तो यदा55त्मानमात्मन्येव प्रपश्यति । तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतो:,अच्छी तरह योगका अभ्यास करके जब योगी अपनेमें ही आत्माका साक्षात्कार करने लगता है, उस समय वह साक्षात् इन्द्रके पदको भी पानेकी इच्छा नहीं करता है
当一位修持得当的瑜伽行者,于自我之中亲见真我之时,就在那一刻,他不再希求——即便是「百祭者」释迦罗(因陀罗)显现的天帝之位亦然。此偈昭示:内证的直接觉悟,足以遮没天界尊位与果报之诱。
Verse 33
योगमेकान्तशीलस्तु यथा विन्दति तच्छूणु । दृष्टपूर्वां दिश॑ चिन्त्य यस्मिन् संनिवसेत् पुरे
婆罗门说道:“且听乐于独处者如何得瑜伽。先思择一方——昔日已知且经验证者——然后居于一城,使其得以安稳久住(以修习)。”
Verse 34
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत् । तस्मिन्नावसथे धार्य सबाहा[॒ भ्यन्तरं मन:,शरीरके भीतर रहते हुए वह आत्मा जिस आश्रयमें स्थित होता है, उसीमें बाह्य और आभ्यन्तर विषयोंसहित मनको धारण करे
住于城中——亦即住于此身之中——当居于其所时,应使心安住于真我所居之处,将其连同外境与内境诸所缘一并摄持于彼。此教诫在于内摄之律:不令注意力散逐于感官境与内心妄想,而当系念于具身生命中真我之座。
Verse 35
प्रचिन्त्यावसथे कृत्स्नं यस्मिन् काले स पश्यति । तस्मिन् काले मनश्लास्य न च किंचन बाह्त:,मूलाधार आदि किसी आश्रयमें चिन्तन करके जब वह सर्वस्वरूप परमात्माका साक्षात्कार करता है, उस समय उसका मन प्रत्यक्स्वरूप आत्मासे भिन्न कोई “बाहा[” वस्तु नहीं रह जाता
当他依托内在的所依处(如“根轮”mūlādhāra等)而周遍观想,于某一时刻亲证那具一切相的至上我——至上灵(Paramātman)之时;就在那一刻,他的心中不再存有任何与现前之自我相异的“外在”之物。
Verse 36
संनियम्येन्द्रियग्रामं निर्घोषं निर्जने वने । कायमभ्यन्तरं कृत्स्नमेकाग्र: परिचिन्तयेत्,निर्जन वनमें इन्द्रिय-समुदायको वशमें करके एकाग्रचित्त हो शब्दशून्य अपने शरीरके बाहर और भीतर प्रत्येक अंगमें परिपूर्ण परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करे
在寂静无人之林中,当摄伏诸根,使之无喧;以一心专注,当观想至上梵——至上灵(Paramātman)——遍满此身内外,于一切肢节无不充盈。
Verse 37
दन्तांस्तालु च जिद्ठां च गलं॑ ग्रीवां तथैव च । हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम्,दन्त, तालु, जिह्ला, गला, ग्रीवा, हृदय तथा हृदय-बन्धन (नाड़ीमार्ग)-को भी परमात्मरूपसे चिन्तन करे
当观想诸相皆为至上我之形:牙齿、上腭、舌、咽喉与颈;亦当观想心脏,以及“心之系缚”——那内在的脉道(nāḍī),诸生命之流由此被摄持并导引。
Verse 38
इत्युक्त: स मया शिष्यो मेधावी मधुसूदन । पप्रच्छ पुनरेवेम॑ मोक्षधर्म सुदुर्वचम्,मधुसूदन! मेरे ऐसा कहनेपर उस मेधावी शिष्यने पुनः जिसका निरूपण करना अत्यन्त कठिन है, उस मोक्षधर्मके विषयमें पूछा--
摩度苏陀那啊!我既如是言毕,那聪慧的弟子又复问我:关于解脱之法(mokṣa-dharma)——此义最难宣说——愿我更为明晰地开示。
Verse 39
भुक्तं भुक्तमिदं कोछे कथमन्न॑ विपच्यते । कथं रसत्वं बत्रजति शोणितत्वं कथं पुन:,“यह बारंबार खाया हुआ अन्न उदरमें पहुँचकर कैसे पचता है? किस तरह उसका रस बनता है और किस प्रकार वह रक्तके रूपमें परिणत हो जाता है?
“这食物一再被食用,入于腹中之后,如何得以消化?又如何化为‘味精’(rasa,滋养之精华),并且再如何转变为血?”
Verse 40
तथा मांसं च मेदश्न स्नाय्वस्थीनि च योषिति । कथमेतानि सर्वाणि शरीराणि शरीरिणाम्,'स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हडियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्-पृथक् नि:सारण कैसे होता है?
婆罗门说道:“同样地,在女子之身也有肉与脂、筋与骨。诸有身众生的这些身体,究竟如何形成并增长?”
Verse 41
वर्धते वर्धमानस्य वर्धते च कथं बलम् । निरोधानां निर्गमनं मलानां च पृथक् पृथक्,'स्त्री-शरीरमें मांस, मेदा, स्नायु और हडियाँ कैसे होती हैं? देहधारियोंके ये समस्त शरीर कैसे बढ़ते हैं? बढ़ते हुए शरीरका बल कैसे बढ़ता है? जिनका सब ओरसे अवरोध है, उन मलोंका पृथक्-पृथक् नि:सारण कैसे होता है?
婆罗门问道:“身体增长之时,它的力量又如何随之增长?而体内诸秽浊之物四面受阻,各各又凭何得其别别之出口?”
Verse 42
कुतो वायं प्रश्नसिति उच्छवसित्यपि वा पुनः । कं च देशमधिष्ठाय तिष्ठत्यात्मायमात्मनि,“यह जीव कैसे साँस लेता, कैसे उच्छवास खींचता और किस स्थानमें रहकर इस शरीरमें सदा विद्यमान रहता है?
婆罗门问道:“此有情之入息从何而起?又如何复引出息?而此我依止何处而住,恒常在此具身之我中不离?”
Verse 43
जीव: कथं वहति च चेष्टमान: कलेवरम् । कि वर्ण कीदृशं चैव निवेशयति वै पुन:
婆罗门问道:“生灵之我在奋发动作之时,如何负持此身之躯壳?又将再入何等形相与境况?”
Verse 44
इति सम्परिपृष्टो5हं तेन विप्रेण माधव
“因此,噢摩陀婆,我被那位婆罗门细细诘问。”
Verse 45
यथा स्वकोषे प्रक्षिप्प भाण्डं भाण्डमना भवेत्,जैसे घरका सामान अपने कोटेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे
正如一人纵然已将家中器物一件件安置于自家库藏之中,心念仍萦绕于那些财物;同样地,应当把那经由诸根这不安的“门户”向外游走的心收摄回来,安住于自身之躯,并在此处探求真我(我、Ātman),舍弃放逸与怠惰。
Verse 46
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलै: । आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत्,जैसे घरका सामान अपने कोटेमें डालकर भी मनुष्य उन्हींके चिन्तनमें मन लगाये रहता है, उसी प्रकार इन्द्रियरूपी चंचल द्वारोंसे विचरनेवाले मनको अपनी कायामें ही स्थापित करके वहीं आत्माका अनुसंधान करे और प्रमादको त्याग दे
因此,当将心安置于自身之躯,制止它经由诸根不定的门户而摇荡外驰;就在此处寻求真我(Ātman),并远离放逸。
Verse 47
एवं सततमुदूुक्त: प्रीतात्मा नचिरादिव । आसादयति तदू् ब्रह्म यद् दृष्टवा स्यात् प्रधानवित्,इस प्रकार सदा ध्यानके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषका चित्त शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह उस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है, जिसका साक्षात्कार करके मनुष्य प्रकृति एवं उसके विकारोंको स्वतः जान लेता है
婆罗门说道:如此,恒常被劝勉而精进于禅修之人,不久其内心便得清明安宁。顷刻之间,他便证得至上梵(Brahman);而由对其直接证悟,人便如实了知自然(Prakṛti)及其诸变相。
Verse 48
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्मो न च सर्वैरपीन्द्रियै: । मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते,उस परमात्माका इन चर्म-चक्षुओंसे दर्शन नहीं हो सकता, सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे भी उसको ग्रहण नहीं किया जा सकता; केवल बुद्धिरूपी दीपककी सहायतासे ही उस महान् आत्माका दर्शन होता है
然而,那至上之我并非肉眼所能摄取,亦非诸根合力所能把握;唯有以心为灯,使其照明,方能观见那伟大之我。
Verse 49
सर्वतःपाणिपादान्त: सर्वतो$क्षिशिरोमुख: । सर्वतः श्रुतिमाल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति,वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है
婆罗门说道:祂四方皆有手足,四方皆有眼、首与面,四方皆有耳;因为祂遍满世间,包覆一切而安立。
Verse 50
जीवो निष्क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति । स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम्,तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे--उसकी पृथकृताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है)
婆罗门说道:“个体之我(jīva)观见自身仿佛已出离——与此身躯截然有别。虽仍住于身中,却舍弃对身体的认同,了知其与我之分离,唯执持清净梵(Brahman)而已。通达实相者观想至上者为自身真实本性,并凭辨慧之助,亲证自我。于彼境界,他几乎含笑自语:‘唉!如海市蜃楼中所见之水,此世间——仅在我内显现——竟至今徒然使我沉沦迷妄。’如是得见至上者,便唯依彼而住,终归解脱入于我——安住于自我之内对至上者的直接体验。”
Verse 51
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव । तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्ष याति ततो मयेि,तत्त्वज्ञ जीव अपने-आपको शरीरसे पृथक् देखता है। वह शरीरके भीतर रहकर भी उसका त्याग करे--उसकी पृथकृताका अनुभव करके अपने स्वरूपभूत केवल परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करता हुआ बुद्धिके सहयोगसे आत्माका साक्षात्कार करता है। उस समय वह यह सोचकर हँसता-सा रहता है कि अहो! मृगतृष्णामें प्रतीत होनेवाले जलकी भाँति मुझमें ही प्रतीत होनेवाले इस संसारने मुझे अबतक व्यर्थ ही भ्रममें डाल रखा था। जो इस प्रकार परमात्माका दर्शन करता है, वह उसीका आश्रय लेकर अन्तमें मुझमें ही मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने-आपमें ही परमात्माका अनुभव करने लगता है)
婆罗门说道:“他以心观照自我,仿佛含笑。如此唯以彼为依止,便得解脱;其后安住于我。通达真理者见自身与身体有别;虽仍居于身中,却以内证其分离而于心中舍离。专注观想唯一至上梵,凭辨慧之助,亲证自我。于是他几乎失笑,心念:‘唉!如蜃景中所想之水,此世间——仅在我内显现——竟至今徒然令我迷妄。’如是得见至上者,便归依于彼,终而在我中得自由——亦即体验至上者即为自身之自我。”
Verse 52
इदं सर्वरहस्यं ते मया प्रोक्त द्विजोत्तम । आपूृच्छे साधयिष्यामि गच्छ विप्र यथासुखम्,द्विजश्रेष्ठ) यह सारा रहस्य मैंने तुम्हें बता दिया। अब मैं जानेकी अनुमति चाहता हूँ। विप्रवर! तुम भी सुखपूर्वक अपने स्थानको लौट जाओ
噢,最胜的二生者,我已向你尽说此一切秘密教法。如今我请辞而去,以成就当行之事。噢,婆罗门,你也随意归返,安乐而宁静。
Verse 53
इत्युक्त:स तदा कृष्ण मया शिष्यो महातपा: । अगच्छत यथाकामं ब्राह्मण: संशितव्रत:,श्रीकृष्ण! मेरे इस प्रकार कहनेपर वह कठोर व्रतका पालन करनेवाला मेरा महातपस्वी शिष्य ब्राह्मण काश्यप इच्छानुसार अपने अभीष्ट स्थानको चला गया
婆罗门说道:“噢,克里希纳,当我如此说罢,我的弟子——大苦行者、誓行坚固而自律严谨的婆罗门——便于其时随心而去,前往他所择定的归处。”
Verse 54
वायुदेव उवाच इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तम: । मोक्षधर्माश्रित: सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत,भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--अर्जुन! मोक्षधर्मका आश्रय लेनेवाले वे सिद्धमहात्मा श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग सुनाकर वहीं अन्तर्धान हो गये
风神(Vāyudeva)说道:“噢,帕尔塔(阿周那),那位最胜的二生圣者——已正住于解脱之法(mokṣa-dharma)——当时对我说罢此言,便就在原地隐没不见。”
Verse 55
कच्चिदेतत् त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा । तदापि हि रथस्थस्त्वं श्रुववानेतदेव हि,पार्थ! क्या तुमने मेरे बताये हुए इस उपदेशको एकाग्रचित्त होकर सुना है? उस युद्धके समय भी तुमने रथपर बैठे-बैठे इसी तत्त्वको सुना था
风神伐由说道:“噢,帕尔塔啊,你是否以专一不散的心聆听了这番教诲?因为即便在那场战争之时——你端坐战车之上——也曾听闻同一真理。”
Verse 56
नैतत् पार्थ सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणेति मे मतिः । नरेणाकृतसंज्ञेन विशुद्धेनान्तरात्मना,कुन्तीनन्दन! मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जिसका चित्त व्यग्र है, जिसे ज्ञानका उपदेश नहीं प्राप्त है, वह मनुष्य इस विषयको सुगमतापूर्वक नहीं समझ सकता। जिसका अन्त:करण शुद्ध है, वही इसे जान सकता है
风神伐由说道:“噢,帕尔塔啊,依我之见,当人的理解掺杂混乱之时,此事并不容易明了。觉知未曾正当成就之人——心神不定、未经调御——难以轻易把握。唯有内在自性清净者,方能真正知晓它,噢,昆蒂之子。”
Verse 57
सुरहस्यमिदं प्रोक्तं देवानां भरतर्षभ । कच्चिन्नेदं श्रुतं पार्थ मनुष्येणेह कर्हिचित्,भरतश्रेष्ठ! यह मैंने देवताओंका परम गोपनीय रहस्य बताया है। पार्थ! इस जगतमें कभी किसी भी मनुष्यने इस रहस्यका श्रवण नहीं किया है
风神伐由说道:“噢,婆罗多族中的雄牛啊,我已向你宣说诸天所藏的至极秘奥之谜。告诉我吧,噢,帕尔塔——在这世间,曾有任何凡人于任何时候听闻过它吗?”
Verse 58
न होतच्छोतुमहों5न्यो मनुष्यस्त्वामृतेडनघ । नैतदद्य सुविज्ञेयं व्यामिश्रेणान्तरात्मना,अनघ! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मनुष्य इसे सुननेका अधिकारी भी नहीं है। जिसका चित्त दुविधेमें पड़ा हुआ है, वह इस समय इसे अच्छी तरह नहीं समझ सकता
风神伐由说道:“唉,清白无瑕者啊,除你之外,再无任何凡人有资格哪怕只是听闻此事。并且,内心掺杂疑惧与冲突者,在此时也不能清明地理解它。”
Verse 59
क्रियावद्धि्हिं कौन्तेय देवलोक: समावृत: । न चैतदिष्टं देवानां मर्त्यरूपनिवर्तनम्,कुन्तीकुमार! क्रियावान् पुरुषोंसे देवलोक भरा पड़ा है। देवताओंको यह अभीष्ट नहीं है कि मनुष्यके मर्त्यरूपकी निवृत्ति हो
风神伐由说道:“噢,昆蒂之子啊,天界充满了富于圣行、以戒律奉行本分之人。诸天并不愿凡人过早抛却其人身与凡性;因为当人类安住于所分配的领域,并以正当之业积聚功德时,神圣的秩序方得维系。”
Verse 60
परा हि सा गति: पार्थ यत् तद् ब्रह्म सनातनम् | यत्रामृतत्व॑ प्राप्रोति त्यक्त्वा देह सदा सुखी,पार्थ! जो सनातन ब्रह्म है, वही जीवकी परम-गति है। ज्ञानी मनुष्य देहको त्यागकर उस ब्रह्ममें ही अमृतत्त्वको प्राप्त होता है और सदाके लिये सुखी हो जाता है
噢,帕尔塔啊,那确是至高的归宿——永恒的梵(Brahman)。智者舍离此身之后,于彼梵中得不死之境,永享安乐。
Verse 61
इमं धर्म समास्थाय येडपि स्यु: पापयोनय: । स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेडपि यान्ति परां गतिम्,इस आत्मदर्शनरूप धर्मका आश्रय लेकर स्त्री, वैश्य और शूद्र तथा जो पापयोनिके मनुष्य हैं, वे भी परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं
风神(Vāyu)说道:“即便是生于所谓罪业之境者——女子、吠舍与首陀罗亦然——若依止并坚定修行此内证之法,亦能到达至上的境界。”
Verse 62
किं पुनर्त्रह्मिणा: पार्थ क्षत्रिया वा बहुश्ुता: । स्वधर्मरतयो नित्य॑ ब्रह्मलोकपरायणा:,पार्थ! फिर जो अपने धर्ममें प्रेम रखते और सदा ब्रह्मलोककी प्राप्तिके साधनमें लगे रहते हैं, उन बहुश्रुत ब्राह्मण और क्षत्रियोंकी तो बात ही क्या है
风神(Vāyu)说道:“那么,噢帕尔塔啊,又何必多言那些博闻的婆罗门与刹帝利——他们乐于自身所当行之法,且恒常专注于通往梵界(Brahmaloka)之道?对他们而言,更高的归宿自是愈加稳固。”
Verse 63
हेतुमच्चैतदुद्दिष्टमुपाया श्वास्य साधने । सिद्धि फलं च मोक्षश्न दुःखस्य च विनिर्णय:,इस प्रकार मैंने तुम्हें मोक्षधर्मका युक्तियुक्त उपदेश किया है। उसके साधनके उपाय भी बतलाये हैं और सिद्धि, फल, मोक्ष तथा दुःखके स्वरूपका भी निर्णय किया है
风神(Vāyu)说道:“我已以明晰的理路宣说此解脱之法(mokṣa-dharma)。我也阐明了成就它的实际方法,并为你判定了成就之相与其果——解脱本身——以及苦的真实体性。”
Verse 64
नात: परं सुखं त्वन्यत् किंचित् स्याद् भरतर्षभ । बुद्धिमान श्रद्दधानश्व पराक्रान्तश्व॒ पाण्डव,भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है
风神(Vāyu)说道:“噢,婆罗多族中的雄牛啊,再无高于此的安乐——别无他物。噢,般度之子:凡具智慧、具信心、且勤勉不懈者,若知世间享乐皆无实义而能舍离,便能依上述诸法,迅速抵达至上的归宿。”
Verse 65
यः परित्यज्यते मर्त्यो लोकसारमसारवत् | एतैरुपायै: स क्षिप्रं परां गतिमवाप्रुते,भरतश्रेष्ठ! इससे बढ़कर दूसरा कोई सुखदायक धर्म नहीं है। पाण्डुनन्दन! जो कोई बुद्धिमान, श्रद्धालु और पराक्रमी मनुष्य लौकिक सुखको सारहीन समझकर उसे त्याग देता है, वह उपर्युक्त इन उपायोंके द्वारा बहुत शीघ्र परम गतिको प्राप्त कर लेता है
风神伐由说道:“噢,婆罗多族中最卓越者!凡人若能舍弃世人所认作尘世生活之‘精髓’者,洞见其本无实质,便能凭借这些方法迅速证得至上境界。”
Verse 66
एतावदेव वक्तव्यं नातो भूयो5स्ति किंचन । षण्मासान् नित्ययुक्तस्य योग: पार्थ प्रवर्तते,पार्थ! इतना ही कहनेयोग्य विषय है। इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। जो छः: महीनेतक निरन्तर योगका अभ्यास करता है, उसका योग अवश्य सिद्ध हो जाता है
风神伐由说道:“唯此足以宣说;此外再无可增。噢,帕尔塔啊,若能恒常守持纪律,瑜伽便真实运转,并在六个月内显现成效、趋于成就。”
Verse 336
पुरस्याभ्यन्तरे तस्य मन: स्थाप्यं न बाह्मत:। एकान्तमें ध्यान करनेवाले पुरुषको जिस प्रकार योगकी प्राप्ति होती है, वह सुनो--जो उपदेश पहले श्रुतिमें देखा गया है, उसका चिन्तन करके जिस भागमें जीवका निवास माना गया है, उसीमें मनको भी स्थापित करे। उसके बाहर कदापि न जाने दे
婆罗门说道:“当将心安置于那内在的‘城邑’(此身)之中,而非在外。且听独处而一境专注之人如何得瑜伽:他当忆念并思惟已由《闻传》(Śruti)所知之教诲,将心准确安立于被理解为生灵之我(我魂)所居之处,决不可使其越界游荡。”
Verse 433
याथातथ्येन भगवन् वक्तुमहसि मेडनघ । 'चेष्टाशील जीवात्मा इस शरीरका भार कैसे वहन करता है? फिर कैसे और किस रंगके शरीरको धारण करता है। निष्पाप भगवन्! यह सब मुझे यथार्थरूपसे बताइये”
婆罗门说道:“噢,吉祥的尊主,噢,具慧而无罪者——请如实为我开示。那恒常从事诸行的个体之我,如何承担此身之重?继而它又如何取受另一具身体,那身体又是何等色相、何等类型?噢,无瑕的尊主,请将这一切以真实相告。”
Verse 443
प्रत्यब्रुवं महाबाहो यथाश्रुतमरिंदम । शत्रुदमन महाबाहु माधव! उस ब्राह्मणके इस प्रकार पूछनेपर मैंने जैसा सुना था वैसा ही उसे बताया
我回答道:噢,大臂者,噢,摧敌者——我完全依我所闻,如实作答。噢,摩陀婆!当那婆罗门如此发问时,我便将所承受的传述原原本本告诉了他,毫无歪曲。
Non-attachment and non-reactivity: friendliness to all, self-control, purity, absence of pride, and equality toward opposites (life/death, pleasure/pain, gain/loss), culminating in a ‘non-initiating’ stance toward compulsive projects.
A staged inward relocation of attention: from an outer direction to the city, from the city to the dwelling, and from the dwelling to the body—keeping the mind from outward roaming and stabilizing it within embodied awareness to seek the self.
Yes. It concludes that for one who is ‘nitya-yukta’ (constantly disciplined), yoga becomes operative within six months, presented as an instructional benchmark rather than a narrative reward formula.