Bala KandaPrakarana 3421 Verses

Prakarana 34

सोपान-प्रवेश: ‘मंगल-आरम्भ’ से ‘भक्ति-बीज’ तक। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रथम दर्शन जीव के भीतर श्रद्धा (श्रवण-रुचि) जगाता है। यहाँ विवाह-उत्सव, अतिथि-सत्कार, गुरु-कृपा, दान और कुल-रीति—ये सब ‘धर्म-आचरण’ को भक्ति का आधार बनाते हैं। इस खण्ड का द्वार-भाव यह है कि मोक्ष-मार्ग का पहला पायदान सामाजिक-धर्म और प्रेम-सम्बन्धों की शुद्धि से खुलता है; लोक-मर्यादा के भीतर रहकर भी ईश्वर-प्रेम (सगुण-भक्ति) निरन्तर नूतन होता जाता है।

अस्मिन् अंशे (दोहा 330–339-समीपे) ‘विवाहोत्तरः’ रस-प्रवाहः—उत्साहः, करुण-विरहः, वात्सल्यं, दान-धर्मश्च समन्विताः। ‘नित्यं नूतनं मङ्गलम्’ इति आवृत्तिः कथां नित्य-नवीन-कृपा-अनुभवत्वेन भावयति—जनकस्य अतिथि-सत्कारः, दशरथस्य गुरु-पूजनं विप्र-दानं च, विदायां रानीवास-जनक-परिवारस्य विह्वल-प्रेम च—एते सर्वे भक्तेः सामाजिक-आधारं (मर्यादां) पुष्णन्ति। तुलसी अत्र राज-वैभव-वर्णनं केवलं ऐश्वर्य-रसार्थं न करोति; दानं सेवां च यज्ञीय-शुद्धिवत् स्थापयति, येन गृहस्थ-धर्मोऽपि साधना भवति। भाव-शिखरं विदायायाम्—सीतायाः पालकी-गमनम्, मातृ-आशीषः, श्वश्रू-स्नुषा-प्रेम, ‘करुण-विरह’स्य मानसी-संस्कारश्च; एष विरहः अग्रे भक्तिं गाढां करिष्यति। एवं बालकाण्डस्य अयं खण्डः जीवम् ‘स्नेहेन शुद्धं’ कृत्वा पर-सोपानाय सज्जयति।

Verses

Verse 695 (चौपाई)

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।। बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।। देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।। प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।। करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।। तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।। अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।। सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।

Verse 696 (दोहा/सोरठा)

बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।

Verse 697 (चौपाई)

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।। चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।। सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।। करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।। पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।। कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।। चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।। एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।

Verse 698 (दोहा/सोरठा)

बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।

Verse 699 (चौपाई)

जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।। दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।। नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।। नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।। बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।। कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।। अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।। भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।

Verse 700 (दोहा/सोरठा)

अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।

Verse 701 (चौपाई)

पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।। सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।। जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।। बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।। भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।। तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।। मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।। कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।

Verse 702 (दोहा/सोरठा)

दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।

Verse 703 (चौपाई)

सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।। चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।। पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।। होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।। सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।। अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।। सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।। बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।

Verse 704 (दोहा/सोरठा)

तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।

Verse 705 (चौपाई)

चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।। कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।। लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।। को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।। मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।। पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।। निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।। एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।

Verse 706 (दोहा/सोरठा)

रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।

Verse 707 (चौपाई)

देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।। रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।। भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।। बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।। राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।। मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।। सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।। हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।

Verse 708 (छंद)

करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाँउ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।। परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।

Verse 709 (दोहा/सोरठा)

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।336।।

Verse 710 (चौपाई)

अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।। सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।। राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।। पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।। मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।। पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।। पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।। पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।

Verse 711 (दोहा/सोरठा)

प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।

Verse 712 (चौपाई)

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।। भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।। बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।। लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।। समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।। बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।

Verse 713 (दोहा/सोरठा)

प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।

Verse 714 (चौपाई)

बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।। दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।। सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।। भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।। समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।। दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।। चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।। सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।

Verse 715 (दोहा/सोरठा)

सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।

Inside Prakarana 34

Bhakti highlights

यह खण्ड सिखाता है कि भक्ति का प्रथम सोपान ‘मर्यादा-युक्त प्रेम’ है। (1) गृहस्थ-धर्म भी साधना है: अतिथि-सत्कार, गुरु-पूजन, विप्र-दान—ये कर्म ‘यज्ञ’ बनकर चित्त-शुद्धि करते हैं। (2) ऐश्वर्य का धर्म-उपयोग: संपदा का सार सेवा और दान में है; राज-वैभव तभी मंगल है जब वह लोक-कल्याण में ढले। (3) ‘नित नूतन मंगल’ का भाव: प्रभु-कृपा और नाम-स्मरण का रस प्रतिदिन नया हो—भक्ति जड़ नहीं, जीवित अनुभव है। (4) विरह-भक्ति का बीज: विदाई का करुण क्षण आसक्ति नहीं, समर्पण को परिपक्व करता है; प्रेम का शोधन होकर आगे चलकर अधिक गहन भक्ति में परिणत होता है। (5) कुल-रीति और प्रेम-सम्बन्धों की शुद्धि: सामाजिक मर्यादा के भीतर रहकर भी ईश्वर-प्रेम निरन्तर बढ़ता है—यही बालकाण्ड का ‘सोपान-प्रवेश’ है।

Compositional abstract

इस अंश (दोहा 330–339 के आसपास) में ‘विवाहोत्तर’ रस-प्रवाह है—उत्साह, करुण-विरह, वात्सल्य और दान-धर्म का समन्वय। ‘नित नूतन मंगल’ की आवृत्ति कथा को नित्य-नवीन कृपा का अनुभव बनाती है: जनक का अतिथि-सत्कार, दशरथ का गुरु-पूजन व विप्र-दान, और विदाई के समय रनिवास-जनक-परिवार का विह्वल प्रेम—ये सब भक्ति के सामाजिक-आधार (मर्यादा) को पुष्ट करते हैं। तुलसी यहाँ राज-वैभव का वर्णन केवल ऐश्वर्य-रस के लिए नहीं करते; वह ‘दान’ और ‘सेवा’ को यज्ञीय-शुद्धि की तरह रखते हैं, जिससे गृहस्थ-धर्म भी साधना बनता है। भाव-शिखर विदाई में है: सीता का पालकी-गमन, मातृ-आशीष, सास-बहू का प्रेम, और ‘करुणा-बिरह’ का मानसी संस्कार—यह विरह आगे चलकर भक्ति को गाढ़ा करेगा। इस प्रकार बालकाण्ड का यह खण्ड जीव को ‘स्नेह से शुद्ध’ कर अगले सोपान हेतु तैयार करता है।

The emotional arc

यह प्रकरण ‘विवाहोत्तर’ मंगल-प्रवाह से आरम्भ होकर करुण-विरह तक क्रमशः गाढ़ा होता है। (1) उत्सव/आनन्द-रस: ‘नित नूतन मंगल’—नगर में निरन्तर शुभ-उत्साह, समय का निमिष-सा बीतना। (2) ऐश्वर्य-रस का धर्म-रूपान्तरण: राज-वैभव का वर्णन भोग-प्रदर्शन नहीं, बल्कि अतिथि-सत्कार, गुरु-पूजन, विप्र-दान के माध्यम से ‘यज्ञीय शुद्धि’ बनता है। (3) वात्सल्य/स्नेह-रस: जनक-परिवार, रनिवास, मातृ-आशीष, सास-बहू का अपनत्व—घर-घर में प्रेम का विस्तार। (4) करुणा-बिरह: विदाई का क्षण भाव-शिखर—हर्ष के भीतर विछोह की टीस; पालकी-गमन, आँसू, आशीष, और मर्यादा-बद्ध संयम। (5) शान्त/भक्ति-रस की तैयारी: विरह को ‘मानसी संस्कार’ बनाकर कथा जीव के भीतर श्रद्धा को पकाती है—आगे की भक्ति अधिक गहन होने का बीज यहीं पड़ता है।

The dialogue

  • गोस्वामी तुलसीदास (कथावाचक-स्वर; मानसी-परम्परा में शिव-कथित भाव की छाया)साधक-मन (मानस-श्रोता); परम्परागत फ्रेम में ‘श्रोता-समाज’ · प्रथम घाट (शिव–पार्वती संवाद की परम्परागत ‘मानस-उद्गम’ दृष्टि): बालकाण्ड का रंग-आलोक, जहाँ कथा ‘मंगल’ बनकर उतरती है।

Frequently Asked Questions

परम्परा में विवाहोत्तर मंगल-प्रसंग (दान, गुरु-पूजन, अतिथि-सत्कार, विदाई) का पाठ ‘गृहस्थ-धर्म की शुद्धि’, पारिवारिक सौहार्द, कन्या/विवाह-संबन्धी मंगल, तथा ‘विरह-भक्ति’ के संस्कार हेतु फलदायी माना जाता है—विशेषतः ‘नित नूतन मंगल’ भाव से मन में सात्त्विक आनन्द स्थिर होता है।

परम्परागत मानस-पाठ में इस प्रकार के मंगल-प्रसंगों पर अनेक पाठ-परम्पराएँ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘सियाराममय सब जग जानी’ जैसे जप-सम्पुट जोड़ती हैं; कुछ परम्पराएँ ‘राम नाम’ (एकाक्षरी/द्व्यक्षरी) को ही सार्वभौम सम्पुट मानती हैं।

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