यह सोपान ‘धर्म-राज्य’ से ‘धर्म-त्याग’ की ओर अंतर्मुख यात्रा है: समाज-उत्सव (राजतिलक) के बीच ईश्वर-लीला का उलटाव (वनगमन) दिखाकर तुलसी ‘अनुकूल-प्रतिकूल’ दोनों में राम-शरणागति का अभ्यास कराते हैं। यहाँ साधक के लिए मुख्य द्वार है—‘इच्छित सिद्धि’ के क्षण में भी वैराग्य, संयम, और भगवत्-प्रसाद-बुद्धि।
अयोध्याकाण्डस्य रसकेन्द्रं ‘करुणा’ ‘वैराग्य-शान्ति’ इत्येतयोः युग्मम्; किन्तु तस्यारम्भः प्रबल-‘शृङ्गार-उत्सव’रसेन भवति—अभिषेक-समाजः, वाद्य-निनादः, नगर-प्रमोदश्च—येन आसक्तेः मनोविज्ञानं प्रकाश्यते। अस्मिन् अंशे (दोहा १०–१९) तुलसीदासः प्रथमं रामस्य अन्तःकरणे ‘धर्म-सङ्कटम्’ दर्शयति—सहजन्मभ्रातॄणां स्मरणम्, बन्धु-भावः, तथा ‘ज्येष्ठस्यैवाभिषेकः’ इति मर्यादायाः अनुचितत्व-शङ्का; अनन्तरं देवतानां ‘कुचाली’ नीति-चेष्टा प्रविशति (रामस्य वनगमनमेव सुरकार्यं), येन लीलायाः दैवी-प्रयोजनं स्फुटीभवति। ततः मन्थरायाः प्रवेशः वाचिक-विषवत्—सा नगर-मङ्गलं ‘उर-दाह’रूपे परिणमयति, कैकेय्याः अन्तः सुप्तं अहं-भयं प्रबोध्य ‘सवति-विरोध’प्रपञ्चं रचयति। अत्र धर्म-राज्यस्य बाह्य-वैभवं साधकस्य परीक्षाभूमिः भवति—किं मनः मधुर-वचनेषु निहितं कपटं विवेकेन गृह्णाति? अस्य सोपानस्य शिक्षा—विवेकः, वैराग्यम्, राम-प्रसादे स्थैर्यम्।
Verse 21 (चौपाई)
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।। भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।। राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।। गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।। जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।। बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।। प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
Verse 22 (दोहा/सोरठा)
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
Verse 23 (चौपाई)
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।। भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।। हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।। कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।। कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।। सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।। तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।। सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
Verse 24 (दोहा/सोरठा)
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु। रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
Verse 25 (चौपाई)
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।। देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।। बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।। जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।। बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।। ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।। आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।। हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
Verse 26 (दोहा/सोरठा)
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
Verse 27 (चौपाई)
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।। पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।। करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।। देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।। भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।। ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।। हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।। तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
Verse 28 (दोहा/सोरठा)
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
Verse 29 (चौपाई)
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।। रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।। भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।। देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।। पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।। नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।। सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।। पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
Verse 30 (दोहा/सोरठा)
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
Verse 31 (चौपाई)
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।। सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।। जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।। राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।। कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।। मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।। जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।। प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।
Verse 32 (दोहा/सोरठा)
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।
Verse 33 (चौपाई)
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।। फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।। कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।। हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।। करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।। कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।। जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।। तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।
Verse 34 (दोहा/सोरठा)
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि। सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।
Verse 35 (चौपाई)
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।। तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।। तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।। सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।। प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।। रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।। भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।। जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।
Verse 36 (दोहा/सोरठा)
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
Verse 37 (चौपाई)
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।। पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।। सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।। सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।। राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।। रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।। यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।। आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।
Verse 38 (दोहा/सोरठा)
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।
Verse 39 (चौपाई)
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।। का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।। भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।। खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।। जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।। रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।। रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।। जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।
1) ‘अनुकूल-प्रतिकूल’ दोनों में शरणागति का अभ्यास: उत्सव (इच्छित सिद्धि) के क्षण में भी राम का संयम बताता है कि भक्त का मन उपलब्धि में नहीं, प्रभु-आज्ञा/मर्यादा में टिके। 2) प्रसाद-बुद्धि: देव-योजना से संकेत मिलता है कि जीवन के उलटाव भी ईश्वरीय प्रयोजन के वाहक हो सकते हैं—इससे शिकायत नहीं, समर्पण जन्मे। 3) विवेक-रक्षा: मंथरा ‘वाणी के विष’ का रूपक है—भक्त को सीख है कि मधुर शब्दों में छिपे कपट, तुलना, और भय-उत्पादन को पहचानकर मन को राम-नाम/सत्संग में स्थिर रखना चाहिए। 4) वैराग्य-शांत का बीज: राज्य-वैभव के बीच राम का अंतर्मुख भाव बताता है कि धर्म-त्याग नहीं, ‘धर्म के लिए त्याग’ ही उच्चतम है—मर्यादा के आगे निजी सुख गौण। 5) करुण-रस की तैयारी: सामूहिक हर्ष के बीच ही करुणा का बीज पड़ता है, ताकि साधक समझे—भक्ति केवल सुख में गान नहीं, संकट में भी अडिग प्रेम है।
अयोध्या काण्ड का रस-केन्द्र ‘करुण’ और ‘वैराग्य-शांत’ का युग्म है, परंतु इसकी शुरुआत प्रबल ‘श्रृंगार/उत्सव’ (अभिषेक-समाज, बाजे, नगर-प्रमोद) से होती है ताकि आसक्ति का मनोविज्ञान उभरे। इस अंश (दोहा 10–19) में तुलसीदास पहले राम के अंतःकरण का ‘धर्म-संकट’ दिखाते हैं—संग-साथ जन्मे भाइयों का स्मरण, बंधु-भाव, और ‘बड़ेहि अभिषेकू’ की अनुचितता का भाव; फिर देवताओं की ‘कुचाली’ राजनीति आती है (राम का वनगमन ही सुरकार्य), जिससे लीला का दैवी-प्रयोजन स्पष्ट होता है। इसके बाद मंथरा का प्रवेश ‘वाचिक-विष’ की तरह है: नगर-मंगल को वह ‘उर-दाह’ में बदलती है और कैकेयी के भीतर सुषुप्त अहं/भय को जगाकर ‘सवति-विरोध’ का प्रपंच रचती है। धर्म-राज्य का बाह्य वैभव यहाँ साधक के लिए परीक्षा-भूमि बनता है: क्या मन मधुर वचन में छिपे कपट को पहचानता है? इस सोपान पर शिक्षा है—विवेक, वैराग्य, और राम-प्रसाद में स्थिरता।
आरम्भ में ‘श्रृंगार/उत्सव’ का उन्मेष—नगर में अभिषेक-समाज, बाजे, सजावट, और सामूहिक हर्ष। उसी उजास के भीतर राम के अंतःकरण में ‘धर्म-संकट’ का सूक्ष्म उदय—भाइयों/बंधु-भाव का स्मरण, बड़प्पन का संकोच, और ‘अनुचितता’ का आत्मसंयमी विचार; यहाँ रस ‘शांत-वैराग्य’ की पहली झलक देता है। फिर देवताओं की ‘सुरकार्य’ हेतु लीला-योजना से भाव-भूमि ‘अद्भुत’ और ‘दैवी-नियति’ की ओर मुड़ती है—उत्सव के ऊपर एक अदृश्य, विराट प्रयोजन का आभास। इसके बाद मंथरा के प्रवेश से रस-धारा तीव्रता से ‘बीभत्स/रौद्र-बीज’ और ‘करुण’ की ओर ढलती है: मधुर मंगल के बीच वाचिक-विष, शंका, ईर्ष्या, और भय का संचार। अंततः कैकेयी के भीतर सुप्त अहं-भय जागकर ‘विपर्यय’ रचता है—उत्सव का शिखर धीरे-धीरे ‘करुण-वैराग्य’ की तैयारी-भूमि बन जाता है, जहाँ साधक के लिए परीक्षा है: अनुकूल में भी त्याग-बुद्धि और प्रतिकूल में भी प्रसाद-बुद्धि।
परंपरागत मान्यता में अयोध्या काण्ड के इन प्रसंगों का पाठ ‘विवेक-जागरण’ कराता है: मंथरा-कपट और देव-प्रपंच के बीच भी राम-धर्म की स्मृति दृढ़ होती है, गृहस्थ-जीवन में ईर्ष्या/भय से बचने की बुद्धि मिलती है, और ‘प्रसाद-बुद्धि’ (जो हो, राम-इच्छा) का संस्कार बढ़ता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण को संपुट रूप में रखा जाता है; कुछ परंपराएँ संकट-निवारण हेतु ‘रामचरितमानस’ के प्रसंग-पाठ के साथ ‘हनुमान चालीसा’/‘राम रक्षा स्तोत्र’ जोड़ती हैं, पर यह स्थानीय आचार पर निर्भर है।
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