
Uttanka’s Guru-Śuśrūṣā and the Commission to Retrieve the Maṇikuṇḍalas (उत्तङ्क-गुरुशुश्रूषा तथा मणिकुण्डल-आदेशः)
Upa-parva: Uttanka-Upākhyāna (Episode of Uttanka and Gautama)
Janamejaya asks how Uttanka—an intense ascetic—became empowered enough to contemplate cursing Viṣṇu. Vaiśaṃpāyana explains that Uttanka’s potency arises from exceptional tapas and exclusive guru-bhakti under the sage Gautama. Among many disciples, Gautama holds special affection for Uttanka due to his restraint, purity, energetic service, and proper conduct. As time passes, Gautama ages without noticing, while Uttanka remains intent on service. During a wood-gathering task, Uttanka collapses under a heavy load; his matted hair falls, and he laments the long passage of years without being formally released. Gautama acknowledges that, absorbed in affection and service, time elapsed unnoticed; he grants permission to depart and frames dakṣiṇā as the teacher’s satisfaction. He further bestows his daughter as wife upon Uttanka, asserting her suitability to accompany his spiritual radiance. Uttanka nevertheless seeks a concrete service for the guru’s household; Ahalyā (Gautama’s wife), pleased, finally requests the retrieval of the divine earrings (maṇikuṇḍalas) known to belong to Saudāsa’s queen. Uttanka accepts and departs to seek them, while Gautama worries about the dangers associated with that king; Ahalyā expresses confidence that Uttanka will be protected by Gautama’s favor. The chapter closes as Uttanka encounters the king in a deserted forest setting, setting up the next narrative development.
Chapter Arc: शाप-ग्रस्त और तपस्वी उत्तंक का चित्त अब अच्युत के सान्निध्य से शांत होता है; वह स्वीकार करता है कि शाप का आवेग निवृत्त हो गया है और फिर भी एक असाधारण वर माँगने का साहस करता है—भगवान् का ऐश्वर्य-रूप प्रत्यक्ष देखने की इच्छा। → उत्तंक की प्रार्थना के साथ कथा उस रहस्य की ओर मुड़ती है जिसे वह अब तक समझ नहीं पाया था—जल/अमृत के रूप में जो ‘दान’ उसे मिला, वह क्यों अस्वीकार्य और भयावह प्रतीत हुआ। दृश्य में भयानक रूप, बाण-कार्मुक, बद्ध-निस्त्रिंश और अधःस्रोतस का संकेत तनाव बढ़ाता है; साथ ही इन्द्र-सम्बन्धी संवाद (वज्रपाणि पुरंदर) यह बताता है कि देव-व्यवस्था में भी ‘देय’ और ‘अदेय’ का द्वंद्व चलता है। → कृष्ण का उसी मार्ग से शंख-चक्र-गदा धारण कर प्रकट होना और उत्तंक का ऐश्वर्य-रूप देखने का आग्रह—यहीं चरम बिंदु है; साथ ही इन्द्र का कथन कि भार्गव (भृगुवंश) के अमृत-प्रसंग में वह ‘प्रत्याख्यात’ हुआ, यह उद्घाटन करता है कि उत्तंक के अनुभव के पीछे दैवी-नीति और रूप-परिवर्तन का रहस्य है। → जनार्दन उत्तंक को मधुर वाणी से सान्त्वना देते हैं और स्पष्ट करते हैं कि ‘जैसा रूप धारण करके वह जल तुम्हें देना उचित था, उसी रूप से दिया गया; किंतु तुम उसे समझ न सके।’ उत्तंक का चित्त प्रसन्न होता है, शाप-प्रेरित विक्षोभ हटता है, और दैवी अनुग्रह का अर्थ—रूप के पार तत्त्व—उसके सामने रखा जाता है। → उत्तंक की ऐश्वर्य-दर्शन की आकांक्षा बनी रहती है—क्या वह रूप-रहस्य को पूर्णतः जान पाएगा, और क्या दैवी लीला का प्रत्यक्ष दर्शन उसे वैराग्य देगा या और प्रश्न?
Verse 1
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५४ ॥। अपर बक। ] अति्ऑशाएड< पञ्चपज्चाशत्तमो& ध्याय: श्रीकृष्णका उत्तंक मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना और मरुदेशमें जल प्राप्त होनेका वरदान देना उत्तडुक उवाच अभिजानामि जगत: कर्तरिं त्वां जनार्दन । नूनं भवत्प्रसादोडयमिति मे नास्ति संशय:,उत्तंकने कहा--जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगतके कर्ता हैं। निश्चय ही यह आपकी कृपा है (जो आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया), इसमें संशय नहीं है
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်— «အို ဇနာရ္ဒန၊ သင်သည် လောကတစ်လောကလုံး၏ ဖန်ဆင်းရှင်ဖြစ်ကြောင်း ငါသိမြင်လက်ခံ၏။ ဤသည်မှာ သင်၏ ကရုဏာတော်ပင် ဖြစ်သည်; ငါ၌ သံသယမရှိ»။
Verse 2
चित्तं च सुप्रसन्न॑ मे त्वद्भावगतमच्युत । विनिवृत्तं च मे शापादिति विद्धि परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अत: इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်— «အို အချျုတ၊ သင့်အပေါ် သဒ္ဓါဘక్తိဖြင့် ငါ့စိတ်သည် အလွန်တည်ငြိမ်သန့်ရှင်းလာပြီ။ အို ရန်သူတို့ကို မီးလောင်စေသူ၊ ငါသည် သင့်ကို ကျိန်စာတင်မည်ဟူသော ရည်ရွယ်ချက်မှ လုံးဝလှည့်ကွာသွားပြီဟု သိမှတ်ပါ»။
Verse 3
यदि त्वनुग्रहं कंचित् त्वत्तोडहामि जनार्दन । द्रष्टमिच्छामि ते रूपमैश्वरं तन्निदर्शय,जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये। आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है
«အို ဇနာရ္ဒန၊ ငါသည် သင်ထံမှ ကရုဏာတော်တစ်စုံတစ်ရာကို ခံယူထိုက်သူဖြစ်ပါက၊ သင်၏ အာဣශ්ဝရိယ—အရှင့်တော်၏ သာသနာတော်ဆိုင်ရာ မြတ်သော ရုပ်သဏ္ဌာန်ကို မြင်လိုပါသည်။ ထိုရုပ်ကို ငါ့အား ပြသပါ»။
Verse 4
वैशम्पायन उवाच ततः स तस्मै प्रीतात्मा दर्शयामास तदू वपु: । शाश्व॒तं वैष्णवं धीमान् ददृशे यद् धनंजय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तब परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်— ထို့နောက် စိတ်နှလုံးပျော်ရွှင်သော ဉာဏ်ကြီးရှင် ဘုရားသခင်သည် သူ့အား မိမိ၏ ထိုရုပ်တော်ကိုပင် ပြသတော်မူ၏။ ထိုသည်ကား အနန္တကာလတည်သော ဝိုင်ෂ္ဏဝ ရုပ်တော်—စစ်ပွဲအစ၌ ဓနဉ္ဇယ (အာర్జုန) မြင်ခဲ့သည့် ထိုမြင်ကွင်းတော်ပင် ဖြစ်၏။
Verse 5
स ददर्श महात्मानं विश्वरूपं महाभुजम् । सहस्रसूर्यप्रतिमं दीप्तिमत् पावकोपमम्,उत्तंक मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान् था। जो सहस्रों सूर्योके समान प्रकाशमान तथा बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था। उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်— ဥတ္တင်္ကသည် မဟာအတ္တမန်ကို ဗိဿဝရူပ—လောကတစ်လောကလုံးကို ထင်ဟပ်သည့် ရုပ်တော်အဖြစ် မြင်တွေ့၏။ ထိုရုပ်တော်သည် လက်မောင်းကြီးများဖြင့် ထင်ရှား၍ နေတစ်ထောင်ကဲ့သို့ တောက်ပကာ မီးတောက်ကဲ့သို့ လောင်ကျွမ်းတောက်လျှောက်နေ၏။
Verse 6
सर्वमाकाशमावृत्य तिष्ठन्तं सर्वतोमुखम् । तद् दृष्टवा परम रूपं विष्णोर्वैष्णवमद्भुतम् । विस्मयं च ययौ वित्रस्तं दृष्टवा परमेश्वरम्,उसके सब ओर मुख था और वह सम्पूर्ण आकाशको घेरकर खड़ा था। भगवान् विष्णुके उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूपको देखकर उन परमेश्वरकी ओर दृष्टिपात करके ब्रह्मर्षि उत्तंकको बड़ा विस्मय हुआ
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– မိုးကောင်းကင်တစ်လျှောက်လုံးကို ဖုံးလွှမ်း၍၊ မျက်နှာများကို အရပ်အနှံ့သို့ လှည့်ထားကာ ထိုနေရာ၌ ရပ်တည်နေတော်မူ၏။ ဗိဿဏု၏ အံ့ဩဖွယ် အမြင့်မြတ်ဆုံး ဝိုင်ရှ္ဏဝရုပ်သဏ္ဌာန်ကို မြင်ရပြီး၊ အလုံးစုံ၏ အရှင်ကို မျက်မြင်တွေ့သဖြင့် ပုရောဟိတ်ပညာရှင် ဗြဟ္မရ္ရှိ ဥတ္တင်ကာသည် အံ့အားသင့်တုန်လှုပ်ကာ—အမြင့်မြတ်ဆုံးကို မြင်သည့်အခါ နှလုံးသားတုန်ယင်သွားလေ၏။
Verse 7
उत्तड़्क उवाच (नमो नमस्ते सर्वात्मन् नारायण परात्पर । परमात्मन् पद्मनाभ पुण्डरीकाक्ष माधव ।। उत्तंक बोले--सर्वात्मन्! परात्पर नारायण! आपको बारंबार नमस्कार है। परमात्मन्! पद्मनाभ! पुण्डरीकाक्ष! माधव! आपको नमस्कार है ।। हिरण्यगर्भरूपाय संसारोत्तारणाय च । पुरुषाय पुराणाय चान्तर्यामाय ते नमः ।। हिरण्यगर्भ ब्रह्मा आपके ही स्वरूप हैं। आप संसार-सागरसे पार उतारनेवाले हैं। आप ही अन्तर्यामी पुराण-पुरुष हैं। आपको नमस्कार है ।। अविद्यातिमिरादित्यं भवव्याधिमहौषधिम् | संसारार्णवपारं त्वां प्रणमामि गतिर्भव ।। आप अविद्यारूपी अन्धकारको मिटानेवाले सूर्य, संसाररूपी रोगके महान् औषध तथा भवसागरसे पार करनेवाले हैं। आपको प्रणाम करता हूँ। आप मेरे आश्रय-दाता हों ।। सर्ववेदैकवेद्याय सर्वदेवमयाय च । वासुदेवाय नित्याय नमो भक्तप्रियाय ते ।। आप सम्पूर्ण वेदोंके एकमात्र वेद्यतत्त्व हैं। सम्पूर्ण देवता आपके ही स्वरूप हैं तथा आप भक्तजनोंको अत्यन्त प्रिय हैं। आप नित्यस्वरूप भगवान् वासुदेवको नमस्कार है ।। दयया दुःखमोहान्मां समुद्धर्तुमिहाहसि । कर्मभिर्बहुभि: पापैर्बद्धं पाहि जनार्दन ।।) जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोहसे मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्माद्वारा बँधा हुआ हूँ। आप मेरी रक्षा करें ।। विश्वकर्मन् नमस्ते<स्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । पदभ्यां ते पृथिवी व्याप्ता शिरसा चावृतं नभ:,विश्वकर्मन! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत विश्वात्मन! आपके दोनों पैरोंसे पृथ्वी और सिरसे आकाश व्याप्त है
ဥတ္တင်ကာက ပြောသည်– “အို ဗိශ්ဝကರ್ಮန်၊ သင့်အား ဦးချ၍ ကန်တော့ပါ၏—အို ကမ္ဘာလောက၏ အတ္တမ၊ ကမ္ဘာလောက ပေါ်ပေါက်ရာ အရင်းအမြစ်။ သင်၏ ခြေတော်တို့ဖြင့် မြေကြီးတစ်လျှောက် ပျံ့နှံ့၍၊ သင်၏ ဦးခေါင်းတော်ဖြင့် မိုးကောင်းကင်ကို ဖုံးလွှမ်းထားပါသည်။”
Verse 8
द्यावापृथिव्योर्यन्मध्यं जठरेण तवावृतम् । भुजाभ्यामावृताश्चाशास्त्वमिदं सर्वमच्युत,आकाश और पृथ्वीके बीचका जो भाग है, वह आपके उदसरसे व्याप्त हो रहा है। आपकी भुजाओंने सम्पूर्ण दिशाओंको घेर लिया है। अच्युत! यह सारा दृश्य-प्रपंच आप ही हैं
ဥတ္တင်ကာက ပြောသည်– “ကောင်းကင်နှင့် မြေကြီးကြားရှိ အကျယ်အဝန်းအားလုံးကို သင်၏ ဝမ်းတော်က ပြည့်နှံ့ထားပါသည်။ သင်၏ လက်တော်တို့ဖြင့် အရပ်အနှံ့ကို ဝိုင်းကာ ဖုံးလွှမ်းထားပါသည်။ အို အချျုတ၊ မြင်နိုင်သမျှ ဤလောကပေါင်းစုံသည် သင်ကိုယ်တိုင်မှတပါး အခြားမဟုတ်ပါ။”
Verse 9
संहरस्व पुनर्देव रूपमक्षय्यमुत्तमम् । पुनस्त्वां स्वेन रूपेण द्रष्टमिच्छामि शाश्वतम्,देव! अब अपने इस उत्तम एवं अविनाशी स्वरूपको फिर समेट लीजिये। मैं आप सनातन पुरुषको पुनः अपने पूर्वरूपमें ही देखना चाहता हूँ
ဥတ္တင်ကာက ပြောသည်– “အို ဒေဝ၊ ထို အမြင့်မြတ်၍ မပျက်စီးနိုင်သော ရုပ်သဏ္ဌာန်ကို ပြန်လည် ချုံ့သိမ်းတော်မူပါ။ အို ဒေဝ၊ အမြဲတည်သော သင့်ကို မိမိ၏ ရင်းနှီးသိကျွမ်းသော ကိုယ်ပိုင်ရုပ်သဏ္ဌာန်ဖြင့် ထပ်မံ မြင်လိုပါသည်။”
Verse 10
वैशम्पायन उवाच तमुवाच प्रसन्नात्मा गोविन्दो जनमेजय । वरं वृणीष्वेति तदा तमुत्तड़को<ब्रवीदिदम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मुनिकी बात सुनकर सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णने कहा--“महर्ष!ी आप मुझसे कोई वर माँगिये।' तब उत्तंकने कहा --
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– အို ဇနမေဇယ၊ ထိုအခါ အမြဲတမ်း စိတ်နှလုံးငြိမ်သက်သော ဂోవိန္ဒက သူ၏စကားကို ကြားပြီး “အလိုရှိရာ ဆုတောင်းတစ်ပါးကို ရွေးချယ်လော့” ဟု ပြောတော်မူ၏။ ထို့နောက် ဥတ္တင်ကာက ဤသို့ ပြန်လည်ဆိုလေ၏။
Verse 11
पर्याप्त एष एवाद्य वरस्त्वत्तो महद्युते । यत् ते रूपमिदं कृष्ण पश्यामि पुरुषोत्तम,“महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आपके इस स्वरूपका जो मैं दर्शन कर रहा हूँ, यही मेरे लिये आज आपकी ओरसे बहुत बड़ा वरदान प्राप्त हो गया'
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို မဟာတေဇရှိသော အရှင်! ယနေ့ ငါ့အတွက် ပေးကမ်းရမည့် အကြီးမားဆုံး ဆုတောင်းကောင်းချီးသည် ဤတစ်ခုတည်းပင် လုံလောက်၏—အို ကృష్ణ၊ အို ပုရုရှောတ္တမ (အမြင့်မြတ်ဆုံး ပုရုရှ)၊ သင်၏ ရုပ်သဏ္ဌာန်ကို ငါ မြင်တွေ့ရခြင်းပင် ဖြစ်သည်»။
Verse 12
तमब्रवीत् पुनः कृष्णो मा त्वमत्र विचारय । अवश्यमेतत् कर्तव्यममोघं दर्शन॑ मम,यह सुनकर श्रीकृष्णने फिर कहा--'मुने! आप इसमें कोई अन्यथा विचार न करें। आपको अवश्य ही मुझसे वर माँगना चाहिये; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है”
ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– ကృష్ణက ထပ်မံမိန့်တော်မူသည်– «ဤကိစ္စ၌ မစဉ်းစားမရှုပ်ပါနှင့်၊ မသံသယဖြစ်ပါနှင့်။ ဤအရာကို မဖြစ်မနေ ဆောင်ရွက်ရမည်—ငါ့ထံမှ ဆုတောင်းကောင်းချီးတစ်ခု တောင်းလော့။ ငါ့၏ ပေါ်ထွန်းလာခြင်းသည် မည်သည့်အခါမျှ အကျိုးမဲ့ မဖြစ်»။
Verse 13
उत्तडुक उवाच अवश्यं करणीयं च यद्येतन्मन्यसे विभो | तोयमिच्छामि यत्रेष्टं मरुष्वेतद्धि दुर्लभम्,उत्तंक बोले--प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमिमें जल बड़ा ही दुर्लभ है
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «အို အရှင်ဗိဘို (အလုံးစုံကို အုပ်စိုးသူ)! သင်က ငါ့အတွက် ဆုတောင်းတောင်းခြင်းကို မဖြစ်မနေ လုပ်ရမည့် တာဝန်ဟု ထင်မြင်ပါက၊ ငါသည် ဤနေရာ၌ လိုသလောက် ရေကို ရလိုပါ၏။ ဤသဲကန္တာရ၌ ရေသည် အလွန်ရှားပါး၏»။
Verse 14
तत: संहृत्य तत् तेज: प्रोवाचोत्तड़कमी श्वर:ः । एष्टव्ये सति चिन्त्यो5हमित्युक्त्वा द्वारकां ययौ,तब भगवानने अपने उस तेजोमय स्वरूपको समेटकर उत्तंक मुनिसे कहा--'मुने! जब आपको जलकी इच्छा हो, तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा।' ऐसा कहकर वे द्वारका चले गये
ထို့နောက် အရှင်ဘုရားသည် ထိုတောက်ပသော တေဇောရုပ်ကို ပြန်လည်သိမ်းဆည်း၍ ဥတ္တင်္က မုနိအား မိန့်တော်မူသည်– «မုနိရေ၊ ရေလိုသည့်အခါတိုင်း ငါ့ကို သတိရလော့»။ ထိုသို့ဆိုပြီးနောက် ဒွာရကာသို့ ထွက်ခွာတော်မူ၏။
Verse 15
ततः कदाचिद् भगवानुत्तड़कस्तोयकाडुक्षया । तृषितः परिचक्राम मरौ सस्मार चाच्युतम्,तत्पश्चात् एक दिन उत्तंक मुनिको बड़ी प्यास लगी। वे पानीकी इच्छासे उस मरुभूमिमें चारों ओर घूमने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णका स्मरण किया
ထို့နောက် တစ်ခါတစ်ရံ၌ ဂုဏ်သရေရှိသော ဥတ္တင်္ကသည် ရေလိုအပ်၍ ဆာလောင်ခြင်းကြောင့် ပင်ပန်းနာကျင်ကာ သဲကန္တာရအတွင်း အနားယူရာကို ရှာဖွေရန် လှည့်လည်သွားလာ၏။ လှည့်လည်နေစဉ် အချိန်၌ သူသည် အချျူတ (Acyuta) — သရီကృష్ణ — ကို အားကိုးရာအဖြစ် သတိရလေ၏။
Verse 16
ततो दिग्वाससं धीमान् मातड़ं मलपड्किनम् | अपश्यत मरौ तस्मिन् श्वयूथपरिवारितम्,इतनेहीमें उन बुद्धिमान् मुनिको उस मसरुप्रदेशमें कुत्तोंक झुंडसे घिरा हुआ एक नंग- धड़ंग चाण्डाल दिखायी पड़ा, जिसके शरीरमें मैल और कीचड़ जमी हुई थी
ထို့နောက် ပညာရှိမုနိသည် ထိုသဲကန္တာရဒေသ၌ အဝတ်မဝတ်သော အပြင်ပန်းအောက်တန်းသား (မာတင်္ဂ) တစ်ဦးကို မြင်၏။ သူ၏ကိုယ်ခန္ဓာသည် အညစ်အကြေးနှင့် ရွံ့ညစ်ကပ်လျက်ရှိပြီး ခွေးအုပ်တစ်အုပ်က ဝိုင်းရံထားသည်။
Verse 17
भीषण बद्धनिस्त्रिंशं बाणकार्मुकधारिणम् | तस्याध: स्रोतसो5पश्यद् वारि भूरि द्विजोत्तम:,वह देखनेमें बड़ा भयंकर था। उसने कमरमें तलवार बाँध रखी थी और हाथोंमें धनुष- बाण धारण किये थे। द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने देखा--उसके नीचे पैरोंके समीप एक छिद्रसे प्रचुर जलकी धारा गिर रही है
သူသည် မြင်ရသမျှ အလွန်ကြောက်မက်ဖွယ်ကောင်း၏။ ခါးတွင် ဓားကိုချည်ထားပြီး လက်တွင် လေးနှင့် မြားတို့ကို ကိုင်ဆောင်ထားသည်။ ထို့နောက် ဒွိဇအထက်မြတ် ဥတ္တင်္ကသည် သူ၏ခြေဖျားအောက်ဘက်၌ အပေါက်တစ်ပေါက်မှ ရေစီးကြီးတစ်စင်း အလွန်များစွာ စီးကျလာသည်ကို မြင်၏။
Verse 18
स्मरन्नेव च तं प्राह मातज्भरः प्रहसन्निव । एह्ुत्तड़क प्रतीच्छस्व मत्तो वारि भूगूद्वह,मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला--'भूगकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्पाससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।' चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया--उसे लेनेसे इनकार कर दिया
သူ့ကို မှတ်မိသဖြင့် ရေသယ်သူသည် အော်ဟစ်ရယ်မောသကဲ့သို့ ပြော၏—“လာပါ၊ ဥတ္တင်္က၊ ဘೃဂုမျိုးရိုး၏ အကောင်းဆုံးသူ၊ ငါ့ထံမှ ရေကို လက်ခံပါ။” သို့ရာတွင် ဥတ္တင်္ကသည် ရေငတ်၍ ပင်ပန်းနာကျင်နေသည်ကို မြင်၍ သနားကြင်နာကြောင်း ပြောသော်လည်း၊ ထိုချန္ဒာလ၏ ကမ်းလှမ်းမှုကို မုနိသည် မကြိုဆိုဘဲ လက်မခံ၊ မယူဟု ငြင်းပယ်하였다။
Verse 19
कृपा हि मे सुमहती त्वां दृष्टवा तृट् समाश्रितम् । इत्युक्तस्तेन स मुनिस्तत् तोयं नाभ्यनन्दत,मुनिको पहचानते ही वह जोर-जोरसे हँसता हुआ-सा बोला--'भूगकुलतिलक उत्तंक! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्पाससे पीड़ित देखकर मुझे तुमपर बड़ी दया आ रही है।' चाण्डालके ऐसा कहनेपर भी मुनिने उसके जलका अभिनन्दन नहीं किया--उसे लेनेसे इनकार कर दिया
ဥတ္တင်္ကက ပြော၏—“သင်ကို ရေငတ်၍ ဒုက္ခရောက်နေသည်ကို မြင်သဖြင့် ငါ့တွင် ကြီးမားသော ကရုဏာ ပေါ်ထွန်းလာသည်။” ထိုသို့ သူက ပြောဆိုသော်လည်း မုနိသည် ထိုရေကို မနှစ်သက်၊ မလက်ခံဘဲ မယူဟု ငြင်းပယ်하였다။
Verse 20
चिक्षेप च स तं धीमान् वाग्भिरुग्राभिरच्युतम् । पुनः पुनश्च मातड़ः पिबस्वेति तमब्रवीत्,उस समय बुद्धिमान् उत्तंकने अपने कठोर वचनों-द्वारा भगवान् श्रीकृष्णपर भी आक्षेप किया। उधर चाण्डाल बारंबार आग्रह करने लगा--“महर्षे! जल पी लीजिये”
ထိုအခါ ပညာရှိ ဥတ္တင်္ကသည် ပြင်းထန်သောစကားများဖြင့် အချျုတ (သီရိကృష్ణ) ကိုတောင် အပြစ်တင်ပြောဆိုလိုက်၏။ အခြားဖက်တွင် ချန္ဒာလသည် ထပ်ခါထပ်ခါ တိုက်တွန်းကာ—“မဟာမုနိ၊ ရေကို သောက်ပါ” ဟု ပြောလေ၏။
Verse 21
न चापिबत् स सक्रोध: क्षुभितेनान्तरात्मना । स तथा निश्चयात् तेन प्रत्याख्यातो महात्मना,उत्तंकने उस जलको नहीं पीया। वे अत्यन्त कुपित हो उठे थे। उनके अन्त:करणमें बड़ा क्षोेभ था। उन महात्माने अपने निश्चयपर अटल रहकर चाण्डालको जवाब दे दिया
ထိုရေကို သူမသောက်ခဲ့။ ဒေါသမီးလောင်ကာ အတွင်းစိတ်လည်း လှုပ်ရှားတုန်လှုပ်နေသော်လည်း မိမိဆုံးဖြတ်ချက်အပေါ် တည်ကြည်ခိုင်မာစွာ ရပ်တည်ခဲ့သည်။ ထို့ကြောင့် မဟာစိတ်ရှိသူသည် ပြတ်သားသောအဖြေဖြင့် သူ့ကို ငြင်းပယ်ကာ ပြန်လွှတ်လိုက်သည်။
Verse 22
श्वभि: सह महाराज तत्रैवान्तरधीयत । उत्तड़कस्तं तथा दृष्टवा ततो ब्रीडितमानस:
အို မင်းကြီး၊ ခွေးတို့နှင့်အတူ သူသည် ထိုနေရာတင်ပင် ချက်ချင်း ပျောက်ကွယ်သွား၏။ ထိုသို့ ပျောက်သွားသည်ကို မြင်သောအခါ ဥတ္တဍုက၏ စိတ်သည် အရှက်အကြောက်ဖြင့် ပြည့်နှက်သွားသည်။
Verse 23
अथ तेनैव मार्गेण शड्खचक्रगदाधर:,सलिल विप्रमुख्येभ्यो मातड्स्रोतसा विभो | तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा--'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है!
ထို့နောက် ထိုလမ်းတစ်လျှောက်တည်းဖြင့်ပင် သင်္ခ၊ စက်ရ၊ ဂဒါ ကိုင်ဆောင်တော်မူသော အရှင်သည် မာတೃ-စရောတသ ဟုခေါ်သော စမ်းချောင်းအနီး၌—ဗြာဟ္မဏအထွတ်အမြတ်တို့ ရှိနေရာတွင်—ပေါ်ထွန်းလာတော်မူ၏။ ထိုအရှင်ကို မြင်သောအခါ မဟာဉာဏ်ရှိသော ဥတ္တင်ကာက လျှောက်၏—“ပုရုရှိုတ္တမ၊ प्रभု၊ ဗြာဟ္မဏအထွတ်အမြတ်တို့အတွက် ချဏ္ဍာလ ထိတွေ့ထားသော မသန့်ရှင်းသည့် ရေကို ပေးအပ်ခြင်းသည် မသင့်တော်ပါ” ဟု။
Verse 24
आजगाम महाबुद्धिरुत्तड़कश्नैनमब्रवीत् । न युक्त तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम
ထို့နောက် ဥတ္တဍုကာ—ဉာဏ်ကြီးသူ—လာရောက်၍ သူ့အား ပြော၏—“အို လူတို့အထွတ်အမြတ်၊ ထိုသို့သော အလှူကို သင်ပေးအပ်ခြင်း မသင့်တော်ပါ” ဟု။
Verse 25
इत्युक्तवचन त॑ तु महाबुद्धिर्जनार्दन:
ထိုစကားများ ပြောပြီးနောက် ဉာဏ်ကြီးသော ဇနာရ္ဒန (Janārdana) သည် ထိုအကြောင်းကို ချိန်ဆ၍ ပြန်လည်တုံ့ပြန်တော်မူ၏။
Verse 26
यादृशेनेह रूपेण योग्यं दातुं धृतेन वै
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «ဤနေရာ၌ လှူဒါန်းရန် သင့်တော်သော ပုံသဏ္ဍာန်မည်သို့ရှိစေကာမူ၊ ထိုလှူဒါန်းမှုကို မလှုပ်မယှက်သော ဆုံးဖြတ်ချက်ဖြင့် အမှန်တကယ် ပေးအပ်ရမည်»။
Verse 27
मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्पाणि: पुरंदर:,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है
ဥတ္တဒုကက ပြောသည်– «သင့်အတွက်ကြောင့် မိုးကြိုးဗဇ္ဇာကိုင် ပုရန္ဒရ အိန္ဒြာထံ သွား၍ ပြောခဲ့သည်။ ဘೃဂု၏ မျိုးဆက်ရေ၊ ဗဇ္ဇာကိုင်သူအား ‘ရေ၏ ပုံသဏ္ဍာန်ဖြင့် မုနိ ဥတ္တင်္ကအား အမရတရည် အမృతကို ပေးပါ’ ဟု တောင်းဆိုခဲ့သည်။ ငါ့စကားကို ကြားသော် အာနုဘော်ကြီးသော ဒေဝိန္ဒြာက မကြာခဏ ပြန်ပြောသည်– ‘လူသားသည် မသေမမြဲ မဖြစ်နိုင်; ထို့ကြောင့် အမృతမပေးဘဲ အခြားသော ဆုတောင်းတစ်ပါး ပေးလော့’ ဟု။ သို့သော် ငါသည် သချီပတိ အိန္ဒြာကို တင်းတင်းကျပ်ကျပ် ဖိအားပေး၍ ‘ဥတ္တင်္ကအား အမృతသာ ပေးရမည်’ ဟု အတင်းအကျပ် တောင်းဆိုခဲ့သည်»။
Verse 28
उत्तड़कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभु: । स मामुवाच देदवेन्द्रो न मर्त्योमर्त्यतां ब्रजेत्,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है
ဥတ္တဒုကက ပြောသည်– «အရှင်ဘုရား၊ ဥတ္တဒုကအား ရေ၏ ပုံသဏ္ဍာန်ဖြင့် အမရတရည် အမృతကို ပေးပါ» ဟု။ သို့သော် ဒေဝိန္ဒြာက ငါ့အား မကြာခဏ ပြန်ပြောသည်– «မသေမမြဲသူသည် မသေမမြဲခြင်းကို မလွန်နိုင်» ဟု။ ထို့ကြောင့် အိန္ဒြာသည် အမృతအစား အခြားဆုတောင်းတစ်ပါး ပေးရန် တိုက်တွန်းသော်လည်း၊ ငါသည် ဥတ္တဒုကအား အမృతသာ ပေးရမည်ဟု တင်းတင်းကျပ်ကျပ် အတည်ပြု၍ ဖိအားပေးခဲ့သည်။
Verse 29
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भुगुनन्दन । अमृतं देयमित्येव मयोक्त: स शचीपति:,'भुगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि “मनुष्य अमर नहीं हो सकता। इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये।” परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तड़कको तो अमृत ही देना है
«ဘૃဂု၏ မျိုးဆက်ရေ၊ သူက ငါ့အား မကြာခဏ ‘သူ့ကို အခြားဆုတောင်းတစ်ပါး ပေးလော့’ ဟု ပြောသည်။ သို့သော် ငါက ‘မသေမမြဲခြင်းပဲ ဖြစ်ရမည်—အမృతကိုပဲ ပေးရမည်’ ဟု အတည်ပြုခဲ့သည်။ ထို့ကြောင့် သချီပတိ (အိန္ဒြာ) ကို ငါ တင်းတင်းကျပ်ကျပ် ဖိအားပေးခဲ့သည်»။
Verse 30
स मां प्रसाद्य देवेन्द्र: पुनरेवेदमब्रवीत् । यदि देयमवश्यं वै मातड्रो5हं महामते,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"
ဒေဝတားတို့၏ အရှင် အိန္ဒြာသည် ငါ့ကို သဘောကျအောင် ပြု၍ ထပ်မံ ပြောသည်– «မဟာဉာဏ်ရှိသူရေ၊ မဖြစ်မနေ ပေးရမည်ဆိုလျှင်—ထိုအမృతကို ငါပေးရမည်ဆိုလျှင်—ငါသည် ချဏ္ဍာလ ပုံသဏ္ဍာန်ကို ယူ၍ အမృతကို ပေးအပ်မည်»။
Verse 31
भूत्वामृतं प्रदास्थामि भार्गवाय महात्मने । यद्येवं प्रतिगृह्नाति भार्गवो5मृतमद्य वै,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «ငါသည် အမృతကိုယ်တိုင်အဖြစ် ပြောင်းလဲကာ မဟာသတ္တဝါ ဘာရ္ဂဝထံ ပေးအပ်မည်။ ယနေ့ ဤနည်းဖြင့် ဘာရ္ဂဝက အမృతကို လက်ခံလျှင် ကတိထားသော အကျိုးကျေးဇူးနှင့် ပြန်လည်သင့်မြတ်ခြင်းတို့ ပြည့်စုံမည်။ သို့ရာတွင် သူက ငြင်းပယ်လျှင် မသေမရှင်၏ အလှူတော်ကို မပေးနိုင်တော့»။
Verse 32
प्रदातुमेष गच्छामि भार्गवस्यामृतं विभो । प्रत्याख्यातस्त्वहं तेन दास्यामि न कथंचन,“तब देवराज इन्द्र मुझे प्रसन्न करके बोले--'सर्वव्यापी महामते! यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तंकको अमृत अवश्य देना है तो मैं चाण्डालका रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तंक अमृत लेना स्वीकार करेंगे तो मैं उन्हें वर देनेके लिये अभी जा रहा हूँ और यदि वे अस्वीकार कर देंगे तो मैं किसी तरह उन्हें अमृत नहीं दूँगा"
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «အို အင်အားကြီးသူ၊ ငါသည် ဘာရ္ဂဝထံ အမృతကို ပေးအပ်ရန် ယခုသွားမည်။ သို့သော် သူက ငြင်းပယ်လျှင် ငါသည် မည်သို့မျှ မပေးတော့»။
Verse 33
स तथा समयं कृत्वा तेन रूपेण वासव: । उपस्थितस्त्वया चापि प्रत्याख्यातो5मृतं ददत्,“इस तरहकी शर्त करके साक्षात् इन्द्र चाण्डालके रूपमें यहाँ उपस्थित हुए थे और आपको अमृत दे रहे थे; परंतु आपने उन्हें ठुकरा दिया
«ဤသို့ စည်းကမ်းသတ်မှတ်ပြီးနောက် ဝါသဝ (အိန္ဒြ) ကိုယ်တိုင်က ထိုရုပ်သဏ္ဌာန်ဖြင့် ဤနေရာသို့ ရောက်လာခဲ့သည်။ သူသည် မသေမရှင်၏ အမృతကို သင့်အား ပေးအပ်နေသော်လည်း သင်က ငြင်းပယ်ခဲ့သည်»။
Verse 34
चाण्डालरूपी भगवान् सुमहांस्ते व्यतिक्रम: । यत् तु शक््यं मया कर्तु भूय एव तवेप्सितम्,“आपने चाण्डालरूपधारी भगवान् इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान् अपराध है। अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुन: जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «ဘုရားသခင် အိန္ဒြသည် ချဏ္ဍာလ ရုပ်သဏ္ဌာန်ကို ဆောင်ယူခဲ့သည်။ ထိုသို့သောသူကို ငြင်းပယ်ခြင်းသည် သင့်အတွက် အလွန်ကြီးမားသော အပြစ်ဖြစ်သည်။ သို့သော် သင့်ဆန္ဒ ပြည့်စုံစေရန် ငါတတ်နိုင်သမျှကို ထပ်မံ ပြုလုပ်မည်»။
Verse 35
तोयेप्सां तव दुर्धर्षा करिष्ये सफलामहम् । येष्वह:सु च ते ब्रह्मन् सलिलेप्सा भविष्यति
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «အို ဗြာဟ္မဏ၊ သင်၏ ပြည့်စုံရန်ခက်ခဲသော ရေလိုအင်ကို ငါ အကျိုးဖြစ်ထွန်းစေမည်။ သင် ရေကို တမ်းတသော နေ့ရက်များတွင်ပင် ထိုတမ်းတမှုသည် ရေထဲအလယ်၌ သင့်အပေါ် တကယ်ပေါ်ပေါက်လိမ့်မည်»။
Verse 36
तदा मरौ भविष्यन्ति जलपूर्णा: पयोधरा: । रसवच्च प्रदास्यन्ति तोयं ते भूगुनन्दन
ထိုအခါ သဲကန္တာရထဲ၌ပင် မိုးတိမ်များသည် ရေပြည့်ဝလာကြမည်။ ထိုတိမ်တို့သည် သင့်အတွက် အရသာချိုမြိန်၍ အာဟာရပြည့်ဝသော ရေကို သွန်းလောင်းပေးမည်—အို ဘൃဂုမျိုး၏ အပျော်အပါးဖြစ်သူ။ ဤစကားသည် သီလနှင့် မှန်ကန်သောအကျင့်ကို ထိန်းသိမ်းလျှင် သဘာဝတရားတိုင်ပင် အချိန်မီ အာဟာရပြည့်ဝသော ပေါများမှုဖြင့် တုံ့ပြန်ကာ ခြောက်သွေ့မှုကို အသက်ရှင်စေသော အထောက်အပံ့အဖြစ် ပြောင်းလဲပေးသည်ဟု သဘောတရားအာမခံချက်တစ်ရပ်ကို ဖော်ပြသည်။
Verse 37
उत्तड़कमेघा इत्युक्ता: ख्यातिं यास्यन्ति चापि ते । “ब्रह्म! आपकी तीव्र पिपासाको मैं अवश्य सफल करूँगा। जिन दिनों आपको जल पीनेकी इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेशमें जलसे भरे हुए मेघ प्रकट होंगे। भूगुनन्दन! वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथ्वीपर उत्तंक मेघके नामसे विख्यात होंगे” ।। इत्युक्त: प्रीतिमान् विप्र: कृष्णेन स बभूव ह । अद्याप्युत्तड़कमेघाश्व मरौ वर्षन्ति भारत,भारत! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर विप्रवर उत्तंक मुनि बड़े प्रसन्न हुए। इस समय भी मरुभूमिमें उत्तंक मेघ प्रकट होकर जलकी वर्षा करते हैं
ဥတ္တဒုကာက ပြောသည်– «ထိုတိမ်များသည် ‘ဥတ္တဒုကာ-တိမ်’ ဟူသောအမည်ဖြင့် အမှန်တကယ် ကျော်ကြားလာမည်။ အို ဗြာဟ္မဏ၊ သင်၏ ပြင်းထန်သော ရေငတ်မှုကို ငါ မလွဲမသွေ ဖြည့်ဆည်းပေးမည်။ သင် ရေသောက်လိုသောနေ့များတွင် ထိုနေ့များတည်းဟူ၍ သဲကန္တာရဒေသ၌ ရေပြည့်ဝသော တိမ်များ ပေါ်ထွန်းလာမည်။ အို ဘൃဂုမျိုးဆက်၊ ထိုတိမ်တို့သည် သင့်အား ချိုမြိန်၍ လန်းဆန်းသော ရေကို ပေးအပ်မည်၊ ထို့ပြင် ဤကမ္ဘာပေါ်တွင် ‘ဥတ္တဒုကာ-တိမ်’ ဟူ၍ ထင်ရှားကြလိမ့်မည်»။ ထိုသို့ မိန့်ကြားခြင်းခံရသဖြင့် ဗြာဟ္မဏရသီသည် ကృష్ణ၏စကားကြောင့် အလွန်ပျော်ရွှင်သွား၏။ ယနေ့တိုင်ပင်၊ အို ဘာရတ၊ ထို ‘ဥတ္တဒုကာ-တိမ်’ များသည် သဲကန္တာရ၌ မိုးရွာနေဆဲဟု ဆိုကြသည်—အမှန်တရားဖြင့် ပေးသော ဘုရားသခင်၏ကတိသည် သီလရှိသူတို့အတွက် ဆက်လက်ကာကွယ်မှုဖြစ်လာသည်ဟူသော သက်သေတစ်ရပ်ပင်။
Verse 55
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तड़कोपाख्याने पञ्चपज्चाशत्तमो<ध्याय:
ဤသို့ဖြင့် သီရိမဟာဘာရတ၏ အာရှွမေဓိကပရဝ၌ အနုဂီတာအပိုင်း၊ ဥတ္တဍကာနှင့်ဆိုင်သော ဥပာချာန၌ အခန်းငါးဆယ့်ငါး ပြီးဆုံး၏။ ဤသည်မှာ အခန်းအဆုံးကို မှတ်သားကာ ဇာတ်ကြောင်းကို ပိုမိုကျယ်ပြန့်သော သီလ-ဆွေးနွေးဖွဲ့စည်းမှုအတွင်း တည်နေရာပြသသော တရားဝင် ကော်လိုဖွန် ဖြစ်သည်။
Verse 223
मेने प्रलब्धमात्मानं कृष्णेनामित्रघातिना । महाराज! मुनिके इनकार करते ही कुत्तोंसहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देख उत्तंक मन-ही-मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि “शत्रुघाती श्रीकृष्णने मुझे ठग लिया'
ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «ရန်သူသတ်သူ ကృష్ణက ငါ့ကို လှည့်စားခဲ့သည်ဟု ငါ ထင်မိ၏။ အို မဟာရာဇာ၊ မုနိက ငြင်းဆိုလိုက်သည်နှင့်တပြိုင်နက် ထိုချဏ္ဍာလသည် ခွေးများနှင့်အတူ ထိုနေရာတင် ပျောက်ကွယ်သွား၏။ ထိုကိုမြင်သဖြင့် ဥတ္တင်္ကသည် စိတ်ထဲတွင် အလွန်ရှက်ကြောက်ကာ ‘ရန်သူဖျက်ဆီးသူ သီရိကృష్ణက ငါ့ကို လှည့်ဖျက်လိုက်ပြီ’ ဟု တွေးတောလေ၏။»
Verse 246
सलिल विप्रमुख्येभ्यो मातड्स्रोतसा विभो | तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा--'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है!
မာတင်္ဂာနှင့် ဆက်စပ်သော စီးချောင်း (မသန့်ဟု ယူဆသော အရင်းအမြစ်) မှ ရေကို ဗြာဟ္မဏအထွတ်အမြတ်တို့အား ပူဇော်ရန် ပေးအပ်ခဲ့သည်။ ထို့နောက် ချက်ချင်းပင် သင်္ခ၊ စက္ကရ၊ ဂဒါ ကိုင်ဆောင်တော်မူသော ဘုရားသခင် သီရိကృష్ణသည် ထိုလမ်းတလျှောက် ပေါ်ထွန်းလာ၍ ရောက်လာ၏။ ထိုကိုမြင်သော် ဉာဏ်ကြီးသော ဥတ္တင်္ကက ပြောသည်– «ပုရုရှောတ္တမ၊ प्रभो! အထွတ်အမြတ် ဗြာဟ္မဏတို့အတွက် ချဏ္ဍာလ၏ ထိတွေ့မှုကြောင့် မသန့်ဖြစ်သော ထိုကဲ့သို့သော ရေကို ပေးအပ်ခြင်းသည် မသင့်တော်ပါ!»
Verse 256
उत्तड़कं श्लक्षणया वाचा सान्त्वयन्निदमब्रवीत् | उत्तंकके ऐसा कहनेपर महाबुद्धिमान् जनार्दनने उन्हें मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना देते हुए कहा--
ဥတ္တင်္ကက ထိုသို့ ပြောဆိုသော် ဉာဏ်ကြီးမားသော ဇနာရ္ဒနသည် နူးညံ့သိမ်မွေ့၍ ယဉ်ကျေးသော စကားများဖြင့် သူ့ကို သက်သာစေကာ စိတ်ကို တည်ငြိမ်၍ ဓမ္မနှင့် ကိုက်ညီသည့် သဘောထားသို့ ပြန်လည်ရောက်စေရန် အားပေးနှစ်သိမ့်ကာ ပြန်လည်ဖြေကြား하였다။
Verse 263
तादृशं खलु ते दत्तं यच्च त्वं नावबुध्यथा: । “महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूपसे दिया गया; किंतु आप उसे समझ न सके
«အမှန်တကယ်ပင် သင့်အား ပေးအပ်ခဲ့သည့်အရာသည် သင့်အတွက် သင့်လျော်သည့် ပုံသဏ္ဌာန်အတိုင်းပင် ပေးအပ်ခဲ့သည်။ သို့သော် သင်က မသိမမြင်နိုင်ခဲ့» ဟုဆို၏။
Uttanka faces the tension between accepting the guru’s declared satisfaction as sufficient dakṣiṇā and insisting on a further concrete act of service, risking harm while attempting to perfect his obligation.
Discipline and devotion generate moral authority, but righteous action also requires discernment about duties, permissions, and the real-world consequences of undertaking tasks that cross into dangerous social domains.
No formal phalaśruti appears here; the chapter’s meta-function is etiological—explaining the roots of Uttanka’s tapas-based potency and setting causal conditions for later ethical confrontation.