
Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
Upa-parva: Aśvatthāmā–Rudrārādhana (Invocation of Rudra and the Bhūta-gaṇas)
Sañjaya reports that Aśvatthāmā, after deliberation, dismounts and stands in focused resolve. Aśvatthāmā then recites an extended stuti to Rudra/Śiva using a wide range of divine epithets (e.g., Ugra, Sthāṇu, Girīśa, Nīlakaṇṭha, Tryakṣa, Umāpati), combining theological praise with a stated intention to overcome a perilous crisis through worship and offering. A visionary ritual setting unfolds: a golden altar appears, fire manifests, and numerous gaṇas and formidable beings are described in expansive enumerations of forms, faces, weapons, ornaments, and sounds. Aśvatthāmā prepares a self-referential offering (ātma-upahāra), presenting himself as oblation within the ritual logic. Mahādeva appears directly, speaks, and articulates a doctrinal preference for Kṛṣṇa as uniquely dear due to disciplined devotion; he notes prior protective actions concerning the Pāñcālas as part of that regard. Śiva then enters Aśvatthāmā, grants him a spotless superior sword, and Aśvatthāmā becomes further inflamed with divine energy as unseen beings and rākṣasa forces move around the enemy camp, framing the next phase as an empowered nocturnal operation.
Chapter Arc: रात्रि के भयावह सन्नाटे में, युद्ध-विनाश से टूटे अश्वत्थामा का मन एक ही आश्रय खोजता है—महादेव। वह अग्निवेदी के समीप खड़ा होकर शिव की स्तुति आरम्भ करता है। → अश्वत्थामा उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, गिरिश, वरद, विश्वरूप, विरूपाक्ष, बहुरूप, उमापति—इन नामों से शिव को पुकारता है। स्तुति के साथ वातावरण बदलता है; अग्निवेदी के सामने भूतगणों/गणों का प्राकट्य होने लगता है—विविध मुखों, विकराल आकृतियों, अस्त्रों और पाशों से युक्त पार्षद, जिनकी गर्जना और वाद्य-ध्वनि विश्व को संत्रस्त करती है। → महागण द्वीपवर्ती पर्वतों-से ऊँचे कद के साथ प्रकट होकर चारों ओर प्रभा फैलाते हैं; उनकी सिंहनाद-गर्जना और भयावह रूपों के बीच अश्वत्थामा स्वयं को महादेव के चरणों में समर्पित करता है—मानो अपनी शेष मानव-सीमा त्यागकर रुद्र-शक्ति की शरण लेता हो। → शिव-परिवार के पार्षदों की उपस्थिति से यह स्थापित होता है कि अश्वत्थामा की आराधना स्वीकार की जा रही है; रात्रि का दृश्य अब केवल युद्ध-शोक नहीं, एक दैवी-भैरव अनुष्ठान बन जाता है, जहाँ शिव-भक्ति और विनाश-शक्ति एक ही धारा में मिलती है। → यह दैवी स्वीकृति आगे किस रूप में फलित होगी—और अश्वत्थामा किस सीमा तक ‘शिव-आश्रित’ होकर कर्म करेगा—यह अगले प्रसंग पर टिका रह जाता है।
Verse 1
न्न्य्स्य््स््रनास्स हज नी नप्प्स सप्तमो<्ध्याय: अश्वत्थामाद्वारा शिवकी स्तुति, उसके सामने एक अग्निवेदी तथा भूतगणोंका प्राकट्य और उसका आत्मसमर्पण करके भगवान् शिवसे खड्ग प्राप्त करना संजय उवाच एवं संचिन्तयित्वा तु द्रोणपुत्रो विशाम्पते । अवतीर्य रथोपस्थाद् देवेशं प्रणतः स्थित:,संजय कहते हैं--प्रजानाथ! ऐसा सोचकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रथकी बैठकसे उतर पड़ा और देवेश्वर महादेवजीको प्रणाम करके खड़ा हो इस प्रकार स्तुति करने लगा
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ പ്രജാനാഥാ! ഇങ്ങനെ ചിന്തിച്ച ശേഷം ദ്രോണപുത്രൻ അശ്വത്ഥാമാ രഥാസനത്തിൽ നിന്ന് ഇറങ്ങി. ദേവേശ്വരനായ മഹാദേവനെ ദണ്ഡവത് പ്രണാമം ചെയ്ത് അവന്റെ മുമ്പിൽ നിന്നു, സ്തുതി അർപ്പിക്കാൻ ഒരുങ്ങി.
Verse 2
द्रीणिस्वाच उम्र॑ स्थाणुं शिवं रुद्रं शर्वमीशानमी श्वरम् | गिरिशं वरदं देवं भवभावनमी श्वरम्,अश्वत्थामा बोला--प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ അശ്വത്ഥാമാവ് ആ ഉഗ്രനും അചല-സ്ഥിരനും മംഗളപ്രദനുമായ ശിവനെ സ്തുതിച്ചു—രുദ്രൻ, ശർവൻ, ഈശാനൻ, പരമേശ്വരൻ, ഗിരീശൻ എന്നിങ്ങനെ പ്രസിദ്ധനായ വരദാതാ ദേവൻ; സർവ്വഭവത്തെയും പ്രകടമാക്കുന്ന പരമേശ്വരൻ. യുദ്ധാനന്തര രാത്രിയിൽ വിരിയുന്ന ഭീകരകർമ്മത്തിന് അനുമതിയും ശക്തിയും തേടി, മനുഷ്യോപദേശം വിട്ട് ദൈവശക്തിയുടെ ശരണത്തിലേക്ക് അവൻ തിരിഞ്ഞു।
Verse 3
शितिकण्ठमजं शुक्र दक्षक्रतुहरं हरम् । विश्वरूपं विरूपाक्ष॑ बहुरूपमुमापतिम्,अश्वत्थामा बोला--प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അശ്വത്ഥാമാവ് ശിവനെ നീലകണ്ഠൻ, അജൻ, ശുദ്ധനും ദീപ്തിമാനുമായവൻ എന്നു വന്ദിച്ചു; ദക്ഷയജ്ഞനാശകൻ, സംഹാരകാരിയായ ഹരൻ, വിശ്വരൂപനും ബഹുരൂപനും, ഭയങ്കരനേത്രനും, ഉമാപതിയും എന്നു സ്തുതിച്ചു. യുദ്ധാനന്തര ഭീകരാന്തരീക്ഷത്തിൽ ഈ സ്തോത്രം അവനെ നിയന്ത്രണത്തിലേക്ക് അല്ല, ഭയങ്കര ശക്തി നൽകുന്ന ഭക്തിയിലേക്കാണ് തിരിക്കുന്നത്।
Verse 4
श्मशानवासिन दृप्तं महागणपतिं विभुम् । खट््वाड़धारिणं रुद्रं जटिलं ब्रह्मचारिणम्,अश्वत्थामा बोला--प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അശ്വത്ഥാമാവ് രുദ്രനെ ദർശിച്ച് സ്തുതിച്ചു—ശ്മശാനവാസി, ഉഗ്രനും ആത്മതേജസ്സിൽ ദീപ്തനും, മഹാഗണങ്ങളുടെ അധിപതി, സർവ്വവ്യാപി; ഖട്വാംഗധാരി; ജടാധാരി, ബ്രഹ്മചര്യവ്രതസ്ഥൻ. സൗപ്തിക സംഭവത്തിന്റെ നൈതിക മങ്ങലിൽ ഈ ദർശനം അവനെ ഭയങ്കര തപസ്വി-ദൈവത്തിലേക്ക് തിരിക്കുന്നു; അവിടെ ധർമ്മയുദ്ധത്തിന്റെ അതിരുകൾ തകർന്നുവീഴുന്നു।
Verse 5
मनसा सुविशुद्धेन दुष्करेणाल्पचेतसा । सो5हमात्मोपहारेण यक्ष्ये त्रिपुरघातिनम्,अश्वत्थामा बोला--प्रभो! आप उग्र, स्थाणु, शिव, रुद्र, शर्व, ईशान, ईश्वर और गिरिश आदि नामोंसे प्रसिद्ध वरदायक देवता तथा सम्पूर्ण जगत्को उत्पन्न करनेवाले परमेश्वर हैं। आपके कण्ठमें नील चिह्न है। आप अजन्मा एवं शुद्धात्मा हैं। आपने ही दक्षके यज्ञका विनाश किया है। आप ही संहारकारी हर, विश्वरूप, भयानक नेत्रोंवाले, अनेक रूपधारी तथा उमादेवीके प्राणनाथ हैं। आप श्मशानमें निवास करते हैं। आपको अपनी शक्तिपर गर्व है। आप अपने महान् गणोंके अधिपति, सर्वव्यापी तथा खट्वांगधारी हैं, उपासकोंका दुःख दूर करनेवाले रुद्र हैं, मस्तकपर जटा धारण करनेवाले ब्रह्मचारी हैं। आपने त्रिपुरासुरका विनाश किया है। मैं विशुद्ध हृदयसे अपने-आपकी बलि देकर, जो मन्दमति मानवोंके लिये अति दुष्कर है, आपका यजन करूँगा
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അശ്വത്ഥാമാവ് പറഞ്ഞു: “മനസ്സിനെ പൂർണ്ണമായി വിശുദ്ധമാക്കി—അൽപബുദ്ധിക്ക് ഇത് അത്യന്തം ദുഷ്കരമായ നിശ്ചയമായാലും—ഞാൻ എന്നെത്തന്നെ അർപ്പണമായി നൽകി ത്രിപുരഘാതിയായ പ്രഭുവിനെ യജിക്കും.” യുദ്ധാനന്തരത്തിൽ ഈ വാക്ക് ഭക്തിയെ പരമവ്രതമാക്കുന്നു—ആത്മസമർപ്പണത്തിലൂടെ ശിവന്റെ അനുമതിയും ശക്തിയും തേടുന്നു।
Verse 6
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमों अश्वत्थामाकी चिन्ताविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,स्तुतं स्तुत्यं स््तूयमानममोघं कृत्तिवाससम् | विलोहितं नीलकण्ठमसहां दुर्निवारणम् पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഭൂതകാലത്തും നിങ്ങളെ സ്തുതിച്ചിട്ടുണ്ട്; ഭാവിയിലും നിങ്ങൾ സദാ സ്തുത്യനായിരിക്കും; ഇപ്പോഴും നിങ്ങളെ സ്തുതിക്കുന്നു. നിങ്ങളുടെ ഒരു സംकल्पവും നിഷ്ഫലമാകുന്നില്ല. നിങ്ങൾ കൃത്തിവാസൻ, ലോഹിതവർണ്ണൻ, നീലകണ്ഠൻ; നിങ്ങളുടെ വേഗം അസഹ്യം, നിങ്ങളുടെ ഗതി തടയുക അത്യന്തം ദുഷ്കരം. ഇങ്ങനെ സ്തോത്രം പ്രഭുവിന്റെ അപ്രതിരോധ്യ ശക്തിയും അമോഘ ഇച്ഛയും പാടുന്നു; സൗപ്തിക സംഭവത്തിലെ ഹിംസയും നൈതിക തകർച്ചയും നടുവിൽ ശരണാഗതിയെയേ ആശ്രയമായി സ്ഥാപിക്കുന്നു।
Verse 7
शुक्र ब्रह्मसजं ब्रद्यम॒ ब्रह्मचारिणमेव च । व्रतवन्तं तपोनिष्ठमनन्तं तपतां गतिम्,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृतशिवार्चने सप्तमो5ध्याय:
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവൻ തേജോമയൻ, ബ്രഹ്മാവിന്റെ കാരണവും ആശ്രയവും, നിത്യ ബ്രഹ്മചാരിയുമാണ്; വ്രതധാരി, തപസ്സിൽ അചഞ്ചലൻ, അനന്തൻ, തപസ്വികളുടെ പരമാശ്രയവും പരമഗതിയും.
Verse 8
बहुरूपं गणाध्यक्ष॑ त्रयक्षं पारिषदप्रियम् | धनाध्यक्षेक्षितमुखं गौरीहृदयवल्लभम्,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—നീ ബഹുരൂപൻ, ഗണങ്ങളുടെ അധിപൻ, ത്രിനേത്രൻ, നിന്റെ പാരിഷദന്മാർക്ക് അതിപ്രിയൻ. ധനാധ്യക്ഷനായ കുബേരൻ നിത്യം നിന്റെ മുഖത്തേക്കു ദൃഷ്ടി പതിപ്പിക്കുന്നു; നീ ഗൗരിയുടെ ഹൃദയവല്ലഭൻ.
Verse 9
कुमारपितरं पिड़ं गोवृषोत्तमवाहनम् | तनुवाससमत्युग्रमुमा भूषणतत्परम्,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—(ഞാൻ ശരണം പ്രാപിക്കുന്നു) കുമാരൻ കാർത്തികേയന്റെ പിതാവായ, പിംഗളവർണ്ണനായ, ശ്രേഷ്ഠവാഹനമായി വൃഷഭമുള്ളവനായ; അതിസൂക്ഷ്മ വസ്ത്രധാരിയായിട്ടും ശക്തിയിൽ അത്യുഗ്രനായ, ഉമയെ അലങ്കരിക്കുന്നതിൽ നിത്യം തത്പരനായ ദേവനിൽ.
Verse 10
परं परेभ्य: परम॑ परं यस्मान्न विद्यते । इष्वस्त्रोत्तमभर्तारें दिगन्तं देशरक्षिणम्,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—നീ പരമങ്ങളിൽ പരമൻ; നിന്നേക്കാൾ ഉയർന്നതായി ഒന്നും അറിയപ്പെടുന്നില്ല. നീ ശ്രേഷ്ഠ ഇഷ്വസ്ത്രങ്ങളുടെ അധിപൻ, ദിഗന്തവ്യാപി, സർവ്വദേശങ്ങളുടെ രക്ഷകൻ.
Verse 11
हिरण्यकवचं देवं चन्द्रमौलिवि भूषणम् । प्रपद्ये शरणं देव॑ं परमेण समाधिना,पूर्वकालमें आपकी स्तुति की गयी है, भविष्यमें भी आप स्तुतिके योग्य बने रहेंगे और वर्तमानकालमें भी आपकी स्तुति की जाती है। आपका कोई भी संकल्प या प्रयत्न व्यर्थ नहीं होता। आप व्याप्र-चर्ममय वस्त्र धारण करते हैं, लोहितवर्ण और नीलकण्ठ हैं। आपके वेगको सहन करना असम्भव है और आपको रोकना सर्वथा कठिन है। आप शुद्धस्वरूप ब्रह्म हैं। आपने ही ब्रह्माजीकी सृष्टि की है। आप ब्रह्मचारी, व्रतधारी तथा तपोनिष्ठ हैं, आपका कहीं अन्त नहीं है। आप तपस्वी जनोंके आश्रय, बहुत-से रूप धारण करनेवाले तथा गणपति हैं। आपके तीन नेत्र हैं। अपने पार्षदोंको आप बहुत प्रिय हैं। धनाध्यक्ष कुबेर सदा आपका मुख निहारा करते हैं। आप गौरांगिनी गिरिराजनन्दिनीके हृदय-वल्लभ हैं। कुमार कार्तिकेयके पिता भी आप ही हैं। आपका वर्ण पिंगल है। वृषभ आपका श्रेष्ठ वाहन है। आप अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र धारण करनेवाले और अत्यन्त उग्र हैं। उमादेवीको विभूषित करनेमें तत्पर रहते हैं। ब्रह्मा आदि देवताओंसे श्रेष्ठ और परात्पर हैं। आपसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है। आप उत्तम धनुष धारण करनेवाले, दिगन्तव्यापी तथा सब देशोंके रक्षक हैं। आपके श्रीअंगोंमें सुवर्णमय कवच शोभा पाता है। आपका स्वरूप दिव्य है तथा आप चन्द्रमय मुकुटसे विभूषित होते हैं। मैं अपने चित्तको पूर्णतः एकाग्र करके आप परमेश्वरकी शरणमें आता हूँ
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—സ്വർണ്ണകവചധാരിയും ചന്ദ്രമൗലിയാൽ വിഭൂഷിതനുമായ ആ ദേവനിൽ ഞാൻ ശരണം പ്രാപിക്കുന്നു. പരമ സമാധിയോടെ, പൂർണ്ണ ഏകാഗ്രതയോടെ, ആ ദേവനെയേ ഞാൻ ആശ്രയിക്കുന്നു.
Verse 12
इमां चेदापदं घोरां तराम्यद्य सुदुष्कराम् । सर्वभूतोपहारेण यक्ष्येडहं शुचिना शुचिम्,यदि मैं आज इस अत्यन्त दुष्कर और भयंकर विपत्तिसे पार पा जाऊँ तो मैं सर्वभूतमय पवित्र उपहार समर्पित करके आप परम पावन परमेश्वरकी पूजा करूँगा
ഇന്ന് ഞാൻ ഈ അത്യന്തം ദുഷ്കരവും ഭയാനകവുമായ ആപത്തിൽ നിന്ന് കടന്നുപോകാൻ കഴിഞ്ഞാൽ, ശുദ്ധഹൃദയത്തോടെ സർവ്വഭൂതമയമായ പവിത്രോപഹാരം അർപ്പിച്ച് പരമപാവനനായ പരമേശ്വരനെ ആരാധിക്കും।
Verse 13
इति तस्य व्यवसिते ज्ञात्वा योगात् सुकर्मण: । पुरस्तात् काज्चनी वेदी प्रादुरासीन्महात्मन:,इस प्रकार अश्वत्थामाका दृढ़ निश्चय जानकर उसके शुभकर्मके योगसे उस महामनस्वी वीरके आगे एक सुवर्णमयी वेदी प्रकट हुई
ഇങ്ങനെ അവന്റെ ദൃഢനിശ്ചയം അറിഞ്ഞ്, അവന്റെ പുണ്യകർമ്മയോഗബലത്താൽ, ആ മഹാത്മാവായ വീരന്റെ മുമ്പിൽ ഒരു സ്വർണമയ വേദി പെട്ടെന്ന് പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു।
Verse 14
तस्यां वेद्यां तदा राजंश्रित्रभानुरजायत । स दिशो विदिश: खं च ज्वालाभिरिव पूरयन्,राजन! उस वेदीपर तत्काल ही अग्निदेव प्रकट हो गये, जो अपनी ज्वालाओंसे सम्पूर्ण दिशाओं-विदिशाओं और आकाशको परिपूर्ण-सा कर रहे थे
രാജാവേ! ആ വേദിയിൽ അതേ നിമിഷം അഗ്നിദേവൻ പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു; തന്റെ ജ്വാലകളാൽ ദിക്കുകളും ഉപദിക്കുകളും ആകാശവും നിറയ്ക്കുന്നതുപോലെ തോന്നി।
Verse 15
दीप्तास्यनयनाश्षात्र नैकपादशिरोभुजा: । रत्नचित्राज्भदधरा: समुद्यतकरास्तथा
അവർക്ക് ജ്വലിക്കുന്ന മുഖവും കണ്ണുകളും; ആയുധധാരികൾ; ചിലർക്കു പല കാലുകളും തലകളും ഭുജങ്ങളും; രത്നചിത്രിത വസ്ത്രങ്ങൾ ധരിച്ച്, കൈകൾ ഉയർത്തി പ്രഹരിക്കാൻ ഒരുങ്ങിയവരായി തോന്നി।
Verse 16
श्ववराहोष्ट्रूपाश्व॒ हयगोमायुगोमुखा:,उनके रूप कुत्ते, सूअर और ऊँटोंके समान थे; मुँह घोड़ों, गीदड़ों और गाय-बैलोंके समान जान पड़ते थे। किन्हींके मुख रीछोंके समान थे तो किन्हींके बिलावोंके समान। कोई बाघोंके समान मुँहवाले थे तो कोई चीतोंके। कितने ही गणोंके मुख कौओं, वानरों, तोतों, बड़े-बड़े अजगरों और हंसोंके समान थे। भारत! कितनोंकी कान्ति भी हंसोंके समान सफेद थी, कितने ही गणोंके मुख कठफोरवा पक्षी और नीलकण्ठके समान थे
അവരുടെ രൂപങ്ങൾ നായ, പന്നി, ഒട്ടകം എന്നിവയെപ്പോലെ; മുഖങ്ങൾ കുതിര, കുറുനരി, പശു-കാള എന്നിവയെപ്പോലെ തോന്നി. ചിലർക്കു കരടിമുഖം, ചിലർക്കു പൂച്ചമുഖം; ചിലർ കടുവമുഖം, ചിലർ പുലിമുഖം (ചിതാമുഖം). അനേകം ഗണങ്ങൾക്ക് കാക്ക, കുരങ്ങ്, തത്ത, മഹാ അജഗരം, ഹംസം എന്നിവയെപ്പോലുള്ള മുഖങ്ങൾ. ഹേ ഭാരതാ! ചിലരുടെ കാന്തിയും ഹംസത്തെപ്പോലെ വെളുത്തതായിരുന്നു; പലരുടെയും മുഖങ്ങൾ മരംകൊത്തി (woodpecker)യും നീലകണ്ഠ പക്ഷിയും പോലെയായിരുന്നു।
Verse 17
ऋक्षमार्जारवदना व्याप्रद्वीपिमुखास्तथा । काकवकत्रा: प्लवमुखा: शुकवक्त्रास्तथैव च,उनके रूप कुत्ते, सूअर और ऊँटोंके समान थे; मुँह घोड़ों, गीदड़ों और गाय-बैलोंके समान जान पड़ते थे। किन्हींके मुख रीछोंके समान थे तो किन्हींके बिलावोंके समान। कोई बाघोंके समान मुँहवाले थे तो कोई चीतोंके। कितने ही गणोंके मुख कौओं, वानरों, तोतों, बड़े-बड़े अजगरों और हंसोंके समान थे। भारत! कितनोंकी कान्ति भी हंसोंके समान सफेद थी, कितने ही गणोंके मुख कठफोरवा पक्षी और नीलकण्ठके समान थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവരിൽ ചിലർക്കു കരടിയുടെയും പൂച്ചയുടെയും പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ; ചിലർക്കു പുലിയുടെയും ചിതയുടെയും പോലെയുള്ള വായുകൾ. ചിലർ കാക്കമുഖർ, ചിലർ കുരങ്ങുമുഖർ, ചിലർ തത്തപോലെയുള്ള മുഖവുമുള്ളവർ ആയിരുന്നു.
Verse 18
महाजगरवक्त्राश्व हंसवक्त्रा: सितप्रभा: । दार्वाघाटमुखाश्नलापि चाषवक्त्राश्न भारत,उनके रूप कुत्ते, सूअर और ऊँटोंके समान थे; मुँह घोड़ों, गीदड़ों और गाय-बैलोंके समान जान पड़ते थे। किन्हींके मुख रीछोंके समान थे तो किन्हींके बिलावोंके समान। कोई बाघोंके समान मुँहवाले थे तो कोई चीतोंके। कितने ही गणोंके मुख कौओं, वानरों, तोतों, बड़े-बड़े अजगरों और हंसोंके समान थे। भारत! कितनोंकी कान्ति भी हंसोंके समान सफेद थी, कितने ही गणोंके मुख कठफोरवा पक्षी और नीलकण्ठके समान थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ ഭാരതാ! ചിലർക്കു മഹാ അജഗരത്തെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ, ചിലർക്കു കുതിരയുടെയും ഹംസത്തിന്റെയും പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ; അവർ മങ്ങിയ വെളുത്ത പ്രഭയിൽ തിളങ്ങി. ചിലർക്കു ദാർവാഘാട പക്ഷിയെപ്പോലെയുള്ള വായുകൾ, ചിലർക്കു ചാഷ പക്ഷിയെപ്പോലെയുള്ളവയും ഉണ്ടായിരുന്നു.
Verse 19
कूर्मनक्रमुखा श्वैव शिशुमारमुखास्तथा । महामकरवक्त्राश्ष॒ तिमिवक्त्रास्तथैव च,इसी प्रकार बहुत-से गण कछुए, नाकें, सूँस, बड़े-बड़े मगर, तिमि नामक मत्स्य, मोर, क्रौंच (कुरर), कबूतर, हाथी, परेवा तथा मदगु नामक जलपक्षीके समान मुखवाले थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—പല സംഘങ്ങൾക്കും ആമയുടെയും മുതലയുടെയും പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ ഉണ്ടായിരുന്നു; അതുപോലെ ചിലർക്കു ശിശുമാര (നദി-ഡോൾഫിൻ) പോലെയുള്ള മുഖങ്ങളും. ചിലർക്കു മഹാമകരത്തെപ്പോലെ വിസ്തൃതമായി പിളർന്ന വായുകൾ, ചിലർക്കു തിമി മത്സ്യത്തെപ്പോലെയുള്ള വായുകളും ഉണ്ടായിരുന്നു.
Verse 20
हरिवक्त्रा: क्रौड्चमुखा: कपोतेभमुखास्तथा । पारावतमुखाश्वैव मद्गुवक्त्रास्तथैव च,इसी प्रकार बहुत-से गण कछुए, नाकें, सूँस, बड़े-बड़े मगर, तिमि नामक मत्स्य, मोर, क्रौंच (कुरर), कबूतर, हाथी, परेवा तथा मदगु नामक जलपक्षीके समान मुखवाले थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ചിലർക്കു സിംഹത്തെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ, ചിലർക്കു ക്രൗഞ്ച പക്ഷിയെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ; ചിലർക്കു പ്രാവിന്റെയും ആനയുടെയും പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ; ചിലർക്കു പരാവതത്തെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ, ചിലർക്കു മദ്ഗു എന്ന ജലപക്ഷിയെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങളും ഉണ്ടായിരുന്നു.
Verse 21
किन्हींके हाथोंमें ही कान थे। कितने ही हजार-हजार नेत्र और लंबे पेटवाले थे। कितनोंके शरीर मांसरहित, हड्ियोंके ढाँचे मात्र थे। भरतनन्दन! कोई कौओंके समान मुखवाले थे तो कोई बाजके समान। राजन! किन्हीं-किन्हींके तो सिर ही नहीं थे। भारत! कोई-कोई भालूके समान मुखवाले थे। उन सबके नेत्र और जिह्लाएँ तेजसे प्रज्वलित हो रही थीं। अंगोंकी कान्ति आगकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ചിലർക്കു കൈകളിലേ തന്നെ ചെവികൾ ഉണ്ടായിരുന്നു. ചിലർക്കു ആയിരങ്ങളായിരം കണ്ണുകളും നീണ്ട വയറുകളും. ചിലർ മാംസരഹിതർ—എല്ലുകളുടെ പഞ്ചരം മാത്രം. ഭരതനന്ദനാ! ചിലർ കാക്കമുഖർ, ചിലർ പരുന്തുമുഖർ; രാജാവേ! ചിലർ ശിരസ്സില്ലാത്തവരും ആയിരുന്നു. ഹേ ഭാരതാ! ചിലർക്കു കരടിയെപ്പോലെയുള്ള മുഖങ്ങൾ. അവരുടെ എല്ലാവരുടെയും കണ്ണുകളും നാവുകളും തേജസ്സാൽ ജ്വലിച്ചു; അവയവങ്ങളുടെ കാന്തി അഗ്നിജ്വാലപോലെ തോന്നി.
Verse 22
तथैवाशिरसो राजन्नृक्षवक्त्राश्च॒ भारत । प्रदीप्तनेत्रजिद्वाश्न॒ ज्वालावर्णास्तथैव च,किन्हींके हाथोंमें ही कान थे। कितने ही हजार-हजार नेत्र और लंबे पेटवाले थे। कितनोंके शरीर मांसरहित, हड्ियोंके ढाँचे मात्र थे। भरतनन्दन! कोई कौओंके समान मुखवाले थे तो कोई बाजके समान। राजन! किन्हीं-किन्हींके तो सिर ही नहीं थे। भारत! कोई-कोई भालूके समान मुखवाले थे। उन सबके नेत्र और जिह्लाएँ तेजसे प्रज्वलित हो रही थीं। अंगोंकी कान्ति आगकी ज्वालाके समान जान पड़ती थी
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ രാജാവേ, ഹേ ഭാരതാ! അതുപോലെ ചിലർ ശിരസ്സില്ലാത്തവരായി പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു; ചിലരുടെ മുഖം കരടിപോലെയായിരുന്നു. അവരുടെ കണ്ണുകളും നാവുകളും ഉഗ്രതേജസ്സോടെ ജ്വലിച്ചു; അവരുടെ ദേഹവർണം അഗ്നിജ്വാലയുടെ നിറംപോലെ തോന്നി.
Verse 23
पाणिकर्णा: सहस्राक्षास्तथैव च महोदरा: । निर्मासा: काकवकत्राश्ष श्येनवक्त्राक्ष भारत,ज्वालाकेशाश्र राजेन्द्र ज्वलद्रोमचतुर्भुजा: । मेषवक्त्रास्तथैवान्ये तथा छागमुखा नृप राजेन्द्र! उनके केश भी अग्नि-शिखाके समान प्रतीत होते थे। उनका रोम-रोम प्रज्वलित हो रहा था। उन सबके चार भुजाएँ थीं। नरेश्वर! कितने ही गणोंके मुख भेड़ों और बकरोंके समान थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ ഭാരതാ! ചിലർക്കു ചെവികളുടെ സ്ഥാനത്ത് കൈകൾ ഉണ്ടായിരുന്നു; ചിലർക്കു സഹസ്രനേത്രങ്ങൾ; ചിലർക്കു മഹാവിശാലമായ ഉദരം. ചിലർ മാംസരഹിതർ; ചിലരുടെ മുഖം കാക്കപോലെ; ചിലരുടെ മുഖവും കണ്ണുകളും പരുന്തുപോലെ. ഹേ രാജേന്ദ്രാ! അവരുടെ കേശം അഗ്നിശിഖപോലെ ജ്വലിച്ചു; രോമരോമം കത്തിപ്പൊള്ളുകയായിരുന്നു; എല്ലാവർക്കും നാലു ഭുജങ്ങൾ. ഹേ നൃപാ! പലർക്കും ആടുപോലെയുള്ള മുഖം; പലർക്കും മേക്കുപോലെയുള്ള മുഖം.
Verse 24
शड्खाभा: शड्खवक्त्राश्न शड्खवर्णास्तथैव च । शड्खमालापरिकरा: शड्खध्वनिसमस्वना:
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ ശംഖംപോലെ ദീപ്തരായിരുന്നു; അവരുടെ മുഖം ശംഖംപോലെ, ദേഹവർണവും ശംഖശ്വേതം. ശംഖാകൃതിയിലുള്ള മാലകളാൽ അലങ്കരിക്കപ്പെട്ട അവർ ശംഖധ്വനിക്കു തുല്യമായ നാദം മുഴക്കുകയായിരുന്നു.
Verse 25
कितनोंके मुख, वर्ण और कान्ति शंखके सदृश थे। वे शंखकी मालाओंसे अलंकृत थे और उनके मुखसे शंखध्वनिके समान ही शब्द प्रकट होते थे ।। जटाधरा: पञ्चशिखास्तथा मुण्डा: कृशोदरा: । चरतुर्वष्टा श्षतुर्जिह्ना: शड्कुकर्णा: किरीटिन:,कोई समूचे सिरपर जटा धारण करते थे, कोई पाँच शिखाएँ रखते थे और कितने ही मूड़ मुड़ाये रहते थे। बहुतोंके उदर अत्यन्त कृश थे, कितनोंके चार दाढ़ें और चार जिद्वाएँ थीं। किन्हींके कान खूँटीके समान जान पड़ते थे और कितने ही पार्षद अपने मस्तकपर किरीट धारण करते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവരിൽ ചിലർ മുഴുവൻ തലയിൽ ജട ധരിച്ചിരുന്നു; ചിലർക്കു അഞ്ചു ശിഖകൾ; ചിലർ മുണ്ഡിതർ. പലർക്കും ഉദരം അത്യന്തം ക്ഷീണിതമായിരുന്നു. ചിലർക്കു നാല് ദംഷ്ട്രകളും നാല് നാവുകളും ഉണ്ടായിരുന്നു. ചിലരുടെ ചെവികൾ കൂർത്ത കുത്തുപോലെ തോന്നി; ചിലർ തലയിൽ കിരീടം ധരിച്ചിരുന്നു.
Verse 26
मौज्जीधराश्न राजेन्द्र तथा कुज्चितमूर्थजा: । उष्णीषिणो मुकुटिनश्नारुवक्त्रा: स्वलड्कृता:,राजेन्द्र! कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे, किन्हींके सिरके बाल घूँघराले दिखायी देते थे, कोई पगड़ी धारण किये हुए थे तो कोई मुकुट। कितनोंके मुख बड़े ही मनोहर थे। कितने ही सुन्दर आभूषणोंसे विभूषित थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ രാജേന്ദ്രാ! ചിലർ മുന്ജാ പുല്ലിന്റെ മേഘല ധരിച്ചിരുന്നു; ചിലരുടെ മുടി ചുരുളുകളായി തോന്നി. ചിലർ ഉഷ്ണീഷം (പാഗടി) കെട്ടിയിരുന്നു; ചിലർ മുകുടധാരികൾ. പലർക്കും മനോഹരമായ മുഖം; പലരും മനോഹരാഭരണങ്ങളാൽ അലങ്കരിക്കപ്പെട്ടിരുന്നു.
Verse 27
पद्मोत्पलापीडधरास्तथा मुकुटधारिण: । माहात्म्येन च संयुक्ताः शतशो5थ सहस्रश:
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ പദ്മവും നീലപദ്മവും കൊണ്ടുള്ള മാലകളും പുഷ്പമകുടങ്ങളും ധരിച്ചു; തലയിൽ കിരീടങ്ങളും അണിഞ്ഞിരുന്നു. ദിവ്യ മഹാത്മ്യത്തോടെ സമ്പന്നരായ അവർ നൂറുകളായും ആയിരങ്ങളായും പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു.
Verse 28
कोई अपने मस्तकपर कमलों और कुमुदोंका किरीट धारण करते थे। बहुतोंने विशुद्ध मुकुट धारण कर रखा था। वे भूतगण सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें थे और सभी अद्भुत माहात्म्यसे सम्पन्न थे ।। शतघ्नीवज्रहस्ताश्व॒ तथा मुसलपाणय: । भुशुण्डीपाशहस्ताश्न दण्डहस्ताश्व॒ भारत,भारत! उनके हाथोंमें शतघ्नी, वज्र, मूसल, भुशुण्डी, पाश और दण्ड शोभा पाते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ ഭാരതാ! അവരുടെ കൈകളിൽ ശതഘ്നി, വജ്രം, മുസലം, ഭുശുണ്ഡി, പാശം, ദണ്ഡം എന്നീ ഭയങ്കര വിനാശായുധങ്ങൾ ശോഭിച്ചു. അവർ നൂറുകളായും ആയിരങ്ങളായും, അത്ഭുതശക്തിയോടെ, പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു.
Verse 29
पृष्ठेषु बद्धेषुधयश्चित्रबवाणोत्कटास्तथा । सध्वजा: सपताकाश्न सघण्टा: सपरश्वधा:,उनकी पीठोंपर तरकस बँधे थे। वे विचित्र बाण लिये युद्धके लिये उन्मत्त जान पड़ते थे। उनके पास ध्वजा, पताका, घंटे और फरसे मौजूद थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവരുടെ പുറത്ത് അമ്പുതൂണികൾ കെട്ടിയിരുന്നു; വിചിത്രവും ഭീകരവുമായ അമ്പുകൾ ധരിച്ചു അവർ യുദ്ധോന്മത്തരായി തോന്നി. അവരുടെ കൈവശം ധ്വജങ്ങളും പതാകകളും ഘണ്ടകളും പരശുക്കളും ഉണ്ടായിരുന്നു.
Verse 30
महापाशोद्यतकरास्तथा लगुडपाणय: । स्थूणाहस्ता: खड्गहस्ता: सर्पोच्छितकिरीटिन:,उन्होंने अपने हाथोंमें बड़े-बड़े पाश उठा रखे थे, कितनोंके हाथोंमें डंडे, खम्भे और खड्ग शोभा पाते थे तथा कितनोंके मस्तकपर सर्पोके उन्नत किरीट सुशोभित होते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ചിലർ ഉയർത്തിയ കൈകളിൽ മഹാപാശങ്ങൾ പിടിച്ചിരുന്നു; ചിലരുടെ കൈകളിൽ ലഗുഡം, തൂൺ, ഖഡ്ഗം എന്നിവ ശോഭിച്ചു. ചിലരുടെ മസ്തകത്തിൽ സർപ്പഫണത്തെപ്പോലെ ഉയർന്ന മകുടങ്ങൾ ഭയം വർധിപ്പിച്ചു.
Verse 31
महासर्पाज्गभिदधराश्षित्राभरणधारिण: । रजोध्वस्ता: पड्कदिग्धा: सर्वे शुक्लाम्बरस्रज:
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ മഹാസർപ്പത്തിന്റെ ഫണത്തെപ്പോലെയുള്ള ചിഹ്നങ്ങൾ ധരിച്ചു, വിചിത്രാഭരണങ്ങൾ അണിഞ്ഞിരുന്നു. ശ്വേതവസ്ത്രങ്ങളും മാലകളും ധരിച്ചിരുന്നിട്ടും അവർ പൊടിയിൽ മൂടപ്പെട്ടും ചെളിയിൽ ലിപ്തരുമായിരുന്നു.
Verse 32
कितनोंने बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प धारण कर रखे थे। कितने ही विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे, बहुतोंके शरीर धूलि-धूसर हो रहे थे। कितने ही अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटे हुए थे। उन सबने श्वेत वस्त्र और श्वेत फ़ूलोंकी माला धारण कर रखी थी ।। नीलाजड़्ा: पिड़लाड्राश्न मुण्डवक्त्रास्तथैव च | भेरीशड्खमृदड्ांश्ष झर्सरानकगोमुखान्,कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ആ പാർഷദന്മാരിൽ ചിലർക്കു നീലജടകൾ, ചിലർക്കു പിംഗളവർണ്ണമായ അവയവങ്ങൾ, ചിലർ മുണ്ഡിതശിരസ്സുകാർ; ചിലർ സ്വർണ്ണപ്രഭയിൽ ദീപ്തരായിരുന്നു. ഹർഷോന്മത്തരായി അവർ ഭേരിയും ശംഖും മുഴക്കി, മൃദംഗം അടിച്ചു, ഝർഝര, ആനക, ഗോമുഖ വാദ്യങ്ങൾ നിനദിപ്പിച്ചു; ചിലർ പാടുകയും അനേകർ നൃത്തം ചെയ്യുകയും ചെയ്തു.
Verse 33
अवादयन् पारिषदा: प्रह्ृष्ा: कनकप्रभा: । गायमानास्तथैवान्ये नृत्यमानास्तथा परे,कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഹർഷത്തിൽ പ്രഹർഷിതരും സ്വർണ്ണപ്രഭപോലെ ദീപ്തരുമായ ആ പാർഷദന്മാർ വാദ്യങ്ങൾ മുഴക്കിത്തുടങ്ങി. ചിലർ പാടുകയും ചിലർ നൃത്തം ചെയ്യുകയും ചെയ്തു.
Verse 34
लड्घन्त: प्लवन्तश्न वल्गन्तश्न॒ महारथा: । धावन्तो जवना मुण्डा: पवनोद्धूतमूर्धजा:,वे महारथी भूतगण उछलते, कूदते और लाँघते हुए बड़े वेगसे दौड़ रहे थे। उनमेंसे कितने तो माथ मुँड़ाये हुए थे और कितनोंके सिरके बाल हवाके झोंकेसे ऊपरकी ओर उठ गये थे
ആ മഹാരഥന്മാരെപ്പോലെയുള്ള ഭൂതഗണം ചാടിയും കുതിച്ചും തടസ്സങ്ങൾ ലംഘിച്ചും മഹാവേഗത്തിൽ പാഞ്ഞു. ചിലർ മുണ്ഡിതർ; ചിലരുടെ മുടി കാറ്റിന്റെ കുത്തിൽ മേലോട്ടുയർന്നു പറന്നു.
Verse 35
मत्ता इव महानागा विनदन्तो मुहुर्मुहु: । सुभीमा घोररूपाश्न शूलपट्टिशपाणय:,वे मतवाले गजराजोंके समान बारंबार गर्जना करते थे। उनके हाथोंमें शूल और पट्टिश दिखायी देते थे। वे घोर रूपधारी और भयंकर थे
മത്തമായ മഹാനാഗങ്ങളെപ്പോലെ അവർ വീണ്ടും വീണ്ടും ഗർജിച്ചു. അവരുടെ കൈകളിൽ ശൂലവും പട്ടിശവും ഉണ്ടായിരുന്നു. അവർ ഘോരരൂപികളും അത്യന്തം ഭയങ്കരരുമായിരുന്നു.
Verse 36
नानाविरागवसनाश्षित्रमाल्यानुलेपना: । रत्नचित्राड्भदधरा: समुद्यतकरास्तथा,उनके वस्त्र नाना प्रकारके रंगोंमें रँगे हुए थे। वे विचित्र माला और चन्दनसे अलंकृत थे। उन्होंने रत्ननिर्मित विचित्र अंगद धारण कर रखे थे और उन सबके हाथ ऊपरकी ओर उठे हुए थे
അവരുടെ വസ്ത്രങ്ങൾ നാനാവർണ്ണങ്ങളിൽ വർണ്ണിതമായിരുന്നു. വർണ്ണമാലകളും ചന്ദനലേപനങ്ങളും കൊണ്ട് അവർ അലങ്കൃതരായിരുന്നു. രത്നം പതിപ്പിച്ച അങ്കദങ്ങൾ ധരിച്ചു, എല്ലാവരും കൈകൾ ഉയർത്തിയിരുന്നു.
Verse 37
हन्तारो द्विषतां शूरा: प्रसहाासहुविक्रमा: । पातारो5सृग्वसौधानां मांसान्त्रकृतभोजना:,वे शूरवीर पार्षद हठपूर्वक शत्रुओंका वध करनेमें समर्थ थे। उनका पराक्रम असहा था। वे रक्त और वसा पीते तथा आँत और मांस खाते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ ശത്രുസംഹാരകരായ വീരന്മാർ; ബലപ്രയോഗത്തോടെ മുന്നേറുന്ന, തടയാനാവാത്ത പരാക്രമശാലികൾ. വീണവരുടെ രക്തവും കൊഴുപ്പും അവർ കുടിച്ചു; മാംസവും ആന്ത്രങ്ങളും തന്നെയായിരുന്നു അവരുടെ ആഹാരം.
Verse 38
चूडाला: कर्णिकाराश्र प्रह्ष्टा: पिठरोदरा: । अतिहस्वातिदीर्घाक्ष प्रलम्बाश्वातिभैरवा:,कितनोंके मस्तकपर शिखाएँ थीं। कितने ही कनेरके फूल धारण करते थे। बहुतेरे पार्षद अत्यन्त हर्षसे खिल उठे थे। कितनोंके पेट बटलोई या कड़ाहीके समान जान पड़ते थे। कोई बहुत नाटे, कोई बहुत मोटे, कोई बहुत लंबे और कोई अत्यन्त भयंकर थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ചിലരുടെ തലയിൽ ശിഖകൾ ഉണ്ടായിരുന്നു; ചിലർ കർണികാരപുഷ്പങ്ങൾ ധരിച്ചിരുന്നു. പല പരിഷദരും ഉന്മത്തഹർഷത്തിൽ ഉല്ലസിച്ചു; അവരുടെ മുഖങ്ങളിൽ ക്രൂരാനന്ദം തെളിഞ്ഞിരുന്നു. ചിലരുടെ വയറുകൾ പാത്രമോ കടായിയോ പോലെയായിരുന്നു. ചിലർ അത്യന്തം ചെറുതും, ചിലർ വികൃതമായി വലുതും, ചിലർ വളരെ ഉയരമുള്ളവരും, ചിലർ അത്യന്തം ഭയാനകരൂപികളുമായിരുന്നു.
Verse 39
विकटा: काललम्बोष्ठा बृहच्छेफाण्डपिण्डिका: । महार्हनानामुकुटा मुण्डाश्व जटिला: परे,कितनोंके आकार बहुत विकट थे, कितनोंके काले-काले और लंबे ओठ लटक रहे थे, किन्हींके लिंग बड़े थे तो किन्हींके अण्डकोष। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके बहुमूल्य मुकुट शोभा पाते थे, कुछ लोग मथमुंडे थे और कुछ जटाधारी
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ചിലർ അത്യന്തം വികൃതാകൃതിയുള്ളവർ; ചിലർക്കു കറുത്ത, നീണ്ട, തൂങ്ങുന്ന അധരങ്ങൾ. ചിലർക്കു അതിവലുതായ ജനനേന്ദ്രിയങ്ങൾ, ചിലർക്കു വീർന്ന വൃഷണങ്ങൾ. ചിലരുടെ തലയിൽ നാനാവിധ വിലയേറിയ മുകുടങ്ങൾ ശോഭിച്ചു; ചിലർ മുണ്ഡിതർ, ചിലർ ജടാധാരികൾ ആയിരുന്നു.
Verse 40
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रां द्यां कुर्युस्ते महीतले । उत्सहेरंश्व ये हन्तुं भूतग्रामं चतुर्विधम्,वे सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित सम्पूर्ण आकाश-मण्डलको पृथ्वीपर गिरा सकते थे और चार प्रकारके समस्त प्राणिसमुदायका संहार करनेमें समर्थ थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—സൂര്യൻ, ചന്ദ്രൻ, ഗ്രഹങ്ങൾ, നക്ഷത്രങ്ങൾ എന്നിവയോടുകൂടിയ സമസ്ത ആകാശമണ്ഡലത്തെയും ഭൂമിയിലേക്കു വീഴ്ത്താൻ കഴിയുന്നത്ര ശക്തിയുള്ളവർ അവർ. അതുപോലെ ചതുര്വിധമായ സർവ്വ ജീവസമൂഹത്തെയും സംഹരിക്കാൻ അവർക്ക് കഴിയും.
Verse 41
ये च वीतभया नित्यं हरस्य भ्रुकुटीसहा: । कामकारकरा नित्यं त्रैलोक्यस्येश्वरेश्व॒ुरा:,वे सदा निर्भय होकर भगवान् शंकरके भ्रूभंगको सहन करनेवाले थे। प्रतिदिन इच्छानुसार कार्य करते और तीनों लोकोंके ईश्वरोंपर भी शासन कर सकते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ നിത്യവും നിർഭയരായിരുന്നു; ഹരന്റെ (ശങ്കരന്റെ) ഭ്രൂകുടിയുടെ കോപവും സഹിക്കാവുന്നവർ. അവർ പ്രതിദിനം തങ്ങളുടെ ഇഷ്ടപ്രകാരം പ്രവർത്തിച്ചു; ത്രിലോകത്തിലെ ഈശ്വരന്മാരിന്മേലും ആധിപത്യം ചെലുത്താൻ കഴിയുന്നവർ ആയിരുന്നു.
Verse 42
नित्यानन्दप्रमुदिता वागीशा वीतमत्सरा: । प्राप्याष्टगुणमैश्वर्य ये न यास्यन्ति वै स्मयम्,वे पार्षद नित्य आनन्दमें मग्न रहते थे, वाणीपर उनका अधिकार था। उनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या और द्वेष नहीं रह गये थे। वे अणिमा-महिमा आदि आठ प्रकारके ऐश्वर्यको पाकर भी कभी अभिमान नहीं करते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവർ നിത്യാനന്ദത്തിൽ ആഹ്ലാദിതരായി, വാക്കിന്റെ അധിപതികളായി, അസൂയാദ്വേഷരഹിതരായി നിലകൊണ്ടു. അണിമാ-മഹിമാദി അഷ്ടവിധ ഐശ്വര്യം ലഭിച്ചിട്ടും അവർ ഒരിക്കലും അഹങ്കാരത്തിലേക്ക് വീഴുകയില്ലായിരുന്നു.
Verse 43
येषां विस्मयते नित्यं भगवान् कर्मभिह्र: । मनोवाक्कर्मभिय॑क्तिनित्यमाराधितश्न यै:,साक्षात् भगवान् शंकर भी प्रतिदिन उनके कर्मोंको देखकर आश्चर्यचकित हो जाते थे। वे मन, वाणी और क्रियाओंद्वारा सदा सावधान रहकर महादेवजीकी आराधना करते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവരുടെ കർമ്മങ്ങൾ അത്തരം ആയിരുന്നു; ഭഗവാൻ നിത്യവും അവ കണ്ടു വിസ്മയിച്ചു. മനസ്സ്, വാക്ക്, പ്രവൃത്തി എന്നിവയിൽ ശാസനയോടെ അവർ നിരന്തരം ജാഗ്രതയോടെ ആരാധിച്ചു; ദിനംപ്രതി അവർ സാക്ഷാൽ ഭഗവാൻ ശങ്കരനെയേ ആരാധിച്ചു.
Verse 44
मनोवाक्कर्मभिर्भक्तान् पाति पुत्रानिवौरसान् | पिबन्तो5सृग्वसाश्रान्ये क्रुद्धा ब्रह्मद्विषां सदा,मन, वाणी और कर्मसे अपने प्रति भक्ति रखनेवाले उन भक्तोंका भगवान् शिव सदा औरस पुत्रोंकी भाँति पालन करते थे। बहुत-से पार्षद रक्त और वसा पीकर रहते थे। वे ब्रह्मद्रोहियोंपर सदा क्रोध प्रकट करते थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—മനസ്സ്, വാക്ക്, പ്രവൃത്തി എന്നിവകൊണ്ട് ഭക്തിയുള്ള ഭക്തന്മാരെ ഭഗവാൻ ശിവൻ തന്റെ ഔരസ പുത്രന്മാരെപ്പോലെ സദാ പരിപാലിച്ചു. അവന്റെ ചില ഉഗ്രപരിവാരങ്ങൾ രക്തവും വസയും കുടിച്ചാണ് ജീവിച്ചത്; ബ്രാഹ്മണധർമ്മത്തെ ദ്വേഷിക്കുന്നവരോടു അവർ എപ്പോഴും ക്രുദ്ധരായിരുന്നു.
Verse 45
चतुर्विधात्मकं सोम॑ ये पिबन्ति च सर्वदा । श्रुतेन ब्रह्मचर्येण तपसा च दमेन च
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—എവർ സദാ ചതുര്വിധ സോമം ‘പാനം’ ചെയ്യുന്നു, അവർ ശ്രുതി-അധ്യയനം, ബ്രഹ്മചര്യം, തപസ്സ്, ദമം (ഇന്ദ്രിയസംയമം) എന്നിവയിലൂടെ തന്നെയാണ് അത് പാനം ചെയ്യുന്നത്.
Verse 46
यैरात्मभूतैर्भगवान् पार्वत्या च महेश्वरः
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവന്റെ സ്വന്തം ആത്മാവിനുതുല്യരായവരാൽ തന്നെയാണ്, പാർവതീസമേതനായ ഭഗവാൻ മഹേശ്വരൻ സേവിക്കപ്പെടുകയും പരിചരിക്കപ്പെടുകയും ചെയ്തിരുന്നത്.
Verse 47
महाभूतगणैर्भुड्धक्ते भूतभव्यभवत्प्रभु: । वे महाभूतगण भगवान् शिवके आत्मस्वरूप हैं, उनके तथा पार्वतीदेवीके साथ भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी महेश्वर यज्ञ-भाग ग्रहण करते हैं ।। नानावादित्रहसितक्ष्वेडितोत्क्रुष्टगर्जितै:
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—മഹാഭൂതഗണങ്ങളാൽ ചുറ്റപ്പെട്ട്, അവർ സത്യത്തിൽ ഭഗവാൻ ശിവന്റെ ആത്മസ്വരൂപങ്ങളായിരിക്കെ, ഭൂത-വർത്തമാന-ഭവിഷ്യങ്ങളുടെ അധിപനായ മഹേശ്വരൻ പാർവതിദേവിയോടുകൂടെ യജ്ഞഭാഗം സ്വീകരിക്കുന്നു. ചുറ്റുമെങ്ങും നാനാവിധ വാദ്യധ്വനികൾ, ചിരി, വിസിൽപോലുള്ള വിളികൾ, ഉച്ചഘോഷങ്ങൾ, ഗർജ്ജനങ്ങൾ മുഴങ്ങി—പ്രഭുവിന്റെ ഭയാനക മഹിമയെ പ്രഖ്യാപിക്കുന്നു।
Verse 48
संस्तुवन्तो महादेवं भा: कुर्वाणा: सुवर्चस:,भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—മഹാദേവനെ സ്തുതിച്ചുകൊണ്ട്, തങ്ങളുടെ ദീപ്തി ചുറ്റും പരത്തിക്കൊണ്ട്, ഭയാനകവും തേജസ്സുമുള്ള ഭൂതഗണങ്ങൾ അവിടെ ഒന്നിച്ചു കൂടി. അശ്വത്ഥാമാവിലെ തേജസ്സിന്റെ അളവ് അറിയാനും, യോദ്ധാക്കൾ നിദ്രിക്കുന്ന വേളയിൽ സംഭവിക്കാനിരിക്കുന്ന മഹാസംഹാരം കാണാനും അവർ ആഗ്രഹിച്ചു. കൂടാതെ മഹാത്മാവായ ദ്രോണപുത്രന്റെ മഹിമ വർധിപ്പിക്കുവാൻ നാലു ദിക്കുകളിൽ നിന്നുമവർ അവിടെ എത്തി. അവരുടെ കൈകളിൽ ഭീകരമായ പരിഘങ്ങൾ, ജ്വലിക്കുന്ന ദണ്ഡങ്ങൾ, ശൂലം-ത്രിശൂലം, പട്ടിശം എന്നിവ കാന്തിയോടെ തെളിഞ്ഞു।
Verse 49
विवर्धयिषवो द्रौणेमहिमानं महात्मन: । जिज्ञासमानास्तत्तेज: सौप्तिकं च दिदृक्षव:,भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे
മഹാത്മാവായ ദ്രോണപുത്രന്റെ മഹിമ വർധിപ്പിക്കുവാൻ ആഗ്രഹിച്ചു, അവന്റെ തേജസ്സിന്റെ അളവ് അറിയാൻ ഉത്സുകരായി, നിദ്രാവസ്ഥയിൽ സംഭവിക്കാനിരിക്കുന്ന ആ സൗപ്തിക സംഹാരം കാണാൻ മോഹിച്ചു അവർ അവിടെ ഒന്നിച്ചു കൂടി।
Verse 50
भीमोग्रपरिघालातशूलपट्टिशपाणय: । घोररूपा: समाजम्मुर्भूतसड्घा: समन्तत:,भूतोंके वे समूह बड़े भयंकर और तेजस्वी थे तथा सब ओर अपनी प्रभा फैला रहे थे। अश्वत्थामामें कितना तेज है, इस बातको वे जानना चाहते थे और सोते समय जो महान् संहार होनेवाला था, उसे भी देखनेकी इच्छा रखते थे। साथ ही महामनस्वी द्रोणकुमारकी महिमा बढ़ाना चाहते थे; इसीलिये महादेवजीकी स्तुति करते हुए वे चारों ओरसे वहाँ आ पहुँचे। उनके हाथोंमें अत्यन्त भयंकर परिघ, चलते लुआठे, त्रिशूल और पट्टिश शोभा पा रहे थे
ഘോരരൂപമുള്ള ഭൂതസംഘങ്ങൾ എല്ലാദിക്കുകളിൽ നിന്നുമവിടെ എത്തിച്ചേർന്നു; അവരുടെ കൈകളിൽ ഭീമോഗ്ര പരിഘങ്ങൾ, ജ്വലിക്കുന്ന അലാതങ്ങൾ, ശൂലങ്ങൾ, പട്ടിശങ്ങൾ എന്നിവ ഉണ്ടായിരുന്നു।
Verse 51
जनयेयुर्भयं ये सम त्रैलोक्यस्यापि दर्शनात् | तान् प्रेक्षमाणो5पि व्यथां न चकार महाबल:
അവരുടെ ദർശനം മാത്രത്താൽ തന്നെ ത്രൈലോക്യത്തിലും ഭയം ജനിക്കുമായിരുന്നു; അവരെ നോക്കിക്കൊണ്ടിരുന്നിട്ടും ആ മഹാബലൻ അല്പവും വ്യഥപ്പെടുകയില്ലായിരുന്നു।
Verse 52
भगवान् भूतनाथके वे गण दर्शन देनेमात्रसे तीनों लोकोंके मनमें भय उत्पन्न कर सकते थे, तथापि महाबली अअभश्रत्थामा उन्हें देखकर तनिक भी व्यथित नहीं हुआ ।। अथ द्रौणिर्धनुष्पाणिरबद्धगोधाड्गुलित्रवान् । स्वयमेवात्मनात्मानमुपहारमुपाहरत्,तदनन्तर हाथमें धनुष लिये और गोहके चर्मके बने दस्ताने पहने हुए द्रोणकुमारने स्वयं ही अपने-आपको भगवान् शिवके चरणोंमें भेंट चढ़ा दिया
അപ്പോൾ ദ്രോണപുത്രൻ അശ്വത്ഥാമാവ്—കയ്യിൽ ധനുസ്സുമായി, ഗോചർമ്മത്തിൽ നിന്നുള്ള ഇളക്കമുള്ള കൈയുറയും ഭുജരക്ഷയും ധരിച്ച്—സ്വമേധയാ ഭഗവാൻ ശിവന്റെ പാദങ്ങളിൽ താനെയെ ഉപഹാരമായി അർപ്പിച്ചു. ഭൂതനാഥനായ ആ പ്രഭു ദർശനമാത്രം കൊണ്ടുതന്നെ ത്രിലോകഹൃദയങ്ങളിൽ ഭയം ജനിപ്പിക്കാൻ ശേഷിയുള്ളവൻ ആയിരുന്നുവെങ്കിലും, അവനെ കണ്ട മഹാബലി അശ്വത്ഥാമാവ് അല്പവും വിറച്ചില്ല. യുദ്ധത്തിന്റെ ധാർമ്മിക തകർച്ചയുടെ ആ നിർണായക നിമിഷത്തിൽ ശിവേച്ഛയ്ക്ക് കീഴടങ്ങി ശരണം പ്രാപിച്ചു।
Verse 53
धनूंषि समिधस्तत्र पवित्राणि शिता: शरा: । हविरात्मवतश्चात्मा तस्मिन् भारत कर्मणि,भारत! उस आत्मसमर्पणरूपी यज्ञकर्ममें आत्मबल-सम्पन्न अश्वत्थामाका धनुष ही समिधा, तीखे बाण ही कुशा और शरीर ही हविष्यरूपमें प्रस्तुत हुए
ഹേ ഭാരതാ! ആ ആത്മസമർപ്പണ-രൂപ യജ്ഞകർമ്മത്തിൽ ധനുസ്സ് സമിധയായി, മൂർച്ചയുള്ള അമ്പുകൾ പവിത്ര കുശപോലെ ആയി, അന്തർബലസമ്പന്നനായ യോദ്ധാവിന്റെ സ്വന്തം ശരീരമേ ഹവിസ്സായി സമർപ്പിക്കപ്പെട്ടു।
Verse 54
ततः सौम्येन मन्त्रेण द्रोणपुत्र: प्रतापवान् । उपहारं महामन्युरथात्मानमुपाहरत्,फिर महाक्रोधी प्रतापी द्रोणपुत्रने सोमदेवता-सम्बन्धी मन्त्रके- द्वारा अपने शरीरको ही उपहारके रूपमें अर्पित कर दिया
അതിനുശേഷം സൗമ്യമായ, സോമബന്ധിയായ മന്ത്രം ചൊല്ലി—മഹാക്രോധത്തിൽ ജ്വലിച്ചിരുന്നിട്ടും—പ്രതാപവാനായ ദ്രോണപുത്രൻ ഉപഹാരമായി തന്റെ ശരീരത്തെയേ അർപ്പിച്ചു।
Verse 55
त॑ रुद्रं रौद्रकर्माणं रौद्रै: कर्मभिरच्युतम् । अभिष्टत्य महात्मानमित्युवाच कृताञज्जलि:
അപ്പോൾ രൗദ്രകർമ്മങ്ങളുള്ള, രൗദ്ര പ്രവർത്തികളിൽ അചലനായ ആ മഹാത്മാവായ രുദ്രനെ സ്തുതിച്ച്, അവൻ കൃതാഞ്ജലിയോടെ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു।
Verse 56
भयंकर कर्म करनेवाले तथा अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले महात्मा रुद्रदेवकी रौद्रकर्मोद्वारा ही स्तुति करके अश्वत्थामा हाथ जोड़कर इस प्रकार बोला ।। द्रौणिस्वाच इममात्मानमपद्याहं जातमाड्रिरसे कुले । स्वग्नौ जुहोमि भगवन् प्रतिगृह्नीष्व मां बलिम्
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഭയങ്കരകർമ്മങ്ങളുള്ളതും മഹിമയിൽ ഒരിക്കലും ച്യുതനാകാത്തതുമായ മഹാത്മാവായ രുദ്രദേവനെ രൗദ്രകർമ്മങ്ങളെ ആഹ്വാനിച്ച് സ്തുതിച്ച്, അശ്വത്ഥാമാവ് കൃതാഞ്ജലിയോടെ ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു. ദ്രൗണി പറഞ്ഞു—“ആഡ്രിരസകുലത്തിൽ ജനിച്ച ഞാൻ, ഈ എന്റെ ആത്മാവിനെയേ ആശ്രയിക്കുന്നു; എന്റെ സ്വന്തം അഗ്നിയിൽ തന്നെ എന്നെയേ ഹോമം ചെയ്യുന്നു. ഭഗവൻ! എന്നെ ബലിയായി സ്വീകരിക്കണമേ।”
Verse 57
अश्वत्थामाने कहा--भगवन्! आज मैं आंगिरस कुलमें उत्पन्न हुए अपने शरीरकी प्रज्वलित अग्निमें आहुति देता हूँ। आप मुझे हविष्यरूपमें ग्रहण कीजिये ।। भवद्धकत्या महादेव परमेण समाधिना । अस्यामापदि विश्वात्मन्नुपाकुर्मि तवाग्रत:
അശ്വത്ഥാമാവ് പറഞ്ഞു—ഭഗവൻ! ഇന്ന് ആംഗിരസകുലത്തിൽ ജനിച്ച എന്റെ ഈ ശരീരത്തെ പ്രജ്വലിത അഗ്നിയിൽ ആഹുതിയായി അർപ്പിക്കുന്നു. എന്നെ ഹവിഷ്യരൂപമായി സ്വീകരിക്കണമേ. മഹാദേവാ! നിങ്ങളുടെ ഭക്തിയോടും പരമസമാധിയോടും കൂടി, ഹേ വിശ്വാത്മൻ, ഈ ആപത്തിൽ നിങ്ങളുടെ സന്നിധിയിൽ ഞാൻ ഈ ആഹുതി സമർപ്പിക്കുന്നു॥
Verse 58
विश्वात्मन्! महादेव! इस आपत्तिके समय आपके प्रति भक्तिभावसे अपने चित्तको पूर्ण एकाग्र करके आपके समक्ष यह भेंट समर्पित करता हूँ (आप इसे स्वीकार करें) ।। त्वयि सर्वाणि भूतानि सर्वभूतेषु चासि वै । गुणानां हि प्रधानानामेकत्वं त्वयि तिष्ठति,प्रभो! सम्पूर्ण भूत आपमें स्थित हैं और आप सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित हैं। आपमें ही मुख्य-मुख्य गुणोंकी एकता होती है
ഹേ വിശ്വാത്മൻ, ഹേ മഹാദേവ! ഈ ആപത്തുകാലത്ത് നിങ്ങളോടുള്ള ഭക്തിയോടെ ചിത്തത്തെ പൂർണ്ണമായി ഏകാഗ്രമാക്കി നിങ്ങളുടെ സന്നിധിയിൽ ഈ സമർപ്പണം അർപ്പിക്കുന്നു—സ്വീകരിക്കണമേ. സർവ്വഭൂതങ്ങളും നിങ്ങളിൽ നിലകൊള്ളുന്നു; നിങ്ങൾ സർവ്വഭൂതങ്ങളിലുമുണ്ട്. പ്രഭോ! പ്രധാനഗുണങ്ങളുടെ ഏകത്വം നിങ്ങളിൽ തന്നെയാണ് നിലനിൽക്കുന്നത്॥
Verse 59
सर्वभूताश्रय विभो हविर्भूतमवस्थितम् । प्रतिगृहाण मां देव यद्यशक्या: परे मया,विभो! आप सम्पूर्ण भूतोंके आश्रय हैं। देव! यदि शत्रुओंका मेरे द्वारा पराभव नहीं हो सकता तो आप हविष्यरूपमें सामने खड़े हुए मुझ अभश्वत्थामाको स्वीकार कीजिये
ഹേ വിഭോ! നിങ്ങൾ സർവ്വഭൂതങ്ങളുടെ ആശ്രയമാണ്. ദേവാ! എനിക്കാൽ ശത്രുക്കളെ പരാജയപ്പെടുത്താൻ കഴിയാത്ത പക്ഷം, ഹവിഷ്യരൂപമായി നിലകൊള്ളുന്ന എന്നെ—അശ്വത്ഥാമാവിനെ—സ്വീകരിക്കണമേ॥
Verse 60
इत्युक्त्वा द्रौणिरास्थाय तां वेदीं दीप्तपावकाम् | संत्यज्यात्मानमारुहय कृष्णवर्त्मन्युपाविशत्,ऐसा कहकर द्रोणकुमार अश्व॒त्थामा प्रज्वलित अग्निसे प्रकाशित हुई उस वेदीपर चढ़ गया और प्राणोंका मोह छोड़कर आगके बीचमें बैठ गया
ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞിട്ട് ദ്രോണപുത്രനായ അശ്വത്ഥാമാവ് ജ്വലിക്കുന്ന അഗ്നിയാൽ ദീപ്തമായ ആ വേദിയിൽ കയറുകയും, ജീവമോഹം ഉപേക്ഷിച്ച് അഗ്നിയുടെ നടുവിൽ ഇരിക്കയും ചെയ്തു॥
Verse 61
तमूर्ध्वबाहुं निश्चेष्टं दृष्टया हविरुपस्थितम् । अब्रवीद् भगवान् साक्षान्महादेवो हसन्निव,उसे हविष्यरूपसे दोनों बाँहें ऊपर उठाये निश्चेष्ट भावसे बैठे देख साक्षात् भगवान् महादेवने हँसते हुए-से कहा--
അവനെ ഹവിഷ്യരൂപമായി—ഇരുകൈകളും മേലോട്ടുയർത്തി—നിശ്ചേഷ്ടനായി ഇരിക്കുന്നതു കണ്ടപ്പോൾ, സാക്ഷാൽ ഭഗവാൻ മഹാദേവൻ മന്ദഹാസത്തോടെ എന്നപോലെ പറഞ്ഞു—॥
Verse 62
सत्यशौचार्जवत्यागैस्तपसा नियमेन च । क्षान्त्या भक्त्या च धृत्या च बुद्धया च वचसा तथा,“अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणीके द्वारा मेरी यथोचित आराधना की है; अतः श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई मुझे परम प्रिय नहीं है
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു— സത്യം, ശൗചം, ലാളിത്യമില്ലാത്ത നേര്മ, ത്യാഗം, തപസ്സ്, നിയമം, ക്ഷമ, ഭക്തി, ധൈര്യം, ബുദ്ധി, സംയതവാക്യം എന്നിവകൊണ്ട് അനായാസ മഹാകർമ്മനായ ശ്രീകൃഷ്ണൻ എന്നെ യഥാവിധി ആരാധിച്ചു; അതിനാൽ ശ്രീകൃഷ്ണനേക്കാൾ എനിക്ക് മറ്റാരും പരമപ്രിയനല്ല.
Verse 63
यथावदहमाराद्ध: कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा | तस्मादिष्टतम: कृष्णादन्यो मम न विद्यते,“अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने सत्य, शौच, सरलता, त्याग, तपस्या, नियम, क्षमा, भक्ति, धैर्य, बुद्धि और वाणीके द्वारा मेरी यथोचित आराधना की है; अतः श्रीकृष्णसे बढ़कर दूसरा कोई मुझे परम प्रिय नहीं है
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു— അനായാസ കർമ്മനായ കൃഷ്ണൻ എല്ലാത്തരത്തിലും എന്നെ യഥാവിധി ആദരിച്ചു സേവിച്ചു; അതിനാൽ കൃഷ്ണനേക്കാൾ എനിക്ക് മറ്റാരും ഇഷ്ടതമനല്ല—അവനേക്കാൾ പ്രിയൻ മറ്റൊരാളുമില്ല.
Verse 64
कुर्वता तात सम्मान त्वां च जिज्ञासता मया | पज्चाला: सहसा गुप्ता मायाश्र बहुश: कृता:,“तात! उन्हींका सम्मान और तुम्हारी परीक्षा करनेके लिये मैंने पांचालोंकी सहसा रक्षा की है और बारंबार मायाओंका प्रयोग किया है
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു— താതാ! നിന്നെ ആദരിക്കാനും നിന്നെ പരീക്ഷിക്കാനും വേണ്ടി ഞാൻ പാഞ്ചാലരെ പെട്ടെന്നു സംരക്ഷിച്ചു; പലവട്ടം മായായുക്ത ഉപായങ്ങളും പ്രയോഗിച്ചു.
Verse 65
कृतस्तस्यैव सम्मान: पज्चालान् रक्षता मया । अभिभूतास्तु कालेन नैषामद्यास्ति जीवितम्,'पांचालोंकी रक्षा करके मैंने श्रीकृष्णका ही सम्मान किया है; परंतु अब वे कालसे पराजित हो गये हैं, अब इनका जीवन शेष नहीं है”
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു— പാഞ്ചാലരെ സംരക്ഷിച്ചതിലൂടെ ഞാൻ യഥാർത്ഥത്തിൽ ശ്രീകൃഷ്ണനേ തന്നെയാണ് ആദരിച്ചത്; എന്നാൽ ഇപ്പോൾ അവർ കാലത്താൽ കീഴടക്കപ്പെട്ടിരിക്കുന്നു—ഇന്ന് അവർക്കു ജീവൻ ശേഷിക്കുന്നില്ല.
Verse 66
एवमुक््त्वा महात्मानं भगवानात्मनस्तनुम् । आविवेश ददौ चास्मै विमलं खड्गमुत्तमम्
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു— ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞ ശേഷം ഭഗവാൻ ആ മഹാത്മാവിനോടു അനുഗ്രഹം കാണിച്ച് തന്റെ ദേഹധാരിയായ സ്വരൂപത്തിൽ പ്രവേശിച്ചു; പിന്നെ അവനു മലിനതയറ്റ ഉത്തമമായ ഖഡ്ഗവും നൽകി.
Verse 67
महामना अभश्वत्थामासे ऐसा कहकर भगवान् शिवने अपने स्वरूपभूत उसके शरीरमें प्रवेश किया और उसे एक निर्मल एवं उत्तम खड्ग प्रदान किया ।। अथाविष्टो भगवता भूयो जज्वाल तेजसा । वेगवांश्वाभवद् युद्धे देवसृष्टेन तेजसा,भगवानका आवेश हो जानेपर अभश्वृत्थामा पुन: अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो उठा। उस देवप्रदत्त तेजसे सम्पन्न हो वह युद्धमें और भी वेगशाली हो गया
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞിട്ട് ഭഗവാൻ ശിവൻ തന്റെ തന്നെ സ്വരൂപമായി അശ്വത്ഥാമാവിന്റെ ശരീരത്തിൽ പ്രവേശിച്ചു; അവന് നിർമലവും ഉത്തമവുമായ ഒരു ഖഡ്ഗം നൽകി. ഭഗവാന്റെ ആവേശം ലഭിച്ചതോടെ അശ്വത്ഥാമാവ് വീണ്ടും അത്യന്തം തേജസ്സോടെ ജ്വലിച്ചു; ദേവദത്തമായ ആ ശക്തിയാൽ സമ്പന്നനായി യുദ്ധത്തിൽ കൂടുതൽ വേഗവാനും ഭീകരനുമായി.
Verse 68
तमदृश्यानि भूतानि रक्षांसि च समाद्रवन् | अभित: शत्रुशिबिरं यान्तं साक्षादिवेश्वरम्,साक्षात् महादेवजीके समान शत्रुशिविरकी ओर जाते हुए अश्वत्थामाके साथ-साथ बहुत-से अदृश्य भूत और राक्षस भी दौड़े गये
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അശ്വത്ഥാമാവ് എല്ലാദിക്കുകളിലും നിന്ന് ശത്രുശിബിരത്തേക്കു നീങ്ങുമ്പോൾ, അവൻ സാക്ഷാൽ ഈശ്വരനെപ്പോലെ പ്രതാപവാനായി തോന്നി; അവനോടൊപ്പം അനവധി അദൃശ്യ ഭൂതങ്ങളും രാക്ഷസന്മാരും കൂടി പാഞ്ഞെത്തി.
Verse 156
दडीपशैलप्रतीकाशा: प्रादुरासन् महागणा: । वहीं बहुत-से महान् गण प्रकट हो गये, जो द्वीपवर्ती पर्वतोंके समान बहुत ऊँचे कदके थे। उनके मुख और नेत्र दीप्तिसे दमक रहे थे। उन गणोंके पैर, मस्तक और भुजाएँ अनेक थीं। वे अपनी बाहोंमें रत्न-निर्मित विचित्र अंगद धारण किये हुए थे। उन सबने अपने हाथ ऊपर उठा रखे थे
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—അവിടെ അനവധി മഹാഗണങ്ങൾ പെട്ടെന്ന് പ്രത്യക്ഷപ്പെട്ടു; ദ്വീപുകളിലെ പർവതങ്ങളെപ്പോലെ അത്യുച്ചകായന്മാർ. അവരുടെ മുഖങ്ങളും കണ്ണുകളും ദീപ്തിയിൽ ജ്വലിച്ചു; അവർക്കു അനവധി പാദങ്ങളും ശിരസ്സുകളും ഭുജങ്ങളും ഉണ്ടായിരുന്നു. രത്നനിർമ്മിതമായ വിചിത്ര അങ്കദങ്ങൾ ധരിച്ച്, അവർ എല്ലാവരും കൈകൾ ഉയർത്തി നിന്നു.
Verse 453
ये समाराध्य शूलाड्कं॑ भवसायुज्यमागता: । अन्न, सोमलताका रस, अमृत और चन्द्रमण्डल--चे चार प्रकारके सोम हैं, वे पार्षदगण इनका सदा पान करते हैं। उन्होंने वेदोंके स्वाध्याय, ब्रह्मचर्यपालन, तपस्या और इन्द्रिय- संयमके द्वारा त्रिशूल-चिह्लित भगवान् शिवकी आराधना करके उनका सायुज्य प्राप्त कर लिया है
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ത്രിശൂലചിഹ്നിതനായ ഭവൻ (ശിവൻ)നെ യഥാവിധി ആരാധിച്ചവർ അവനോടുള്ള സായുജ്യം പ്രാപിച്ചു. അവർ അവന്റെ പാർഷദന്മാർ; അവർ സദാ ചതുര്വിധ സോമം പാനം ചെയ്യുന്നു—അന്നം, സോമലതാരസം, അമൃതം, ചന്ദ്രമണ്ഡലം. വേദസ്വാധ്യായം, ബ്രഹ്മചര്യം, തപസ്സ്, ഇന്ദ്രിയസംയമം എന്നിവയാൽ ത്രിശൂലധാരിയായ ശിവനെ പ്രസന്നനാക്കി അവർ അവന്റെ നില പ്രാപിച്ചു.
Verse 473
संत्रासयन्तस्ते विश्वमश्चत्थामानम भ्ययु: । भगवान् शिवके वे पार्षद नाना प्रकारके बाजे बजाने, हँसने, सिंहनाद करने, ललकारने तथा गर्जने आदिके द्वारा सम्पूर्ण विश्वको भयभीत करते हुए अभश्वत्थामाके पास आये
സഞ്ജയൻ പറഞ്ഞു—ഭഗവാൻ ശിവന്റെ ആ പാർഷദന്മാർ നാനാവിധ വാദ്യനാദങ്ങൾ, ചിരി, സിംഹനാദം, വെല്ലുവിളി, ഗർജ്ജനം മുതലായവകൊണ്ട് സർവ്വലോകത്തെയും ഭീതിയിലാഴ്ത്തിക്കൊണ്ട് അശ്വത്ഥാമാവിന്റെ അടുത്തേക്ക് മുന്നേറി വന്നു.
The chapter juxtaposes devotional purity-language (śauca, tyāga, samādhi) with the instrumental pursuit of power for a retaliatory night operation, raising the question of whether divine empowerment resolves or intensifies moral accountability.
Śiva frames disciplined devotion and integrity of practice as the basis of genuine divine favor, explicitly elevating Kṛṣṇa as uniquely dear due to consistent, untroubled performance of duty and devotion.
A formal phalaśruti is not presented here; instead, the chapter functions as a narrative meta-device that explains causal authorization—how ritual devotion and divine entry (āveśa) are used to account for exceptional efficacy in the ensuing events.