
Jarītā-Śārṅgaka-saṃvādaḥ — The Dialogue of Jaritā and the Śārṅgaka Chicks (Fire-escape deliberation)
Upa-parva: Āstīka Parva (Āstīkākhāna and allied episodes)
Vaiśaṃpāyana reports a crisis episode: a forest fire advances, leaving the Śārṅgaka chicks distressed and without clear refuge. Their mother Jaritā laments the impossibility of saving all by flight—she cannot carry them, they cannot run, and she cannot abandon any without inner injury. She recalls the father’s earlier expectations for the sons’ future roles and lineage increase, intensifying her responsibility to preserve continuity. Jaritā proposes an expedient: a nearby mouse-hole (ākhor-bila) by a tree; the chicks should enter quickly, and she will seal the opening with dust, returning after the fire passes to remove the covering. The chicks object with a risk assessment: the hole entails predation by the mouse, while remaining outside risks burning; they argue that being eaten in a hole is a disgraceful death, whereas death by fire is a socially “preferred” relinquishment of the body. The chapter thus stages an ethical-technical deliberation under duress, contrasting survival strategy, honor-coded evaluations of death, and the preservation of maternal agency and lineage duty.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर के धर्ममय राज्य में प्रजा ऐसे सुख से रहती है जैसे देहधारी अपने ही शरीर में सुरक्षित रहता हो—इसी शांत समृद्धि के बीच कृष्ण और अर्जुन का एक साधारण-सा जलविहार आरम्भ होता है। → कृष्ण-अर्जुन वन-उपवन के निकट प्रसन्न बैठे हैं कि तभी एक अद्भुत तेजस्वी ब्राह्मण (वास्तव में अग्नि) प्रकट होता है—तरुण सूर्य-सा दहकता, जटाधारी, चीरवस्त्रधारी; उसका आगमन शांति में असामान्य कम्पन भर देता है। → तेजस्वी द्विज के निकट आते ही अर्जुन और वासुदेव आदरपूर्वक उठ खड़े होते हैं—यह क्षण संकेत देता है कि कोई दिव्य याचना/कार्य सामने है, जो सामान्य राजसुख को अचानक महाकाव्य-घटना में बदल देगा। → अध्याय का समापन इस स्थापना पर होता है कि धर्मराज के राज्य की पृष्ठभूमि में कृष्ण-अर्जुन के समक्ष एक दिव्य अतिथि उपस्थित है; आगे की कथा उसी के प्रयोजन पर टिकती है। → ब्राह्मण-रूपधारी का वास्तविक अभिप्राय क्या है, और वह कृष्ण-अर्जुन से कौन-सा असाध्य कार्य करवाना चाहता है?
Verse 1
/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ श्लोक मिलाकर कुल ९०३ श्लोक हैं) 27:22 हज हम ३. धनुर्वेदमें निम्नाँकित चार पाद बताये गये हैं--मन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तामुक्त और अमुक्त। जैसा कि वचन है-- मन्त्रमुक्त पाणिमुक्तं मुक्तामुक्तं तथैव च । अमुक्तं च धनुर्वेदे चतुष्पाच्छस्त्रमीरितम् |। जिसका मन्त्रद्वारा केवल प्रयोग होता है, उपसंहार नहीं, उसे मन्त्रमुक्त कहते हैं। जिसे हाथमें लेकर धनुषद्वारा छोड़ा जाय, वह बाण आदि पाणिमुक्त कहा गया है। जिसके प्रयोग और उपसंहार दोनों हों, वह मुक्तामुक्त है। जो वस्तुत: छोड़ा नहीं जाता, जैसे मन्त्रद्वारा साधित (ध्वजा आदि) है, जिसको देखनेमात्रसे शत्रु भाग जाते हैं, वह अमुक्त कहलाता है। ये अथवा सूत्र, शिक्षा, प्रयोग तथा रहस्य--ये ही धनुर्वेदके चार पाद हैं। २. आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्तत मण्डल तथा रहस्य--थनुर्वेदके ये दस अंग हैं। यथा-- आदानमथ संधानं मोक्षणं विनिवर्तनम् | स्थान मुष्टि: प्रयोगश्न प्रायश्चित्तानि मण्डलम् ।। रहस्यं चेति दशधा धनुर्वेदाड़मिष्यते । “तरकससे बाणको निकालना आदान है। उसे धनुषकी प्रत्यंचापर रखना संधान है, लक्ष्यपर छोड़ना मोक्षण कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना विनिवर्तन कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यंचाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यंचाके मध्यदेशको स्थान कहा गया है। तीन या चार अंगुलियोंका सहयोग ही मुष्टि है। तर्जनी और मध्यमा अंगुलिके अथवा मध्यमा और अंगुष्ठके मध्यसे बाणका संधान करना प्रयोग कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यंचाके आधात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्तानों आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम प्रायश्वित्त है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध मण्डल कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बींधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना, ये सब रहस्यके अन्तर्गत हैं।' 3. ब्रह्मासत्र आदिको दिव्य और खड्ग आदिको मानुष कहा गया है। (खाण्डवदाहपर्व) एकविशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन वैशम्पायन उवाच इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान् नराधिपान् | शासनादू् धृतराष्ट्रस्य राज्ञ: शान्तनवस्यथ च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थमें रहते हुए पाण्डवोंने अन्य बहुत-से राजाओंको, जो उनके शत्रु थे, मार दिया
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຈະນະເມຊະຍະ! ໃນຂະນະທີ່ພວກປານດະວະພັກອາໄສຢູ່ອິນດຣະປຣັສຖະ ຕາມພຣະບັນຊາຂອງພຣະຣາຊາ ທຣິຕະຣາສຕຣະ ແລະບຸດຂອງສັນຕະນຸ ຄື ພີສະມະ ພວກເຂົາໄດ້ປະຫານກະສັດອື່ນໆອີກຫຼາຍອົງ—ຜູ້ເປັນສັດຕູຂອງພວກເຂົາ»
Verse 2
आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोको5वसत् सुखम् । पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिन:,धर्मराज युधिष्ठटिका आसरा लेकर सब लोग सुखसे रहने लगे, जैसे जीवात्मा पुण्यकर्मोके फलस्वरूप अपने उत्तम शरीरको पाकर सुखसे रहता है
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອພວກຊົນທັງປວງພຶງພາ ທັມມະຣາຊາ ຢຸທິສຖິຣະ ເປັນທີ່ພັກພິງ ທຸກຄົນກໍຢູ່ຢ່າງສຸກສະບາຍ—ດັ່ງສັດມີກາຍທີ່ໄດ້ຮັບກາຍອັນດີ ເປັນຜົນແຫ່ງກຳດີ ແລ້ວຢູ່ຢ່າງຜາສຸກ»
Verse 3
स समं धर्मकामार्थान् सिषेवे भरतर्षभ । त्रीनिवात्मसमान् बन्धून् नीतिमानिव मानयन्,भरतश्रेष्ठ! महाराज युधिष्छिर नीतिज्ञ पुरुषकी भाँति धर्म, अर्थ और काम इन तीनोंको आत्माके समान प्रिय बन्धु मानते हुए न्याय और समतापूर्वक इनका सेवन करते थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງສາພາຣະຕະ! ພຣະອົງໄດ້ປະພຶດ ທັມມະ, ອັດຖະ, ແລະ ກາມະ ຢ່າງສົມດຸນ. ດັ່ງບຸລຸດຜູ້ຮູ້ນະໂຍບາຍ ພຣະອົງໄດ້ໃຫ້ກຽດແກ່ທັງສາມນັ້ນ ດຸດດັ່ງເປັນຍາດອັນຮັກ ເທົ່າກັບຕົນເອງ ແລະເສບສົມດ້ວຍຄວາມຍຸດຕິທຳ ແລະການສຳລວມ»
Verse 4
तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव । बभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिव:,इस प्रकार तुल्यरूपसे बँटे हुए धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ भूतलपर मानो मूर्तिमान् होकर प्रकट हो रहे थे और राजा युधिष्ठिर चौथे पुरुषार्थ मोक्षकी भाँति सुशोभित होते थे
ທັມມະ, ອັດຖະ ແລະ ກາມະ ທັງສາມປຸຣຸສາດຖະ ທີ່ແບ່ງສະເໝີກັນ ປານດັ່ງມີຮ່າງກາຍ ໄດ້ປາກົດໃນພື້ນພິພົບ. ແລະ ພຣະຣາຊາ ຢຸດທິສຖິຣ ກໍສະຫງ່າງາມ ປານດັ່ງປຸຣຸສາດຖະທີ່ສີ່ ຄື «ໂມກສະ».
Verse 5
अध्येतारं पर वेदान् प्रयोक्तारं महाध्वरे । रक्षितारं शुभालल्लोकान् लेभिरे तं जनाधिपम्,प्रजाने महाराज युधिष्ठिरके रूपमें ऐसा राजा पाया था, जो परम ब्रह्म परमात्माका चिन्तन करनेवाला, बड़े-बड़े यज्ञोंमें वेदोंका उपयोग करनेवाला और शुभ लोकोंके संरक्षणमें तत्पर रहनेवाला था
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ປະຊາຊົນໄດ້ຮັບເຈົ້າແຫ່ງມະນຸດເປັນກະສັດ—ຜູ້ຊໍານານໃນເວດສູງສຸດ, ຜູ້ຮູ້ນໍາພຣະວາຈາແຫ່ງເວດໄປໃຊ້ໃນຍັນຍະອັນໃຫຍ່, ແລະຜູ້ມຸ່ງໝັ້ນປົກປ້ອງໂລກອັນເປັນມົງຄຸນຢູ່ເສມອ. ດັ່ງນັ້ນ ໂອ ພຣະຣາຊາ, ໃນຕົວຢຸດທິສຖິຣເອງ ພວກເຂົາໄດ້ພົບຜູ້ປົກຄອງຜູ້ອຸທິດໃຈຕໍ່ການພິຈາລະນາພຣະສູງສຸດ ແລະການຄຸ້ມຄອງລະບຽບແຫ່ງທັມມະ.
Verse 6
अधिष्ठानवती लक्ष्मी: परायणवती मति: । वर्धमानो5खिलो धर्मस्तेनासीत् पृथिवीक्षिताम्,राजा युधिष्ठिरके द्वारा दूसरे राजाओंकी चंचल लक्ष्मी भी स्थिर हो गयी, बुद्धि उत्तम निष्ठावाली हो गयी और सम्पूर्ण धर्मकी दिनोंदिन वृद्धि होने लगी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ພາຍໃຕ້ການປົກຄອງນັ້ນ ຄວາມຮັ່ງມີກໍຕັ້ງມັ່ນ ແລະປັນຍາກໍຍຶດໝັ້ນຕໍ່ເປົ້າໝາຍອັນສູງສຸດ. ດັ່ງນັ້ນ ສໍາລັບບັນດາກະສັດແຫ່ງພິພົບ ທັມມະທັງປວງໄດ້ເພີ່ມພູນຂຶ້ນທຸກມື້—ຈົນແມ່ນແຕ່ໂຊກລາບອັນຜັນຜວນຂອງຜູ້ປົກຄອງອື່ນໆ ກໍກາຍເປັນມັ່ນຄົງ ໂດຍອໍານາດການປົກຄອງຂອງພຣະຣາຊາ ຢຸດທິສຖິຣ.
Verse 7
भ्रातृभि: सहितो राजा चतुर्भिरधिकं बभौ । प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरिव महाध्वर:,जैसे यथावसर उपयोगमें लाये जानेवाले चारों वेदोंके द्वारा विस्तारपूर्वक आरम्भ किया हुआ महायज्ञ शोभा पाता है, उसी प्रकार अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले चारों भाइयोंके साथ राजा युधिष्ठिर अत्यन्त सुशोभित होते थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອມີພີ່ນ້ອງຢູ່ຄຽງຂ້າງ ພຣະຣາຊາກໍຍິ່ງສະຫງ່າງາມ—ດັ່ງຍັນຍະອັນໃຫຍ່ທີ່ສົດງາມ ເມື່ອເວດທັງສີ່ຖືກນໍາໃຊ້ໃນເວລາອັນຄວນ ແລະຖືກຈັດວາງຢ່າງຄົບຖ້ວນ.
Verse 8
त॑ तु धौम्यादयो विप्रा: परिवार्योपतस्थिरे । बृहस्पतिसमा मुख्या: प्रजापतिमिवामरा:,जैसे बृहस्पति-सदृश मुख्य-मुख्य देवता प्रजापतिकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार धौम्य आदि ब्राह्मण राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर बैठते थे
ຕໍ່ມາ ບັນດາພຣາມະນະ—ມີທໍມຍະເປັນຫົວໜ້າ—ໄດ້ມາຊຸມຮອບ ແລະປະຄອງຮັບໃຊ້ພຣະອົງ. ຜູ້ເປັນເລີດໃນພວກເຂົາ ປານດັ່ງພຣະບຣິຫັດສະປະຕິ ຢືນຮັບໃຊ້ ເຫມືອນທີ່ເທວະດາຮັບໃຊ້ພຣະປຣະຊາປະຕິ; ເຊັ່ນນັ້ນແຫຼະ ບັນດາລິສີເຫຼົ່ານັ້ນໄດ້ຫ້ອມລ້ອມກະສັດ ໃຫ້ຄໍາຊີ້ນໍາ ແລະກໍາລັງໜູນຕາມທັມມະ.
Verse 9
धर्मराजे ह्ाृतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले । प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च,निर्मल एवं पूर्ण चन्द्रमाके समान आनन्दप्रद राजा युधिष्ठिरके प्रति अत्यन्त प्रीति होनेके कारण उन्हें देखकर प्रजाके नेत्र और मन एक साथ प्रफुल्लित हो उठते थे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເນື່ອງຈາກຄວາມຮັກແລະຄວາມເຄົາລົບຈາກໃຈຕໍ່ ທັມມະຣາຊາ (ຢຸທິສຖິຣະ)—ບໍລິສຸດ ແລະຊື່ນບານດັ່ງດວງຈັນເຕັມດວງອັນໃສສະອາດ—ເມື່ອໃດທີ່ປະຊາຊົນໄດ້ເຫັນພຣະອົງ ທັງຕາແລະໃຈກໍຊື່ນບານພ້ອມກັນ. ພຽງແຕ່ການປະທັບຢູ່ຂອງພຣະອົງກໍນຳຄວາມສຸກຮ່ວມມາ ດັ່ງວ່າທັມມະໄດ້ປາກົດເປັນກະສັດ.
Verse 10
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे । यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत्,प्रजा केवल उनके पालनरूप राजोचित कर्मसे ही संतुष्ट नहीं थी, वह उनके प्रति श्रद्धा और भक्तिभाव रखनेके कारण भी सदा आनन्दित रहती थी। राजाके प्रति प्रजाकी भक्ति इसलिये थी कि प्रजाके मनको जो प्रिय लगता था, राजा युधिष्छिर उसीको क्रियाद्वारा पूर्ण करते थे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ປະຊາຊົນບໍ່ໄດ້ຊື່ນບານແຕ່ເພາະຊະຕາຫຼືໂຊກດີເທົ່ານັ້ນ; ພວກເຂົາຊື່ນບານຈາກໃຈ. ສິ່ງໃດທີ່ເຫັນວ່າຖືກໃຈ ກະສັດກໍນຳມາໃຫ້ສຳເລັດດ້ວຍການກະທຳ. ດັ່ງນັ້ນ ຄວາມພໍໃຈຂອງພວກເຂົາບໍ່ແມ່ນມາຈາກການຄຸ້ມຄອງຕາມພະລະກິດຂອງກະສັດເທົ່ານັ້ນ ແຕ່ຍັງມາຈາກຄວາມໄວ້ວາງໃຈ ແລະຄວາມເຄົາລົບສັດທາຕໍ່ພຣະອົງ.
Verse 11
न हायुक्त न चासत्यं नासहां न च वाप्रियम् । भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमत:,सदा मीठी बातें करनेवाले बुद्धिमान् कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरके मुखसे कभी कोई अनुचित, असत्य, असहा और अप्रिय बात नहीं निकलती थी
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຈາກປາກຂອງປາຣຖະຜູ້ມີປັນຍາ—ຢຸທິສຖິຣະ ບຸດຂອງກຸນຕີ ຜູ້ເວົ້າຈາອ່ອນໂຍນເປັນນິດ—ບໍ່ເຄີຍມີຄຳເວົ້າໃດທີ່ບໍ່ເໝາະສົມ, ບໍ່ຈິງ, ຫຍາບຄາຍ, ຫຼືບໍ່ນ່າຟັງ. ຖ້ອຍຄຳຂອງພຣະອົງສອດຄ່ອງກັບຄວາມເໝາະສົມ, ຄວາມຈິງ, ແລະການສຳລວມວາຈາອັນມີວິໄນ.
Verse 12
स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च | चिकीर्षन् सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर सब लोगोंका और अपना भी हित करनेकी चेष्टामें लगे रहकर सदा प्रसन्नतापूर्वक समय बिताते थे
ພຣະອົງຜູ້ມີລັງສີອັນຍິ່ງໃຫຍ່ ປາຖະໜາຈະເຮັດປະໂຫຍດແກ່ທົ່ວໂລກ ແລະແກ່ຕົນເອງດ້ວຍ. ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນວົງພັນບາຣະຕະ! ກະສັດຢຸທິສຖິຣະ ຜູ້ໃຈກວ້າງ ມຸ່ງໝັ້ນໃນການເຮັດສິ່ງທີ່ເປັນປະໂຫຍດ ແລະໃຊ້ເວລາດ້ວຍຄວາມພໍໃຈ—ຊື່ນບານໃນເປົ້າໝາຍແຫ່ງທັມມະ ບໍ່ແມ່ນໃນຄວາມສຸກສຳລານລ້ວນໆ.
Verse 13
तथा तु मुदिता: सर्वे पाण्डवा विगतज्वरा: । अवसन् पृथिवीपालांस्तापयन्त: स्वतेजसा,इस प्रकार सभी पाण्डव अपने तेजसे दूसरे नरेशोंको संतप्त करते हुए निश्चिन्त तथा आनन्दमग्न होकर वहाँ निवास करते थे
ດັ່ງນັ້ນ ປານດະວະທັງຫມົດ ຊື່ນບານ ແລະປາດຈາກຄວາມກັງວົນ ໄດ້ພຳນັກຢູ່ທີ່ນັ້ນ ໂດຍໃຊ້ລັງສີແຫ່ງຕົນເອງເຮັດໃຫ້ກະສັດອື່ນໆ ຢຳເກງ ແລະຢູ່ໃນລະບຽບ. ບົດນີ້ຊີ້ໃຫ້ເຫັນຍຸກແຫ່ງການປົກຄອງອັນໝັ້ນຄົງ: ຄວາມສະຫງົບໃນໃຈ ແລະອຳນາດພາຍນອກ ຮ່ວມກັນສ້າງລະບຽບ ບໍ່ແມ່ນດ້ວຍຄວາມໂຫດຮ້າຍບໍ່ຈຳເປັນ ແຕ່ໂດຍຄວາມເປັນເຫນືອທຳມະຊາດຂອງພະລັງທີ່ຝຶກຝົນແລ້ວ.
Verse 14
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सु: कृष्णमब्रवीत् | उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति,तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद अर्जुनने श्रीकृष्णसे कहा--“कृष्ण! बड़ी गरमी पड़ रही है। चलिये, यमुनाजीमें स्नानके लिये चलें
ຕໍ່ມາເມື່ອຜ່ານໄປອີກສອງສາມມື້ ບີພັດສຸ (ອາຈຸນ) ໄດ້ກ່າວກັບກຣິສນະວ່າ: «ກຣິສນະ, ຄວາມຮ້ອນແຮງຫຼາຍ. ພວກເຮົາໄປຫາແມ່ນ້ຳຢະມຸນາກັນເຖີດ».
Verse 15
सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन । सायाह्वे पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन,“मधुसूदन! मित्रोंक साथ वहाँ जलविहार करके हमलोग शामतक फिर लौट आयेंगे। जनार्दन! यदि आपकी रुचि हो, तो चलें”
«ໂອ ມະທຸສູດະນະ, ພວກເຮົາຈະພາກັນຫຼິ້ນນ້ຳຢູ່ນັ້ນກັບມິດສະຫາຍ ແລ້ວຈະກັບຄືນໃນຍາມແລງ. ໂອ ຈະນາຣະດະນະ, ຖ້າທ່ານພໍໃຈ ກໍໄປກັນເຖີດ».
Verse 16
वायुदेव उवाच कुन्तीमातर्ममाप्येतद् रोचते यद् वयं जले । सुहृज्जनवृता: पार्थ विहरेम यथासुखम्,वासुदेव बोले--कुन्तीनन्दन! मेरी भी ऐसी ही इच्छा हो रही है कि हमलोग सुहृदोंके साथ वहाँ चलकर सुखपूर्वक जलविहार करें
ວາສຸເທວະ (ກຣິສນະ) ກ່າວວ່າ: «ໂອ ບຸດແຫ່ງກຸນຕີ, ຂ້າພະເຈົ້າກໍພໍໃຈເຊັ່ນກັນ—ໃຫ້ພວກເຮົາໄປຫຼິ້ນນ້ຳຢູ່ນັ້ນ ໂດຍມີມິດຜູ້ຫວັງດີລ້ອມຮອບ ແລະສະບາຍໃຈຕາມປາຖະໜາ».
Verse 17
वैशम्पायन उवाच आमन्त्रय तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत । जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुह्ृज्जनवृताौ तत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--भारत! यह सलाह करके युधिष्ठिरकी आज्ञा ले अर्जुन और श्रीकृष्ण सुहदोंके साथ वहाँ गये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ພາຣະຕະ, ເມື່ອໄດ້ໄປລາທ່ານທັມມະຣາຊ (ຢຸທິສຖິຣະ) ແລະໄດ້ຮັບອະນຸຍາດແລ້ວ, ປາຣຖະ (ອາຈຸນ) ແລະ ໂກວິນທະ (ກຣິສນະ) ພ້ອມດ້ວຍມິດຜູ້ຫວັງດີ ຈຶ່ງອອກເດີນທາງໄປຍັງທີ່ນັ້ນ».
Verse 18
विहारदेशं सम्प्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम् । गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम्,यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं। वह उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी। वहाँ बने हुए अनेक छोटे-बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था। अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति-भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे। भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອເຂົ້າເຖິງສະຖານທີ່ພັກຜ່ອນອັນລ້ຳເລີດ ທີ່ປະດັບດ້ວຍໄມ້ດີຫຼາຍຊະນິດ ແລະມີເຮືອນຫຼາຍຮູບແບບ ທັງສູງຕ່ຳ ທັງໃຫຍ່ນ້ອຍ, ສະຖານນັ້ນສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງນະຄອນຂອງປຸຣັນດະຣະ (ພຣະອິນ).
Verse 19
भक्ष्यैरभोज्यैश्न पेयैश्व रसवद्धिर्महा धनै: । माल्यैश्न विविधैर्गन्धैर्युक्त वाष्णेयपार्थयो:,यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं। वह उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी। वहाँ बने हुए अनेक छोटे-बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था। अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति-भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे। भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໃນອັນຕະປຸຣະຂອງ ວາສຸເທວະ ກຣິສນະ ແລະ ປາຣຖະ (ອາຣຊຸນ) ນັ້ນ ມີອາຫານຫວານຄາວຫຼາຍຊະນິດ ອາຫານທີ່ປຸງແຕ່ງດີ ເຄື່ອງດື່ມມີລົດຊາດອັນລ້ຳຄ່າ ຊັບສົມບັດອັນໃຫຍ່ ພ້ອມພວງມາລາຫຼາຍສີ ແລະ ຂອງຫອມນານາ. ເມື່ອເຖິງສວນພັກຜ່ອນອັນຮື່ນຮົມທີ່ຝັ່ງແມ່ນ້ຳຢະມຸນາ ນາງໆໃນວັງໄດ້ເຂົ້າໄປໃນສາລາຫຼິ້ນທີ່ປະດັບດ້ວຍແກ້ວມະນີງາມ ແລະ ແຕ່ລະນາງຕາມໃຈມັກ ໄດ້ເລີ່ມຫຼິ້ນນ້ຳ—ເປັນພາບແຫ່ງຄວາມຮຸ່ງເຮືອງຂອງລາຊະສຳພັນ ແລະ ຄວາມສຸກອັນປະນີດ ຍິ່ງກວ່າພາບແຫ່ງການຮົບພົນ.
Verse 20
विवेशान्त:पुरं तूर्ण रत्नैरुच्चावचै: शुभै: । यथोपजोष॑ सर्वश्ष जनश्रिक्रीड भारत,यमुनाके तटपर जहाँ विहारस्थान था, वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण और अर्जुनके रनिवासकी स्त्रियाँ नाना प्रकारके सुन्दर रत्नोंके साथ क्रीड़ाभवनके भीतर चली गयीं। वह उत्तम विहारभूमि नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित थी। वहाँ बने हुए अनेक छोटे-बड़े भवनोंके कारण वह स्थान इन्द्रपुरीके समान सुशोभित होता था। अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ अनेक प्रकारके भक्ष्य, भोज्य, बहुमूल्य सरस पेय, भाँति-भाँतिके पुष्पहार और सुगन्धित द्रव्य भी थे। भारत! वहाँ जाकर सब लोग अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जलक्रीड़ा करने लगे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ນາງໆໃນອັນຕະປຸຣະໄດ້ເຂົ້າໄປໃນສາລາກະສິກກະສົມຢ່າງວ່ອງໄວ ພ້ອມນຳເອົາແກ້ວມະນີອັນເປັນມົງຄຸນຫຼາຍຊະນິດ. ແລ້ວໂອ ພາຣະຕະ! ທຸກຄົນກໍໄດ້ຫຼິ້ນສະໜຸກຢ່າງສຸກສັນຕາມທີ່ຕົນພໍໃຈ. ພາບນັ້ນຊູ້ໃຫ້ເຫັນຄວາມຮຸ່ງເຮືອງຂອງລາຊະສຳພັນ ແລະ ຄວາມສຸກອັນປະນີດ ທີ່ຖືກຄຸ້ມຄອງໂດຍຄວາມເໝາະສົມ—ຄວາມພໍດີຕາມການກະທຳ ແລະ ລະບຽບປະເພນີ.
Verse 21
स्त्रियश्न विपुलश्रोण्यश्चारुपीनपयोधरा: । मदस्खलितगामिन्यश्रिक्रीडुर्वामलोचना:,विशाल नितम्बों और मनोहर पीन उरोजोंवाली वामलोचना वनिताएँ भी यौवनके मदके कारण डगमगाती चालसे चलकर इच्छानुसार क्रीड़ाएँ करने लगीं
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ແມ່ຍິງເຫຼົ່ານັ້ນ—ສະໂພກກວ້າງ ຮູບຮ່າງງາມ ອົງອົບເຕັມ ແລະ ດວງຕາອ່ອນຫວານ—ເດີນດ້ວຍກ້າວທີ່ຫວ່າງໄຫວເພາະຄວາມເມົາມົນແຫ່ງວັຍໜຸ່ມ, ແລ້ວກໍເລີ່ມຫຼິ້ນຢ່າງເສຣີຕາມໃຈປາຖະໜາ. ບົດນີ້ວາດພາບຄວາມຮື່ນເຮືອງອັນບໍ່ມີຄວາມກັງວົນ ແລະ ບອກໃຫ້ເຫັນວ່າ ຄວາມລະເລີງທາງກາມອາລົມອາດເຮັດໃຫ້ຄວາມຢັບຢັ້ງ ແລະ ຄວາມເໝາະສົມອ່ອນລົງໄດ້.
Verse 22
वने काश्चिचज्जले काश्ित् काश्रिद् वेश्मसु चाड़ना: । यथायोग्यं यथाप्रीति चिक्रीडु: पार्थकृष्णयो:,वे स्त्रियाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनकी रुचिके अनुसार कुछ वनमें, कुछ जलमें और कुछ घरोंमें यथोचितरूपसे क्रीड़ा करने लगीं
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ນາງບາງຄົນຫຼິ້ນຢູ່ໃນປ່າ, ບາງຄົນຫຼິ້ນຢູ່ໃນນ້ຳ, ແລະ ບາງຄົນຫຼິ້ນຢູ່ໃນຄຸ້ມເຮືອນ—ແຕ່ລະນາງກະທຳຕາມທີ່ເໝາະສົມ ແລະ ຕາມທີ່ເປັນທີ່ພໍໃຈແກ່ ກຣິສນະ ແລະ ອາຣຊຸນ. ພາບນີ້ຊູ້ໃຫ້ເຫັນລະບຽບແບບສານຫຼວງ: ການປະພຶດຕ້ອງເໝາະກັບສະຖານທີ່ ແລະ ໂອກາດ, ແລະ ສອດຄ່ອງກັບຄວາມປາຖະໜາຂອງເຈົ້າພາບ.
Verse 23
द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्थाभरणानि च । प्रायच्छतां महाराज ते तु तस्मिन् मदोत्कटे,महाराज! उस समय यौवनमदसे युक्त द्रौपदी और सुभद्राने बहुत-से वस्त्र और आभूषण बाँटे
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໂອ ພຣະມະຫາຣາຊາ, ໃນເວລານັ້ນ ດຣໍປະດີ ແລະ ສຸພັດຣາ ຜູ້ມີຄວາມຄຶກຄື້ນແຫ່ງວັຍໜຸ່ມ ໄດ້ແຈກຢາຍເຄື່ອງນຸ່ງຫົ່ມ ແລະ ເຄື່ອງປະດັບຫຼາຍຢ່າງ. ໃນຂະນະທີ່ຄວາມຮື່ນເຮືອງພຸ່ງສູງນັ້ນ ພວກນາງໄດ້ໃຫ້ຂອງຂວັນຈຳນວນຫຼາຍ—ເປັນພາບແຫ່ງຄວາມເອື້ອເຟື້ອໃນງານມົງຄຸນ ແລະ ການໃຫ້ທານອັນສົມກັບລາຊະສຳພັນໃນຄຸ້ມເຮືອນ.
Verse 24
काश्रित् प्रह्ष ननृतुश्लुक्तुशुश्च तथापरा: । जहसुश्न परा नार्यो जगुश्नान्या वरस्त्रिय:,वहाँ कुछ श्रेष्ठ स्त्रियाँ हर्षोल्लासमें भरकर नृत्य करने लगीं। कुछ जोर-जोरसे कोलाहल करने लगीं। अन्य बहुत-सी स्त्रियाँ ठठाकर हँसने लगीं तथा कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ गीत गाने लगीं
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຍິງບາງຄົນ ເຕັມໄປດ້ວຍຄວາມປິຕິ ເລີ່ມຟ້ອນລໍາ; ບາງຄົນຮ້ອງໂຮກັນດັງໆ ແລະເຮັດໃຫ້ເກີດຄວາມຄຶກຄື້ນອື້ອອຶງ. ຍິງຫຼາຍຄົນຫົວເຮາະດັງລັ່ນ ແລະຍິງງາມຜູ້ເລືອກສັນບາງຄົນຮ້ອງເພງ—ເປັນການພັ່ງພູອາລົມແຫ່ງງານສະຫລອງໃນພາບນັ້ນ.
Verse 25
रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्न परस्परम् । मन्त्रयामासुरन्याश्व॒ रहस्यानि परस्परम्,कुछ एक-दूसरीको पकड़कर रोकने और मृदु प्रहार करने लगीं तथा कुछ दूसरी स्त्रियाँ एकान्तमें बैठकर आपसमें कुछ गुप्त बातें करने लगीं
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ຢູ່ທີ່ນັ້ນ ຍິງບາງຄົນຈັບກັນໄວ້ ແລະຫ້າມກັນໄປມາ; ບາງຄົນຕີກັນເບົາໆ ໃນການຫຼິ້ນຢອກ. ແຕ່ຍິງອື່ນໆ ນັ່ງແຍກອອກໃນທີ່ສະງົບ ແລະແລກປ່ຽນຄໍາລັບກັນໄປມາ.
Verse 26
वेणुवीणामृदड्जानां मनोज्ञानां च सर्वशः । शब्देन पूर्यते हर्म्य तद् वन॑ं सुमहर्द्धिमत्,वहाँका राजभवन और महान् समृद्धिशाली वन वीणा, वेणु और मृदंग आदि मनोहर वाद्योंकी सुमधुर ध्वनिसे सब ओर गूँजने लगा
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ພະລາຊວັງນັ້ນ—ແລະປ່າສວນອັນຮັ່ງມີຢ່າງຍິ່ງທີ່ລ້ອມຮອບ—ຖືກເຕີມເຕັມໄປທົ່ວທິດດ້ວຍສຽງ, ເມື່ອທຳນອງອ່ອນຫວານຂອງເຄື່ອງດົນຕີອັນຊວນໃຈ ເຊັ່ນ ຂຸ່ຍໄມ້ໄຜ່, ວີນາ, ແລະ ມຣິດັງກະ ດັງກ້ອງໄປທົ່ວ.
Verse 27
तस्मिंस्तदा वर्तमाने कुरुदाशार्हनन्दनौ । समीपं जग्मतुः कंचिदुद्देशे सुमनोहरम्,इस प्रकार जब वहाँ क्रीड़ा-विहारका आनन्दमय उत्सव चल रहा था, उसी समय श्रीकृष्ण और अर्जुन पासके ही किसी अत्यन्त मनोहर प्रदेशमें गये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໃນຂະນະທີ່ການຫຼິ້ນສະໜຸກແລະງານສະຫລອງກໍາລັງດໍາເນີນຢູ່ນັ້ນ, ອາຣຈຸນ—ຄວາມພາກພູມໃຈຂອງຊາວກຸຣຸ—ແລະ ກຣິສນະ—ຄວາມປິຕິຂອງຊາວດາຊາຣຫະ—ໄດ້ໄປຍັງບ່ອນໜຶ່ງໃກ້ໆ ທີ່ງາມຢ່າງຍິ່ງ.
Verse 28
तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरंजयौ । महाहासनयो राजंस्ततस्तौ संनिषीदतु:,राजन! वहाँ जाकर शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन दो बहुमूल्य सिंहासनोंपर बैठे और पहले किये हुए पराक्रमों तथा अन्य बहुत-सी बातोंकी चर्चा करके आमोद-प्रमोद करने लगे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ໂອ ພະຣາຊາ! ເມື່ອໄປຮອດທີ່ນັ້ນ ວິລະບຸລຸດຜູ້ມີຈິດໃຈຍິ່ງໃຫຍ່ທັງສອງ—ກຣິສນະ ແລະ ອາຣຈຸນ ຜູ້ພິຊິດປ້ອມເມືອງຂອງສັດຕູ—ໄດ້ນັ່ງລົງເທິງບັນລັງສອງອັນງາມສະຫງ່າ ແລະມີຄ່າສູງ. ແລ້ວພວກເຂົາລະລຶກວິລະກຳໃນອະດີດ ແລະສົນທະນາເລື່ອງອື່ນໆອີກຫຼາຍ, ຢູ່ດ້ວຍຄວາມຊື່ນບານແຫ່ງມິດຕະພາບ.
Verse 29
तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च । बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ,राजन! वहाँ जाकर शत्रुओंकी राजधानीको जीतनेवाले वे दोनों महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन दो बहुमूल्य सिंहासनोंपर बैठे और पहले किये हुए पराक्रमों तथा अन्य बहुत-सी बातोंकी चर्चा करके आमोद-प्रमोद करने लगे
ທີ່ນັ້ນ ໂອ້ ພຣະຣາຊາ, ພາຣຖ (ອາຣຊຸນ) ແລະ ມາທະວະ (ພຣະກຣິດສະນະ) ຫຼັງຈາກໄດ້ເລົ່າເລື່ອງຫຼາຍປະການ—ທັງວິລະກຳໃນອະດີດ ແລະ ເຫດການອື່ນໆ—ກໍໄດ້ພັກຜ່ອນຢ່າງສະບາຍ ແລະ ຊື່ນຊົມໃນການສົນທະນາກັນ.
Verse 30
तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ेउश्चिनाविव । अभ्यागच्छत् तदा विप्रो वासुदेवधनंजयौ,वहाँ प्रसन्नतापूर्वक बैठे हुए धनंजय और वासुदेव स्वर्गलोकमें स्थित अश्विनीकुमारोंकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। उसी समय उन दोनोंके पास एक ब्राह्मणदेवता आये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ທີ່ນັ້ນ ວາສຸເທວະ ແລະ ທະນັນຊະຍະ ນັ່ງຄູ່ກັນດ້ວຍຄວາມຍິນດີ ສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງຄູ່ອັສວິນໃນສະຫວັນ. ໃນຂະນະນັ້ນເອງ ພຣາຫມັນຜູ້ໜຶ່ງໄດ້ເຂົ້າມາຫາທັງສອງ.
Verse 31
बृहच्छालप्रतीकाश: प्रतप्तकनकप्रभ: । हरिपिड्रोज्ज्वलश्मश्रु: प्रमाणायामत: सम:,वे विशाल शालवृक्षके समान ऊँचे थे। उनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान थी। उनके सारे अंग नीले और पीले रंगके थे, दाढ़ी-मूँछें अग्निज्वालाके समान पीतवर्णकी थीं तथा ऊँचाईके अनुसार ही उनकी मोटाई थी
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ທ່ານນັ້ນສູງໃຫຍ່ດັ່ງຕົ້ນສາລາໃຫຍ່. ລັດສະຫມີຂອງທ່ານດັ່ງຄຳທີ່ຖືກເຜົາໃຫ້ຮ້ອນຈົນສຸກ. ອະວະຍະວະມີເງົາສີຟ້າແລະສີເຫຼືອງ, ແລະ ໜວດກັບເຄົາຂອງທ່ານສ່ອງສະຫວ່າງສີນ້ຳຕານອ່ອນດັ່ງແປວໄຟ. ຮ່າງກາຍກໍສົມສ່ວນກັບຄວາມສູງ ເປັນຮູບລັກທີ່ນ່າກະຫຼັງ.
Verse 32
तरुणादित्यसंकाशश्वीरवासा जटाधर: । पद्मपत्रानन: पिड्ुस्तेजसा प्रज्वलन्निव,वे प्रातःकालिक सूर्यके समान तेजस्वी जान पड़ते थे। वे चीरवस्त्र पहने और मस्तकपर जटा धारण किये हुए थे। उनका मुख कमलदलके समान शोभा पा रहा था। उनकी प्रभा पिंगलवर्णकी थी और वे अपने तेजसे मानो प्रज्वलित हो रहे थे
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ທ່ານນັ້ນສ່ອງສະຫວ່າງດັ່ງຕາເວັນອ່ອນໃນຍາມເຊົ້າ. ນຸ່ງຜ້າເປືອກໄມ້ ແລະ ຖືກຈັດຜົມເປັນຈະຕາ. ໃບໜ້າງາມດັ່ງກີບດອກບົວ. ມີສີອອກນ້ຳຕານອ່ອນ ແລະ ດ້ວຍເຕຊະແຫ່ງຕະປະສະຍາ ທ່ານດູປານດັ່ງກຳລັງລຸກໄຟຈາກພາຍໃນ.
Verse 33
उपसूष्टं तु तं कृष्णौ भ्राजमानं द्विजोत्तमम् । अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतु:,वे तेजस्वी द्विजश्रेष्ठ जब निकट आ गये, तब अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही आसनसे उठकर खड़े हो गये
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເມື່ອດວິຊະຜູ້ປະເສີດນັ້ນ ຜູ້ສ່ອງສະຫວ່າງ ໄດ້ເຂົ້າມາໃກ້ ແລະ ຖືກແນະນຳຕາມພິທີອັນຄວນແລ້ວ, ອາຣຊຸນ ແລະ ວາສຸເທວະ (ພຣະກຣິດສະນະ) ກໍລຸກຂຶ້ນຈາກບ່ອນນັ່ງຢ່າງວ່ອງໄວ ແລະ ຢືນຂຶ້ນເພື່ອຖວາຍຄວາມເຄົາລົບ.
Verse 221
इति श्रीमहा भारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि ब्राह्मणरूप्यनलागमने एकविंशत्यधिकद्वधिशततमो<ध्याय:
ດັ່ງນັ້ນ ໃນ «ສີຣີມະຫາພາຣະຕະ» ພາຍໃນ ອາດິປະວະ (Ādi Parva) ໃນຕອນວ່າດ້ວຍການເຜົາປ່າຄານະດະວະ (Khāṇḍava) ໃນເຫດການທີ່ ອັກນິ (Agni) ມາໃນຮູບພຣາຫມັນ ບົດທີ 221 ກໍສິ້ນສຸດລົງ. ຂໍ້ປິດທ້າຍນີ້ເປັນເຄື່ອງໝາຍປິດຕອນ ໂດຍຈັດວາງເຫດການໃຫ້ເປັນການພົບພາທີ່ມີນ້ຳໜັກທາງທຳມະ ເມື່ອຈຸດປະສົງຂອງເທວະດາຖືກຜັກດັນຜ່ານການເຂົ້າຫາແບບມະນຸດ ແລະການຂໍຢ່າງເປັນພິທີການ.
A constrained-choice dilemma: whether to attempt a risky refuge (the mouse-hole, with potential predation) or face the advancing fire; the mother must also decide how to act without abandoning any child, balancing care, feasibility, and duty to lineage.
In emergency ethics (āpaddharma), deliberation and proportional choice matter: one may need to select the least degrading and most duty-consistent option, while acknowledging uncertainty and avoiding paralysis when ideal solutions are unavailable.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as an embedded exemplum, contributing interpretive guidance on duty, survival strategy, and honor-coded evaluation within the broader Ādi Parva narrative frame.