Adhyaya 222
Vana ParvaAdhyaya 22234 Verses

Adhyaya 222

द्रौपदी–सत्यभामा संवादः (Draupadī and Satyabhāmā on ethical household conduct)

Upa-parva: Draupadī–Satyabhāmā Saṃvāda (Discourse on conjugal ethics and household governance)

Vaiśaṃpāyana narrates a meeting where Draupadī and Satyabhāmā sit together in a cordial setting. Satyabhāmā privately asks Draupadī how she maintains the Pandavas’ affection and compliance, explicitly inquiring about vows, austerities, ritual baths, mantras, medicines, and other techniques. Draupadī rebukes the premise, refusing to endorse ‘asat-strī’ practices, and argues that a husband who suspects mantra-based control becomes distressed rather than peaceful. She warns of the dangers of clandestine powders and poisons and of the social harms attributed to such conduct. Draupadī then enumerates her method: abandoning ego, desire, and anger; practicing careful speech and demeanor; prioritizing service and attentiveness; observing domestic discipline (timely food, cleanliness, hospitality); honoring elders (especially Kuntī); and maintaining detailed oversight of resources, guests, and staff. She portrays household stability as achieved through tireless, transparent duty and respectful comportment. Satyabhāmā, hearing the dharma-consistent explanation, apologizes for her teasing inquiry and affirms Draupadī’s conduct.

Chapter Arc: मार्कण्डेय के वचन से कथा एक अनोखे ‘यज्ञ-विश्व’ में प्रवेश करती है—जहाँ अग्नि केवल ज्वाला नहीं, देव-स्वरूप नामों और विधानों का जीवित जाल है; भूर्-भुवः-स्वः आदि महाव्याहृतियों से ध्यान-मन्त्र का आरम्भ होता है। → अग्नियों के अनेक नाम, वंश-परम्परा और यज्ञ-प्रयोग क्रमशः खुलते हैं—‘शिव’ नामक अग्नि शक्तिपूजा में रत, ‘शम्भु’ और ‘आवसथ्य’ जैसे गृह्य-अग्नि-स्वरूप, दर्श-पौर्णमास, आग्रयण आदि कर्मों में किस अग्नि को हवि मिले—यह सूक्ष्म विधान कथा को गहन बनाता है; साथ ही चेतावनी आती है कि गृहस्थ अग्नियों का दावानल से संसर्ग हो जाए तो प्रायश्चित्त-इष्टि आवश्यक है। → विधि का शिखर उस क्षण पर आता है जब प्रायश्चित्त और ‘स्विष्टकृत्’ की परम भूमिका प्रतिपादित होती है—यज्ञ की त्रुटि को ‘स्विष्ट’ बनाकर पूर्ण करने वाला अग्नि-तत्त्व ही रक्षक है; ‘विश्वपति’ नामक अग्नि को वेदों में ‘सम्पूर्ण जगत् का पति’ कहे जाने का उल्लेख इस अध्याय का दार्शनिक उत्कर्ष बनता है। → अग्नि-नामों, उनके कर्म-क्षेत्र और शुद्धि-विधानों का संहिताबद्ध निष्कर्ष देकर मार्कण्डेय आंगिरसोपाख्यान के इस खण्ड को पूर्ण करते हैं—यज्ञ की शुद्धि, नाम-स्मरण और नियत हवि-समर्पण से लोक-व्यवस्था टिकती है। → आंगिरसोपाख्यान की अगली कड़ी में अग्नि-परम्परा/विधान का विस्तार आगे बढ़ने का संकेत रहता है।

Shlokas

Verse 1

हि >> मय न [हुक आज अप > भू:, भुवः, स्वः, महः, जनः--ये पाँच महाव्याहतियाँ हैं। ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है--'* भूरजन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा इत्यादि। एकविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच गुरुभिरनियमैर्युक्तो भरतो नाम पावक: । अग्नि: पुष्टिमतिर्नाम तुष्ट: पुष्टिं प्रयच्छति । भरत्येष प्रजा: सर्वास्ततो भरत उच्यते,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युथिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति” भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं

ព្រះមារកណ្ឌេយៈមានព្រះវាចាថា៖ «មានអគ្គីបរិសុទ្ធមួយ មាននាមថា ភរត (Bharata) ដែលបានបណ្តុះខ្លួនដោយវិន័យធ្ងន់ធ្ងរ និងការអនុវត្តតឹងរឹង។ ទ្រង់ក៏មាននាមថា ពុស្តិមតិ (Puṣṭimati) ដែរ ព្រោះនៅពេលទ្រង់ពេញព្រះហឫទ័យ ទ្រង់ប្រទានការចិញ្ចឹមបំប៉ន និងសម្បទា។ ព្រោះទ្រង់ទ្រទ្រង់ និងចិញ្ចឹមសត្វលោកទាំងអស់ ដូច្នេះហើយទ្រង់ត្រូវបានហៅថា ‘ភរត’—អ្នកទ្រទ្រង់ប្រជាជនទាំងឡាយ»។

Verse 2

अग्निर्यश्न शिवो नाम शक्तिपूजापरश्न सः | दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत्‌ सततं शिव:,'शिव” नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव” कहते हैं

ព្រះមារកណ្ឌេយៈមានព្រះវាចាថា៖ «អគ្គីដែលល្បីដោយនាម ‘សិវៈ’ (Śiva) នោះ តែងតែឧទ្ទិសខ្លួនក្នុងការគោរពបូជា សក្តិ (Śakti)។ ទ្រង់ធ្វើសិវៈ—សេចក្តីកុសល និងសុខសាន្ត—ដល់មនុស្សទាំងឡាយដែលរងទុក្ខជានិច្ច; ដូច្នេះហើយទ្រង់ត្រូវបានហៅថា ‘សិវៈ’—អ្នកប្រទានកល្យាណ»។

Verse 3

तपसस्तु फल दृष्टवा सम्प्रवृद्धं तपो महत्‌ | उद्धर्तुकामो मतिमान्‌ पुत्रो जज्ञे पुरंदर:,तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान्‌ हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान्‌ इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ដោយឃើញថា ផលនៃតបស្យា (ការប្រតិបត្តិអាសេតិច) បានកើនឡើងយ៉ាងអស្ចារ្យ និងធំធេងណាស់ ពុរន្ទរៈ (ឥន្ទ្រៈ) អ្នកមានប្រាជ្ញា ប្រាថ្នាចង់យកឬនាំយកផលនោះទៅ ក៏បានកើតជាកូនប្រុសរបស់ពួកគេ ដោយបង្ហាញខ្លួនក្រោមនាម «ពុរន្ទរៈ»។

Verse 4

* ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोडग्निधूतस्य लक्ष्यते अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत्‌,उन्हीं पांचजन्यसे “ऊष्मा” नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो “मनु” नामक अग्निस्वरूप पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य” यज्ञ सम्पन्न कराया था

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ពីសភាពនៃកម្តៅ (ឧស្មន) នោះឯង បានកើតមានអគ្គីឈ្មោះ «ឧស្មា» ដែលត្រូវបានដឹងដោយកម្តៅក្នុងរាងកាយរបស់សត្វមានជីវិតទាំងអស់។ ហើយក៏មានអគ្គីមួយទៀតឈ្មោះ «មនុ»—កូនប្រុសមានសភាពជាភ្លើងដោយតបស្យា—ដែលបានបំពេញយញ្ញ «ប្រាជាបត្យ»។

Verse 5

शम्भुमग्निमथ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा: । आवसथशथ्यं द्विजा: प्राहुर्दीप्तमरग्निं महाप्रभम्‌,वेदोंके पारंगत दिद्वान्‌ ब्राह्मण “शम्भु' तथा “आवसथ्य” नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान्‌ तेज: पुछ्जसे सम्पन्न बताते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះព្រាហ្មណ៍អ្នកឆ្លងកាត់វេទទាំងឡាយ បានប្រកាសថា មានអគ្គីបរិសុទ្ធមួយឈ្មោះ «សម្ភុ»។ ហើយពួកទ្វិជៈក៏បាននិយាយអំពីអគ្គីមួយទៀតឈ្មោះ «អាវសថ្យ» ដែលកំពុងភ្លឺរលោង និងពោរពេញដោយពន្លឺដ៏មហិមា។

Verse 6

ऊर्जस्करान्‌ हव्यवाहान्‌ सुवर्णसदृशप्रभान्‌ । ततस्तपो हाजनयत्‌ पज्च यज्ञसुतानिह,इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ បន្ទាប់មក តបស្យានោះបានបង្កើតកូនប្រុសប្រាំ—កូននៃយញ្ញ—នៅទីនេះ៖ ពួកគេភ្លឺរលោងដូចមាស ប្រោសប្រទានកម្លាំងនិងវិរភាព ហើយជាអ្នកនាំយកហាវិស្យ (អាហារបូជា) ទៅដល់ទេវតាទាំងឡាយ។

Verse 7

प्रशान्तेअग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पति: । असुरान्‌ जनयन्‌ घोरानू्‌ मर्त्याश्चवैव पृथग्विधान्‌,महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस्वरूप हो जाते हैं।* भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है)

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «ឱ មហាបាគៈ! ពេលម្ចាស់ហ្វូងគោ—ដែលនឿយហត់ដោយការខិតខំ—បានស្ងប់ស្ងាត់ចុះ គាត់ក្លាយជាភ្លើង។ ពីសភាពនោះ គាត់បង្កើតអសុរៈដ៏គួរភ័យខ្លាច និងមនុស្សស្លាប់បានជាច្រើនប្រភេទ។ ដូច្នេះ សូម្បីកំណើតដ៏គួរភ័យ និងអនិច្ចា ក៏ត្រូវបានតាមដានទៅដល់តបស្យា និងការប្រែប្រួលដ៏សកលដូចគ្នានោះដែរ»។

Verse 8

तपसश्च मनु पुत्र भानुं चाप्यड्रिरा: सृजत्‌ । बृहद्धानु तु त॑ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा:,तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान ब्राह्मण भानुको ही “बृहद्धानु' कहते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ដោយអានុភាពនៃតបស្យា ឱ កូនរបស់មនុ អង្គិរាសក៏បានបង្កើតភានុ (អគ្គិ) ហើយប្រទានកម្លាំងថ្មីឲ្យគាត់។ ព្រះព្រាហ្មណ៍អ្នកឆ្លងដល់ឆ្នេរឆ្ងាយនៃវេដទាំងឡាយ ហៅភានុនោះថា ‘ព្រឹហទ្ធានុ’»។

Verse 9

भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्धासा तु सूर्यजा । असूजेतां तु षट्‌ पुत्रान्‌ शृणू तासां प्रजाविधिम्‌,भानुकी दो पत्नियाँ हुईं--सुप्रजा और बृहद्धासा। इनमें बृहद्धासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ភានុមានភរិយាពីរនាក់—សុប្រជា និង ព្រឹហទ្ធាសា; ហើយព្រឹហទ្ធាសា ជាកូនស្រីរបស់សូរ្យៈ។ ពីភរិយាទាំងពីរនោះ បានកើតកូនប្រុសប្រាំមួយ។ ឥឡូវ ចូរស្តាប់ ខ្ញុំនឹងពណ៌នាវិធីដែលពូជពង្សរបស់ពួកគេបានកើតមាន»។

Verse 10

दुर्बलानां तु भूतानामसून्‌ यः सम्प्रयच्छति । तमनग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम्‌,जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें 'बलद' नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «អគ្គិដ៏ទេវភាពនោះ ដែលប្រទានដង្ហើមជីវិត និងកម្លាំងដល់សត្វមានជីវិតដែលទន់ខ្សោយ គេហៅថា បលដ (អ្នកប្រទានកម្លាំង)។ គាត់ត្រូវបានប្រកាសថា ជាកូនប្រុសច្បងរបស់ភានុ»។

Verse 11

यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुण: । अग्नि: स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुत: सुत:,जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर “क्रोध” बनकर प्रकट होते हैं, वे 'मन्युमान्‌” नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «កំហឹងដ៏សាហាវ ដែលកើតឡើងសូម្បីតែក្នុងសត្វមានជីវិតដែលស្ងប់ស្ងាត់—ចូរដឹងថា នោះជារូបមួយនៃអគ្គិ។ គាត់មាននាមថា មន្យុមាន់ ជាកូនប្រុសទីពីររបស់ភានុ»។

Verse 12

दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते । विष्णु्नामेह यो<ग्निस्तु धृतिमान्नाम सोडज्लिरा:,यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम “विष्णु” है। वे “अंगिरा” गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम “धृतिमान' अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं)

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «អគ្គិដ៏បរិសុទ្ធនោះ ដែលក្នុងលោកនេះ មានបទបញ្ជាឲ្យថ្វាយហាវិសក្នុងពិធីដರ್ಶ (ថ្ងៃចន្ទថ្មី) និងពោរណមាស (ថ្ងៃពេញចន្ទ) គេហៅនៅទីនេះថា ‘វិෂ್ಣុ’។ គាត់ត្រូវបានរាប់ថា ស្ថិតក្នុងវង្សអង្គិរាស ហើយក៏មាននាមថា ‘ធ្រឹតិមាន’—អ្នកមានភាពមាំមួន»។

Verse 13

३ इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम्‌ । अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «អ្នកណាដែលការបូជាហវីសដំបូង (āgrayaṇa) ត្រូវបានចងចាំថាបានធ្វើរួមជាមួយឥន្ទ្រៈ គេហៅថា “អគ្និ-អាគ្រយណ” (Agni-Āgrayaṇa) ហើយវង្សត្រកូលរបស់គាត់ពិតជាតាមពីភានុ (ព្រះអាទិត្យ)»។

Verse 14

इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अद्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य- अर्पणका विधान है, वे “आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ।। चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रह: । चतुर्भि: सहित: पुत्रैर्भानोरेवान्वय: स्तुभ:,चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्धवस्थान हैं, उनका नाम “अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं--से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ” नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छ: पुत्र हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ក្នុងយញ្ញៈចាតុರ್ಮាស្យ (Cāturmāsya) ហវីសដែលបានកំណត់ជានិច្ច (nitya) មានប្រភពមួយហៅថា “អគ្រហ” (Agraha)។ ហើយ “ស្តុភ” (Stubha) ក៏ស្ថិតក្នុងវង្សភានុដែរ។ រួមជាមួយកូនប្រុសបួននាក់ដែលបានរៀបរាប់មុននេះ “អគ្រហ” និង “ស្តុភ” ត្រូវបានរាប់ជាកូនចៅរបស់ភានុ»។

Verse 15

निशा त्वजनयत्‌ कन्यामग्नीषोमाबुभौ तथा । मनोरेवाभवद्‌ भार्या सुषुवे पडच पावकान्‌,मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम “रोहिणी” तथा) पुत्रोंके नाम थे--अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस्वरूप पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--वैश्वानर, विश्वपति, सब्निहित, कपिल और अग्रणी)

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «និសា (Niśā) បានបង្កើតកូនស្រីមួយ និងកូនប្រុសពីរនាក់—អគ្និ (Agni) និង សោម (Soma)។ នាងក៏បានក្លាយជាប្រពន្ធរបស់មនុ (Manu) ហើយបានបង្កើតកូនប្រុសប្រាំនាក់ដែលមានសភាពជាភ្លើង»។

Verse 16

पूज्यते हविषाग्रयेण चातुर्मास्येषु पावक: । पर्जन्यसहित: श्रीमाननिनेर्वेश्वानरस्तु सः,चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान्‌ वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «ក្នុងពិធីចាតុರ್ಮាស្យ (Cāturmāsya) ពាវកៈ (Pāvaka)—អគ្និដ៏បរិសុទ្ធ—ត្រូវបានបូជាដោយហវីសដ៏ប្រសើរបំផុត។ អ្នកមានពន្លឺរុងរឿងនោះ ដែលត្រូវបានបូជារួមជាមួយបរជន្យ (Parjanya) គឺ “វៃស្វានរ” (Vaiśvānara) — អគ្និដ៏ល្បីល្បាញ ជាកូនរបស់ អនិនី (Anini)»។

Verse 17

अस्य लोकस्य सर्वस्य य: प्रभु: परिपठ्यते । सोअन्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनो: सुत:

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចាថា៖ «អ្នកណាដែលត្រូវបានសូត្រនិងចងចាំថាជាព្រះអម្ចាស់នៃលោកទាំងមូលនេះ គាត់មាននាមថា អនិរវិស្វបតិ (Anirviśvapati) ហើយគាត់ពិតជាកូនប្រុសទីពីររបស់មនុ (Manu)»។

Verse 18

कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपो: सुता

មារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «កញ្ញានោះមាននាមថា រោហិណី; នាងជាកូនស្រីរបស់ ហិរ៉ណ្យកសិពុ»។

Verse 19

कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्नि: स प्रजापति: । मनुकी कन्या भी *स्विष्टकृत” ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें “मनु” ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ।। १८ $ ।। प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम्‌ । तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधन:,जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित” अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है

មារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «គោលធម៌ដ៏ទេវភាពមួយ ដែលពឹងផ្អែកលើដង្ហើមជីវិត ហើយជំរុញឲ្យរាងកាយរបស់សត្វមានជីវិតដំណើរការ ត្រូវហៅថា សំ្ននិហិត (ភ្លើង ‘ស្ថិតនៅក្នុង’)។ វាជាមធ្យោបាយសម្រាប់ការយល់ដឹង និងការប្រតិបត្តិរបស់សំឡេង និងរូប—ដូច្នេះហើយជីវិត ការយល់ឃើញ និងសកម្មភាព ត្រូវបានគាំទ្រដោយវត្តមានខាងក្នុងដែលគ្រប់គ្រង។»

Verse 20

शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम्‌ । अकल्मष: कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः,जो दीप्तिमान्‌ महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात्‌ विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)

មារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «ទេវបុរសនោះ ដែលជាផ្លូវ និងជាគ្រឹះទ្រទ្រង់ទាំងមាគ៌ាពន្លឺ និងមាគ៌ាអន្ធការ; ដែលទ្រទ្រង់ និងចិញ្ចឹមភ្លើងបូជា; ដែលខ្លួនឯងស្អាតបរិសុទ្ធឥតមាលិន្យ ប៉ុន្តែក៏ក្លាយជាអ្នកបង្កើតអ្វីៗទាំងអស់ដែលមានមាលិន្យ—ទ្រង់ស្ថិតនៅក្នុងកំហឹងជារូបភ្លើង។ ទ្រង់ជាមហាបុរសភ្លឺរលោង ដែលពួកយតីស្គាល់ថា មហាឥសី កបិលៈ អ្នកបង្កើតផ្លូវសាំងខ្យ និងយោគៈ។»

Verse 21

कपिलं परमर्षि च यं प्राहुर्यतय: सदा । अग्नि: स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तक:,जो दीप्तिमान्‌ महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात्‌ विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)

មារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «ពួកយតីតែងហៅទ្រង់ថា កបិលៈ មហាឥសីដ៏អធិក។ ទ្រង់ជាអគ្គិផ្ទាល់—មាននាមថា កបិលៈ—អ្នកដែលបានចាប់ផ្តើមផ្លូវសាំងខ្យ និងយោគៈ។ ទោះស្អាតបរិសុទ្ធឥតមាលិន្យ និងលើសលប់ពីមាលិន្យទាំងអស់ ក៏ទ្រង់ក្លាយជាប្រភពដែលធ្វើឲ្យលោកធាតុបម្លែងចម្រុះកើតឡើង; ដូច្នេះហើយ ព្រះឥសីទាំងឡាយគោរពទ្រង់ជាមូលដ្ឋានភ្លើងនៃចំណេះដឹងវិន័យ និងការគ្រប់គ្រងខ្លួន។»

Verse 22

अग्र॑ यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सो5ग्रणीर्वद्विरुच्यते,मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានពាក្យថា៖ «ទ្រង់ដែលដោយសារទ្រង់ ក្នុងកិច្ចការចម្រុះនៅទីនេះ មនុស្សជាដើមតែងអនុវត្តការបូជាផ្នែកដំបូងនៃអាហារ ដើម្បីប្រយោជន៍សត្វទាំងអស់—ឲ្យសត្វទាំងឡាយបានរស់រាន—ទ្រង់ត្រូវបានសរសើរថា ‘អគ្រ​ណី’ (អ្នកដឹកនាំ)»។ ក្នុងន័យនេះ អគ្រ​ណីត្រូវបានស្គាល់ថាជាទេវតាភ្លើងដែលទាក់ទងនឹងការបូជាចំណែកដំបូង ហើយក៏ត្រូវចងចាំក្នុងប្រពៃណីវង្សាវតារថាជាកូនប្រុសមួយរបស់ មនុ។

Verse 23

इमानन्यान्‌ समसृजत्‌ पावकान्‌ प्रथितान्‌ भुवि । अन्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्षित्तार्थमुल्वणान्‌,मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त [समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं

មនុបានបង្កើតអគ្គីទាំងនេះផ្សេងទៀត ដែលល្បីល្បាញលើលោក មានពន្លឺខ្លាំង ដោយខុសពីអគ្គីដែលបាននិយាយមុន ដើម្បីជាព្រះយសសម្រាប់ការប្រាយស្ចិត្ត (ការសងសំណងបាប) ចំពោះកំហុសធ្ងន់ធ្ងរ ក្នុងពិធីអគ្និហោត្រ។

Verse 24

संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथज्चिद्‌ वायुनाग्नय: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचये5ग्नये,यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें- संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «បើដោយហេតុណាមួយ ព្រោះខ្យល់បក់ ធ្វើឲ្យអគ្គីបរិសុទ្ធទាំងឡាយប៉ះគ្នាទៅវិញទៅមក នោះគួរធ្វើពិធីអិಷ್ಟិ (iṣṭi) សម្រាប់អគ្គីឈ្មោះ “សុចិ” ដោយប្រើពុរោឌាស (puroḍāśa) អष्टាកបាល (aṣṭākapāla) គឺរៀបចំតាមសាស្ត្រនៅក្នុងកបាលប្រាំបី។ ដូច្នេះលំដាប់ពិធីត្រូវបានស្ដារឡើងវិញ ហើយភាពបរិសុទ្ធនៃអគ្គីត្រូវបានរក្សាទុក»។

Verse 25

दक्षिणानिनिर्यदा द्वाभ्यां संसजेत तदा किल | इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेडग्नये,जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा “वीति” नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលដែលដក្ខិណាគ្គី (អគ្គីខាងត្បូង) ប៉ះពាល់ជាមួយអគ្គីពីរផ្សេងទៀត គឺ ការហបត្យ និង ហវនីយៈ នោះតាមបទបញ្ញត្តិ គួរធ្វើពិធីអិષ્ટិ ដោយប្រើពុរោឌាសដែលរៀបចំតាមសាស្ត្រនៅក្នុងចានដីប្រាំបី ហើយដាក់អាហូតិទៅកាន់អគ្គីឈ្មោះ “វីតិ”។»

Verse 26

यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेडग्नये,यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «បើអគ្គីក្នុងផ្ទះ ដែលបានដំឡើងនៅកន្លែងត្រឹមត្រូវ ប៉ះពាល់ជាមួយភ្លើងព្រៃ (ដាវានល) នោះត្រូវធ្វើពិធីអិષ્ટិជាប្រាយស្ចិត្ត ដោយប្រើអष्टាកបាល (aṣṭākapāla) គឺចានដីប្រាំបី ហើយដាក់អាហូតិជាចារុ (caru) ដែលបានសំស្ការ ទៅកាន់អគ្គីក្រោមនាម “សុចិ” (អ្នកបរិសុទ្ធ)។»

Verse 27

अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमते5ग्नये,यदि अनि्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान्‌ अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបាននិយាយថា៖ «បើស្ត្រីដែលកំពុងមានរដូវ ប៉ះអគ្គីបរិសុទ្ធដែលពាក់ព័ន្ធនឹងពិធីអគ្និហោត្រ នោះត្រូវធ្វើអិષ્ટិជាប្រាយស្ចិត្ត ដោយប្រើអष्टាកបាល (aṣṭākapāla) គឺចានដីប្រាំបី ហើយដាក់អាហូតិជាចារុ (caru) ដែលបានសំស្ការ ទៅកាន់អគ្គីក្រោមនាម “វសុមត” (Vasumat)។»

Verse 28

मृत: श्रूयेत यो जीव: परेयु: पशवो यदा । इष्टिरशकपालेन कार्या सुरभिमतेडग्नये,यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान्‌ नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើស្តាប់ឮសញ្ញាមរណៈរបស់សត្វមានជីវិត ដូចជា​សំឡេងយំសោកជាដើម ឬបើសត្វដូចជា​ឆ្កែជាដើម ប៉ះពាល់នឹងភ្លើងបរិសុទ្ធនោះ នោះក្នុងស្ថានភាពនោះ គួរធ្វើពិធីសងសឹក (ពិធីបំបាត់ទោស) គឺ iṣṭi មួយ ដោយរៀបចំ puroḍāśa លើចានដីប្រាំបី ហើយធ្វើហោម ដើម្បីបំពេញព្រះហឫទ័យអគ្គិដែលមាននាមថា “Surabhimān”»។

Verse 29

आर्तों न जुहुयादनिंे त्रिरात्र॑ यस्तु ब्राह्मण: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये,जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अनिनिहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा “उत्तरर नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើព្រះព្រាហ្មណ៍ម្នាក់ ដែលត្រូវទុក្ខវេទនា បោះបង់ការដាក់អាហុតិចូលភ្លើងបរិសុទ្ធរយៈបីយប់ នោះគួរធ្វើពិធីសងសឹក គឺ iṣṭi មួយ ដោយរៀបចំអាហុតិ (charu) ក្នុងភាជន៍ដីប្រាំបីផ្នែក (aṣṭākapāla) ហើយថ្វាយដល់អគ្គិដែលមាននាមថា “Uttara”។ ព្រះបន្ទូលនេះបង្ហាញថា ទោះមានទុក្ខលំបាករំខានកិច្ចបូជាប្រចាំក៏ដោយ គួរតែស្ដារឡើងវិញនូវរបៀបពិធីដោយការសងសឹកតាមវិន័យ មិនមែនបោះបង់វិន័យឡើយ»។

Verse 30

दर्श च पौर्णमासं च यस्य तिछेत्‌ प्रतिष्ठितम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेडग्नये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «សម្រាប់អ្នកដែលបានបង្កើត និងរក្សាទុកយ៉ាងត្រឹមត្រូវនូវពិធីថ្ងៃចន្ទថ្មី (darśa) និងថ្ងៃពេញចន្ទ (paurṇamāsa) គួរធ្វើការថ្វាយអាហុតិ ដោយរៀបចំអាហុតិលើភាជន៍ដីប្រាំបីផ្នែក ហើយឧទ្ទិសដល់អគ្គិ ជាអ្នកការពារអ្នកធ្វើដំណើរ។ ដូច្នេះ សូម្បីតែការធ្វើដំណើរ ក៏ត្រូវដាក់ក្រោមរបៀបបរិសុទ្ធ ដើម្បីឲ្យការធ្វើចលនាក្នុងលោក ត្រូវបានដឹកនាំដោយវិន័យ ការគោរព និងបំណងមិនបង្កអន្តរាយ»។

Verse 31

जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे “पथिकृत” नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ।। सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम्‌ । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेडग्नये,जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा 'अग्निमान” नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បើពិធី darśa និង paurṇamāsa ដែលបានចាប់ផ្តើមរួច ត្រូវផ្អាកកណ្ដាលផ្លូវ ឬនៅសល់ដោយមិនបានថ្វាយអាហុតិ នោះគួរធ្វើហោមដោយ charu ដែលបានសំស្ការ លើភាជន៍ដីប្រាំបីផ្នែក ដើម្បីអគ្គិដែលមាននាម ‘Pathikṛt’। ហើយបើភ្លើងនៅបន្ទប់សម្រាលកូន (sūtikā-fire) ទៅប៉ះភ្លើង Agnihotra របស់គ្រួសារ នោះគួរធ្វើពិធីសងសឹក ដោយ puroḍāśa លើភាជន៍ដីប្រាំបីផ្នែក ថ្វាយដល់អគ្គិដែលមាននាម ‘Agnimat’។ ព្រះបន្ទូលនេះរំលេចកាតព្វកិច្ចក្នុងពិធី៖ ពេលភ្លើងបរិសុទ្ធត្រូវរំខាន គួរស្ដាររបៀបឡើងវិញដោយសងសឹកតាមវិន័យ មិនមែនមើលរំលងការខូចខាតនោះឡើយ»។

Verse 173

ततः स्विष्ट॑ भवेदाज्यं स्विष्टकृत्‌ परमस्तु सः । जो वेदोंमें सम्पूर्ण जगत॒के पति” कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत्‌ (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं

មារកណ្ឌេយៈបានមានព្រះវាចា៖ «បន្ទាប់មក ទឹកខ្លាញ់បរិសុទ្ធ (ājya) ក្លាយជាអ្វីដែល ‘បានថ្វាយល្អ’ ពិតប្រាកដ ព្រោះព្រះអង្គនោះជាព្រះ Sviṣṭakṛt អធិបតី—អ្នកបំពេញឲ្យពិធីបូជាសម្រេចល្អឥតខ្ចោះ។ ដោយអานุភាពរបស់ព្រះអង្គ ការថ្វាយអាហុតិប្រព្រឹត្តទៅដោយសោភ័ណ និងត្រឹមត្រូវ; ហេតុនេះហើយ ព្រះអង្គត្រូវបានសរសើរថា ជាអ្នកសម្រេចបំណងខ្ពស់បំផុត ដែលបំពេញពិធី និងផលរបស់វា»។

Verse 220

इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्मानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទី ២២០ នៃ «មហាភារត» ក្នុង «វណបវ៌» នៅក្នុងផ្នែក «មារកណ្ឌេយ-សមាស្យា», ដែលពាក់ព័ន្ធនឹងរឿងនិទាន «អង្គិរាស»។ កថាបញ្ចប់នេះជាសញ្ញាបិទបញ្ចប់មួយឯកតានៃការបង្រៀន និងការនិទានរឿង ហើយជាការឈប់សម្រាកឲ្យពិចារណាអំពីន័យធម៌ និងវិញ្ញាណនៃហេតុការណ៍ដែលទើបបាននិទាន។

Verse 221

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

មារកណ្ឌេយបានមានព្រះវាចា៖ «ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ផ្នែក «វណបវ៌» នៅក្នុងផ្នែក «មារកណ្ឌេយ-សមាស្យា» រឿងនិទានដែលហៅថា «អង្គិរាស ឧបាខ្យាន» បានបញ្ចប់—នេះជាជំពូកទី ២២១»។ នោះមានន័យថា កថាបញ្ចប់នេះបិទជំពូកដោយផ្លូវការ បង្ហាញថាភាគរឿងបានបញ្ចប់ ហើយអញ្ជើញឲ្យអ្នកស្តាប់រក្សាទុកន័យធម៌របស់វា ជាផ្នែកនៃការបង្រៀនធម៌ក្នុង «សៀវភៅព្រៃ» តាមរយៈរឿងគំរូ។

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether relational influence should be sought through covert techniques (mantras, medicines, coercive stratagems) or through ethically transparent conduct; Draupadī treats the former as corrosive to trust and peace within intimate life.

Sustainable concord arises from self-governance and service: controlling anger and desire, speaking carefully, honoring elders, maintaining hospitality and cleanliness, and managing resources responsibly—thereby making trust, not fear, the basis of stability.

No formal phalaśruti is stated; the closure functions as ethical validation through Satyabhāmā’s acknowledgment and apology, marking the discourse as dharma-consistent and socially commendable rather than ritually reward-framed.