Adhyaya 76
Vana ParvaAdhyaya 7655 Verses

Adhyaya 76

Adhyāya 76: Kuṇḍina-praveśaḥ, Bhīmena satkāraḥ, Ṛtuparṇa-kṣamā, Aśvahṛdaya-pratyarpanam (Nala’s Reception and Reconciliation)

Upa-parva: Nala–Damayantī Upākhyāna (Embedded Narrative within Āraṇyaka Parva)

Bṛhadaśva narrates Nala’s arrival after the night has passed: Nala, adorned and accompanied by Damayantī, meets Bhīma (the ruler of Vidarbha) in the morning and offers respectful salutations; Damayantī follows with reverence toward her father. Bhīma receives Nala with paternal warmth, honors him appropriately, and reassures Damayantī’s steadfast presence beside her husband. News of Nala’s return produces civic jubilation: the city is decorated with banners and flags, roads are cleaned and strewn with flowers, and shrines are honored. King Ṛtuparṇa hears that “Bāhuka” was Nala in disguise and rejoices; when brought, Nala and Ṛtuparṇa mutually seek forgiveness, with Ṛtuparṇa explicitly requesting pardon for any offense committed during Nala’s incognito residence. Nala denies wrongdoing on Ṛtuparṇa’s part, reaffirms friendship and kinship ties, praises Ṛtuparṇa’s hospitality, and proposes to return the equine science (aśvahṛdaya) previously obtained. Nala then transmits the knowledge to Ṛtuparṇa by proper procedure; Ṛtuparṇa departs for his city with another charioteer, and Nala remains in Kuṇḍina for a short period.

Chapter Arc: दमयन्ती का हृदय अब भी ‘बाहुक’ में नल की छाया पहचान चुका है; वह केशिनी को फिर भेजती है—क्योंकि नल-दर्शन की अभिलाषा दुःख बनकर लौट-लौट आती है। → बाहुक की पहचान को लेकर संशय और संकोच गहराते हैं—दमयन्ती स्वयं सत्य जानना चाहती है, पर मर्यादा, लोकलज्जा और पूर्व-वियोग का भय उसे रोकता है। वह माता-पिता की आज्ञा लेकर नल को राजभवन के भीतर बुलवाती है, ताकि सत्य का निर्णय प्रत्यक्ष हो सके। → दमयन्ती वायुदेवता को साक्षी मानकर शपथ/सत्यवचन करती है—‘यदि मैं पाप कर रही हूँ तो प्राण छूट जाएँ’; उसी क्षण पुष्पवृष्टि होती है, देवदुन्दुभियाँ बजती हैं और शुभ पवन बहता है—दैवी संकेत से दमयन्ती की निष्कलुषता और नल की पहचान का सत्य प्रकाशित हो उठता है। → नल (बाहुक-रूप) दमयन्ती को दीर्घ आलिंगन में लेता है—शोक से आप्लुत होकर भी मिलन की सच्चाई में स्थिर होता है। दमयन्ती की ज्वर-तन्द्रा शांत होती है; वह पुनः समवाप्तकामा होकर चन्द्र-उदय से शोभित रात्रि की भाँति दमक उठती है—नल-दमयन्ती का समागम सिद्ध होता है। → समागम तो हो गया, पर नल का ‘बाहुक’ से पूर्ण ‘नल’ में प्राकट्य और आगे का धर्म-निर्णय (कली-शाप, राज्य-प्राप्ति, पुनर्स्थापन) अगले प्रसंगों की ओर संकेत करता है।

Shlokas

Verse 1

न > 'मांस' शब्दका अर्थ 'संस्कृत-शब्दार्थ-कौस्तुभ' में फलका गूदा किया गया है। षट्सप्ततितमो< ध्याय: दमयन्ती और बाहुककी बातचीत, नलका प्राकट्य और नल-दमयन्ती-मिलन बृहदश्चव उवाच सर्व विकार दृष्टवा तु पुण्यश्लोकस्य धीमत: । आगत्य केशिनी सर्व दमयन्त्यै न्‍्यवेदयत्‌,बृहदश्व मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! परम बुद्धिमान्‌ पुण्यश्लोक राजा नलके सम्पूर्ण विकारोंको देखकर केशिनीने दमयन्तीको आकर बताया

Bṛhadaśva berkata: Setelah melihat segala perubahan pada Raja Nala yang bijaksana dan termasyhur, Keśinī datang dan melaporkan semuanya kepada Damayantī.

Verse 2

दमयन्ती ततो भूय: प्रेषयामास केशिनीम्‌ । मानु: सकाशं दु:खार्ता नलदर्शनकाड्क्षया,अब दमयन्ती नलके दर्शनकी अभिलाषासे दुःखातुर हो गयी। उसने केशिनीको पुनः अपनी माँके पास भेजा

Kemudian Damayantī, diliputi duka dan rindu untuk memandang Nala, kembali mengutus Keśinī kepada ibunya.

Verse 3

परीक्षितो मे बहुशो बाहुको नलशड्कया । रूपे मे संशयस्त्वेक: स्वयमिच्छामि वेदितुम्‌,(और यह कहलाया--) “माँ! मेरे मनमें बाहुकके ही नलके होनेका संदेह था, जिसकी मैंने बार-बार परीक्षा करा ली है और सब लक्षण तो मिल गये हैं। केवल नलके रूपमें संदेह रह गया है। इस संदेहका निवारण करनेके लिये मैं स्वयं पता लगाना चाहती हूँ

“Ibu, karena menduga bahwa Bāhuka sesungguhnya Nala, aku telah mengujinya berulang kali dan semua tanda cocok. Namun satu keraguan masih tersisa—rupa dirinya sebagai Nala. Untuk menyingkirkan keraguan itu, aku ingin memastikannya sendiri.”

Verse 4

स वा प्रवेश्यतां मातर्मा वानुज्ञातुमहसि । विदितं वाथवा ज्ञातं॑ पितुर्मे संविधीयताम्‌,“माताजी! या तो बाहुकको महलमें बुलाओ या मुझे ही बाहुकके निकट जानेकी आज्ञा दो। तुम अपनी रुचिके अनुसार पिताजीसे सूचित करके अथवा उन्हें इसकी सूचना दिये बिना इसकी व्यवस्था कर सकती हो”

“Ibu, panggillah Bāhuka masuk ke istana, atau izinkan aku mendatangi Bāhuka sendiri. Aturlah sebagaimana Ibu anggap patut—dengan memberitahu ayahku, atau bahkan tanpa sepengetahuannya.”

Verse 5

एवमुक्ता तु वैदर्भ्या सा देवी भीममब्रवीत्‌ । दुहितुस्तमभिप्रायमन्वजानात्‌ स पार्थिव:,दमयन्तीके ऐसा कहनेपर महारानीने विदर्भनरेश भीमसे अपनी पुत्रीका यह अभिप्राय बताया। सब बातें सुनकर महाराजने आज्ञा दे दी

Setelah demikian disampaikan, sang permaisuri Vidarbha berbicara kepada Raja Bhīma, menyatakan maksud putrinya. Memahami kehendak sang gadis, raja pun memberikan persetujuannya.

Verse 6

सा वै पित्राभ्यनुज्ञाता मात्रा च भरतर्षभ । नलं॑ प्रवेशयामास यत्र तस्या: प्रतिश्रय:,भरतकुलभूषण! पिता और माताकी आज्ञा ले दमयन्तीने नलको राजभवनके भीतर जहाँ वह स्वयं रहती थी, बुलवाया। दमयन्तीको सहसा सामने उपस्थित देख राजा नल शोक और दु:खसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे

Wahai banteng keturunan Bharata! Setelah memperoleh izin ayah dan ibunya, Damayantī menyuruh Nala masuk ke dalam istana, ke tempat ia sendiri berdiam.

Verse 7

तां सम दृष्टवैव सहसा दमयन्तीं नलो नृपः । आविष्ट: शोकदु:खाभ्यां बभूवाश्रुपरिप्लुत:,भरतकुलभूषण! पिता और माताकी आज्ञा ले दमयन्तीने नलको राजभवनके भीतर जहाँ वह स्वयं रहती थी, बुलवाया। दमयन्तीको सहसा सामने उपस्थित देख राजा नल शोक और दु:खसे व्याप्त हो नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे

Begitu Raja Nala tiba-tiba melihat Damayantī di hadapannya, ia diliputi duka dan nestapa; matanya pun tergenang air mata.

Verse 8

त॑ तु दृष्टवा तथायुक्तं दमयन्ती नलं तदा । तीव्रशोकसमाविष्टा बभूव वरवर्णिनी,उस समय नलको उस अवस्थामें देखकर सुन्दरी दमयन्ती भी तीव्र शोकसे व्याकुल हो गयी

Namun ketika Damayantī melihat Nala dalam keadaan yang demikian, sang wanita berparas elok itu pun dilanda duka yang amat dalam.

Verse 9

ततः काषायवसना जटिला मलपड्किनी । दमयन्ती महाराज बाहुकं वाक्यमत्रवीत्‌,महाराज! तदनन्तर मलिन वस्त्र पहने, जटा धारण किये, मैल और पंकसे मलिन दमयन्तीने बाहुकसे पूछा--

Kemudian, wahai raja, Damayantī—berbalut kain oker yang kotor, berambut gimbal, dan tubuhnya berlumur debu serta lumpur—berkata kepada Bāhuka demikian.

Verse 10

पूर्व दृष्टस्त्वया कश्चिद्‌ धर्मज्ञो नाम बाहुक । सुप्तामुत्सृज्य विपिने गतो यः पुरुष: स्त्रियम्‌,“बाहुक! तुमने पहले किसी ऐसे धर्मज्ञ पुरुषको देखा है, जो अपनी सोयी हुई पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर चले गये थे

Bṛhadaśva berkata: “Wahai Bāhuka, pernahkah engkau melihat sebelumnya seorang lelaki—yang termasyhur sebagai tahu dharma—yang meninggalkan istrinya saat ia tertidur, lalu pergi dan membiarkannya seorang diri di hutan?”

Verse 11

अनागसं प्रियां भार्या विजने श्रममोहिताम्‌ । अपहाय तु को गच्छेत्‌ पुण्यश्लोकमृते नलम्‌,'पुण्यश्लोक महाराज नलके सिवा दूसरा कौन होगा, जो एकान्तमें थकावटके कारण अचेत सोयी हुई अपनी निर्दोष प्रियतमा पत्नीको छोड़कर जा सकता हो

Bṛhadaśva berkata: “Siapa lagi selain Raja Nala—yang termasyhur dan berbudi luhur—yang sanggup pergi setelah meninggalkan istri tercinta yang tak bersalah, sendirian di tempat sunyi, diliputi letih dan pingsan?”

Verse 12

किमु तस्य मया बाल्यादपराद्ध॑ महीपते: । यो मामुत्सृज्य विपिने गतवान्‌ निद्रयार्दिताम्‌,“न जाने उन महाराजका मैंने बचपनसे ही क्या अपराध किया था, जो नींदकी मारी हुई मुझ असहाय अबलाको जंगलमें छोड़कर चल दिये

“Aku tak tahu kesalahan apa yang telah kulakukan terhadap raja itu sejak masa kanak-kanak, hingga ia meninggalkanku—lemah tak berdaya, diliputi kantuk—dan pergi, membiarkanku di hutan.”

Verse 13

साक्षाद्‌ देवानपाहाय वृतो य: स पुरा मया | अनुव्रतां साभिकामा पुत्रिणीं त्यक्तवान्‌ कथम्‌,“पहले स्वयंवरके समय साक्षात्‌ देवताओंको छोड़कर मैंने उनका वरण किया था। मैं उनकी अनुगत भक्त, निरन्तर उन्हें चाहनेवाली और पुत्रवती हूँ, तो भी उन्होंने कैसे मुझे त्याग दिया?

“Dahulu, pada saat svayaṃvara, aku memilih dia—bahkan dengan mengesampingkan para dewa yang hadir di hadapanku. Aku setia mengikutinya, selalu mendambakannya, dan aku ibu dari anak-anaknya; bagaimana mungkin ia meninggalkanku?”

Verse 14

अग्नौ पार्णिं गृहीत्वा तु देवानामग्रतस्तथा । भविष्यामीति सत्य तु प्रतिश्रुत्य क्व तद्‌ गतम्‌,'“अग्निके समीप और देवताओंके समक्ष मेरा हाथ पकड़कर और “मैं तेरा ही अनुगत होकर रहूँगा” ऐसी प्रतिज्ञा करके जिन्होंने मुझे अपनाया था, उनका वह सत्य कहाँ चला गया?”

“Di dekat api suci, di hadapan para dewa, ia menggenggam tanganku dan bersumpah dengan sebenar-benarnya: ‘Aku akan tetap menjadi pengikutmu, hanya milikmu.’ Ke manakah perginya kebenaran itu kini?”

Verse 15

दमयन्त्या ब्रुवन्त्यास्तु सर्वमेतदरिंदम । शोकजं वारि नेत्राभ्यामसुखं प्रास्रवद्‌ बहु,शत्रुदमन युधिष्ठिर! दमयन्ती जब ये सब बातें कह रही थी, उस समय नलके नेत्रोंसे शोकजनित दुःखपूर्ण आँसुओंकी अजस््र धारा बहती जा रही थी

Bṛhadaśva berkata: “Wahai penakluk musuh, Yudhiṣṭhira! Ketika Damayantī mengucapkan semua kata itu, dari mata Nala terus mengalir deras air duka—air mata yang perih—tanpa henti.”

Verse 16

अतीव कृष्णसाराशभ्यां रक्तान्ताभ्यां जल॑ तु तत्‌ परिस््रवन्‌ नलो दृष्टवा शोकार्तामिदमब्रवीत्‌,उनकी आँखोंकी पुतलियाँ काली थीं और नेत्रके किनारे कुछ-कुछ लाल थे। उनसे निरन्तर अश्रुधारा बहाते हुए नलने दमयन्तीको शोकसे आतुर देख इस प्रकार कहा --

Bṛhadaśva berkata: “Matanya gelap seperti mata kijang hitam, sudut-sudutnya kemerahan, dan air mata terus mengalir. Melihat Damayantī dilanda duka, Nala pun berkata demikian—”

Verse 17

मम राज्यं प्रणष्टं यन्नाहं तत्‌ कृतवान्‌ स्वयम्‌ । कलिना तत्‌ कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम्‌,'भीरु! मेरा जो राज्य नष्ट हो गया और मैंने जो तुम्हें त्याग दिया, वह सब कलियुगकी करतूत थी। मैंने स्वयं कुछ नहीं किया था

Bṛhadaśva berkata: Nala berkata, “Wahai yang lembut hati! Kerajaanku hancur dan aku meninggalkanmu—semuanya dilakukan oleh Kali; aku sendiri tidak berbuat apa-apa.”

Verse 18

यत्‌ त्वया धर्मकृच्छे तु शापेनाभिहत: पुरा । वनस्थया दुःखितया शोचन्त्या मां दिवानिशम्‌,“पहले जब तुम वनमें दुखी होकर दिन-रात मेरे लिये शोक करती थी और उस समय धर्मसंकटमें पड़नेपर तुमने जिसे शाप दे दिया था, वही कलियुग मेरे शरीरमें तुम्हारी शापग्निसे दग्ध होता हुआ निवास करता था, जैसे आगमें रखी हुई आग हो; उसी प्रकार वह कलि तुम्हारे शापसे दग्ध हो सदा मेरे भीतर रहता था

Bṛhadaśva berkata: “Dahulu, ketika engkau tinggal di hutan—bersedih dan meratap untukku siang dan malam—dalam krisis dharma engkau melontarkan kutuk. Sejak itu, Kali yang terkena kutuk itu pun berdiam dalam diriku.”

Verse 19

स मच्छरीरे त्वच्छापाद्‌ दह्मुमानो&$वसत्‌ कलि: । त्वच्छापदग्ध: सततं सो5ग्नावग्निरिवाहित:,“पहले जब तुम वनमें दुखी होकर दिन-रात मेरे लिये शोक करती थी और उस समय धर्मसंकटमें पड़नेपर तुमने जिसे शाप दे दिया था, वही कलियुग मेरे शरीरमें तुम्हारी शापग्निसे दग्ध होता हुआ निवास करता था, जैसे आगमें रखी हुई आग हो; उसी प्रकार वह कलि तुम्हारे शापसे दग्ध हो सदा मेरे भीतर रहता था

Bṛhadaśva berkata: “Kali itu, terbakar oleh api kutukmu, tinggal di dalam tubuhku. Terus-menerus hangus oleh kutukmu, ia menetap dalam diriku—laksana api yang diletakkan di dalam api.”

Verse 20

मम च व्यवसायेन तपसा चैव निर्जित: । दुःखस्यान्तेन चानेन भवितव्यं हि नौ शुभे,'शुभे! मेरे व्यवसाय (उद्योग) तथा तपस्यासे कलियुग परास्त हो चुका है। अतः अब हमारे दुःखोंका अन्त हो जाना चाहिये

Wahai yang berbahagia, dengan usaha teguh dan tapa-brata, hal ini (Kali-yuga) telah kutaklukkan; maka melalui hasil inilah, duka kita pasti akan mencapai akhirnya.

Verse 21

विमुच्य मां गत: पापस्ततो5हमिह चागत: । त्वदर्थ विपुलश्रोणि न हि मेडन्यत्‌ प्रयोजनम्‌,'सुन्दरी! पापी कलियुग मुझे छोड़कर चला गया, इसीसे मैं तुम्हारी प्राप्तिका उद्देश्य लेकर यहाँ आया हूँ। इसके सिवा, मेरे आगमनका दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है

Wahai jelita berpinggul lebar, si durjana itu (Kali-yuga) telah melepaskanku lalu pergi; sebab itu aku datang ke sini. Aku datang semata-mata demi engkau—tiada tujuan lain bagiku.

Verse 22

कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम्‌ । उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कहिचित्‌,'भीरु! कोई भी स्त्री कभी अपने अनुरक्त एवं भक्त पतिको त्यागकर दूसरे पुरुषका वरण कैसे कर सकती है? जैसा कि तुम करने जा रही हो

Wahai yang pemalu, bagaimana mungkin seorang perempuan meninggalkan suami yang mencintainya dan setia pada dharmanya, lalu memilih lelaki lain—seperti yang hendak kaulakukan?

Verse 23

दूताश्चरन्ति पृथिवीं कृत्स्नां नूपतिशासनात्‌ । भेमी किल सम भर्तरं द्वितीयं वरयिष्यति,“विदर्भनरेशकी आज्ञासे सारी पृथ्वीपर दूत विचरते हैं और यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय पतिका वरण करेगी

Atas titah raja, para utusan menjelajahi seluruh bumi, menyerukan bahwa Bhīmī (Damayantī) akan memilih seorang suami kedua yang setara dengan tuan lamanya.

Verse 24

स्वैरवृत्ता यथाकाममनुरूपमिवात्मन: । श्रुत्वैव चैवं त्वरितो भाड़ासुरिरुपस्थित:,“दमयन्ती स्वेच्छाचारिणी है और अपनी रुचिके अनुसार किसी अनुरूप पतिका वरण कर सकती है', यह सुनकर ही राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ यहाँ उपस्थित हुए हैं!

Begitu mendengar bahwa Damayantī bebas bertindak menurut kehendaknya dan dapat memilih suami yang sesuai dengan seleranya, Bhāḍāsuri (Raja Ṛtupārṇa) segera datang ke sini dengan tergesa-gesa.

Verse 25

दमयन्ती तु तच्छुत्वा नलस्य परिदेवितम्‌ । प्राउजलिवेपमाना च भीता वचनमत्रवीत्‌,दमयन्ती नलका यह विलाप सुनकर काँप उठी और भयभीत हो हाथ जोड़कर यह वचन बोली

Mendengar ratapan Nala, Damayantī gemetar. Dengan takut, ia merangkapkan tangan penuh hormat dan berkata—

Verse 26

दमयन्त्युवाच न मा्महसि कल्याण दोषेण परिशड्कितुम्‌ । मया हि देवानुत्सृज्य वृतस्त्वं निषधाधिप,दमयन्तीने कहा--कल्याणमय निषधनरेश! आपको मुझपर दोषारोपण करते हुए मेरे चरित्रपर संदेह नहीं करना चाहिये। (आपके प्रति अनन्य प्रेमके कारण ही) मैंने देवताओंको छोड़कर आपका वरण किया है

Damayantī berkata: “Wahai raja Niṣadha yang mulia, janganlah engkau mencurigai aku bersalah atau meragukan kesucianku. Aku telah mengesampingkan bahkan para dewa dan memilih engkau.”

Verse 27

तवाभिगमनार्थ तु सर्वतो ब्राह्मणा गता: । वाक्यानि मम गाथाभिग्गायमाना दिशो दश,आपका पता लगानेके लिये ही चारों ओर ब्राह्मणलोग भेजे गये और वे मेरी कही हुई बातोंको सब दिशाओंमें गाथाके रूपमें गाते फिरे

Untuk menemukanmu dan mempertemukan kita, para brāhmaṇa dikirim ke segala penjuru. Mereka mengembara ke sepuluh arah sambil melagukan pesanku sebagai syair-syair.

Verse 28

ततत्त्वां ब्राह्मणो विद्वान्‌ पर्णादो नाम पार्थिव । अभ्यगच्छत्‌ कोसलायामृतुपर्णनिवेशने

Kemudian, wahai Raja, seorang brāhmaṇa bijak bernama Parṇāda mendatangimu di Kosala, di kediaman Ṛtupārṇa.

Verse 29

राजन! इसी योजनाके अनुसार पर्णाद नामक दिद्दान्‌ ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें ऋतुपर्णके राजभवनमें गये थे ।। तेन वाक्ये कृते सम्यक्‌ प्रतिवाक्ये तथा$56वते । उपायो<यं मया दृष्टो नैषधानयने तव,उन्होंने वहाँ मेरी बात उपस्थित की और वहाँसे आपके द्वारा प्राप्त हुआ ठीक-ठीक उत्तर वे ले आये। निषधराज! इसके बाद आपको यहाँ बुलानेके लिये मुझे यह उपाय सूझा (कि एक ही दिनके बाद होनेवाले स्वयंवरका समाचार देकर ऋतुपर्णको बुलाया जाय)

Bṛhadaśva berkata: “Wahai Raja, sesuai rencana ini, seorang brāhmaṇa bernama Parṇāda pergi ke Ayodhyā dan masuk ke istana Raja Ṛtupārṇa. Ia menyampaikan pesanku dengan tepat, lalu kembali membawa jawabanmu sebagaimana adanya. Wahai penguasa Niṣadha, sesudah itu aku menemukan siasat untuk membawamu kemari—dengan memberitakan kepada Ṛtupārṇa kabar tentang svayaṃvara yang konon akan berlangsung keesokan harinya.”

Verse 30

त्वामृते न हि लोकेडन्य एकाह्वा पृथिवीपते । समर्थो योजनशतं गन्तुम श्वैर्नराधिप,नरेश्वर! पृथ्वीनाथ! मैं यह अच्छी तरह जानती हूँ कि इस जगत्‌में आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो एक ही दिनमें घोड़े जुते हुए रथकी सवारीसे सौ योजन दूरतक जानेमें समर्थ हो

Bṛhadaśvā berkata: “Wahai penguasa bumi, selain engkau tiada seorang pun di dunia ini yang sanggup menempuh seratus yojana dalam satu hari dengan menaiki kereta yang ditarik kuda. Aku mengetahui hal ini dengan pasti.”

Verse 31

स्पृशेयं तेन सत्येन पादावेतौ महीपते । यथा नासत्कृतं किंचिन्मनसापि चराम्यहम्‌,महीपते! मैं मनसे भी कभी कोई असदाचरण नहीं करती हूँ और इसी सत्यकी शपथ खाकर आपके इन दोनों चरणोंका स्पर्श करती हूँ

Bṛhadaśvā berkata: “Wahai raja, demi kebenaran ini aku menyentuh kedua kakimu: aku tak pernah melakukan perbuatan yang tak patut—bahkan di dalam pikiran sekalipun.”

Verse 32

अयं चरति लोके5स्मिन्‌ भूतसाक्षी सदागति: । एष मे मुछ्चतु प्राणान्‌ यदि पापं चराम्यहम्‌,ये सदा गतिशील वायुदेवता इस जगत्‌में निरन्तर विचरते रहते हैं, अतः ये सम्पूर्ण भूतोंके साक्षी हैं। यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें

Bṛhadaśvā berkata: “Dia yang bergerak di seluruh dunia ini—senantiasa dalam gerak dan menjadi saksi semua makhluk—biarlah ia merenggut napasku jika aku telah berbuat dosa.”

Verse 33

यथा चरति तिग्मांशु: परेण भुवनं सदा | स मुञ्चतु मम प्राणान्‌ यदि पापं चराम्यहम्‌,प्रचण्ड किरणोंवाले सूर्यदेव समस्त भुवनोंके ऊपर विचरते हैं, (अतः वे भी सबके शुभाशुभ कर्म देखते रहते हैं।) यदि मैंने पाप किया है तो ये मेरे प्राणोंका हरण कर लें

Bṛhadaśvā berkata: “Sebagaimana Sang Surya yang bersinar tajam senantiasa bergerak melintasi dunia di atas, demikian pula—jika aku benar telah berbuat dosa—biarlah ia merenggut nyawaku.”

Verse 34

चन्द्रमा: सर्वभूतानामन्तश्चरति साक्षिवत्‌ | स मुञ्चतु मम प्राणान्‌ यदि पापं चराम्यहम्‌,चित्तके अभिमानी देवता चन्द्रमा समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें साक्षीरूपसे विचरते हैं। यदि मैंने पाप किया है तो वे मेरे प्राणोंका हरण कर लें

Bṛhadaśvā berkata: “Sang Candra bergerak di dalam hati semua makhluk sebagai saksi. Jika aku telah berbuat dosa, maka biarlah ia mengambil napas hidupku.”

Verse 35

एते देवास्त्रय: कृत्स्नं त्रैलोक्यं धारयन्ति वै । विल्लुवन्तु यथा सत्यमेतद्‌ देवास्त्यजन्तु माम्‌,ये पूर्वोक्त तीन देवता सम्पूर्ण त्रिलोकीको धारण करते हैं। मेरे कथनमें कितनी सचाई है, इसे देवतालोग स्वयं स्पष्ट करें। यदि मैं झूठ बोलती हूँ तो देवता मेरा त्याग कर दें

Ketiga dewa yang telah disebut itu menopang seluruh Triloka. Biarlah para dewa sendiri menyatakan seberapa benarnya ucapanku; dan bila aku berkata dusta, biarlah para dewa meninggalkanku.

Verse 36

एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत । नैषा कृतवती पापं नल सत्य ब्रवीमि ते,दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अन्तरिक्षलोकसे वायु-देवताने कहा--“नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्तीने कभी कोई पाप नहीं किया है

Setelah demikian diucapkan, Dewa Angin bersabda dari angkasa: “Nala, kukatakan kepadamu kebenaran—Damayantī ini tak pernah melakukan dosa.”

Verse 37

राजज्छीलनिधि: स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षित: । साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन्‌ परिवत्सरान्‌,“राजन! दमयन्तीने अपने शीलकी उज्ज्वल निधिको सदा सुरक्षित रखा है। हमलोग तीन वर्षोतक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं

“Wahai Raja, Damayantī senantiasa menjaga harta cemerlang berupa kesucian dan keluhuran budi. Selama tiga tahun kami menjadi penjaga dan saksinya.”

Verse 38

उपायो विहितश्चायं त्वदर्थमतुलो5नया । न होकाह्वा शतं गन्ता त्वामृतेडन्य: पुमानिह,“तुम्हारी प्राप्तिके लिये दमयन्तीने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगतमें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिनमें सौ योजन (रथद्वारा) जा सके

“Demi dirimu, Damayantī menyusun siasat yang tiada banding ini; sebab di dunia ini, selain engkau, tak ada lelaki lain yang mampu menempuh seratus yojana dalam satu hari.”

Verse 39

उपपन्ना त्वया भैमी त्वं च भैम्या महीपते । नात्र शड़्का त्वया कार्या संगच्छ सह भार्यया,“राजन! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो। तुम्हें इसके चरित्रके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये। तुम अपनी पत्नीसे निःशंक होकर मिलो”

“Wahai Raja, Damayantī putri Bhīma sungguh layak bagimu, dan engkau pun layak baginya. Janganlah engkau menyimpan keraguan tentang kelakuannya. Temuilah istrimu dan bersatulah kembali tanpa curiga.”

Verse 40

तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टि: पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्ववी च पवन: शिव:,वायुदेवके ऐसा कहते समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही थी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज रही थीं और मंगलमय पवन चलने लगा

Ketika Vāyu mengucapkan kata-kata itu, hujan bunga pun jatuh dari langit. Genderang surgawi para dewa bergemuruh, dan angin yang membawa pertanda baik mulai berhembus.

Verse 41

तदद्भुतमयं दृष्टवा नलो राजाथ भारत | दमयन्त्यां विशड्कां तामुपाकर्षदरिंदम:,युधिष्ठि!! यह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुसूदन राजा नलने दमयन्तीके विरुद्ध होनेवाली शंकाको त्याग दिया

Wahai Bhārata, melihat pemandangan yang menakjubkan itu, Raja Nala—penakluk musuh—menarik kembali dan membuang kecurigaan yang sempat ia simpan terhadap Damayantī.

Verse 42

ततस्तदू वस्त्रमजरं प्रावणोद्‌ वसुधाधिप: । संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपु:,तदनन्तर उन भूपालने नागराज कर्कोटकका स्मरण करके उसके दिये हुए अजीर्ण वस्त्रको ओढ़ लिया। उससे उन्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो गयी

Kemudian sang penguasa bumi menyelubungkan pakaian yang tak lapuk itu. Begitu ia mengingat raja ular, Karkotaka, seketika ia memperoleh kembali wujudnya yang sejati.

Verse 43

स्वरूपिणं तु भर्तरें दृष्टवा भीमसुता तदा । प्राक्रोशदुच्चैरालिड्र्य पुण्यश्लोकमनिन्दिता,अपने वास्तविक रूपमें प्रकट हुए अपने पतिदेव पुण्यश्लोक महाराज नलको देखकर सती साध्वी दमयन्ती उनके हृदयसे लगकर उच्च स्वरसे रोने लगी

Saat itu Damayantī, putri Bhīma, melihat suaminya tampil dalam wujud sejati. Ia memeluk Nala—raja tanpa cela, termasyhur karena kebajikannya—lalu menangis keras.

Verse 44

भैमीमपि नलो राजा भ्राजमानो यथा पुरा । ससस्‍्वजे स्वसुतौ चापि यथावतृ प्रत्यनन्दत,राजा नलका रूप पहलेकी ही भाँति ही प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने भी दमयन्तीको छातीसे लगा लिया और अपने दोनों बालकोंको भी प्यार-दुलार करके प्रसन्न किया

Raja Nala kembali bersinar seperti sediakala. Ia memeluk Bhīmī (Damayantī), dan juga merangkul kedua anaknya dengan kasih yang patut, lalu bersukacita.

Verse 45

ततः स्वोरसि विन्यस्य वक्‍त्रं तस्य शुभानना | परीता तेन दुःखेन नि:शश्वासायतेक्षणा,तत्पश्चात्‌ सुन्दर मुख और विशाल नेत्रोंवाली दमयन्ती नलके मुखको अपने वक्ष:स्थलपर रखकर दु:खसे व्याकुल हो लंबी साँसे खींचने लगी

Kemudian Damayantī yang berwajah elok menarik wajah Nala ke dadanya sendiri. Dihimpit duka itu, sang wanita bermata lebar mulai menghela napas panjang dan dalam, seakan kesedihannya pecah menjadi hembusan ketika kata-kata tak sanggup keluar.

Verse 46

तथैव मलदिग्धाजुीं परिष्वज्य शुचिस्मिताम्‌ । सुचिरं पुरुषव्याप्रस्तस्थौ शोकपरिप्लुत:,इसी प्रकार पवित्र मुसकान तथा मैलसे भरे हुए अंगोंवाली दमयन्तीको हृदयसे लगाकर पुरुषसिंह नल बहुत देरतक शोकमग्न खड़े रहे

Demikian pula, memeluk Damayantī—yang anggota tubuhnya tersaput kotoran namun senyumnya tetap suci—Nala, sang harimau di antara manusia, berdiri lama sekali, tenggelam dan dilanda duka.

Verse 47

ततः सर्व यथावृत्तं दमयन्त्या नलस्य च । भीमायाकथयतु प्रीत्या वैदर्भ्या जननी नूप,“राजन! तदनन्तर (दमयन्तीके द्वारा मालूम होनेपर) दमयन्तीकी माताने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक राजा भीमसे नल-दमयन्तीका सारा वृत्तान्त यथावत्‌ कह सुनाया"

Kemudian, wahai raja, ibu Damayantī—sang permaisuri dari Vidarbha—dengan gembira menuturkan kepada Raja Bhīma seluruh kisah Damayantī dan Nala, tepat sebagaimana terjadinya.

Verse 48

ततोड<ब्रवीन्महाराज: कृतशौचमहं नलम्‌ | दमयन्त्या सहोपेतं कल्ये द्रष्टा सुखोषितम्‌,तब महाराज भीमने कहा--“आज नलको सुखपूर्वक यहीं रहने दो। कल सबेरे स्नान आदिसे शुद्ध हुए दमयन्तीसहित नलसे मैं मिलूँगा”

Lalu Raja Bhīma berkata: “Biarkan Nala, yang telah menuntaskan mandi penyucian, tinggal di sini hari ini dengan tenteram bersama Damayantī. Besok pagi, setelah aku pun mandi dan menjadi suci menurut tata, aku akan menemui Nala bersama Damayantī.”

Verse 49

ततस्तौ सहितौ रात्रिं कथयन्तौ पुरातनम्‌ | वने विचरितं सर्वमूषतुर्मुदिती नूप,राजन! तत्पश्चात्‌ वे दोनों दम्पति रातभर वनमें रहनेकी पुरानी घटनाओंको एक-दूसरेसे कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे

Kemudian keduanya menghabiskan malam bersama, dengan hati gembira saling menuturkan kenangan lama tentang segala yang mereka alami ketika hidup dan mengembara di hutan, wahai raja.

Verse 50

गृहे भीमस्य नृपते: परस्परसुखैषिणौ | वसेतां हृष्टसंकल्पौ वैदर्भी च नलश्ष ह,एक-दूसरेको सुख देनेकी इच्छा रखनेवाले दमयन्ती और नल राजा भीमके महलमें प्रसन्नचित्त होकर रहे

Di istana Raja Bhīma, Nala dan putri Vidarbha, Damayantī—keduanya menghendaki kebahagiaan satu sama lain—tinggal dengan hati gembira dan tekad yang kembali teguh.

Verse 51

स चतुर्थे ततो वर्षे संगम्य सह भार्यया । सर्वकामै: सुसिद्धार्थो लब्धवान्‌ परमां मुदम्‌,चौथे वर्षमें अपनी प्यारी पत्नीसे मिलकर सम्पूर्ण कामनाओंसे सफलमनोरथ हो नल अत्यन्त आनन्दमें निमग्न हो गये

Kemudian, pada tahun keempat, Nala bersatu kembali dengan istrinya. Setelah segala keinginannya terpenuhi dan tujuannya tercapai, ia meraih sukacita tertinggi.

Verse 52

दमयन्त्यपि भर्तारमासाद्याप्यायिता भृशम्‌ | अर्धसंजातसस्येव तोयं प्राप्प वसुंधरा,जैसे आधी जमी हुई खेतीसे भरी वसुधा वर्षाका जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पतिको पाकर बहुत संतुष्ट हुई

Damayantī pun, setelah mencapai suaminya, terasa amat segar dan terpenuhi—laksana bumi yang memikul tanaman setengah tumbuh, bersukacita ketika menerima air hujan.

Verse 53

सैवं समेत्य व्यपनीय तन्‍्द्रां शान्तज्वरा हर्षविवृद्धसत्त्वा । रराज भैमी समवाप्तकामा शीतांशुना रात्रिरिवोदितेन,जैसे चन्द्रोदयसे रात्रिकी शोभा बढ़ जाती है, उसी प्रकार भीमकुमारी दमयन्ती पतिसे मिलकर आलस्यका त्याग करके निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदयसे पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी

Setelah bertemu demikian, Damayantī menyingkirkan lesu; demam dukanya pun reda. Dengan daya batin yang bertambah oleh sukacita, Bhīmī, setelah hasratnya terpenuhi, bersinar laksana malam yang menjadi indah oleh terbitnya bulan bercahaya sejuk.

Verse 75

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें नलका अपनी पुत्री और पुत्रके देखनेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचद्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ketujuh puluh lima dalam bagian Nalopākhyāna di dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, yang berkaitan dengan pertemuan Raja Nala dan makna memandang kembali putra-putrinya.

Verse 76

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि नलदमयन्तीसमागमे षट्सप्ततितमो<्ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva, dalam subkisah yang dikenal sebagai Kisah Nala, pada bagian pertemuan kembali Nala dan Damayantī, berakhirlah bab ketujuh puluh enam.

Frequently Asked Questions

The chapter negotiates ethical repair after concealment: how to address potential offense incurred during ajñātavāsa through explicit requests for pardon, denial of grievance, and reaffirmation of prior bonds without escalating blame.

Reconciliation is modeled as an active duty: restoring trust through humility, hospitality, and reciprocal restitution (returning knowledge or benefits received), thereby converting a period of disguise and vulnerability into renewed social order.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s significance is conveyed implicitly through exemplary conduct—public honor, mutual forgiveness, and ethical reciprocity—as a normative template within the larger Nala–Damayantī teaching narrative.