
दमयन्त्याः व्याकुलता — स्वयंवरसंनिपातः — देवदूतयाचनम् (Damayantī’s Distress, Proclamation of the Svayaṃvara, and the Gods’ Request)
Upa-parva: Nalopākhyāna (Tale of Nala and Damayantī) — Svayaṃvara Preparations and Divine Interest
Bṛhadaśva narrates Damayantī’s immediate transformation after hearing the haṃsa describe Nala: she becomes restless, emaciated, absorbed in inward contemplation, sleepless by night and day, repeatedly voicing grief. Her companions infer her inner condition from behavioral signs and report it to her father, King Bhīma of Vidarbha. Bhīma reflects on an appropriate remedy and, seeing his daughter at marriageable age, determines that arranging her svayaṃvara is the suitable course. He summons rulers with a formal invitation to attend the selection rite; kings arrive with conspicuous retinues and ceremonial display. In parallel, the ancient sages Nārada and Parvata visit Indra; asked why notable kings are not visible in heaven, Nārada explains that they are traveling to Damayantī’s imminent svayaṃvara, drawn by her exceptional reputation and beauty. Hearing this, the lokapālas resolve to go as well. On the road they see Nala, radiant in appearance, and request that the truth-bound king assist them by acting as their messenger—setting up a tension between duty to guests/divine authorities and personal attachment to Damayantī.
Chapter Arc: हस्तिनापुर के अन्धे सम्राट धृतराष्ट्र लम्बी, गरम साँस छोड़ते हुए संजय को बुलाते हैं—नींद और दिन का चैन दोनों जुए की उस भयावह नीति-भ्रष्टता ने छीन लिए हैं। → धृतराष्ट्र अपने ही निर्णयों की आग में जलते हुए पाण्डवों की बढ़ती शक्ति का स्मरण करते हैं—विशेषतः अश्विनीकुमारों-से तेजस्वी नकुल-सहदेव, और उनके आगे भीम-अर्जुन जैसे सिंहविक्रान्त योद्धा। यह स्मृति उनके भीतर भय को भविष्यवाणी में बदल देती है: यदि ये रणभूमि में खड़े हुए तो कौरव-पक्ष का टिकना कठिन है। → द्रौपदी के अपमान और पाण्डवों के वनवास की परिणति का साक्षात्कार—धृतराष्ट्र के मुख से यह तीखा निष्कर्ष फूट पड़ता है कि दुर्योधन अपने क्रोध और अधर्म के कारण जीवन तक त्याग देगा; और वासुदेव (कृष्ण) के रहते पाण्डव-पक्ष का विनाश असम्भव-सा है। → अध्याय धृतराष्ट्र के विलाप-स्वर में ठहरता है—पश्चात्ताप, भय, और अनिवार्य दण्ड की प्रतीक्षा। संजय श्रोता-रूप में उपस्थित है; भविष्य का युद्ध अभी घटित नहीं, पर उसकी छाया राजसभा पर उतर आती है। → युधिष्ठिर का कृष्ण से प्रतिज्ञा-स्मरण—तेरहवें वर्ष के बाद शत्रुओं का समूल नाश—आगामी निर्णायक संघर्ष की घोषणा बनकर लटकती है।
Verse 1
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपरव्वके अन्तर्गत इन्रलोकाभिगमनपर्वमें पाण्डवोंके भोजनका वर्णनविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५० ॥ #:73:.8 #::3::.7 () है 7 7-3 - सिंह-व्याप्रादि हिंसक जानवरोंको मार देनेसे वे मारनेवालेको पवित्र करनेवाले हैं; इसलिये उनको पवित्र कहा गया है। एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: 80000 (80 ष्टके प्रति श्रीकृष्णादिके द्वारा की हुई दुर्यो वधकी प्रतिज्ञाका वृत्तान्त सुनाना वैशम्पायन उवाच तेषां तच्चरितं श्रुत्वा मनुष्यातीतमद्भुतम् । चिन्ताशोकपरीतात्मा मन्युनाभिपरिप्लुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--पुरुषरत्न जनमेजय! पाण्डवोंका वह अद्भुत एवं अलौकिक चरित्र सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रका मन चिन्ता और शोकमें डूब गया। वे अत्यन्त खिन्न हो उठे और लंबी एवं गरम साँसें खींचकर अपने सारथि संजयको निकट बुलाकर बोले--
Waiśampāyana berkata: Setelah mendengar kisah Pāṇḍawa yang menakjubkan—seakan melampaui batas-batas manusia—hati Raja Dhṛtarāṣṭra, putra Ambikā, diliputi cemas dan duka. Dikuasai amarah dan gelora batin, ia menghela napas panjang yang panas; lalu memanggil saisnya, Sañjaya, mendekat dan berkata.
Verse 2
दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत: । अब्रवीत् संजयं सूतमामन्त्रय पुरुषर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--पुरुषरत्न जनमेजय! पाण्डवोंका वह अद्भुत एवं अलौकिक चरित्र सुनकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रका मन चिन्ता और शोकमें डूब गया। वे अत्यन्त खिन्न हो उठे और लंबी एवं गरम साँसें खींचकर अपने सारथि संजयको निकट बुलाकर बोले--
Dhṛtarāṣṭra, putra Ambikā, menghela napas panjang yang panas; lalu memanggil Sañjaya sang sais—wahai yang utama di antara manusia—dan berkata.
Verse 3
नरात्रौ न दिवा सूत शान्तिं प्राप्रोमि वै क्षणम् । संचिन्त्य दुर्नयं घोरमतीतं द्यूतजं हि तत्
Wahai Sūta, baik malam maupun siang aku tak memperoleh ketenteraman walau sesaat; sebab aku terus memikirkan keputusan yang mengerikan dan keliru itu—yang lahir dari permainan dadu—yang telah terjadi.
Verse 4
'सूत! मैं बीते हुए द्यूतजनित घोर अन्यायका स्मरण करके दिन तथा रातमें क्षणभर भी शान्ति नहीं पाता ।। तेषामसहावीर्याणां शौर्य धैर्य धृतिं पराम् । अन्योन्यमनुरागं च भ्रातृणामतिमानुषम्,“मैं देखता हूँ, पाण्डवोंके पराक्रम असह्ा हैं। उनमें शौर्य, धैर्य तथा उत्तम धारणाशक्ति है। उन सब भाइयोंमें परस्पर अलौकिक प्रेम है
“Wahai Sūta! Mengingat ketidakadilan mengerikan yang timbul dari permainan dadu itu, siang dan malam aku tak memperoleh ketenteraman walau sesaat. Aku melihat keperkasaan para Pāṇḍava tak tertahankan: pada mereka ada keberanian tertinggi, keteguhan hati, dan daya tahan tekad; dan di antara para saudara itu terjalin kasih sayang timbal balik yang melampaui kebiasaan manusia.”
Verse 5
देवपुत्रौ महाभागौ देवराजसमझ्ुती | नकुल: सहदेवश्न पाण्डवौ युद्धदुर्मदौ,'देवपुत्र महाभाग नकुल-सहदेव देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हैं। वे दोनों ही पाण्डव युद्धमें प्रचण्ड हैं
Vaiśampāyana berkata: “Dua putra para dewa, yang amat beruntung dan bercahaya laksana Indra, raja para dewa—Nakula dan Sahadeva—kedua saudara Pāṇḍava itu ganas dan tak terkendali dalam amuk pertempuran.”
Verse 6
दृढायुधौ दूरपातौ युद्धे च कृतनिश्चयौ । शीघ्रहस्ती दृढकोधौ नित्ययुक्तो तरस्विनौ,“उनके आयुध दृढ़ हैं। वे दूरतक निशाना मारते हैं। युद्धके लिये उनका भी दृढ़ निश्चय है। वे दोनों ही बड़ी शीघ्रतासे हस्तसंचालन करते हैं। उनका क्रोध भी अत्यन्त दृढ़ है। वे सदा उद्योगशील और बड़े वेगवान् हैं
Vaiśampāyana berkata: “Keduanya teguh dalam senjata dan mampu menghantam dari jauh; tekad mereka untuk berperang telah bulat. Tangan mereka bergerak sangat cepat, amarah mereka tak melunak, dan mereka senantiasa giat berusaha—para kesatria yang melaju dengan daya yang dahsyat.”
Verse 7
भीमार्जुनौ पुरोधाय यदा तौ रणमूर्थनि । स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ,“जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहानेपर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है। संजय! देवपुत्र महारथी नकुल-सहदेव युद्धमें अनुपम हैं। कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता
Vaiśampāyana berkata: “Ketika kedua itu—dengan Bhīma dan Arjuna di barisan depan—berdiri di pucuk pertempuran, melangkah laksana singa dan setangguh si kembar Aśvin, maka aku tak melihat seorang pun pahlawan dari pasukanku akan tersisa. Wahai Sañjaya, Nakula dan Sahadeva, putra para dewa dan para mahārathi, tiada bandingnya dalam perang; tak ada kesatria kereta yang sanggup bertahan melawan mereka.”
Verse 8
न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय । तो ह्ाप्रतिरथौ युद्धे देवपुत्रो महारथी,“जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहानेपर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है। संजय! देवपुत्र महारथी नकुल-सहदेव युद्धमें अनुपम हैं। कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Sañjaya, aku tak melihat sisa apa pun dari pasukanku di sini. Sebab kedua putra para dewa itu—para mahārathi—tiada tandingnya dalam pertempuran; tak ada kesatria kereta yang sepadan dengan mereka.”
Verse 9
द्रौपद्यास्तं परिकलेशं न क्षंस्येते त्वमर्षिणौ । वृष्णयो5थ महेष्वासा: पञ्चाला वा महौजस:,“अमर्षमें भरे हुए माद्रीकुमार द्रौपदीको दिये गये उस कष्टको कभी क्षमा नहीं करेंगे। महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी, महातेजस्वी पांचाल योद्धा और युद्धमें सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुन्तीपुत्र निश्चय ही मेरे पुत्रोंकी सेनाको भस्म कर डालेंगे
Waiśampāyana berkata— Penderitaan yang ditimpakan kepada Draupadī itu, para kesatria yang tak tahan penghinaan takkan pernah memaafkannya. Kaum Vṛṣṇi, para pemanah agung, dan para Pāñcāla yang perkasa takkan membiarkannya berlalu. Di bawah lindungan Vāsudeva Kṛṣṇa, putra-putra Kuntī pasti akan membakar habis bala tentaraku hingga menjadi abu.
Verse 10
युधि सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिता: । प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्था: पुत्राणां मम वाहिनीम्,“अमर्षमें भरे हुए माद्रीकुमार द्रौपदीको दिये गये उस कष्टको कभी क्षमा नहीं करेंगे। महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी, महातेजस्वी पांचाल योद्धा और युद्धमें सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुन्तीपुत्र निश्चय ही मेरे पुत्रोंकी सेनाको भस्म कर डालेंगे
Dilindungi dalam perang oleh Vāsudeva yang berketetapan pada kebenaran, para Pārtha akan, di medan laga, pasti membakar habis bala tentara putra-putraku.
Verse 11
रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन । न शक््य: सहितुं वेग: सर्वैस्तैरपि संयुगे,'सूतनन्दन! बलराम और श्रीकृष्णसे प्रेरित वृष्णि-वंशी योद्धाओंके वेगको युद्धमें समस्त कौरव मिलकर भी नहीं सह सकते
Wahai putra kusir, gelombang serbuan para kesatria Vṛṣṇi—yang digerakkan dan dipimpin oleh Balarāma dan Kṛṣṇa—takkan sanggup ditahan di medan perang, sekalipun semua lawan bersatu.
Verse 12
तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रम: । शैक्यया वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति,“उनके बीचमें जब भयानक पराक्रमी महान् धनुर्थर भीमसेन बड़े-बड़े वीरोंका संहार करनेवाली आकाशगमें ऊपर उठी हुई गदा लिये विचरेंगे तब उन भीमकी गदाके वेगको तथा वज्रगर्जके समान गाण्डीव धनुषकी टंकारको भी कोई नरेश नहीं सह सकता
Di tengah-tengah mereka akan bergerak Bhīma—pemanah agung, dahsyat dalam keberanian—berkeliling dengan gada yang mematikan para pahlawan.
Verse 13
तथा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशने: । गदावेगं च भीमस्य नाल॑ सोढुं नराधिपा:,“उनके बीचमें जब भयानक पराक्रमी महान् धनुर्थर भीमसेन बड़े-बड़े वीरोंका संहार करनेवाली आकाशगमें ऊपर उठी हुई गदा लिये विचरेंगे तब उन भीमकी गदाके वेगको तथा वज्रगर्जके समान गाण्डीव धनुषकी टंकारको भी कोई नरेश नहीं सह सकता
Demikian pula, tak ada raja yang sanggup menahan gelegar Gāṇḍīva yang laksana dentuman petir Indra, maupun daya hantam gada Bhīma yang menghancurkan.
Verse 14
ततो<हं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुग: । स्मरणीया: स्मरिष्यामि मया या न कृता: पुरा,“उस समय मैं दुर्योधनके वशमें होनेके कारण अपने हितैषी सुहृदोंकी उन याद रखनेयोग्य बातोंको याद करूँगा, जिनका पालन मैंने पहले नहीं किया”
Saat itu aku—karena berada di bawah pengaruh Duryodhana—kini akan mengingat kembali kata-kata para sahabat yang tulus menghendaki kebaikanku, kata-kata yang patut dikenang, yang dahulu tidak kuikuti.
Verse 15
संजय उवाच व्यतिक्रमो<यं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षित: । समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारित:,संजयने कहा--राजन्! आपके द्वारा यह बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, जिसकी आपने जान-बूझकर उपेक्षा की है (उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की है); वह यह है कि आपने समर्थ होते हुए भी मोहवश अपने पुत्रको कभी रोका नहीं
Sanjaya berkata: Wahai Raja, engkau telah mengabaikan suatu pelanggaran yang amat besar. Walau engkau mampu mengekangnya, karena delusi engkau tak pernah menahan putramu.
Verse 16
श्र॒त्वा हि निर्जितान् द्यूते पाण्डवान् मधुसूदन: । त्वरित: काम्यके पार्थान्ू समभावयदच्युत:,भगवान् मधुसूदनने ज्यों ही सुना कि पाण्डव द्यूतमें पराजित हो गये, त्यों ही वे काम्यकवनमें पहुँचकर कुन्तीपुत्रोंसे मिले और उन्हें आश्वासन दिया
Begitu Bhagavan Madhusudana mendengar bahwa para Pandawa dikalahkan dalam permainan dadu, Acyuta segera bergegas ke hutan Kamyaka, menemui putra-putra Pritha, dan meneguhkan hati mereka dengan penghiburan.
Verse 17
द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमा: । विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्व महारथा:,इसी प्रकार ट्रुपदके धृष्टद्युम्न आदि पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी कैकय--इन सबने पाण्डवोंसे भेंट की
Demikian pula putra-putra Drupada, dipimpin oleh Dhrishtadyumna, bersama Raja Virata, Dhrishtaketu, dan para maharathi dari negeri Kekaya, semuanya datang menemui para Pandawa.
Verse 18
तैश्व॒ यत् कथितं राजन् दृष्टवा पार्थान् पराजितान् | चारेण विदितं सर्व तन्मया5<5वेदितं च ते,राजन्! पाण्डवोंको जूएमें पराजित देखकर उन सबने जो बातें कहीं, उन्हें गुप्तचरोंद्वारा जानकर मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया था
Sanjaya berkata: “Wahai Raja, apa pun yang mereka ucapkan ketika melihat putra-putra Pritha terkalahkan, semuanya telah diketahui melalui para mata-mata; dan seluruh perkara itu telah kulaporkan kepadamu dengan semestinya, wahai Raja.”
Verse 19
समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदन: । सारथ्ये फाल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान् हरि:,पाण्डवोंने मिलकर मधुसूदन श्रीकृष्णको युद्धमें अर्जुनका सारथि होनेके लिये वरण किया और श्रीहरिने “तथास्तु' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया
Di sana, setelah berkumpul, para Pāṇḍava memilih Madhusūdana (Śrī Kṛṣṇa) sebagai sais kereta Phālguna (Arjuna) di medan perang; dan Hari, seraya berkata “Tathāstu—demikianlah,” menerima permohonan mereka.
Verse 20
अमर्षितो हि कृष्णोडपि दृष्टवा पार्थासतथा गतान् | कृष्णाजिनोत्तरासंगानब्रवीच्च युधिष्ठिरम्,भगवान् श्रीकृष्ण भी कुन्तीपुत्रोंकी उस अवस्थामें काला मृगचर्म ओढ़कर आये हुए देख उस समय अमर्षमें भर गये और युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले---
Melihat putra-putra Kuntī dalam keadaan demikian—berselimut kulit kijang hitam sebagai pakaian atas—bahkan Bhagavān Śrī Kṛṣṇa pun tersulut murka, lalu berkata kepada Yudhiṣṭhira sebagai berikut.
Verse 21
या सा समृद्धि: पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह । राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यै: सुदुर्लभा,इन्द्रप्रस्थमें कुन्तीकुमारोंक पास जो समृद्धि थी तथा राजसूययज्ञके समय जिसे मैंने अपनी आँखों देखा था, वह अन्य नरेशोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ थी
Kemakmuran yang dimiliki para Pārtha di Indraprastha—bahkan kemegahan yang kusaksikan sendiri pada upacara Rājasūya mereka—sangat sukar dicapai oleh raja-raja lain.
Verse 22
यत्र सर्वान् महीपालाउछस्त्रतेजो भयार्दितान् । सवज्ाज्रान् सपौण्ड्रोड़़ान् सचोलद्राविडान्ध्रकान्,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
Pada saat itu, semua raja di bumi—yang gentar oleh kilau dahsyat senjata para Pāṇḍava—hadir di sana: para penguasa Aṅga dan Vaṅga, Pauṇḍra dan Uḍa, serta negeri Coḷa, Drāviḍa, dan Āndhra.
Verse 23
सागरानूपकांश्वैव ये च प्रान्ताभिवासिन: । सिंहलान् बर्बरान् म्लेच्छान् ये च लड़कानिवासिन:,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
Juga mereka yang tinggal di pesisir samudra dan dataran rendah berair, serta para penghuni wilayah perbatasan—orang Sinhala, kaum Barbar, para Mleccha, dan mereka yang bermukim di Laṅkā—semuanya hadir di sana.
Verse 24
पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतश: सागरान्तिकान् । पह्ववान् दरदान् सर्वान् किरातान् यवनाछ्छकान्,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
Sañjaya berkata: “Ada pula ratusan negeri di barat yang terletak di sepanjang pesisir samudra—bersama kaum Pahlava, Darada, seluruh Kirāta, serta Yavana dan Śaka.”
Verse 25
हारह्णांश्व चीनांश्व तुषारान् सैन्धवांस्तथा । जागुडान् रामठान् मुण्डान् स्त्रीराज्यमथ तड्णान्,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
Sañjaya berkata: “Juga kaum Hārahūṇa dan Cīna, kaum Tuṣāra, demikian pula Saindhava; Jāguḍa, Rāmaṭha, Muṇḍa, negeri kaum perempuan, dan Taṅgaṇa.”
Verse 26
केकयान् मालवांश्वैव तथा काश्मीरकानपि । अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान्,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
Sañjaya berkata: “Aku pun melihat para Kekaya, Mālava, dan Kāśmīra—dipanggil ke kurban sucimu—berdiri sebagai pelayan yang membagikan persembahan dan hidangan.”
Verse 27
सा ते समृद्धिर्यैरात्ता चपला प्रतिसारिणी । आदाय जीवितं तेषामाहरिष्यामि तामहम्,“सब ओर फैली हुई आपकी उस चंचल समृद्धिको जिन लोगोंने छलसे छीन लिया है, उनके प्राण लेकर भी मैं उसे पुनः: वापस लाऊँगा
Sañjaya berkata: “Kemakmuranmu yang labil dan selalu bergeser itu—yang telah dirampas oleh beberapa orang dengan tipu daya—akan kubawa kembali kepadamu, sekalipun aku harus merenggut nyawa mereka.”
Verse 28
रामेण सह कौरव्य भीमार्जुनयमैस्तथा । अक्रूरगदसाम्बैश्व प्रद्युम्नेनाहुकेन च
Sañjaya berkata: “Bersama Rāma, wahai keturunan Kuru, hadir pula Bhīma, Arjuna, dan Yama; demikian juga Akrūra, Gada, Sāmba, Pradyumna, dan Ahuka.”
Verse 29
धृष्टय्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च | दुर्योधनं रणे हत्वा सद्य: कर्ण च भारत
Sañjaya berkata: “Wahai Bhārata, setelah Duryodhana gugur di medan laga oleh sang pahlawan Dhṛṣṭadyumna dan putra Śiśupāla, Karṇa pun akan segera terbunuh.”
Verse 30
दुःशासनं सौबलेयं यश्चान्य: प्रतियोत्स्यते । ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभि: सहितो वसन्
Sañjaya berkata: “Biarlah Duḥśāsana, Śakuni putra Subala, dan siapa pun yang hendak melawan maju bertempur. Adapun engkau—tinggallah di Hāstinapura bersama saudara-saudaramu.”
Verse 31
धार्तरष्ट्रीं श्रियं प्राप्प प्रशाधि पृथिवीमिमाम् | “कुरुनन्दन! भरतकुलतिलक! बलराम, भीमसेन, अर्जुन, नकुल-सहदेव, अक्रूर, गद, साम्ब, प्रद्युम्न, आहुक, वीर धृष्टद्युम्न और शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुके साथ आक्रमण करके युद्धमें दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन एवं शकुनिको तथा और जो कोई योद्धा सामना करने आयेगा, उसे भी शीघ्र ही मारकर मैं आपकी सम्पत्ति लौटा लाऊँगा। तदनन्तर आप भाइयोंसहित हस्तिनापुरमें निवास करते हुए धृतराष्ट्रकी राज्यलक्ष्मीको पाकर इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये” || २८--३० ह || अथैनमब्रवीद् राजा तस्मिन् वीरसमागमे
“Setelah memperoleh kembali kemakmuran kerajaan milik para Dhārtarāṣṭra, perintahlah bumi ini. Wahai kebanggaan Kuru, permata garis Bharata! Aku akan berangkat berperang bersama Balarāma, Bhīmasena, Arjuna, Nakula dan Sahadeva, juga Akrūra, Gada, Sāmba, Pradyumna, Āhuka, sang kesatria Dhṛṣṭadyumna, serta Dhṛṣṭaketu putra Śiśupāla. Di medan laga akan segera kutewaskan Duryodhana, Karṇa, Duḥśāsana, Śakuni, dan siapa pun yang maju menentang; lalu akan kukembalikan milikmu kepadamu. Setelah itu, engkau tinggal di Hāstinapura bersama saudara-saudaramu, memperoleh kemakmuran kerajaan Dhṛtarāṣṭra, dan memerintah seluruh bumi.” Sesudah itu, di pertemuan para pahlawan itu, sang raja berbicara kepadanya.
Verse 32
युधिछिर उवाच प्रतिगृह्नामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन,युधिष्ठिर बोले--जनार्दन! मैं आपकी सत्य वाणीको शिरोधार्य करता हूँ
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Janārdana, aku menerima dan menjunjung ucapanmu yang benar ini.”
Verse 33
अमित्रान् मे महाबाहो सानुबन्धान् हनिष्यसि । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्व सत्यं मां कुरु केशव
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, engkau akan membinasakan musuh-musuhku beserta sekutu dan para pendukungnya. Wahai Keśava, setelah tiga belas tahun berlalu, genapkanlah janji ini bagiku.”
Verse 34
तद् धर्मराजवचन प्रतिश्रुत्य सभासद:,धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्म आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया
Mendengar sabda Dharmarāja Yudhiṣṭhira, para hadirin—dipimpin Dhṛṣṭadyumna—dengan ujaran yang manis dan tepat pada waktunya segera menenangkan Śrī Kṛṣṇa yang tengah berkobar oleh amarah yang benar.
Verse 35
धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते शभयामासुरञ्जसा । केशवं मधुरैर्वाक्यै: कालयुक्तैरमर्षितम्,धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्म आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया
Dengan Dhṛṣṭadyumna di barisan depan, mereka dengan kata-kata manis yang tepat pada waktunya segera menenteramkan Keśava yang menyala oleh indignasi.
Verse 36
पाज्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः । दुर्योधनस्तव क्रोधाद् देवि त्यक्ष्यति जीवितम्,तत्पश्चात् उन्होंने क्लेशरहित हुई द्रौपदीसे भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए कहा--'देवि! दुर्योधन तुम्हारे क्रोधसे निश्चय ही प्राण त्याग देगा
Kemudian, di hadapan Vāsudeva yang mendengarkan, mereka berkata kepada Pāñcālī Draupadī yang tenang tanpa duka: “Wahai Dewi, oleh daya murkamu Duryodhana pasti akan melepaskan nyawanya.”
Verse 37
प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि । ये सम ते$क्षजितां कृष्णे दृष्टवा त्वां प्राहसंस्तदा । मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजा:,“वरवर्णिनि! हम यह सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं, तुम शोक न करो। कृष्णे! उस समय तुम्हें जूएमें जीती हुई देखकर जिन लोगोंने हँसी उड़ायी है, उनके मांस भेड़िये और गीध खायँगे और नोच-नोचकर ले जायूँगे
“Wahai wanita berparas elok, kami mengikrarkan sumpah yang benar—jangan bersedih. Wahai Kṛṣṇā (Draupadī), mereka yang dahulu menertawakanmu ketika melihatmu dimenangkan dalam permainan dadu—daging mereka akan dilahap serigala dan burung pemakan bangkai, dikoyak-koyak dan diseret pergi.”
Verse 38
पास्यन्ति रुर्धिर तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा । उत्तमाड़ानि कर्षन्तो यै: कृष्टासि सभातले,“इसी प्रकार जिन्होंने तुम्हें सभाभवनमें घसीटा है, उनके कटे हुए सिरोंको घसीटते हुए गीध और गीदड़ उनके रक्त पीयेंगे
“Burung nasar dan serigala hutan akan meneguk darah mereka, sambil menyeret kepala-kepala yang terpenggal—merekalah yang menyeretmu di lantai balairung kerajaan.”
Verse 39
तेषां द्रक्ष्यसि पाउ्चालि गात्राणि पृथिवीतले । क्रव्यादे: कृष्पमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत्,'पांचालराजकुमारि! तुम देखोगी कि उन दुष्टोंके शरीर इस पृथ्वीपर मांसाहारी गीदड़- गीध आदि पशु-पक्षियोंद्वारा बार-बार घसीटे और खाये जा रहे हैं
Wahai Pāñcālī, engkau akan melihat tubuh-tubuh mereka tergeletak di atas bumi—diseret ke sana kemari dan berulang kali dilahap oleh pemakan daging seperti serigala hutan dan burung nasar.
Verse 40
परिक्लिष्टासि यैस्तत्र यैश्वासि समुपेक्षिता । तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमि: पास्यति शोणितम्,“जिन लोगोंने तुम्हें सभामें क्लेश पहुँचाया और जिन्होंने चुपचाप रहकर उस अन्यायकी उपेक्षा की है, उन सबके कटे हुए मस्तकोंका रक्त यह पृथ्वी पीयेगी'
Mereka yang di balairung istana membuatmu menderita, dan mereka yang dengan diam saja mengabaikan ketidakadilan itu—darah dari kepala-kepala mereka yang terpenggal akan diminum oleh bumi ini.
Verse 41
एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभ । सर्वे तेजस्विन: शूरा: सर्वे चाहतलक्षणा:,भरतकुलतिलक! इस प्रकार उन वीरोंने अनेक प्रकारकी बातें कही थीं। वे सब-के-सब तेजस्वी और शूरवीर हैं। उनके शुभ लक्षण अमिट हैं
Demikianlah, wahai yang termulia di antara keturunan Bharata, mereka mengucapkan berbagai macam kata. Semuanya bercahaya dan gagah berani, dan semuanya memiliki tanda-tanda mujur yang tak berkurang.
Verse 42
ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्व त्रयोदशात् । पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेव॑ महारथा:,धर्मराजने तेरहवें वर्षके बाद युद्ध करनेके लिये उनका वरण किया है। वे महारथी वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर आक्रमण करेंगे
Para mahāratha itu, yang telah dipilih oleh Raja Dharma (Yudhiṣṭhira), setelah genap tiga belas tahun akan maju ke medan perang—dengan menempatkan Vāsudeva Śrī Kṛṣṇa di barisan terdepan.
Verse 43
रामश्न कृष्णश्व धनंजयश्न प्रद्युम्नसाम्बी युयुधानभीमौ । माद्रीसुतीो केकयराजपुत्रा: पाञ्चालपुत्रा: सह मत्स्यराज्ञा,बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट--ये सब-के-सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं। ये महामना जब अपने सगे-सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा?
Balarāma dan Śrī Kṛṣṇa, serta Arjuna (Dhanañjaya); Pradyumna dan Sāmba; Sātyaki (Yuyudhāna) dan Bhīmasena; kedua putra Mādrī, Nakula dan Sahadeva; para pangeran Kekaya; putra-putra Pāñcāla bersama raja Matsya, Virāṭa—mereka semua adalah kesatria termasyhur di dunia, tak terkalahkan. Bila para jiwa agung ini, bersama sanak keluarga dan bala tentaranya, menerjang ke medan laga dengan amarah menyala, laksana singa yang mengamuk—siapakah manusia yang masih ingin hidup sanggup berdiri menghadapi mereka?
Verse 44
एतान् सर्वान् लोकवीरानजेयान् महात्मन: सानुबन्धान् ससैन्यान् । को जीवितार्थी समरे< भ्युदीयात् क्रुद्धान सिंहानू केसरिणो यथैव,बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट--ये सब-के-सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं। ये महामना जब अपने सगे-सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा?
Yudhiṣṭhira berkata: “Mereka semua adalah pahlawan termasyhur di dunia, tak terkalahkan—berjiwa agung, maju bersama sanak keluarga dan bala tentaranya. Ketika mereka menerjang ke medan perang, siapa yang masih ingin hidup akan bangkit menghadapi mereka—seperti menantang singa-singa berjanggut surai yang murka?”
Verse 45
ध्तराष्ट्र उवाच यन्माब्रवीद् विदुरो द्यूतकाले त्वं पाण्डवाग्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र । ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो महाभयो भविता शोणितौघ:,धृतराष्ट्र बोले--संजय! जब जूआ खेला जा रहा था, उस समय विदुरने मुझसे जो यह बात कही थी कि नरेन्द्र! यदि आप पाण्डवोंको जूएमें जीतेंगे तो निश्चय ही यह कौरवोंके लिये खूनकी धारासे भरा हुआ अत्यन्त भयंकर विनाशकाल होगा
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Sañjaya, apa yang Vidura katakan kepadaku pada saat permainan dadu—‘Wahai raja, bila engkau memenangkan para Pāṇḍava lewat perjudian, ini pasti menjadi saat kebinasaan bagi kaum Kuru: kengerian besar, banjir darah’—kini tampak menjadi kenyataan.”
Verse 46
मन्ये तथा तद् भवितेति सूत यथा क्षत्ता प्राह वच: पुरा माम् | असंशयं भविता युद्धमेतद् गते काले पाण्डवानां यथोक्तम्,सूत! विदुरने पहले जो बात कही थी, वह अवश्य ही उसी प्रकार होगी, ऐसा मेरा विश्वास है। वनवासका समय व्यतीत होनेपर पाण्डवोंके कथनानुसार यह घोर युद्ध होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Wahai Sūta, aku percaya hal itu akan terjadi persis seperti yang dahulu dikatakan Vidura kepadaku. Setelah waktu yang ditetapkan berlalu, perang dahsyat ini pasti terjadi, sebagaimana dinyatakan para Pāṇḍava—tanpa keraguan.”
Verse 51
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे एकपज्चाशत्तमो5ध्याय:
Demikian berakhir bab kelima puluh satu dalam Vana Parva dari Śrī Mahābhārata, pada bagian Indralokābhigamana Parva, dalam episode “Ratapan Dhṛtarāṣṭra.”
Verse 313
शण्वसत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च । तब राजा युधिष्ठिरने उस वीरसमुदायमें इन धृष्टद्युम्न आदि शूरवीरोंके सुनते हुए श्रीकृष्ससे कहा
Sañjaya berkata: Ketika para pahlawan itu—dipimpin Dhṛṣṭadyumna—sedang mendengarkan, Raja Yudhiṣṭhira lalu menyampaikan kata-katanya kepada Śrī Kṛṣṇa.
Verse 333
प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मया हायम् । महाबाहो! केशव! तेरहवें वर्षके बाद आप मेरे सम्पूर्ण शत्रुओंको उनके बन्धु- बान्धवोंसहित नष्ट कीजियेगा। ऐसा करके आप मेरे सत्य (वनवासके लिये की गयी प्रतिज्ञा)-की रक्षा कीजिये। मैंने राजाओंकी मण्डलीमें वनवासकी प्रतिज्ञा की है
Yudhiṣṭhira berkata: “Di tengah sidang para raja aku sungguh telah bersumpah untuk tinggal di hutan. Wahai Keśava yang berlengan perkasa, setelah tahun ketiga belas genap, binasakanlah semua musuhku beserta sanak keluarga dan sekutu mereka. Dengan demikian, jagalah kebenaranku—ikrar pengasingan ini—sebab di majelis kerajaanlah aku mengucapkan sumpah tinggal di rimba.”
Nala is asked to serve as a messenger for the lokapālas; the dilemma arises from balancing satyavrata and obligations to powerful guests/divine authorities against his personal inclination and emerging commitment toward Damayantī.
Inner states are legible through disciplined observation: the text treats emotion as ethically consequential, showing how desire can destabilize bodily and social functioning, requiring governance through legitimate institutions rather than secrecy or coercion.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the chapter functions as narrative causation, establishing the conditions and obligations that will later be evaluated within broader dharma reasoning.