दमयन्त्याः व्याकुलता — स्वयंवरसंनिपातः — देवदूतयाचनम्
Damayantī’s Distress, Proclamation of the Svayaṃvara, and the Gods’ Request
हारह्णांश्व चीनांश्व तुषारान् सैन्धवांस्तथा । जागुडान् रामठान् मुण्डान् स्त्रीराज्यमथ तड्णान्,“उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे। अंग, वंग, पुण्ड्र, उड़, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे। सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था
hārahūṇāṁś ca cīnānāṁś ca tuṣārān saindhavāṁs tathā | jāguḍān rāmaṭhān muṇḍān strīrājyam atha taṅgaṇān ||
Sañjaya berkata: “Juga kaum Hārahūṇa dan Cīna, kaum Tuṣāra, demikian pula Saindhava; Jāguḍa, Rāmaṭha, Muṇḍa, negeri kaum perempuan, dan Taṅgaṇa.”
संजय उवाच