Adhyaya 301
Vana ParvaAdhyaya 30146 Verses

Adhyaya 301

Chapter Arc: अंधे और निर्वासित राजा द्युमत्सेन अपनी पत्नी शैब्या के साथ आश्रम-आश्रम भटकते हैं—पुत्र सत्यवान का कोई समाचार नहीं, और रात घिर आई है। → दम्पती नदी, वन, सरोवर और ऋषि-आश्रमों में रात भर खोज करते हैं। उधर आश्रम-समाज में एक अद्भुत घटना की आहट है—सावित्री सत्यवान को साथ लेकर लौट रही है, मानो मृत्यु से छीन लाई हो। → गौतम ऋषि संकेत करते हैं कि द्युमत्सेन की ‘अकस्मात्’ दृष्टि-प्राप्ति का कारण साधारण नहीं—यह सावित्री के सत्य, तप और पतिव्रत-बल का प्रत्यक्ष फल है; आश्रमवासी चकित होकर राजा से प्रश्न करते हैं। → सावित्री सत्यवान सहित आश्रम में प्रवेश करती है; ऋषि-समुदाय उस ‘वरस्त्री’ की प्रशंसा और पूजा कर राजा को पुत्र-प्राप्ति तथा दृष्टि-लाभ के शुभ संकेतों सहित विदा करता है। द्युमत्सेन का संकट-काल समाप्ति की ओर मुड़ता है और परिवार का पुनर्मिलन स्थिर होता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं) हू... “+(>9) #2९-3 #25-२ अष्टनवर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवानके लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्‌का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना मार्कण्डेय उवाच एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महाबल: । लब्धचक्षु: प्रसन्नायां दृष्ट्यां सर्व ददर्श ह,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इसी समय महाबली महाराजा द्युमत्सेनको उनकी खोयी हुई आँखें मिल गयीं। दृष्टि स्वच्छ हो जानेके कारण वे सब कुछ देखने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Pada saat itu juga, Raja Dyumatsena yang perkasa mendapatkan kembali penglihatannya yang hilang. Dengan pandangan yang kini jernih dan tenteram, ia kembali dapat melihat segala sesuatu.”

Verse 2

स सर्वनाश्रमान्‌ गत्वा शैब्यया सह भार्यया । पुत्रहेतो: परामार्ति जगाम भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] वे अपनी पत्नी शैब्याके साथ सभी आश्रमोंमें जाकर पुत्रका पता लगाने लगे। उस समय उन्हें सत्यवानके लिये बड़ी वेदना हो रही थी

Wahai banteng di antara Bharata! Ia pergi ke semua pertapaan bersama istrinya, Śaibyā, demi mencari putranya; dan dalam pencarian itu ia jatuh ke dalam duka yang dalam, tersiksa oleh kesedihan karena Satyavān.

Verse 3

तावाश्रमान्‌ नदीश्वैव वनानि च सरांसि च | तस्यां निशि विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतु:,वे दोनों पति-पत्नी उस रातमें पुत्रकी खोज करते हुए विभिन्न आश्रमों, नदीके तटों तथा वनों और सरोवरोंमें भ्रमण करने लगे

Malam itu, pasangan suami-istri itu, mencari putra mereka, menjelajahi pertapaan, tepi sungai, hutan, dan danau-danau.

Verse 4

श्रुत्वा शब्दं तु यं कज्चिदुन्मुखा सुतशड्कया । सावित्रीसहितो<भ्येति सत्यवानित्यभाषताम्‌,जो कोई भी शब्द कानमें पड़ता, उसीको सुनकर वे अपने पुत्रके आनेकी आशंकासे उत्सुक हो उठते और परस्पर कहने लगते कि “सावित्रीके साथ सत्यवान्‌ आ रहा है!

Mendengar bunyi sekecil apa pun, mereka segera menengadah—dengan harap cemas bahwa putra mereka telah datang—dan berkata satu sama lain, “Satyavān datang bersama Sāvitrī!”

Verse 5

भिन्नैश्न परुषै: पादैः सव्रणै: शोणितोक्षितै: । कुशकण्टकविद्धाड्गावुन्मत्ताविव धावत:,उनके पैरोंमें बिवाई फट गयी थी, वे कठोर हो गये थे तथा घाव हो जानेके कारण रक्तसे भींगे रहते थे, तो भी उन्हीं पैरोंसे वे दोनों दम्पति इधर-उधर पागलोंकी भाँति दौड़ रहे थे। उस समय उनके अंगोंमें कुश और काँटे बिंध गये थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Kaki mereka pecah-pecah dan mengeras, terluka serta basah oleh darah; namun keduanya tetap berlari ke sana kemari seperti orang gila. Saat melarikan diri, tubuh mereka tertusuk rumput kuśa dan duri-duri.”

Verse 6

ततोभिसूृत्य तैरविंप्रै: सर्वराश्रमवासिभि: । परिवार्य समाश्वास्य तावानीतौ स्वमाश्रमम्‌,तब उन आश्रमोंमें रहनेवाले समस्त ब्राह्मणोंने उनके पास जा उन्हें सब ओरसे घेरकर आश्वासन दिया तथा उन दोनोंको उनके आश्रमपर पहुँचाया

Kemudian para brāhmaṇa—penghuni semua pertapaan—mendatangi mereka, mengepung dari segala arah, dan menenangkan dengan kata-kata penghiburan. Setelah menguatkan hati mereka, kedua orang itu diantar kembali ke āśrama mereka sendiri.

Verse 7

तत्र भार्यासहाय: स वृतो वृद्धैस्तपोधनै: । आश्वासितोडपि चित्रार्थ: पूर्वराज्ञां कथाश्रयैः,तपस्याके धनी वृद्ध ब्राह्मणोंद्वारा घिरे हुए पत्नीसहित राजा ट्ुमत्सेनको प्राचीन राजाओंकी विचित्र अर्थोंसे भरी हुई कथाएँ सुनाकर पूरा आश्वासन दिया गया, तो भी वे दोनों वृद्ध बारंबार सान्त्वना मिलते रहनेपर भी अपने पुत्रको देखनेकी इच्छासे उसके बचपनकी बातें सोचते हुए बहुत दुःखी हो गये

Di sana Raja Dyumatsena, bersama istrinya, dikelilingi para pertapa tua yang kaya tapa. Walau berulang kali dihibur—dengan kisah para raja terdahulu yang sarat makna dan peristiwa menakjubkan—pasangan lanjut usia itu tetap tenggelam dalam duka, karena rindu melihat putra mereka dan terus mengingat masa kecilnya.

Verse 8

ततस्तौ पुनराश्चवस्तौ वृद्धौ पुत्रदिदृक्षया । बाल्यवृत्तानि पुत्रस्य स्मरन्तौ भृशदु:ःखितौ,तपस्याके धनी वृद्ध ब्राह्मणोंद्वारा घिरे हुए पत्नीसहित राजा ट्ुमत्सेनको प्राचीन राजाओंकी विचित्र अर्थोंसे भरी हुई कथाएँ सुनाकर पूरा आश्वासन दिया गया, तो भी वे दोनों वृद्ध बारंबार सान्त्वना मिलते रहनेपर भी अपने पुत्रको देखनेकी इच्छासे उसके बचपनकी बातें सोचते हुए बहुत दुःखी हो गये

Kemudian kedua orang tua itu, meski telah berulang kali ditenteramkan, kembali dikuasai kerinduan untuk melihat putra mereka. Sambil mengenang peristiwa-peristiwa masa kecil sang putra, mereka pun sangat berduka.

Verse 9

पुनरुक्त्वा च करुणां वाचं तौ शोककर्शितौ | हा पुत्र हा साध्वि वधू: क्वासि क्वासीत्यरोदताम्‌ | ब्राह्मण: सत्यवाक्‌ तेषामुवाचेदं तयोवच:,वे शोककातर दम्पति बारंबार करुण वचन बोलते हुए 'हा पुत्र! हा सती-साध्वी बहू! तुम कहाँ हो, कहाँ हो?' यों कहकर रोने लगे। उस समय एक सत्यवादी ब्राह्मणने उन दोनोंसे इस प्रकार कहा

Berulang kali, keduanya yang diluluhlantakkan duka mengucapkan ratapan pilu sambil menangis: “Aduhai, putraku! Aduhai, menantu perempuan yang suci! Di mana engkau, di mana engkau?” Lalu seorang brāhmaṇa yang berkata benar menanggapi mereka dengan berkata demikian.

Verse 10

युवर्चा उवाच यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च | आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान्‌,सुवर्चा बोले--सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि सत्यवान्‌ जीवित है

Yuvārcā berkata: “Karena istrinya, Sāvitrī, dianugerahi tapa, pengendalian diri, dan keluhuran laku, maka aku dapat menegaskan bahwa Satyavān masih hidup.”

Verse 11

गौतम उवाच वेदा: साड़्ा मयाधीतास्तपो मे संचितं महत्‌ | कौमारब्रह्मचर्य च गुरवो3ग्निश्व तोषिता:

Gautama berkata: “Aku telah mempelajari Weda beserta seluruh cabang ilmunya, dan telah menghimpun tapa yang agung. Sejak masa muda aku menjalankan brahmacarya, serta menunaikan bakti hingga para guru dan api suci (Agni) berkenan.”

Verse 12

समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे । वायुभक्षोपवास श्च कृतो मे विधिवत्‌ पुरा

Gautama berkata: “Dengan batin yang terpusat, aku telah menunaikan semua kaulku dengan semestinya. Dahulu pun aku menjalankan puasa ‘vayubhaksha’—bertahan hanya dengan napas—sesuai aturan.”

Verse 13

अनेन तपसा वेदि सर्व परचिकीर्षितम्‌ । सत्यमेतन्निबोधध्वं प्रियते सत्यवानिति

Gautama berkata: “Dengan tapa ini aku mengetahui seluruh maksud di balik segala upaya yang hendak dilakukan. Pahamilah ini sebagai kebenaran: ia yang teguh pada satya disebut ‘Satyavān’, karena ia berbakti pada kebenaran.”

Verse 14

गौतम बोले--मैंने छहों अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन किया है। महान्‌ तपका संचय किया है। कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गुरुजनों तथा अग्निदेवको संतुष्ट किया है। एकाग्रचित्त होकर सभी व्रत पूर्ण किये हैं। पूर्वकालमें हवा पीकर विधिपूर्वक उपवासव्रतका साधन किया है। इस तपस्याके प्रभावसे मैं दूसरोंकी सारी चेष्टाओंको जान लेता हूँ। आपलोग मेरी यह बात सच मानें कि सत्यवान्‌ जीवित है ।। ११ “7१३ || शिष्य उवाच उपाध्यायस्य मे वक्‍्त्राद्‌ यथा वाक्यं विनि:सृतम्‌ । नैव जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान्‌,गौतमके शिष्यने कहा--मेरे गुरुजीके मुखसे जो बात निकली है वह कभी मिथ्या नहीं हो सकती। सत्यवान्‌ अवश्य जीवित है

Sang murid berkata: “Apa pun yang telah keluar dari mulut guruku takkan pernah menjadi dusta. Maka Satyavān sungguh masih hidup.”

Verse 15

ऋषय ऊचु यथास्य भार्या सावित्री सर्वरेव सुलक्षणै: । अवैधव्यकरैरयुक्ता तथा जीवति सत्यवान्‌,कुछ ऋषियोंने कहा--सत्यवान्‌की पत्नी सावित्री उन सभी शुभ लक्षणोंसे युक्त है जो वैधव्यका निवारण करके सौभाग्यकी वृद्धि करनेवाले हैं, इसलिये सत्यवान्‌ अवश्य जीवित है

Para resi berkata: “Karena istri Satyavān, Sāvitrī, dianugerahi segala tanda mujur—yang menolak janda dan menambah kemuliaan suami-istri—maka Satyavān pasti masih hidup.”

Verse 16

भारद्वाज उवाच यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च । आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान्‌

Bhāradvāja berkata: “Sebagaimana istri Satyavān, Sāvitrī, bersatu dengan tapa, pengendalian diri, dan laku yang tak bercela, demikian pula Satyavān tetap hidup.”

Verse 17

भारद्वाज बोले--सत्यवानकी पत्नी सावित्री जैसी तपस्या, इन्द्रियसंयम तथा सदाचारसे संयुक्त है, उसे देखते हुए मैं कह सकता हूँ कि सत्यवान्‌ जीवित है ।। दाल्भ्य उवाच यथा दृष्टि: प्रवृत्ता ते सावित्र्याश्न यथा व्रतम्‌ गता55हारमकृत्वा च तथा जीवति सत्यवान्‌,दाल्भ्यने कहा--राजन! जिस प्रकार आपको दृष्टि प्राप्त हो गयी और जिस प्रकार सावित्रीका उपवास-व्रत चल रहा था तथा जिस प्रकार वह आज भोजन किये बिना ही पतिके साथ गयी है, इन सब बातोंपर विचार करनेसे यही प्रतीत होता है कि सत्यवान्‌ जीवित है

Dālbhyā berkata: “Wahai Raja, karena wawasmu telah bangkit demikian, dan karena kaul Sāvitrī dijalankan seperti ini—hari ini pun ia pergi bersama suaminya tanpa menyentuh makanan—maka menimbang tanda-tanda ini, tampak bahwa Satyavān sungguh masih hidup.”

Verse 18

आपस्तम्ब उवाच यथा वदन्ति शान्तायां दिशि वै मृगपक्षिण: । पार्थिवी च प्रवृत्तिस्ते तथा जीवति सत्यवान्‌,आपफस्तम्ब बोले--इस शान्त (एवं प्रसन्न) दिशामें मृत और पक्षी जैसी बोली बोल रहे हैं और आपके द्वारा जिस प्रकार राजोचित धर्मका अनुष्ठान हो रहा है, उसके अनुसार यह कहा जा सकता है कि सत्यवान्‌ जीवित है

Āpastamba berkata: “Sebagaimana rusa dan burung-burung berseru di penjuru yang tenang dan mujur ini, dan sebagaimana laku tuanku berjalan menurut dharma seorang raja, demikianlah patut dipahami bahwa Satyavān memang hidup.”

Verse 19

धौग्य उवाच सर्वर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रिय: । दीर्घायु्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान्‌,धौम्यने कहा--महाराज! आपका यह पुत्र जिस प्रकार समस्त सदगुणोंसे सम्पन्न, जनप्रिय तथा चिरजीवी पुरुषोंके लक्षणोंसे युक्त है, उसके अनुसार यही मानना चाहिये कि सत्यवान्‌ जीवित है

Dhaumya berkata: “Wahai Raja, putramu ini dipenuhi segala kebajikan—dicintai rakyat dan bertanda umur panjang. Maka patut disimpulkan bahwa Satyavān sungguh masih hidup.”

Verse 20

मार्कण्डेय उवाच एवमाश्वासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभि: । तांस्तान्‌ विगणयन्‌ सर्वास्तत:ः स्थिर इवाभवत्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार सत्यवादी एवं तपस्वी मुनियोंने जब राजा द्युमत्सेनको पूर्णतः आश्वासन दिया, तब उन सबका समादर करते हुए उनकी बात मानकर वे स्थिर-से हो गये

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, setelah ditenteramkan oleh para pertapa yang tutur katanya benar, ia menghormati mereka satu per satu dan menerima nasihat mereka; maka Raja Dyumatsena pun seakan menjadi teguh, tenang, dan mantap.”

Verse 21

ततो मुहूर्तात्‌ सावित्री भरत्रां सत्यवता सह । आजगामाश्रमं रात्रौ प्रह्ष्ठा प्रविवेश ह,तदनन्तर दो ही घड़ीमें सावित्री अपने पति सत्यवानके साथ रातमें वहाँ आयी और बड़े हर्षके साथ उसने आश्रममें प्रवेश किया

Kemudian, tak lama berselang, Sāvitrī datang ke pertapaan pada malam hari bersama suaminya, Satyavān; dengan hati yang penuh sukacita ia pun masuk ke dalam.

Verse 22

ब्राह्मणा ऊचु. पुत्रेण संगतं त्वां तु चक्षुष्मन्तं निरीक्ष्य च सर्वे वयं वै पृच्छामो वृद्धिं वै पृथिवीपते,तब ब्राह्मणोंने कहा--महाराज! पुत्रके साथ आपका मिलन हुआ और आपको नेत्र भी प्राप्त हो गये, इस अवस्थामें आपको देखकर हम सब लोग आपका अभ्युदय मना रहे हैं

Para Brahmana berkata: “Wahai raja, melihat engkau telah bersatu kembali dengan putramu dan penglihatanmu pun pulih, kami semua menanyakan kesejahteraan dan kemakmuranmu.”

Verse 23

समागमेन पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च । चक्षुषश्चात्मनो लाभात्‌ त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे,बड़े सौभाग्यकी बात है कि आपको पुत्रका समागम प्राप्त हुआ, बहू सावित्रीका दर्शन हुआ और अपने खोये हुए नेत्र पुन: मिल गये। इन तीनों बातोंसे आपका अभ्युदय सूचित होता है

Dengan bersatu kembali dengan putramu, dengan melihat Sāvitrī, dan dengan pulihnya penglihatanmu sendiri—oleh tiga keberuntungan ini, kemuliaanmu kian bertambah.

Verse 24

सर्वैरस्माभिरुक्त यत्‌ तथा तन्नात्र संशय: । भूयोभूय: समृद्धिस्ते क्षिप्रमेव भविष्यति,हम सब लोगोंने जो बात कही है, वह ज्यों-की-त्यों सत्य निकली, इसमें संशय नहीं है। आगे भी शीघ्र ही आपकी बारंबार समृद्धि होनेवाली है

Apa yang kami semua nyatakan telah terbukti benar adanya—tanpa keraguan. Dan kelak pun, kemakmuranmu akan datang kembali berulang kali, dan itu akan segera terjadi.

Verse 25

ततोड<ग्निं तत्र संज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि । उपासांचक्रिरे पार्थ द्युमत्सेने महीपतिम्‌,युधिष्ठि!! तदनन्तर सभी ब्राह्मण वहाँ आग जलाकर राजा च्ुमत्सेनके पास बैठ गये

Kemudian, setelah menyalakan api di sana, semua Brahmana dwija itu duduk berjaga dan melayani. Wahai Pārtha, mereka dengan hormat mendampingi Raja Dyumatsena—tetap dekat dalam bakti dan penopang, sebagaimana dituntut dharma terhadap raja yang tua dan tertimpa derita.

Verse 26

शैब्या च सत्यवांश्रैव सावित्री चैकतः स्थिता: । सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोका: समुपाविशन्‌,शैब्या, सत्यवान्‌ तथा सावित्री--ये तीनों भी एक ओर खड़े थे, जो उन सब महात्माओंकी आज्ञा पाकर शोकरहित हो बैठ गये

Śaibyā, Satyavān, dan Sāvitrī berdiri bersama di satu sisi. Dengan persetujuan para resi mulia itu, mereka pun duduk tanpa duka—seakan ketenteraman dan tatanan dharma kembali tegak setelah ujian berlalu.

Verse 27

ततो राज्ञा सहासीना: सर्वे ते वनवासिन: । जातकौतूहला: पार्थ पप्रच्छुर्न॒पते: सुतम्‌,पार्थ! तत्पश्चात्‌ राजाके साथ बैठे हुए वे सभी वनवासी कौतूहलवश राजकुमार सत्यवानसे पूछने लगे

Kemudian, ketika sang raja duduk bersama mereka, semua penghuni rimba itu—digerakkan rasa ingin tahu—mulai menanyai sang pangeran, putra raja. Dalam tatanan dharma, masyarakat yang menyaksikan peristiwa luar biasa pun mencari penjelasan yang benar dari ahli waris yang sah.

Verse 28

ऋषय ऊचु. प्रागेव नागतं कस्मात्‌ सभार्येण त्वया विभो | विरात्रे चागतं कस्मात्‌ को5नुबन्धस्तवाभवत्‌,ऋषि बोले--राजकुमार! तुम अपनी पत्नीके साथ पहले ही क्यों नहीं चले आये? क्‍यों इतनी रात बिताकर आये? तुम्हारे सामने कौन-सी अड़चन आ गयी थी?

Para resi berkata: “Wahai yang perkasa, mengapa engkau tidak datang lebih awal bersama istrimu? Mengapa engkau baru tiba setelah malam larut? Rintangan atau keadaan mendesak apa yang menahanmu?”

Verse 29

संतापित: पिता माता वयं चैव नृपात्मज । कस्मादिति न जानीमस्तत्‌ सर्व वक्तुमहसि,राजपुत्र! तुमने आनेमें विलम्ब करके अपने माता-पिता तथा हमलोगोंको भी भारी संतापमें डाल दिया था। तुमने ऐसा क्यों किया? यह हम नहीं जान पाते हैं, अतः सब बातें स्पष्ट रूपसे बताओ

“Wahai putra raja, karena keterlambatanmu ayahmu, ibumu, dan kami semua diliputi duka yang berat. Kami tidak mengerti mengapa engkau berbuat demikian. Maka jelaskanlah semuanya dengan terang.”

Verse 30

सत्यवानुवाच पित्राहमभ्यनुज्ञात: सावित्रीसहितो गतः । अथ मे<भूच्छिरोदु:खं वने काष्ठानि भिन्दतः,सत्यवान्‌ बोले--मैं पिताकी आज्ञा पाकर सावित्रीके साथ वनमें गया। फिर वनमें लकड़ियोंको चीरते समय मेरे सिरमें बड़े जोरसे दर्द होने लगा

Satyavān berkata: “Dengan izin ayahku, aku pergi ke hutan bersama Sāvitrī. Lalu, ketika membelah kayu bakar di rimba, tiba-tiba timbul nyeri yang sangat hebat di kepalaku.”

Verse 31

सुप्तश्नाहं वेदनया चिरमित्युपलक्षये । तावत्‌ काल॑ न च मया सुप्तपूर्व कदाचन,मैं समझता हूँ कि मैं वेदनासे व्याकुल होकर देरतक सोता रह गया। उतने समयतक मैं उसके पहले कभी नहीं सोया था

Aku menyadari bahwa karena diliputi rasa sakit, aku pasti tertidur sangat lama. Belum pernah sebelumnya aku tidur selama itu.

Verse 32

सर्वेषामेव भवतां संतापो मा भवेदिति । अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम्‌,नींद खुलनेपर मैं इतनी रातके बाद भी इसलिये चला आया कि आप सब लोगोंको मेरे लिये चिन्तित न होना पड़े। इस विलम्बमें और कोई कारण नहीं है

Agar kalian semua tidak cemas karena diriku, maka meski sudah larut malam aku datang ke sini. Tidak ada alasan lain bagi keterlambatan ini.

Verse 33

गौतम उवाच अकस्माच्चक्षुष: प्राप्तिर्युमत्सेनस्य ते पितु: । नास्य त्वं कारण वेत्सि सावित्री वक्तुमहति,गौतम बोले--तुम्हारे पिता द्युमत्सेनको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम नहीं जानते। सम्भवत: सावित्री बतला सकती है

Gautama berkata: “Ayahmu Dyumatsena tiba-tiba memperoleh kembali penglihatannya. Engkau tidak mengetahui sebabnya; Sāvitrī-lah yang layak menjelaskannya.”

Verse 34

श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम्‌ । त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा,सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो। मैं तुम्हें साक्षात्‌ सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ। राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो। सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो

Wahai Sāvitrī, aku ingin mendengarnya darimu, sebab engkau mengetahui yang luhur dan yang rendah, yang lampau dan yang akan datang. Aku mengenalmu, Sāvitrī, bercahaya laksana Dewi Sāvitrī sendiri. Engkau mengetahui sebab sejati mengapa sang raja tiba-tiba memperoleh kembali penglihatannya. Katakanlah kebenaran; bila tiada sesuatu yang harus disembunyikan, nyatakanlah tanpa menahan apa pun.

Verse 35

त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात्‌ सत्यं निरूच्यताम्‌ | रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व न:,सावित्री! मैं इसका रहस्य तुमसे सुनना चाहता हूँ; क्योंकि तुम भूत और भविष्य सब कुछ जानती हो। मैं तुम्हें साक्षात्‌ सावित्रीदेवीके समान तेजस्विनी जानता हूँ। राजाको जो सहसा नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है, इसका कारण तुम जानती हो। सच-सच बताओ, यदि इसमें कुछ छिपानेकी बात न हो तो हमसे अवश्य कहो

Gautama berkata: “Engkau mengetahui sebab sejati dari apa yang terjadi di sini; maka ucapkanlah kebenaran dengan terang. Jika bagimu tidak ada rahasia dalam perkara ini, katakanlah kepada kami apa adanya.”

Verse 36

सावित्रयुवाच एवमेतद्‌ यथा वेत्थ संकल्पो नान्यथा हि व: । न हि किंचिद्‌ रहस्यं मे श्रूयतां तथ्यमेव यत्‌,सावित्री बोली--मुनीश्वरो! आपलोग जैसा समझते हैं, ठीक है। आपलोगोंका संकल्प अन्यथा नहीं हो सकता। मेरे लिये कोई छिपानेकी बात नहीं है। मैं सब घटनाएँ ठीक-ठीक बताती हूँ, सुनिये

Sāvitrī berkata: “Benar demikian, sebagaimana kalian pahami; tekad kalian tak mungkin meleset. Bagiku tak ada rahasia sedikit pun. Dengarkan, akan kujelaskan semuanya setepat-tepatnya.”

Verse 37

मृत्युमें पत्युराख्यातो नारदेन महात्मना । स चाद्य दिवस: प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम्‌,महात्मा नारदजीने मुझसे मेरे पतिकी मृत्युका हाल बताया था। वह मृत्युदिवस आज ही आया था; इसलिये मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ती थी

Resi agung Nārada telah memberitahukan kepadaku saat kematian suamiku. Hari itu kini telah tiba; sebab itu aku tidak meninggalkannya seorang diri.

Verse 38

सुप्तं चैनं यम: साक्षादुपागच्छत्‌ सकिड्कर: । स एनमनयद्‌ बद्धवा दिशं पितृनिषेविताम्‌,जब ये सिरके दर्दसे व्याकुल होकर सो गये, उस समय साक्षात्‌ भगवान्‌ यमराज अपने सेवकके साथ पधारे। वे इन्हें बाँधकर दक्षिण दिशाकी ओर ले चले

Ketika ia tertidur karena sakit kepala yang hebat, Yama sendiri datang menampakkan diri bersama para pengiringnya. Ia mengikatnya lalu membawanya ke arah selatan, arah yang dilalui para Pitṛ (leluhur).

Verse 39

अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम्‌ | पज्च वै तेन मे दत्ता वरा: शूणुत तान्‌ मम,उस समय मैंने सत्यवचनोंद्वारा उन भगवान्‌ यमकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझे पाँच वर दिये। उन वरोंको आप मुझसे सुनिये

Saat itu aku memuji dewa Yama yang mahakuasa dengan kata-kata yang benar. Ia pun berkenan dan menganugerahkan kepadaku lima karunia. Dengarkanlah kini, akan kusebutkan karunia-karunia itu.

Verse 40

चक्षुषी च स्वराज्यं च द्वौ वरौ श्वशुरस्य मे । लब्धं पितु: पुत्रशतं पुत्राणां चात्मन: शतम्‌,नेत्र तथा अपने राज्यकी प्राप्ति--ये दो वर मेरे श्वशुरके लिये प्राप्त हुए हैं। इसके सिवा मैंने अपने पिताके लिये सौ पुत्र तथा अपने लिये भी सौ पुत्र होनेके दो वर और पाये हैं

Gautama berkata: “Dua anugerah telah diperoleh bagi mertuaku—penglihatan kembali dan kedaulatannya sendiri pulih. Selain itu, aku pun memperoleh dua anugerah lagi: ayahku diberkahi seratus putra, dan aku sendiri memiliki seratus putra.”

Verse 41

चतुर्वर्षशतायुर्मे भर्ता लब्धश्न सत्यवान्‌ | भर्तुर्हि जीवितार्थ तु मया चीर्ण त्विदं ब्रतम्‌,पाँचवें वरके रूपमें मुझे मेरे पति सत्यवान्‌ चार सौ वर्षोकी आयु लेकर प्राप्त हुए हैं। पतिके जीवनकी रक्षाके लिये ही मैंने यह व्रत किया था

Sebagai anugerah kelima, aku memperoleh suamiku Satyavān dengan usia empat ratus tahun. Sungguh, semata-mata demi melindungi nyawa suamiku aku menjalankan dan menunaikan tapa-brata ini.

Verse 42

एतत्‌ सर्व मया55ख्यातं कारणं विस्तरेण व: । यथावृत्तं सुखोदर्कमिदं दु:ःखं महन्मम,इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे विलम्बसे आनेका कारण और उसका यथावत्‌ वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है। मुझे जो यह महान्‌ दुःख उठाना पड़ा है उसका अन्तिम फल सुख ही हुआ है

Demikianlah telah kuceritakan kepada kalian semuanya—alasan keterlambatanku dengan rinci, dan peristiwa-peristiwa tepat sebagaimana terjadinya. Walau penderitaanku ini amat besar, pada akhirnya buahnya adalah kebahagiaan.

Verse 43

ऋषय ऊचु: निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं कुल नरेन्द्रस्य तमोमये हृदे । त्वया सुशीलब्रतपुण्यया कुलं समुद्धृतं साध्वि पुन: कुलीनया,ऋषि बोले--पतिव्रते! राजा द्युमत्सेनका कुल भाँति-भाँतिकी विपत्तियोंसे ग्रस्त होकर दुःखके अंधकारमय गढ़ेमें डूबा जा रहा था; परंतु तुझ-जैसी सुशीला, व्रतपरायणा और पवित्र आचरणवाली कुलीन वधूने आकर इसका उद्धार कर दिया

Para resi berkata: “Wahai wanita suci yang setia pada dharma suami! Ketika keluarga raja dari garis ini dihantam banyak malapetaka dan tenggelam ke dalam jurang duka yang gelap, engkau—lembut budi, teguh dalam brata, suci oleh kebajikan, dan berdarah mulia—telah mengangkat kembali dan memulihkan keluarga itu.”

Verse 44

मार्कण्डेय उदाच तथा प्रशस्य हाभिपूज्य चैव वरस्त्रियं तामृषय: समागता: । नरेन्द्रमामन्त्रय सपुत्रमज्जसा शिवेन जम्मुर्मुदिता: स्वमालयम्‌,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इस प्रकार वहाँ आये हुए महर्षियोंने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ सावित्रीकी भूरि-भूरि प्रशंसा तथा आदर-सत्कार करके पुत्रसहित राजा द्युमत्सेनकी अनुमति ले सुख और प्रसन्नताके साथ अपने-अपने घरको प्रस्थान किया

Markandeya berkata: “Demikianlah, wahai Yudhiṣṭhira. Para maharsi yang berkumpul di sana memuji dengan berlimpah dan memuliakan dengan semestinya Sāvitrī, yang terbaik di antara para wanita. Lalu mereka berpamitan kepada raja Dyumatsena beserta putranya; dan dengan pertanda baik serta hati yang gembira, mereka segera berangkat menuju pertapaan masing-masing.”

Verse 297

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दो सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-297 dari Śrī Mahābhārata, Parwa Wana, dalam bagian Pativratā-māhātmya (keagungan istri setia), yang mengisahkan episode Sāvitrī.

Verse 298

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावितरयुपाख्याने अष्टनवत्यधिकद्वधिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतित्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री- उपाख्यानविषयक दी सौ अद्ठदानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Parwa Wana—khususnya bagian Pativratā-māhātmya—episode Sāvitrī berakhir di sini sebagai bab ke-298.