(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ११२ श्लोक हैं) हू... “+(>9) #2९-3 #25-२ अष्टनवर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवानके लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वरप्राप्तिका विवरण बताना मार्कण्डेय उवाच एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महाबल: । लब्धचक्षु: प्रसन्नायां दृष्ट्यां सर्व ददर्श ह,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! इसी समय महाबली महाराजा द्युमत्सेनको उनकी खोयी हुई आँखें मिल गयीं। दृष्टि स्वच्छ हो जानेके कारण वे सब कुछ देखने लगे
Mārkaṇḍeya uvāca: etasminn eva kāle tu dyumatseno mahābalaḥ | labdhacakṣuḥ prasannāyāṁ dṛṣṭyā sarvaṁ dadarśa ha ||
Mārkaṇḍeya berkata: “Pada saat itu juga, Raja Dyumatsena yang perkasa mendapatkan kembali penglihatannya yang hilang. Dengan pandangan yang kini jernih dan tenteram, ia kembali dapat melihat segala sesuatu.”
मार्कण्डेय उवाच