Adhyaya 22
Vana ParvaAdhyaya 2254 Versesमाया-आधारित आक्रमण का पूर्ण विनाश; कृष्ण-पक्ष की निर्णायक विजय

Adhyaya 22

Adhyāya 22: Śālva’s Weapon-Shower, Dāruka’s Wounding, and the Māyā-Report of Vasudeva’s Father

Upa-parva: Saubha-vadha Upākhyāna (Episode of the Destruction of Saubha)

Vāsudeva recounts an intense phase of engagement with Śālva, who repeatedly attacks using heavy weapons and volleys, including a mass discharge of arrows that wounds the charioteer Dāruka, the horses, and the chariot. Dāruka, overwhelmed and injured, reports difficulty maintaining control; Vāsudeva observes the extent of the wounding and steadies the situation. A man from Dvārakā then approaches as a messenger, conveying an alarming statement attributed to Āhuka: that Śālva has struck down the son of Śūra while Kṛṣṇa is engaged elsewhere, urging Kṛṣṇa to withdraw and protect Dvārakā. The report induces grief and cognitive instability in Vāsudeva, who internally assesses the improbability of such a defeat while allies like Baladeva and others live; he concludes that if the report is true, it implies catastrophic loss. Amid renewed fighting, he perceives a vision of his aged father falling from Saubha, which triggers a brief collapse and the dropping of the Śārṅga bow; the army reacts in alarm. Regaining composure, Vāsudeva recognizes the episode as māyā (deceptive illusion), reorients to the engagement, and resumes action with renewed volleys, marking the chapter’s thematic pivot from emotional shock to discriminative clarity.

Chapter Arc: सौभविमान-वध की गाथा के धुएँ और तेज के बीच कथा खुलती है—शाल्व पर छोड़े गए सर्प-सदृश विषबाण, और फिर मायावी सौभ का अचानक अदृश्य हो जाना, जिससे वीर भी क्षणभर को विस्मित रह जाए। → माया-आवरण के कारण लक्ष्य लुप्त है; रथ-घोड़े पर्वत-भार से दबे, प्राण-क्षीण और लड़खड़ाते दिखते हैं। सारथि दारुक तात्कालिक सलाह देता है, और कृष्ण क्षण-भर ठहरने का आदेश देकर दिव्य, अभेद्य प्रतिरोध के बीच निर्णायक प्रहार का अवसर साधते हैं। → सुदर्शन-चक्र की अचूक शक्ति से सौभविमान त्रिपुर के समान चूर होकर द्विधा गिरता है; उसी तेजस्वी वेग में गदा घुमाते शाल्व को भी चक्र सहसा दो भागों में कर देता है—युद्ध का मायावी शिखर एक क्षण में कट जाता है। → उपाख्यान का परिणाम स्पष्ट है—माया पर धर्म-तेज की विजय। इसके बाद दृश्य बदलता है: काम्यक वन में युधिष्ठिर के राज्य/आश्रय से जुड़े ब्राह्मण-वैश्य पाण्डवों को छोड़ने को तैयार नहीं; अंततः युधिष्ठिर उनकी अनुमति लेकर सेवकों को रथ जोतने का आदेश देते हैं। → काम्यक वन का वह ‘अद्भुत समवाय’ समाप्ति की ओर है—रथ जुड़ रहे हैं; पाण्डवों की अगली गति और वन-यात्रा का अगला मोड़ सामने खड़ा है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत अ्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २९ ॥। हि >> मय ० | है 7 द्ाविशोद्ध्याय: शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने- अपने नगरको प्रस्थान वायुदेव उवाच ततो<हं भरतश्रेष्ठ प्रगृह्य रुचिरं धनु: । शरैरपातयं सौभाच्छिरांसि विबुधद्विषाम्‌,भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं--भरतश्रेष्ठ] तब मैं अपना सुन्दर धनुष उठाकर बाणोंद्वारा सौभविमानसे देवद्रोही दानवोंके मस्तक काट-काटकर गिराने लगा

Vāyu berkata: “Kemudian, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, setelah mengangkat busurku yang elok, aku mulai menghujani dengan anak panah, menebas kepala para raksasa yang memusuhi para dewa dan menjatuhkannya dari benteng udara Saubha. Dengan demikian, tatanan ilahi dipertahankan melalui kekuatan yang diarahkan kepada para penyerang pembenci dewa.”

Verse 2

शरांश्षाशीविषाकारानूर्ध्वगांस्तिग्मतेजस: । प्रैषयं शाल्वराजाय शार्ज्रमुक्तानू सुवासस:,तत्पश्चात्‌ शार्ड़् धनुषसे छूटे हुए विषैले सर्पोंके समान प्रतीत होनेवाले, सुन्दर पंखोंसे सुशोभित, प्रचण्ड तेजस्वी तथा अनेक ऊर्ध्वगामी बाण मैंने राजा शाल्वपर चलाये

Sesudah itu, dari busur Śārṅga kulepaskan banyak anak panah yang melesat ke atas, berkilau tajam, berhias bulu yang indah, dan tampak laksana ular berbisa—semuanya kutujukan kepada Raja Śālva.

Verse 3

ततो नादृश्यत तदा सौभं कुरुकुलोद्वह । अन्तहितं माययाभूत्‌ ततो5हं विस्मितो5$भवम्‌,कुरुकुलशिरोमणे! परंतु उस समय सौभविमान मायासे अदृश्य हो गया, अतः किसी प्रकार दिखायी नहीं देता था। इससे मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ

Lalu, wahai penopang utama wangsa Kuru, kota udara Saubha tidak lagi tampak. Ia lenyap, terselubung oleh māyā; dan aku pun diliputi keheranan.

Verse 4

अथ दानवसडूघास्ते विकृताननमूर्धजा: । उदक्रोशन्‌ महाराज विछिते मयि भारत,भरतवंशी महराज! तदनन्तर जब मैं निर्भय और अचलभावसे स्थित हुआ तथा उनपर शस्त्रप्रहार करने लगा, तब विकृत मुख और केशवाले सौभनिवासी दानवगण जोर-जोरसे चिल्लाने लगे

Kemudian gerombolan Dānava itu—berwajah mengerikan dan berambut kusut—berteriak keras, wahai maharaja, wahai keturunan Bharata, ketika aku berdiri teguh tanpa gentar dan menghantam mereka dengan senjata.

Verse 5

ततोअस्त्रं शब्दसाहं वै त्वरमाणो महारणे । अयोजयं तद्गभधाय तत: शब्द उपारमत्‌,तब मैंने उनके वधके लिये उस महान्‌ संग्राममें बड़ी उतावलीके साथ शब्दवेधी बाणका संधान किया। यह देख उनका कोलाहल शान्त हो गया

Lalu, dalam pertempuran besar itu, demi membinasakan mereka, dengan segera kupasang dan kulepaskan senjata pencari bunyi. Begitu ia mengena pada sasaran, kegaduhan mereka pun mereda dan hiruk-pikuk menjadi sunyi.

Verse 6

हतास्ते दानवा: सर्वे यै: स शब्द उदीरित: । शरैरादित्यसंकाशैज्वलितै: शब्दसाधनै:,जिन दानवोंने पहले कोलाहल किया था, वे सब सूर्यके समान तेजस्वी शब्दवेधी बाणोंद्वारा मारे गये

Para Dānava yang lebih dahulu menimbulkan hiruk-pikuk itu semuanya tewas—ditumbangkan oleh panah-panah menyala seterang matahari, yang membidik berdasarkan bunyi.

Verse 7

तस्मिन्नुपरते शब्दे पुनरेवान्यतो5भवत्‌ | शब्दो5परो महाराज तत्रापि प्राहरं शरै:,महाराज! वह कोलाहल शान्त होनेपर फिर दूसरी ओर उनका शब्द सुनायी दिया। तब मैंने उधर भी बाणोंका प्रहार किया

Wahai Raja, ketika bunyi itu mereda, dari arah lain timbul lagi bunyi yang kedua; mendengarnya, aku pun menghujani arah itu dengan panah.

Verse 8

एवं दश दिश: सर्वास्तिर्यगूर्ध्य च भारत । नादयामासुरसुरास्ते चापि निहता मया,भारत! इस तरह वे असुर इधर-उधर ऊपर-नीचे दसों दिशाओंमें कोलाहल करते और मेरे हाथसे मारे जाते थे

Demikianlah, wahai Bhārata, para Asura menimbulkan kegaduhan ke segala sepuluh penjuru—ke samping dan ke atas—namun mereka pun kutumbangkan.

Verse 9

ततः प्राग्ज्योतिषं गत्वा पुनरेव व्यदृश्यत । सौभं कामगमं वीर मोहयन्मम चक्षुषी,तदनन्तर इच्छानुसार चलनेवाला सौभविमान प्राग्ज्योतिषपुरके निकट जाकर मेरे नेत्रोंको भ्रममें डालता हुआ फिर दिखायी दिया

Kemudian Saubha—wahana udara yang bergerak sesuka hati—menuju ke arah Prāgjyotiṣa dan tampak kembali; wahai pahlawan, ia membingungkan penglihatanku.

Verse 10

ततो लोकान्तकरणो दानवो दारुणाकृति: । शिलावर्षेण महता सहसा मां समावृणोत्‌,तत्पश्चात्‌ लोकान्तकारी भयंकर आकृतिवाले दानवने आकर सहसा पत्थरोंकी भारी वर्षकि द्वारा मुझे आवृत कर दिया

Lalu seorang Dānava berwujud mengerikan, pembawa kebinasaan dunia, mendadak menyelimutiku dengan hujan batu yang dahsyat.

Verse 11

सो<हं पर्वतवर्षेण वध्यमान: पुन: पुनः । वल्मीक इव राजेन्द्र पर्वतोपचितो5भवम्‌,राजेन्द्र! शिलाखण्डोंकी उस निरन्तर वृष्टिसे बार-बार आहत होकर मैं पर्वतोंसे आच्छादित बाँबी-सा प्रतीत होने लगा

Wahai Rajendra! Dihantam berulang-ulang oleh hujan bongkah-bongkah batu yang tiada henti, aku tampak laksana gundukan sarang semut yang tertimbun timbunan gunung batu.

Verse 12

ततोऊहं पर्वतचित: सहय: सहसारथि: । अप्रख्यातिमियां राजन सर्वतः पर्वतैश्चित:,राजन! मेरे चारों ओर शिलाखण्ड जमा हो गये थे। मैं घोड़ों और सारथिसहित प्रस्तरखण्डोंसे चुना-सा गया था, जिससे दिखायी नहीं देता था

Wahai Raja! Di sekelilingku bongkah-bongkah batu menumpuk. Bersama kuda-kudaku dan sais kereta, aku tertutup rapat oleh timbunan batu dari segala arah, hingga tak dikenali dan tak terlihat.

Verse 13

ततो वृष्णिप्रवीरा ये ममासन्‌ सैनिकास्तदा । ते भयार्ता दिश: सर्वे सहसा वित्रदुद्रुवु:,यह देख वृष्णिकुलके श्रेष्ठ वीर जो मेरे सैनिक थे, भयसे आर्त हो सहसा चारों दिशाओंमें भाग चले

Melihat itu, para pahlawan terkemuka dari wangsa Vṛṣṇi yang saat itu menjadi prajuritku, dilanda ketakutan, seketika lari tercerai-berai ke segala penjuru.

Verse 14

ततो हाहाकृतमभूत्‌ सर्व किल विशाम्पते । द्यौश्न भूमिश्व खं चैवादृश्यमाने तथा मयि,प्रजानाथ! मेरे अदृश्य हो जानेपर भूलोक, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गलोक--सभी स्थानोंमें हाहाकार मच गया

Wahai pelindung rakyat! Begitu aku lenyap dari pandangan, di bumi, di angkasa, dan di surga—di segala penjuru—terdengar jerit ratap yang mengguncang.

Verse 15

ततो विषण्णमनसो मम राजन्‌ सुहृज्जना: । रुरुदुश्लुक्तुशुश्वेव द:खशोकसमन्विता:,राजन्‌! उस समय मेरे सभी सुहृद्‌ खिन्नचित्त हो दुःख-शोकमें डूबकर रोने-चिल्लाने लगे

Wahai Raja! Saat itu semua sahabat dan para pengasihku, hati mereka remuk, tenggelam dalam duka dan nestapa; mereka menangis dan meratap dengan suara keras.

Verse 16

द्विषतां च प्रहर्षो5 भूदार्ति श्वाद्धिषतामपि । एवं विजितवान्‌ वीर पश्चादश्रौषमच्युत,शत्रुओंमें उल्लास छा गया और मित्रोंमें शोक। अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले वीर युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा शाल्व एक बार मुझपर विजयी हो चुका था। यह बात मैंने सचेत होनेपर पीछे सारथिके मुँहसे सुनी थी

Di pihak musuh-musuhku timbul kegirangan, sedangkan di pihak para sahabat dan pendukungku muncul kedukaan. Wahai pahlawan yang tak pernah menyimpang dari tata-dharma, baru kemudian aku mendengar bahwa dengan cara demikian Raja Śālva pernah mengalahkanku—aku mengetahuinya setelah sadar kembali, dari mulut sais kereta sendiri.

Verse 17

ततो5हमिन्द्रदयितं सर्वपाषाण भेदनम्‌ । वज़मुद्यम्य तान्‌ सर्वान्‌ पर्वतान्‌ समशातयम्‌,तब मैंने सब प्रकारके प्रस्तरोंको विदीर्ण करनेवाले इन्द्रके प्रिय आयुध वज्रका प्रहार करके उन समस्त शिलाखण्डोंको चूर-चूर कर दिया

Lalu kuangkat vajra—senjata kesayangan Indra yang mampu membelah segala jenis batu—dan kutebaskan, hingga seluruh gunung-gunung itu hancur berkeping-keping.

Verse 18

ततः पर्वतभारार्त्ता मन्दप्राणविचेष्टिता: । हया मम महाराज वेपमाना इवाभवन्‌,महाराज! उस समय पर्वतखण्डोंके भारसे पीड़ित हुए मेरे घोड़े कम्पित-से हो रहे थे। उनकी बलसाध्य चेष्टाएँ बहुत कम हो गयी थीं

Wahai maharaja, saat itu kuda-kudaku—terhimpit oleh beban bongkahan gunung—seakan gemetar. Gerak mereka melemah, dan daya hidupnya pun tampak menurun.

Verse 19

मेघजालमिवाकाशे विदार्यभ्युदितं रविम्‌ । दृष्टवा मां बान्धवा: सर्वे हर्षमाहारयन्‌ पुन:,जैसे आकाशमें बादलोंके समुदायको छिन्न-भिन्न करके सूर्य उदित होता है, उसी प्रकार शिलाखण्डोंको हटाकर मुझे प्रकट हुआ देख मेरे सभी बन्धु-बान्धब पुनः हर्षसे खिल उठे

Seperti matahari terbit setelah merobek hamparan awan di langit, demikian pula ketika bongkahan batu tersingkir dan aku tampak, seluruh sanak-saudaraku melihatku dan kembali dipenuhi sukacita.

Verse 20

ततः पर्वतभारार्त्तान्‌ मन्दप्राणविचेष्टितान्‌ । हयान्‌ संदृश्य मां सूत: प्राह तात्कालिकं वच:,तब प्रस्तरखण्डोंके भारसे पीड़ित तथा धीरे-धीरे प्राणसाध्य चेष्टा करनेवाले घोड़ोंको देखकर सारथिने मुझसे यह समयोचित बात कही--

Kemudian, melihat kuda-kuda yang tertindih beban bongkahan batu dan bergerak dengan napas lemah serta tersengal, sais kereta menegurku dengan kata-kata yang tepat bagi saat genting itu.

Verse 21

साधु सम्पश्य वार्ष्णेय शाल्वं सौभपतिं स्थितम्‌ । अलं कृष्णावमन्यैनं साधु यत्नं समाचर,4वार्ष्णेय! वह देखिये, सौभराज शाल्व वहाँ खड़ा है। श्रीकृष्ण! इसकी उपेक्षा करनेसे कोई लाभ नहीं। इसके वधका कोई उचित उपाय कीजिये

Wahai Vārṣṇeya, pandanglah baik-baik—Śālva, penguasa Saubha, berdiri di sana. Jangan meremehkannya, wahai Kṛṣṇa; mengabaikannya takkan membawa hasil. Lakukan upaya yang tepat dengan kewaspadaan—susunlah cara yang semestinya.

Verse 22

मार्दव॑ सखितां चैव शाल्वादद्य व्यपाहर । जहि शाल्वं महाबाहो मैनं जीवय केशव,“महाबाहु केशव! अब शाल्वकी ओरसे कोमलता और मित्रभाव हटा लीजिये। इसे मार डालिये, जीवित न रहने दीजिये इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने द्वाविंशोडध्याय:

Wahai Keśava yang berlengan perkasa, singkirkan kini kelembutan dan rasa persahabatan terhadap Śālva. Bunuhlah Śālva; jangan biarkan ia tetap hidup.

Verse 23

सर्वे: पराक्रमैर्वीर वध्य: शत्रुरमित्रहन्‌ | न शत्रुरवमन्तव्यो दुर्बलोडपि बलीयसा,शत्रुहन्ता वीरवर! आपको सारा पराक्रम लगाकर इस शत्रुका वध कर डालना चाहिये। कोई कितना ही बलवान क्‍यों न हो, उसे अपने दुर्बल शत्रुकी भी अवहेलना नहीं करनी चाहिये

Wahai pahlawan, pembinasa musuh—dengan segenap keberanian dan daya upaya, musuh ini harus dijatuhkan. Betapa pun kuatnya seseorang, jangan pernah meremehkan musuh, sekalipun ia tampak lemah.

Verse 24

योडपि स्यात्‌ पीठग: ककश्रित्‌ कि पुनः समरे स्थित: । स त्वं पुरुषशार्दूल सर्वयत्नैरिमं प्रभो,“कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्‍या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।” कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया

Sekalipun musuh hanya duduk di rumah di atas singgasananya—bila kebinasaannya memang perlu—ia tak patut dibiarkan; apalagi yang berdiri tegak di medan laga. Maka, wahai harimau di antara manusia, wahai tuan, kerahkan segala upaya untuk menumpas musuh ini.

Verse 25

जहि वृष्णिकुलश्रेष्ठ मा त्वां कालो<त्यगात्‌ पुन: । नैष मार्दवसाध्यो वै मतो नापि सखा तव,“कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्‍या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।” कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया

Binasakan dia, wahai yang terbaik dari wangsa Vṛṣṇi; jangan biarkan waktu kembali mendahuluimu. Ia bukan orang yang dapat ditundukkan dengan kelembutan, dan ia pun bukan sahabatmu yang sejati.

Verse 26

येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता । एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेवच:,“कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्‍या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।” कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया

Vāyu berkata: “Wahai pahlawan! Dialah yang menantangmu bertempur, dan dialah pula yang meluluhlantakkan Dvārakā. Wahai putra Kuntī, setelah mendengar kata-kata kusir kereta—bahwa musuh yang duduk tenteram di rumah pun tak patut dibiarkan, apalagi yang berdiri siap berperang di medan laga—aku menilai nasihat itu benar. Maka kupusatkan tekadku pada pertempuran: membunuh Raja Śālva dan menjatuhkan benteng udara Saubha.”

Verse 27

तत्त्वमेतदिति ज्ञात्वा युद्धे मतिमधारयम्‌ । वधाय शाल्वराजस्य सौभस्य च निपातने,“कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्‍या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।” कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया

Mengetahui inilah jalan yang benar, aku meneguhkan tekadku pada perang—untuk membunuh Raja Śālva dan menjatuhkan Saubha. Nasihatnya terang: musuh yang duduk tenteram di rumah pun tak patut dibiarkan, apalagi yang berdiri siap bertempur. Lawan ini tak dapat ditundukkan dengan kelembutan; ia telah melanggar persahabatan dengan berperang melawanku dan menghancurkan Dvārakā. Karena itu, tindakan cepat dan menentukan di medan laga ditampilkan sebagai kewajiban dharma demi perlindungan.

Verse 28

दारुकं चाब्रुवं वीर मुहूर्त स्थीयतामिति । ततो<प्रतिहतं दिव्यमभेद्यमतिवीर्यवत्‌,वीर! तत्पश्चात्‌ मैंने दारुकसे कहा--'सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी)।' तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान्‌ आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया। वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था

Wahai pahlawan! Lalu kukatakan kepada Dāruka, “Kusir, tunggulah sejenak.” Sesudah itu kupasang sebuah senjata ilahi—tak terhentikan, tak terpatahkan, dan berdaya luar biasa. Jeda ini bukan keraguan, melainkan ketertiban dharma: menahan diri dan menempatkan tindakan pada urutan yang tepat sebelum kekuatan dilepaskan.

Verse 29

आग्नेयमस्त्र दयितं सर्वसाहं महाप्रभम्‌ । योजयं तत्र धनुषा दानवान्तकरं रणे,वीर! तत्पश्चात्‌ मैंने दारुकसे कहा--'सारथे! दो घड़ी और ठहरो (फिर तुम्हारी इच्छा पूरी हो जायगी)।' तदनन्तर मैंने कहीं भी कुण्ठित न होनेवाले दिव्य, अभेद्य, अत्यन्त शक्तिशाली, सब कुछ सहन करनेमें समर्थ, प्रिय तथा परम कान्तिमान्‌ आग्नेयास्त्रका अपने धनुषपर संधान किया। वह अस्त्र युद्धमें दानवोंका अन्त करनेवाला था

Vāyu berkata: “Lalu kupasang pada busurku senjata Agneya yang kucintai—tangguh, sanggup menanggung segalanya, dan bercahaya agung—terkenal sebagai pemusnah para Dānava di medan perang. Setelah itu kukatakan kepada Dāruka, ‘Kusir, tunggulah dua saat lagi; kemudian keinginanmu akan terpenuhi.’ Maka kutegakkan senjata Agneya itu: ilahi, tak terpatahkan, maha-kuat, dan gemilang.”

Verse 30

यक्षाणां राक्षसानां च दानवानां च संयुगे । राज्ञां च प्रतिलोमानां भस्मान्तकरणं महत्‌,इतना ही नहीं, वह यक्षों, राक्षसों, दानवों तथा विपक्षी राजाओंको भी भस्म कर डालनेवाला और महान था

Vāyu berkata: “Di medan perang, itu adalah kekuatan yang dahsyat—mampu membakar menjadi abu bukan hanya Yakṣa, Rākṣasa, dan Dānava, melainkan juga raja-raja musuh yang berdiri menentang.”

Verse 31

क्षुरान्तममलं चक्रं कालान्तकयमोपमम्‌ । अनुमन्त्रयाहमतुलं द्विषतां विनिबर्हणम्‌,वह आग्नेयास्त्र (सुदर्शन) चक्रके रूपमें था। उसके परिधिभागमें सब ओर तीखे छूरे लगे हुए थे। वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तकके समान भयंकर था। उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्रको अभिमन्त्रित करके मैंने कहा--'तुम अपनी शक्तिसे सौभविमान और उसपर रहनेवाले मेरे शत्रुओंको मार डालो।' ऐसा कहकर अपने बाहुबलसे रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभ-विमानकी ओर चलाया

Vāyu berkata: “Aku menguduskan dengan mantra sebuah cakra yang tiada banding, bening tanpa cela; pada lingkarnya terpasang tepi setajam silet, mengerikan laksana Kāla, Antaka, dan Yama. Setelah senjata pemusnah musuh itu kuperkuat, aku berketetapan mengirimkannya dengan kekuatan lenganku sendiri untuk menumpas kota udara Saubha beserta para musuhku yang berdiam di sana.”

Verse 32

जहि सौभे स्ववीर्येण ये चात्र रिपवो मम । इत्युक्त्वा भुजवीर्येण तस्मै प्राहिणवं रुषा,वह आग्नेयास्त्र (सुदर्शन) चक्रके रूपमें था। उसके परिधिभागमें सब ओर तीखे छूरे लगे हुए थे। वह उज्ज्वल अस्त्र काल, यम और अन्तकके समान भयंकर था। उस शत्रुनाशक अनुपम अस्त्रको अभिमन्त्रित करके मैंने कहा--'तुम अपनी शक्तिसे सौभविमान और उसपर रहनेवाले मेरे शत्रुओंको मार डालो।' ऐसा कहकर अपने बाहुबलसे रोषपूर्वक मैंने वह अस्त्र सौभ-विमानकी ओर चलाया

Vāyu berkata: “Hancurkan Saubha dengan kekuatanmu sendiri, dan binasakan pula musuh-musuhku yang ada di sana.” Setelah berkata demikian, dalam murka dan bersandar pada kekuatan lengannya, ia mengirimkan senjata itu ke arah Saubha.

Verse 33

रूप॑ सुदर्शनस्थासीदाकाशे पततस्तदा । द्वितीयस्येव सूर्यस्य युगान्ते प्रपतिष्यत:,आकाशमें जाते ही उस सुदर्शन चक्रका स्वरूप प्रलयकालमें उगनेवाले द्वितीय सूर्यके समान प्रकाशित हो उठा

Saat cakra Sudarśana melesat ke angkasa, wujud dan cahayanya menyala—laksana matahari kedua yang terbit pada akhir suatu yuga.

Verse 34

तत्‌ समासाद्य नगरं सौभं व्यपगतत्विषम्‌ । मध्येन पाटयामास क्रकचो दार्विवोच्छितम्‌,उस दिव्यास्त्रने सौभनगरमें पहुँचकर उसे श्रीहीन कर दिया और जैसे आरा ऊँचे काठको चीर डालता है, उसी प्रकार सौभविमानको बीचसे काट डाला

Setibanya di kota Saubha, cakra itu merenggut seluruh kemegahannya; lalu, bagaikan gergaji membelah gelondong kayu yang menjulang, ia membelah benteng udara Saubha tepat di bagian tengah.

Verse 35

द्विधा कृतं ततः: सौभ॑ सुदर्शनबलाद्धतम्‌ । महेश्वरशरोद्धूतं पपात त्रिपुरं यथा,सुदर्शन चक्रकी शक्तिसे कटकर दो टुकड़ोंमें बँटा हुआ सौभविमान महादेवजीके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए त्रिपुरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा

Maka Saubha pun terbelah dua, dihantam oleh daya Sudarśana; dan seperti Tripura yang dahulu runtuh oleh panah Mahēśvara, benteng itu jatuh menghantam bumi.

Verse 36

तस्मिन्‌ निपतिते सौभे चक्रमागात्‌ करं मम | पुनश्चादाय वेगेन शाल्वायेत्यहमब्रुवम्‌,सौभविमानके गिरनेपर चक्र फिर मेरे हाथमें आ गया। मैंने फिर उसे लेकर वेगपूर्वक चलाया और कहा--“अबकी बार शाल्वको मारनेके लिये तुम्हें छोड़ रहा हूँ”

Ketika kota udara Saubha telah runtuh, cakra itu kembali ke tanganku. Aku mengambilnya lagi dengan daya yang cepat dan berkata: “Kini kulepaskan engkau sekali lagi—kali ini untuk menumbangkan Śālva.”

Verse 37

ततः शाल्वं गदां गुर्वीमाविध्यन्तं महाहवे । द्विधा चकार सहसा प्रजज्वाल च तेजसा,तब उस चक्रने महासमरमें बड़ी भारी गदा घुमानेवाले शाल्वके सहसा दो टुकड़े कर दिये और वह तेजसे प्रज्वलित हो उठा

Lalu, dalam pertempuran besar itu, cakra seketika membelah Śālva—yang sedang memutar gada raksasa—menjadi dua. Senjata itu pun menyala oleh dayanya sendiri.

Verse 38

तस्मिन्‌ विनिहते वीरे दानवास्त्रस्तचेतस: । हाहाभूता दिशो जम्मुरदिता मम सायकै:,वीर शाल्वके मारे जानेपर दानवोंके मनमें भय समा गया। वे मेरे बाणोंसे पीड़ित हो हाहाकार करते हुए सब दिशाओंमें भाग गये

Ketika sang pahlawan Śālva terbunuh, para Dānava terguncang ketakutan. Disiksa oleh anak panahku, mereka menjerit “hā hā” dan lari tercerai-berai ke segala arah.

Verse 39

ततो<5हं समवस्थाप्य रथं सौभसमीपत: । शड्खं प्रध्माप्य हर्षेण सुहृद: पर्यहर्षयम्‌,तब मैंने सौभविमानके समीप अपने रथको खड़ा करके प्रसन्नतापूर्वक शंख बजाकर सभी सुहृदोंको हर्षमें निमग्न कर दिया

Kemudian aku menempatkan keretaku dekat Saubha. Dengan sukacita aku meniup sangkha, membangkitkan kegembiraan para sahabat dan sekutuku.

Verse 40

तन्मेरुशिखराकारं विध्वस्ताट्टालगोपुरम्‌ । दह्यूमानमभिप्रेक्ष्य स्त्रियस्ता: सम्प्रदुद्गरुवु:,मेरुपर्वतके शिखरके समान आकृतिवाले सौभ-नगरकी अट्टालिका और गोपुर सभी नष्ट हो गये। उसे जलते देख उसपर रहनेवाली स्त्रियाँ इधर-उधर भाग गयीं

Kota Saubha—berwujud laksana puncak Gunung Meru—kini telah hancur: menara-menara dan gerbang-gerbangnya runtuh. Melihatnya menyala dengan asap dan api, para perempuan yang tinggal di sana lari panik ke segala arah.

Verse 41

एवं निहत्य समरे सौभ॑ शाल्व॑ निपात्य च । आनर्तान्‌ पुनरागम्य सुहृदां प्रीतिमावहम्‌,धर्मराज! इस प्रकार युद्धमें सौभविमान तथा राजा शाल्वको नष्ट करके मैं पुनः आनर्तनगर [द्वारका)-में लौट आया और सुहृदोंका हर्ष बढ़ाया

Demikianlah, setelah menumpas benteng udara Saubha dalam pertempuran dan menjatuhkan Raja Śālva pula, aku kembali ke negeri Ānarta (Dvārakā) dan menjadi sebab sukacita bagi para sahabat yang tulus mencintaiku, wahai Dharmarāja.

Verse 42

तदेतत्‌ कारणं राजन्‌ यदहं नागसाह्नयम्‌ । नागमं परवीरघ्न न हि जीवेत्‌ सुयोधन:,राजन! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुरमें न आ सका। शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले धर्मराज! मेरे आनेपर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता। जैसे बाँध टूट जानेपर पानीको कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा

Wahai raja, inilah sebabnya pada masa itu aku tak dapat datang ke Hāstinapura. Wahai Dharmarāja, pembinasa para kesatria musuh, seandainya aku tiba, maka permainan dadu itu takkan terjadi sama sekali—atau Suyodhana (Duryodhana) takkan tetap hidup.

Verse 43

मय्यागते<5थवा वीर द्यूतं न भविता तथा । अद्याहं कि करिष्यामि भिन्नसेतुरिवोदकम्‌,राजन! यही कारण है, जिससे मैं उन दिनों हस्तिनापुरमें न आ सका। शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले धर्मराज! मेरे आनेपर या तो जूआ नहीं होता या दुर्योधन जीवित नहीं रह पाता। जैसे बाँध टूट जानेपर पानीको कोई नहीं रोक सकता, उसी प्रकार आज जबकि सब कुछ बिगड़ चुका है, तब मैं क्या कर सकूँगा

Wahai pahlawan, seandainya aku datang ke sana, perjudian itu takkan terjadi demikian—atau Duryodhana takkan tetap hidup. Namun kini, wahai raja, ketika segalanya telah terlanjur kacau, apa yang dapat kulakukan hari ini? Seperti air yang tak dapat dibendung setelah tanggul jebol, demikian pula peristiwa yang telah lepas dari ikatan melaju tanpa tertahan.

Verse 44

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वा महाबाहु: कौरवं पुरुषोत्तम: । आमन्त्रय प्रययौ श्रीमान्‌ पाण्डवान्‌ मधुसूदन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर पुरुषोंमें श्रेष्ठ महाबाहु श्रीमान्‌ मधुसूदन कुरुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर द्वारकाकी ओर चले

Vaiśampāyana berkata: Setelah berkata demikian, Madhusūdana yang termasyhur—terunggul di antara manusia dan berlengan perkasa—berpamitan kepada para Pāṇḍava dan, dengan persetujuan sang Kaurava (Yudhiṣṭhira), berangkat menuju Dvārakā.

Verse 45

अभिवाद्य महाबाहुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । राज्ञा मूर्थन्युपाप्रातो भीमेन च महाभुज:,महाबाहु श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरको प्रणाम किया। राजा युधिष्ठिर तथा भीमने बड़ी-बड़ी भुजाओंवाले श्रीकृष्णका सिर सूँघा

Setelah memberi hormat kepada Dharmarāja Yudhiṣṭhira, Śrī Kṛṣṇa yang berlengan perkasa mendekat. Lalu Raja Yudhiṣṭhira dan Bhīma, dalam kasih dan penghormatan, menyentuh serta mencium kepalanya—tanda keakraban keluarga yang berpadu dengan takzim.

Verse 46

परिष्वक्तश्नार्जुनेन यमा भ्यां चाभिवादित: । सम्मानितश्च धौम्येन द्रौपद्या चार्चितो5श्रुभि:,अर्जुनने उनको हृदयसे लगाया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। पुरोहित धौम्यजीने उनका सम्मान किया तथा द्रौपदीने अपने आँसुओंसे उनकी अर्चना की

Arjuna memeluknya erat dari lubuk hati; dan si kembar Nakula serta Sahadeva—putra-putra Yama—bersujud hormat di kakinya. Pendeta keluarga, Dhaumya, menyambutnya dengan penghormatan yang semestinya; sementara Draupadī, dengan hati meluap, menerimanya laksana pemujaan, disertai air mata.

Verse 47

सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य काउ्चनम्‌ | आरुरोह रथं कृष्ण: पाण्डवैरभिपूजित:,पाण्डवोंसे सम्मानित श्रीकृष्ण सुभद्रा और अभिमन्युको अपने सुवर्णमय रथपर बैठाकर स्वयं भी उसपर आरूढ़ हुए

Dihormati sepantasnya oleh para Pāṇḍava, Kṛṣṇa mendudukkan Subhadrā dan Abhimanyu di atas kereta emas, lalu ia sendiri pun naik ke kereta itu.

Verse 48

शैब्यसुग्रीवयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा । द्वारकां प्रययौ कृष्ण: समाश्वास्य युधिष्ठिरम्‌,उस रथमें शैब्य और सुग्रीव नामक घोड़े जुते हुए थे और वह सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था। युधिष्ठिरको आश्वासन देकर श्रीकृष्ण उसी रथके द्वारा द्वारकापुरीकी ओर चल दिये

Dengan kereta yang bercahaya laksana matahari, ditarik oleh kuda bernama Śaibya dan Sugrīva, Kṛṣṇa menenangkan Yudhiṣṭhira lalu berangkat menuju Dvārakā.

Verse 49

ततः प्रयाते दाशाहें धृष्टद्युम्नोडपि पार्षत: । द्रौपदेयानुपादाय प्रययौ स्वपुरं तदा,श्रीकृष्णके चले जानेपर ट्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नने भी द्रौपदीकुमारोंको साथ ले अपनी राजधानीको प्रस्थान किया

Setelah Śrī Kṛṣṇa dari wangsa Dāśārha berangkat, Dhṛṣṭadyumna putra Pṛṣata pun pergi, membawa serta putra-putra Draupadī, menuju ibu kotanya.

Verse 50

धृष्टकेतु: स्वसारं च समादायाथ चेदिराट्‌ । जगाम पाण्डवान्‌ दृष्टवा रम्यां शुक्तिमतीं पुरीम्‌,चेदिराज धृष्टकेतु भी अपनी बहिन करेणुमतीको, जो नकुलकी भार्या थी, साथ ले पाण्डवोंसे मिल-जुलकर अपनी सुरम्य राजधानी शुक्तिमतीपुरीको चले गये

Kemudian Dhṛṣṭaketu, raja Cedi, membawa serta saudari perempuannya; ia menemui para Pāṇḍava, dan setelah menyaksikan kota Śuktimatī yang elok, ia pun melanjutkan perjalanan ke sana.

Verse 51

केकयाश्षाप्यनुज्ञाता: कौन्तेयेनामितौजसा । आमन्त्र्य पाण्डवान्‌ सर्वान्‌ प्रययुस्तेषपि भारत,भारत! केकयराजकुमार भी अमित तेजस्वी कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पा समस्त पाण्डवोंसे विदा लेकर अपने नगरको चले गये

Waiśampāyana berkata: Para pangeran Kekaya, setelah memperoleh izin dari putra Kuntī yang berlengan perkasa, berpamitan kepada seluruh Pāṇḍava lalu berangkat menuju kota mereka sendiri.

Verse 52

ब्राह्मणाश्ष विशश्वैव तथा विषयवासिन: । विसृज्यमाना: सुभृशं न त्यजन्ति सम पाण्डवान्‌,युधिष्ठिरके राज्यमें रहनेवाले ब्राह्मण तथा वैश्य बारंबार विदा करनेपर भी पाण्डवोंको छोड़कर जाना नहीं चाहते थे

Waiśampāyana berkata: Para brāhmaṇa, vaiśya, dan para penduduk negeri lainnya, meski berulang kali diminta pergi, tetap tidak mau meninggalkan Pāṇḍava.

Verse 53

समवाय: स राजेन्द्र सुमहाद्भुतदर्शन: । आसीन्महात्मनां तेषां काम्यके भरतर्षभ,भरतवंशभूषण महाराज जनमेजय! उस समय काम्यकवनमें उन महात्माओंका बड़ा अद्भुत सम्मेलन जुटा था

Waiśampāyana berkata: Wahai raja terbaik, pertemuan para mahātmā itu sungguh agung dan menakjubkan untuk disaksikan. Di hutan Kāmyaka, para insan berhati luhur berkumpul dalam sidang yang luar biasa.

Verse 54

युधिष्ठिरस्तु विप्रांस्ताननुमान्य महामना: । शशास पुरुषान्‌ काले रथान्‌ योजयतेति वै,तदनन्तर महामना युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंकी अनुमतिसे अपने सेवकोंको समयपर आज्ञा दी--*रथोंको जोतकर तैयार करो”

Kemudian Yudhiṣṭhira yang berhati luhur, setelah memperoleh persetujuan para brāhmaṇa itu, memberi perintah tepat pada waktunya kepada para pelayan: “Pasangkan kuda-kuda pada kereta dan siapkanlah.”

Frequently Asked Questions

The dilemma is divided duty under uncertain information: whether to disengage to protect Dvārakā based on a distressing report, or to maintain the present engagement—requiring discernment about truth, deception, and proportional response.

Perception is not equivalent to reality in moments of crisis; disciplined discrimination (viveka) and emotional regulation are necessary to prevent strategic and ethical failure when deceptive appearances target attachment and grief.

No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter’s meta-function is implicit—illustrating how recognizing māyā preserves agency and dharmic action within the epic’s larger moral-psychological framework.