Adhyaya 217
Vana ParvaAdhyaya 21742 Verses

Adhyaya 217

Skanda–Mātṛgaṇa-janma: Kumārakāḥ, Kanyāgaṇāḥ, and the Vīrāṣṭaka (स्कन्द-मातृगण-सम्भवः)

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-samvāda (Skanda–Mātṛgaṇa episode)

Mārkaṇḍeya describes formidable attendants associated with Skanda, said to arise following a vajra-strike, including Kumārakāḥ characterized as dangerous to infants and even the unborn. He reports the birth of powerful maidens (kanyās) and notes that the Kumāras designate Viśākha in a paternal capacity. Skanda is depicted in a protective, battle-context role, marked by a goat-faced form and surrounded by these groups. The account links popular designation of Skanda as “father of the Kumāras” and notes ongoing worship by those desiring offspring, directed to Rudra, Agni, Umā, Svāhā, and a powerful regional goddess figure. The Mātṛs request elevated maternal status across the worlds; Skanda grants differentiated manifestations, both auspicious and inauspicious. A named set of seven “child-mothers” is listed, and a fearsome offspring (Lohitākṣa) is described as born from Skanda’s favor. The narrative classifies an eightfold heroic set arising from the Skanda–Mātṛ group, with a ninth figure associated with the goat-faced aspect. It further identifies a goat-form face as Skanda’s sixth, describes continual worship by the Mātṛs, and singles out Bhadrāśākha as preeminent among the heads, credited with producing a divine śakti (weapon/power). The chapter closes by situating events on specific lunar dates (pañcamī and ṣaṣṭhī), including reference to a severe battle occurring on ṣaṣṭhī.

Chapter Arc: धर्मव्याध कौशिक मुनि से अपने पूर्वजन्म का रहस्य खोलता है—कैसे एक ऋषि के शाप से वह शूद्र-योनि में आया, और फिर भी धर्म का ज्ञाता बना। → व्याध स्वीकार करता है कि अज्ञानवश उससे अपराध हुआ था और वह क्षमा चाहता है; ऋषि का वचन अटल है—शाप टलेगा नहीं, पर करुणा से उसके भीतर धर्म-मार्ग का बीज बोया जाता है: माता-पिता की सेवा और अहिंसा-आनृशंस्य का पालन। → ऋषि का निर्णायक विधान: ‘शूद्र-योनि में रहकर भी तू धर्मज्ञ होगा; माता-पिता की शुश्रूषा करेगा; शाप-क्षय के बाद पुनः द्विज होगा’—यहाँ जन्म नहीं, वृत्त (आचरण) को द्विजत्व का मानदंड ठहराया जाता है। → व्याध उपदेश का उपसंहार करता है—गुणों के संयोग-वियोग से ही जगत चलता है; एक व्यक्ति के लिए शोक का स्थायी आधार नहीं। असंतोष का अंत नहीं, इसलिए संतोष ही परम सुख; ज्ञान-मार्ग पार कर परमात्म-साक्षात्कार करने वाले शोकातीत होते हैं। कौशिक मुनि यह सुनकर अपने आश्रम/गृह की ओर प्रस्थान करता है।

Shlokas

Verse 1

#72:.7 #:ड-.ह () हि २ 7 षोडशाधिकद्विशततमो< ध्याय: कौशिक-धर्मव्याध-संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान व्याध उवाच एवं शप्तो5हमृषिणा तदा द्विजवरोत्तम । अभिप्रसादयमृषिं गिरा त्राहीति मां तदा,धर्मव्याध कहता है--विप्रवर! जब इस प्रकार ऋषिने मुझे शाप दे दिया, तब मैंने कहा--'भगवन्‌! मेरी रक्षा कीजिये--मुझे उबारिये। मुने! मैंने अनजानमें यह आज अनुचित काम कर डाला है। मेरा सब अपराध क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न हो जाइये।' ऐसा कहकर उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की

Sang pemburu berkata: “Wahai yang terbaik di antara para brahmana, ketika sang resi telah mengutukku demikian, aku berusaha meraih keridaannya dengan kata-kata penuh kerendahan hati, seraya memohon, ‘Selamatkan aku!’ Aku memohon perlindungan dan ampunan; mengakui kesalahanku dan mengetuk belas kasihnya, aku mencoba menenangkan sang resi.”

Verse 2

अजानता मयाकार्यमिदमद्य कृतं मुने । क्षन्तुमहसि तत्‌ सर्व प्रसीद भगवनज्निति,धर्मव्याध कहता है--विप्रवर! जब इस प्रकार ऋषिने मुझे शाप दे दिया, तब मैंने कहा--'भगवन्‌! मेरी रक्षा कीजिये--मुझे उबारिये। मुने! मैंने अनजानमें यह आज अनुचित काम कर डाला है। मेरा सब अपराध क्षमा कीजिये और मुझपर प्रसन्न हो जाइये।' ऐसा कहकर उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा की

Wahai resi, tanpa kusadari hari ini aku telah melakukan perbuatan yang tak patut dilakukan. Ampunilah semuanya, dan berkenanlah, wahai Yang Mulia.

Verse 3

ऋषिरुवाच नान्यथा भविता शाप एवमेतदसंशयम्‌ | आनृशंस्यात्‌ त्वहं किज्चित्‌ कर्तनुग्रहमद्य ते,ऋषिने कहा--यह शाप टल नहीं सकता। ऐसा होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं है। परंतु मेरा स्वभाव क्रूर नहीं है, इसलिये मैं तुझपर आज कुछ अनुग्रह करता हूँ

Sang resi berkata: “Tak mungkin terjadi selain demikian—kutukan ini pasti berlaku; tak ada keraguan. Namun karena aku bukanlah kejam pada tabiatku dan digerakkan oleh welas asih, hari ini akan kuberikan kepadamu suatu anugerah.”

Verse 4

शूद्रयोन्यां वर्तमानो धर्मज्ञो हि भविष्यसि । मातापित्रोश्व शुश्रूषां करिष्यसि न संशय:,तू शूद्रयोनिमें रहकर धर्मज्ञ होगा और माता-पिताकी सेवा करेगा। इसमें तनिक भी संदेहके लिये स्थान नहीं है

Walau engkau berada dalam kelahiran sebagai Śūdra, engkau akan menjadi seorang yang mengetahui dharma. Engkau akan melayani ayah dan ibumu dengan bakti—tanpa keraguan.

Verse 5

तया शुश्रूषया सिद्धि महत्त्वं समवाप्स्यसि | जातिस्मरश्न भविता स्वर्ग चैव गमिष्यसि,उस सेवासे तुझे सिद्धि और महत्ता प्राप्त होगी। तू पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला होगा और अन्तमें स्वर्गलोकमें जायगा

Dengan pengabdian itu engkau akan meraih siddhi dan kebesaran sejati. Engkau akan menjadi pengingat kelahiran-kelahiran lampau, dan pada akhirnya engkau akan pergi ke surga.

Verse 6

शापक्षये तु निर्वत्ते भवितासि पुनर्द्धिज: । एवं शप्त: पुरा तेन ऋषिणास्म्युग्रतेजसा,शापका निवारण हो जानेपर तू फिर ब्राह्मण होगा। इस प्रकार उन उग्र तेजस्वी महर्षिने पूर्वकालमें मुझे शाप दिया था

Ketika daya kutuk itu telah berakhir, engkau akan menjadi dwija—seorang brāhmaṇa—kembali. Demikianlah dahulu kala aku dikutuk oleh resi yang menyala oleh cahaya tapa itu.

Verse 7

प्रसादश्च॒ कृतस्तेन ममैव द्विपदां वर । शरं चोद्धृतवानस्मि तस्य वै द्विजसत्तम

Wahai yang terbaik di antara manusia, ia sungguh menganugerahkan kemurahan kepadaku; dan wahai yang utama di antara para brāhmaṇa, aku pun telah mencabut anak panah miliknya itu.

Verse 8

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं यथा मम पुराभवत्‌,विप्रवर! पूर्वजन्ममें मेरे ऊपर जो कुछ बीता था, वह सब मैंने आपसे कह सुनाया। अब इस जीवनके पश्चात्‌ मुझे स्वर्गलोकमें जाना है

Wahai brāhmaṇa terbaik, segala sesuatu telah kukisahkan kepadamu persis sebagaimana dahulu terjadi padaku. Apa pun yang kualami dalam kelahiran lampau—semuanya telah kuceritakan. Kini, setelah hayat ini berakhir, aku ditakdirkan menuju alam surga.

Verse 9

अभितसश्चापि गन्तव्यं मया स्वर्ग द्विजोत्तम,विप्रवर! पूर्वजन्ममें मेरे ऊपर जो कुछ बीता था, वह सब मैंने आपसे कह सुनाया। अब इस जीवनके पश्चात्‌ मुझे स्वर्गलोकमें जाना है

Wahai yang terbaik di antara para dwija, wahai brāhmaṇa utama! Kini aku harus berangkat menuju surga. Segala yang terjadi padaku dalam kelahiran lampau—yang membentuk arah hidupku—telah kukatakan. Dan ketika hidup ini berakhir, jalanku telah ditetapkan menuju alam surga.

Verse 10

ब्राह्मण उवाच एवमेतानि पुरुषा दुःखानि च सुखानि च । आप्ुवन्ति महाबुद्धे नोत्कण्ठां कर्तुमहसि,ब्राह्मण बोला--महामते! मनुष्य इसी प्रकार दुःख और सुख पाते रहते हैं। इसके लिये आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये

Sang brāhmaṇa berkata: “Wahai yang berakal agung, manusia memang mengalami duka dan suka dengan cara demikian. Karena itu, janganlah engkau larut dalam kegelisahan atau kerinduan yang mencemaskan.”

Verse 11

दुष्करं हि कृतं कर्म जानता जातिमात्मन: । लोक वृत्तान्ततत्त्वज्ञ नित्यं धर्मपरायण:,जिसके फलस्वरूप आपको अपने पूर्वजन्मकी बातोंका ज्ञान बना हुआ है, वह पिता- माताकी सेवारूप कर्म दूसरोंके लिये दुष्कर है; किंतु आपने उसे सम्पन्न कर लिया है। आप लोकवृत्तान्तका तत्त्व जानते हैं और सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं

Sungguh, engkau telah menuntaskan suatu perbuatan yang sukar dilakukan oleh orang lain. Karena pengetahuan tentang peristiwa kelahiranmu yang lampau tetap tinggal dalam dirimu, engkau mampu menjalankan dharma yang berat berupa bakti dan pelayanan kepada ayah dan ibu. Engkau memahami hakikat tata laku dunia, dan senantiasa berpegang teguh pada dharma.

Verse 12

कर्मदोषश्न वै विद्वन्नात्मजातिकृतेन ते । कज्चित्‌ कालमुष्यतां वै ततो5सि भविता द्विज:,विद्वन! आपको जो यह कर्मदोष (दूषित कर्म) प्राप्त हुआ है, वह आपके पूर्वजन्मके कर्मका फल है। इस जन्मके नहीं। अत: कुछ कालतक और इसी रूपमें रहें। फिर आप ब्राह्मण हो जायँगे

Wahai orang bijak, noda perbuatan yang menimpamu ini bukanlah buah dari tindakan pada kelahiran sekarang. Ini adalah hasil karma dari kehidupan terdahulu. Karena itu, tinggallah dalam keadaan ini untuk beberapa waktu lagi; kemudian engkau akan menjadi dvija (brahmana) kembali.

Verse 13

साम्प्रतं च मतो मे5सि ब्राह्मणो नात्र संशय: । ब्राह्मण: पतनीयेषु वर्तमानो विकर्मसु

Kini aku yakin bahwa engkau sungguh seorang brāhmaṇa—tanpa keraguan. Namun engkau adalah brāhmaṇa yang terlibat dalam perbuatan yang menjatuhkan martabat suci, dalam tindakan yang menyimpang dari tata laku benar.

Verse 14

यस्तु शूद्रो दमे सत्ये धर्मे च सततोत्थित:

Namun, seorang śūdra yang senantiasa teguh dalam pengendalian diri, kebenaran, dan dharma—

Verse 15

कर्मदोषेण विषमां गतिमाप्रोति दारुणाम्‌

Karena cacat karma, seseorang mencapai nasib yang keras dan timpang—suatu jalan hidup yang pedih.

Verse 16

कर्तुमहसि नोत्कण्ठां त्वद्विधा हविषादिन: । लोकवृत्तानुवृत्तज्ञा नित्यं धर्मपरायणा:,अतः आपको अपने विषयमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। आपके-जैसे ज्ञानी पुरुष, जो लोकवृत्तान्तके अनुवर्तनका रहस्य जाननेवाले तथा नित्य धर्मपरायण हैं, कभी विषादग्रस्त नहीं होते हैं

Engkau tidak patut menyerah pada kegelisahan. Orang sepertimu—bijaksana, berdisiplin, hidup dari persembahan suci, memahami cara bertindak selaras dengan tata laku dunia, dan senantiasa berpegang pada dharma—tidak akan tenggelam dalam keputusasaan.

Verse 17

व्याध उवाच प्रज्ञया मानसं दु:खं हन्याच्छारीरमौषधै: । एतद्‌ विज्ञानसामर्थ्य न बालै: समतामियात्‌,धर्मव्याधने कहा--ज्ञानी पुरुष शारीरिक कष्टका औषधसेवनद्वारा नाश करे और विवेकशील बुद्धिद्वारा मानसिक दुःखको नष्ट करे। यही ज्ञानकी शक्ति है। बुद्धिमान्‌ मनुष्यको बालकोंके समान शोक या विलाप नहीं करना चाहिये

Sang pemburu berkata: “Dengan kebijaksanaan, lenyapkan duka batin; dengan obat, hilangkan derita jasmani. Inilah daya sejati pengetahuan; orang bijak tidak patut meratap dan menangis seperti anak-anak.”

Verse 18

अनिष्टसम्प्रयोगाच्च विप्रयोगात्‌ प्रियस्प च । मनुष्या मानसैर्दु:खैर्युज्यन्ते चाल्पबुद्धय:,मन्दबुद्धि मनुष्य ही अप्रिय वस्तुके संयोग और प्रिय वस्तुके वियोगमें मानसिक दुःखसे दुःखी होते हैं

Karena berjumpa dengan yang tidak disukai dan berpisah dari yang dicintai, orang yang kurang pengertian terbelenggu oleh duka batin.

Verse 19

गुणैर्भूतानि युज्यन्ते वियुज्यन्ते तथैव च । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थान हि विद्यते,सभी प्राणी तीनों गुणोंके कार्यभूत विभिन्न वस्तु आदिसे जिस प्रकार संयुक्त होते हैं, वैसे ही वियुक्त भी होते रहते हैं। अतः किसी एकका संयोग और किसी एकका वियोग वास्तवमें शोकका कारण नहीं है

Semua makhluk berhubungan dengan hal-hal dan keadaan yang lahir dari tiga guṇa, dan demikian pula berpisah darinya. Ini hukum yang berlaku bagi semua; maka pertemuan atau perpisahan seseorang, pada hakikatnya, bukanlah tempat yang layak bagi duka.

Verse 20

अनिष्टं चान्वितं पश्यंस्तथा क्षिप्रं विरज्यते । ततकश्न प्रतिकुर्वन्ति यदि पश्यन्त्युपक्रमात्‌,यदि किसी कार्यमें अनिष्टका संयोग दिखायी देता है तो मनुष्य शीघ्र ही उससे निवृत्त हो जाता है। और यदि आरम्भ होनेसे पहले ही उस अनिष्टका पता लग जाता है तो लोग उसके प्रतीकारका उपाय करने लगते हैं

Bila seseorang melihat bahwa suatu usaha disertai unsur yang tidak baik, ia segera mengundurkan diri darinya. Dan bila ketidakberuntungan itu diketahui bahkan sebelum pekerjaan dimulai, orang-orang pun sejak awal menyiapkan penangkal dan langkah perbaikannya.

Verse 21

शोचतो न भवेत्‌ किंचित्‌ केवलं परितप्यते। परित्यजन्ति ये दुःखं सुखं वाप्युभयं नरा:,केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दु:ख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं। मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है

Dengan meratap, tak ada yang diperoleh; yang tersisa hanyalah bara yang membakar batin. Mereka yang melepaskan duka—bahkan juga suka, yakni keduanya—mencapai ketenteraman; sedangkan yang terkelabui tetap gelisah dalam ketidakpuasan, dan yang bijak meraih kepuasan melalui pengertian sejati.

Verse 22

त एव सुखमेधन्ते ज्ञानतृप्ता मनीषिण: । असंतोषपरा मूढा: संतोष॑ यान्ति पण्डिता:,केवल शोक करनेसे कुछ नहीं होता, संतापमात्र ही हाथ लगता है। जो ज्ञानतृप्त मनीषी मानव सुख और दु:ख दोनोंका परित्याग कर देते हैं, वे ही सुखी होते हैं। मूढ़ मनुष्य असंतोषी होते हैं और ज्ञानवानोंको संतोष प्राप्त होता है

Hanya para bijak yang puas oleh pengetahuan sejati yang benar-benar bertumbuh dalam kebahagiaan. Orang dungu yang dikuasai ketidakpuasan tetap gelisah; sedangkan kaum terpelajar mencapai kepuasan batin.

Verse 23

असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्‌ । न शोचन्ति गताध्वान: पश्यन्त: परमां गतिम्‌

Ketidakpuasan tak bertepi; tetapi kepuasan batin adalah kebahagiaan tertinggi. Mereka yang telah menuntaskan perjalanan hidup dan memandang tujuan tertinggi tidak lagi berduka.

Verse 24

असंतोषका अन्त नहीं है, अतः संतोष ही परम सुख है। जिन्होंने ज्ञानमार्गको पार करके परमात्माका साक्षात्कार कर लिया है, वे कभी शोकमें नहीं पड़ते हैं ।। न विषादे मन: कार्य विषादो विषमुत्तमम्‌ | मारयत्यकृतप्रज्ञं बाल॑ क्रुद्ध इवोरग:,मनको विषादकी ओर न जाने दे। विषाद उग्र विष है। वह क्रोधमें भरे हुए सर्पकी भाँति विवेकहीन अज्ञानी मनुष्यको मार डालता है

Jangan biarkan batin jatuh ke dalam keputusasaan; keputusasaan adalah racun yang paling ganas. Ia membinasakan orang bodoh yang belum terasah kebijaksanaannya, laksana ular yang murka.

Verse 25

यं विषादो$भिभवति विक्रमे समुपस्थिते । तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न विद्यते,पराक्रमका अवसर उपस्थित होनेपर जिसे विषाद घेर लेता है, उस तेजोहीन पुरुषका कोई पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता

Bila saat untuk keberanian dan tindakan tegas telah tiba, namun seseorang dikuasai keputusasaan, maka—karena kehilangan nyala batin—tak satu pun upayanya akan berhasil.

Verse 26

अवश्यं क्रियमाणस्य कर्मणो दृश्यते फलम्‌ । न हि निर्वेदमागम्य किंचित्‌ प्राप्नोति शोभनम्‌,किये जानेवाले कर्मका फल अवश्य दृष्टिगोचर होता है। केवल खिन्न होकर बैठ रहनेसे कोई अच्छा परिणाम हाथ नहीं लगता

Buah dari tindakan yang sungguh-sungguh dilakukan pasti tampak. Namun dengan sekadar tenggelam dalam putus asa dan meninggalkan usaha, seseorang tidak memperoleh apa pun yang patut dipuji.

Verse 27

अथाप्युपायं पश्येत दुःखस्य परिमोक्षणे | अशोचचन्नारभेतैवं मुक्तश्नाव्यसनी भवेत्‌,अतः दुःखसे छूटनेके उपायको अवश्य देखे। शोक और विषादमें न पड़कर आवश्यक कार्य आरम्भ कर दे। इस प्रकार प्रयत्न करनेसे मनुष्य निश्चय ही दुःखसे छूट जाता है और फिर किसी संकट या व्यसनमें नहीं फँसता

Karena itu, hendaknya seseorang mencari jalan untuk terbebas dari penderitaan. Tanpa tenggelam dalam duka dan putus asa, ia harus memulai apa yang wajib dilakukan. Dengan usaha demikian, seseorang pasti lepas dari kesedihan dan tidak lagi jatuh ke dalam malapetaka atau kebiasaan buruk.

Verse 28

भूतेष्वभावं संचिन्त्य ये तु बुद्धे: परं गता: । न शोचन्ति कृतप्रज्ञा: पश्यन्त: परमां गतिम्‌,संसारके सभी पदार्थ अनित्य हैं, ऐसा सोचकर जो बुद्धिसे पार होकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो गये हैं वे ज्ञानी महापुरुष परमात्माका साक्षात्कार करते हुए कभी शोकमें नहीं पड़ते

Dengan merenungkan ketidak-kekalan pada semua makhluk dan segala yang ada, mereka yang melampaui batas budi dan mencapai keadaan tertinggi—para bijak yang teguh—tidak berduka, karena memandang tujuan tertinggi.

Verse 29

न शोचामि च वै विद्वन्‌ कालाकाडुक्षी स्थितो हाहम्‌ | एतैर्निंदर्शनैर््रह्मयनू नावसीदामि सत्तम,विद्वन! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ। अत: कभी शोकमग्न नहीं होता। सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! उपर्युक्त विचारोंका मनन करते रहनेसे मुझे कभी दुःख या अनुत्साह नहीं होता

Wahai orang berilmu, aku tidak berduka; aku berdiri menanti waktuku yang telah ditetapkan (ajal). Karena itu aku tidak pernah tenggelam dalam kemurungan. Wahai brāhmaṇa yang utama di antara orang saleh, dengan terus merenungkan pertimbangan-pertimbangan ini, aku tidak jatuh ke dalam duka atau hilang semangat.

Verse 30

ब्राह्मण उवाच कृतप्रज्ञोडसि मेधावी बुद्धिर्हि विपुला तव । नाहं भवन्तं शोचामि ज्ञानतृप्तोडसि धर्मवित्‌,ब्राह्मण बोला--धर्मव्याध! आप ज्ञानी और बुद्धिमान हैं। आपकी बुद्धि विशाल है। आप धर्मके तत्त्वको जानते हैं और ज्ञानानन्दसे तृप्त रहते हैं। अत: मैं आपके लिये शोक नहीं करता

Sang brāhmaṇa berkata, “Engkau berpengertian teguh dan cerdas; akalmu luas. Engkau mengetahui hakikat dharma dan puas oleh pengetahuan; karena itu aku tidak berduka untukmu.”

Verse 31

आपूृच्छे त्वां स्वस्ति ते<स्तु धर्मस्त्वां परिरक्षतु । अप्रमादस्तु कर्तव्यो धर्मे धर्मभृतां वर,अब मैं जानेके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। आपका कल्याण हो और धर्म सदा आपकी रक्षा करे। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ व्याध! आप धर्माचरणमें कभी प्रमाद न करें

Sang brāhmana berkata: “Aku mohon izin untuk berpamitan dan berangkat. Semoga kesejahteraan menyertaimu, dan semoga Dharma senantiasa melindungimu. Wahai yang terbaik di antara para penegak dharma—wahai pemburu—jangan pernah lalai dalam menjalankan dharma.”

Verse 32

मार्कण्डेय उवाच बाढमित्येव तं व्याध: कृताञज्जलिरुवाच ह । प्रदक्षिणमथो कृत्वा प्रस्थितो द्विजसत्तम:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युधिष्ठिर! कौशिक ब्राह्मणकी बात सुनकर धर्मव्याधने हाथ जोड़कर कहा--“बहुत अच्छा! अब आप अपने घरको पधारें।” तदनन्तर विप्रवर कौशिक धर्मव्याधकी परिक्रमा करके वहाँसे चल दिया

Mārkaṇḍeya berkata: Sang pemburu, dengan kedua tangan terkatup hormat, menjawab, “Baiklah—demikian adanya.” Lalu brahmana terbaik itu mengelilinginya sebagai tanda hormat dan berangkat dari tempat itu.

Verse 33

स तु गत्वा द्विज: सर्वा शुश्रूषां कृतवांस्तदा । मातापितृभ्यां वृद्धाभ्यां यथान्यायं सुशंसित:,घर जाकर उस ब्राह्मणने अपने माता-पिताकी सब प्रकारकी सेवा-शुश्रूषा की और उन बूढ़े माता-पिताने प्रसन्न होकर उसकी यथायोग्य प्रशंसा की

Kemudian brahmana itu pulang ke rumah dan mencurahkan diri pada segala bentuk pelayanan serta perawatan bagi ayah-ibunya yang telah lanjut usia. Sang orang tua, puas dan berkenan, memujinya sebagaimana patut menurut kebenaran.

Verse 34

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं निखिलेन युधिष्छिर । पृष्टवानसि यं तात धर्म धर्मभूतां वर

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, semuanya telah kuceritakan kepadamu dengan lengkap, persis sebagaimana yang engkau tanyakan, wahai anakku. Wahai yang terbaik di antara para penegak dharma, inilah ajaran dharma yang engkau cari.”

Verse 35

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तात युधिष्ठिर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके अनुसार मैंने ये सब बातें कह सुनायीं ।। पतिव्रताया माहात्म्य॑ ब्राह्मणस्य च सत्तम । मातापित्रोश्व शुश्रूषा धर्मव्याधेन कीर्तिता,साधुश्रेष्ठट पतिव्रताका माहात्म्य और धर्मव्याथके द्वारा ब्राह्मणसे कही हुई माता- पिताकी सेवा आदिकी बातें बता दीं

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara orang-orang saleh, anakku! Sesuai dengan pertanyaanmu, semuanya telah kuceritakan. Wahai brahmana terbaik, telah kujelaskan kemuliaan seorang istri yang setia pada dharmanya, dan juga bakti melayani ayah-ibu—sebagaimana dipuji oleh pemburu yang saleh.”

Verse 36

युधिछिर उवाच गम: 2 ई; ब्रह्मन्‌ धमाख्यानमनुत्तमम्‌ | सर्व | श्रेष्ठ कथितं मुनिसत्तम,युधिष्ठिर बोले--ब्रह्म! आपने धर्मके विषयमें यह अत्यन्त अद्भुत और उत्तम उपाख्यान सुनाया है। मुनिवर! आप समस्त धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Brahmana, engkau telah menuturkan kisah tentang dharma yang tiada banding dan menakjubkan. Wahai resi termulia, apa yang kauucapkan adalah yang tertinggi; sungguh engkau yang terdepan di antara semua yang memahami dharma.”

Verse 37

सुखभश्रव्यतया विद्वन्‌ मुहूर्त इव मे गत: । न हि तृप्तो5स्मि भगवन्‌ शृण्वानो धर्ममुत्तमम्‌,विद्वन! यह कथा सुननेमें इतनी सुखद थी कि मेरा बहुत-सा समय भी दो घड़ीके समान बीत गया। भगवन्‌! आपके मुखसे यह धर्मकी उत्तम कथा सुनते-सुनते मुझे तृप्ति ही नहीं हो रही है

Wahai orang bijak, kisah ini begitu menyenangkan didengar sehingga rentang waktu yang panjang pun bagiku berlalu seakan hanya sekejap. Wahai yang mulia, meski aku terus mendengarkan ajaran dharma yang tertinggi ini dari bibirmu, aku belum juga merasa puas.

Verse 136

दाम्भिको दुष्कृतः प्रायः शूद्रेण सदृूशो भवेत्‌ । मैं तो अभी आपको ब्राह्मण मानता हूँ। आपके ब्राह्मण होनेमें संदेह नहीं है। जो ब्राह्मण होकर भी पतनके गर्तमें गिरानेवाले पापकर्मोंमें फँसा हुआ है और प्राय: दुष्कर्मपरायण तथा पाखंडी है, वह शूद्रके समान है

Seorang yang, meski berstatus brāhmaṇa, terjerat dalam perbuatan adharma yang menjerumuskan ke dalam kejatuhan, dan kebanyakan condong pada keburukan serta bersifat munafik dan congkak—ia dipandang setara dengan śūdra.

Verse 156

क्षीणदोषमहं मन्ये चाभितत्त्वां नरोत्तम | कर्मदोषसे ही मनुष्य विषम एवं भयंकर दुर्गतिमें पड़ जाता है। परंतु नरश्रेष्ठ! मैं तो समझता हूँ कि आपके सारे कर्मदोष सर्वथा नष्ट हो गये हैं

Sang brāhmaṇa berkata: “Wahai insan termulia, aku memandang engkau sebagai seseorang yang noda-nodanya telah terkikis dan yang telah mencapai kebenaran. Sebab karena cacat perbuatanlah manusia jatuh ke dalam kesengsaraan yang berat dan mengerikan. Namun engkau, wahai yang terdepan di antara manusia—kupahami bahwa segala cela perbuatanmu telah lenyap sepenuhnya.”

Verse 216

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे षोडशाधिकद्विशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—di bawah bagian ringkasan ajaran yang berkaitan dengan Mārkaṇḍeya—berakhir bab ke-216, yakni dialog antara brāhmaṇa dan pemburu.

Verse 736

आश्रमं च मया नीतो न च प्राणैर्व्ययुज्यत । नरश्रेष्ठ फिर उन्होंने ही मेरे ऊपर अनुग्रह किया। द्विजश्रेष्ठ। तदनन्तर मैंने उनके शरीरसे बाण निकाला और उन्हें उनके आश्रमपर पहुँचा दिया। परंतु उनके प्राण नहीं गये

Aku membawanya sampai ke āśrama (pertapaannya), namun napas-hidupnya tidak terpisah darinya. Wahai yang terbaik di antara manusia, wahai yang terbaik di antara para dwija! Setelah itu kucabut anak panah dari tubuhnya dan kuantarkan ia ke āśramanya; namun demikian, nyawanya tidak juga pergi.

Verse 1436

त॑ ब्राह्मणमहं मन्ये वृत्तेन हि भवेद्‌ द्विज: । इसके विपरीत जो शूद्र होकर भी (शम,) दम, सत्य तथा धर्मका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहता है, उसे मैं ब्राह्मण ही मानता हूँ; क्योंकि मनुष्य सदाचारसे ही द्विज होता है

Aku memandang seseorang sebagai Brāhmaṇa karena laku hidupnya; sebab dengan hidup benar seseorang sungguh menjadi ‘dwija’. Sebaliknya, meski terlahir sebagai Śūdra, bila ia senantiasa tekun menjalankan pengendalian diri, pengekangan, kebenaran, dan dharma, aku pun menganggapnya Brāhmaṇa—karena hanya keluhuran budi yang menjadikan seseorang benar-benar dwija.

Frequently Asked Questions

The implied tension is how a community interprets and responds to threats against vulnerable dependents (pregnancy/infancy): whether through panic and blame, or through structured protective duties—ritual, vigilance, and socially shared responsibility.

Power is narratively framed as morally ambivalent and context-dependent; therefore, stability is pursued through disciplined veneration, clear role-assignment (protector/guardian), and differentiated recognition of forces deemed beneficial or harmful.

No explicit phalāśruti is stated in the provided verses; the closest meta-structuring element is the etiological closure that anchors the account to calendrical markers (pañcamī/ṣaṣṭhī), implying ritual-memory value rather than a declared salvific reward.