Varaha Purana - Adhyaya 39
Varaha PuranaAdhyaya 3976 Shlokas

Adhyaya 39: Discrimination of the Three Bodies and the Dharaṇī Vow: A Manual for Dvādaśī Observance

Śarīra-traya-vivekaḥ tathā Dharaṇī-vrata-dvādaśī-kalpaḥ

Ritual-Manual and Ethical-Discourse (with cosmological framing)

Framed as a didactic exchange (mapped here to Varāha and Pṛthivī as the chapter’s emblematic interlocutors), the chapter first classifies embodied existence into a threefold schema: a prior “pāpa”-condition, a present “dharma”-condition, and a third atīndriya (supersensory) condition associated with yātanā and bhoga. The inquiry then shifts to how brahman is attained when “vijñāna-śarīra” is not manifest, prompting an explanation of the interdependence of karma and jñāna. The text identifies the supreme brahman with Nārāyaṇa and introduces an accessible, low-resource vrata modeled on Earth (Dharaṇī) when she sank to rasātala: a Mārgasīrṣa-timed Dvādaśī fast with prescribed pūjā, bathing rites, mantra-utterances, kalaśa arrangements, brāhmaṇa-gifting, and stated spiritual and social benefits, emphasizing restoration and terrestrial stability.

Speakers

VarāhaPṛthivī

Key Concepts

śarīra-traya (pāpa–dharma–atīndriya) and modes of yātanā/bhogakarma–jñāna interdependence in brahman-attainmentparama-brahman identified with Nārāyaṇa (puṇḍarīkākṣa)Dharaṇī-vrata / Dvādaśī-kalpa as an accessible ritual technologyEarth’s descent to rasātala and restoration as ecological-ethical allegorydāna, brāhmaṇa-feeding, guru-adhikāra, and restrictions on transmissioncosmological time-reckoning (yuga, manvantara, brahmāyus) as phala-frame
Recitation with translationVaraha Purana Adhyaya 39

Shlokas in Adhyaya 39

Verse 1

सत्यतपा उवाच । भगवन् द्वे शरीरे तु इति यत्परिकीर्तितम् । तन्मे कथय भेदं वै के ते ब्रह्मविदां वर ॥ ३९.१ ॥

सत्यतप ने पूछा, भगवान, लोग कहते हैं कि दो शरीर होते हैं। आप मुझे समझाओ कि दोनों में क्या फरक है। आप तो ब्रह्मा को जानने वाले में बड़े हैं।

Verse 2

दुर्वासा उवाच । न द्वे त्रीणि शरीराणि वाच्यं तद्विपरीतकम् । विभोगायतनं चैव त्रिशरीराणि प्राणिनाम् ॥ ३९.२ ॥

दुर्वासा ने कहा, नहीं, दो या तीन शरीर मत कहना। उल्टा, यह समझो कि इंसान के पास तीन शरीर होते हैं। इन्हीं में वो अपने करम का फल भोगता है।

Verse 3

प्रागवस्थमधर्माख्यं परिज्ञानविवर्जितम् । अपरं सव्रतं तद्धि ज्ञेयमत्यन्तधार्मिकम् ॥ ३९.३ ॥

जो पहले का टाइम है, उसको अधर्म कहते हैं। उसमे समझ नहीं होती कि क्या सही है। जो बाद का टाइम है, उसमे व्रत और नियम फॉलो करते हैं। यह धरम के सबसे करीब है।

Verse 4

धर्माधर्मोपभोगाय यत् तृतीयमतीन्द्रियम् । तत्त्रिभेदं विनिर्दिष्टं ब्रह्मविद्भिर्विचक्षणैः । यातना धर्मभोगश्च भुक्तिश्चेति त्रिभेदकम् ॥ ३९.४ ॥

तीसरा शरीर इंद्रियों से परे है। इसमे धरम और अधर्म दोनों का फल मिलता है। ज्ञानी लोग इसको तीन हिस्सों में बाँटे हैं, पहला, तकलीफ; दूसरा, अच्छे करम का फल; तीसरा, नॉर्मल सुख।

Verse 5

यस्तु भावः पुरा ह्यासीत् प्राणिनो निघ्नतः स वै । तत्पापाख्यं शरीरं ते पापसंज्ञं तदुच्यते ॥ ३९.५ ॥

अगर किसी इंसान के मन में पहले से ही किसी को मारने की इच्छा होती है, तो वो इच्छा उसके लिए एक शरीर बन जाती है। इसको पाप का शरीर कहते हैं। यह पाप का नाम है।

Verse 6

इदानीं शुभवृत्तिं तु कुर्वतस्तप आर्जवम् । अपरं धर्मरूपं तु शरीरं ते व्यवस्थितम् । तेन वेदपुराणानि ज्ञातुमर्हस्यसंशयम् ॥ ३९.६ ॥

अब तुम अच्छा काम कर रहे हो, तपस्या और सीधे रास्ते पे चल रहे हो। इसलिए तुम्हे एक नया शरीर मिला है जो धरम से बना है। अब तुम वेद और पुराण समझ सकते हो, कोई शक नहीं।

Verse 7

यदाष्टकं संपरिवर्तते पुमां- स्तदा त्र्यवस्थः परिकीर्त्यते तु वै । गताष्टवर्गस्त्रिगतः सदा शुभः स्थिरो भवेदात्मनि निश्चयात्मवान् ॥ ३९.७ ॥

जब आठ चीज़ें इंसान के अंदर बदल जाती हैं, तब तीन स्थितियाँ बन जाती हैं। आठ से आगे बढ़के तीन तक पहुँच जा, इंसान हमेशा अच्छा रहता है। पक्का इरादा रखो, तो मन में स्थिर हो जाओगे।

Verse 8

यदा पञ्च पुनः पञ्च पञ्च पञ्चापि संत्यजेत् । एकमार्गस्तदा ब्रह्म शाश्वतं लभते नरः ॥ ३९.८ ॥

जब इंसान पाँच चीज़ें छोड़ दे, फिर पाँच और, और फिर पाँच गुना पाँच भी। तब वो एक ही रास्ते पे चल पड़ा। उसी रास्ते से वो ब्रह्मन को पा लेता है जो हमेशा से है।

Verse 9

सत्यतपा उवाच । भगवन् यदि विज्ञानं शरीरं नोपजायते । तदा केन प्रकारेण परं ब्रह्मोपलभ्यते ॥ ३९.९ ॥

सत्यतपा ने पूछा। भगवान, अगर ज्ञान वाला शरीर भी नहीं बनता। तो फिर वो ब्रह्मन को कैसे समझ आएगा? कैसे मिलता है?

Verse 10

दुर्वासा उवाच । कर्मकाण्डं ज्ञानमूलं ज्ञानं कर्मादिकं तथा । एतयोरन्तरं नास्ति यथाश्ममृदयोर्मुने ॥ ३९.१० ॥

दुर्वासा ने कहा। कर्म और ज्ञान, दोनों एक दूसरे से जुड़ते हैं। कर्म ज्ञान से शुरू होता है, ज्ञान कर्म से। इन दोनों में कोई फर्क नहीं, जैसे पत्थर और मिट्टी में भी नहीं होता, हे मुनिराज।

Verse 11

कर्मकाण्डं चतुर्भेदं ब्राह्मणादिषु कीर्तितम् । तत्र वेदोक्तकर्माणि त्रयः कुर्वन्ति नित्यशः । त्रिशुश्रूषामथैकस्तु एषा वेदोदिता क्रिया ॥ ३९.११ ॥

वेद में लिखे हुए काम चार तरह के हैं, ब्राह्मण से शुरू करके। इनमें से तीन लोग वेद के हिसाब से काम करते रहते हैं। एक सिर्फ दूसरों की सेवा करता है। यह भी वेद का ही काम है।

Verse 12

एतान् धर्मानवस्थाय ब्रह्मणोपास्तिं रोचते । तस्य मुक्तिर्भवेन्नूनं वेदवादरतस्य च ॥ ३९.१२ ॥

जब इंसान इन सब धरम में स्थिर हो जाता है, तब ब्रह्मा की भक्ति उसको अच्छी लगने लगती है। जो लोग वेद की बातों में लगे रहते हैं, उनको मुक्ति ज़रूर मिलती है।

Verse 13

सत्यतपा उवाच । यदेतत् परमं ब्रह्म त्वया प्रोक्तं महामुने । तस्य रूपं न जानन्ति योगिनोऽपि महात्मनः ॥ ३९.१३ ॥

सत्यतपा ने कहा, महा-मुनि, आपने जो परम ब्रह्मा के बारे में बताया, वो बहुत बड़ी चीज़ है। लेकिन बड़े-बड़े योगी भी उसका रूप नहीं जानते।

Verse 14

अनाममसगोत्रं च अमूर्तं मूर्तिवर्जितम् । कथं स ज्ञायते ब्रह्म संज्ञानामविवर्जितम् । तस्य संज्ञां कथय मे वेदमागविवस्थिताम् ॥ ३९.१४ ॥

उसका कोई नाम नहीं, कोई वंश नहीं। न कोई शकल है, न कोई बॉडी। फिर वो ब्रह्मा को कैसे जाना जाए? आप मुझे बताओ कि उसको क्या कहते हैं, वेद में कैसे लिखा है।

Verse 15

दुर्वासा उवाच । यदेतत् परमं ब्रह्म वेदव्यासेषु पठ्यते । स देवः पुण्डरीकाक्षः स्वयं नारायणः परः ॥ ३९.१५ ॥

दुर्वासा ने कहा, वेद और व्यास के ग्रंथों में जो परम ब्रह्मा लिखा है, वो देवता कौन है? वो पुंडरीकाक्ष है, नारायण खुद, जो सबसे परे हैं।

Verse 16

स यज्ञैर्विविधैरिष्टैर्दानैर्दत्तैश्च सत्तम । प्राप्यते परमो देवः स्वयं नारायणो हरिः ॥ ३९.१६ ॥

अच्छे लोग, बहुत तरह के यज्ञ करके और दान देके नारायण भगवान को पा सकते हैं। यज्ञ सही तरीके से होना चाहिए और दान भी सही जगह देना चाहिए। हरि भगवान खुद मिलते हैं जब आप यह सब करते हो।

Verse 17

सत्यतपा उवाच । भगवन् बहुवित्तेन ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः । प्राप्यते पुण्यकृद्भिर्हि क्वचिद्यज्ञः कथञ्चन । तेन प्राप्तेन भगवान् लभ्यते दुःखतो हरिः ॥ ३९.१७ ॥

सत्यतपा ने पूछा, भगवान, यज्ञ करना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत पैसा चाहिए और पंडित भी चाहिए जो वेद जानते हों। जो लोग पुण्य करते हैं, वो कभी-कभी यज्ञ कर पाते हैं। फिर भी, हरि भगवान जो दुख दूर करते हैं, उन्हें कैसे मिल सकते हैं?

Verse 18

वित्तेन च विना दानं दातुं विप्र न शक्यते । विद्यमानेऽपि न मतिः कुटुम्बासक्तचेतसः । तस्य मोक्षः कथं ब्रह्मन् सर्वथा दुर्लभो हरिः ॥ ३९.१८ ॥

पैसा नहीं तो दान कैसे दोगे? लेकिन पैसा होने पे भी लोग दान नहीं करते। घर परिवार में ही फंस के रहते हैं। उनका मन दान करने का नहीं होता। ऐसे लोगों का मोक्ष कैसे होगा? हरि भगवान उन्हें बहुत मुश्किल से मिलते हैं।

Verse 19

अल्पायासेन लभ्येत येन देवः सनातनः । तन्मे सामान्यतो ब्रूहि सर्ववर्णेषु यद्भवेत् ॥ ३९.१९ ॥

मुझे ऐसा बताओ जो सबसे आसान हो। कम मेहनत में भगवान कैसे मिल सकते हैं? जो बात सब जगह चले, चाहे कोई भी वर्ण हो। कोई सिंपल तरीका बताओ।

Verse 20

दुर्वासा उवाच । कथयामि परं गुह्यं रहस्यं देवनिर्मितम् । धरण्या यत्कृतं पूर्वं मज्जन्त्या तु रसातले ॥ ३९.२० ॥

दुर्वासा ने कहा, मैं तुम्हें एक बड़ा राज़ बताता हूँ। यह देवियों ने बनाया था। जब पृथ्वी नीचे डूब रही थी, उसने क्या किया था वो सुनो।

Verse 21

पृथिव्याः पार्थिवो भावः सलिले नातिरेचितः । तस्मिन् सलिलमग्ने तु पृथिवी प्रायाद्रसातलम् ॥ ३९.२१ ॥

धरती का सॉलिड हिस्सा पानी में ज़्यादा नहीं था। लेकिन जब पानी बढ़ गया, धरती नीचे चली गई। वो रसातल तक पहुँच गई।

Verse 22

सा भूतधारिणी देवी रसातलगता शुभा । आराधयामास विभुं देवं नारायणं परम् । उपवासव्रतैर्देवी नियमैश्च पृथग्विधैः ॥ ३९.२२ ॥

धरती मा ने रसातल में जाकर नारायण भगवान की पूजा की। उन्होंने व्रत रखा और नियम फॉलो किए। भगवान से प्राय किया।

Verse 23

कालेन महता तस्याः प्रसन्नो गरुडध्वजः । उज्जहार स्थितौ चेमां स्थापयामास सोऽव्ययः ॥ ३९.२३ ॥

बहुत टाइम बाद नारायण भगवान खुश हो गए। उन्होंने धरती को उठाया और वापस सही जगह पे सेट कर दिया। अब वो पक्की हो गई है।

Verse 24

सत्यतपा उवाच । कोऽसौ धरन्या सञ्चीर्ण उपवासो महामुने । कानि व्रतानि च तथा एतन्मे वक्तुमर्हसि ॥ ३९.२४ ॥

सत्यतपा ने पूछा, बड़े रिशि, धरती के लिए कौनसा व्रत रखते हैं? और कौनसे नियम फॉलो करना पड़ता है? आप मुझे बताइए।

Verse 25

दुर्वासा उवाच । यदा मार्गशिरे मासि दशम्यां नियतात्मवान् । कृत्वा देवार्चनं धीमानग्निकार्यं यथाविधि ॥ ३९.२५ ॥

दुर्वासा ने कहा, मार्गशिर्ष महीने की दशमी को व्रत रखना चाहिए। पहले भगवान की पूजा करो। फिर अग्नि के साथ सही विधि से कार्य करो।

Verse 26

शुचिवासाः प्रसन्नात्मा हव्यं अन्नं सुसंस्कृतम् । भुक्त्वा पञ्चपदं गत्वा पुनः शौचं तु पादयोः ॥ ३९.२६ ॥

साफ कपडे पहनो और दिल से शांत रहो। अच्छा खाना खाओ जो भगवान के लिए शुरू किया हो। खाने के बाद पाँच कदम चलो। फिर पाँव साफ करो।

Verse 27

कृत्वाऽष्टाङ्गुलमात्रं तु क्षीरवृक्षसमुद्भवम् । भक्षयेद् दन्तकाष्ठं तु तत आचम्य यत्नतः ॥ ३९.२७ ॥

आठ उंगली लंबी लकड़ी ले लो। वो भी ऐसे पेड़ से जो दूध निकालता है। उस्से दाँत साफ करो। फिर पानी पी के मुँह साफ करो, ध्यान से।

Verse 28

स्पृष्ट्वा द्वाराणि सर्वाणि चिरं ध्यात्वा जनार्दनम् । शङ्खचक्रगदापाणिं किरीटिं पीतवाससम् ॥ ३९.२८ ॥

घर के सारे दरवाज़े छो लो। फिर विष्णु का ध्यान करो, लंबे समय तक। शंख और चक्र और गदा उनके हाथ में है। सर पे क्राउन है और पीले कपडे पहने हैं।

Verse 29

प्रसन्नवदनं देवं सर्वलक्षणलक्षितम् । ध्यात्वा पुनर्जलं हस्ते गृहीत्वा भानुं जनार्दनम् ॥ ३९.२९ ॥

फिर से उस भगवान का ध्यान करो। चेहरा खुशियों भरा है, बिल्कुल साफ और अच्छा। हाथ में पानी लो। सूरज और विष्णु को याद करो।

Verse 30

ध्यात्वा अर्ध्यं दापयेत् तस्य करतोयेन मानवः । एवमुच्चारयेद् वाचं तस्मिन् काले महामुने ॥ ३९.३० ॥

ध्यान करके उस पानी से भगवान को अर्घ्य दो। हाथ का पानी ऊपर की तरफ से छोड़ो। और उस वक्त यह बोलना है, बड़े रिशि।

Verse 31

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाहमपरेऽहनि । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥ ३९.३१ ॥

एकादशी को मैं बिना खाये रहूँगा, अगले दिन खाऊँगा। भगवान, तुम्हारे पास मैं शरणा आता हूँ। तुम मेरी रक्षा करो।

Verse 32

एवमुक्त्वा ततो रात्रौ देवदेवस्य सन्निधौ । जपन्नारायणायेति स्वपेत् तत्र विधानतः ॥ ३९.३२ ॥

यह कह के रात को भगवान के पास सो जाना। सोते वक्त नारायण-नारायण जापना। यह सही तरीका है।

Verse 33

ततः प्रभाते विमले नदीं गत्वा समुद्रगाम् । इतरां वा तडागं वा गृहे वा नियतात्मवान् ॥ ३९.३३ ॥

सुबह जब साफ हो, नदी या तालाब पे जाके नहा लो। समुंदर वाली नदी हो तो और भी अच्छा। घर पे भी स्नान कर सकते हो अगर बाहर ना जा सको।

Verse 34

आनीय मृत्तिकां शुद्धां मन्त्रेणानेन मानवः । धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा । तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते ॥ ३९.३४ ॥

साफ मिट्टी लाओ और यह मंत्र बोलो। देवी, तुम सब जीवों को पालते हो और खाना देते हो। यह सच है, तो मेरे पाप मुझसे दूर कर दो।

Verse 35

ब्रह्माण्डोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि देव ते । तेनैमां मृत्तिकां स्पृष्ट्वा मा लभामि त्वयोदिताम् ॥ ३९.३५ ॥

भगवान, तुमने अपने हाथ से सारे तीर्थ छूए हैं। इसलिए यह मिट्टी छू के मैं वो पाना चाहता हूँ जो तुमने बताया है।

Verse 36

त्वयि सर्वे रसाः नित्याः स्थिताः वरुण सर्वदा । तेनैमां मृत्तिकां प्लाव्य पूतां कुरु ममाचिरम् ॥ ३९.३६ ॥

हे वरुण, सारी रसें तुम्हारे पास हमेशा रहती हैं। इसलिए यह मिट्टी पानी में भिगो के जल्दी साफ कर दो मेरे लिए।

Verse 37

एवं मृदं तथा तोयं प्रसाद्यात्मानमालभेत् । त्रिः कृत्वा शेषमृदया कुण्डमालिख्य वै जले ॥ ३९.३७ ॥

मिट्टी और पानी को ऐसे ही तैयार करके अपने ऊपर लगाना है। तीनी बार यह करो। फिर बची हुई मिट्टी से पानी में एक कुंड बनाओ।

Verse 38

ततस्तत्र नरः सम्यक् चक्रवर्त्युपचारतः । स्नात्वा चावश्यकं कृत्वा पुनर्देवगृहं व्रजेत् ॥ ३९.३८ ॥

फिर वहाँ जाके राजा की तरह सारी सेवा करनी है। नहाना है, अपना काम पूरा करना है। फिर वापस मंदिर जाना है।

Verse 39

तत्राराध्य महायोगिं देवं नारायणं प्रभुम् । केशवाय नमः पादौ कटिं दामोदराय च ॥ ३९.३९ ॥

वहाँ जाके नारायण भगवान की पूजा करनी है। केशव को पैरों में नमन करो। दामोदर को कमर पे नमन करो।

Verse 40

ऊरुयुग्मं नृसिंहाय उरः श्रीवत्सधारिणे । कण्ठं कौस्तुभनाथाय वक्षः श्रीपतये तथा ॥ ३९.४० ॥

नरसिंह को टांगों का नमन करो। श्रीवत्स धारण करने वाले को छाती का नमन करो। कौस्तुभ मणि के स्वामी को गला का नमन करो। श्री पति को भी छाती का नमन करो।

Verse 41

त्रैलोक्यविजयायेति बाहू सर्वात्मने शिरः । रथाङ्गधारिणे चक्रं शंकरायेति वारिजम् ॥ ३९.४१ ॥

हाथ भगवान को समर्पित करते वक्त कहते हैं, तीनो दुनिया जीतने वाले को। सिर समर्पित करते वक्त कहते हैं, सबकी आत्मा वाले को। चक्र समर्पित करते वक्त कहते हैं, रथ का चक्र धारण करने वाले को। और कमल समर्पित करते वक्त कहते हैं, शंकर को।

Verse 42

गम्भीरायेति च गदामम्भोजं शान्तिमूर्त्तये । एवमभ्यर्च्य देवेशं देवं नारायणं प्रभुम् ॥ ३९.४२ ॥

गदा समर्पित करते वक्त कहते हैं, गंभीर वाले को। और कमल समर्पित करते वक्त कहते हैं, शांति रूप वाले को। ऐसे ही देवों के स्वामी नारायण भगवान की पूजा करनी चाहिए। वो सबके प्रभु हैं।

Verse 43

पुनस्तस्याग्रतः कुम्भान् चतुरः स्थापयेद् बुधः । जलपूर्णान् समाल्यांश्च सितचन्दनलेपितान् ॥ ३९.४३ ॥

फिर से भगवान के सामने चार मटका रखने हैं। वो समझदार इंसान यह करेगा। मटके पानी से भरे हों, साफ-सुथरे हों, और ऊपर सफेद चंदन लगा हो।

Verse 44

चूतपल्लवसग्रीवान् सितवस्त्रावगुण्ठितान् । स्थगितान् ताम्रपात्रैश्च तिलपूर्णैः सकाञ्चनैः ॥ ३९.४४ ॥

मटकों के गले में आम के पत्ते की माला होनी चाहिए। ऊपर से सफेद कपड़ा ढकना है। और कॉपर के बर्तन से मुंह बंद करना है। उसमे तिल भरना है और सोने के साथ रखना है।

Verse 45

चत्वारस्ते समुद्रास्तु कलशाः परिकीर्तिताः । तेषां मध्ये शुभं पीठं स्थापयेद्वस्त्रगर्भितम् ॥ ३९.४५ ॥

इन चारों मटकों को समुद्र बोला जाता है। इनके बीच में एक अच्छा चबूतरा बनाना है। उसमे कपड़ा बिछाना है अंदर।

Verse 46

तस्मिन् सौवर्णरौप्यं वा ताम्रं वा दारवं तथा । अलाभे सर्वपात्राणां पालाशं पात्रमिष्यते ॥ ३९.४६ ॥

उस पूजा के लिए, बर्तन सोना या चाँदी का हो सकता है। या फिर ताँबे का भी चलेगा। लकड़ी का भी ठीक है। अगर कुछ भी न मिले, तो पलाश लकड़ी का बर्तन इस्तेमाल कर सकते हो।

Verse 47

तोयपूर्णं तु तत्कृत्वा तस्मिन् पात्रे ततो न्यसेत् । सौवर्णं मत्स्यरूपेण कृत्वा देवं जनार्दनम् । वेदवेदाङ्गसंयुक्तं श्रुतिस्मृतिविभूषितम् ॥ ३९.४७ ॥

उस बर्तन में पानी भरो। फिर उसमें सोना का मछली की शकल का मूर्ति रख दो। यह विष्णु भगवान का रूप है। यह वेद और वेदांग के साथ है, और श्रुत-स्मृति से सजा है।

Verse 48

तत्रानेकविधैर्भक्षैः फलैः पुष्पैश्च शोभितम् । गन्धधूपैश्च वस्त्रैश्च अर्चयित्वा यथाविधि ॥ ३९.४८ ॥

वहाँ बहुत सारे खाने की चीज़ें रख दो। फल और फूल भी लगाओ। इत्र, अगरबत्ती और कपड़े से पूजा करो। सब कुछ विधि के हिसाब से करना है।

Verse 49

रसातलगता वेदा यथा देव त्वयाहृताः । मत्स्यरूपेण तद्वन्मां भवानुद्धर केशव ॥ एवमुच्चार्य तस्याग्रे जागरं तत्र कारयेत् ॥ ३९.४९ ॥

बोलो, जैसे तूने मछली बन के वेद को नीचे से उठाया था, वैसे ही मुझे भी उठा ले केशव। यह बोल के वहाँ जागरण करो। रात भर जाग के भगवान के सामने बैठो।

Verse 50

यथाविभवसारेण प्रभाते विमले तथा । चतुर्णां ब्राह्मणानां च चतुरो दापयेद् घटान् ॥ ३९.५० ॥

जब साफ सुबह हो, अपने हिसाब से चार घड़े दो। चार ब्राह्मण को चार घड़े देने हैं। जो तुम्हारी हालत हो, उसके हिसाब से करो।

Verse 51

पूर्वं तु बह्वृचे दद्याच्छन्दोगे दक्षिणं तथा । यजुःशाखान्विते दद्यात् पश्चिमं घटमुत्तमम् । उत्तरं कामतो तद्यादेष एव विधिः स्मृतः ॥ ३९.५१ ॥

पहले हिस्से को ऋग्वेदी पंडित को दो, जो पूरव साइड का है। फिर दक्षिण साइड का हिस्सा सामवेदी पंडित को देना। जो यजुर्वेदी पंडित हो, उसको पश्चिम साइड एक अच्छा घड़ा दो। उत्तर साइड का हिस्सा जिसको चाहो उसको दे सकते हो। यही सही तरीका है जो बताया गया है।

Verse 52

ऋग्वेदः प्रीयतां पूर्वे सामवेदस्तु दक्षिणे । यजुर्वेदः पश्चिमतो अथर्वश्चोत्तरेण तु ॥ ३९.५२ ॥

ऋग्वेद के लिए पूरव डायरेक्शन में पूजा करो। सामवेद के लिए दक्षिण डायरेक्शन में। यजुर्वेद के लिए पश्चिम डायरेक्शन में। और अथर्ववेद के लिए उत्तर डायरेक्शन में। हर वेद अपनी डायरेक्शन में खुश हो।

Verse 53

अनेन क्रमयोगेन प्रीयतामिति वाचयेत् । मत्स्यरूपं च सौवर्णमाचार्याय निवेदयेत् ॥ ३९.५३ ॥

इस सही क्रम से यह बोलना है कि सब खुश हों। गुरु को सोना देने का है, मछली के शेप में। यह सब सही से करना है।

Verse 54

गन्धधूपादिवस्त्रैश्च सम्पूज्य विधिवत् क्रमात् । यस्त्विमं सरहस्यं च मन्त्रं चैवोपपादयेत् । विधानं तस्य वै दत्त्वा फलं कोटिगुणोत्तरम् ॥ ३९.५४ ॥

इत्र, अगरबत्ती, कपड़े और ऐसी चीज़ें लेकर सही से पूजा करो। जो यह मंत्र और इसका राज़ सही से समझाए, उसको पूरा विधान बता दो। उसका फल एक करोड़ गुना ज़्यादा मिलता है।

Verse 55

प्रतिपद्य गुरुं यस्तु मोहाद् विप्रतिपद्यते । स जन्मकोटि नरके पच्यते पुरुषाधमः । विधानस्य प्रदाता यो गुरुरित्युच्यते बुधैः ॥ ३९.५५ ॥

जो गुरु को मान के फिर उसके अगेंस्ट चला जाए, वो इंसान बहुत बुरा है। वो एक करोड़ जनम तक नरक में पकता रहेगा। जो सही विधान बताए, उसको ही गुरु कहते हैं समझदार लोग।

Verse 56

एवं दत्त्वा विधानॆन द्वादश्यां विष्णुमर्च्य च । विप्राणां भोजनं कुर्याद् यथाशक्त्या सदक्षिणम् ॥ ३९.५६ ॥

इस तरह दान करके, द्वादशी को विष्णु की पूजा करो। फिर पंडित लोगों को खाना खिलाओ, अपनी हिम्मत के हिसाब से उन्हे दान भी दो।

Verse 57

ताम्रपात्रैश्च सतीलैः स्थगितान् कारयेद् घटान् । तत्र सज्जलपात्रस्थं ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥ ३९.५७ ॥

तांबे के बर्तन से ढाके हुए घड़े बनाओ, उनमे तिल डाल के। फिर एक घर वाले पंडित को पानी भरा हुआ बर्तन दो।

Verse 58

देवं दद्यान्महाभागस्ततो विप्रांश्च भोजयेत् । भूरीणा परमान्नेन ततः पश्चात् स्वयं नरः । भुञ्जीत सहितो बालैर्वाग्यतः संयतेन्द्रियः ॥ ३९.५८ ॥

और हाँ, भगवान को पहले भोग लगाओ। उसके बाद पंडित लोगों को अच्छा खाना खिलाओ। फिर तुम खुद बच्चों के साथ बैठ के खाना खाओ। बात कम करो, मन शांत रखो।

Verse 59

अनेन विधिना यस्तु धरणीव्रतकृन्नरः । तस्य पुण्यफलं चाग्र्यं शृणु बुद्धिमतां वर ॥ ३९.५९ ॥

जो कोई इस व्रत को इस तरह करता है, उसका बहुत अच्छा फल मिलता है। सुनो, यह समझदार लोगों के लिए खास बात है।

Verse 60

यदि वक्त्रसहस्राणि भवन्ति मम सुव्रत । आयुश्च ब्रह्मणस्तुल्यं भवेद्यदि महाव्रत ॥ ३९.६० ॥

और हाँ, भगवान को पहले भोग लगाओ। उसके बाद पंडित लोगों को अच्छा खाना खिलाओ। फिर तुम खुद बच्चों के साथ बैठ के खाना खाओ। बात कम करो, मन शांत रखो।

Verse 61

तदानीमस्य धर्मस्य फलं कथयितुं भवेत् । तथाप्युद्देशतो ब्रह्मन् कथयामि शृणुष्व तत् ॥ ३९.६१ ॥

अब इस धरम का फल बताने का टाइम आ गया है। मैं सिर्फ आउटलाइन में बताऊंगा, ब्राह्मण, ध्यान से सुन।

Verse 62

दश सप्त दश द्वे च अष्टौ चत्वार एव च । लक्षायुतानि चत्वारि एकस्थं स्याच्चतुर्युगम् ॥ ३९.६२ ॥

दस, सत्रह, दस, दो। और आठ, और चार। चार लाख और अयुता मिलके एक चतुरयुग बनता है।

Verse 63

तैरेकसप्ततियुगं भवेन्मन्वन्तरं मुने । चतुर्दशाहो ब्राह्मस्तु तावती रात्रिरिष्यते ॥ ३९.६३ ॥

मुनि, एक मन्वन्तर में ७१ युग होते हैं। ब्रह्मा का दिन चौदह मन्वन्तरों का होता है। रात भी उतनी ही लम्बी होती है।

Verse 64

एवं त्रिंशद्दिनो मासस्ते द्वादश समाः स्मृताः । तेषां शतं ब्रह्मणस्तु आयुर्नास्त्यत्र संशयः ॥ ३९.६४ ॥

तीस दिन का एक महीना होता है। बारह महीने का एक साल। ब्रह्मा की उम्र सौ साल की होती है, इसमे कोई शक नहीं।

Verse 65

यः सकृद्द्वादशीमेतामनेन विधिना क्षिपेत् । स ब्रह्मलोकमाप्नोति तत्कालं चैव तिष्ठति ॥ ३९.६५ ॥

जो एक बार भी इस तरह से द्वादशी व्रत करे, वो ब्रह्मा लोक पा लेता है। वहाँ वो उस पूरी ताकत तक रहता है।

Verse 66

ततो ब्रह्मोपसंहारे तल्लयं तिष्ठते चिरम् । पुनः सृष्टौ भवेद् देवो वैराजानां महातपाः ॥ ३९.६६ ॥

जब ब्रह्मा सब कुछ वापस ले लेते हैं, तब वो बहुत देर तक उसी में रहते हैं। फिर जब फिर से दुनिया बनती है, वो बड़े तप वाले देवता विराजों में आ जाते हैं।

Verse 67

ब्रह्महत्यादिपापानि इह लोककृतान्यपि । अकामे कामतो वापि तानि नश्यन्ति तत्क्षणात् ॥ ३९.६७ ॥

ब्रह्मा हत्या जैसा बड़ा पाप भी हो, या कोई और पाप। चाहे किसी ने जान-बूझ के किया हो या बिना चाहते हुए। यहाँ सब पाप तुरंत खत्म हो जाते हैं।

Verse 68

इह लोके दरिद्रो यो भ्रष्टराज्योऽथ वा नृपः । उपोष्य तां विधानॆन स राजा जायते ध्रुवम् ॥ ३९.६८ ॥

कोई गरीब हो या कोई राजा जिसका राज चला गया हो। अगर वो इस व्रत को सही तरह से रखे, तो वो पक्का राजा बन जाता है।

Verse 69

वन्ध्या नारी भवेद्या तु अनेन विधिना शुभा । उपोष्यति भवेत् तस्याः पुत्रः परमधार्मिकः ॥ ३९.६९ ॥

जो औरत का बच्चा नहीं होता, वो भी अगर इस व्रत को सही विधि से रखे। उसको एक बेटा मिलता है जो बहुत धरम वाला होता है।

Verse 70

अगम्यागमनं येन कृतं जानाति मानवः । स इमं विधिमासाद्य तस्मात् पापाद् विमुच्यते ॥ ३९.७० ॥

जो इंसान जानता है कि उसने गलत काम किया है जहाँ जाना मना था। अगर वो इस व्रत को सही तरह से रखे, तो उस पाप से छुट मिल जाती है।

Verse 71

ब्रह्मक्रियाया लोभेन बहुवर्षकृतेन च । उपोष्येमां सकृद् भक्त्या वेदसंस्कारमाप्नुयात् ॥ ३९.७१ ॥

कई साल तक ब्रह्मा के काम को छोड़ा है, लोभ में रह के। अब एक बार व्रत रख के भक्ति से यह करो। वेदों का पूरा संस्कार मिल जाएगा।

Verse 72

किमत्र बहुनोक्तेन न तदस्ति महामुने । अप्राप्यं प्राप्यते नैव पापं वा यन्न नश्यति ॥ ३९.७२ ॥

महा मुनि, ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं है। कोई चीज़ ऐसी नहीं जो नहीं मिलती। और कोई पाप ऐसा नहीं जो खत्म नहीं होता।

Verse 73

अनेन विधिना ब्रह्मन् स्वयमेव ह्युपोषिता । धरण्या मग्नया तात नात्र कार्या विचारणा ॥ ३९.७३ ॥

ब्राह्मण, इस तरह से व्रत खुद बा खुद हो गया। जब धरती डूब गई थी, बेटा, तो सोचने की ज़रूरत नहीं थी।

Verse 74

अदीक्षिताय नो देयं विधानं नास्तिकाय च । देवब्रह्मद्विषे वापि न श्राव्यं तु कदाचन । गुरुभक्ताय दातव्यं सद्यः पापप्रणाशनम् ॥ ३९.७४ ॥

जिसने दीक्षा नहीं ली, उसको यह विधि मत देना। नास्तिक को भी मत देना। जो देवता और ब्राह्मण से दुश्मनी रखता है, उसको कभी मत बताना। जो गुरु का भक्त है, उसको देना। उसके पाप तुरंत खत्म हो जाएंगे।

Verse 75

इह जन्मनि सौभाग्यं धनं धान्यं वरस्त्रियः । भवन्ति विविधा यस्तु उपोष्य विधिना ततः ॥ ३९.७५ ॥

इस जन्म में ही भाग्य खुल जाएगा। धन मिलेगा, अनाज मिलेगा, और अच्छी औरतें भी। जो विधि से व्रत करता है, उसे यह सब मिलता है।

Verse 76

य इमं श्रावयेद् भक्त्या द्वादशीकल्पमुत्तमम् । श्रृणोति वा स पापैस्तु सर्वैरेव प्रमुच्यते ॥ ३९.७६ ॥

जो कोई भी इस द्वादशी के व्रत की पूरा विधि भाव के साथ पढ़वा दे, या बस सुन भी ले, वो सब पाप से आज़ाद हो जाता है। यह बात पक्की है।

Inside Adhyaya 39

How it unfolds

  1. Where it opens

    A didactic dialogue opens by classifying embodied existence into a threefold schema—(1) a prior pāpa-conditioned state, (2) a present dharma-conditioned state, and (3) an atīndriya (supersensory) condition—each linked to experiential outcomes such as yātanā (torment) and bhoga (enjoyment). The discussion then pivots to a philosophical problem: how brahman is attained when the vijñāna-śarīra is not manifest or evident.

  2. Central event

    The teaching resolves the problem by asserting the mutual entailment of karma and jñāna in brahman-attainment, identifying the supreme brahman with Nārāyaṇa (Puṇḍarīkākṣa). This doctrinal core is then operationalized through a low-resource, widely accessible ritual technology: the Dharaṇī-vrata/Dvādaśī-kalpa, modeled on Earth’s own discipline when she sank to rasātala due to watery excess.

  3. Climax resolution

    The climax is the full procedural disclosure of the Mārgasīrṣa Dvādaśī observance—Daśamī preparation, Ekādaśī nirāhāra with nocturnal japa, and Dvādaśī completion with bathing, pūjā, kalaśa arrangement, mantra-utterance, brāhmaṇa-feeding and gifting—framed as the means by which terrestrial stability is restored and the practitioner’s karmic burden is reordered toward Nārāyaṇa-realization.

  4. Closing phalashruti

    A phala-frame promises both spiritual and social goods: purification from pāpa, stabilization of dharma in one’s life, prosperity and communal well-being through dāna, and a trajectory toward Nārāyaṇa/parama-brahman. The merit is amplified by cosmological time-reckoning (yuga/manvantara/brahmāyus) and guarded by guru-adhikāra and restrictions on indiscriminate transmission.

Geographical context

Rasātala (nether region); samudra (ocean); nadī leading to the ocean (samudragāminī nadī); taḍāga (tank/pond); gṛha (domestic ritual space).

Tirtha focus

  • Pilgrimage MeritMerit is not tied to a named mahātīrtha but to purity of water-source and intention: bathing may be done at ocean, an ocean-bound river, a pond/tank, or at home, with the vrata’s efficacy presented as portable and accessible rather than site-exclusive.

Ritual instructions

  • Primary RitualDharaṇī-vrata / Mārgasīrṣa Dvādaśī observance (Dvādaśī-kalpa) dedicated to Nārāyaṇa (Hari/Keśava/Janārdana/Puṇḍarīkākṣa).
  • BenefitPurification from pāpa, reinforcement of dharma, improved social harmony through redistribution (feeding/gifting), and progress toward realization of parama-brahman identified with Nārāyaṇa; additionally, an allegorical-ritual promise of terrestrial/ecological stability (Dharaṇī’s restoration).

The narrative frame

  • Varāha (emblematic teacher-voice; transmitted verses also attribute instruction to Durvāsas in dialogue with Satyatapā).Pṛthivī/Dharaṇī (emblematic inquirer; transmission-frame also includes Satyatapā as listener to Durvāsas). · Manual-like and doctrinal: a blend of philosophical discrimination (viveka) and prescriptive ritual instruction (vidhi), with an admonitory note about guru-adhikāra and controlled transmission.

The emotional journey

  • Dominant RasaŚānta (with devotional bhakti undertone).
  • Emotional ProgressionFrom existential concern (classification of embodied suffering/enjoyment) → intellectual clarity (karma–jñāna interdependence; Nārāyaṇa as parama-brahman) → practical reassurance (a low-resource vrata available to householders) → restorative confidence (Earth’s stability mirrored in the practitioner’s steadiness).

Planning a pilgrimage

  • Visit FeasibilityHigh: the chapter’s practice is designed to be portable—performable at home or at any clean water-source (ocean, river to the ocean, pond/tank). A pilgrimage is optional rather than required.
  • Best SeasonMārgasīrṣa (typically Nov–Dec) for the primary observance; choose a local Dvādaśī in that month with access to safe bathing water.
  • Related FestivalMārgasīrṣa Śukla Dvādaśī (Dvādaśī vrata context; often aligned with Vaiṣṇava Dvādaśī observances in local calendars).

Frequently Asked Questions

The text presents a two-part instruction: (1) a philosophical taxonomy of embodied states (pāpa-, dharma-, and atīndriya-oriented conditions) and their experiential outcomes (yātanā and bhoga), and (2) a practical claim that karma and jñāna are mutually entailed in the path to realizing the supreme principle, identified here with Nārāyaṇa. Ethically, it promotes disciplined conduct (niyama), restraint (upavāsa), and socially redistributive acts (dāna, feeding brāhmaṇas) as means to restore order in both the individual and the terrestrial domain.

The observance is anchored to Mārgasīrṣa (Mārgaśīrṣa) month, beginning on Daśamī with preparatory worship and continuing through Ekādaśī as nirāhāra (fasting), with the main completion and gifting on Dvādaśī. The procedure includes nocturnal japa, morning bathing at a river/ocean-bound river, pond, or at home, and a prescribed sequence of pūjā and dāna tied to these tithis.

Environmental balance is encoded through the Dharaṇī narrative: Earth sinks to rasātala due to watery overabundance and is restored after sustained vrata-based propitiation of Nārāyaṇa. The ritual is explicitly modeled on Earth’s self-restorative discipline, making terrestrial stability a paradigmatic outcome. The instructions integrate water, soil (mṛttikā), and purification rites, framing ecological elements as participants in moral-cosmic regulation rather than inert resources.

The dialogue names Durvāsas and Satyatapā as the immediate speakers in the transmitted verses, while the chapter’s theological identification centers on Nārāyaṇa (Hari, Keśava, Janārdana) and the mythic figure Dharaṇī (Pṛthivī). It also references Vedic lineages through the four Vedas (Ṛg, Sāma, Yajur, Atharva) and their associated recipients in the gifting sequence, and it invokes the guru as the authorized transmitter of the ritual vidhāna.

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