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Sukta 8.37
Not specified in the provided excerpt; within RV 8.37 Indra hymn tradition (Anukramaṇī typically assigns to a specific seer family for the sukta)
Indra
Jagatī (likely; recurring refrain with mādhyandina-savana)
This hymn summons Indra to the mādhyandina (midday) Soma-pressing, urging him to drink and to extend his “all-aids” (viśvābhir ūtibhiḥ) to the pressing priest and patron. It recalls Indra’s Vṛtra-battles and his power to drive off besieging forces, then closes by invoking his past responsiveness to seers—especially Śyāvāśva and Atri—and his protection of Trasadasyu, as Indra increases kṣatra (sovereign might).
Mantra 1
प्रेदं ब्रह्म वृत्रतूर्येष्वाविथ प्र सुन्वतः शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इंद्र, तू वृत्र के युद्धों में मदद किया। अब इस मंत्र को आगे बढ़ा। जो लोग सोम पीते हैं, उनको भी आगे ले जा। तू सब तरह की मदद कर सकता है। दोपहर के वक्त सोम पीना है। वृत्र मारनेवाले, तू बिना दोष के है। तू वज्र पकड़ता है, सोम पी ले।
Mantra 2
सेहान उग्र पृतना अभि द्रुहः शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इंद्र, तू बहुत ताकतवर है। दुश्मन की चालों को रोक। युद्ध में आगे बढ़। तू सब तरह की मदद कर सकता है। दोपहर के वक्त सोम पीना है। वृत्र मारनेवाले, तू बिना दोष के है। तू वज्र पकड़ता है, सोम पी ले।
Mantra 3
एकराळस्य भुवनस्य राजसि शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इंद्र, तू अकेला राजा है। सारी दुनिया पर तू राज करता है। तू सब तरह की मदद कर सकता है। दोपहर के वक्त सोम पीना है। वृत्र मारनेवाले, तू बिना दोष के है। तू वज्र पकड़ता है, सोम पी ले।
Mantra 4
सस्थावाना यवयसि त्वमेक इच्छचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इंद्र, तू अकेला है जो दुश्मन को भगाता है। जो लोग हमला करते हैं, उनको तू दूर करता है। तू सब तरह की मदद कर सकता है। दोपहर के वक्त सोम पीना है। वृत्र मारनेवाले, तू बिना दोष के है। तू वज्र पकड़ता है, सोम पी ले।
Mantra 5
क्षेमस्य च प्रयुजश्च त्वमीशिषे शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इंद्र, तू शांति देता है और सही काम कराता है। तू दोनों चीजों का स्वामी है। तू सब तरह की मदद कर सकता है। दोपहर के वक्त सोम पीना है। वृत्र मारनेवाले, तू बिना दोष के है। तू वज्र पकड़ता है, सोम पी ले।
Mantra 6
क्षत्राय त्वमवसि न त्वमाविथ शचीपत इन्द्र विश्वाभिरूतिभिः । माध्यंदिनस्य सवनस्य वृत्रहन्ननेद्य पिबा सोमस्य वज्रिवः ॥
इन्द्र, तुम राजा लोगों की रक्षा करते हो। कोई और नहीं करता। तुम्हारे पास सारी मदद है। दोपहर के वक्त सोम का जूस निकलता है। इन्द्र, तुम वृत्र को मारा है, तुम वज्र ले के आए हो। बिना किसी दोष के सोम पियो।
Mantra 7
श्यावाश्वस्य रेभतस्तथा शृणु यथाशृणोरत्रेः कर्माणि कृण्वतः । प्र त्रसदस्युमाविथ त्वमेक इन्नृषाह्य इन्द्र क्षत्राणि वर्धयन् ॥
इन्द्र, सुनो श्यावाश्व की अर्ज़ी, जैसे तुमने अत्रि रिशि की सुनी थी। उन्होंने भी तुम्हारे लिए काम किया था। तुमने त्रसदस्यु राजा को आगे बढ़ाया और बचाया। इन्द्र, तुम एक हो जो लोगों को हरा के राजा बना देते हो।
It calls Indra to the midday Soma-pressing and asks him to drink the Soma and bring his full protection and help to the sacrificer.
Vṛtra represents obstruction. By recalling Indra’s Vṛtra-slaying, the hymn reminds listeners that he can remove obstacles and secure victory in both ritual and life.
Śyāvāśva is the singer associated with this hymn in the Ātreya tradition. Atri is invoked as an earlier seer whom Indra heard—so the hymn asks Indra to respond now in the same way.
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