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Sukta 4.36
Rbhus (or poet addressing them within the Rbhu cycle of Book 4)
Rbhus
Trishtubh (probable)
This hymn praises the Ṛbhus—divine artisan-brothers—celebrating their wondrous crafts (like the self-moving, three-wheeled chariot) as signs of a power that enlarges and sustains Heaven and Earth. It links their perfected skill (takṣaṇa) with the birth of prosperity, fame, and victorious plenitude, and ends with an intimate request: “here and now” fashion for us progeny, wealth, and heroic renown that awakens higher awareness.
Mantra 1
अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्यो रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः । महत्तद्वो देव्यस्य प्रवाचनं द्यामृभवः पृथिवीं यच्च पुष्यथ ॥
एक रथ है जिमें घोड़े नहीं हैं, लगाम भी नहीं है। तीन पहिए हैं, फिर भी चल रहा है आसमान में। यह र्भु देवता की खास बात है। यह लोग धरती और आसमान दोनों को बड़ा करते हैं, उनकी ताकत बढ़ा देते हैं।
Mantra 2
रथं ये चक्रुः सुवृतं सुचेतसोऽविह्वरन्तं मनसस्परि ध्यया । ताँ ऊ न्वस्य सवनस्य पीतय आ वो वाजा ऋभवो वेदयामसि ॥
वज और र्भु भाइयों ने एक रथ बनाया जो सही चल रहा था। उनका दिमाग साफ था, वो किसी चीज़ से घूमते नहीं थे। अब हम सोम की पूजा के लिए उनको बुला रहे हैं। वज और र्भु, हम तुम्हे यहाँ बुला रहे हैं, आओ।
Mantra 3
तद्वो वाजा ऋभवः सुप्रवाचनं देवेषु विभ्वो अभवन्महित्वनम् । जिव्री यत्सन्ता पितरा सनाजुरा पुनर्युवाना चरथाय तक्षथ ॥
वज और र्भु भाइयों की बात यह है कि देवता लोग उनकी तारीफ करते हैं। उनके माँ बाप बूढ़े हो गए थे। लेकिन इन भाइयों ने उनको फिर से जवान बना दिया। अब वो चल सकते हैं और सफर कर सकते हैं।
Mantra 4
एकं वि चक्र चमसं चतुर्वयं निश्चर्मणो गामरिणीत धीतिभिः । अथा देवेष्वमृतत्वमानश श्रुष्टी वाजा ऋभवस्तद्व उक्थ्यम् ॥
इन भाइयों ने एक प्याला लिया और उसको चार प्याला बना दिया। उन्होंने चमड़ी से गाय पैदा कर दी। देवता लोगों में उनको अमर हो गए। श्रुति, वज और र्भु भाइयों की यह कमाई है, इसकी बात होती है।
Mantra 5
ऋभुतो रयिः प्रथमश्रवस्तमो वाजश्रुतासो यमजीजनन्नरः । विभ्वतष्टो विदथेषु प्रवाच्यो यं देवासोऽवथा स विचर्षणिः ॥
र्भु भाइयों की कला से जो धन मिलता है वो सबसे बड़ा होता है। जो लोग इसको कमाते हैं उनकी बात सब सुनते हैं। विभु ने इसको बनाया है, इसलिए लोग इसकी बात करते हैं। देवता लोग उसकी मदद करते हैं, वो आगे बढ़ जाता है।
Mantra 6
स वाज्यर्वा स ऋषिर्वचस्यया स शूरो अस्ता पृतनासु दुष्टरः । स रायस्पोषं स सुवीर्यं दधे यं वाजो विभ्वाँ ऋभवो यमाविषुः ॥
जिस इंसान को वज और र्भु भाइयों की शक्ति मिलती है वो आगे निकल जाता है। वो तेज़ घोड़ा बन जाता है, रिशि बन जाता है, लड़ाई में मज़बूत हो जाता है। उसको धन मिलता है और ताकत मिलती है। यह वज और र्भु भाइयों की देन है।
Mantra 7
श्रेष्ठं वः पेशो अधि धायि दर्शतं स्तोमो वाजा ऋभवस्तं जुजुष्टन । धीरासो हि ष्ठा कवयो विपश्चितस्तान्व एना ब्रह्मणा वेदयामसि ॥
तुम्हारा सबसे अच्छा रूप यहाँ है, जो सबको दिख रहा है। यह स्तोत्र है, वाज और रिभु, इसमें खुश हो जाओ। तुम लोग पक्के और समझदार हो, जो सही बात समझते हैं। इस पवित्र बोल से हम तुम्हे अपने पास बुला रहे हैं।
Mantra 8
यूयमस्मभ्यं धिषणाभ्यस्परि विद्वांसो विश्वा नर्याणि भोजना । द्युमन्तं वाजं वृषशुष्ममुत्तममा नो रयिमृभवस्तक्षता वयः ॥
तुम जो सब जानते हो, अपनी शक्ति से सारी ताकत का मज़ा लो। हमारे लिए एक चमकदार विजय बनाओ, जैसे बैल की ताकत हो, सबसे ऊपर वाला। हमारे लिए धन और बरकत बनाओ, रिभु, जो हमारी तरक्की करे।
Mantra 9
इह प्रजामिह रयिं रराणा इह श्रवो वीरवत्तक्षता नः । येन वयं चितयेमात्यन्यान्तं वाजं चित्रमृभवो ददा नः ॥
इस ज़िन्दगी में हमारे बच्चे-बच्चे हों, और घर में धन हो। हमारी बड़ाई हो जिसमें बहादुरी हो, जिससे हम दूसरों से आगे निकल जाएँ। वो रंगीन विजय, रिभु, हमे दो।
The Ṛbhus are divine artisan-brothers (Ṛbhu, Vibhu/Vibhvan, and Vāja) praised for perfect craftsmanship that renews and multiplies forms and brings prosperity.
It is a poetic marvel showing Ṛbhu power: a symbol of perfected formation and effortless motion through the luminous realms—often read as craft elevated into divine capability.
It asks them to “fashion” benefits in this life: progeny, inner wealth (rayi), heroic fame (śravas with vīra-power), and a many-colored vāja (victorious plenitude) that awakens higher awareness.
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