
Sukta 1.122
This hymn invokes Rudra together with the Maruts, asking that the well-guarded Soma and sacrifice be carried forward to the healing, gracious power who commands the storm-host. It blends praise of divine might—standing between heaven and earth—with petitions for protection, vitality, and victorious momentum in life. The tone is both awe-struck and intimate: the fearful, wild Rudra is approached through ordered rite and collective Marut-strength.
Mantra 1
प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळ्हुषे भरध्वम् । दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः ॥
रुद्र के लिए पूजा का सामान तैयार करो। रुद्र भोले भंडारी हैं, वो सब ठीक करते हैं। मरुत उनके साथी हैं, जो ताकत से भरे हैं। इन सब की पूजा करो। यह दोनों दुनिया में काम करते हैं।
Mantra 2
पत्नीव पूर्वहूतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने । स्तरीर्नात्कं व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यैः ॥
उषा और रात, दोनों मिलकर पूजा को बढ़ाते हैं। दोनों अलग-अलग काम करते हैं। दोनों चमकते हैं, सूरज की तरह। दोनों सोना जैसा चमकते हैं। यह दिन और रात को सही टाइम पर लाते हैं। इससे हमें समझ में आता है कि क्या करना है।
Mantra 3
ममत्तु नः परिज्मा वसर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान् । शिशीतमिन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः ॥
भगवान की ताकत हमें खुश करे। पानी का तेज़ हवा हमें खुश करे। इंद्र और पर्वत, हमारे लिए ताकत तेज़ करो। सारे देवता हमें जगह दें, ताकि हम आगे बढ़ सकें।
Mantra 4
उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै । प्र वो नपातमपां कृणुध्वं प्र मातरा रास्पिनस्यायोः ॥
मेरा नाम रोशन हो, इसलिए ये ताकतें पास आएँ। औशिज उन्हें पुकारे। पानी का बेटा तुम्हारे लिए तैयार हो। रास्पिन की दो माँ आगे आएँ जो रोशनी बढ़ाएँ।
Mantra 5
आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे । प्र वः पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्नेः ॥
मैं तुम्हें पुकारता हूँ, औशिज भी पुकारे। यह आवाज़ साफ़ सुनाई दे। पूषन जो देता है, मैं उससे मिलने जाऊँगा। अग्नि की दौलत का सीधा उससे कहूँगा।
Mantra 6
श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वतः सीम् । श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्भिः ॥
मित्र और वरुण, मेरी आवाज़ सुनो। अपने घर में हर तरफ से सुनो। जो सुनता है वो हमें सुन ले। नदी का पानी हमारे लिए अच्छा बन जाए।
Mantra 7
स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्रे । श्रुतरथे प्रियरथे दधानाः सद्यः पुष्टिं निरुन्धानासो अग्मन् ॥
वरुण और मित्र, तुम्हारी दान की तारीफ करता हूँ। सौ गाय जैसी रोशनी मिली। ये रथ लेकर आए जो सबको पसंद है। जल्दी से खाना और पूरा मिल गया।
Mantra 8
अस्य स्तुषे महिमघस्य राधः सचा सनेम नहुषः सुवीराः । जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः ॥
मैं उस बड़े दाता की देन की तारीफ करता हूँ। नहुषा, हम मिलकर यह कामयाबी पाएँ, अच्छे लोगों के साथ। जो दाता घोड़े और रथ देकर आगे बढ़ने की ताकत देता है, वो रोशनदान इंसान मुझे भी यह ताकत दे। यह ताकत जीतने में काम आती है और आगे बढ़ने में मदद करती है।
Mantra 9
जनो यो मित्रावरुणावभिध्रुगपो न वां सुनोत्यक्ष्णयाध्रुक् । स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदीं होत्राभिॠतावा ॥
जो इंसान मित्र और वरुण के दुश्मन बन जाते हैं, वो साफ करने वाला पानी नहीं देते। आँख से बुरा नज़र डालने वाला अपने ही दिल में बीमारी डाल लेता है। जब वो सच्चाई पर चलने वाले लोगों को तकलीफ देते हैं, तब वो खुद ही बरबाद होते हैं।
Mantra 10
स व्राधतो नहुषो दंसुजूतः शर्धस्तरो नरां गूर्तश्रवाः । विसृष्टरातिर्याति बाळ्हसृत्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूरः ॥
नहुषा का बेटा अपनी कला से आगे बढ़ता है। वो दूसरों से ज़्यादा ताकतवाला है, उसकी बड़ाई सब जानते हैं। वो दान लेकर तेज़ी से आगे बढ़ता है। हर लड़ाई में वो जीत की कोशिश करता है।
Mantra 11
अध ग्मन्ता नहुषो हवं सूरेः श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्राः । नभोजुवो यन्निरवस्य राधः प्रशस्तये महिना रथवते ॥
आशा है कि राजा लोग अमृत पी कर खुश हो कर आएँ। वो रोशनदान दाता की पुकार सुनेंगे। आसमान की तरह तेज़ी से आएँगे, दान लेकर। उनकी बड़ाई से रथ वाला बंदा तारीफ करेगा।
Mantra 12
एतं शर्धं धाम यस्य सूरेरित्यवोचन्दशतयस्य नंशे । द्युम्नानि येषु वसुताती रारन्विश्वे सन्वन्तु प्रभृथेषु वाजम् ॥
लोगों ने कहा कि यह दाता का ग्रुप है, यह उसकी नीव है। दसतय के हिस्से के लिए यह बात कह गई। जिसमें ताकत और धन की खुशी है, सब लोग यज्ञ में ताकत पाएँ।
Mantra 13
मन्दामहे दशतयस्य धासेर्द्विर्यत्पञ्च बिभ्रतो यन्त्यन्ना । किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरुष ऋञ्जते नॄन् ॥
हम दशतया की देना से खुश हैं। दस नदियाँ खाना लेकर आती हैं। यह अश्वा और चमकदार किरणें हैं जो भगवान ने भेजी हैं। यह सब लोगों को आगे बढ़ा देती हैं और काम में लगाती हैं।
Mantra 14
हिरण्यकर्णं मणिग्रीवमर्णस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवाः । अर्यो गिरः सद्य आ जग्मुषीरोस्राश्चाकन्तूभयेष्वस्मे ॥
सब देवता हमारे लिए रास्ता खोलें। वो पानी जैसे सोने के कान और मोती की माला वाला हो। अच्छी बातें जल्दी हमारे पास आएँ। सुभह की रोशनी अंदर और बाहर दोनों तरफ चमके।
Mantra 15
चत्वारो मा मशर्शारस्य शिश्वस्त्रयो राज्ञ आयवसस्य जिष्णोः । रथो वां मित्रावरुणा दीर्घाप्साः स्यूमगभस्तिः सूरो नाद्यौत् ॥
मशर्शरा की संतान में से चार मेरे हैं। राजा आयवसा की संतान में से तीन हैं। मित्र और वरुण, तुम्हारी रथ आज चमकी है। यह रथ बहुत दूर तक जाती है और सूरज जैसी चमक है।
A direct call to bring forward the guarded Soma and sacrifice to Rudra, immediately pairing him with the Marut-host poised between the worlds.
Praise expands from divine might to benevolence: Rudra’s capacity to heal and the Maruts’ coordinated force are celebrated as powers that secure prosperity and ward off harm.
The hymn’s peak is the confident alignment of human rite with atmospheric/cosmic power—storm-energy becomes protection and victorious impetus when rightly praised and offered to.
It settles into affirmation and blessing: the invoked powers are asked to remain gracious, granting strength, safe movement, and well-being to the worshippers.
प्र वः पान्तं रघुमन्यवोऽन्धो यज्ञं रुद्राय मीळ्हुषे भरध्वम् । दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्योः ॥अस्य स्तुषे महिमघस्य राधः सचा सनेम नहुषः सुवीराः । जनो यः पज्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो मह्यं सूरिः ॥चत्वारो मा मशर्शारस्य शिश्वस्त्रयो राज्ञ आयवसस्य जिष्णोः । रथो वां मित्रावरुणा दीर्घाप्साः स्यूमगभस्तिः सूरो नाद्यौत् ॥The hymn chiefly worships Rudra together with the Maruts, his storm-like companions. Rudra is praised as both fierce and healing, while the Maruts represent powerful, coordinated divine energies.
It asks that the sacrifice—especially the Soma offering—reach Rudra properly, so his power becomes protective and healing rather than harmful. It also seeks strength, safe movement, and success for the worshippers.
The Maruts are portrayed as Rudra’s host and as forces that move between heaven and earth. Invoking them with Rudra emphasizes disciplined storm-energy: courage, vitality, and protection working together.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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