
अयोध्याकाण्डे पञ्चसप्ततितमः सर्गः (Sarga 75: Bharata and Kausalya · Reproach, Oaths, and Reconciliation)
अयोध्याकाण्ड
Sarga 75 stages a courtroom-like moral confrontation within the domestic sphere. Bharata regains consciousness, looks upon his grieving mother, and publicly condemns Kaikeyī’s role amid the counsellors, signalling that succession is inseparable from ethical legitimacy (2.75.1). Kauśalyā, overwhelmed by bereavement and suspicion, addresses Bharata with bitter irony, accusing him of desiring a kingdom obtained ‘without obstacle’ through Kaikeyī’s crooked act (2.75.10–16). Bharata replies with a formal denial: he neither sought the kingdom nor knew of the planned consecration, having been away with Śatrughna (2.75.2–4). He then intensifies his self-vindication through a long sequence of conditional imprecations: may the curse-like sins fall upon whoever consented to Rāma’s exile (2.75.21–58), transforming private defense into a ritualized oath-performance. The emotional arc culminates in collapse and supplication—Bharata falls at Kauśalyā’s feet, laments, loses consciousness, and is consoled (2.75.18–19, 59–63). Kauśalyā finally recognizes his steadfastness in dharma and truth, embraces him, and the night passes in grief and exhaustion (2.75.60–65).
Verse 1
दीर्घकालात्समुत्थाय संज्ञां लब्ध्वा च वीर्यवान् ।नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां दीनामुद्वीक्ष्य मातरम् ॥१॥सोऽमात्यमध्ये भरतो जननीमभ्यकुत्सयत् ।
बहुत देर बाद भरत उठा। होश में आया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने अपनी मा को देखा जो बहुत दुखी थी। मंत्रियों के सामने उसने अपनी मा को बुरा बोला।
Verses 2-3
राज्यं न कामये जातु मन्त्रये नापि मातरम् ॥२॥अभिषेकं न जानामि योऽभूद्राज्ञा समीक्षितः ।विप्रकृष्टेह्यहं देशे शत्रुघ्नसहितोऽवसम् ॥३॥
मुझे राज्य कभी चाहिए ही नहीं था। मैं अपनी माँ से भी कभी बात नहीं की इस बारे में। राजा ने जो अभिषेक करवाया, मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानता। मैं तो शत्रुघ्न के साथ बहुत दूर देश में था।
Verse 4
वनवासं न जानामि रामस्याहं महात्मनः ।विवासनं वा सौमित्रे स्सीतायाश्च यथाऽभवत् ॥४॥
मैं तोह यह भी नहीं जानता था कि इतना बड़ा आदमी राम को जंगल भेज दिया गया है। ना मैं जानता था कि लक्ष्मण और सीता का भी यह हाल हुआ है।
Verse 5
तथैव क्रोशतस्तस्य भरतस्य महात्मनः ।कौसल्या शब्दमाज्ञाय सुमित्रामिदमब्रवीत् ॥५॥
भरत बहुत रो रहा था। कौसल्या ने उसकी आवाज़ पहचान ली। उसने सुमित्रा से कहा।
Verse 6
आगतः क्रूरकार्यायाः कैकेय्या भरतस्सुतः ।तमहं द्रष्टुमिच्छामि भरतं दीर्घदर्शिनम् ॥६॥
भरत आ गया है। कैकेयी ने कैसे काम किए, यह सब जानते हैं। मैं उस भरत को देखना चाहता हूँ जो सोच-समझ के काम करता है।
Verse 7
एवमुक्त्वा सुमित्रां सा विवर्णा मलिना कृशा ।प्रतस्थे भरतो यत्र वेपमाना विचेतना ॥७॥
सुमित्रा को ऐसा बोल के कौसल्या चल पड़ी। उसका चेहरा उतर गया था, कपड़े भी मैल हो गये थे, बॉडी भी कमज़ोर हो गयी थी। वो काँप रही थी, होश में भी नहीं थी, भरत के पास जाने लगी।
Verse 8
स तु रामानुजश्चापि शत्रुघ्नसहितस्तदा ।प्रतस्थे भरतो यत्र कौसल्याया निवेशनम् ॥८॥
फिर भरत चल पड़ा, राम का छोटा भाई। उसके साथ शत्रुघ्न भी था। वो दोनों कौसल्या के घर की तरफ गये।
Verse 9
तत श्शत्रुघ्नभरतौ कौसल्यां प्रेक्ष्य दुःखितौ ।पर्यष्वजेतां दुःखार्तां पतितां नष्टचेतसाम् ॥९॥रुदन्तौ रुदतीं दुःखात्समेत्यार्यां मनस्स्विनीम् ।
शत्रुघ्न और भरत ने कौसल्या को देखा। वो बहुत दुखी थी, गिर पड़ी थी, और होश में नहीं थी। दोनों भाई भी दुखी हो गए। वो रोते हुए माँ के पास गए। जैसे वो रो रही थी, वैसे ही वो भी रोते हुए उससे भाथ लिया।
Verses 10-11
भरतं प्रत्युवाचेदं कौसल्या भृशदुःखिता ॥१०॥इदं ते राज्यकामस्य राज्यं प्राप्तमकण्टकम् ।संप्राप्तं बत कैकेय्या शशीघ्रं क्रूरेण कर्मणा ॥११॥
कौसल्या बहुत दुखी थी। उसने भरत से कहा, लो यह राज्य तुम्हे मिल गया। तुम्हे राज्य चाहिए था, अब कोई दिक्कत नहीं। कैकेयी ने जल्दी से यह तुम्हारे लिए कर दिया। बड़ा ज़ालिम काम किया उसने।
Verse 12
प्रस्थाप्य चीरवसनं पुत्रं मे वनवासिनम् ।कैकेयी कं गुणं तत्र पश्यति क्रूरदर्शिनी ॥१२॥
उसने मेरा बेटा भेज दिया जंगल में। उसने पेड़ की छाल पहनी थी। कैकेयी ने उसकी क्या फायदा सोचा? वो औरत तो बुरी नज़र वाली थी।
Verse 13
क्षिप्रं मामपि कैकेयी प्रस्थापयितुमर्हति ।हिरण्यनाभो यत्रास्ते सुतो मे सुमहायशाः ॥१३॥
कैकेयी को मुझे भी भेज देना चाहिए। जहाँ मेरा बेटा राम है, वहाँ। वो बड़ा नाम वाला है, उसका पेट सोना जैसा है।
Verse 14
अथवा स्वयमेवाहं सुमित्रानुचरा सुखम् ।अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य प्रस्थास्ये यत्र राघवः ॥१४॥
या मैं खुद चला जाऊँगा। सुमित्रा भी मेरे साथ आएगी। अग्नि ले के चलेंगे, जहाँ राम है वहाँ।
Verse 15
कामं वा स्वयमेवाद्य तत्र मां नेतुमर्हसि ।यत्रासौ पुरुषव्याघ्रः पुत्रो मे तप्यते तपः ॥१५॥
या तुम मुझे आज ले चलो। जहाँ मेरा बेटा है, वहाँ। वो आदमियों में शेर जैसा है, वहाँ तपस्या कर रहा है।
Verse 16
इदं हि तव विस्तीर्णं धनधान्यसमाचितम् ।हस्त्वश्वरथसम्पूर्णं राज्यं निर्यातितं तया ॥१६॥
यह बड़ा राज्य तुम्हारा हो गया। इसमें धन और अनाज बहुत है। हाथी, घोड़े, रथ सब है। उसने तुम्हे दे दिया।
Verse 17
इत्यादिबहुभिर्वाक्यैः क्रूरैः सम्भर्त्सितोऽनघः ।विव्यथे भरतस्तीव्रं व्रणे तुद्येव सूचिना ॥१७॥
इतने सारे कठिन शब्द सुनने के बाद भरत को बहुत दुख हुआ। वो पाप से साफ था, फिर भी उसको बड़ा दर्द हुआ। जैसे कोई सूची से ज़ख घूंटी है, वैसे ही उसका दिल दुखा।
Verse 18
पपात चरणौ तस्यास्तदा सम्भ्रान्तचेतनः ।विलप्य बहुधाऽसंज्ञो लब्धसंज्ञस्ततः स्थितः ॥१८॥
फिर उसका दिमाग हिल गया और वो गिर के उसके पाँव पकड़ लिए। वो बहुत रोया, इतना कि बेहोश हो गया। थोड़ी देर बाद होश आया तो वहीं खड़ा रह गया।
Verse 19
एवं विलपमानां तां भरतः प्राञ्जलिस्तदा ।कौसल्यां प्रत्युवाचेदं शोकैर्बहुभिरावृताम् ॥१९॥
जब वो बहुत दुख में रो रही थी, तब भरत ने हाथ जोड़े। फिर उन्होंने कौसल्या से कहा।
Verse 20
आर्ये कस्मादजानन्तं गर्हसे मामकिल्बिषम् ।विपुलां च मम प्रीतिं स्थिरां जानासि राघवे ॥२०॥
माताजी, मैंने कुछ नहीं किया, फिर भी आप मुझे क्यों डाँट रहे हो? मैं तो कुछ जानता भी नहीं था। आप जानते हो कि मैं राम भैया को कितना प्यार करता हूँ।
Verse 21
कृता शास्त्रानुगा बुद्धिर्माभूत्तस्य कदाचन ।सत्यसन्ध स्सतां श्रेष्ठो यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥२१॥
जिस इंसान की सोच शास्त्र के हिसाब से चलती है, उसके मन में यह बात कभी न आए। मेरा बड़ा भाई सच बोलने वाला था और अच्छे लोगों में सबसे बड़ा था। वो वनवास गया किसी की मर्ज़ी से।
Verse 22
प्रेष्यं पापीयसां यातु सूर्यञ्च प्रतिमेहतु ।हन्तु पादेन गां सुप्तां यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥२२॥
जिस इंसान की मर्ज़ी से मेरा बड़ा भाई वनवास गया, उसपे यह पाप लगें। वो बुरे लोगों के नीचे काम करे। सूरज की तरफ मुह करके पेशाब करे। सोती हुई गाइये को पाँव से मारे।
Verse 23
कारयित्वा महत्कर्म भर्ता भृत्यमनर्थकम् ।अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्याऽर्योऽनुमतेगतः ॥२३॥
जिस इंसान ने कहा कि मेरा बड़ा भाई वनवास जाए, उसका यह पाप लगे। जैसे कोई मालिक नौकर से बड़ा काम करवाए और उसका कोई हिसाब न दे। यह उसी तरह का पाप है।
Verse 24
परिपालयमानस्य राज्ञो भूतानि पुयत्रवत् ।ततस्नु दुह्यतां पापं यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥२४॥
जिस इंसान की वजह से मेरा बड़ा भाई वनवास गया, उसपे पाप लगे। जैसे कोई राजा अपने प्रजा की देखभाल करता है जैसे बाप अपने बच्चों की करता है। फिर भी कोई उस राजा को धोखा दे, उसपे वैसा ही पाप लगे।
Verse 25
बलिषड्भागमुद्धृत्य नृपस्यारक्षतः प्रजाः ।अधर्मो योऽस्य सोऽस्यास्तु यस्यार्थोऽनुमते गतः ॥२५॥
जिस इंसान की मर्ज़ी से मेरा बड़ा भाई वनवास गया, उसपे वही पाप लगे। जैसे कोई राजा लोगों से टैक्स ले ले, छठा हिस्सा, लेकिन उनकी सुरक्षा न करे। उस राजा पे जो पाप है, वही उस इंसान पे लगे।
Verse 26
संश्रुत्य च तपस्विभ्यस्सत्रे वै यज्ञदक्षिणाम् ।तां विप्रलपतां पापं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥२६॥
जिसने मेरी बड़े भाई को वनवास भेजने का सलाह दिया, उस पर पाप आए। जैसे कोई यज्ञ में रिशियों को दान देने का वादा करके धोखा दे दे, वैसा ही बड़ा पाप उसके सर पर आए।
Verse 27
हस्त्यश्वरथसम्बाधे युद्धे शस्त्रसमाकुले ।मा स्म कार्षीत्सतां धर्मं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥२७॥
और वो इंसान जो मेरे भाई को वनवास भेजने में लगा, वो अच्छों के धरम से गिर जाए। जैसे कोई योद्धा हाथी, घोड़े, रथ और बहुत सारे हथियारों से भरी जंग में खड़ा हो कर भी अपना काम न करे, वैसा ही वो भी अपना धरम छोड़े।
Verse 28
उपदिष्टं सुसूक्ष्मार्थं शास्त्रं यत्नेन धीमता ।स नाशयतु दुष्टात्मा यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥२८॥
जिसने मेरे भाई को वनवास भेजने का सलाह दिया, वो खराब इंसान बरबाद हो जाए। वो शास्त्र के गहरे अर्थ को समझता नहीं, जो किसी वाइज गुरु ने बड़े ध्यान से सिखाया था। उसी चीज़ को वो खराब कर देता है।
Verse 29
मा च तं व्यूढबाह्वंसं चन्द्रार्कसमतेजसम् ।द्राक्षीद्राज्यस्थमासीनं यस्यार्योऽनुमतेगतः ॥२९॥
और वो कभी न देखे कि मेरे भाई राज सिंहासन पर बैठे हैं। मेरे भाई के हाथ और कंधे टोड़े हैं, और उनकी चमक सूरज और चाँद जैसी है। जिसने उनको वनवास भेजा, उसकी नज़र उन पर कभी न पड़े।
Verse 30
पायसं कृसरं छागं वृथा सोऽश्नातु निर्घृणः ।गुरूंश्चाप्यवजानातु यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥३०॥
जिस आदमी ने कहा कि मेरा बड़ा भाई को वनवास भेजो, वो बड़ा बुरा आदमी है। उसका कोई दिल नहीं। वो खाना खाए पर फायदा नहीं हो, खीर, चावल का लड्डू, बकरा का मीट, सब बेकार। अपने गुरु का भी कोई इज्जत ना करे वो।
Verse 31
गाश्च स्पृशतु पादेन गुरून्परिवदेत्स्वयम् ।मित्रे द्रुह्येत सोऽत्यन्तं यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥३१॥
जिसने कहा कि मेरा भाई को भगाओ, वो बड़े-बड़े पाप करे। गाय को पाँव से मारे। अपने बड़े लोगों को गाली दे। अपने दोस्तों को धोखा दे, बड़ा गंदा काम करे वो।
Verse 32
विश्वासात्कथितं किञ्चित्परिवादं मिथः क्वचित् ।विवृणोतु स दुष्टात्मा यस्याऽर्योऽमते गतः ॥३२॥
जिस आदमी ने हाँ कहा कि मेरा भाई को भेजो, वो बड़ा कमीना है। कोई बात छुप-छुप के बोली हो, उसे किसी और को बोल दे। किसी ने भरोसा किया था, उसने तोड़ दिया, यह बड़ा बुरी बात है।
Verse 33
अकर्ता ह्यकृतज्ञश्च त्यक्ताचाऽत्मा निरपत्रपः ।लोके भवतु विद्विष्टो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥३३॥
जिसने हाँ कहा मेरा भाई को वनवास भेजो, लोग उसे नफरत करें। वो किसी का काम ना करे। कोई भलाई करे तो शुक्रिया ना करे। बुरा काम करे, शरम भी ना करे, ऐसा आदमी सबसे बुरा है।
Verse 34
पुत्रैर्दारैश्च भृत्यैश्च स्वगृहे परिवारितः ।स एको मृष्टमश्नातु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥३४॥
जिसने हाँ कहा मेरा भाई को भेजो, उसके घर में बेटा हो, बीवी हो, नौकर हो, सब हो। पर वो अकेला बैठ के अच्छा खाना खाए। अपने ही लोगों को छोड़ के, खुद ही खाए, बड़ा बुरा आदमी है वो।
Verse 35
अप्राप्य सदृशान् दाराननपत्यः प्रमीयताम् ।अनवाप्य क्रियां धर्म्यां यस्याऽर्योऽनुमते गतः ॥३५॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी, उसकी वजह से मेरा बड़ा भाई जंगल भेजा गया। वह आदमी मरो बिना कोई अच्छी बीवी पाए। बिना कोई बेटा-बेटी के। और जो काम धरम के लिए करना चाहिए, वह भी उसको कभी न मिले।
Verse 36
माऽत्मनस्सन्ततिं द्राक्षीत्स्वेषु दारेषु दुःखितः ।आयुस्समग्रमप्राप्य यऽस्यार्योऽनुमते गतः ॥३६॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी, उसकी वजह से मेरा बड़ा भाई गया। वह आदमी दुखी हो के जियो। उसका पूरा उमर भी न मिले। अपनी बीवी से जो बेटा-बेटी हों, उनको भी वह कभी न देखे।
Verse 37
राजस्त्रीबालवृद्धानां वधे यत्पापमुच्यते ।भृत्यत्यागे च यत्पापं तत्पापं प्रतिपद्यताम् ॥३७॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी, उसकी वजह से मेरा बड़ा भाई गया। उसपर वह पाप लगे जो राजा, औरत, बच्चे, और बूढ़े को माने में आता है। और जो पाप अपने लोगों को छोड़ने में आता है, वह भी उसपर लगे।
Verse 38
लाक्षया मधुमांसेन लोहेन च विषेण च ।सदैव बिभृयाद्भृत्यान्यस्यार्योऽनुमते गतः ॥३८॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी, उसकी वजह से मेरा बड़ा भाई गया। वह हमेशा यह बदका उठा के रखे कि उसने अपने लोगों को लाख, दारू, मास, लोहा, और ज़हर बेच के खिलाया।
Verse 39
सङ्ग्रमे समुपोढे स्म शत्रुपक्षभयङ्करे ।पलायामानो वध्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥३९॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी, उसकी वजह से मेरा बड़ा भाई गया। वह आदमी यूँ ही मरे जैसे कोई योद्धा दुश्मन के लिए खतरनाक हो। पर जब जंग चढ़ जाए और वो भागे, तब उसको मार दिया जाए।
Verse 40
कपालपाणिः पृथिवीमटतां चीरसंवृतः ।भिक्षमाणो यथोन्मत्तो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४०॥
जिस आदमी ने हाँ करके मेरे बड़े भाई को वनवास भेजा, उसकी यही दुआ है। वो फाटे कपडे पहेन के दुनिया घूमे। भिक्षा मांगे जैसे पागल हो। हाथ में खाली कटोरा लेके घूमे।
Verse 41
मद्ये प्रसक्तो भवतु स्त्रीष्वक्षेषु च नित्यशः ।कामक्रोधाभिभूतस्तु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४१॥
जिस आदमी ने मेरी भाई को वनवास भेजा था, वो हमेशा दारू और औरतों के पीछे लगा रहे। वो जुआ खेलता रहे, और अपनी काम और गुस्से में फँसा रहे।
Verse 42
मास्म धर्मे मनो भूयादधर्मं स निषेवताम् ।अपात्रवर्षी भवतु यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४२॥
जिस आदमी ने मेरी भाई को वनवास भेजा था, उसका धरम से कोई वास्ता न रहे। वो गलत काम करता रहे, और अपना पैसा वहाँ गांदा करे जहाँ कोई हक़दार न हो।
Verse 43
सञ्चितान्यस्य वित्तनि विविधानि सहस्रशः ।दस्युभिर्विप्रलुप्यन्तां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४३॥
जिस आदमी ने मेरी भाई को वनवास भेजा था, उसके पास जो कमाया हुआ पैसा पड़ा है, वो चोर लोग लेकर भाग जाएँ। हज़ारों तरह से उसका माल लूट जाए।
Verse 44
उभे सन्ध्ये शयानस्य यत्पापं परिकल्प्यते ।तच्चपापं भवेत्तस्य यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४४॥
जिस आदमी की मर्ज़ी से मेरा बड़ा भाई वनवास गया, उसपर वो पाप लगेगा जो सुबह शाम दोनों टाइम पूजा ना करने वाले पर लगता है। जब सूरज उगता है और जब ढलता है, उस टाइम सोने वाले का बड़ा पाप होता है। वही पाप उसके सर पर आए।
Verse 45
यदग्निदायके पापं यत्पापं गुरतल्पगे ।मित्रद्रोहे च यत्पापं तत्पापं प्रतिपद्यताम् ॥४५॥
उस आदमी पर वो सारा पाप लगेगा जो आग लगाने वाले पर लगता है। गुरु की पत्नी के साथ गलत काम करने वाले का पाप भी उसपर लगेगा। और जो दोस्त को धोखा देता है, उसका पाप भी उसके सर पर आएगा।
Verse 46
देवतानां पित्रूणां च मातापित्रोस्तथैव च ।मा स्म कार्षीत्स शुश्रूषां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४६॥
जिस आदमी ने हाँ करदी थी जब मेरा बड़ा भाई वनवास गया था, वो कभी भी भगवानों की पूजा ठीक से ना कर पाए। अपने पूर्वजों का भी कोई काम ना करे। माँ बाप की भी सेवा ना कर सके, ऐसा हो उसके साथ।
Verse 47
सतां लोकात्सतां कीर्त्या स्सञ्जुष्टात्कर्मणस्तथा ।भ्रश्यतु क्षिप्रमद्यैव यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४७॥
आज ही अभी इसी वक़्त वो आदमी अच्छे लोगों की दुनिया से गिर जाए। अच्छे लोगों की बड़ाई से भी दूर हो जाए। जो काम अच्छे लोग पसंद करते हैं, उससे भी वो हाथ से दे। जिसने हाँ कहा था मेरा भाई वनवास जाए, आज ही उसका सब खत्म हो।
Verse 48
अपास्य मातृशुश्रूषामनर्थे सोऽवतिष्ठताम् ।दीर्घबाहुर्महावक्षाः यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४८॥
वो आदमी अपनी माँ की सेवा छोड़ दे। बेकार के कामों में फंस जाए, जिससे कुछ भी ना मिले। मेरा बड़ा भाई लंबी बाहें वाला है, छाती भी चौड़ी है, फिर भी उसने वनवास जाना पड़ा। जिसने उसकी बात मानी थी, उसका यह हाल हो।
Verse 49
बहुपुत्रो दरिद्रश्च ज्वररोगसमन्वितः ।स भूयात्सतत क्लेशी यस्यार्योऽनुमते गतः ॥४९॥
जिस आदमी की मर्ज़ी से मेरा बड़ा भाई वनवास गया, वो हमेशा दुखी रहे। उसके बहुत बेटे हों, फिर भी वो गरीब हो। उसको बुखार और बीमारियाँ रहती हों, हमेशा तकलीफ़ में।
Verse 50
आशामाशंसमानानां दीनानामूर्ध्वचक्षुषाम् ।अर्थिनां वितथां कुर्याद्यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५०॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी कि मेरा भाई वनवास जाए, उसका पाप यह है। वो लोगों को उम्मीन दिलाता है, वो लोग ऊपर देख के उम्मीन लगाए हैं। फिर वो उनकी उम्मीन तोड़ देता है।
Verse 51
मायया रमतां नित्यं परुषः पिशुनोऽशुचिः ।राज्ञो भीतस्त्वधर्मात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५१॥
जिस आदमी की मर्ज़ी से मेरा भाई वनवास गया, वो धोखे से काम चलाता है। वो बात में कड़क है, बुरा सोचता है, साफ़ नहीं है। उसका दिल में धरम नहीं है। वो राजा से डरता रहता है कि कहीं पकड़ा न जाए।
Verse 52
ऋतुस्नातां सतीं भार्यामृतुकालानुरोधिनीम् ।अतिवर्तेत दुष्टात्मा यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५२॥
जिस आदमी ने हाँ करी थी कि मेरा भाई वनवास जाए, उसका पाप इतना बड़ा है। जैसे कोई बुरा आदमी अपनी बीवी को छोड़ दे। वो बीवी अपना काम निभाती है, साफ़ रहती है, सही वक़्त का ध्यान रखती है। फिर भी वो उसको नहीं देखता।
Verse 53
सधर्मदारान्परित्यज्य परदारान्निषेवताम् ।त्यक्तधर्मरतिर्मूढो यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५३॥
जिसने मेरी बड़े भाई को वनवास करने का हाँ कहा, उसका यह हाल हो। अपनी बीवी को छोड़ के दूसरों की बीवी के पीछे पड़ जाए। धरम छोड़ के पागल बन जाए।
Verse 54
विप्रलुप्तप्रजातस्य दुष्कृतं ब्राह्मणस्य यत् ।तदेव प्रतिपद्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५४॥
जिसने मेरे भाई को वनवास करने दिया, वो वही पाप पाए जो एक ब्राह्मण पाता है। अपना पूरा खानदान खो के बड़ा पाप करे।
Verse 55
पानीयदूषके पापं तथैव विषदायके ।यत्तदेकस्स लभतां यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५५॥
जिसने मेरे भाई को वनवास करवाया, उसको वही पाप लगे। पानी में मिला-मिला के गंदा करे, या किसी को ज़हर दे।
Verse 56
ब्राह्मणायोद्यतां पूजां विहन्तु कलुषेन्द्रियः ।बालवत्सां च गां दोग्धु यस्यार्यो ऽनुमते गतः ॥५६॥
जिसने मेरे भाई को वनवास करवाया, उसका यह हाल हो। ब्राह्मण के लिए तैयार की हुई पूजा में रुकावट डाले। गाय का दूध निकाले जब उसका छोटा बच्चा हो।
Verse 57
तुर्ष्णार्तं सति पानीये विप्रलम्भेन योजयेत् ।लभेत तस्य यत्पापं यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५७॥
जिसने मेरे भाई को वनवास करवाया, उसको वही पाप लगे। प्यासा आदमी पानी मांगे और पानी पास हो, फिर भी उसे धोखा दे के पानी ना दे।
Verse 58
भक्त्या विवदमानेषु मार्गमाश्रित्य पश्यतः ।तस्य पापेन युज्येत यस्यार्योऽनुमते गतः ॥५८॥
जब दो लोग लड़ते हैं और कोई एक तरफ का बन के बस देखता है, उसमें पाप लगता है। वो इंसान जो मेरे भाई को वनवास भेजने पे राज़ी हुआ, उसके ऊपर यह पाप आएगा।
Verse 59
विहीनां पतिपुत्राभ्यां कौसल्यां पार्थिवात्मजः ।एवमाश्वासयन्नेव दुःखार्तो निपपात ह ॥५९॥
भरत ने कौसल्या को समझाया। कौसल्या का पति और बेटा दोनों गए थे। भरत इतना दुखी हुआ कि उसके पाँव गिर गया।
Verse 60
तथा तु शपथैः कष्टै श्शपमानमचेतनम् ।भरतं शोकसन्तप्तं कौसल्या वाक्यमब्रवीत् ॥६०॥
भरत दुख से जल रहा था। वो होश में नहीं था। वो कसम खा रहा था, बहुत बुरी कसमें। कौसल्या ने उससे बात की।
Verse 61
मम दुःखमिदं पुत्र भूयस्समुपजायते ।शपथै श्शपमानो हि प्राणानुपरुणत्सि मे ॥६१॥
बेटा, मेरा दुख और बढ़ रहा है। तू इतनी बुरी कसमें खा रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे तू मेरी जान निकाल रहा है।
Verse 62
दिष्ट्या न चलितो धर्मादात्मा ते सहलक्ष्मणः ।वत्स सत्यप्रतिज्ञो ते सतां लोकमवाप्स्यसि ॥६२॥
बेटा, अच्छा हुआ कि तूने धरम से हिलना नहीं। लक्ष्मण भी साथ है। तूने जो बात कही थी, उसे निभाया। इसलिए तू अच्छे लोगों के पास पहुंचेगा।
Verse 63
इत्युक्त्वा चाङ्कमानीय भरतं भ्रातृवत्सलम् ।परिष्वज्य महाबाहुं रुरोद भृशदुःखिता ॥६३॥
यह कह के उसने भरत को गोद में बिठा लिया। भरत अपने भाइयों से बहुत प्यार करता था। उसने भरत को कस के पकड़ लिया और रोने लगी क्योंकि उसे बहुत दुख हो रहा था।
Verse 64
एवं विलपमानस्य दुःखार्तस्य महात्मनः ।मोहाच्च शोकसम्रोधाद्बभूव लुलितं मनः ॥६४॥
भरत इतना रो रहा था और उसे इतना दुख हो रहा था कि उसका दिमाग हिल गया। वो बेहोश सा हो गया था क्योंकि ग़म ने उसे घेर लिया था।
Verse 65
लालप्यमानस्य विचेतनस्य प्रणष्टबुद्धेः पतितस्य भूमौ ।मुहुर्मुहुर्निश्श्वसतश्च घर्मं सा तस्य शोकेन जगाम रात्रिः ॥६५॥
भरत ज़मीन पर गिर गया था, उसकी समझ चली गयी थी। वो बार-बार रो रहा था और गहरी सांसें ले रहा था। उस रात भर उसके ग़म में गुज़री।
Bharata faces a dharma-sankat of legitimacy: he must refute the charge that he desired or colluded in the usurpation and exile, while honoring his mother and addressing the ministers—balancing filial respect with public moral accountability.
The sarga teaches that righteous intent must be demonstrable in public life: truth is asserted not only by speech but by willingness to accept moral consequences (oath-forms), and reconciliation becomes possible when grief yields to verified integrity.
The setting is the Ayodhya palace/residential quarters (Kauśalyā’s nivēśana) with the ministerial assembly as audience; culturally, the agnihotra (sacred domestic fire) and exile markers like bark-robes (cīra) function as ritual and social signifiers.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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