
अध्याय 244 में वसिष्ठ राजा से सांख्य के तत्त्वों का निरूपण करते हैं और ‘विद्या’–‘अविद्या’ को क्रमबद्ध तत्त्व-श्रृंखला के रूप में दिखाते हुए उसे पच्चीसवें तत्त्व (पञ्चविंशक) तक ले जाते हैं। कर्मेन्द्रिय-ज्ञानेन्द्रिय, मन, पंचमहाभूत, अहंकार, बुद्धि और प्रकृति/अव्यक्त—इनका क्रम सर्ग–प्रलय के चक्र के साथ समझाया गया है। फिर वे क्षर और अक्षर का सूक्ष्म भेद बताते हैं, जिन्हें ज्ञान-विचारक युग्म रूप में विवेचित करते हैं; तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का गुण-परिणाम, बंधन और निर्बंधन से संबंध स्पष्ट करते हैं। मछली और जल के दृष्टांत से अविद्या-जन्य तादात्म्य और वैराग्य के उदय का वर्णन कर, उच्च जागरण से पच्चीसवें का क्षरत्व त्यागकर अक्षरत्व प्राप्त करना प्रतिपादित करते हैं। अंत में सांख्य और योग को परस्पर प्रकाशक शास्त्रीय दृष्टियाँ बताकर, पच्चीस से परे एक तत्त्व की गणना-परंपरा का संकेत देते हैं।
{"opening_hook":"Vasiṣṭha resumes a tightly reasoned Sāṃkhya exposition by redefining “vidyā” and “avidyā” not as mere moral labels but as an ordered ladder of tattvas—inviting the listener to locate oneself within the chain of principles.","rising_action":"The teaching ascends through the instruments of experience (karmendriyas, buddhīndriyas, manas) and their objects, then through the five bhūtas, ahaṃkāra, buddhi/mahat, and finally prakṛti/avyakta—while repeatedly stressing sarga–pralaya as the signature rhythm of the unmanifest and its guṇic unfoldment.","climax_moment":"The analytic pivot arrives with the kṣara–akṣara pairing and the kṣetra–kṣetrajña relation: the “field” is guṇa-transformation, while the knower’s liberation is deconditioning from guṇas; the fish-and-water analogy crystallizes how ignorance makes bondage feel natural, and how discernment births dispassion.","resolution":"The chapter closes by harmonizing Sāṃkhya and Yoga as mutually illuminating śāstric standpoints, and by gesturing to a doctrinal enumeration that recognizes a principle beyond the standard twenty-five—without collapsing the careful distinction between kṣara and akṣara.","key_verse":"“As a fish, born in water, takes water to be its very life and knows no ‘other,’ so the embodied self—through ignorance—clings to the guṇic field; but by higher awakening it abandons kṣaratva and attains akṣaratva.” (teaching-summary translation; verse-form varies by recension)"}
{"primary_theme":"Sāṃkhya tattva-vicāra as a ladder from avidyā to vidyā culminating in the twenty-fifth principle and its akṣara-orientation.","secondary_themes":["Sarga–pralaya as the defining rhythm of avyakta/prakṛti and its evolutes","Kṣetra–kṣetrajña discernment as the engine of liberation (nirguṇatva by non-identification)","Akṣara–kṣara as a paired analytic distinction used by tattva-thinkers, not a crude binary","Sāṃkhya–Yoga harmonization and the hint of a principle beyond the twenty-five"],"brahma_purana_doctrine":"The chapter establishes a Purāṇic hermeneutic in which Sāṃkhya enumeration is not merely cosmology but a graded epistemic discipline: ‘vidyā/avidyā’ are read as levels of principle-recognition culminating in the twenty-fifth, and Yoga is presented as the practical illumination of the same insight.","adi_purana_significance":"Near the Purāṇa’s close, this adhyāya functions as a capstone of philosophical integration—showing that the ‘Ādi’ Purāṇa can house rigorous tattva-analysis alongside its better-known tīrtha and cosmological materials, and that liberation-doctrine is continuous with creation-doctrine."}
{"opening_rasa":"śānta","climax_rasa":"adbhuta","closing_rasa":"śānta","rasa_transitions":["śānta → vicāra-śānta (reflective calm) → adbhuta (insight at kṣara/akṣara pivot) → śānta (settled dispassion)"],"devotional_peaks":["The moment the fish-and-water analogy turns the listener inward, converting metaphysics into lived vairāgya","The declaration that Sāṃkhya and Yoga are mutually illuminating śāstras, elevating analysis into a unified path of release"]}
{"tirthas_covered":[],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":"Avyakta/prakṛti is characterized by sarga–pralaya-dharmitva: guṇas unfold into mahat/buddhi and subsequent evolutes, and dissolution is described as reabsorption as guṇic differentiations subside back into prakṛti—framing the kṣetra as the structured field of manifestation."}
Verse 1
वसिष्ठ उवाच सांख्यदर्शनम् एतावद् उक्तं ते नृपसत्तम विद्याविद्ये त्व् इदानीं मे त्वं निबोधानुपूर्वशः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 244.1 का श्लोक दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 2
अभेद्यम् आहुर् अव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मिणः सर्गप्रलय इत्य् उक्तं विद्याविद्ये च विंशकः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 244.2 का श्लोक दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 3
परस्परस्य विद्या वै तन् निबोधानुपूर्वशः यथोक्तम् ऋषिभिस् तात सांख्यस्यातिनिदर्शनम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 244.3 का श्लोक दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 4
कर्मेन्द्रियाणां सर्वेषां विद्या बुद्धीन्द्रियं स्मृतम् बुद्धीन्द्रियाणां च तथा विशेषा इति नः श्रुतम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 244.4 का श्लोक दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।
Verse 5
विषयाणां मनस् तेषां विद्याम् आहुर् मनीषिणः मनसः पञ्च भूतानि विद्या इत्य् अभिचक्षते //
पंचम श्लोक—यहाँ ‘५’ से सूचित वचन को पवित्र स्मरणीय माना गया है।
Verse 6
अहंकारस् तु भूतानां पञ्चानां नात्र संशयः अहंकारस् तथा विद्या बुद्धिर् विद्या नरेश्वर //
षष्ठ श्लोक—यहाँ ‘६’ से सूचित वचन धर्मार्थ को प्रकट करता है।
Verse 7
बुद्ध्या प्रकृतिर् अव्यक्तं तत्त्वानां परमेश्वरः विद्या ज्ञेया नरश्रेष्ठ विधिश् च परमः स्मृतः //
सप्तम श्लोक—यहाँ ‘७’ से सूचित वचन श्रवण करने से पुण्य उत्पन्न करता है।
Verse 8
अव्यक्तम् अपरं प्राहुर् विद्या वै पञ्चविंशकः सर्वस्य सर्वम् इत्य् उक्तं ज्ञेयज्ञानस्य पारगः //
अष्टम श्लोक—यहाँ ‘८’ से सूचित वचन ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाता है।
Verse 9
ज्ञानम् अव्यक्तम् इत्य् उक्तं ज्ञेयं वै पञ्चविंशकम् तथैव ज्ञानम् अव्यक्तं विज्ञाता पञ्चविंशकः //
नवम श्लोक—यहाँ ‘९’ से सूचित वचन भक्ति और शांति का प्रसाद देता है।
Verse 10
विद्याविद्ये तु तत्त्वेन मयोक्ते वै विशेषतः अक्षरं च क्षरं चैव यद् उक्तं तन् निबोध मे //
इस अध्याय का यह दसवाँ श्लोक पवित्र अर्थ प्रदान करने वाला माना गया है।
Verse 11
उभाव् एतौ क्षराव् उक्तौ उभाव् एताव् अनक्षरौ कारणं तु प्रवक्ष्यामि यथाज्ञानं तु ज्ञानतः //
इस अध्याय का ग्यारहवाँ श्लोक धर्म और अर्थ का विवेचन करने वाला है।
Verse 12
अनादिनिधनाव् एतौ उभाव् एवेश्वरौ मतौ तत्त्वसंज्ञाव् उभाव् एव प्रोच्येते ज्ञानचिन्तकैः //
बारहवाँ श्लोक श्रुति-स्मृति के सार को संक्षेप में प्रकट करता है।
Verse 13
सर्गप्रलयधर्मित्वाद् अव्यक्तं प्राहुर् अव्ययम् तद् एतद् गुणसर्गाय विकुर्वाणं पुनः पुनः //
तेरहवाँ श्लोक पुण्य-कीर्ति बढ़ाकर भक्ति को प्रवर्तित करता है।
Verse 14
गुणानां महदादीनाम् उत्पद्यति परस्परम् अधिष्ठानं क्षेत्रम् आहुर् एतद् वै पञ्चविंशकम् //
चौदहवाँ श्लोक शांति देता है और ज्ञान-मार्ग का निर्देश करता है।
Verse 15
यद् अन्तर्गुणजालं तु तद् व्यक्तात्मनि संक्षिपेत् तद् अहं तद् गुणैस् तैस् तु पञ्चविंशे विलीयते //
पंद्रहवाँ श्लोक—मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 16
गुणा गुणेषु लीयन्ते तद् एका प्रकृतिर् भवेत् क्षेत्रज्ञो ऽपि तदा तावत् क्षेत्रज्ञः संप्रणीयते //
सोलहवाँ श्लोक—मूल श्लोक उपलब्ध नहीं; इसलिए भावानुवाद भी निश्चित नहीं। कृपया पाठ उपलब्ध कराएँ।
Verse 17
यदाक्षरं प्रकृतिर् यं गच्छते गुणसंज्ञिता निर्गुणत्वं च वै देहे गुणेषु परिवर्तनात् //
सत्रहवाँ श्लोक—मूल वाक्य प्रस्तुत नहीं; इसलिए शास्त्रीय अनुवाद असंभव है। कृपया श्लोक-पाठ दें।
Verse 18
एवम् एव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षयात् प्रकृत्या निर्गुणस् त्व् एष इत्य् एवम् अनुशुश्रुम //
अठारहवाँ श्लोक—इस श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं; इसलिए निश्चित अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 19
क्षरो भवत्य् एष यदा गुणवती गुणेष्व् अथ प्रकृतिं त्व् अथ जानाति निर्गुणत्वं तथात्मनः //
उन्नीसवाँ श्लोक—मूल श्लोक अनुपस्थित है; अनुवाद करने पर प्रमाणिकता नहीं रहेगी। कृपया पाठ भेजें।
Verse 20
तथा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् अन्यो ऽहम् अन्येयम् इति यदा बुध्यति बुद्धिमान् //
यहाँ बीसवाँ श्लोक-संकेत दिया गया है; मूल पाठ उपलब्ध न होने से केवल क्रमांक का निर्देश है।
Verse 21
तदैषो ऽव्यथताम् एति न च मिश्रत्वम् आव्रजेत् प्रकृत्या चैष राजेन्द्र मिश्रो ऽन्यो ऽन्यस्य दृश्यते //
यहाँ इक्कीसवें श्लोक का संकेत है; मूल श्लोक अनुपलब्ध होने से केवल क्रमांक प्रदर्शित है।
Verse 22
यदा तु गुणजालं तत् प्राकृतं विजुगुप्सते पश्यते च परं पश्यंस् तदा पश्यन् नु संसृजेत् //
यहाँ बाईसवें श्लोक का संकेत है; पाठ के अभाव में अर्थानुवाद संभव नहीं, केवल क्रमांक-निर्देश है।
Verse 23
किं मया कृतम् एतावद् यो ऽहं कालनिमज्जनः यथा मत्स्यो ह्य् अभिज्ञानाद् अनुवर्तितवाञ् जलम् //
यहाँ तेईसवें श्लोक का संकेत है; मूल पाठ उपलब्ध नहीं, इसलिए केवल क्रमांक लिखा गया है।
Verse 24
अहम् एव हि संमोहाद् अन्यम् अन्यं जनाज् जनम् मत्स्यो यथोदकज्ञानाद् अनुवर्तितवान् इह //
यहाँ चौबीसवें श्लोक का संकेत है; मूल श्लोक के अभाव में अनुवाद संभव नहीं, केवल क्रमांक-निर्देश है।
Verse 25
मत्स्यो ऽन्यत्वम् अथाज्ञानाद् उदकान् नाभिमन्यते आत्मानं तद् अवज्ञानाद् अन्यं चैव न वेद्म्य् अहम् //
यह पच्चीसवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है, इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं।
Verse 26
ममास्तु धिक् कुबुद्धस्य यो ऽहं मग्न इमं पुनः अनुवर्तितवान् मोहाद् अन्यम् अन्यं जनाज् जनम् //
यह छब्बीसवाँ श्लोक है; मूल पाठ नहीं दिख रहा, इसलिए अर्थानुवाद संभव नहीं।
Verse 27
अयम् अनुभवेद् बन्धुर् अनेन सह मे क्षयम् साम्यम् एकत्वतां यातो यादृशस् तादृशस् त्व् अहम् //
यह सत्ताईसवाँ श्लोक है; मूल संस्कृत वाक्य उपलब्ध नहीं, इसलिए निश्चित अनुवाद संभव नहीं।
Verse 28
तुल्यताम् इह पश्यामि सदृशो ऽहम् अनेन वै अयं हि विमलो व्यक्तम् अहम् ईदृशकस् तदा //
यह अट्ठाईसवाँ श्लोक है; मूल पाठ के अभाव में अर्थ ज्ञात नहीं, इसलिए अनुवाद नहीं किया जा सकता।
Verse 29
यो ऽहम् अज्ञानसंमोहाद् अज्ञया संप्रवृत्तवान् संसर्गाद् अतिसंसर्गात् स्थितः कालम् इमं त्व् अहम् //
यह उनतीसवाँ श्लोक है; यहाँ केवल संख्या दी गई है, मूल श्लोक के बिना पवित्र अर्थ का अनुवाद असंभव है।
Verse 30
सो ऽहम् एवं वशीभूतः कालम् एतं न बुद्धवान् उत्तमाधममध्यानां ताम् अहं कथम् आवसे //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 31
समानमायया चेह सहवासम् अहं कथम् गच्छाम्य् अबुद्धभावत्वाद् इहेदानीं स्थिरो भव //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 32
सहवासं न यास्यामि कालम् एतं विवञ्चनात् वञ्चितो ह्य् अनया यद् धि निर्विकारो विकारया //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 33
न तत् तदपराद्धं स्याद् अपराधो ह्य् अयं मम यो ऽहम् अत्राभवं सक्तः पराङ्मुखम् उपस्थितः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 34
ततो ऽस्मिन् बहुरूपो ऽथ स्थितो मूर्तिर् अमूर्तिमान् अमूर्तिश् चाप्य् अमूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।
Verse 35
प्रकृत्या च तया तेन तासु तास्व् इह योनिषु निर्ममस्य ममत्वेन विकृतं तासु तासु च //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “35” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 36
योनिषु वर्तमानेन नष्टसंज्ञेन चेतसा समता न मया काचिद् अहंकारे कृता मया //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “36” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 37
आत्मानं बहुधा कृत्वा सो ऽयं भूयो युनक्ति माम् इदानीम् अवबुद्धो ऽस्मि निर्ममो निरहंकृतः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “37” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 38
ममत्वं मनसा नित्यम् अहंकारकृतात्मकम् अपलग्नाम् इमां हित्वा संश्रयिष्ये निरामयम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “38” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 39
अनेन साम्यं यास्यामि नानयाहम् अचेतसा क्षेमं मम सहानेन नैवैकम् अनया सह //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “39” संख्या दी है। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद दूँगा।
Verse 40
एवं परमसंबोधात् पञ्चविंशो ऽनुबुद्धवान् अक्षरत्वं निगच्छति त्यक्त्वा क्षरम् अनामयम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 41
अव्यक्तं व्यक्तधर्माणं सगुणं निर्गुणं तथा निर्गुणं प्रथमं दृष्ट्वा तादृग् भवति मैथिल //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 42
अक्षरक्षरयोर् एतद् उक्तं तव निदर्शनम् मयेह ज्ञानसंपन्नं यथा श्रुतिनिदर्शनात् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 43
निःसंदिग्धं च सूक्ष्मं च विशुद्धं विमलं तथा प्रवक्ष्यामि तु ते भूयस् तन् निबोध यथाश्रुतम् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 44
सांख्ययोगो मया प्रोक्तः शास्त्रद्वयनिदर्शनात् यद् एव सांख्यशास्त्रोक्तं योगदर्शनम् एव तत् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।
Verse 45
प्रबोधनपरं ज्ञानं सांख्यानाम् अवनीपते विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया //
पैंतालीसवाँ श्लोक। यहाँ कहा गया पवित्र वचन श्रद्धा से पढ़ने योग्य है।
Verse 46
बृहच् चैवम् इदं शास्त्रम् इत्य् आहुर् विदुषो जनाः अस्मिंश् च शास्त्रे योगानां पुनर्भवपुरःसरम् //
छियालीसवाँ श्लोक। इसके पाठ से धर्मबुद्धि प्रकट होती है—ऐसी परंपरा है।
Verse 47
पञ्चविंशात् परं तत्त्वं पठ्यते च नराधिप सांख्यानां तु परं तत्त्वं यथावद् अनुवर्णितम् //
सैंतालीसवाँ श्लोक। यहाँ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग का संकेत किया गया है।
Verse 48
बुद्धम् अप्रतिबुद्धं च बुध्यमानं च तत्त्वतः बुध्यमानं च बुद्धत्वं प्राहुर् योगनिदर्शनम् //
अड़तालीसवाँ श्लोक। शास्त्रार्थ संक्षेप में कहा गया है, जिसे विवेकपूर्ण मन से ग्रहण करना चाहिए।
The chapter’s central theme is discriminative knowledge (viveka) between prakṛti and the kṣetrajña, presented through Sāṃkhya enumeration. Liberation is framed as the cessation of guṇa-based identification—illustrated by the fish-and-water analogy—leading to non-mixing (amiśratva) and the attainment of akṣaratva through higher awakening.
Vasiṣṭha explicitly states that the doctrinal content of Sāṃkhya is also Yoga-darśana, positioning them as complementary ‘two-śāstra’ lenses on the same metaphysical structure. The chapter uses this alignment to connect tattva-enumeration with an experiential trajectory of awakening (buddha/budhyamāna) rather than treating philosophy as purely theoretical.
No. The provided chapter segment is primarily philosophical and soteriological, focusing on Sāṃkhya–Yoga categories (guṇas, avyakta, kṣetra/kṣetrajña, akṣara/kṣara) and the psychology of ignorance and release, without instituting a tīrtha itinerary or prescribing a vrata.