परस्परस्य विद्या वै तन् निबोधानुपूर्वशः यथोक्तम् ऋषिभिस् तात सांख्यस्यातिनिदर्शनम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ यहाँ उपलब्ध नहीं है; कृपया ब्रह्मपुराण 244.3 का श्लोक दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।