
धृतराष्ट्रस्य बलाबलचिन्ता (Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Strength and Preference for Śama)
Upa-parva: Sañjaya–Dhṛtarāṣṭra Strategic Counsel (Power Assessment and Śama-Orientation)
Vaiśampāyana narrates that Dhṛtarāṣṭra, described as prajñācakṣuḥ (insightful despite blindness), hears Sañjaya’s words and begins a fine-grained evaluation of their merits and faults (guṇa–doṣa). He then proceeds to assess comparative strength (bala–abala) with factual intent (yāthātathya), concluding that the Pāṇḍavas possess superior power, intensified by both human prowess and divine supports. Dhṛtarāṣṭra expresses unceasing concern regarding Duryodhana, grounding his view in direct apprehension rather than inference. He reflects on reciprocity ethics—how beings act for their own kin and how beneficiaries often wish to repay benefactors—then applies this to anticipated divine and allied support for the Pāṇḍavas (including recollection of Agni’s assistance at Khāṇḍava). The chapter concentrates on Arjuna’s deterrent profile: the divinity of the Gāṇḍīva bow, inexhaustible quivers, emblematic banner, formidable chariot and sound, and extraordinary archery capacity, corroborated by acknowledged authorities (Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, others). The discourse culminates in Dhṛtarāṣṭra’s sleeplessness and his policy conclusion: the Kuru crisis is at a peak of potential ruin and rise, and its termination is achievable only through śama; he prefers peace and judges the Pāṇḍavas consistently stronger than the Kurus.
Chapter Arc: संजय के वचनों को सुनकर ‘प्रज्ञाचक्षु’ धृतराष्ट्र भीतर-ही-भीतर युद्ध के परिणाम को तौलने लगता है—कौरव-पाण्डवों की शक्ति का सूक्ष्म तुलनात्मक विचार उसके मन में तूफ़ान उठा देता है। → वह गुण-दोषों का ‘सौक्ष्म्येण’ परीक्षण करता है: अपने पुत्रों की विजय-इच्छा और राज्य-रक्षा की चिंता एक ओर, और पाण्डवों की अद्भुत सामर्थ्य (अर्जुन का दिव्य गाण्डीव, ध्वज, रथ-वैभव; भीष्म-द्रोण-कृप जैसे रक्षकों का भय) दूसरी ओर—हर गणना उसे शांति की ओर धकेलती है। → रात-दिन अनिद्र, नि:सुख होकर वह निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचता है: यह कलह कुरुओं के लिए ‘क्षयोदय’ का महाविप्लव बन सकता है; शम (समझौता) के अतिरिक्त कोई अंत नहीं दिखता, क्योंकि वह पाण्डवों को कौरवों से अधिक शक्तिमान मानता है। → धृतराष्ट्र का विवेचन स्पष्ट हो जाता है—विग्रह नहीं, शांति ही उसे नित्य रुचती है; वह अपने मन में युद्ध-परिणाम की भयावहता स्वीकार कर लेता है और शम-चिंतन को ही उपाय मानता है। → यह विवेक क्या दुर्योधन के हठ को मोड़ पाएगा, या धृतराष्ट्र का ज्ञान पुत्रमोह के आगे फिर निष्फल हो जाएगा?
Verse 1
अड-#--#क्रञ षष्टितमो< ध्याय: धृतराष्ट्रके द्वारा कौरव-पाण्डवोंकी शक्तिका तुलनात्मक वर्णन वैशम्पायन उवाच संजयस्य वच: श्र॒त्वा प्रज्ञाचक्षुर्जनेश्वर: । ततः संख्यातुमारेभे तद्गूग्ो गुणदोषत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! संजयकी बात सुनकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रने उसके वचनके गुण-दोषका विवेचन आरम्भ किया
Vaiśampāyana said: Hearing Sañjaya’s words, the lord of men Dhṛtarāṣṭra—though blind, yet ‘seeing’ through understanding—then began to weigh and reckon the matter, examining it in terms of its merits and faults.
Verse 2
प्रसंख्याय च सौक्ष्म्मेण गुणदोषान् विचक्षण: । यथावन्मतितत्त्वेन जयकाम: सुतान् प्रति
Having carefully and subtly weighed the merits and faults, the discerning one—seeking victory—formed a judgment grounded in what was truly right, with his sons in view.
Verse 3
बलाबल विनिश्ित्य याथातथ्येन बुद्धिमान् (यदा तु मेने भूयिष्ठं तद्भबाद्यो गुणदोषत: । पुनरेव कुरूणां च पाण्डवानां च बुद्धिमान् ।। ) शक्ति संख्यातुमारेभे तदा वै मनुजाधिप:
Having carefully ascertained strength and weakness with a clear, reality-based judgment, the wise king—when he had concluded which side was superior in view of merits and faults—once again began to reckon the power of both the Kurus and the Pāṇḍavas.
Verse 4
अपने पुत्रोंकी विजय चाहनेवाले विद्वान् एवं बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने बुद्धितत्त्वके द्वारा उक्त वचनके सूक्ष्म-से-सूक्ष्म गुण-दोषोंकी यथावत् समीक्षा करके दोनों पक्षोंकी प्रबलता एवं निर्बलताका यथार्थरूपसे निश्चय कर लिया। तत्पश्चात् जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि गुण-दोषकी दृष्टिसे श्रीकृष्णका कथन सर्वोत्कृष्ट है, तब उन बुद्धिमान् नरेशने पुनः कौरवों और पाण्डवोंकी शक्तिपर विचार करना आरम्भ किया ।। देवमानुषयो: शक्त्या तेजसा चैव पाण्डवान् । कुरून् शक््त्याल्पतरया दुर्योधनमथाब्रवीत्,पाण्डवोंमें दैवी शक्ति, मानवी शक्ति तथा तेज--इन सभी दृष्टियोंसे उत्कृष्टता प्रतीत हुई और कौरव-पक्षकी शक्ति अल्प जान पड़ी, इस प्रकार विचार करके धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा--
Vaiśaṃpāyana said: Dhṛtarāṣṭra—though intent on securing victory for his own sons—carefully weighed, with subtle discernment, the merits and faults in the counsel that had been spoken, and thus judged the true strengths and weaknesses of both sides. Convinced that Kṛṣṇa’s reasoning was ethically and strategically superior, he again reflected on the power of the Kauravas and the Pāṇḍavas. Seeing the Pāṇḍavas as pre-eminent in divine support, human capability, and splendor, and the Kauravas as comparatively weaker, he then addressed Duryodhana.
Verse 5
दुर्योधनेयं चिन्ता मे शश्वन्न व्युपशाम्यति । सत्यं होतदहं मन्ये प्रत्यक्ष नानुमानत:,“वत्स दुर्योधन! मेरी यह चिन्ता कभी दूर नहीं होती है, क्योंकि तुम्हारा पक्ष दुर्बल है। मैं यह बात अनुमानसे नहीं कहता हूँ; प्रत्यक्ष देख रहा हूँ; अतः इसीको सत्य मानता हूँ
Vaiśampāyana said: “My concern about Duryodhana never truly subsides. I hold this to be the truth—not as a mere inference, but from direct perception.”
Verse 6
(ईदृशेडभिनिविष्टस्य पृथिवीक्षयकारके । अधर्म्यें चायशस्ये वा कार्ये महति दारुणे ।। पाण्डवैर्विग्रहस्तात सर्वथा मे न रोचते ।। ) “तुम ऐसे कार्यके लिये दुराग्रह करते हो, जो समस्त भूमण्डलका विनाश करनेवाला है। यह अधर्मकारक तो है ही, अपयशकी भी वृद्धि करनेवाला है; इसके सिवा यह अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म है। तात! तुम्हारा पाण्डवोंके साथ युद्ध छेड़ना मुझे किसी भी तरह अच्छा नहीं लग रहा है। आत्मजेषु परं स्नेहं सर्वभूतानि कुर्वते । प्रियाणि चैषां कुर्वन्ति यथाशक्ति हितानि च,“संसारके समस्त प्राणी अपने पुत्रोंपर अत्यन्त स्नेह करते हैं तथा अपनी शक्तिके अनुसार इनका प्रिय एवं हितसाधन करते हैं
Vaiśaṃpāyana said: “To persist with such obstinacy in an undertaking that would bring ruin upon the whole earth—an act that is unrighteous, that multiplies disgrace, and that is exceedingly cruel—does not please me at all. Dear one, I cannot approve in any way of your opening hostilities with the Pāṇḍavas. For all beings in the world bear the deepest affection for their own sons, and, according to their capacity, strive to do what is pleasing and beneficial for them.”
Verse 7
एवमेवोपकर्तणां प्रायशो लक्षयामहे । इच्छन्ति बहुलं सन्त: प्रतिकर्तु महत् प्रियम्
Vaiśampāyana said: “So too, in the case of those who render help, we commonly observe this: good people, in great measure, long to repay a great kindness with a fitting return.”
Verse 8
“इसी प्रकार प्रायः यह भी देखता हूँ कि साधु पुरुष उपकारी मनुष्योंके उपकारका बदला चुकानेके लिये उनका बारंबार महान् प्रिय कार्य करना चाहते हैं ।। अग्नि: साचिव्यकर्ता स्यात् खाण्डवे तत्कृतं स्मरन् । अर्जुनस्यापि भीमे5स्मिन् कुरुपाण्डुसमागमे,“कौरव-पाण्डवोंके इस भयंकर संग्राममें अग्निदेव भी खाण्डववनमें अर्जुनके किये हुए उपकारको याद करके उनकी सहायता अवश्य करेंगे
Vaiśaṃpāyana said: “Agni will surely act as an ally, remembering the service done to him in the Khāṇḍava forest. Thus, in this dreadful assembly and clash of the Kurus and Pāṇḍavas, he will come to Arjuna’s aid.” The passage underscores a moral expectation: the noble repeatedly seek opportunities to repay benefactors with deeds that are truly pleasing and substantial.
Verse 9
जातिगृद्धयाभिपन्नाश्न पाण्डवानामनेकश: । धर्मादय: समेष्यन्ति समाहूता दिवौकस:,“इसके सिवा पाण्डवोंका जन्म अनेक देवताओंसे हुआ है, इसलिये वे धर्म आदि देवता युधिष्ठिर आदिके बुलानेपर उनकी सहायताके लिये अवश्य पधारेंगे
Vaiśampāyana said: Moved by attachment to their own lineage and bonds of kinship, the gods connected with the Pāṇḍavas in many ways—Dharma and the others, the heavenly beings—will surely assemble when summoned, coming to aid Yudhiṣṭhira and his brothers.
Verse 10
भीष्मद्रोणकृपादीनां भयादशनिसंनि भम् । रिरक्षिषन्त: संरम्भं गमिष्यन्तीति मे मति:,'भीष्म, द्रोण और कृप आदिके भयसे पाण्डवोंकी रक्षा चाहते हुए देवतालोग भीष्म आदिपर वज्रके समान भयंकर क्रोध करेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है
Vaiśampāyana said: “Out of fear of Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, and the others, the gods—seeking to protect the Pāṇḍavas—will be driven into a wrath as terrible as a thunderbolt against Bhīṣma and his party; such is my conviction.”
Verse 11
ते देवैः सहिता: पार्था न शक्या: प्रतिवीक्षितुम् । मानुषेण नरव्याप्रा वीर्यवन्तो<स्त्रपारगा:,“नरश्रेष्ठ पाण्डव अस्त्रविद्याके पारंगत और पराक्रमी तो हैं ही, देवताओंका सहयोग भी प्राप्त कर चुके हैं; अतः कोई मनुष्य उनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता
Vaiśampāyana said: The Pārthas, strengthened by the support of the gods, cannot even be faced eye to eye by any mere human. Engaged in the work of men yet endowed with heroic power and complete mastery of weapons, they stand beyond ordinary opposition.
Verse 12
दुरासदं यस्य दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । वारुणौ चाक्षयौ दिव्यौ शरपूर्णो महेषुधी,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśampāyana said: “He whose supreme bow is the divine Gāṇḍīva, hard for any foe to withstand; whose two divine, inexhaustible quivers—gifts of Varuṇa—are filled with arrows; and who is a great wielder of missiles.”
Verse 13
वानरश्न ध्वजो दिव्यो नि:सड़ो धूमवद्गति: । रथश्न चतुरन्तायां यस्य नास्ति सम: क्षितौ,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
His divine banner bearing the monkey is unobstructed, swift as smoke; and on the earth in all four quarters there is no chariot equal to his.
Verse 14
महामेघनिभश्नापि निर्घोष: श्रूयते जनै: । महाशनिसम: शब्द: शात्रवाणां भयंकर:,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “People hear a rumbling roar as if it were the thunder of great clouds; its sound, like a mighty thunderbolt, is terrifying to the enemy host.”
Verse 15
यं चातिमानुषं वीर्ये कृत्स्नो लोको व्यवस्यति । देवानामपि जेतारं यं विदु: पार्थिवा रणे,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “Him whom the whole world judges to possess superhuman prowess—him whom kings in battle regard as capable of conquering even the gods.”
Verse 16
शतानि पज्च चैवेषून् यो गृह्नन् नैव दृश्यते । निमेषान्तरमात्रेण मुछ्चन् दूरं च पातयन्,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “He who, taking up five hundred arrows, is not seen at all; who, within the space of a single blink, releases them and makes them strike far-off targets.”
Verse 17
यमाह भीष्मो द्रोणश्न कृपो द्रौणिस्तथैव च । मद्रराजस्तथा शल्यो मध्यस्था ये च मानवा:,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “This is what Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, Droṇa’s son (Aśvatthāman), the king of Madra, Śalya, and even those who stand neutral among men declare.”
Verse 18
युद्धायावस्थितं पार्थ पार्थिवैरतिमानुषै: । अशक्यं नरशार्दूलं पराजेतुमरिंदमम्,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “O Pārtha, even for kings endowed with superhuman might, it is impossible to defeat that tiger among men—Arjuna, the subduer of foes—who stands ready for battle.”
Verse 19
क्षिपत्येकेन वेगेन पजच बाणशतानि य: । सदृशं बाहुवीयेंण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम्,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “That Pāṇḍava who, in a single surge of speed, can discharge five hundred arrows, and whose strength of arm is comparable to that of Kārtavīrya—him I behold in this great battle as though he were already destroying the enemy hosts.”
Verse 20
तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् । निध्नन्तमिव पश्यामि विमर्देडस्मिन् महाहवे,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
Vaiśaṃpāyana said: “In this great clash of arms, I seem to behold that mighty bowman Arjuna—whose prowess is like that of Mahendra (Indra) and Upendra (Viṣṇu)—as though he were striking down the enemy.”
Verse 21
इत्येवं चिन्तयत् कृत्स्नमहोरात्राणि भारत । अनिद्रो नि:ःसुखश्नास्मि कुरूणां शमचिन्तया,“भारत! मैं दिन-रात यही सब सोचते-सोचते नींद नहीं ले पाता हूँ। कुरुवंशियोंमें कैसे शान्ति बनी रहे--इस चिन्तासे मेरा सारा सुख छिन गया है
Vaiśampāyana said: “O Bhārata, thinking in this manner through entire days and nights, I find no sleep. All my happiness has been taken away by anxiety over how peace might be secured among the Kurus.”
Verse 22
क्षयोदयो<यं सुमहान् कुरूणां प्रत्युपस्थित: । अस्य चेत् कलहस्यान्त: शमादन्यो न विद्यते,“कौरवोंके लिये यह महान् विनाशका अवसर उपस्थित हुआ है। तात! यदि इस कलहका अन्त करनेके लिये संधिके सिवा और कोई उपाय नहीं है तो मुझे सदा संधिकी ही बात अच्छी लगती है; कुन्तीपुत्रोंके साथ युद्ध छेड़ना ठीक नहीं है। मैं सदा पाण्डवोंको कौरवोंसे अधिक शक्तिशाली मानता हूँ”
Vaiśaṃpāyana said: “A vast turning-point of ruin and upheaval has come upon the Kurus. If the end of this quarrel cannot be achieved by any means other than pacification and settlement, then settlement alone seems right to me. To provoke war with the sons of Kuntī is not proper; I have always regarded the Pāṇḍavas as stronger than the Kauravas.”
Verse 23
शमो मे रोचते नित्य॑ पार्थैसतात न विग्रह: । कुरुभ्यो हि सदा मन्ये पाण्डवान् शक्तिमत्तरान्,“कौरवोंके लिये यह महान् विनाशका अवसर उपस्थित हुआ है। तात! यदि इस कलहका अन्त करनेके लिये संधिके सिवा और कोई उपाय नहीं है तो मुझे सदा संधिकी ही बात अच्छी लगती है; कुन्तीपुत्रोंके साथ युद्ध छेड़ना ठीक नहीं है। मैं सदा पाण्डवोंको कौरवोंसे अधिक शक्तिशाली मानता हूँ”
Vaiśampāyana said: “Peace is always pleasing to me; with the sons of Pṛthā I do not approve of conflict. For I have long held that the Pāṇḍavas are stronger than the Kurus. Therefore, for the Kauravas this moment has become an opening toward great ruin; if ending this strife admits of no remedy other than a settlement, then settlement alone is what I continually commend.”
Verse 60
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि यानसंधिपर्वणि धृतराष्ट्रविवेचने षष्टितमो5ध्याय: ।। ६० || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत यानसंधिपर्वमें धृतराष्टरके द्वारा कौरव- पाण्डवोंकी शक्तिका विवेचनसम्बन्धी साठवाँ अध्याय पूरा हुआ
Thus ends the sixtieth chapter of the Udyoga Parva of the Śrī Mahābhārata, within the section on the journey and negotiations (Yāna–Saṃdhi Parvan), where Dhṛtarāṣṭra reflects on and weighs the respective powers of the Kauravas and the Pāṇḍavas. The chapter closes by framing this assessment as part of the moral and political deliberation preceding war—an attempt to understand strength, counsel, and consequence before irrevocable action.
The dilemma is whether a ruler should permit escalation driven by factional loyalty and pride when evidence suggests disproportionate risk, or instead pursue śama as the ethically and strategically responsible termination of conflict.
Governance requires disciplined discernment: evaluate counsel by guṇa–doṣa, prefer factual assessment over conjecture, and adopt restraint when coercive action threatens collective harm beyond any plausible gain.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is diagnostic—positioning the listener to interpret subsequent events as consequences of ignored prudential and ethical counsel centered on śama.