महामेघनिभश्नापि निर्घोष: श्रूयते जनै: । महाशनिसम: शब्द: शात्रवाणां भयंकर:,“जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है--धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्व॒त्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाथनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ
mahāmeghanibhaś cāpi nirghoṣaḥ śrūyate janaiḥ | mahāśanisamaḥ śabdaḥ śātravāṇāṃ bhayaṅkaraḥ ||
Vaiśaṃpāyana said: “People hear a rumbling roar as if it were the thunder of great clouds; its sound, like a mighty thunderbolt, is terrifying to the enemy host.”
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights how righteous martial power is not only physical but also psychological: the very sound of a great warrior’s approach can break enemy morale, suggesting that fear and confidence are decisive forces in dharmic conflict.
Vaiśaṃpāyana describes the terrifying roar—likened to storm-cloud thunder and a thunderbolt—that is heard by all and strikes fear into the enemy ranks, as part of a larger portrayal of the Pandava side’s formidable war-readiness (especially Arjuna’s might in the surrounding passage).