
Śiva-nāmānukīrtana-prastāvaḥ (Prologue to the praise of Śiva and the Upamanyu testimony)
Upa-parva: Śiva-mahātmyānuśāsana (Śiva-stuti and the economy of boons)
Chapter 14 opens with Yudhiṣṭhira requesting Bhīṣma to enumerate Śiva’s names and explain Śiva’s auspicious supremacy “tattvataḥ.” Bhīṣma redirects the competence of the account to Vāsudeva (Kṛṣṇa), presenting the tradition of a thousand divine names transmitted by Taṇḍin in Brahmaloka. Vāsudeva then frames a theological epistemology: the full trajectory of Īśvara’s karmic governance is not knowable even to subtle-seeing gods and sages, yet some attributes can be narrated for instruction. The chapter transitions into an embedded autobiographical/legendary chain: Jāmbavatī’s request for a son, Kṛṣṇa’s departure under auspicious blessings, the arrival at Himavat, and the detailed depiction of Upamanyu’s divine āśrama (flora, fauna, ascetic practices, and ritual soundscape). The narrative culminates in Upamanyu’s encounter with Śiva (including deceptive Indra-form), Upamanyu’s exclusive allegiance to Paśupati, Śiva’s revelation with Pārvatī and divine retinue, the description of Śiva’s weapons (notably Pāśupata and Śūla), and a sustained stuti that identifies Śiva as the underlying principle across gods, cosmic functions, and metaphysical categories. Boons follow: enduring youth, knowledge, sustenance, and continued darśana—presented as the ethical fruit of unwavering devotion and disciplined practice.
Chapter Arc: शरशय्या पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर को आज्ञा देते हैं कि वह श्रीकृष्ण के साथ महादेव शंकर के विश्वरूप, तत्त्व और महिमा का श्रवण करे—क्योंकि वही अव्यक्त-कारण, देवासुर-गुरु और सर्वव्यापी होकर भी अदृश्य हैं। → भीष्म स्वीकार करते हैं कि महादेव के गुणों का पूर्ण वर्णन उनकी सामर्थ्य से परे है; फिर भी वे अनेक दिव्य आख्यानों और स्तुतियों के सहारे शिव-तत्त्व को खोलते हैं—भक्तों को वर, देवताओं को आश्रय, और असंभव को संभव करने वाली शिव-कृपा के उदाहरणों सहित। → विश्वरूप महेश्वर का तेज—अग्नि-प्रभा की भाँति—मेघ-गर्जना सहित आकाश को व्याप्त करता है, मानो सहस्र सूर्य एक साथ उदित हों; तीनों लोकों के बीच शरद्-मेघों से मुक्त परिधिस्थ सूर्य की तरह शिव का दिव्य रूप स्थिर होकर प्रकट होता है। → भीष्म शिव-चरित और शिव-भक्ति के फल को निष्कर्षित करते हैं: इन्द्र जैसे देव भी काशी में भस्मभूषित दिगम्बर महादेव की आराधना से देवराजत्व पाते हैं; नारद-प्रदत्त गान/गीति-उपासना जैसी नित्य साधना से भक्त शिव के अनुग्रह-पथ पर चलता है। → भीष्म आगे के उपाख्यानों की ओर संकेत करते हैं—परशुराम द्वारा पृथ्वी को त्रिःसप्तकृत्वः नि:क्षत्रिया करने जैसे महाकर्म भी शिव/दैवी वर-सम्बन्ध और धर्म-सीमा के प्रश्न उठाते हैं—जिनका विस्तार आगामी अध्यायों में होगा।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २०४३ “लोक मिलाकर कुल २१०३ श्लोक हैं) भी्न्आा+ज (2) आस मना चतुर्दशो<5 ध्याय: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन युधिछ्िर उवाच त्वया55पगेन नामानि श्रुतानीह जगत्पते: । पितामहेशाय विभो नामान्याचक्ष्व शम्भवे,युधिष्ठिरने कहा--गंगानन्दन! आपने ब्रह्माजीके भी ईश्वर कल्याणकारी जगदीश्वर भगवान् शिवके जो नाम सुने हों, उन्हें यहाँ बताइये
যুধিষ্ঠির বললেন—হে গঙ্গানন্দন! আপনি এখানে জগত্পতি, ব্রহ্মারও ঈশ্বর, সর্বব্যাপী কল্যাণময় শম্ভুর পবিত্র নামসমূহ শুনেছেন। অনুগ্রহ করে সেই নামগুলি আমাকে বলুন।
Verse 2
बश्रवे विश्वरूपाय महाभाग्यं च तत्त्वतः । सुरासुरगुरौ देवे शंकरेडव्यक्तयोनये,जो विराट विश्वरूपधारी हैं, अव्यक्तके भी कारण हैं, उन सुरासुरगुरु भगवान् शंकरके माहात्म्यका यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये
যুধিষ্ঠির বললেন—যিনি বিরাট বিশ্বরূপধারী, যিনি অব্যক্তেরও কারণ, দেব-অসুর উভয়ের গুরু সেই দেব শংকরের সত্যস্বরূপ মহিমা ও পরম সৌভাগ্য যথার্থভাবে আমাকে বলুন।
Verse 3
भीष्म उवाच अशक्तोडहं गुणान् वक्तुं महादेवस्य धीमतः । यो हि सर्वगतो देवो न च सर्वत्र दृश्यते
ভীষ্ম বললেন—প্রাজ্ঞ মহাদেবের গুণসমূহ সম্পূর্ণভাবে বর্ণনা করতে আমি অক্ষম; কারণ তিনি সর্বত্র ব্যাপ্ত, তবু সর্বত্র দৃশ্যমান নন।
Verse 4
ब्रह्मविष्णुसुरेशानां स्रष्टा च प्रभुरेव च । ब्रह्मादय: पिशाचान्ता यं हि देवा उपासते
ভীষ্ম বললেন—তিনি একাই ব্রহ্মা, বিষ্ণু এবং দেবেশ্বরদেরও স্রষ্টা ও পরম প্রভু। ব্রহ্মা থেকে পিশাচ পর্যন্ত সকল সত্তা—দেবতাসহ—যাঁর উপাসনা করে।
Verse 5
प्रकृतीनां परत्वेन पुरुषस्य च य: पर: । चिन्त्यते यो योगविद्धिर््रषिभिस्तत्त्वदर्शिभि: । अक्षरं परम॑ ब्रह्म असच्च सदसच्च य:
ভীষ্ম বললেন—যে পরম তত্ত্ব প্রকৃতির (ত্রিগুণের) ঊর্ধ্বে এবং পুরুষেরও অতীত, যাকে যোগবিদ্যা-জ্ঞানী তত্ত্বদর্শী ঋষিগণ ধ্যান করেন—সেই অক্ষর, পরম ব্রহ্ম; যিনি অসৎ ও সৎ—উভয়ের অতীত হয়েও উভয়কে ধারণ করেন।
Verse 6
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षो भयित्वा स्वतेजसा । ब्रह्माणमसृजत् तस्माद् देवदेव: प्रजापति:
ভীষ্ম বললেন—দেবদেব প্রজাপতি স্বীয় তেজে প্রকৃতি ও পুরুষ—উভয়কে আন্দোলিত করে, তারপর ব্রহ্মাকে সৃষ্টি করলেন।
Verse 7
को हि शक्तो गुणान् वक्तुं देवदेवस्प धीमत: । गर्भजन्मजरायुक्तो मर्त्यों मृत्युसमन्वित:
ভীষ্ম বললেন—যে মর্ত্য গর্ভধারণ, জন্ম ও জরা-ক্ষয়ের বন্ধনে আবদ্ধ এবং যার সঙ্গে মৃত্যু অবধারিত—সে কীভাবে দেবদেব সেই প্রজ্ঞাবান প্রভুর গুণাবলি বর্ণনা করতে সক্ষম হবে?
Verse 8
भीष्मजी कहते हैं--राजन! मैं परम बुद्धिमान महादेवजीके गुणोंका वर्णन करनेमें असमर्थ हूँ। जो भगवान् सर्वत्र व्यापक हैं
ভীষ্ম বললেন—রাজন! আমি পরম বুদ্ধিমান বলেও মহাদেবের গুণাবলি বর্ণনা করতে অক্ষম। তিনি সর্বব্যাপী, তবু সর্বত্র দৃশ্যমান নন—কারণ তিনি সকলের অন্তরাত্মা। তিনি ব্রহ্মা, বিষ্ণু ও দেবরাজ ইন্দ্রেরও স্রষ্টা ও প্রভু। ব্রহ্মা প্রভৃতি দেবতা থেকে পিশাচ পর্যন্ত সকলেই তাঁর উপাসনা করে। তিনি প্রকৃতিরও ঊর্ধ্বে এবং পুরুষের থেকেও স্বতন্ত্র; যোগবিদ্যা-জ্ঞানী তত্ত্বদর্শী ঋষিগণ যাঁকে ধ্যান করেন। তিনি অবিনশ্বর, পরম ব্রহ্ম—সৎ ও অসৎ উভয়কে নিজের স্বরূপে ধারণকারী। সেই দেবাধিদেব প্রজাপতি শিবই স্বীয় তেজে প্রকৃতি ও পুরুষকে আন্দোলিত করে ব্রহ্মার সৃষ্টিকে প্রবাহিত করেছিলেন। গর্ভ, জন্ম, জরা ও মৃত্যুবদ্ধ কোন মর্ত্য তাঁর গুণ যথার্থভাবে বর্ণনা করতে পারে? আর পুত্র! শঙ্খ-চক্র-গদাধারী নারায়ণ ব্যতীত, আমার মতো কে পরমেশ্বর শিবের তত্ত্ব জানতে সক্ষম?
Verse 9
एष विद्वान गुणश्रेष्ठो विष्णु: परमदुर्जय: । दिव्यचक्षुर्महातेजा वीक्षते योगचक्षुषा
ভীষ্ম বললেন—এই বিষ্ণু সর্বজ্ঞ, গুণে সর্বশ্রেষ্ঠ এবং পরম অজেয়। দিব্য দৃষ্টিসম্পন্ন, মহাতেজস্বী ভগবান যোগচক্ষে সবই দেখেন।
Verse 10
रुद्रभवत्या तु कृष्णेन जगद् व्याप्तं महात्मना । त॑ं प्रसाद्य तदा देवं बदर्या किल भारत
ভীষ্ম বললেন—রুদ্রশক্তিসম্পন্ন মহাত্মা কৃষ্ণ এই সমগ্র জগৎকে পরিব্যাপ্ত করেছেন। হে ভারত! শোনা যায়, প্রাচীনকালে বদরীতে মহাদেবকে প্রসন্ন করে দিব্যদৃষ্টিসম্পন্ন মহেশ্বরের কাছ থেকে তিনি সকল প্রাপ্তির ঊর্ধ্বে এক অতুল প্রিয়ত্ব লাভ করেছিলেন; তাই তিনি সর্বলোকের প্রিয়তম হয়েছিলেন।
Verse 11
अर्थात् प्रियतरत्वं च सर्वलोकेषु वै तदा । प्राप्तवानेव राजेन्द्र सुवर्णक्षान्महेश्वरात्
ভীষ্ম বললেন—হে রাজেন্দ্র! এইভাবে তিনি তখন সর্বলোকেই সর্বাধিক প্রিয় হয়ে উঠলেন—যেন মহেশ্বরের কাছ থেকেই সেই প্রিয়ত্ব লাভ করেছিলেন। হে ভরতনন্দন! বলা হয়, পূর্বকালে বদরিকাশ্রমে মহাদেবকে সন্তুষ্ট করে, দিব্যদৃষ্টিসম্পন্ন মহেশ্বরের কাছ থেকে কৃষ্ণ সকল সিদ্ধির ঊর্ধ্বে এক অতুল প্রিয়ত্ব লাভ করেন; তাই তিনি সর্বত্র সকল জীবের প্রিয়তম হন।
Verse 12
पूर्ण वर्षमहस्रं तु तप्तवानेष माधव: । प्रसाद्य वरदं देवं चराचरगुरुं शिवम्,इन माधवने वरदायक देवता चराचरगुरु भगवान् शिवको प्रसन्न करते हुए पूर्वकालमें पूरे एक हजार वर्षतक तपस्या की थी
ভীষ্ম বললেন—এই মাধব প্রাচীনকালে পূর্ণ এক হাজার বছর তপস্যা করেছিলেন। সেই দীর্ঘ তপস্যায় তিনি বরদাতা, স্থাবর-জঙ্গমের গুরু, শিবকে প্রসন্ন করেছিলেন।
Verse 13
युगे युगे तु कृष्णेन तोषितो वै महेश्वर: । भकक्त्या परमया चैव प्रीतश्चैव महात्मन:,श्रीकृष्णने प्रत्येक युगमें महेश्वरको संतुष्ट किया है। महात्मा श्रीकृष्णकी परम भक्तिसे वे सदा प्रसन्न रहते हैं
ভীষ্ম বললেন—যুগে যুগে কৃষ্ণই মহেশ্বরকে সন্তুষ্ট করেছেন। মহাত্মা কৃষ্ণের পরম ভক্তিতে তিনি সদা প্রীত ও প্রসন্ন থাকেন।
Verse 14
ऐश्वर्य यादृशं तस्य जगद्योनेर्महात्मन: । तदयं दृष्टवान् साक्षात् पुत्रार्थे हरिरच्युत:
ভীষ্ম বললেন—জগতের উৎস ও কারণ সেই মহাত্মা শিবের যে ঐশ্বর্য, পুত্রলাভের উদ্দেশ্যে তপস্যা করতে করতে অচ্যুত হরি তা প্রত্যক্ষ দর্শন করেছিলেন।
Verse 15
यस्मात् परतरं चैव नान्यं पश्यामि भारत | व्याख्यातुं देवदेवस्य शक्तो नामान्यशेषत:
হে ভারত! সেই অতুল ঐশ্বর্যের কারণেই পরাৎপর শ্রীকৃষ্ণ ব্যতীত আর কাউকে আমি এমন সক্ষম দেখি না, যিনি দেবাধিদেব মহাদেবের নামসমূহ সম্পূর্ণরূপে, অবশিষ্ট না রেখে, ব্যাখ্যা করতে পারেন।
Verse 16
एष शक्तो महाबाहुर्वक्तुं भगवतो गुणान् । विभूतिं चैव कार्त्स्न्येन सत्यां माहेश्वरी नूप
হে নরেশ্বর! এই মহাবাহু শ্রীকৃষ্ণই একমাত্র সক্ষম—ভগবান মহেশ্বরের গুণাবলি এবং তাঁর সত্য, মাহেশ্বরী ঐশ্বর্যকে সম্পূর্ণরূপে বর্ণনা করতে।
Verse 17
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा तदा भीष्मो वासुदेवं॑ महायशा: । भवमाहात्म्यसंयुक्तमिदमाह पितामह:
বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! এ কথা বলে মহাযশস্বী পিতামহ ভীষ্ম, বাসুদেবকে উপলক্ষ করে, ভব (শংকর)-মাহাত্ম্যে সংযুক্ত এই বচন উচ্চারণ করলেন।
Verse 18
भीष्म उवाच सुरासुरगुरो देव विष्णो त्वं वक्तुमहसि । शिवाय विश्वरूपाय यन्मां पृच्छद् युधिष्ठिर:
ভীষ্ম বললেন—হে দেব! দেবাসুরগুরু বিষ্ণো! যুধিষ্ঠির আমাকে বিশ্বরূপ শিবের মাহাত্ম্য সম্বন্ধে যা জিজ্ঞাসা করেছেন, তা বলার যোগ্য আপনি একাই।
Verse 19
नाम्नां सहस्र॑ं देवस्य तण्डिना ब्रह्मयोनिना । निवेदितं ब्रह्मलोके ब्रह्मणो यत् पुराभवत्
দেবের সহস্র নাম ব্রহ্মযোনি তণ্ডি দ্বারা ব্রহ্মলোকে নিবেদিত হয়েছিল—যা প্রাচীনকালে ব্রহ্মা থেকে উদ্ভূত হয়েছিল।
Verse 20
द्वैपायनप्रभूतयस्तथा चेमे तपोधना: । ऋषय: सुव्रता दान्ता: शृण्वन्तु गदतस्तव
ভীষ্ম বললেন—দ্বৈপায়ন প্রমুখ এই ঋষিগণ এবং তপোধন, উত্তম-ব্রতধারী ও দান্ত মহর্ষিরা, তুমি যা বলবে তা শ্রবণ করুন।
Verse 21
पूर्वकालमें ब्रह्मपुत्र तण्डीमुनिके द्वारा ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके समक्ष जिस शिव- सहस्रनामका निरूपण किया गया था, उसीका आप वर्णन करें और ये उत्तम व्रतका पालन करनेवाले व्यास आदि तपोधन एवं जितेन्द्रिय महर्षि आपके मुखसे इसका श्रवण करें ।।
পূর্বকালে ব্রহ্মপুত্র তণ্ডী মুনি ব্রহ্মলোকে ব্রহ্মার সম্মুখে যে শিব-সহস্রনামের নিরূপণ করেছিলেন, আপনি সেইটিই বর্ণনা করুন; আর ব্যাস প্রমুখ তপোধন, জিতেন্দ্রিয়, উত্তম-ব্রতধারী মহর্ষিরা আপনার মুখ থেকে তা শ্রবণ করুন। ধ্রুব, নন্দী, হোতা, গোপ্তা, বিশ্বস্রষ্টা, অগ্নি, মুণ্ডী ও কপর্দী—এই বিভুর মহাসৌভাগ্য আপনি ঘোষণা করুন।
Verse 22
जो ध्रुव (कूटस्थ), नन्दी (आनन्दमय), होता, गोप्ता (रक्षक), विश्वस्रष्टा, गार्हपत्य आदि अग्नि, मुण्डी (चूड़ारहित) और कपर्दी (जटाजूटधारी) हैं, उन भगवान् शंकरके महान् सौभाग्यका आप वर्णन कीजिये ।।
ধ্রুব, নন্দী, হোতা, গোপ্তা, বিশ্বস্রষ্টা, অগ্নি, মুণ্ডী ও কপর্দী—এই বিভুর মহাসৌভাগ্য ঘোষণা করুন। বাসুদেব বললেন—ঈশ্বরের কর্মের গতি তত্ত্বত জানা সম্ভব নয়; হিরণ্যগর্ভ (ব্রহ্মা) প্রমুখ দেবগণ, ইন্দ্রসহ, এবং মহর্ষিরাও (তাঁকে যথার্থ জানেন না)।
Verse 23
न विदुर्यस्थ भवनमादित्या: सूक्ष्मदर्शिन: । स कथ॑ नरमात्रेण शक््यो ज्ञातुं सतां गति:
সূক্ষ্মদর্শী আদিত্যগণও যার নিবাসস্থান জানেন না, সেই সৎপুরুষদের আশ্রয় ও লক্ষ্য সেই ভগবানকে একজন সাধারণ মানুষ কীভাবে যথার্থ জানতে পারে?
Verse 24
तस्याहमसुरघ्नस्य कांश्चिद् भगवतो गुणान् । भवतां कीर्तयिष्यामि व्रतेशाय यथातथम्,अतः मैं उन असुरविनाशक व्रतेश्वर भगवान् शंकरके कुछ गुणोंका आपलोगोंके समक्ष यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा
এখন আমি সেই অসুরঘ্ন, ব্রতেশ্বর ভগবানের কিছু গুণ আপনাদের সামনে যথাযথভাবে কীর্তন করব।
Verse 25
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा तु भगवान् गुणांस्तस्य महात्मन: । उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा कथयामास धीमत:
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ আচমন করে শুচি হয়ে সেই মহাত্মার গুণাবলি বর্ণনা করতে লাগলেন। তারপর তিনি প্রজ্ঞাসম্পন্ন হয়ে পরমেশ্বর শিবের মহিমা ও উৎকর্ষসমূহ শ্রদ্ধাভরে বিবৃত করলেন।
Verse 26
वासुदेव उवाच शुश्रूषध्व॑ ब्राह्म॒णेन्द्रास्त्वं च तात युधिष्ठिर । त्वं चापगेय नामानि शृणुष्वेह कपर्दिने
বাসুদেব বললেন—হে ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠগণ! তোমরা মনোযোগ দিয়ে শোনো; আর তাত যুধিষ্ঠির, তুমিও শোনো। এবং গঙ্গানন্দন ভীষ্ম, এখানে কপর্দী ভগবান শংকরের গেয় নামসমূহ শ্রবণ করো।
Verse 27
यदवाप्तं च मे पूर्व साम्बहेतो: सुदुष्करम् । यथावद् भगवान् दृष्टो मया पूर्व समाधिना
বাসুদেব বললেন—পূর্বকালে সাম্বের কল্যাণার্থে আমি অতি দুষ্কর তপস্যা করে যে দুর্লভ নামসমূহ লাভ করেছিলাম, এবং পূর্বে সমাধির দ্বারা যেভাবে ভগবান শংকরকে যথাযথভাবে দর্শন করেছিলাম—সে সমস্ত প্রসঙ্গ এখন আমি বলছি।
Verse 28
शम्बरे निहते पूर्व रौक्मिणेयेन धीमता । अतीते द्वादशे वर्षे जाम्बवत्यब्रवीद्धि माम्
বাসুদেব বললেন—হে যুধিষ্ঠির! পূর্বকালে প্রজ্ঞাবান রুক্মিণীনন্দন শম্বরকে বধ করেছিলেন। তার বারো বছর অতিবাহিত হলে, পুত্রকামিনী জাম্ববতী আমার কাছে এসে এভাবে বলল।
Verse 29
प्रद्युम्नचारुदेष्णादीन् रुक्मिण्या वीक्ष्य पुत्रकान् पुत्रार्थिनी मामुपेत्य वाक्यमाह युधिछ्िर
বাসুদেব বললেন—হে যুধিষ্ঠির! রুক্মিণীর প্রদ্যুম্ন, চারুদেষ্ণ প্রভৃতি পুত্রদের দেখে পুত্রকামিনী জাম্ববতী আমার কাছে এসে আমাকে এই কথা বলল।
Verse 30
शूरं बलवतां श्रेष्ठ कान्तरूपमकल्मषम् | आत्मतुल्यं मम सुतं प्रयच्छाच्युत माचिरम्
হে অচ্যুত! বিলম্ব না করে আমাকে তোমারই সমান এক পুত্র দান করো—যে বীর, বলবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, রূপ-সৌন্দর্যে মনোহর এবং কলঙ্কহীন। এতে দেরি করা উচিত নয়।
Verse 31
न हि ते<प्राप्यमस्तीह त्रिषु लोकेषु किंचन । लोकान् सूजेस्त्वमपरानिच्छन् यदुकुलोद्वह
হে যদুকুল-উদ্বহ! তিন লোকের মধ্যে তোমার কাছে অপ্রাপ্য কিছুই নেই। তুমি ইচ্ছা করলে আরও আরও লোকও সৃষ্টি করতে পারো।
Verse 32
त्वया द्वादशवर्षाणि व्रती भूतेन शुष्यता । आराध्य पशुभर्तारें रुक्मिण्यां जनिता: सुता:
তুমি বারো বছর ব্রতধারী হয়ে তপস্যায় দেহকে কৃশ করেছিলে; পশুপতি প্রভুর আরাধনা করে রুক্মিণীর গর্ভে পুত্রসন্তান লাভ করেছিলে।
Verse 33
चारुदेष्ण: सुचारुश्ष चारुवेशो यशोधर: । चारुश्रवाश्लारुयशा: प्रद्युम्न: शम्भुरेव च
হে মধুসূদন! চারুদেষ্ণ, সুচারু, চারুবেশ, যশোধর, চারুশ্রবা, চারুযশা, প্রদ্যুম্ন এবং শম্ভু—এরা আমার পুণ্যবান, বীর ও মনোরম পরাক্রমশালী পুত্র। যেমন রুক্মিণীর গর্ভে তুমি এদের দান করেছ, তেমনি আমাকেও পুত্র দান করো।
Verse 34
यथा ते जनिताः पुत्रा रुक्मिण्यां चारुविक्रमा: । तथा ममापि तनयं प्रयच्छ मधुसूदन
হে মধুসূদন! রুক্মিণীর গর্ভে যেমন তোমার সুন্দর ও পরাক্রমশালী পুত্রেরা জন্মেছে, তেমনি আমাকেও একটি পুত্র দান করো।
Verse 35
इत्येवं चोदितो देव्या तामवोच॑ सुमध्यमाम् | अनुजानीहि मां राज्ञि करिष्ये वचनं तव
দেবীর এইরূপ প্রেরণায় আমি সেই সুমধ্যা রাণীকে বললাম— “রাণী, আমাকে যাত্রার অনুমতি দাও; আমি তোমার বাক্য পালন করব।”
Verse 36
सा च मामब्रवीद् गच्छ शिवाय विजयाय च | ब्रह्मा शिव: काश्यपश्च नद्यो देवा मनो5नुगा:
তখন সে আমাকে বলল— “যাও—শিবের দিকে, আর বিজয়ের দিকে। ব্রহ্মা, শিব, কাশ্যপ, নদীগণ এবং মনের অভিপ্রায় অনুসরণকারী দেবতারা সকলেই অনুকূল।”
Verse 37
क्षेत्रीौषध्यो यज्ञवाहाश्छन्दांस्यृषिगणाध्वरा: । समुद्रा दक्षिणास्तोभा ऋक्षाणि पितरो ग्रहा:
পবিত্র ক্ষেত্র ও ঔষধি, যজ্ঞবাহক, বৈদিক ছন্দ এবং যজ্ঞ সম্পাদনকারী ঋষিগণ; সমুদ্র, দক্ষিণা, স্তোভ-গান; নক্ষত্র, পিতৃগণ ও গ্রহসমূহ—এসবও (সেই দিব্য বিধানে) অন্তর্ভুক্ত।
Verse 38
देवपत्न्यो देवकन्या देवमातर एव च | मन्वन्तराणि गावश्न चन्द्रमा: सविता हरि:
দেবপত্নীগণ, দেবকন্যাগণ ও দেবমাতৃগণ; মন্বন্তরসমূহ, গাভীসমূহ; চন্দ্র, সূর্য ও হরি—এ সকলই শ্রদ্ধেয়।
Verse 39
सावित्री ब्रह्म॒विद्या च ऋतवो वत्सरास्तथा । क्षणा लवा मुहूर्ताश्न निमेषा युगपर्यया:
সাবিত্রী, ব্রহ্মবিদ্যা, ঋতু ও বর্ষ; আর সময়ের পরিমাপ—ক্ষণ, লব, মুহূর্ত, নিমেষ ও যুগ-পর্যায়—এসবও (তাতেই) অন্তর্ভুক্ত।
Verse 40
रक्षन्तु सर्वत्र गतं त्वां यादव सुखाय च । अरिए्टं गच्छ पन्थानमप्रमत्तो भवानघ
বাসুদেব বললেন— “তুমি যেখানে-যেখানে গমন করো, সর্বত্র যাদবরা তোমাকে রক্ষা করুন এবং তা তোমার কল্যাণের কারণ হোক। তুমি অরিষ্ট-রহিত নিরাপদ পথে যাত্রা করো; হে নিষ্পাপ, সদা সতর্ক থেকো।”
Verse 41
उसने कहा--'प्राणनाथ! आप कल्याण और विजय पानेके लिये जाइये। यदुनन्दन! ब्रह्मा
জাম্ববতী বললেন— “প্রাণনাথ! কল্যাণ ও বিজয় লাভের জন্য প্রস্থান করুন। হে যদুনন্দন! ব্রহ্মা, শিব, কাশ্যপ, নদীগণ, মনঃপ্রসন্ন দেবগণ, পবিত্র ক্ষেত্র, ঔষধি, যজ্ঞবাহ—মন্ত্র, ছন্দ, ঋষিগণ, যজ্ঞ, সমুদ্র, দক্ষিণা, সামগানের স্তোভাবাক্য, নক্ষত্র, পিতৃগণ, গ্রহ, দেবপত্নীগণ, দেবকন্যা ও দেবমাতৃগণ, মন্বন্তর, গাভী, চন্দ্র, সূর্য, ইন্দ্র, সাবিত্রী, ব্রহ্মবিদ্যা, ঋতু, বর্ষ এবং সময়ের সকল পরিমাপ—ক্ষণ, লব, মুহূর্ত, নিমেষ ও যুগ—এরা সর্বত্র আপনাকে রক্ষা করুন। আপনি নির্বিঘ্নে পথে যাত্রা করুন; হে অনঘ, সদা সতর্ক থাকুন।” এই মঙ্গলবচন সম্পন্ন হলে আমি সেই রাজকন্যার অনুমতি নিয়ে আমার শ্রেষ্ঠ পিতা বসুদেব, মাতা দেবকী এবং রাজা উগ্রসেনের নিকট গেলাম। সেখানে বিদ্যাধররাজকন্যা জাম্ববতী গভীর ব্যাকুলতায় আমার কাছে যা প্রার্থনা করেছিলেন, সব জানালাম এবং তপস্যার জন্য যাত্রার অনুমতি চাইলাম। পরে গদ ও অতিবলবান বলরামের কাছেও বিদায় নিলাম; তারা দুজন দুঃখাকুল হলেও স্নেহভরে বললেন— “ভাই, তোমার তপস্যা নির্বিঘ্নে সম্পূর্ণ হোক।”
Verse 42
गत्वा समावेद्य यदब्रवीन्मां विद्याधरेन्द्रस्य सुता भृशार्ता । तानभ्यनुज्ञाय तदातिदुःखाद् गदं तथैवातिबलं च रामम् | अथोचतुः प्रीतियुतौ तदानीं तपःसमृद्धिर्भवतो<स्त्वविघध्नम्
আমি গিয়ে সব নিবেদন করলাম—বিদ্যাধররাজের কন্যা গভীর ব্যাকুলতায় আমাকে যা বলেছিলেন। তারপর সেই মহাদুঃখে তাদের অনুমতি নিয়ে গদ ও অতিবলবান বলরামের কাছ থেকেও বিদায় নিলাম। তখন তারা দুজন স্নেহভরে বললেন— “ভাই, তোমার তপস্যার সিদ্ধি নির্বিঘ্ন হোক।”
Verse 43
प्राप्पानुज्ञां गुरुजनादहं ताक्ष्यमचिन्तयम् । सो5वहद्धिमवन्तं मां प्राप्प चैनं व्यसर्जयम्
গুরুজনদের অনুমতি পেয়ে আমি মনে মনে তাক্ষ্য (গরুড়)-কে স্মরণ করলাম। তিনি আমাকে হিমবান (হিমালয়)-এ পৌঁছে দিলেন; সেখানে পৌঁছে আমি তাঁকে সম্মানসহ বিদায় দিলাম।
Verse 44
तत्राहमद्भुतान् भावानपश्यं गिरिसत्तमे । क्षेत्र च तपसां श्रेष्ठ पश्याम्यद्भुतमुत्तमम्
সেই পর্বতশ্রেষ্ঠে আমি বিস্ময়কর ভাব ও লক্ষণ দেখলাম। আর সেই স্থানকে তপস্যার জন্য আশ্চর্য, উত্তম ও শ্রেষ্ঠ ক্ষেত্র বলে মনে হলো।
Verse 45
दिव्यं वैयाच्रपद्यस्य उपमन्योर्महात्मन: । पूजितं देवगन्धर्वै््राह्म्या लक्ष्म्यमा समावृतम्
বাসুদেব বললেন—ব্যাঘ্রপদবংশীয় মহাত্মা উপমনুর এক দিব্য আশ্রম ছিল। তা ব্রাহ্মী শোভায় আবৃত ছিল এবং দেবতা ও গন্ধর্বদের দ্বারা পূজিত ছিল।
Verse 46
धवककुभकदम्बनारिकेलै: कुरबककेतकजम्बुपाटलाभि: । वटवरुणकवत्सना भबिल्वै: सरलकपित्थप्रियालसालतालै:
বাসুদেব বললেন—ধব, ককুভ, কদম্ব, নারিকেল, কুরবক, কেতক, জাম্বু, পাটল, বট, বরুণক, বৎসনাভ, বিল্ব, শরল, কপিত্থ, প্রিয়াল, শাল ও তাল—এমন বহু ফল-ফুলধারী বনজ বৃক্ষ সেই আশ্রমকে শোভিত করেছিল। তা পুষ্প, ঝোপঝাড় ও লতায় পরিপূর্ণ ছিল, আর কলাগাছের কুঞ্জ তার সৌন্দর্য আরও বাড়িয়ে দিয়েছিল।
Verse 47
बदरीकुन्दपुन्नागैरशोकाम्रातिमुक्तकै: । मधूकै: कोविदारैश्न चम्पकैः पनसैस्तथा
বাসুদেব বললেন—বরই, কুন্দ, পুন্নাগ, অশোক, আম, অতিমুক্ত লতা, মধূক, কোবিদার, চম্পক ও কাঁঠাল—এমন বহু বনজ বৃক্ষ সেই আশ্রমকে শোভিত করেছিল। তা পুষ্প, ঝোপঝাড় ও লতায় পরিপূর্ণ ছিল, আর কলাগাছের কুঞ্জ তার সৌন্দর্য আরও বাড়িয়ে দিয়েছিল।
Verse 48
वन्यैर्बहुविधैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युतम् । पुष्पगुल्मलताकीर्ण कदलीषण्डशोभितम्
বাসুদেব বললেন—সেই আশ্রম নানা প্রকার বনজ বৃক্ষে পরিপূর্ণ ছিল, যা ফল ও ফুল দিত। তা সর্বত্র পুষ্প, ঝোপঝাড় ও লতায় ভরা ছিল, আর কলাগাছের কুঞ্জে তার শোভা আরও বেড়ে গিয়েছিল।
Verse 49
नानाशकुनिसम्भोज्यै: फलैरव॑क्षेरलंकृतम् । यथास्थानविनिक्षिप्तैर्भूषितं भस्मराशिभि:
বাসুদেব বললেন—বিভিন্ন পাখির আহার্য ফলভারে নত বৃক্ষসমূহই ছিল সেই আশ্রমের অলংকার। যথাস্থানে রাখা ভস্মরাশিও তার তপস্বী শোভা আরও বাড়িয়ে দিচ্ছিল।
Verse 50
रुरुवानरशार्दूलसिंहद्वीपिसमाकुलम् । कुरड़बर्हिणाकीर्ण मार्जारभुजगावृतम् । पूगैश्न मृगजातीनां महिषर्क्षनिषेवितम्
সেই আশ্রমের নিকটবর্তী বন রুরু, বানর, শার্দূল, সিংহ ও চিতায় পরিপূর্ণ ছিল। নানা জাতির হরিণের দল, ময়ূর, বিড়াল ও সাপ সেখানে বিচরণ করত; আর মহিষ ও ভালুকও সেই অরণ্যে বাস করত।
Verse 51
सकृप्प्रभिन्नैश्व गजैर्विं भूषित॑ प्रहृषष्नानाविधपक्षिसेवितम् । सुपुष्पितैरम्बुधरप्रकाशै- महीरुहाणां च वनैर्विचित्रै:
যাদের কপাল থেকে প্রথমবার মদধারা ফেটে বেরিয়েছিল, এমন হাতিরা সেখানে উপবনের শোভা বাড়াচ্ছিল। আনন্দে উচ্ছ্বসিত নানা প্রকার পাখি গাছে গাছে বাসা বেঁধেছিল। অসংখ্য মহাবৃক্ষের বিচিত্র বন সুন্দর ফুলে ভরে মেঘের মতো দীপ্তিমান দেখাত; আর তাতেই সেই আশ্রম অপূর্ব শোভায় উদ্ভাসিত ছিল।
Verse 52
नानापुष्परजोमिश्रो गजदानाधिवासित: । दिव्यस्त्रीगीतबहुलो मारुतो5भिमुखो ववौ
সামনে থেকে মৃদু অনুকূল বাতাস বইছিল—নানাবিধ ফুলের পরাগে ভরা, মত্ত হাতির মদের সুগন্ধে সুবাসিত; আর তাতে দিব্য রমণীদের মধুর গানের মনোহর ধ্বনি বিশেষভাবে মিশে ছিল।
Verse 53
धारानिनादैर्विहगप्रणादै: शुभैस्तथा बूंहितैः: कुज्जराणाम् | गीतैस्तथा किन्नराणामुदारै: शुभै: स्वनै: सामगानां च वीर
হে বীর! পর্বতশিখর থেকে ঝরে পড়া ঝরনার কলকল ধ্বনি, পাখিদের মধুর কূজন, হাতিদের গর্জন, কিন্নরদের উদার ও মনোহর গান, এবং সামগানকারী সামবেদী পণ্ডিতদের মঙ্গলময় স্বর—এসবই সেই বনপ্রদেশকে সঙ্গীতময় করে তুলেছিল।
Verse 54
अचिन्त्यं मनसाप्यन्यै: सरोभि: समलंकृतम् । विशालैश्वाग्निशरणैर्भूषितं कुसुमावृतै:
যার শোভা অন্যেরা মনে করেও কল্পনা করতে পারে না—এমন অচিন্ত্য সৌন্দর্যে সমৃদ্ধ সেই পর্বতপ্রদেশ বহু সরোবর দিয়ে অলঙ্কৃত ছিল এবং ফুলে আচ্ছাদিত বিশাল অগ্নিশালায় বিভূষিত ছিল।
Verse 55
विभूषितं पुण्यपवित्रतोयया सदा च जुष्टं नृप जह्लुकन्यया । विभूषितं धर्मभृतां वरिष्ठै- महात्मभिव॑द्लिसमानकल्पै:
বাসুদেব বললেন—হে নরেশ্বর! সেই স্থান পুণ্য ও পবিত্র জলে অলংকৃত ছিল, আর যেন স্নেহভরে উপভোগ করছে এমনভাবে জাহ্নুর কন্যা জাহ্নবী সর্বদা সেখানে বিচরণ করত। ধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, অগ্নিসদৃশ তেজস্বী বহু মহাত্মার উপস্থিতিতে সেই আশ্রমভূমি আরও শোভিত হয়েছিল। এইভাবে পুণ্যসলিলা জাহ্নবী সেই পবিত্র অঞ্চলের সৌন্দর্য নিত্য বৃদ্ধি করত।
Verse 56
वाय्वाहारैरम्बुपैर्जप्यनित्यै: सम्प्रक्षालैयोंगिभिर्ध्याननित्यै: । धूमप्राशैरूष्मपै: क्षीरपैश्न संजुष्टं च ब्राह्मणेन्द्रै: समन्तात्
সেখানে চারিদিকে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণেরা বাস করতেন। কেউ কেবল বায়ু গ্রহণ করে থাকতেন, কেউ জল পান করে জীবন ধারণ করতেন, আর কেউ নিত্য জপে রত থাকতেন। কতক তপস্বী অন্তঃশুদ্ধির সাধনায় চিত্ত প্রক্ষালন করতেন, আর যোগীরা সর্বদা ধ্যানে নিমগ্ন থাকতেন। কেউ যজ্ঞাগ্নির ধোঁয়া গ্রহণ করতেন, কেউ তপস্যার উষ্ণতায় জীবন ধারণ করতেন, কেউ বা দুধ পান করতেন—সকলেই সংযম ও আত্মনিগ্রহের দ্বারা ধর্মকে দৃশ্যমান করতেন।
Verse 57
गोचारिणो<5थाश्मकुट्टा दन्तोलूखलिकास्तथा । मरीचिपा: फेनपाश्चव तथैव मृगचारिण:
বাসুদেব বললেন—কেউ গোসেবার ব্রত নিয়ে গাভীদের সঙ্গেই বাস করত ও বিচরণ করত। কেউ পাথরে পিষে খাদ্য গ্রহণ করত, আর কেউ দাঁতকেই যেন ওখলি-মুসলের মতো ব্যবহার করত। কেউ সূর্যকিরণ পান করত, কেউ ফেন পান করত; আর তেমনি বহু মুনি মৃগচর্যার ব্রত নিয়ে হরিণদের সঙ্গেই থাকত ও ঘুরে বেড়াত।
Verse 58
अश्वत्थफलभक्षाश्व तथा हुदकशायिन: । चीरचर्माम्बरधरास्तथा वल्कलधारिण:,कोई पीपलके फल खाकर रहते, कोई जलमें ही सोते तथा कुछ लोग चीर, वल्कल और मृगचर्म धारण करते थे
বাসুদেব বললেন—কেউ অশ্বত্থ (পিপল) গাছের ফল খেয়ে থাকত, কেউ জলে শয়ন করত, আর কেউ চীর, বল্কল ও মৃগচর্ম পরিধান করত।
Verse 59
सुदुःखान् नियमांस्तांस्तान् वहतः सुतपोधनान् । पश्यन् मुनीन् बहुविधानू प्रवेष्टमुपचक्रमे
বাসুদেব বললেন—অত্যন্ত দুঃসহ নানা নিয়ম বহন করে তপস্যা ও আধ্যাত্মিক সম্পদে সমৃদ্ধ বিভিন্ন প্রকার মুনিদের দর্শন করে আমি সেই মহান আশ্রমে প্রবেশ করার উদ্যোগ নিলাম।
Verse 60
सुपूजितं देवगणैर्महात्मभि: शिवादिभिर्भारत पुण्यकर्मभि: । रराज तच्चाश्रममण्डलं सदा दिवीव राजन् शशिमण्डलं यथा
হে ভরতবংশীয় রাজন! দেবগণ ও শিব প্রভৃতি পুণ্যকর্মা মহাত্মাদের দ্বারা অত্যন্ত পূজিত সেই আশ্রম-পরিসর সর্বদা দীপ্তিময় ছিল; আকাশে চন্দ্রমণ্ডলের ন্যায় তা সদা জ্যোতির্ময় হয়ে উঠত।
Verse 61
क्रीडन्ति सर्पर्नकुला मृगैर्व्याच्रिश्व मित्रवत् । प्रभावाद् दीप्ततपसां सैनिकर्षान्महात्मनाम्
দীপ্ত তপস্যাসম্পন্ন মহাত্মাদের প্রভাব ও সান্নিধ্যে সেখানে নেউল সাপের সঙ্গে খেলত, আর বনচর মৃগ বাঘের সঙ্গে বন্ধুর মতো বাস করত।
Verse 62
तत्राश्रमपदे श्रेष्ठे सर्वभूतमनोरमे । सेविते द्विजशार्टूलैवेंदवेदाड़पारगै:
সেখানে সেই শ্রেষ্ঠ আশ্রমস্থানে—যা সকল প্রাণীর মনোরম এবং বেদ ও বেদাঙ্গে পারদর্শী শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের দ্বারা সেবিত—আমি প্রবেশ করলাম।
Verse 63
नानानियमविख्यातैर्षिभि: सुमहात्मभि: । प्रविशन्नेव चापश्यं जटाचीरधरं प्रभुम्
নানাবিধ নিয়মাচরণে খ্যাত সুমহাত্মা ঋষিদের দ্বারা শোভিত সেই আশ্রমে প্রবেশ করামাত্রই আমি জটা ও বল্কলধারী প্রভু উপমনুকে দেখলাম।
Verse 64
तेजसा तपसा चैव दीप्यमानं यथानलम् । शिष्यैरनुगतं शान्तं युवान ब्राह्मणर्षभम्
তেজ ও তপস্যায় অগ্নির ন্যায় দীপ্ত, শান্ত স্বভাব, যৌবনে সমৃদ্ধ, শিষ্যবেষ্টিত সেই ব্রাহ্মণশ্রেষ্ঠকে আমি দেখলাম।
Verse 65
शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत
আমি মাথা নত করে তাঁকে প্রণাম করলাম। আমাকে বন্দনা করতে দেখে উপমন्यु বললেন— “পুণ্ডরীকাক্ষ! স্বাগতম। তুমি পূজ্য হয়েও আমাকে পূজা করছ; তুমি দর্শনীয় হয়েও আমার দর্শন কামনা করছ। এতে আমাদের তপস্যা সফল হয়েছে।”
Verse 66
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि नः । यः पूज्य: पूजयसि मां द्रष्टव्यो द्रष्टमिच्छसि
উপমন्यु বললেন— “পুণ্ডরীকাক্ষ! স্বাগতম। আজ আমাদের তপস্যা সফল— তুমি পূজ্য হয়েও আমাকে পূজা করছ, আর তুমি দর্শনীয় হয়েও আমার দর্শন কামনা করছ।”
Verse 67
तमहं प्राउ्जलिर्भूत्वा मृगपक्षिष्वथाग्निषु । धर्मे च शिष्यवर्गे च समपृच्छमनामयम्,तब मैंने हाथ जोड़कर आश्रमके मृग, पक्षी, अग्निहोत्र, धर्मांचरण तथा शिष्यवर्गका कुशल-समाचार पूछा
তখন আমি করজোড়ে আশ্রমের মৃগ-পক্ষী, অগ্নিহোত্র, ধর্মাচরণ এবং শিষ্যসমাজের কুশল জিজ্ঞাসা করলাম— সবই কি নিরাময় ও নির্বিঘ্ন আছে?
Verse 68
ततो मां भगवानाह साम्ना परमवल्गुना । लप्स्यसे तनयं कृष्ण आत्मतुल्यमसंशयम्
তখন ভগবান উপমন्यु অতি মধুর ও সান্ত্বনাময় স্বরে আমাকে বললেন— “হে কৃষ্ণ! তুমি তোমারই সমান এক পুত্র লাভ করবে— এতে কোনো সন্দেহ নেই।”
Verse 69
तप: सुमहदास्थाय तोषयेशानमीश्वरम् । इह देव: सपत्नीक: समाक्रीडत्यधोक्षज
“অধোক্ষজ! মহাতপস্যা অবলম্বন করে সর্বেশ্বর ঈশানকে সন্তুষ্ট করো। এখানে দেব মহাদেব পত্নী (উমা)-সহ ক্রীড়া করেন।”
Verse 70
इह्ैनं दैवतश्रेष्ठं देवा: सर्षिगणा: पुरा । तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च
এখানে প্রাচীন কালে দেবগণ ঋষিসঙ্ঘের সঙ্গে তপস্যা, ব্রহ্মচর্য, সত্য ও দম (ইন্দ্রিয়-সংযম) দ্বারা এই দैवतশ্রেষ্ঠকে আরাধনা করে পরম দেবত্ব লাভ করেছিলেন।
Verse 71
शत्रुनाशक श्रीकृष्ण! आप जिनकी प्रार्थना करते हैं
শত্রুনাশক শ্রীকৃষ্ণ! আপনি যাঁর কাছে প্রার্থনা করেন, সেই তেজ ও তপস্যার নিধি, অচিন্ত্য ভগবান শঙ্কর দেবী পার্বতীর সঙ্গে এখানে চিরকাল বিরাজমান—শম প্রভৃতি শুভভাবের সৃষ্টি করেন এবং কাম প্রভৃতি অশুভ ভাবের সংহার করেন।
Verse 72
शुभाशुभान्वितान् भावान् विसृजन् संक्षिपन्नपि । आस्ते देव्या सदाचिन्त्यो य॑ प्रार्थयसि शत्रुहन्
শুভ ও অশুভ ভাবকে কখনো বিস্তার করে, কখনো সংযত ও লয় করে—দেবীর সঙ্গে সেই চির-অচিন্ত্য প্রভু এখানে বিরাজমান। হে শত্রুহন! আপনি যাঁর কাছে প্রার্থনা করেন, সেই তেজ ও তপস্যার নিধি ভগবান শঙ্কর শমাদি শুভভাবের সৃষ্টি করেন এবং কামাদি অশুভ ভাবকে দমন/সংহার করেন।
Verse 73
तोषयित्वा शुभान् कामान् प्राप्तवन्तो जनार्दन । जनार्दन! यहाँ सुरश्रेष्ठ महादेवजीको तपस्या
বাসুদেব বললেন—হে জনার্দন! এখানে পূর্বকালে দেবশ্রেষ্ঠ মহাদেবকে তপস্যা, ব্রহ্মচর্য, সত্য ও ইন্দ্রিয়-সংযম দ্বারা সন্তুষ্ট করে বহু দেবতা ও মহর্ষি তাঁদের শুভ কামনা লাভ করেছিলেন। এমনকি মেরুকেও কম্পিত করতে সক্ষম হিরণ্যকশিপু নামক দানব শর্ব (শিব)-এর কাছ থেকে এক অর্বুদ—দশ কোটি বছর—পর্যন্ত সমস্ত দেবতার ঐশ্বর্য লাভ করেছিল।
Verse 74
तस्यैव पुत्रप्रवरो मन्दारो नाम विश्रुत: । महादेववराच्छक्रं वर्षार्बुदमयोधयत्,उसीका श्रेष्ठ पुत्र मन्दार नामसे विख्यात हुआ, जो महादेवजीके वरसे एक अर्बुद वर्षोंतक इन्द्रके साथ युद्ध करता रहा
তারই শ্রেষ্ঠ পুত্র মন্দার নামে খ্যাত ছিল; মহাদেবের বরপ্রভাবে সে এক অর্বুদ বছর ধরে শক্র (ইন্দ্র)-এর সঙ্গে যুদ্ধ করেছিল।
Verse 75
विष्णोश्ष॒क्रंं च तद् घोरं वज़ञमाखण्डलस्य च । शीर्ण पुराभवत् तात ग्रहस्याड्रेषु केशव
বাসুদেব বললেন—হে তাত, হে কেশব! বিষ্ণুর সেই ভয়ংকর চক্র এবং আখণ্ডল (ইন্দ্র)-এর বজ্রও এক কালে সেই গ্রহের অঙ্গে পুরোনো তৃণের মতো জীর্ণ-বিধ্বস্ত হয়ে পড়েছিল।
Verse 76
यत् तद् भगवता पूर्व दत्त चक्रं तवानघ । जलान्तरचरं हत्वा दैत्यं च बलगर्वितम्
বাসুদেব বললেন—হে নিষ্পাপ! যে চক্রটি ভগবান পূর্বে তোমাকে দান করেছিলেন—জলের অন্তরে বিচরণকারী বল-গর্বে মত্ত দানবকে বধ করে—তা স্বয়ং বৃষধ্বজ (শিব) উৎপন্ন করে তোমাকে প্রদান করেছিলেন। অগ্নিসদৃশ দীপ্ত সেই অস্ত্র আশ্চর্য তেজে সমন্বিত ও অদম্য।
Verse 77
उत्पादितं वृषाड्केन दीप्तज्वलनसंनिभम् | दत्तं भगवता तुभ्य॑ दुर्धर्ष तेजसाद्भुतम्
বৃষাঙ্কধারী ভগবান (শিব) তা উৎপন্ন করেছিলেন—প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্ত। সেই ভগবানই তা তোমাকে দান করেছিলেন; তা আশ্চর্য তেজে সমন্বিত ও অদম্য।
Verse 78
न शव्यं द्रष्टमन्येन वर्जयित्वा पिनाकिनम् । सुदर्शनं भवत्येवं भवेनोक्तं तदा तु तत्
পিনাকধারী (শিব) ব্যতীত অন্য কারও পক্ষে তাকে দেখা সম্ভব ছিল না। তখন ভব (শিব) বললেন—“এটি সুদর্শন হোক।”
Verse 79
सुदर्शनं तदा तस्य लोके नाम प्रतिष्ठितम् । तज्जीर्णमभवत्् तात ग्रहस्याड्रेषु केशव
তখন লোকের মধ্যে তার নাম ‘সুদর্শন’ প্রতিষ্ঠিত হল। তবু, হে তাত কেশব! সেই অস্ত্রও সেই গ্রহের অঙ্গে জীর্ণ হয়ে পড়েছিল।
Verse 80
ग्रहस्यथातिबलस्याजड्रे वरदत्तस्य धीमत: । न शस्त्राणि वहन्त्यड्रे चक्रवज्ञशतान्यपि
বাসুদেব বললেন—শিবের বরপ্রাপ্ত সেই অতিশয় বলবান ও বুদ্ধিমান গ্রহের দেহে চক্র ও বজ্রের মতো ধারালো শত শত অস্ত্রও কাজ করত না; দেববরের আশ্রয়ে রক্ষিত জনের বিরুদ্ধে কেবল শক্তি ও অস্ত্রশস্ত্র নিষ্ফল হয়।
Verse 81
अर्द्धमानाश्च विबुधा ग्रहेण सुबलीयसा । शिवदत्तवरान् जष्नुरसुरेन्द्रान सुरा भूशम्
বাসুদেব বললেন—অতিশয় বলবান গ্রহ যখন দেবতাদের উৎপীড়ন শুরু করল, তখন দেবতারা চাপে পড়েও শিবের বরপ্রাপ্ত অসুরেন্দ্রদের উপর আঘাত হেনে তাদের পরাভূত করল; এভাবে তাদের মধ্যে দীর্ঘকাল যুদ্ধ চলতে থাকল।
Verse 82
तुष्टो विद्युत्प्रभस्यापि त्रिलोकेश्वरतां ददौ | शतं वर्षसहस्राणां सर्वलोकेश्वरो5भवत्
রুদ্রদেব বিদ্যুৎপ্রভ নামক দৈত্যের উপর সন্তুষ্ট হয়ে তাকে ত্রিলোকের অধিপত্য দান করলেন; এভাবে সে এক লক্ষ বছর ধরে সমগ্র লোকের ঈশ্বরতুল্য অধীশ্বর হয়ে রইল।
Verse 83
ममैवानुचरो नित्यं भवितासीति चाब्रवीत् | तथा पुत्रसहस्राणामयुतं च ददौ प्रभु:
তিনি আরও বললেন—“তুমি সর্বদা আমারই অনুচর (পার্ষদ) হবে”; আর সেই প্রভু তাকে সহস্রের অযুত—অর্থাৎ এক কোটি—পুত্রও দান করলেন।
Verse 84
कुशद्वीपं च स ददौ राज्येन भगवानज: । तथा शतमुखो नाम धात्रा सृष्टो महासुर:
অজ (অজন্মা) ভগবান তাকে রাজ্যসহ কুশদ্বীপও দান করলেন; আর ধাতা শতমুখ নামক এক মহা অসুরের সৃষ্টি করলেন।
Verse 85
त॑ प्राह भगवांस्तुष्ट: कि करोमीति शंकर:
তাঁতে সন্তুষ্ট হয়ে ভগবান শঙ্কর জিজ্ঞাসা করলেন— “বল, আমি তোমার জন্য কী করব? তোমার কোন অভিলাষ পূর্ণ করব?” তখন শতামুখ বলল— “দেবশ্রেষ্ঠ! আমাকে আশ্চর্য যোগশক্তি দান করুন; আর এমন শাশ্বত বল দিন, যা কখনও ক্ষয় না হয়।”
Verse 86
त॑ं वै शतमुख: प्राह योगो भवतु मे5द्भुत: । बलं॑ च दैवतश्रेष्ठ शाश्वतं सम्प्रयच्छ मे
তখন শতামুখ তাঁকে বলল— “দৈবতশ্রেষ্ঠ! আমার যেন অদ্ভুত যোগশক্তি হয়; আর আমাকে শাশ্বত, অক্ষয় বলও দান করুন।”
Verse 87
तथेति भगवानाह तस्य तद् वचन प्रभु: । स्वायम्भुव: क्रतुश्चापि पुत्रार्थम भवत् पुरा
তার কথা শুনে পরাক্রমী প্রভু ভগবান বললেন— “তথাস্তु,” এবং তা মঞ্জুর করলেন। এইভাবেই প্রাচীনকালে স্বয়ম্ভূর পুত্র ক্রতুও পুত্রলাভের জন্য যোগসাধনায় তিনশো বছর ধরে মনকে ভগবান শিবের ধ্যানে স্থির রেখেছিলেন।
Verse 88
आविश्य योगेनात्मानं त्रीणि वर्षशतान्यपि । तस्य चोपददौ पुत्रान् सहस्न॑ क्रतुसम्मितान्
যোগের দ্বারা আত্মার অন্তরে প্রবেশ করে তিনি তিনশো বছর পর্যন্ত তাতে নিমগ্ন ছিলেন। তাতে প্রসন্ন হয়ে ভগবান শঙ্কর তাঁকে ক্রতুর তুল্য মর্যাদাসম্পন্ন এক হাজার পুত্র দান করলেন।
Verse 89
योगेश्वरं देवगीतं वेत्थ कृष्ण न संशय: । याज्ञवल्क्य इति ख्यात ऋषि: परमधार्मिक:
বাসুদেব বললেন— “হে কৃষ্ণ! যোগেশ্বরের সেই দেবগীতি তুমি নিঃসন্দেহে জানো। যাজ্ঞবল্ক্য নামে খ্যাত এক ঋষি আছেন— তিনি পরম ধার্মিক।”
Verse 90
वेदव्यासश्न योगात्मा पराशरसुतो मुनि:
বাসুদেব বললেন—আর বেদব্যাস—যোগাত্মা, পরাশরের পুত্র সেই মুনি।
Verse 91
सो<5पि शड्करमाराध्य प्राप्तवानतुलं यश: । पराशरजीके पुत्र मुनिवर वेदव्यास तो योगके स्वरूप ही हैं। उन्होंने भी शंकरजीकी आराधना करके वह महान् यश पा लिया, जिसकी कहीं तुलना नहीं है ।।
বাসুদেব বললেন—তিনি-ও শঙ্করের আরাধনা করে অতুল যশ লাভ করেছিলেন। পরাশরের পুত্র মুনিবর বেদব্যাস যোগস্বরূপ; তিনিও ভগবান শিবের উপাসনায় সেই মহৎ খ্যাতি অর্জন করেন, যার তুলনা নেই। আর প্রাচীনকালে বালখিল্য ঋষিগণকে মঘবা (ইন্দ্র) অবজ্ঞা করেছিল।
Verse 92
तांक्षापि दैवतश्रेष्ठ: प्राह प्रीतो जगत्पति:
তখন দেবশ্রেষ্ঠ, জগত্পতি, অন্তরে প্রসন্ন হয়ে তাকেও বললেন।
Verse 93
महादेवस्य रोषाच्च आपो नष्टा: पुराभवन्
প্রাচীনকালে মহাদেবের ক্রোধে জল নষ্ট হয়ে গিয়েছিল। তখন দেবতারা—যার অধিপতি রুদ্র—সেই সপ্তকপাল যজ্ঞের দ্বারা অন্য জল লাভ করলেন; এইভাবে ত্রিনেত্রধারী ভগবান শিব প্রসন্ন হলে তবেই ভূতলে জলের প্রাপ্তি হল।
Verse 94
ताक्ष सप्तकपालेन देवैरन्या: प्रवर्तिता: । ततः पानीयमभवत् प्रसन्ने >यम्बके भुवि
দেবতারা সপ্তকপাল যজ্ঞের দ্বারা অন্য জল প্রবাহিত করলেন; তারপর ত্র্যম্বক (ত্রিনেত্রধারী) প্রসন্ন হলে ভূতলে পানীয় জল উপলব্ধ হল।
Verse 95
अन्रेर्भार्यापि भर्तां संत्यज्य ब्रह्म॒वादिनी । नाहं तस्य मुनेर्भूयो वशगा स्यां कथंचन
বাসুদেব বললেন—‘অনৃ-এর পত্নীও, যিনি ব্রহ্মবাদিনী ছিলেন, স্বামীকে ত্যাগ করেছিলেন। অতএব আমি আর কখনও কোনোভাবেই সেই মুনির বশে যাব না।’
Verse 96
निराहारा भयादवत्रेस्त्रीणि वर्षशतान्यपि
বাসুদেব বললেন—‘ভয়ে সে অনাহারে থেকেছিল—শত শত বছর পর্যন্ত।’
Verse 97
तामब्रवीद्धसन् देवो भविता वै सुतस्तव
হাসতে হাসতে দেবতা তাকে বললেন—‘দেবি! তোমার অবশ্যই পুত্র হবে। আমার কৃপায় যজ্ঞ-সম্পর্কিত চরুর তরল অংশ মাত্র পান করলেই, স্বামীর সহায়তা ছাড়াই, তুমি পুত্র লাভ করবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই। আর সে তোমার বংশে তোমারই নামে, ইচ্ছামতো, খ্যাতি অর্জন করবে।’
Verse 98
विना भर्त्रां च रुद्रेण भविष्यति न संशय: । वंशे तवैव नाम्ना तु ख्यातिं यास्यति चेप्सिताम्
বাসুদেব বললেন—‘স্বামী ছাড়াই—রুদ্রের শক্তিতে—এটি ঘটবেই; এতে সন্দেহ নেই। তোমারই বংশে সেই পুত্র তোমারই নামের সঙ্গে যুক্ত হয়ে, কাঙ্ক্ষিত খ্যাতি লাভ করবে।’
Verse 99
विकर्णश्व महादेवं तथा भक्तसुखावहम् | प्रसाद्य भगवान् सिद्धि प्राप्तवान् मधुसूदन,मधुसूदन! ऐश्वर्यशाली विकर्णने भक्तसुखदायक महादेवजीको प्रसन्न करके मनोवांछित सिद्धि प्राप्त की थी
বাসুদেব বললেন—‘তেমনি বিকর্ণও ভক্তদের সুখদাতা ভগবান মহাদেবকে প্রসন্ন করে মনঃকাঙ্ক্ষিত সিদ্ধি লাভ করেছিল। হে মধুসূদন! এতে বোঝা যায়, শিবের প্রতি সত্য ভক্তি ও শ্রদ্ধাময় উপাসনাই সাফল্য দান করে।’
Verse 100
शाकल्य: संशितात्मा वै नववर्षशतान्यपि । आराधयामास भवं मनोयज्ञेन केशव,केशव! शाकल्य ऋषिके मनमें सदा संशय बना रहता था। उन्होंने मनोमय यज्ञ (ध्यान)-के द्वारा भगवान् शिवकी नौ सौ वर्षोतक आराधना की
বাসুদেব বললেন—হে কেশব! সংযতচিত্ত, দৃঢ়সংকল্প ঋষি শাকল্য মনোযজ্ঞে (অন্তর্যাগ/ধ্যানে) ভগবান ভব (শিব)-এর আরাধনা করেছিলেন; এবং তিনি টানা নয়শো বছর সেই সাধনা অবিচলভাবে পালন করেন।
Verse 101
त॑ चाह भगवांस्तुष्टो ग्रन्थकारो भविष्यसि । वत्साक्षया च ते कीर्तिस्त्रिलोक्ये वै भविष्यति
তাঁর প্রতি প্রসন্ন হয়ে ভগবান বললেন—“বৎস! তুমি গ্রন্থকার হবে, আর তোমার কীর্তি তিন লোক জুড়ে অক্ষয় হয়ে প্রসারিত হবে।”
Verse 102
अक्षयं च कुल ते<स्तु महर्षिभिरलंकृतम् । भविष्यति द्विजश्रेष्ठ: सूत्रकर्ता सुतस्तव,“तुम्हारा कुल अक्षय एवं महर्षियोंसे अलंकृत होगा। तुम्हारा पुत्र एक श्रेष्ठ ब्राह्मण एवं सूत्रकार होगा'
“তোমার বংশ অক্ষয় হোক এবং মহর্ষিদের দ্বারা অলংকৃত হোক। তোমার পুত্র দ্বিজদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ হবে এবং সূত্রকার—সূত্ররচয়িতা—হবে।”
Verse 103
सावर्णिश्वापि विख्यात ऋषिरासीत् कृते युगे । इह तेन तपस्तप्तं षष्टिवर्षशतान्यथ,सत्ययुगमें सावर्णिनामसे विख्यात एक ऋषि थे। उन्होंने यहाँ आकर छ: हजार वर्षोतक तपस्या की
বাসুদেব বললেন—কৃত (সত্য) যুগে ‘সাবর্ণি’ নামে এক প্রসিদ্ধ ঋষিও ছিলেন। তিনি এই স্থানেই এসে ছয় হাজার বছর কঠোর তপস্যা করেছিলেন।
Verse 104
तमाह भगवान् रुद्र: साक्षात् तुष्टोडस्मि तेडनघ । ग्रन्थकूल्लोकविख्यातो भवितास्यजरामर:
তখন ভগবান রুদ্র স্বয়ং প্রকাশ হয়ে বললেন—“হে অনঘ! আমি তোমার প্রতি অত্যন্ত প্রসন্ন। তুমি লোকবিখ্যাত গ্রন্থকার হবে, এবং অজর-অমর হবে।”
Verse 105
शक्रेण तु पुरा देवो वाराणस्यां जनार्दन । आराधितो<भूद् भक्तेन दिग्वासा भस्मगुण्ठित:
প্রাচীনকালে বারাণসীতে শক্র ভক্তিভরে জনার্দনকে আরাধনা করেছিলেন; তিনি দিগম্বর তপস্বীর রূপে, দেহে ভস্ম মাখা অবস্থায় প্রকাশিত হয়েছিলেন।
Verse 106
नारदेन तु भक्त्यासौ भव आराधित: पुरा
পূর্বকালে দেবর্ষি নারদ ভক্তিভরে ভব (শিব)-কে আরাধনা করেছিলেন। সেই ভক্তিতে প্রসন্ন হয়ে ভব বর দিলেন—“গান ও বাদ্যধ্বনির দ্বারা তুমি সদা আমার অনুসরণ ও প্রচার করবে।”
Verse 107
तस्य तुष्टो महादेवो जगौ देवगुरुगगुरु: । तेजसा तपसा कीर्त्या त्वत्ममो न भविष्यति
তাঁর প্রতি প্রসন্ন হয়ে দেবগুরুরও গুরু মহাদেব বললেন—“তেজ, তপস্যা ও কীর্তিতে তোমার সমান কেউ হবে না।”
Verse 108
मयापि च यथा दृष्टो देवदेव: पुरा विभो
হে বিভো! যেমন বর্ণিত হয়েছে, তেমনই আমিও পূর্বকালে দেবদেবকে দর্শন করেছিলাম।
Verse 109
यदर्थ च मया देव: प्रयतेन तथा विभो
হে বিভো! যে উদ্দেশ্যে আমি পরিশ্রমসহকারে দেবকে অন্বেষণ করেছিলাম, সেই উদ্দেশ্য পূর্ণ হয়েছে।
Verse 110
यदवाप्तं॑ च मे पूर्व देवदेवान्महेश्वरात्
আর দেবদেব মহেশ্বর—মহান প্রভু—থেকে আমি পূর্বে যা লাভ করেছিলাম, তা-ই এখন আমি যথার্থরূপে প্রমাণরূপে বর্ণনা করছি।
Verse 111
पुरा कृतयुगे तात ऋषिरासीन्महायशा:
অতীতকালে, কৃতযুগে, হে তাত, এক মহাযশস্বী ঋষি ছিলেন।
Verse 112
तस्याहमभवं पुत्रो धौम्यश्चापि ममानुज:,उन्हींका मैं पुत्र हूँ। मेरे छोटे भाईका नाम धौम्य है। माधव! किसी समय मैं धौम्यके साथ खेलता हुआ पवित्रात्मा मुनियोंके आश्रमपर आया
আমি ছিলাম তাঁর পুত্র, আর ধৌম্য ছিল আমার কনিষ্ঠ ভ্রাতা।
Verse 113
कस्यचित् त्वथ कालस्य धौम्येन सह माधव । आगच्छमाश्रमं क्रडिन् मुनीनां भावितात्मनाम्
এক সময়, হে মাধব, ধৌম্যের সঙ্গে খেলতে খেলতে আমি ভাবিতাত্মা মুনিদের আশ্রমে পৌঁছালাম।
Verse 114
तत्रापि च मया दृष्टा दुह्ममाना पयस्विनी । लक्षितं च मया क्षीरं स्वादुतो हमृतोपमम्,वहाँ मैंने देखा, एक दुधारू गाय दुही जा रही थी। वहीं मैंने दूध देखा, जो स्वादमें अमृतके समान होता है
সেখানেও আমি দেখলাম এক দুধেল গাভী দোহন করা হচ্ছে; আর আমি সেই দুধ লক্ষ্য করলাম—স্বাদে অমৃতসম।
Verse 115
ततो&5हमन्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तथा । क्षीरोदनसमायुक्त भोजन हि प्रयच्छ मे,तब मैंने बालस्वभाववश अपनी मातासे कहा--“माँ! मुझे खानेके लिये दूध-भात दो”
তখন শিশুসুলভ স্বভাববশে আমি আমার মাকে বললাম— “মা, আমাকে খেতে দুধ-ভাত দাও।”
Verse 116
अभावाच्चैव दुग्धस्य दु:खिता जननी तदा । ततः पिष्टं समालोड्य तोयेन सह माधव
বাসুদেব বললেন— “দুধ না থাকায় তখন মা দুঃখিত হলেন। তারপর, হে মাধব, তিনি জল মিশিয়ে ময়দা ভালো করে গুলে দিলেন।”
Verse 117
अथ गव्यं पयस्तात कदाचित् प्राशितं मया,तात! उसके पहले एक दिन मैंने गायका दूध पीया था। पिताजी यज्ञके समय एक बड़े भारी धनी कुटुम्बीके घर मुझे ले गये थे। वहाँ दिव्य सुरभी गाय दूध दे रही थी
বাসুদেব বললেন— “বৎস! এর আগে একদিন আমি গরুর দুধ পান করেছিলাম।”
Verse 118
पित्राहं यज्ञकाले हि नीतो ज्ञातिकुलं महत् । तत्र सा क्षरते देवी दिव्या गौ: सुरनन्दिनी
বাসুদেব বললেন— “যজ্ঞকালে পিতা আমাকে আমাদের জ্ঞাতিদের এক মহান গৃহে নিয়ে গিয়েছিলেন। সেখানে দেবীদের মতো সেই দিব্য গাভী—সুরদের আনন্দদায়িনী সুরভি—দুধ ঝরাচ্ছিল।”
Verse 119
तस्याहं तत् पय: पीत्वा रसेन हमृतोपमम् । ज्ञात्वा क्षीरगुणांश्नैव उपलभ्य हि सम्भवम्
বাসুদেব বললেন— “অমৃতসম সেই সুস্বাদু দুধ পান করে আমি বুঝে গেলাম দুধের গুণ কী, আর তা কীভাবে লাভ করা যায়।”
Verse 120
स च पिष्टरसस्तात न मे प्रीतिमुपावहत् । ततो5हमन्रुवं बाल्याज्जननीमात्मनस्तदा
প্রিয়, সেই পিষ্ট-রসের মতো খাদ্য আমার তৃপ্তি আনল না। তাই শৈশব থেকেই আমি তখন নিজের জননীকে বললাম।
Verse 121
तात! इसीलिये वह आटेका रस मुझे प्रिय नहीं लगा; अतः मैंने बालस्वभाववश ही अपनी मातासे कहा-- ।।
প্রিয়, সেই কারণেই ওই মোটা পিষ্ট-রসের স্বাদ আমার ভালো লাগেনি। তাই শিশুসুলভ সরলতায় আমি মাকে বললাম— “মা, তুমি যা দিয়েছ, তা তো ক্ষীর-ভাত নয়।” তখন দুঃখ ও শোকে আচ্ছন্ন আমার মা মাতৃস্নেহে আমাকে বুকে জড়িয়ে, আমার মাথায় ঘ্রাণ নিয়ে বললেন— “বৎস, যারা সদা অরণ্যে থাকে এবং কন্দ, মূল ও ফল খেয়ে জীবনধারণ করে— সেই সংযতচিত্ত মুনিদের কাছে ক্ষীর-ভাতই বা কোথা থেকে আসবে?”
Verse 122
पुत्रस्नेहात् परिष्वज्य मूर्थ्नि चाप्राय माधव । कुतः क्षीरोदनं वत्स मुनीनां भावितात्मनाम्
হে মাধব, পুত্রস্নেহে আমাকে বুকে জড়িয়ে ও মাথায় চুম্বন দিয়ে (মা বললেন)— “বৎস, সংযতচিত্ত মুনিদের জন্য ক্ষীর-ভাতই বা কোথা থেকে আসবে?”
Verse 123
आस्थितानां नदीं दिव्यां वालखिल्यैनिषेविताम्
সে এক দিব্য নদী—যার তীরে স্থিতপ্রজ্ঞ তপস্বীরা আশ্রয় নেয়—এবং যা বালখিল্য মুনিদের দ্বারা নিত্য সেবিত।
Verse 124
कुतः क्षीरं वनस्थानां मुनीनां गिरिवासिनाम् | “जो बालखिल्योंद्वारा सेवित दिव्य नदी गंगाका सहारा लिये बैठे हैं, पर्वतों और वनोंमें रहनेवाले उन मुनियोंको दूध कहाँसे मिलेगा? || १२३ $ ।।
অরণ্যে অবস্থানকারী, পর্বতবাসী সেই মুনিদের দুধই বা কোথা থেকে মিলবে? যারা পবিত্র, বনজ আহারেই নির্ভরশীল, এবং বনাশ্রমে বাস করে।
Verse 125
नास्ति पुत्र पयो5रण्ये सुरभीगोत्रवर्जिते
বাসুদেব বললেন—“বৎস! এই অরণ্য সুরভী-বংশশূন্য; তাই এখানে দুধ একেবারেই নেই—এখানে গাভী নেই। অতএব নদী, গুহা, পর্বত ও নানাবিধ তীর্থে তপস্যা ও জপে নিরত আমরা ঋষিগণ—আমাদের পরম আশ্রয় একমাত্র ভগবান শঙ্কর।”
Verse 126
नदीगदह्दरशैलेषु तीर्थेषु विविधेषु च । तपसा जप्यनित्यानां शिवो न: परमा गति:
নদী, গুহা, পর্বত-গিরিখাত এবং নানাবিধ তীর্থে তপস্যা ও জপে সদা নিয়োজিত আমরা তপস্বীদের পরম গতি ও পরম আশ্রয় শিবই।
Verse 127
अप्रसाद्य विरूपाक्षं वरदं स्थाणुमव्ययम् । कुत: क्षीरोदनं वत्स सुखानि वसनानि च
বৎস! বরদাতা, নিত্য স্থির ও অবিনাশী ভগবান বিরূপাক্ষকে প্রসন্ন না করে দুধ-ভাত, সুখ-সম্ভোগ ও উত্তম বস্ত্রই বা কোথা থেকে মিলবে?
Verse 128
त॑ प्रपद्य सदा वत्स सर्वभावेन शड्करम् | तत्प्रसादाच्च कामेभ्य: फल प्राप्स्यसि पुत्रक,“बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे'
বৎস! সর্বভাব দিয়ে সদা শঙ্করের শরণ নাও; তাঁর প্রসাদে তুমি তোমার কাম্য ফল লাভ করবে।
Verse 129
जनन्यास्तद् वच: श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् प्राउजलि: प्रणतो भूत्वा इृदमम्बामचोदयम्,शत्रुसूदन! जननीकी वह बात सुनकर उसी समय मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर माताजीसे यह पूछा--
জননীর সেই বাক্য শুনে সেই মুহূর্ত থেকেই, হে শত্রুহন, আমি করজোড়ে নত হলাম। তাঁর চরণে প্রণাম করে শ্রদ্ধাভরে মাতাকে জিজ্ঞাসা করলাম—ধর্মের পথ আমাকে নির্দেশ করুন।
Verse 130
को5यमम्ब महादेव: स कथं च प्रसीदति । कुत्र वा वसते देवो द्रष्टव्यो वा कथठचन,“अम्व! ये महादेवजी कौन हैं? और कैसे प्रसन्न होते हैं? वे शिव देवता कहाँ रहते हैं और कैसे उनका दर्शन किया जा सकता है?
বাসুদেব বললেন—“মা! এই মহাদেব কে? কোন উপায়ে তিনি প্রসন্ন হন? সেই দেব কোথায় বাস করেন, আর কোনোভাবে কি তাঁর দর্শন লাভ করা যায়?”
Verse 131
तुष्यते वा कथं शर्वो रूपं॑ तस्य च कीदृशम् । कथं ज्ञेय: प्रसन्नो वा दर्शयेज्जननि मम
বাসুদেব বললেন—“মা! শর্ব (শিব) কীভাবে সন্তুষ্ট হন, আর তাঁর রূপ কেমন? কোন উপায়ে তাঁকে সত্যভাবে জানা যায়? অথবা প্রসন্ন হয়ে তিনি কীভাবে আমাকে দর্শন দিতে পারেন?”
Verse 132
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला । मूर्थन्याप्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना
আমি এভাবে বলতেই, গোবিন্দ, আমার পুত্রস্নেহে ভরা মা অশ্রুতে বিহ্বল হয়ে উঠলেন। তিনি আমার মস্তকের কাছে এসে স্নেহভরে তা শুঁকে নিলেন, আর কান্নাভেজা চোখে আমার অঙ্গপ্রত্যঙ্গে হাত বুলাতে লাগলেন।
Verse 133
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन । दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम
হে মধুসূদন, আমার মা স্নেহভরে আমার অঙ্গ মুছতে-মুছতে, দীন সুরে—হে দেবশ্রেষ্ঠ—আমাকে এই কথা বললেন।
Verse 134
अम्बोवाच दुर्विज्ञेयो महादेवो दुराधारो दुरन्तक: । दुराबाधश्र दुर्ग्राह्मो दुर्दुश्यो हकृतात्मभि:
অম্বা বললেন—“মহাদেবকে জানা অত্যন্ত কঠিন। তাঁকে মনে ধারণ করাও দুরূহ, আর তাঁর প্রাপ্তির পথে ভয়ংকর বিঘ্ন রয়েছে। যাদের আত্মসংযম নেই, তাদের কাছে তিনি অগম্য—ধরা কঠিন, এবং দর্শনও দুর্লভ।”
Verse 135
यस्य रूपाण्यनेकानि प्रवदन्ति मनीषिण: । स्थानानि च विचित्राणि प्रसादाक्षाप्पनेकश:
মনীষীরা বলেন, ভগবান শঙ্করের বহু রূপ। তাঁর নিবাসস্থানও আশ্চর্য ও বিচিত্র, আর তাঁর কৃপাপ্রসাদও নানাভাবে প্রকাশিত হয়।
Verse 136
को हि तत्त्वेन तद् वेद ईशस्य चरितं शुभम् । कृतवान् यानि रूपाणि देवदेव: पुरा किल | क्रीडते च तथा शर्व: प्रसीदति यथा च वै
পূর্বকালে দেবাদিদেব মহাদেব যে যে রূপ ধারণ করেছিলেন, ঈশ্বরের সেই শুভ চরিত কে সত্যভাবে জানতে পারে? শর্ব কীভাবে লীলা করেন, আর কোন প্রকারে প্রসন্ন হন—এ কে বুঝতে পারে?
Verse 137
हृदिस्थ: सर्वभूतानां विश्वरूपो महेश्वर: । भक्तानामनुकम्पार्थ दर्शनं च यथाश्रुतम्
মহেশ্বর, যাঁর রূপ সমগ্র বিশ্ব, তিনি সকল জীবের হৃদয়ে অধিষ্ঠিত। ভক্তদের প্রতি অনুকম্পার জন্য তিনি দর্শন দেন—যেমন শ্রুতি-পরম্পরায় শোনা যায়।
Verse 138
कृतवान् यानि रूपाणि कथितानि दिवौकसै:
বৎস! দেবতাদের দ্বারা কথিত যে যে রূপ তিনি ধারণ করেছেন, তা সংক্ষেপে শোনো।
Verse 139
अनुग्रहर्थ विप्राणां शूणु वत्स समासत: । तानि ते कीर्तयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि
বৎস! ব্রাহ্মণদের প্রতি অনুগ্রহের জন্য দেবতারা যে যে রূপের কথা বলেছেন, তা সংক্ষেপে শোনো। তুমি যা যা আমাকে জিজ্ঞাসা করছ, সবই আমি তোমাকে বলব।
Verse 140
अम्बोवाच ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां रुद्रादित्याश्विनामपि । विश्वेषामपि देवानां वपुर्धारयते भव:
অম্বা বললেন—ভব (শিব) ব্রহ্মা, বিষ্ণু, দেবেন্দ্র ইন্দ্র, রুদ্রগণ, আদিত্যগণ, অশ্বিনীকুমারদ্বয় এবং সর্ব দেবতারই দেহ ধারণ করেন।
Verse 141
नराणां देवनारीणां तथा प्रेतपिशाचयो: । किरातशबराणां च जलजानामनेकश:
বাসুদেব বললেন—মানুষদের মধ্যে, দেবনারীদের মধ্যে, তদ্রূপ প্রেত ও পিশাচদের মধ্যে; কিরাত ও শবরদের মধ্যেও; এবং জলে জন্ম নেওয়া নানাবিধ প্রাণীদের মধ্যেও (এই তত্ত্ব সর্বত্রই দেখা যায়)।
Verse 142
कूर्मो मत्स्यस्तथा शड्ख: प्रवालाड्कुरभूषण:
বাসুদেব বললেন—তিনি কূর্ম, মৎস্য এবং শঙ্খরূপেও প্রকাশিত হন—প্রবালসদৃশ অঙ্কুরে ভূষিত। বসন্ত প্রভৃতি ঋতুর নিত্য-নতুন রূপে, নব পল্লবে শোভিত হয়ে, তিনিই প্রকাশ পান। সেই মহাপ্রভু যক্ষ, রাক্ষস, সর্প, দৈত্য, দানব এবং পাতালবাসীদেরও রূপ ধারণ করেন।
Verse 143
यक्षराक्षससर्पाणां दैत्यदानवयोरपि । वपुर्धारयते देवो भूयश्व विलवासिनाम्
বাসুদেব বললেন—দেবতা যক্ষ, রাক্ষস ও সর্পদের মধ্যেও, তদ্রূপ দৈত্য ও দানবদের মধ্যেও দেহ ধারণ করেন; আবার বারংবার পাতালবাসীদেরও রূপ গ্রহণ করেন।
Verse 144
व्याप्रसिंहमृगाणां च तरक्ष्वृक्षपतत्रिणाम् उलूकश्चशृगालानां रूपाणि कुरुतेडपि च,वे व्याप्र, सिंह, मृग, तरक्षु, रीछ, पक्षी, उल्लू, कुत्ते और सियारोंके भी रूप धारण कर लेते हैं
বাসুদেব বললেন—তিনি বাঘ, সিংহ ও হরিণ; হায়েনা, ভালুক ও পক্ষী; এবং পেঁচা, কুকুর ও শেয়ালেরও রূপ ধারণ করতে পারেন।
Verse 145
हंसकाकमयूराणां कृकलासकसारसाम् | रूपाणि च बलाकानां गृध्रचक्राज़््योरपि
বাসুদেব বললেন—মহাদেব হাঁস, কাক, ময়ূর, গিরগিটি ও সারসের রূপ ধারণ করেন; বক, শকুন এবং চক্রবাক-পাখির রূপও তিনি গ্রহণ করেন। এভাবে প্রভু অসংখ্য জীব-রূপে প্রকাশিত হয়ে জানান যে দেবত্ব সর্বভূতে ব্যাপ্ত, এবং কোনো প্রাণীই শ্রদ্ধার সীমার বাইরে নয়।
Verse 146
करोति वा स रूपाणि धारयत्यपि पर्वतम् । गोरूपं च महादेवो हस्त्यश्वोष्टखराकृति:
বাসুদেব বললেন—তিনি নানারূপ ধারণ করেন; এমনকি পর্বতও ধারণ করতে পারেন। মহাদেব গোরূপে এবং হাতি, ঘোড়া, উট ও গাধার আকৃতিতেও প্রকাশিত হন।
Verse 147
छागशार्दूलरूपश्न अनेकमृगरूपधृक् । अण्डजानां च दिव्यानां वपुर्धारयते भव:
বাসুদেব বললেন—ভব (শিব) ছাগ ও শার্দূল (ব্যাঘ্র)-রূপেও প্রকাশিত হন। তিনি নানা প্রকার মৃগ—বন্য পশুর—রূপ ধারণ করেন এবং দিব্য পক্ষীদের দেহও গ্রহণ করেন।
Verse 148
दण्डी छत्री च कुण्डी च द्विजानां धारणस्तथा । षण्मुखो वै बहुमुखस्त्रिनेत्रो बहुशीर्षक:
বাসুদেব বললেন—তিনি দ্বিজদের চিহ্ন—দণ্ড, ছত্র ও কুণ্ড (কমণ্ডলু)—ধারণ করেন। কখনও তিনি ষণ্মুখ, কখনও বহুমুখ; কখনও ত্রিনেত্র, আবার কখনও বহুশির।
Verse 149
अनेककटिपादश्न अनेकोदरवकक््त्रधृक् । अनेकपाणिपार्श्श्ष अनेकगणसंवृत:
বাসুদেব বললেন—তাঁর বহু কটি ও বহু পাদ; তিনি অগণিত উদর ও মুখ ধারণ করেন। তাঁর হাত ও পার্শ্বও অসংখ্য, আর নানা গণ তাঁকে চারিদিক থেকে পরিবেষ্টন করে থাকে।
Verse 150
ऋषिगन्धर्वरूपश्व सिद्धचारणरूपधृक् । भस्मपाण्ड्रगात्रश्न चन्द्रार्थकृतभूषण:
বাসুদেব বললেন—তিনি ঋষি ও গন্ধর্বের রূপ ধারণ করেন, সিদ্ধ ও চারণের রূপও গ্রহণ করেন। পবিত্র ভস্মলেপনে তাঁর সর্বাঙ্গ ধবলাভ প্রতীয়মান হয়, এবং তিনি ললাটে অর্ধচন্দ্রের অলংকার ধারণ করেন।
Verse 151
अनेकरावसंघुष्ट श्वानेकस्तुतिसंस्कृत: । सर्वभूतान्तकः सर्व: सर्वलोकप्रतिछ्तित:
বাসুদেব বললেন—নানাবিধ ধ্বনি ও কোলাহলে তিনি সদা গর্জিত; বহুবিধ স্তব-স্তোত্রে তিনি সম্মানিত। তিনি সকল প্রাণীর অন্তকারী, স্বয়ং সর্বব্যাপী স্বরূপ, এবং সকলের অন্তরাত্মা রূপে সর্বলোকেই প্রতিষ্ঠিত।
Verse 152
सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वगः सर्ववाद्यपि । सर्वत्र भगवान् ज्ञेयो हृदिस्थ: सर्वदेहिनाम्
বাসুদেব বললেন—তিনি সকল লোকের অন্তরাত্মা, সর্বব্যাপী, এবং সকল মত-উক্তিরও অধিষ্ঠান। সেই ভগবান শিবকে সর্বত্র জ্ঞাতব্য—তিনি সকল দেহধারীর হৃদয়ে অধিষ্ঠিত।
Verse 153
यो हि यं कामयेत् काम॑ यस्मिन्नर्थेडर्च्यते पुनः । तत् सर्व वेत्ति देवेशस्तं प्रपद्य यदीच्छसि
বাসুদেব বললেন—মানুষ যে যে কামনা করে এবং যে উদ্দেশ্যে বারংবার পূজা নিবেদন করে, দেবেশ্বর শিব তা সবই জানেন। অতএব যদি তুমি কোনো বর বা সিদ্ধি চাও, তবে তাঁরই শরণ গ্রহণ কর।
Verse 154
नन्दते कुप्यते चापि तथा हुंकारयत्यपि । चक्री शूली गदापाणिर्मुसली खड्गपट्टिशी
বাসুদেব বললেন—তিনি কখনও আনন্দিত হয়ে অন্যদেরও আনন্দ দেন, কখনও ক্রুদ্ধ হয়ে রোষ প্রকাশ করেন, আবার কখনও ভয়ংকর হুঙ্কার করেন। তিনি চক্র, শূল, গদা, মুসল, খড়্গ ও পট্টিশ ধারণ করেন।
Verse 155
भूधरो नागमौज्जी च नागकुण्डलकुण्डली । नागयज्ञोपवीती च नागचर्मोत्तरच्छद:
বাসুদেব বললেন—তিনি পৃথিবীর ধারক; সাপের মেখলা পরিধান করেন। সাপময় কুণ্ডলে কুণ্ডলধারী, সাপেরই যজ্ঞোপবীত ধারণ করেন, এবং সাপচর্মকে উত্তরীয়রূপে ধারণ করেন।
Verse 156
हसते गायते चैव नृत्यते च मनोहरम् । वादयत्यपि वाद्यानि विचित्राणि गणैर्युत:,वे अपने गणोंके साथ रहकर हँसते हैं, गाते हैं, मनोहर नृत्य करते हैं और विचित्र बाजे भी बजाते हैं
বাসুদেব বললেন—তিনি তাঁর গণদের সঙ্গে থেকে হাসেন, গান করেন, মনোহর নৃত্য করেন, এবং বিচিত্র বিচিত্র বাদ্যও বাজান।
Verse 157
वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि । उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वर:
বাসুদেব বললেন—ভগবান রুদ্র কখনও লাফিয়ে ওঠেন, কখনও হাই তোলেন; কখনও কাঁদেন, আবার অন্যদেরও কাঁদান। কখনও উন্মত্ত বা মত্তের মতো কথা বলেন, আবার কখনও মধুর স্বরে উৎকৃষ্ট বাক্য উচ্চারণ করেন।
Verse 158
अतीव हसते रौद्रस्त्रासयन् नयनैर्जनम् । जागर्ति चैव स्वपिति जृम्भते च यथासुखम्
বাসুদেব বললেন—তিনি রুদ্রভাব নিয়ে অতিশয় হাসেন এবং নিজের দৃষ্টিতেই লোকদের ভীতসন্ত্রস্ত করেন। তবু তিনি ইচ্ছামতো জাগেন, ঘুমান, এবং স্বচ্ছন্দে হাই তোলেন।
Verse 159
कभी भयंकर रूप धारण करके अपने नेत्रोंद्वारा लोगोंमें त्रास उत्पन्न करते हुए जोर- जोरसे अट्टहास करते, जागते, सोते और मौजसे अँगड़ाई लेते हैं ।।
বাসুদেব বললেন—তিনি জপ করেন, আবার তিনিই জপের দ্বারা আহ্বেয়; তিনি তপস্যা করেন, আবার তাঁরই উদ্দেশ্যে তপস্যা করা হয়। তিনি দান দেন এবং দান গ্রহণও করেন; তিনি যোগে যুক্ত হন এবং ধ্যানও করেন।
Verse 160
वेदीमध्ये तथा यूपे गोष्ठमध्ये हुताशने । दृश्यते दृश्यते चापि बालो वृद्धों युवा तथा
যজ্ঞবেদীতে, যূপস্তম্ভে, গোশালায় এবং প্রজ্বলিত অগ্নিতে—তিনি দৃশ্যমান, সত্যই দৃশ্যমান। আবার তিনি বালক, বৃদ্ধ ও যুবারূপেও দর্শন দেন।
Verse 161
क्रीडते ऋषिकन्याभिक्रषिपत्नीभिरेव च । ऊर्ध्वकेशो महाशेफो नग्नो विकृतलोचन:
তিনি ঋষিকন্যা ও মুনিপত্নীদের সঙ্গে ক্রীড়া করেন। কখনও ঊর্ধ্বকেশ, কখনও মহাশেফ, কখনও নগ্ন, আবার কখনও বিকৃত-লোচন (ভয়ংকর দৃষ্টিসম্পন্ন) রূপ ধারণ করেন।
Verse 162
गौर: श्यामस्तथा कृष्ण: पाण्डुरो धूमलोहित: । विकृताक्षो विशालाक्षो दिग्वासा: सर्ववासक:
কখনও তিনি গৌর, কখনও শ্যাম, কখনও কৃষ্ণ, কখনও পাণ্ডুর; কখনও ধূম্রবর্ণ, কখনও লোহিতবর্ণ রূপে দেখা দেন। কখনও তাঁর চোখ বিকৃত মনে হয়, আবার কখনও সুন্দর বিশাল নয়নে শোভিত হন। কখনও তিনি দিগম্বর, আবার কখনও সর্বপ্রকার বস্ত্রে ভূষিত।
Verse 163
अरूपस्याद्यरूपस्य अतिरूपाद्यरूपिण: । अनाट्यन्तमजस्यान्तं वेत्स्यते को5स्य तत्त्वतः
তিনি রূপহীন—এবং রূপহীনদের মধ্যেও আদ্য; রূপের অতীত, তবু সকল রূপের কারণ। তিনি অজ, যার না আছে আদি, না আছে অন্ত। সত্যতই তাঁর তত্ত্ব কে জানতে পারে?
Verse 164
हृदि प्राणो मनो जीवो योगात्मा योगसंज्ञित: । ध्यानं तत्परमात्मा च भावग्राह्मो महेश्वर:
প্রাণীদের হৃদয়ে তিনিই প্রাণ, তিনিই মন, এবং তিনিই জীবাত্মা হয়ে বিরাজ করেন। তিনিই যোগস্বরূপ, তিনিই যোগী, তিনিই ধ্যান, এবং তিনিই পরমাত্মা। মহেশ্বর ভক্তিভাব দ্বারাই গ্রাহ্য হন।
Verse 165
वादको गायनश्वैव सहस्रशतलोचन: । एकवतक्त्रो द्विवक्त्रश्न त्रिवक्त्रोडनेकवक्त्रक:,वे बाजा बजानेवाले और गीत गानेवाले हैं। उनके लाखों नेत्र हैं। वे एकमुख, द्विमुख, त्रिमुख और अनेक मुखवाले हैं
সেখানে বাদ্যযন্ত্র বাজানো ও গান গাওয়া লোকও আছে। তাদের শত-সহস্র নয়ন; তারা একমুখ, দ্বিমুখ, ত্রিমুখ এবং বহুমুখ বলে বর্ণিত।
Verse 166
तद्धक्तस्तद्गतो नित्य॑ तन्निष्ठस्तत्परायण: । भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम्
তাঁরই ভক্ত হও, নিত্য তাঁতেই মন নিবিষ্ট রাখো। সেই একনিষ্ঠায় স্থির থেকো, তাঁকেই পরম আশ্রয় মানো। হে পুত্র, মহাদেবের নিরন্তর ভজন করো; তবেই তুমি ইচ্ছিত ফল লাভ করবে।
Verse 167
जनन्यास्तद् वच: श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् । मम भक्तिर्महादेवे नैप्ठेकी समपद्यत
মায়ের সেই বাক্য শুনে, হে শত্রুহন, সেই সময় থেকেই মহাদেবের প্রতি আমার ভক্তি নৈষ্ঠিক—অচল ও অবিচল—হয়ে উঠল।
Verse 168
शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! माताका वह उपदेश सुनकर तभीसे महादेवजीके प्रति मेरी सुदृढ़ भक्ति हो गयी ।।
তারপর আমি তপস্যার আশ্রয় নিয়ে শংকরকে প্রসন্ন করলাম। পূর্ণ এক সহস্র বছর আমি বাম পায়ের বৃদ্ধাঙ্গুষ্ঠের অগ্রভাগে ভর দিয়ে দাঁড়িয়ে রইলাম।
Verse 169
एकं वर्षशतं चैव फलाहारस्ततो 5भवम् । द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजन:
প্রথম পূর্ণ একশ বছর আমি কেবল ফলাহার করলাম। দ্বিতীয় শতকে ঝরে-পড়া শুকনো পাতা খেয়ে থাকলাম, আর তৃতীয় শতকে শুধু জল গ্রহণ করেই জীবন ধারণ করলাম।
Verse 170
शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदा भवम् | एकं वर्षसहसत्रं तु दिव्यमाराधितो मया,फिर शेष सात सौ वर्षोतक केवल हवा पीकर रहा। इस प्रकार मैंने एक सहस्र दिव्य वर्षोतक उनकी आराधना की
বাসুদেব বললেন—তখন আমি কেবল বায়ু আহার করে সাতশো বছর কাটিয়েছিলাম। এইভাবে আমি পূর্ণ এক সহস্র দিব্যবর্ষ ভক্তি ও তপস্যায় তাঁর আরাধনা করেছিলাম।
Verse 171
ततस्तुष्टो महादेव: सर्वलोके श्वरः: प्रभु: । एकभक्त इतितकज्ञात्वा जिज्ञासां कुरुते तदा,तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् महादेव मुझे अपना अनन्यभक्त जानकर संतुष्ट हुए और मेरी परीक्षा लेने लगे
তারপর সর্বলোকেশ্বর প্রভু মহাদেব সন্তুষ্ট হলেন। আমাকে একনিষ্ঠ ভক্ত জেনে তিনি তখন আমার ভক্তির দৃঢ়তা যাচাই করতে আমাকে পরীক্ষা করতে লাগলেন।
Verse 172
शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृत: । सहस्राक्षस्तदा भूत्वा वज्रपाणिमहायशा:
তখন তিনি সকল দেবগণের পরিবেষ্টিত হয়ে শক্র (ইন্দ্র)-রূপ ধারণ করে এলেন। সহস্রনেত্র মহাযশস্বী বজ্রপাণি ইন্দ্ররূপে তিনি প্রকাশ পেলেন।
Verse 173
सुधावदातं रक्ताक्ष॑ं स्तब्धकर्ण मदोत्कटम् । आवेष्टितकरं घोर चतुर्दष्टं महागजम्
আমি সেই মহাগজকে দেখলাম—সুধার মতো উজ্জ্বল শুভ্র, রক্তবর্ণ নয়ন, স্থির-উন্নত কর্ণ, মদে উন্মত্ত, কুণ্ডলিত শুঁড়, ভয়ংকর এবং চতুর্দন্ত।
Verse 174
समास्थित: स भगवान् दीप्यमान: स्वतेजसा । आजगाम किरीटी तु हारकेयूरभूषित:
তিনি স্বীয় তেজে দীপ্ত, স্থিরভাবে সেখানে এলেন—মস্তকে মুকুট, কণ্ঠে হার এবং বাহুতে কেয়ূর ধারণ করে।
Verse 175
पाण्डुरेणातपत्रेण प्रियमाणेन मूर्थनि । सेव्यमानो5प्सरोभि श्व् दिव्यगन्धर्वनादितै:
তাঁর মস্তকের উপর স্নেহভরে ধরা শুভ্র ছত্র বিস্তৃত ছিল। অপ্সরারা তাঁকে সেবা করছিল, আর দিব্য গন্ধর্বদের মধুর সংগীতধ্বনি চারিদিকে প্রতিধ্বনিত হচ্ছিল—পুণ্যফলে প্রাপ্ত রাজসম্মান ও অলৌকিক সৌভাগ্যের এক মহিমান্বিত দৃশ্য।
Verse 176
ततो मामाह देवेन्द्रस्तुष्टस्ते5हं द्विजोत्तम । वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यत् ते मनसि वर्तते
তখন সন্তুষ্ট হয়ে দেবেন্দ্র ইন্দ্র আমাকে বললেন—“হে দ্বিজশ্রেষ্ঠ, আমি তোমার প্রতি প্রসন্ন। তোমার মনে যে ইচ্ছা আছে, আমার কাছ থেকে সেই বরই গ্রহণ কর।” ইন্দ্রের কথা শুনেও আমার হৃদয় উল্লসিত হলো না; তবু সৌজন্য রক্ষা করে আনন্দ প্রকাশ করে আমি দেবরাজকে উত্তর দিলাম।
Verse 177
शक्रस्य तु वच: श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम् । अब्रुवंश्व तदा हृष्टो देवराजमिदं वच:
শক্রের কথা শুনেও আমি অন্তরে প্রসন্ন হলাম না। তবু বাহ্যত আনন্দ প্রকাশ করে আমি দেবরাজকে এই কথা বললাম।
Verse 178
नाहं त्वत्तो वरं काडक्षे नान्यस्मादपि दैवतात् | महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,'सौम्य! मैं महादेवजीके सिवा तुमसे या दूसरे किसी देवतासे वर लेना नहीं चाहता। यह मैं सच्ची बात कहता हूँ
হে সৌম্য! আমি তোমার কাছ থেকে, কিংবা অন্য কোনো দেবতার কাছ থেকেও, বর চাই না। মহাদেব ব্যতীত—এ কথাই আমি তোমাকে সত্য বলে জানাই।
Verse 179
सत्यं सत्यं हि नः शक्र वाक्यमेतत् सुनिश्चितम् | न यन्महे श्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते
হে শক্র! আমাদের এই বাক্য সত্য—সত্যই—এবং দৃঢ়ভাবে স্থির। মহেশ্বরকে বাদ দিয়ে অন্য কোনো কথা আমার মনকে রোচে না।
Verse 180
पशुपतिवचनाद् भवामि सद्य: कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाख: । अपशुपतिवरप्रसादजा मे त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा
বাসুদেব বললেন—ভগবান পশুপতির বাক্যে আমি তৎক্ষণাৎ আনন্দসহকারে কীটও হতে পারি, বহু শাখাবিশিষ্ট বৃক্ষও হতে পারি। কিন্তু পশুপতি (শিব) ব্যতীত অন্য কারও বর-প্রসাদে যদি ত্রিভুবনের রাজ্য-ঐশ্বর্যও আমার কাছে আসে, তবু তা আমার কাম্য নয়।
Verse 181
जन्म श्व॒पाकम ध्ये5पि मे5स्तु हरचरणवन्दनरतस्य । मा वानीश्वरभक्तो भवानि भवने5पि शक्रस्य
বাসুদেব বললেন—যদি হর (শংকর)-চরণে বন্দনায় রত থাকতে পারি, তবে আমার জন্ম চাণ্ডালদের মধ্যেও হোক—তাও আমি গ্রহণ করি। কিন্তু শিবের অনন্য ভক্তি থেকে বঞ্চিত হয়ে ইন্দ্রের প্রাসাদেও বাস চাই না।
Verse 182
वाय्वम्बुभुजो5पि सतो नरस्य दुःखक्षय: कुतस्तस्य । भवति हि सुरासुरगुरौ यस्य न विश्वेश्वरे भक्ति:
বাসুদেব বললেন—মানুষ কেবল বায়ু আর জলেই জীবনধারণ করুক না কেন, যার দেব-অসুর-গুরু বিশ্বেশ্বরে ভক্তি নেই, তার দুঃখক্ষয় কীভাবে হবে?
Verse 183
अलमन्याभिस्तेषां कथाभिरप्यन्यधर्मयुक्ताभि: । येषां न क्षणमपि रुचितो हरचरणस्मरणविच्छेद:
যাদের কাছে এক মুহূর্তের জন্যও হর (শিব)-চরণারবিন্দের স্মরণ থেকে বিচ্ছেদ সুখকর নয়, তাদের জন্য অন্য ধর্মে যুক্ত নানা কথাবার্তা সবই নিষ্ফল।
Verse 184
हरचरणनिरतमतिना भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य । संसारभयं न भवति हरभक्तिरसायनं पीत्वा
কুটিল কলিযুগ উপস্থিত হলেও মানুষের উচিত নিজের চিত্ত হর (শংকর)-চরণারবিন্দের চিন্তনে নিবদ্ধ করা। শিবভক্তিরূপ রসায়ন পান করলে সংসারভয় আর থাকে না।
Verse 185
दिवसं दिवसार्ध वा मुहूर्त वा क्षणं लवम् न हालब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शडूकरे
যার উপর ভগবান শিবের প্রসাদ নেই, তার অন্তরে শঙ্করের প্রতি ভক্তি এক দিন, অর্ধদিন, এক মুহূর্ত, এক ক্ষণ বা এক লবমাত্রও জাগে না।
Verse 186
अपि कीट: पतड़्जो वा भवेयं शड्कराज्ञया । न तु शक्र त्वया दत्त त्रलोक्यमपि कामये
হে শক্র! শঙ্করের আজ্ঞায় আমি কীট বা পতঙ্গও হতে পারি; কিন্তু তোমার দত্ত ত্রিলোক্যের রাজ্যও আমি কামনা করি না।
Verse 187
श्वापि महेश्वरवचनाद् भवामि स हि नः पर: काम: । त्रिदशगणराज्यमपि खलु नेच्छाम्यमहेश्वराज्ञप्तम्
হে শক্র! মহেশ্বরের বাক্যে আমি কুকুরও হতে পারি—সেটাই আমার পরম কামনা। আর মহেশ্বরের আজ্ঞা না থাকলে দেবগণের রাজ্যও আমি চাই না।
Verse 188
न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं न ब्रह्मलोक॑ न च निष्कलत्वम् | न सर्वकामानखिलान् वृणोमि हरस्य दासत्वमहं वृणोमि
আমি না স্বর্গের শিখর চাই, না দেবরাজ্য, না ব্রহ্মলোক, না নিষ্কল মুক্তি। সকল কামনার পূর্তিও আমি বরণ করি না—আমি কেবল হর (শিব)-এর দাসত্বই বরণ করি।
Verse 189
यावच्छशाड्कधवलामलबद्धमौलि- न प्रीयते पशुपतिर्भगवान् ममेश: । तावज्जरामरणजन्मशताभिषघातै- दुःखानि देहविहितानि समुद्गह्यामि
যাঁর মস্তকে চন্দ্রসম উজ্জ্বল, নির্মল অর্ধচন্দ্রের মুকুট বাঁধা—সেই আমার স্বামী ভগবান পশুপতি যতক্ষণ প্রসন্ন না হন, ততক্ষণ জন্ম, জরা ও মৃত্যুর শত শত আঘাতে উৎপন্ন দেহগত দুঃখের ভার আমি বহন করব।
Verse 190
दिवसकरशशाड्कवद्िदीप्तं त्रिभुवनसारमसारमाद्यमेकम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम्
বাসুদেব বললেন—যিনি সূর্য, চন্দ্র ও অগ্নির জ্যোতিতে দীপ্ত; যিনি ত্রিভুবনের সারস্বরূপ, যাঁর ঊর্ধ্বে আর কোনো ‘সার’ নেই; যিনি জগতের আদিকারণ, অদ্বিতীয়, অজর ও অমর—সেই ভগবান রুদ্রকে ভক্তিভাবে প্রসন্ন না করে এই জগতে কোন মানুষ শান্তি লাভ করতে পারে?
Verse 191
यदि नाम जन्म भूयो भवति मदीयेै: पुनर्दोषै: । तस्मिंस्तस्मिउजन्मनि भवे भवेन्मे$क्षया भक्ति:
বাসুদেব বললেন—যদি আমারই পুনঃপুন দোষের কারণে আমাকে এই জগতে বারবার জন্ম নিতে হয়, তবে আমার এই কামনা—প্রতিটি সেই জন্মে ভগবান শিবের প্রতি আমার ভক্তি অক্ষয় ও অবিনশ্বর থাকুক।
Verse 192
शक्र उवाच कः पुनर्भवने हेतुरीशे कारणकारणे । येन शरवददृतेडन्यस्मात् प्रसादं नाभिकाड्क्षसि
শক্র (ইন্দ্র) বললেন—হে ঈশ, হে কারণেরও কারণ! পুনর্জন্মের কারণ কী? আর এমন কী প্রমাণ আছে, যার ফলে আপনি শর্ব (শিব) ব্যতীত অন্য কোনো দেবতার কৃপা-প্রসাদ কামনা করেন না?
Verse 193
उपमन्युरुवाच सदसद् व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिन: । नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणीमहे
উপমনু বললেন—দেবরাজ! ব্রহ্মবাদী মহাত্মারা যাঁকে নানা মত অনুসারে সৎ-অসৎ, ব্যক্ত-অব্যক্ত, নিত্য, এক ও অনেক বলে অভিহিত করেন—সেই মহাদেবের কাছ থেকেই আমরা বর প্রার্থনা করব।
Verse 194
अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम् । आत्मानं परमं यस्माद् वरं तस्माद् वृणीमहे
যাঁর আদিও নেই, মধ্যও নেই, অন্তও নেই; যাঁর ঐশ্বর্যই জ্ঞান; যিনি চিত্তের চিন্তনশক্তিরও অতীত—এই কারণেই যাঁকে পরমাত্মা বলা হয়—সেই মহাদেবের কাছ থেকেই আমরা বর গ্রহণ করব।
Verse 195
ऐश्वर्य सकल॑ यस्मादनुत्पादितमव्ययम् | अबीजाद् बीजसम्भूतं वरं तस्माद् वृणीमहे
যাঁহা হইতে সমগ্র ঐশ্বর্য অনুৎপন্ন, অব্যয় ও অক্ষয়রূপে উদ্ভূত হয়; যিনি স্বয়ং অবীজ এবং যাঁহা হইতে বীজসম্ভূত সকল কারণ-কার্য উৎপন্ন—সেই মহাদেবের নিকটেই আমরা বর প্রার্থনা করি।
Verse 196
तमस: परम ज्योतिस्तपस्तद्वृत्तिनां परम् य॑ ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद् वृणीमहे
তিনি অজ্ঞতার তমসার অতীত চৈতন্যময় পরম জ্যোতি; তপস্বীদের জন্য পরম তপস্যা; যাঁকে জেনে জ্ঞানীরা আর কখনও শোক করেন না—সেই ভগবান শিবের নিকটেই আমরা বর চাই।
Verse 197
भूतभावनभावज्ञ सर्वभूताभिभावनम् | सर्वगं सर्वदं देवं पूजयामि पुरन्दर
পুরন্দর! যিনি সকল ভূতের উৎপাদক এবং তাদের অন্তর্ভাব জানেন; যিনি সকল প্রাণীর পরাভব-লয়েরও পরম আশ্রয়; যিনি সর্বব্যাপী ও সর্বদাতা দেব—সেই মহাদেবকে আমি পূজা করি।
Verse 198
हेतुवादैर्विनिर्मुक्ते सांख्ययोगार्थदं परम् यमुपासन्ति तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणीमहे
যিনি তর্ক-বিতর্ক ও যুক্তিবাদের ঊর্ধ্বে; যিনি ভক্তদের সাংখ্য ও যোগের পরম লক্ষ্য দান করেন; যাঁকে তত্ত্বজ্ঞেরা নিরন্তর উপাসনা করেন—সেই মহাদেবের নিকটেই আমরা বর প্রার্থনা করি।
Verse 199
मघवन् मघवात्मान यं वदन्ति सुरेश्वरम । सर्वभूतगुरुं देवं वरं तस्माद् वृणीमहे,मघवन! ज्ञानी पुरुष जिन्हें देवेश्वर इन्द्ररूप तथा सम्पूर्ण भूतोंके गुरुदेव बताते हैं, उन्हींसे हम वर लेना चाहते हैं
হে মঘবন, হে মঘবাত্মন! যাঁকে লোকেরা সুরেশ্বর এবং সকল ভূতের গুরু-দেব বলে—সেই দেবের নিকটেই আমরা বর চাই।
Verse 200
य: पूर्वमसृजद् देवं ब्रह्माणं लोकभावनम् । अण्डमाकाशमापूर्य वरं तस्माद् वृणीमहे
যিনি আদিতে লোকধারক দেব ব্রহ্মাকে সৃষ্টি করেছিলেন এবং আকাশকে মহাণ্ডে পরিপূর্ণ করেছিলেন—সেই মহাদেবের কাছ থেকেই আমরা বর প্রার্থনা করি।
Upamanyu faces a choice between accepting boons from a powerful deity in disguise (Śakra/Indra-form) versus maintaining exclusive fidelity to Mahādeva; the dilemma tests whether spiritual aims are instrumentally negotiated or steadfastly oriented to the highest object of devotion.
The chapter teaches that ultimate stability and auspiciousness are pursued through disciplined devotion and self-restraint: even when cosmic power is offered, ethical clarity lies in refusing lesser ends and aligning intention with a single highest principle.
Yes in functional terms: the narrative explicitly links steadfast bhakti and tapas to concrete outcomes—darśana, knowledge, enduring well-being, and divine proximity—positioning the chapter as a model for how understanding and reciting Śiva’s greatness supports liberation-oriented conduct.