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यह सोपान ‘वैराग्य-प्रवेश’ का द्वार है: राजधर्म/गृहस्थ-व्यवस्था के बीच राम का वनगमन दिखाता है कि मुक्ति-मार्ग में ‘प्रिय’ (सुख, राज्य, लोक-प्रतिष्ठा) का त्याग नहीं, बल्कि ‘धर्म-निष्ठ’ समर्पण प्रधान है। अयोध्या काण्ड में करुण-रस के माध्यम से आसक्ति की जड़ें उजागर होती हैं और भक्त को शिक्षा मिलती है कि प्रेम (प्रेम-भक्ति) शोक में भी भगवान की ओर ले जाने वाली शक्ति है। यह चरण साधक को ‘लोक-बंधन’ से ‘ईश्वर-शरण’ की ओर मोड़ता है—जहाँ राम-चरित स्वयं साधना का अनुशासन बन जाता है।
الراسا الرئيسي في أيودhya كاندا هو كارونا، لكن هذه الرحمة ليست يأساً، بل هي سمسكارا للفيراغيا. في هذا المقطع، نصيحة راما للناس، وتوقيره للغورو، وحب المدينة المتألم معاً يخلقان دراما مكثفة لـ "الدهرما مقابل التعلق". في رؤية تولاسي للدهرما، نفي راما إلى الغابة ليس مجرد حدث سياسي، بل هو تنشيط للساعي للتخلي عن "مملكة الأنا" الداخلية. استعارة ظلام المدينة، مثل كالاراتري، ومحرق الموتى، ومأوى الأرواح، تُظهر كيف يذبل جمال العالم في الانفصال عن الرب. في الوقت نفسه، دارشان الغانجا وصداقة زعيم النيشادا غوها تؤكد طبيعة البكتي التي تحتضن المجتمع. هكذا يصبح هذا كاندا جسراً وسطياً في ماناس: متجاوزاً "بكتي الأصل" في بالاكاندا، يصبح سلم "بكتي التخلي" وشاراناغاتي، حيث يتألق داخل ليللا الساغونا حقيقة النيرغونا: تياغا، ساماتا، كارونا.
Verse 164 (चौपाई)
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।। कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।। गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।। जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।। दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।। सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।। बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।
خرجوا ووقفوا عند باب فاشيشتا، ورآهم الناس وقلوبهم تحترق بنار الفراق. فتحدث بكلمات محبة ونصحهم جميعاً، ودعا جماعة البراهمة وبطل راغو. وكلم معلمه وأعطاه العرش الملكي، وبالاحترام والعطايا والتوسل رضاه. فارتضى المتلقي العطية والشرف، وسر الصديق بالمحبة الطاهرة. ودعا الخادمات والخدم مرة أخرى، وضم يديه وكلم معلمه. قائلاً: يا سيد، تولَّ أمر كل ما هو ضروري، واعتنِ بأمي كما ينبغي للأم. ومراراً ضم كفيه وانحنى، وراما يقول كلمات لطيفة للجميع. قائلاً: افعلوا كل ما فيه خيري بكل طريقة، ليبقى أهل البيت سعداء.
Verse 165 (दोहा/सोरठा)
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
يا أماه، الجميع في فراقي حزينون، ولا أحد إلا وهو مبتلى بالأسى. لذلك، ضعي وسيلة بحيث يصبح أهل المدينة مهرة غاية في المهارة.
Verse 166 (चौपाई)
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा। गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।। राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।। कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।। गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।। रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं। एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।। पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।
بهذه الطريقة أوضح راما للجميع، وفرحاً انحنى برأسه عند قدمي معلمه اللتين كاللوتس. ثم ودع غانيشاتي وغاوري وغريشا، وبعد أن نال البركات، انطلق سيد راغو. وعندما رحل راما، عمّ حزن عظيم، ولا يمكن سماع أنات المدينة. ظهرت نذور شؤم في لانكا وأيوديا، سببت حزناً عظيماً، وغمرت الآلهة الحزن والذهول. وعندما استعاد الملك وعيه من إغمائه، نادى سوميترا وبدأ يتحدث هكذا: رحل راما إلى الغابة، لكن حياتي لا تفارقني، لأي سعادة يبقى هذا الجسد في داخلي؟ لذلك، ما هذا الابتلاء القوي الذي يجعل المرء يترك الجسد والحياة نفسه بعد الحصول على مثل هذا الحزن؟ ثم هدأ سيد الرجال وقال: خذ المركبة واذهب يا صديقي معه.
Verse 167 (दोहा/सोरठा)
-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।
الأميران الرقيقان وابنة جاناكا الرقيقة، بعد ركوب المركبة، سينظران إلى الغابة ويعودان بعد مرور أربعة أيام.
Verse 168 (चौपाई)
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।। तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।। जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।। सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।। पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।। एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।। नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।। अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।
إذا لم يعد الأخوان الثابتان على الحق والراسخان في العزم، سيدا راغو، فضمّ يديك توسلاً وقُل: عُد يا سيد، يا ابنة ملك ميثيلا. وعندما ترى سيتا الغابة وتخاف، تحدث إليها عندما يحين الوقت المناسب. قُل إن حماتك وحموك أرسلا هذه الرسالة: عودي يا ابنتي، الغابة تجلب معاناة كبيرة. أحياناً أقيمي في بيت أبيك، وأحياناً في بيت حموك، ابقي حيثما يسرّك. بهذه الطريقة خطط حيلة، وإذا عادت، ستجد حياتي سنداً. وإلا، سيكون موتي هو النتيجة، لم أستطع إنجاز شيء، فقد كان القدر قاسياً معي. بعد أن قال هذا، سقط الملك مغشياً على الأرض، وجاء راما ولاكشمانا وسيتا وأروا أنفسهم له.
Verse 169 (दोहा/सोरठा)
-पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ। गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।
بعد الحصول على الإذن، انحنى برأسه وساق المركبة بسرعة كبيرة، وذهب إلى حيث كان الأخوان مع سيتا خارج المدينة.
Verse 170 (चौपाई)
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।। चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।। चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।। कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।। लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।। घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।। घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।। बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।
ثم أعلن سومانترا كلمات الملك، وبعد تقديم طاعته، ساعد راما على ركوب المركبة. وبعد ركوب المركبة مع سيتا وأخويه، انطلقوا وهم ينحنون برؤوسهم نحو أيوديا في قلوبهم. وعندما رأوا راما يرحل، شعر سكان أيوديا باليتم، وغمرهم الحزن وبدأوا جميعاً يتبعونه. محيط الرحمة أوضح لهم بطرق كثيرة، لكنهم عادوا ثم جاءوا مرة أخرى، مغلوبين بالحب. بدت أيوديا مخيفة للغاية، كأن ليل الموت المظلم قد حل عليها. كان الرجال والنساء في المدينة مثل مخلوقات مرعوبة، كل واحد يرتجف عند رؤية الآخر. بدت البيوت مثل مدافن، والأقارب مثل أشباح، وبدا الأبناء من أجل آبائهم مثل رسل ياما. ذبلت الحدائق والأشجار والزواحف، ولم يعد بالإمكان التعرف على الأنهار والبحيرات.
Verse 171 (दोहा/सोरठा)
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।
الخيول والأبقار والغزلان بالملايين، وحيوانات المدينة، والشاتاكا والطواويس والببغاوات وعجلات المركبات والببغاوات الصغيرة والزرازير والرافعات والبجع والشاكورا.
Verse 172 (चौपाई)
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।। नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।। बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।। सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।। सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।। जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।। चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।। राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।
وقف الجميع بلا حراك في حزنهم لفراق راما، كأنهم صور مرسومة وضعت هنا وهناك. كانت المدينة مليئة بالطيور والغزلان والرجال والنساء بكثرة، وكانت الغابة كثيفة وعميقة. جعل براهما كايكي مثل صيادة، أعطت سماً لا يُحتمل ونشرته في جميع الاتجاهات العشرة. لم يستطع الناس تحمل ألم فراق سيد راغو، فانطلقوا جميعاً مشتتين هاربين. فكر الجميع في قلوبهم أنه بدون راما ولاكشمانا وسيتا لا توجد سعادة. حيث يوجد راما، يوجد كل المجتمع، وبدون سيد راغو، أيوديا لا شيء. انطلقوا معاً، عازمين بثبات على هذا الفكر، تاركين بيوتهم، وهي فرحة نادرة حتى للآلهة. الذين تعزّ عليهم قدمي راما اللتين كاللوتس، كيف يمكنهم البقاء تحت سيطرة الملذات الدنيوية؟
Verse 173 (दोहा/सोरठा)
बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।
ترك الأطفال وكبار السن بيوتهم، وانضم جميع الناس معاً. في اليوم الأول، جعل سيد راغو مسكنه على ضفة تاماسا.
Verse 174 (चौपाई)
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।। करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।। कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।। किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।। सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।। लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।। जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।। खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।
رأى سيد راغو الناس مغلوبين بالحب، وامتلأ قلبه الرقيق بحزن خاص. سيد راغو الرحيم، المعلم، يشعر بسرعة بألم الآخرين كأنه ألمه. متحدثاً كلمات لطيفة وجميلة بالحب، أوضح راما للناس بطرق كثيرة. أعطاهم الكثير من التعليم في البر، لكن الناس تحت سيطرة الحب لم يعودوا. لا يمكن التخلي عن الصلاح والمودة، وهكذا وجد سيد راغو نفسه في موقف صعب. غمر الناس الحزن والإرهاق، وكان هذا إلى حد ما عمل خداع الآلهة. وعندما مر الليل، تحدث راما بمودة إلى مستشاره. ابحث عن مكان وسُق المركبة يا صديقي، لا توجد طريقة أخرى للتعامل مع هذا الأمر.
Verse 175 (दोहा/सोरठा)
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।। सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
عندما عرف أن راما ولاكشمانا وسومانترا قد ركبوا المركبة وانحنوا برؤوسهم عند قدمي شامبو، ساق الوزير المركبة فوراً بعيداً، باحثاً هنا وهناك لتضليلهم.
Verse 176 (चौपाई)
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।। रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।। मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।। एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।। निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।। जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।। एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।। बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।
استيقظ جميع الناس، وطلع الفجر؛ وعندما رحل رب راغو، ثار ضجيج عظيم. بحثوا عن المركبة فلم يجدوها في مكان؛ وركضوا في كل الاتجاهات الأربعة، صارخين: راما، راما! كان الأمر كأن سفينة قد غرقت في المحيط؛ وكان جمع المواطنين العظيم في ألم شديد. قال أحدهم للآخر: لقد تخلى راما عنا، عالمين بحزننا. لاموا أنفسهم ومدحوا مينا، صارخين: تباً لهذه الحياة الخالية من بطل راغو! إذا كان الله قد قدر هذا الفراق المؤلم عن الحبيب، فلماذا لم يمنحنا الموت بدلاً منه؟ هكذا رثوا وناحوا، وجاء أهل أيوديا، مملوئين بالألم. لا يمكن وصف الفراق المروع؛ ومع ذلك يحتفظ الجميع بحياتهم على أمل رؤيته مرة أخرى.
Verse 177 (दोहा/सोरठा)
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि। मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।
بدأ الرجال والنساء، من أجل رؤية راما، يلتزمون بالنذور والصيام، مثل طيور التشاكورا التي فقدت اللوتس وتعاني بلا القمر.
Verse 178 (चौपाई)
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।। उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।। लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।। कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।। सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।। मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।। सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।
مع سيتا والوزير، وصل الأخوان إلى شرينغافيرابورا. نزل راما ورأى النهر المقدس؛ فسجد بجسده كله، وكان فرحه عظيماً. سجد لاكشمانا والوزير وسيتا؛ وفرح راما معهم جميعاً. نهر الغانغا هو أصل كل فرح وبركة، مانحة كل سعادة ومزيلة كل أحزان. بينما يروي قصصاً لا تحصى وحكايات، كان راما يتأمل أمواج الغانغا. روى للوزير وأخيه وحبيبته مجد النهر السماوي الفائق. اغتسل، وزال تعب الرحلة؛ وشرب الماء النقي، فصار قلبه مسروراً. ذكره يزيل عبء التعب؛ وهذا الفعل الدنيوي بالاغتسال هو رمز لذلك الراحة الروحية.
Verse 179 (दोहा/सोरठा)
सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।
هو النقي، تجسيد الوجود والوعي والنعمة، سرور محبيه، راية جنس الشمس، يقوم بأفعاله، ويتبعه الناس؛ هو الجسر عبر محيط الوجود الدنيوي.
Verse 180 (चौपाई)
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।। लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।। करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।। सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।। नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।। देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।। कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।। कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।
عندما تلقى غوهة النيشادا هذا الخبر، فرح واستدعى أقاربه الأحباء. أخذ فواكه وجذور، وحمل هداياه بوفرة، وانطلق للقائهم، وقلبه مملوء بفرح لا حدود له. سجد بسجود، ووضع قرابينه أمامهم، ونظر إلى الرب بمحبة عميقة. تغلب عليه العاطفة الطبيعية، فسأل رب راغو عن حاله وأجلسه بقربه. قال: يا رب، برؤية قدميك اللتين كاللوتس في صحة، أحسب نفسي الأكثر حظاً بين الناس. الآلهة والأرض وكل شيء هي مسكنك؛ أنا وضيع مع كل عائلتي. أظهر الرحمة واسكن في المدينة؛ نصبني خادماً لك وأفرح جميع الناس. قل لي الصدق يا صديقي الحكيم، ما الأمر الذي أرسلني والدي لأحمله.
Verse 181 (दोहा/सोरठा)
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
لمدة أربع عشرة سنة ستسكن في الغابة بزي ناسك، مع جذور وفواكه طعاماً. السكن في قرية ليس لائقاً؛ سماع هذا، حُمل غوهة بالحزن.
Verse 182 (चौपाई)
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।। तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।। लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।। पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।। गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।। सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।
برؤية جمال راما ولاكشمانا وسيتا، تكلم رجال ونساء القرية بمحبة. قالوا: أخبرنا يا صديق، أي نوع من الآباء والأمهات هم الذين يرسلون شباباً مثل هؤلاء إلى الغابة؟ قال بعضهم: لقد أحسن الملك؛ ربحنا بركة لعيوننا، هذا كان حظنا. حينها فكر رب النيشادا في قلبه وعرف شجرة شيشام جميلة. أخذ رب راغو وأراه المكان؛ فوجده راما جميلاً بكل طريقة. بعد الانحناء لأهل المدينة، ذهبوا إلى البيت؛ وذهب أفضل راغو لأداء طقوس المساء. جهز غوهة سريراً جميلاً، فراشه بعشب الكوشا وأوراق ناعمة جميلة. عرف الفواكه والجذور النقية حلوة ولطيفة، فملأ أوعية بالماء مراراً.
Verse 183 (दोहा/सोरठा)
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।
أكلت سيتا وسومانت وأخوه جذوراً وفواكه؛ وجعل جوهرة سلالة راغو فراشه، راحاً أطرافه على الأرض.
परंपरागत मान्यता में वनगमन-प्रसंग का पाठ ‘वैराग्य-बुद्धि’ जगाता है, शोक/वियोग में धैर्य देता है, और शरणागति को दृढ़ करता है। विशेषतः गंगा-दर्शन व निषाद-मैत्री वाले अंश का पाठ ‘सत्संग-भाव’ और ‘समता’ बढ़ाकर मन को निर्मल करता है—भवसागर-सेतु (दोहा 87) की भावना के अनुरूप।
कई रामानंदी/मानस-पाठ परंपराओं में शरणागति-भाव दृढ़ करने हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का संकीर्तन-सम्पुट या ‘राम राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियाराममय सब जग जानी’ भी भाव-सम्पुट रूप में लिया जाता है (स्थानीय मर्यादा अनुसार).
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