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यह सोपान ‘वैराग्य-जन्य धर्म-निष्ठा’ का द्वार है: राज्य, परिवार, लोकमर्यादा और निजी प्रेम—इन सबके बीच राम का त्याग ‘धर्म की सर्वोच्चता’ को साधक के अंतःकरण में प्रतिष्ठित करता है। अयोध्या-काण्ड में भक्ति भावुकता नहीं, ‘मर्यादा-आधारित समर्पण’ बनती है; यहाँ साधक सीखता है कि ईश्वर-प्रसाद (आज्ञा/अनुशासन) ही मुक्ति-पथ का वास्तविक आलंबन है।
في هذه الحلقة المقسمة (الدوهة 300, 309)، ضمن كارونا في أيوديا كاندا، يطلع فجر البهكتي الهادئ. تواضع بهارات، وإحساسه بالخطأ، ولغته في واجب السيد والخادم يطهران الداسيا؛ بينما رد راما، من خلال السياسة واللياقة العامة والغورو ومجلس الشيوخ، ورعاية الرعية، والدارما الموقفية، يؤسس المريادا كمبدأ للدارما. لا يترك تولسي الرأفة العاطفية مجرد بكاء؛ بل يحولها إلى استسلام مدعوم بالتمييز. وبإظهاره إندرا (ماغافا) يحاول الخداع عبر مايا الإلهية، يعلم أيضاً أنه داخل النية الحسنة الظاهرة قد تختبئ المصلحة الذاتية والاحتيال؛ لذلك تتخلى البهكتي الحقيقية عن "الثمار الأربعة للمكر الأناني" وتثبت في طاعة الأمر الإلهي. وبهذه الطريقة، ضمن تسلسل السلم في أيوديا كاندا، يرتقي السالك من "أخلاق التخلي" إلى "نضج البهكتي".
Verse 612 (दोहा/सोरठा)
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।
حينئذ قال أتري لبهارات قرب الجبل والبئر الجميل: احفظ ماء هذا الموقع المقدس هنا، إنه مطهر، كالرحيق، ولا مثيل له.
Verse 613 (चौपाई)
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।। पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।। तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।। भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।। प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।
بهارات، بعد نيل أمر أتري، أعطى أواني الماء للجميع وأرسلها. مع إخوته والحكيم أتري والقديسين، ذهبوا حيث البئر العميق. حفظ الماء المطهر والأرض المقدسة، وتكلم أتري مملوءاً فرحاً ومحبة: يا بني، هذا موقع قديم ومكتمل، أضاعه الزمن ولا يعرفه أحد. حينئذ رأى الخدم مكاناً جميلاً وصنعوا بئراً خاصاً مملوءاً بماء طيب. بمشيئة براهما صار نافعاً للعالم، سهل الوصول صعب المنال، عادل جداً في التصميم. سيسميه الناس بئر بهارات، إنه مطهر جداً، موقع حج بماء صالح للاستخدام المقدس. المخلوقات الذين يغتسلون فيه بمحبة وإخلاص سيصيرون طاهرين في الفعل والقلب والكلام.
Verse 614 (दोहा/सोरठा)
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।
أخبر بفضل البئر، وذهب الجميع حيث كان رب راغو. أظهر أتري لرب راغو القوة المقدسة لموقع الحج.
Verse 615 (चौपाई)
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।। सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।। कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।। महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।। सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।
يروي تاريخ البر بمحبة، مرت الليلة بسعادة وطلع الفجر. يومياً يخدم بهارات الأخوين، راما ولاكشمانا، ونال الحكيم أتري أمرهما. بكل حاشيتهم ومعداتهم المعدة، سار راما إلى الغابة على قدميه. مشت قدماه اللطيفتان بلا نعال، فصارت الأرض ناعمة خجلاً في قلبها. أصبح عشب الكوسا والأشواك والحصى، الحادة والقاسية والصعبة، لطيفة. صنعت الأرض مساراً جميلاً ناعماً، وهبت الرياح حاملة كل الأحزان الثلاثة. رشت الآلهة أزهاراً وبسطت سحباً للظل، أزهرت الأشجار وأثمرت، وصار العشب ناعماً. رؤية الغزلان وسماع تغريد الطيور، خدمت كل المخلوقات راما عارفة أنه عزيز عليها.
Verse 616 (दोहा/सोरठा)
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
يقول راما إن النجاح يأتي بسهولة حتى للعاديين من الناس، لكن هذا ليس أمراً عظيماً، لأن بهارات يحب راما أكثر من حياته نفسها.
Verse 617 (चौपाई)
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।। चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।। कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।। कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।। देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।। फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।
بهذه الطريقة سار بهارات عبر الغابة، وعندما رأى الحكماء نذره وحبه شعروا بالخجل. كانت الأرض ملاذاً للفضيلة، بمناطق متنوعة، وطيور وغزلان وأشجار وأعشاب وجبال وغابات وحدائق. جميلة وعجيبة ومقدسة بشكل خاص، تأمل بهارات وهو يرى كل منظر إلهي. عند سماع هذا، فرح قلبه، وقال الحكيم: السبب والاسم والفضائل وقوة الفضيلة. في مكان ما اغتسل، وفي مكان ما سجد، وفي مكان ما نظر بقلب مليء بالسرور. في مكان ما جلس بعد أن تلقى أمر الحكماء، وذكر سيتا وكلا الأخوين. وعندما رأوا أخلاقه ومحبته وخدمته المخلصة، أعطاه آلهة الغابة بركات بفرح. مضوا في طريقهم، وبعد أن مرت ساعتان ونصف من النهار، جاءوا ونظروا إلى قدمي الرب اللتين تشبهان زهرة اللوتس.
Verse 618 (दोहा/सोरठा)
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।
زار بهارات جميع الأماكن المقدسة في الطريق، ومرت خمسة أيام، وقضى النهار يستمع ويروي المجد المشرق لهاري وشيفا، ثم جاء المساء.
Verse 619 (चौपाई)
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।। भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
عند الفجر اغتسل الجميع في المجمع، وكان بهارات ملك الأرض يحكم ثلاث عشرة مملكة. وعرف في قلبه أن هذا يوم مبارك، فتكلم راما الرحيم بتواضع. ونظر المعلم والملك بهارات والمجمع، فاستحى راما والتفت ونظر إلى الأرض. وأثنى المجمع على أخلاقه وفكروا: لا يوجد سيد متواضع مثل راما. ورأى بهارات الحكيم عزيمة راما، فقام بمحبة وضبط شجاعته الخاصة. وسجد بيديه المضمومتين وقال: يا سيد، احتفظ بكل رغباتي عندك. من أجلي تحملت حزن الجميع، وعانيت بنفسك أحزاناً كثيرة بطرق متعددة. والآن يا سيد، امنحني الإذن، وسأخدم أيودهيا حتى نهاية حياتي.
Verse 620 (दोहा/सोरठा)
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
بأي وسيلة أستطيع أن أنال مرة أخرى رؤية الرحيم بالضعفاء، فليعطني رب كوسالا الرحيم تلك النصيحة، حتى النهاية.
Verse 621 (चौपाई)
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।। राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।। स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।। प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।। अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।। आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।। यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।
كان المواطنون والأقارب والرعية ورب الشعب جميعهم متحدين بمحبة نقية ورقيقة. خيركم هو الخير الأعلى، والفراق عنكم حرق حزين، وبدون الرب لا نيل للمقام الأسمى. السيد الحكيم يعلم كل رغبات قلبي وشوق نفس خادمه. حامي المستسلمين سيحمي الجميع، وسيحقق نتيجة طيبة لكلا الجانبين. هكذا لدي ثقة وفيرة بكل طريقة، وقد اتخذت قراري وليس لدي قلق قاسٍ. يا سيد، حزني شيء تافه، لقد تصرفنا معاً بعناد وإصرار. أزل هذا الخطأ الكبير يا سيد، وتخلى عن كل تردد وعلّم تابعك.
Verse 622 (दोहा/सोरठा)
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
صديق الضعفاء، عند سماع كلمات أخيه المتواضعة الخالية من الخداع، تكلم راما البارع في الكلام المناسب للبلد والزمان والمناسبة.
Verse 623 (चौपाई)
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।। मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।। पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।। गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।। देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।
يا أبتِ، إن القلق من أقاربك وأقاربي، ومن المعلم والملك والبيت والغابة، يقع على رأسي. المعلم والحكماء ورب ميثيلا على رأسي، فلا تعاني أنا وأنت من الحزن حتى في الحلم. واجبي الأسمى وواجبك هو الخير الأعلى، والمصلحة الشخصية والسمعة الطيبة والبر هي الغاية العظمى. كلا الأخوين سيطيعان أمر الأب، وهذا حسن حسب الفيدا والعالم، وخير للملك. أكرم نصيحة المعلم والأب والأم والسيد، ولا تتبع طريق الحمقى لئلا تقع في حفرة. فكر هكذا وتخلص من كل القلق، وحكم أيودهيا حتى تصل إلى النهاية. البلد والخزينة والأقارب والأسرة هم عبء ثقيل، فالجأ إلى غبار قدمي المعلم. أنت أيها الحكيم والأم والوزير والمستشار، حكم هذه المملكة ورعيتها والعاصمة بخير.
Verse 624 (दोहा/सोरठा)
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
يحتاج المرء فماً يكون رئيساً بين الأفواه، فماً واحداً للأكل والشرب، فهو يغذي ويحافظ على جميع الأطراف مع العقل، كما يقول تولسيداس.
Verse 625 (चौपाई)
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।। प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।। भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।। प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।। बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।
أكرم النيشادا وودعه، وفي قلبه قام حنين حزين عظيم. ورجع الكول والكيراتا والبيل وسكان الغابة، وهم يسلمون مراراً وتكراراً بأيديهم المضمومة. وجلس الرب وسيتا ولاكشمانا في ظل شجرة بانيان، يبكون على فراق أحبتهم. وتكلم بهارات بطبيعته المحبة وكلامه اللطيف، بكلمات الثناء عن أخيه الحبيب وأخيه الأصغر. وبالمحبة والثقة والكلمات والفكر والأفعال، وصف محبة راما كما رواها فم الرب نفسه. وفي ذلك الوقت شحب طير الغابة والغزلان والماء والسمك في تشيتراكوت، المتحرك وغير المتحرك. ورأت الآلهة حالة رب راغو، فأمطرت الزهور وأخبرت عن حاله في كل بيت. وسجدوا للرب ووضعوا ثقتهم فيه، ومضوا بقلوب فرحة، بلا خوف أو شك.
Verse 626 (दोहा/सोरठा)
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।
مع أخيه وسيتا، أشرق الرب ساطعاً في كوخ من الأوراق. وبدا أن الإخلاص والحكمة والزهد تزين جسده نفسه.
Verse 627 (चौपाई)
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।। जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।। सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।। सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।। नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
كان الحكماء والأسياد الكبار والمعلمون وأهل بيت بهارات مضطربين جميعاً بشوقهم لراما. يحسبون في عقولهم قرية فضائل الرب، ساروا جميعاً في طريقهم صامتين. عبروا نهر يامونا ووصلوا إلى الضفة الأخرى؛ مر ذلك اليوم دون أن يتناولوا طعاماً. وبعد عبور النهر الإلهي، أمضوا الليل؛ وسار أصحاب راما جميعاً بخير. عبرت النساء واغتسلن في نهر غوماتي؛ وفي اليوم الرابع وصلوا إلى مدينة أيودهيا. بقي جاناكا في المدينة أربعة أيام، يرتب جميع شؤون المملكة. عهد بالوزراء والمعلمين إلى بهارات، وبعد ترتيب كل الأمور، غادر إلى تيرهوت. قبل رجال المدينة ونساؤها ومعلموهم وتلاميذهم نصيحته؛ وأقاموا في سلام في عاصمة راما.
Verse 628 (दोहा/सोरठा)
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।
جميع الناس، اشتياقاً لرؤية راما، التزموا بالنذور والصيام. تخلوا عن الزينة والملذات والسرور، وعاشوا فقط في أمل أيودهيا.
Verse 629 (चौपाई)
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।। पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।। भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।। ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।। परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।। सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।। आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।। समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।
أرشد الوزراء والخدم بهارات، يعلمه كل منهم واجباته ومهامه الخاصة. ثم قدم النصح لإخوته الأصغر وعهد بجميع الخدمة إلى أمهاته. إنحنى البراهمة بأيدي مضمومة أمام بهارات، وقدموا التحيات وتكلموا بضراعات متواضعة. سواء كان الأمر كبيراً أو صغيراً، جيداً أو سيئاً، سنعطي أمرنا ولن نشعر بأي تردد. دعا أقاربه ومواطنيه وشعبه، وبعد طمأنتهم، أسكنهم في سرور. ذهب مع إخوته مرة أخرى إلى دار المعلم؛ وMaking obeisance بأيدي مضمومة، تكلم. إذا كان ذلك يرضيكم، سأبقى هنا. أجاب الحكيم وجسده يرتجف بالمحبة. سأشرح وأتكلم وأفعل كل ما ترغبون؛ سيكون ذلك جوهر البر في العالم.
Verse 630 (दोहा/सोरठा)
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।
بعد سماع التعليمات وتلقي بركة عظيمة، حدد المنجم يوماً مباركاً وقال: وُضعت صندل الرب على العرش بلا قيد.
Verse 631 (चौपाई)
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।। जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।। असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।। भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।। तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।
حنى راما رأسه عند قدمي أمه ومعلمه، وحصل على الإذن بالمغادرة إلى الغابة. صنع كوخاً من الأوراق في نانديغراما، وأقام بهارات الثابت مسكنه، راسخاً في البر. بضفائر على رأسه ومرتدياً زي الحكيم، فرش عشب كوشا على الأرض وفرش فراشه. في الطعام والملبس والمسكن والنذور والطقوس، مارس دهرما المتقشف للحكماء بإخلاص. الزينة والملابس الفاخرة والملذات والسرور الوفير، تخلى عنها تماماً في الفكر والقول والفعل. تألق مجد أيودهيا كمجد الآلهة؛ وعند سماع ثروة داشاراثا، خجل حتى كوبيرا. في تلك المدينة سكن بهارات، خالياً من التعلق، مثل نحلة في حديقة من زهور تشامباكا. تخلى عن ملذات لاكشمي، متفانياً في راما، مثل رجل محظوظ يرفض هدايا امرأة وضيعة.
Verse 632 (दोहा/सोरठा)
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
بهارات هو وعاء محبة راما؛ لا أحد أعظم منه في مثل هذا السلوك. يُمدح الشاتاكا والبجع؛ لكن هذا هو المجد الحقيقي للتمييز.
परंपरानुसार इस प्रसंग का पाठ ‘सेवक-धर्म’ (आज्ञापालन), ‘प्रजा/परिवार में शान्ति’ और ‘मन के उचाट-द्विविधा’ के शमन का फल देता है; विशेषतः भरत-विनय का श्रवण/कीर्तन दास्य-भक्ति को निर्मल कर ‘अहं-त्याग’ की सिद्धि में सहायक माना जाता है।
सामान्य वैष्णव-परंपरा में दास्य-विनय प्रसंगों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-संपुट) या ‘राम रामेति रामेति’ (नाम-स्मरण) जोड़ा जाता है; कुछ रामानंदी पाठ-परंपराओं में ‘सीता-राम’ नाम-संपुट भी प्रचलित है।
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