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त्याग-धर्म का सोपान: राजधर्म, कुलधर्म और निजी प्रेम (स्नेह) के टकराव में ‘राम-आज्ञा’ को परम मानकर अहं-क्षय, शरणागति और निष्काम सेवा की सिद्धि। अयोध्या काण्ड साधक को ‘घर’ (सामाजिक भूमिका) के भीतर ही वैराग्य और समर्पण का अभ्यास कराता है—यही इस सोपान का द्वार है।
في هذا المقطع المُقسَّم (الدوهة 260, 269)، يظهر المزاج المركزي لأيوديا كاندا يرتفع من كارونا-شرينغارا (الحب الرقيق) ويستقر في شانتا-باكتي (الإخلاص السلمي). تأسف بهاراتا على نفسه, على خطأ أمه وقسوة القدر الظاهرة, مع استسلامه لكلمة الغورو، مما يعطي رابطة "الخادم-السيد" شكل تحقيق دارمي. سكون الجمعية كالصقيع، وتحول العيون إلى "مياه المودة", هذه الزخارف تشير إلى تغيير داخلي: الحزن إلى تطهير، والاتهام إلى تدقيق النفس، وأخيراً العزم على اعتبار "راجاياس راما" (إرادة راما/أمره) عليا. حلقة جمعية الآلهة تضع هذا الدراما البشرية ضمن تصميم كوني للدارما: راما "بهاكتا-باسا"، مغلوب من قبل devotees له، وإخلاص بهاراتا هو جذر خير العالم. هكذا، في الصعود التدريجي، يصبح أيوديا كاندا "القمة الأخلاقية للزهد"، حيث يتم التحقق من فايراغيا من داخل غريهاستا-دارما نفسها.
Verse 531 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।। पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा। मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।। सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।। मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।
سماع كلمات الحكيم، امتلأ قلب راما بالحب، سيده ومعلم كان موافقاً له تماماً. رؤية أن اللوم كله يقع على رأسه، لم يستطع قول شيء، لكنه فكر في داخله. جسده ارتجف بالفرح، وقف الجميع في المجلس بلا حراك، عيونهم الزهرية امتلأت بدموع الحب. سأتحدث يا سيد الحكماء، لماذا أقول أكثر من هذا؟ أعرف طبيعة سيدي: لا يحمل غضباً حتى تجاه المذنبين. رحمته ومحبته لي تفوق القياس، لم أره أبداً يلعب دور العدو. حتى في طفولتي لم أتجنب صحبته، لم يكسر قلبي أبداً. أرى دائماً في قلبي طريقة نعمة سيدي: حتى لو خسرت اللعبة، يجعلني أفوز.
Verse 532 (दोहा/सोरठा)
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
من خلال الحب والخجل لا أستطيع نطق كلمة أمامه، عيوني لا تشبع من رؤيته حتى الآن، بل تظل عطشى للحب.
Verse 533 (चौपाई)
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।। मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।। सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।। बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।। हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।
حتى براهما لم يستطع تحمل دلالي، أمي مثل قارب واطئ على البحر. هذا أيضاً أقوله: اليوم لا مجد لي، أُعتبر نفساً فاضلة وطاهرة. أمي بطيئة الفهم وأنا فاضل وطاهر، لكن في قلبي تسكن ملايين الأفكار الشريرة. هل يحمل الكودافا محصولاً جيداً؟ هل ينتج المحيط اللآلئ؟ هل ينتج الصدفة السواد؟ حتى في الحلم لن آخذ خطأ غيري، أنا تعيس الحظ، أغوص في البحر. دون فهم خطاياي الخاصة، أحرقت اسم الأم. بالنظر إلى قلبي، خسرت من كل جانب، بطريقة واحدة فقط خيري حقيقي. سيدي ومعلمي، سيتا وراما، يبدوان لي أنهما يجلبان نهاية جميلة.
Verse 534 (दोहा/सोरठा)
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।
أمام جمع الحكماء، سيدي ومعلمي، أتحدث بالحق بإخلاص نقي، الحكماء ورب راغو يعرفون هل هذا عرض محبة أم كذب.
Verse 535 (चौपाई)
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।। देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।। महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।। बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।। अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।
حافظ الملك على عهده بالمحبة حتى في الموت، مشورة أمه الشريرة كان العالم كله شاهداً عليها. رؤية أمه في مثل هذا الضيق، لم يستطع تحمل النظر إليها، رجال ونساء المدينة استهلكهم حرق لا يُطاق. الأرض نفسها أصبحت جذر كل الكوارث، سماع هذا وفهمه، تحملت كل ألم. سماع رحيله إلى الغابة، رب راغو اتخذ زي حكيم، مع لاكشمانا وسيتا كرفيقين. دون شرب، أعطى ماء للعطشى، شيفا بقي شاهداً في هذا الأمر نفسه. نظرت مرة أخرى على عاطفة النيشادا، قلبي الصلب كالصاعقة لم يلن. الآن كل هذا جاء أمام عيني، بينما كنت حياً، كل الكائنات الحية، حتى غير العاقلة، كانت مساعدي. الذين رآني على الطريق وألقوا نظرات شريرة وسامة من خبث مظلم، هؤلاء تخلوا عني.
Verse 536 (दोहा/सोरठा)
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।
لذلك صار فخر راغو، لاكشمانا وسيتا، سبباً للأذى لي. وبعد أن تخليت عن ابني، أحتمل حزناً لا يُطاق. من ذا الذي يستطيع أن يعينني؟
Verse 537 (चौपाई)
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।। सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।। कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।। तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।। तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
عند سماع كلمات بهارات الممتازة، المملوءة بالضيق والمحبة والتواضع والحياء، غمر الحزن المجمع كله، كأن الصقيع قد سقط على بستان اللوتس. حكى الحكيم المتبصر قصصاً قديمة كثيرة بطرق شتى ليعظ بهارات. وتكلم فخر راغو بكلمات لائقة، كالقمر لبستان اللوتس من سلالة الشمس: "أبتاه، اذهب حيث يقودك قلبك، واعلم أن الروح خاضعة لمشيئة الرب. في جميع الأزمنة الثلاثة والعوالم الثلاثة، عقلي ثابت عليك؛ أبتاه، شهرك حميدة. أنت تضمر المكر في قلبك ضدي، وبهذا تهلك الدنيا والآخرة. إنهم يلقون باللوم على أمهم الحمقاء، الذين لا يخدمون المعلم والأخيار والمجمع."
Verse 538 (दोहा/सोरठा)
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।
تمحى جميع الخطايا والأوهام، وكل عبء الشؤم. وذكر اسمك يجلب الشهرة في هذه الدنيا والسعادة في الآخرة.
Verse 539 (चौपाई)
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।। मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।। तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।। राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।। तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।
أتكلم بالحق، وشيفا شاهدي: بهارات، لقد حفظت الأرض شرفك. أبتاه، لا تقع في الخطأ؛ فالعداوة والمحبة لا تُطردان بالكلمات القاسية. الحكماء والطيور والغزلان تقترب، وعندما يرون الصياد يفرون خائفين. الحيوانات والطيور تعرف ما ينفع وما يضر؛ وجسم الإنسان كنز من الفضائل والمعرفة. أبتاه، أنا أعرفك جيداً؛ فلماذا أخلق مثل هذا الارتباك؟ لقد حفظ الملك عهده بالحق معي؛ لقد تخلى عن جسده، ملتزماً بعهده بالمحبة. كلماته تزيل الحزن من قلبي؛ لذلك أنا أستحيي أكثر أمامك. زيادة على ذلك، أعطاني معلمي أمراً؛ مهما تقله، سأفعله حتماً."
Verse 540 (दोहा/सोरठा)
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।
أفرح قلبي، اترك كل تردد، وقل لي ماذا أفعل اليوم. وعند سماع كلمات رب راغو الملتزم بالحق، امتلأ المجمع كله بالسرور.
Verse 541 (चौपाई)
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।। बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।। सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।। आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।। हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।
الآلهة مع ملكهم، رغم اجتماعهم، كانوا غارقين في التفكير، يرغبون في منع ما بدا عملاً غير لائق. لم يستطيعوا ابتكار أي حيلة، وفي قلوبهم لجأوا جميعاً إلى راما. ثم، بعد تفكير أعمق، قالوا لبعضهم البعض إن رب راغو مخلص لمخلصيه، وهو دائماً تحت سلطان إخلاصهم. واستدعوا إلى ذاكرتهم قصة أمباريشا ودورفاسا، فأصيب الآلهة وسيدهم بإحباط تام. احتمل الآلهة حزناً عظيماً طويلاً، حتى تجلى الرب في صورة أسد لأجل براهلادا. وهمسوا في آذان بعضهم البعض، هزين رؤوسهم، أن مهمة الآلهة الآن في يد بهارات. لم يروا وسيلة أخرى، يا آلهة؛ لأن راما يقبل خدمة الخادم الصادق. لذلك، في قلوبكم، اذكروا بهارات بإيمان؛ فبطبيعته وفضيلته يبقى دائماً تحت سلطان راما.
Verse 542 (दोहा/सोरठा)
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
عند سماع مشورة الآلهة، قال معلم الآلهة: "عظيم حقاً هو حظك الجيد. أصل جميع البركات في العالم هو الحب لقدمي بهارات."
Verse 543 (चौपाई)
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।। देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।। सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।। निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।। करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।
رب سيتا هو خادم خدمه؛ وهو مثل البقرة الممنية للأمنيات، جميل كالظبية الرشيقة. بما أن الإخلاص لبهارات قد دخل قلوبكم، اتركوا همومكم؛ لقد تكلم براهما بالحق. انظر، يا ملك الآلهة، إلى قوة بهارات؛ فبطبيعته يمسك رب راغو في قبضته. اطمئنوا، يا آلهة، ولا تخافوا؛ واعلموا أن راما مكرس تماماً لبهارات. اسمع، يا معلم الآلهة، المشورة التي يوافق عليها الآلهة؛ الرب عارف كل القلوب، لذا اقترب منه بخشوع. لقد وضع عبء رأسه على قلب بهارات، ويقدره بطرق لا تحصى. بعد التفكير، أعطاه قلبه؛ وهو مرضي تماماً لراما. لقد تخلى عن طرقه وحفظ وعده؛ ولم يظهر حباً قليلاً، بل محبة لا حدود لها.
Verse 544 (दोहा/सोरठा)
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।
أظهر رب سيتا نعمة لا حدود لها بكل طريقة. وضم بهارات يديه كاللوتس وانحنى وتكلم.
Verse 545 (चौपाई)
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।। अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।। पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।। जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।
ماذا أقول، ولمن أتحدث الآن، يا سيدي؟ أنت محيط من الرحمة، العارف بكل القلوب. لقد سر المعلم، والرب موافق؛ لقد زال الوسخ، والحزن الذي كان يؤلم عقلي قد اختفى. لم أخف من الغابة، ولم أقلق إطلاقاً؛ لم أجد عيباً في الشمس، ولم أخطئ في حق الآلهة. سوء حظي، مكر أمي، المصير القاسي الذي قدره براهما، قسوة الزمن، هذه كانت السبب. لقد اجتمعوا جميعاً وجعلوني أتجول على قدمي؛ يا حامي المستسلمين، لقد حفظت عهدك. هذا ليس عرفاً جديداً، ولا هو عرفك؛ هو مجهول في العالم وفي الفيدا. العالم ناكر للجميل؛ الصالح هو الرب وحده. قل لي، ما الخير الذي يأتي من فعل الخير لأي أحد؟ الرب مثل شجرة تعطي الظل؛ طبيعته واحدة تجاه الجميع؛ لا يولي وجهه نحو أحد ولا يصرفه عن أحد.
Verse 546 (दोहा/सोरठा)
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच। मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
اذهب وتعرّف على الشجرة القريبة، وتحت ظلها ضع كل همومك لتستريح. فالملك والفقير على حد سواء ينالون ما تشتهيه قلوبهم، والفقير أيضاً يُحظى بالاحترام الحسن.
Verse 547 (चौपाई)
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।। अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।। जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।। सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।। स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।। यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।। देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।। तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।
لما رأى الغورو والسيد هذا كله امتلآ حباً، فتلاشت الأحزان ولم يبق في القلب شك. والآن يا رحيم، افعل ما فيه خير للخادم، يا رب، لا تدع الحزن يدخل قلبك. إن خجل الخادم من سيده يدل على ضعف فهمه، لأنه يطلب مصلحته الخاصة. خدمة السيد للخادم هي جوهر العبودية، فهو يمنح كل سعادة متخلياً عن كل طمع. يا مولاي، المصلحة الذاتية تحرك الجميع، لكنك فعلت مشيئتك بطرق لا تُحصى من الجمال. هذه المصلحة الذاتية هي جوهر الخير الأعلى، وهي ثمر كل الفضائل وزينة الطريق المستقيم. يا رب، استمع لهذه الصلاة الواحدة مني، وسأفعل ما يليق بعد ذلك. ليجتمع المجمع ويتزين الجميع، وليتحقق مقصود الرب إذا سرّ قلبه.
Verse 548 (दोहा/सोरठा)
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ। नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।
أرسلني إلى الغابة مع أخي، واجعلنا جميعاً في أمان. وإلا فأرجع الأخوين يا مولاي، وأنا سأمضي معك.
Verse 549 (चौपाई)
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।। देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।। कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।। उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।। अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।। प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।
وإلا فليذهب الإخوة الثلاثة إلى الغابة، ثم ليعد رب راغو مع سيتا. وبأي طريقة يسرّ قلب الرب، يا محيط الرحمة، فليكن ذلك. لقد أعطتني الآلهة كل شيء بلا مقابل، وليس لي فكر في السياسة أو البر. أتكلم بهذه الكلمات لمصلحتي الخاصة، فقلب المكروب لا يبقى متيقظاً لشيء آخر. الخادم الذي يسمع مشيئة سيده ويجيب، هو الخادم الذي يعرف الحياء ويتصرف بتواضع. هكذا أنا، محيط من العيوب بلا قاع، أُمدح بمحبة السيد كرجل صالح. والآن يا رحيم، هذا هو المشورة التي تروق لي، لا تدع الخجل يدخل قلب السيد. أقسم بقدمي الرب، بصدق الشعور: هناك وسيلة واحدة لخير العالم.
Verse 550 (दोहा/सोरठा)
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
الرب كريم، فبعد أن يترك كل تردد، أي أمر يعطيه سأحمله على رأسي وأنفذه كله، وستتلاشى كل متاعبي.
परंपरागत मान्यता में भरत-विनय (दोहा 260–269) का पाठ ‘सेवक-धर्म’ और ‘गुरु-वचन-पालन’ की बुद्धि देता है, मातृ/कुल-कलह से उत्पन्न दोषारोप-भाव को शान्त करता है, तथा ‘राम-आज्ञा’ के प्रति श्रद्धा बढ़ाकर गृहस्थ-जीवन में भी वैराग्य और शरणागति की सिद्धि कराता है।
सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-संपुट जोड़ा जाता है; विशेषतः भरत-प्रसंग में ‘भरत चरन अनुरागु’ की भावना के साथ राम-नाम जप (राम/सीता-नाम) को संपुट रूप में रखा जाता है।
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