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यह सोपान ‘धर्म-संकट में भक्ति की परीक्षा’ का है। राजधर्म, पुत्रधर्म, मातृभाव, और लोकलज्जा—इन सबके बीच राम-आज्ञा (ईश-आज्ञा) को सर्वोच्च मानने की साधना यहाँ घटित होती है। अयोध्या का वैभव-त्याग भीतर के ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन बनता है; भरत का विलाप और फिर धीरज—वैराग्य-युक्त प्रेम (विवेक सहित करुणा) की सीढ़ी है।
في هذا المقطع يطغى راس الكارونا، لكنه ليس مجرد حزن، بل هو رحمة منضبطة بالوعي بالدارما. صرخة بهاراتا "تات! تات!" تكشف قلب ابن عاجز؛ وخطاب كيكايي "كأنه يحك الجرح كمن يصب السم" يعطي القسوة النفسية استعارة حادة. ثم تُحوّل كوساليا الأمومة الرحمة إلى سلام: نصيحتها "تمسك بالصبر" تحول الكارونا نحو شانتا. هنا يحول تولسيداس "ليلا" (نفي راما إلى الغابة) إلى "سادهانا" (الطاعة، الفايراغيا، دارما العالم). خطاب بهاراتا الشبيه بالنذر (حساب الخطايا) يصبح اختبارا للتطهير الذاتي: يُلزم عقله علنا بتعهد دارمي. هكذا يصبح هذا القسم، في ترتيب السلم، درجة من "فيراهي إلى فيفيكا" ومن "الحزن إلى شاراناغاتي".
Verse 327 (चौपाई)
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।। कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।। सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।। तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।। चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।। बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।। सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।। आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।
قالت: يا أبي، لقد أصلحت كل الأمور، وكانت مانثارا عوني في هذا، فكرت. لكن القدر أفسد الخطاب قليلاً، فقد وضع الملك قدمه في مدينة ملك الآلهة. وعند سماع هذا، تغلب الحزن على بهاراتا، وكأن أسداً قد زأر ففزع. وصاح: يا أبي، يا أبي، آه يا أبي! وسقط على الأرض في شدة الأسى. لم تدعني أراك عندما رحلت، يا أبي، لم توكلني إلى راما. ثم جمع نفسه وقام مجدداً وقال: يا أماه، أخبريني سبب وفاة أبي. وعند سماع كلمات ابنها، تكلمت كيكيا، وكأنها تطعمه سماً بعد ذلك. من البداية، كل هذا كان من صنع يدي، كنت ماكرة قاسية، وفرح قلبي بذلك.
Verse 328 (दोहा/सोरठा)
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
نسي بهاراتا وفاة أبيه عندما سمع أن راما قد ذهب إلى الغابة. وعلم أنه هو نفسه السبب، فبقي صامتاً متعب القلب.
Verse 329 (चौपाई)
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।। तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।। जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।। अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।। सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।। धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।। जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।। पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।
في شدة الحزن، نظرت إلى ابنها وحاولت مواساته، وكأنها تضع ملحاً على حرق. قالت: يا أبي، الملك لا يستحق حزنك، فقد جنى ثمر أفعاله الصالحة ونال المجد. نال تحقيق الميلاد وهو حي، وفي النهاية رحل إلى مسكن ملك الخالدين. وعلى هذا، اطرح حزنك جانباً، وعد إلى العاصمة وحكم مع جمعك. وعند سماع هذا، أصيب الأمير بالرعب، وكأن جمرة حية قد لامسته. كبح نفسه وأخذ نفساً عميقاً، فقد دمر الخاطئ العائلة تماماً. قالت: لو كان فيك هذا الشر، لماذا لم تقتلني عندما ولدت؟ لقد قطعت الشجرة ثم سقيت الجذع، وسحبت الماء يومياً للسمك الذي قتلته.
Verse 330 (दोहा/सोरठा)
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।
داشاراثا من سلالة هامسا، وجاناكا من سلالة هامسا، وراما ولاكشمانا أخوان. لقد صرتِ أماً لي، ومع براهما لا تردد.
Verse 331 (चौपाई)
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।। बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।। भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।। सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।। अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।। भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।। जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।
من اللحظة التي عقدتِ فيها قلبك على المشورة الشريرة، تحطم قلبي إلى قطع، لكنه لم يفارقك. عندما طلبت النعمة، لم يشعر عقلي بالحزن، لم أبتلع سماً، ولم يخترق الشوك فمي. كيف نلتِ هذه الثقة من الملك؟ في ساعة الموت، سرق براهما حكمتك. حتى براهما لا يعرف طرق قلب المرأة، فهي منجم كل خداع وخطيئة وعيوب. الملك بسيط فاضل متفانٍ في البر، كيف له أن يعرف طبيعة المرأة؟ هل من مخلوق في هذا العالم ليس فيه رب الراغوس عزيزاً كالحياة؟ لقد صار معادياً جداً لراما، وأنتِ كذلك، من أنتِ؟ قولي لي الحق. من يضحك، ليضحك ويدهن وجهه بالحبر، ليغطي عينيه ويقوم ويذهب في طريقه.
Verse 332 (दोहा/सोरठा)
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।
لقد كشف لي براهما واحداً معادياً لراما في قلبه. أخبريني حقاً، هل من خاطئ مثلي؟
Verse 333 (चौपाई)
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।। तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।। लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।। हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।। कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।। आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।। सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।। भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।
عند سماع هذا، غضب شاتروغنا من مكر أمه، واحترق جسده ولم يستطع كبح غضبه. وفي تلك اللحظة جاء كوبارا مزيناً بملابس وحلي متنوعة. وعند رؤيته، امتلأ الأخ الأصغر لاكشمانا غضباً، كان كالنار المغذاة بالسمن. بركلة سريعة ضرب كوبارا، فسقط كوبارا على وجهه في الأرض صارخاً. انشطر جمجمة كوبارا وانكسرت، وسحقت أسنانه وانتشر الدم على وجهه. صاح: آه! لماذا لم تقتلوني؟ فعلت خيراً لكنني نلت شراً. وعند سماع هذا ورؤية خبثه من رأسه إلى قدميه، بدأ لاكشمانا يسحبه ممسكاً به مراراً. بهاراتا كنز الرحمة أمر بإطلاقه، وذهب الأخوان إلى كوساليا.
Verse 334 (दोहा/सोरठा)
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।
في ملابس متسخة شاحب مضطرب بجسد نحيل وعبء ثقيل من الحزن، بدا ككرمة ذهبية في الغابة ضربها الصقيع.
Verse 335 (चौपाई)
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।। देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।। मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।। कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।। कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।। को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।। पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।। धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।
عند رؤية بهاراتا، قامت أمه وركضت إليه، وسقطت على الأرض مغشياً عليها فاقدة الوعي. وعند رؤيتها، أصيب بهاراتا بحزن عميق، وسقط عند قدميها ناسياً حالته. قال: يا أماه، أين أريتِ نفسك؟ أين سيتا وراما ولاكشمانا الأخوان؟ لماذا ولدت كيكيا في هذا العالم؟ إذا كان لا بد أن تولد، لماذا لم تولد عاقراً؟ التي جلبت العار على ميلادي هي وعاء السمعة السيئة، عدوة أحبائها. من في العوالم الثلاثة أشأم مني، التي وقعت أمه في مثل هذه الحال؟ أبي ذهب إلى المدينة السماوية، ورب الراغوس إلى الغابة، وأنا وحدي سبب كل هذا الخراب. ملعون أنا الذي صرت ناراً في الغابة، حرقاً لا يطاق، عاراً لعائلتي، خاطئاً.
Verse 336 (दोहा/सोरठा)
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
سمعت الأم كلمات بهارات الناعمة مراراً وتكراراً، فقامت وجمعت نفسها؛ وحملها وضمها إلى صدره، ومسح الدموع من عينيها.
Verse 337 (चौपाई)
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।। भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।। देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।। माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।। अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।। जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।। काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।। जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।
بعاطفة بسيطة ضم أمه إلى قلبه؛ وكأن راما نفسه قد عاد بمحبة. ثم قابل لاكشمانا، أخاه الأصغر؛ لم يسع الحزن والحب قلبه. ورأى الجميع طبيعته فقالوا: "لماذا لا تكون أم راما هكذا؟" وأجلس بهارات أمهات في حضنه؛ ومسح دموعهن، وتكلم بكلمات ناعمة. "حتى الآن يا بني، كن قوياً وصبوراً؛ واعلم أن هذا تحول قاسٍ، فاطرح حزنك جانباً. لا تشعر بالخزي أو العار في قلبك؛ اعلم أن هذا عمل الزمن والقدر، حدث لا يمكن إصلاحه. لا تلوم أحداً على هذا يا أمي؛ كل هذا حل بي بإرادة الخالق المعاكسة. من يعلم ما في ذهنه، الذي أبقاني حياً خلال كل هذا المعاناة؟"
Verse 338 (दोहा/सोरठा)
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
بأمر أبيه، تخلى رب راغو عن زينته وملابسه؛ ولم يشعر بالفرح أو الحزن في قلبه، بل لبس فقط ملابس من لحاء الشجر.
Verse 339 (चौपाई)
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।। चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।। सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।। तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।। रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।। यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।। मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।। जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।
كان وجهه هادئاً، وقلبه خالياً من الشغف أو الغضب؛ وسعى لإرضاء الجميع بكل الطرق. انطلق إلى الغابة، وتبعته سيتا؛ ولم تفارق قدمي راما. سمع لاكشمانا هذا فقام وذهب معهم؛ ولم يتخلف رغم محاولات رب راغو ثنيه. حينها انحنى رب راغو برأسه لهم جميعاً وانطلق، مع سيتا وأخيه الأصغر. راما ولاكشمانا وسيتا غادروا إلى الغابة؛ لم تذهب حياتي معهم، ولم تتبع روحي. كل هذا حدث أمام عيني، لكن هذا الجسد التعيس لم يهلك. لم يعد لدي خزي ولا حب لنفسي؛ أنا أم لابن مثل راما. سواء عشت أو مت، أعرف أن الملك صالح؛ قلبي صلب كالصاعقة."
Verse 340 (दोहा/सोरठा)
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।
سماع كلمات كاوساليا، امتلأ بهارات ونساء القصر بالألم وبكوا؛ وامتلأ البيت الملكي بالندب، وكأن الحزن نفسه قد اتخذ منه مسكناً.
Verse 341 (चौपाई)
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।। भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।। भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।। जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।। जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।। ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।
بكى الأخوان، بهارات وشاتروغنا، في أسى؛ وضمت كاوساليا إليهما وضمتهما إلى قلبها. بطرق كثيرة حاول بهارات إقناعها، متكلماً بكلمات مليئة بالحكمة. كما وعظت أمهات بهارات بالكامل، يروين قصصاً جميلة من البورانات والفيدا. بخطاب بلا مكر، نقي وبسيط، تكلم بهارات ضاماً كفيه معاً. تلك الخطايا التي يقتل بها الإنسان أمه أو أباه أو ابنه، أو يحرق القرى وحظائر الأبقار وبيوت العلماء. تلك الخطايا التي يقتل بها الإنسان امرأة أو طفلاً، أو يعطي سماً لصديق أو ملك. تلك الخطايا والخطايا الأصغر التي يعلنها الحكماء أنها روابط الولادة، في الفعل والكلمة والفكر. اللهم أيها الخالق، أتحمل أنا تلك الخطايا بالذات إن كانت هذه نصيحة أمي.
Verse 342 (दोहा/सोरठा)
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
أولئك الذين يتركون أقدام هاري وشيفا ويعبدون الجنود المرعبة من الأرواح؛ ليمنحني الخالق مصيرهم، يا أمي، إن كانت هذه إرادتك.
Verse 343 (चौपाई)
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।
يبيعون الفيدا ويأخذون ثمن البر؛ وهم نمامون يتحدثون عن خطايا الآخرين. مخادعون، ملتوون، محبون للنزاع، غاضبون، مذمون للفيدا، أعداء العالم. طماعون، شهوانيون، ذوو سلوك سيء، يطمعون في ثروة الآخرين ونسائهم. ليكن لي مصيرهم الرهيب إن وافقت أمي على هذا المسار. أولئك الذين لا يحبون صحبة الصالحين، التعساء الذين يبتعدون عن طريق الخير الأعلى. أولئك الذين، بعد حصولهم على جسد بشري، لا يعبدون هاري، الذين لا يزينهم مجد هاري وشيفا. متخليين عن طريق الفيدا، يتبعون الطريق الأيسر؛ يتخذون مظهر الزهاد ويخدعون العالم. ليمنحني شيفا مصير أولئك، إن علمت أن هذه نية أمي.
Verse 344 (दोहा/सोरठा)
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
سماع كلمات أمه وبهارات، قال راما، الصادق البسيط بطبيعته: "يا أخي العزيز، لتبق كلماتك وذهنك وقلبك فيّ دائماً."
Verse 345 (चौपाई)
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।। भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।। अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।। बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।
راما أحب إليّ من حياتي نفسها؛ وأنت يا بني، أحب إلى رب راغو من الحياة نفسها. لو مضغت السم أو صببت الجليد والنار، لكنت من سكان الماء، غير مبال بالماء. حتى لو نلت المعرفة، لن يزول وهمي؛ لا أريد أن أكون ضد راما. هذه نصيحتك التي يمدحها العالم، لا تجلب السعادة ولا الطريق الحسن حتى في الحلم. قائلة هذا، ضمت الأم كايكي بهارات إلى قلبها؛ وسال اللبن من ثدييها، وامتلأت عيناها بالدموع. نادبة كثيراً بهذه الطريقة، قضت الليل كله جالسة هناك. ثم جاء فاماديفا وفاسيشتا، ودُعي الوزراء والشيوخ جميعاً. وعظ الحكيم بهارات بطرق كثيرة، متكلماً بكلمات الخير الأعلى، المختارة جيداً والميمونة.
Verse 346 (दोहा/सोरठा)
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
يا بني، تشجع في قلبك، وافعل ما تقتضيه المناسبة الآن. وعندما سمع بهارات كلمات المعلم، قام وأمر بإعداد كل الاستعدادات.
परंपरा में भरत-चरित के पाठ से ‘राम-प्रेम में निष्कपटता’, माता-पिता के प्रति धर्मबुद्धि, और संकट में धैर्य-लाभ माना गया है; विशेषतः ‘राम-प्रतिकूलता’ का त्याग और शरणागति-भाव दृढ़ होता है।
सामान्य मानस-परंपरा में शोक-निवारण/धैर्य हेतु ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ नाम-स्मरण समपुट रूप में जोड़ा जाता है; कुछ पाठ-परंपराओं में ‘सियावर रामचंद्र की जय’ का आवर्तन भी किया जाता है।
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