Mahabharata Adhyaya 33
Virata ParvaAdhyaya 3368 Versesविराट-पक्ष के पक्ष में निर्णायक झुकाव; सुशर्मा के बंदी होने से त्रिगर्तों का मनोबल टूटता है।

Adhyaya 33

Virāṭa-parva Adhyāya 33 — Kuru Cattle-Raid and Matsya Mobilization (भूमिंजय-प्रेरणा)

Upa-parva: Gograharaṇa (Cattle-Raid) Episode

Vaiśaṃpāyana reports that after the Trigarta-related movement, Duryodhana advances toward Virāṭa’s Matsya realm accompanied by senior Kuru commanders (Bhīṣma, Droṇa, Karṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, Śakuni, Duḥśāsana, and others). The Kuru force reaches the pastoral settlements (ghoṣa), drives away herds, and seizes a large stock of cattle—specified as sixty thousand—protected by a substantial chariot screen. A fearful uproar rises among cowherds as violence breaks out in the frightening engagement. The superintendent of cattle, alarmed, rides swiftly to the city and enters the royal residence to report the crisis. He informs Bhūmiṃjaya, a son of Matsya, detailing the raid and urging immediate action to recover the kingdom’s wealth and prestige. The messenger amplifies the appeal through praise of Bhūmiṃjaya’s martial skill, urging him to deploy with white horses, a golden lion banner, and a storm of arrows, return victorious, and restore public confidence. The chapter ends with Bhūmiṃjaya responding in the women’s quarters with self-assured speech, indicating the court’s mobilization posture.

Chapter Arc: रात्रि के घोर अन्धकार को चीरता हुआ चन्द्रमा उदित होता है; प्रकाश लौटते ही रणभूमि फिर जाग उठती है—और त्रिगर्तों का राजा सुशर्मा विराट को पकड़कर ले जाने के दुस्साहस में बढ़ता है। → उजाला होते ही युद्ध का वेग दुगुना हो जाता है; आवेश में योद्धा एक-दूसरे को ठीक से पहचान भी नहीं पाते। भीम का प्रचण्ड प्रताप उभरता है, पर साथियों की चेतावनी आती है कि वह वृक्ष-उखाड़ कर ‘अतिमानुष’ कर्म न करें—युद्ध की मर्यादा और उन्माद के बीच तनाव बढ़ता जाता है। → भीम सुशर्मा को रथहीन कर धराशायी करते हैं, पद-प्रहार और घुटने/मुष्टि के प्रहारों से उसे मोहित-सा कर देते हैं; फिर गला पकड़कर धूल-धूसरित, विवश सुशर्मा को घसीटते हुए ले आते हैं और रणभूमि में युधिष्ठिर के सामने प्रस्तुत करते हैं। → सुशर्मा का अपहरण-प्रयास विफल होता है; विराट-पक्ष का मनोबल उठता है और त्रिगर्तों की धुरी टूटती है। युधिष्ठिर भी उतावले होकर सुशर्मा पर बाण-वर्षा करते हैं—यह संकेत कि बंदी बनाना भी युद्ध-नीति का अंग है, केवल क्रोध का नहीं। → सुशर्मा के पकड़े जाने के बाद भी रण का शोर थमता नहीं—त्रिगर्तों की शेष सेना और विराट-पक्ष की अगली चालें अगले अध्याय की ओर धकेलती हैं।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।) #:73:.8 #::3-..ह (0) हि २ 7 त्रयस्त्रिंशो5 ध्याय: सुशर्माका विराटको पकड़कर ले जाना

Vaiśampāyana said: “O Bhārata, when the world was engulfed in darkness and also covered with dust, the fighters—having drawn up their troops in battle formation—paused for a short while, standing still and ceasing their blows.”

Verse 2

ततो<न्थकारं प्रणुदन्नुदतिष्ठत चन्द्रमा: । कुर्वाणो विमलां रात्रि ननन्‍्दयन्‌ क्षत्रियान्‌ युधि

Then, dispelling the darkness, the moon rose. Making the night clear and spotless, he brought cheer to the kṣatriyas engaged in battle—casting a calm, bright light over the field even amid the violence of war.

Verse 3

ततः प्रकाशमासाद्य पुनर्युद्धमवर्तत । घोररूपं ततस्ते सम नावैक्षन्त परस्परम्‌,अतः उजाला हो जानेसे पुनः घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। उस समय (युद्धके आवेशमें) योद्धा एक दूसरेको देख नहीं रहे थे

ثم لما عاد ضياء النهار ووضوح الرؤية، اندلع القتال العنيف من جديد. وفي لهيب ذلك الصدام المروّع وضجيجه، لم يعد المحاربون يميّزون بعضهم بعضًا بجلاء، إذ غمرتهم جميعًا وطأة الاشتباك على السواء.

Verse 4

ततः सुशर्मा त्रैगर्त: सह भ्रात्रा यवीयसा । अभ्यद्रवन्मत्स्यराजं रथव्रातेन सर्वश:,तदनन्तर त्रिगर्तराज सुशर्माने अपने छोटे भाईके साथ रथियोंका समूह लेकर चारों ओरसे मत्स्यराज विराटपर धावा बोल दिया

قال فايشَمبايانا: ثم إن سوشَرما، ملك التريغارتا، ومعه أخوه الأصغر، اندفعا نحو فيرَاطا ملك الماتسيا، وأحاطاه من كل جانب بجماعة عظيمة من مقاتلي العربات.

Verse 5

ततो रथाभ्यां प्रस्कन्द्य भ्रातरौ क्षत्रियर्षभौ । गदापाणी सुसंरब्धौ समभ्यद्रवतां रथान्‌,फिर वे क्षत्रियशिरोमणि दोनों बन्धु रथोंसे कूद पड़े और हाथमें गदा ले क्रोधमें भरकर शत्रुसेनाके रथोंकी ओर दौड़े

ثم إن الأخوين—وهما ثوران بين الكشاتريا—قفزا من عربتيهما. وبأيديهما الهراوات، وقد اشتعل عزمهما بغضبٍ مُحقّ، اندفعا مباشرة نحو عربات العدو.

Verse 6

(मत्ताविव वृषावेतौ गजाविव मदोद्धतौ । सिंहाविव गजग्राहौ शक्रवृत्राविवोत्थितौ ।।

قال فايشَمبايانا: «كان الاثنان يبدوان كثورين مخمورين بالهياج، وكفيلين من فيلةٍ ملوكيةٍ مستبدّةٍ بالهيام، وكأسدين يقتنصان الفيل نفسه، وكإندرا وفِرترا وقد نهضا للقتال. كانت قوتهما وحماستهما سواء؛ وبأسهما سواء؛ وكلاهما على السواء عارفٌ بعلوم السلاح، خبيرٌ تامّ الخبرة بفنون الحرب.»

Verse 7

बल॑ तु मत्स्यस्य बलेन राजा सर्व त्रिगर्ताधिपति: सुशर्मा | प्रमथ्य जित्वा च प्रसह मत्स्यं विराटमोजस्विनम भ्यधावत्‌

قال فايشَمبايانا: إن الملك سوشَرما، سيدَ جميع التريغارتا، اعتمادًا على قوة جنده، سحق جيش الماتسيا، وبعد أن قهر ملك الماتسيا قهرًا، تقدّم على فيرَاطا الجبّار. وفي الهجوم الذي تلا ذلك انكسر سندُ فيرَاطا: قُتلت خيوله، وقُتل سائقه والحرس الذين يحمون الجانبين، فبقي الملك بلا عربة وأُخذ حيًّا أسيرًا.

Verse 8

तौ निहत्य पृथग धुर्यावुभौ तौ पार्ष्णिसारथी । विरथं मत्स्यराजानं जीवग्राहमगृह्नताम्‌

قال فايشَمبايانا: إنَّ هذين المحاربين من التريغارتا قتلا، كلٌّ على حدة، الفرسين المتقدّمين اللذين يجرّان العربة، ثم قتلا حرس المؤخرة وسائق العربة. وهكذا جعلا ملك الماتسيا، فيرَاطا، بلا مركبة، وأمسكا به حيًّا—وهو نصرٌ تدبيريّ قاسٍ، إذ إن أسرَ الملك في ساحة القتال يُعدّ غنيمةً استراتيجيةً حتى وإن لم يُسفك دمه.

Verse 9

तमुन्मथ्य सुशर्माथ युवतीमिव कामुक: । स्यन्दनं स्वं समारोप्य प्रययौ शीघ्रवाहन:

قال فايشَمبايانا: بعدما قهره قهرًا عنيفًا، أمسك سوشَرمان بملك فيرَاطا وأذلّه، كما يفعل رجلٌ مسعور بالشهوة حين يختطف فتاةً فتية. ثم أركبه قسرًا على عربته هو، المجهزة بخيول سريعة، وانطلق مسرعًا—نصرٌ ملوّث بالإكراه والمهانة.

Verse 10

तस्मिन्‌ गृहीते विरथे विराटे बलवत्तरे । प्राद्रवन्त भयान्मत्स्यास्त्रिगर्तैरदिता भूशम्‌

قال فايشَمبايانا: لما أُمسك الملك فيرَاطا، وهو شديد البأس، بعد أن جُعل بلا عربة، اضطرب محاربو الماتسيا—وقد أنهكهم التريغارتا إيذاءً—فاستولى عليهم الخوف وبدؤوا يفرّون. وهكذا يتبدّى كيف تنهار معنويات الجيش سريعًا حين يُقهر قائده ويحلّ الاضطراب محلّ النظام.

Verse 11

तेषु संत्रस्यमानेषु कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । प्रत्यभाषन्महाबाहुं भीमसेनमरिंदमम्‌,उनके इस प्रकार अत्यन्त भयभीत होनेपर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु भीमसेनसे कहा--

ولمّا استولى عليهم الفزع على هذا النحو، خاطب يودهيشثيرا ابن كونتي بهيماسينا—عظيم الذراعين، قاهر الأعداء—مستنهضًا قوته في ساعةٍ تتطلب الثبات وحماية القوم.

Verse 12

मत्स्यराज: परामृष्ट स्त्रिगर्तेन सुशर्मणा । तं मोचय महाबाहो न गच्छेद्‌ द्विषतां वशम्‌,“महाबाहो! त्रिगर्तराज सुशर्माने मत्स्यराजको पकड़ लिया है। उन्हें शीघ्र छुड़ाओ; जिससे वे शत्रुओंके वशमें न पड़ जायँ

قال فايشَمبايانا: «لقد أُسر ملك الماتسيا على يد سوشَرمان، حاكم التريغارتا. يا عظيم الذراعين، أنقذه على الفور، لئلا يقع تحت سلطان الأعداء.»

Verse 13

उषिता: सम सुखं सर्वे सर्वकामै: सुपूजिता: । भीमसेन त्वया कार्या तस्य वासस्य निष्कृति:

قال فايشَمبايانا: «لقد أقمنا جميعًا في بيته في راحةٍ وسعة، وأُكرمنا بكل ما تشتهيه النفوس من زادٍ ومتاع. فلذلك، يا بهيماسينا، عليك أن تفي بدَينِ المعروف الذي ترتّب علينا من مقامنا في داره».

Verse 14

भीमसेन उवाच अहमेनं परित्रास्ये शासनात्‌ तव पार्थिव । पश्य मे सुमहत्‌ कर्म युध्यतः सह शत्रुभि:

قال بهيماسينا: «أيها الملك، بأمرك سأُنقذه من أيدي سوشارما. انظر اليوم إلى فعلي العظيم وبأس ذراعيّ، وأنت تخوض القتال مع الأعداء».

Verse 15

स्वबाहुबलमाश्रित्य तिष्ठ त्वं भ्रातृभि: सह | एकान्तमश्रितो राजन्‌ पश्य मेडद्य पराक्रमम्‌,मैं अपने बाहुबलका भरोसा करके लडूँगा। राजन! आज आप भाइयोंसहित एकान्तमें खड़े होकर अब मेरा पराक्रम देखें

قال بهيماسينا: «سأقاتل معتمدًا على قوة ذراعيّ. أيها الملك، قِفْ أنت وإخوتك جانبًا في مأمن، وانظروا اليوم بأسَ شجاعتي».

Verse 16

सुस्कन्धो<यं महावृक्षो गदारूप इव स्थित: । अहमेनमपारुज्य द्रावयिष्यामि शात्रवान्‌

قال بهيماسينا: «هذه الشجرة العظيمة أمامنا جذعُها متينٌ شديد، قائمةٌ كأنها هراوةٌ متجسدة. سأقتلعها من أصلها، وأتخذها سلاحًا لأطرد صفوف الأعداء وأُوليهم الفرار».

Verse 17

वैशम्पायन उवाच त॑ मत्तमिव मातजुूं वीक्षमाणं वनस्पतिम्‌ । अब्रवीद्‌ भ्रातरं वीरं धर्मराजो युधिषछ्िर:

قال فايشَمبايانا: «أيها الملك، وبعد أن قال ذلك ظلّ بهيماسينا يحدّق في تلك الشجرة كفيلٍ مهيبٍ قد استبدّ به السُّكر. عندئذٍ خاطبه دهرماراجا يودهيشثيرا، أخاه البطل—مُشيرًا إلى لزوم ضبط النفس وحُسن التقدير في تلك اللحظة العصيبة.»

Verse 18

मा भीम साहसं कार्षीस्तिष्ठत्वेष वनस्पति: । मा त्वां वृक्षेण कर्माणि कुर्वाणमतिमानुषम्‌

قال فايشَمبايانا: «لا يا بِهيما، لا تُقدِم على هذا الفعل المتهوِّر؛ دَعِ الشجرة قائمة. فإن أنت أتيتَ هذا العمل فوقَ طاقة البشر واتخذتَ الشجرة سلاحًا، عرف الناس أنك بِهيما. فلهذا، يا بهاراتا، خُذ سلاحًا آخر يليق بإنسانٍ عاديّ».

Verse 19

जना: समवबुध्येरन्‌ भीमो5यमिति भारत । अन्यदेवायुध॑ किंचित्‌ प्रतिपद्यस्व मानुषम्‌

قال فايشَمبايانا: «يا بهاراتا، سيُدرك الناس بوضوح: ‘إنه بِهيما’. لذلك خُذ سلاحًا آخر لا يتجاوز طاقة البشر. ولا تُقدِم على بطولةٍ فوق بشرية—كاقتلاع هذه الشجرة العظيمة من جذورها—فإن ذلك يفضح هويتك ويعرّض غاية التخفي للخطر».

Verse 20

चापं वा यदि वा शक्ति निस्त्रिंशं वा परश्वधम्‌ । यदेव मानुषं भीम भवेदन्यैरलक्षितम्‌

قال فايشَمبايانا: «سواء أكان قوسًا أم رمحًا أم سيفًا أم فأسًا—يا بِهيما—فليكن شيئًا يبدو سلاحًا بشريًّا عاديًّا، لا يلتفت إليه الآخرون».

Verse 22

सहिता: समरे तत्र मत्स्यराजं परीप्सत । “धनुष

قال فايشَمبايانا: وقد اجتمعوا هناك في ساحة القتال، وعزموا على إنقاذ ملك المَتسْيَة. «خُذ قوسًا أو رمحًا أو سيفًا أو فأسًا—أيَّ سلاحٍ رجوليٍّ تراه لائقًا بك؛ واختر ما لا يُعرَف به أمرك، ثم أسرِع بتخليص الملك. وهذان الجَبّاران نَكولا وسَهَديفا سيحميان عجلات مركبتك. وأنتم الإخوة الثلاثة، قاتلوا كأنكم جسدٌ واحد، وأنقذوا الملك فيرَاطا».

Verse 23

तदेवायुधमादाय मोक्षयाशु महीपतिम्‌ । यमौ च चक्ररक्षौ ते भवितारो महाबलौ

قال فايشَمبايانا: «فخذ ذلك السلاح بعينه، وخلِّص الملك على عَجَل. وأما التوأمان—حارسا عجلات مركبتك—فسيثبتان قوةً عظيمة». ثم إن بِهيماسينا، ذا البأس الشديد والسرعة العاتية، قبض على قوسٍ ممتاز، وأطلق وابلًا من السهام—كغيمةٍ مثقلةٍ بالماء تصبُّ سيولًا متتابعة.

Verse 24

त॑ भीमो भीमकर्माणं सुशर्माणमथाद्रवत्‌ । विराटं समवीक्ष्यैनं तिष्ठ तिछ्ठेति चावदत्‌,तदनन्तर भीमसेन भयंकर कर्म करनेवाले सुशर्माकी ओर दौड़े और विराटकी ओर देखते हुए सुशर्मासे बोले--“अरे! खड़ा रह, खड़ा रह”

قال فايشَمبايانا: ثم اندفع بهيما—الرهيب في أفعاله—نحو سوشَرما. ولمّا لمح الملك فيرَاطا، صاح في وجه سوشَرما: «قِف! اثبُت في مكانك!»

Verse 25

सुशर्मा चिन्तयामास कालान्तकयमोपमम्‌ । तिष्ठ तिषछ्ेति भाषन्तं पृष्ठतो रथपुज्भव: । पश्यतां सुमहत्‌ कर्म महद्‌ युद्धमुपस्थितम्‌

قال فايشَمبايانا: إن سوشَرما، إذ رأى من خلفه أبرع فرسان المركبات—مهيبًا كَالزمن وكالموت وكَيَما—وهو يهتف: «قِف! قِف!»، وقع في قلقٍ واضطراب. ثم خاطب أصحابه قائلاً: «انظروا—لقد حضرت من جديد معركة عظيمة. فأظهروا فيها بأسًا جليلًا».

Verse 26

परावृत्तो धनुर्गह्य सुशर्मा भ्रातृभि: सह । निमेषान्तरमात्रेण भीमसेनेन ते रथा:

قال فايشَمبايانا: وبعد أن قال ذلك، استدار سوشَرما، وأخذ قوسه، ومعه إخوته اندفع ثانيةً إلى المعمعة. غير أنّ بهيماسينا، في لمح البصر، قبض على هراوته وضرب قوات العدو قرب الملك فيرَاطا، فكسر زخم المهاجمين سريعًا.

Verse 27

रथानां च गजानां च वाजिनां च ससादिनाम्‌ । सहस्रशतसड्घाता: शूराणामुग्रधन्विनाम्‌

قال فايشَمبايانا: كانت هناك صفوفٌ متراصّة—بالمئات والآلاف—من رماةٍ أشدّاء: فرسانُ المركبات، وراكبو الفيلة، والفرسانُ على الخيل مع أتباعهم من الركبان. وبعد أن قال ذلك، أخذ سوشَرما قوسه مع إخوته وانسحب. أمّا بهيماسينا، عظيم النفس، فقبض على هراوته، وفي لمح البصر أسقط قرب الملك فيرَاطا جموعًا هائلة من المقاتلين—رماةً مروّعين بين أهل المركبات وفِرَق الفيلة والفرسان—وقتل أيضًا كثيرًا من المشاة.

Verse 28

पातिता भीमसेनेन विराटस्य समीपत: । पत्तयो निहतास्तेषां गदां गृह्म महात्मना

قال فايشَمبايانا: قرب الملك فيرَاطا أسقطهم بهيماسينا، وقُتل أيضًا مشاتهم. ذلك البطل عظيم النفس، وقد قبض على هراوته، حطّم قوات العدو في جوار فيرَاطا حمايةً للملك.

Verse 29

तद्‌ दृष्टवा तादृशं युद्ध सुशर्मा युद्धदुर्मद: । चिन्तयामास मनसा किं शेषं हि बलस्य मे । अपरो दृश्यते सैन्ये पुरा मग्नो महाबले

قال فايشَمبايانا: لما رأى سوشَرما تلك المعركة المروِّعة—وقد سكر بزهو الحرب—أخذ يحدّث نفسه قائلاً: «أيُّ قوة ستبقى لي الآن؟ ففي هذا الحشد الجبار يُرى أخي الآخر أيضاً وقد غاص سلفاً، كأنما ابتلعته بحرُ ساحة القتال الواسع».

Verse 30

आकर्णपूर्णेन तदा धनुषा प्रत्यदृश्यत । सुशर्मा सायकांस्तीक्ष्णान्‌ क्षिपते च पुन: पुन:

قال فايشَمبايانا: ثم شوهد واقفاً مستعدّاً للقتال، وقد شدّ قوسه حتى الأذن. وكان سوشَرما يرسل السهام الحادّة مراراً وتكراراً في وابل لا ينقطع. فلما رأى محاربو أرض المَتسْيَا ذلك، استشاطوا غضباً على التريغارتا، وأظهروا أسلحتهم السماوية، وحثّوا خيول مركباتهم إلى الأمام.

Verse 31

ततः समस्तास्ते सर्वे तुरगानभ्यचोदयन्‌ । दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणात्त्रिगर्तान्‌ प्रत्यमर्षणा:

ثم إنهم جميعاً معاً حثّوا خيولهم إلى الأمام. وإذ لم يطيقوا عدوان التريغارتا، تقدموا وهم يُظهرون الأسلحة السماوية—مدفوعين بغضبٍ عادل، مستعدين لأن يلاقوا العنف بقوةٍ منضبطة في ساحة القتال.

Verse 32

तान्‌ निवृत्तरथान्‌ दृष्टवा पाण्डवान्‌ सा महाचमू: । वैराटि: परमक्ुद्धो युयुधे परमाद्भुतम्‌

فلما رأت تلك الجموع العظيمة من جيش المَتسْيَا أن الباندافا قد أعادوا عرباتهم (نحو التريغارتا)، استدارت هي أيضاً. عندئذٍ اندفع فايراطي، أميرُ فيرَاطا، وقد اشتعل غضباً شديداً، فقاتل قتالاً بالغ الإعجاب.

Verse 33

सहस्रमवधीत्‌ तत्र कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । भीम: सप्त सहस्नाणि यमलोकमदर्शयत्‌,कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरे एक हजार त्रिगर्तोंकी मार गिराया। भीमसेनने सात हजार योद्धाओंको यमलोकका दर्शन कराया इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे त्रयस्त्रिंशो 5 ध्याय: ।।

قال فايشَمبايانا: هناك قتل يودهيشثيرا، ابن كونتي، ألفاً من التريغارتا. وأما بهيما فقد جعل سبعة آلاف من المحاربين «يبصرون مملكة يَما»—أي أرسلهم إلى الموت.

Verse 34

नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरै: । शतानि त्रीणि शूराणां सहदेव: प्रतापवान्‌

قال فايشَمبايانا: إن ناكولا أيضًا صرع بسهامه سبعمائة من المقاتلين؛ وإن سهاديڤا الشجاع أسقط ثلاثمائة من الأبطال. وتُبرز الرواية بأسَ إخوة الباندڤا المنضبط في ساحة القتال—قوةً تُساق إلى غاية، تحت مقتضيات واجب الكشترية (دارما المحارب).

Verse 35

ततो<5भ्यपतदत्युग्र: सुशर्माणमुदायुध:

ثم اندفع، وهو شديد البأس مكتمل السلاح، اندفاعًا مباشرًا نحو سوشَرما—فعلٌ يدل على عزم المحارب الذي لا يلين، يواجه العدوان وجهًا لوجه بلا تردد.

Verse 36

ततो युधिष्िरो राजा त्वरमाणो महारथ:

ثم إن الملك يودهيشثيرا—وهو من عظماء فرسان العربة (مَهارَثا)—تحرّك على عَجَل، فبادر بالفعل كما اقتضى الواجب وما استجدّ من الحال.

Verse 37

सुशर्मापि सुसंरब्धस्त्वरमाणो युधिष्िरम्‌

قال فايشَمبايانا: وكذلك سوشَرما، وقد اشتعل غضبًا عاتيًا، أسرع نحو يودهيشثيرا—تدفعه العداوة وإلحاح المعركة، عازمًا على مواجهته مواجهةً مباشرة.

Verse 38

ततो राजन्नाशुकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदर:

قال فايشَمبايانا: ثم، أيها الملك، إن فْرِكودَرا (بهِيما) ابن كُنتي، السريع إلى الفعل، وقد استبدّ به الغضب، أسقط سائس عربة خصمه عن منصة العربة. ويُبرز هذا المشهد اندفاع المعركة العنيف، حيث يصبح تعطيل حركة العدو وقيادته أمرًا حاسمًا؛ كما يعكس كيف يدفع الغضب (krodha) إلى أفعال قاسية وفورية وسط ضرورة الحرب.

Verse 39

समासाद्य सुशर्माणमश्चानस्य व्यपोथयत्‌ । पृष्ठगोपांश्व॒ तस्याथ हत्वा परमसायकै:

ولمّا دنا من الملك سوشَرما، صرع خيوله؛ ثمّ بسهامٍ عليا قاطعة قتل أيضًا حماةَ الماشية في مؤخرة سوشَرما. وتُبرز هذه الواقعة واجبَ المحارب: أن يقطع على المعتدي وسائلَ الفرار والعون، وأن يُنهي الخطر بحزمٍ عمّا هو أضعف—عن القطعان وحُرّاسها—في قلب المعركة.

Verse 40

चक्ररक्षश्न शूरो वै मदिराक्षोडतिविश्रुत:

قال فَيْشَمْبايَنَة: «ذلك البطل، ذائع الصيت في الآفاق، كان يُعرَف باسم مَديراكْشَ؛ وكان “تشَكْرَراكْشَشْنَ” مهيبًا—مشهورًا ببأسه في حراسة (أو استعمال) السلاح الشبيه بالقرص الدوّار.»

Verse 41

ततो विराट: प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मण:

قال فَيْشَمْبايَنَة: ثم إنّ الملك فيرَاط قفز من عربة سوشَرما، وأخذ الدبّوس (الگَدَا) واندفع نحوه اندفاعًا مباشرًا. وعلى الرغم من تقدّم سنّه، كان فيرَاط يجول في ساحة القتال بحيوية الفتى—مُظهرًا شجاعةً ملكيةً ثابتة وعزمًا على لقاء العدوان دون تراجع.

Verse 42

गदां तस्य परामृश्य तमेवाभ्यद्रवद्‌ बली । स चचार गदापाणिव॑द्धो 5पि तरुणो यथा

قال فَيْشَمْبايَنَة: إنّ الملك فيرَاط، وهو شديد البأس، قبض على دبّوسه، وقفز من عربة سوشَرما، ثم اندفع نحوه اندفاعًا مباشرًا. وبالدبّوس في يده كان يجول في ساحة الحرب كالشاب، وإن كان قد تقدّم به العمر—مُظهرًا شجاعةً ثابتة وعزمَ ملكٍ على حماية مملكته.

Verse 43

पलायमान त्रैगर्त दृष्टयवा भीमो5भ्याभाषत । राजपुत्र निवर्तस्व न ते युक्ते पलायनम्‌

ولمّا رأى بِهيما أميرَ التريگارت يفرّ من ساحة القتال خاطبه: «أيّها الأمير، ارجع! لا يليق بك أن تهرب مُولّيًا ظهرك في المعركة.» وتؤكّد الآية خُلُقَ الكشَتْرِيَة: أنّ الشجاعة والثبات في القتال هما لبُّ الشرف والدَّرْمَا.

Verse 44

अनेन वीर्येण कथं गास्त्व॑ प्रार्थयसे बलात्‌ | कथं चानुचरांस्त्यक्त्वा शत्रुमध्ये विषीदसि

قال فايشَمبايانا: «معتمدًا على هذا الذي تسميه بأسًا، كيف ظننت أنك تستطيع اغتصاب ماشية الملك فيرَاطا بالقوة وحدها؟ وكيف لك أن تترك أتباعك في قلب الأعداء، ثم تفرّ الآن وتغرق في اليأس؟»

Verse 45

इत्युक्त: स तु पार्थेन सुशर्मा रथयूथप: । तिष्ठ तिष्ठेति भीम॑ं स सहसा<भ्यद्रवद्‌ बली

قال فايشَمبايانا: لما خاطبه ابنُ پṛthā بتلك الكلمات، اندفع سوشَرما—القائد القوي لفِرقة مقاتلي العربات—نحو بهيما اندفاعًا مفاجئًا وهو يصيح: «قِف! قِف!» غير أن بهيما ظل ثابت الجأش، مستعدًا لملاقاة العنف بلا فزع.

Verse 46

भीमस्तु भीमसंकाशो रथात्‌ प्रस्कन्द्य पाण्डव: | प्राद्रवत्‌ तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सु: सुशर्मण:

قال فايشَمبايانا: إن بهيما، المهيب كاسمه، قفز من عربته. غير مضطرب ولا جزِع، اندفع مسرعًا نحو سوشَرما بعزمٍ على إزهاق روحه، يلاقي المعتدي وجهًا لوجه بعزيمة لا تعرف الخوف في لهيب القتال.

Verse 47

त॑ भीमसेनो धावन्तमभ्यधावत वीर्यवान्‌ | त्रिगर्तराजमादातु सिंह: क्षुद्रमूगं यथा

قال فايشَمبايانا: لما فرّ سوشَرما، ملكُ التريگارتا، اندفع بهيماسينا الجبار وراءه ليقبض عليه—كأسدٍ يطارد غزالًا صغيرًا.

Verse 48

अभिद्रुत्य सुशर्माणं केशपक्षे परामृशत्‌ | समुद्यम्य तु रोषात्‌ तं निष्पिपेष महीतले

قال فايشَمبايانا: اندفع بهيما مباشرة إلى سوشَرما فأمسكه من شعره. ثم، في فوران غضبه، رفعه وطرحه على الأرض طرحًا عنيفًا، وأخذ يسحقه هناك—ليحطم كبرياء العدو ويُنهي مقاومته في ساحة القتال.

Verse 49

पदा मूर्थ्नि महाबाहु: प्राहरद्‌ विलपिष्यत: । तस्य जानुं ददौ भीमो जघ्ने चैनमरत्निना | स मोहमगमद्‌ राजा प्रहारवरपीडित:

قال فايشَمبايانا: وبينما كان سوشَرما ينوح، ضربه بهيما ذو الساعدين العظيمين على رأسه بقدمه، ثم كبسه بركبته، ولطمه كذلك بساعده. فغلبته شدة تلك الضربات، وتعذّب بقوة الصدمات، فسقط الملك سوشَرما مغشيًّا عليه.

Verse 50

तस्मिन्‌ गृहीते विरथे त्रिगर्तानां महारथे । अभज्यत बल सर्व त्रैगर्त तद्‌ भयातुरम्‌

قال فايشَمبايانا: لما أُمسِكَ ذلك المحارب العظيم على العربة من التريغارتا بعد أن جُعِل بلا عربة، انكسرت صفوف جيش التريغارتا كله وقد استولى عليه الفزع، فتفرّق وتشتّت.

Verse 51

निवर्त्य गास्तत: सर्वा: पाण्डुपुत्रा महारथा: । अवजित्य सुशर्माणं धनं चादाय सर्वश:,तदनन्तर पाण्डुके महारथी पुत्र सुशर्माको परास्त करनेके पश्चात्‌ सब गौओंको लौटाकर और लूटका सारा धन वापस लेकर चले

قال فايشَمبايانا: ثم إن أبناء باندو، أولئك المحاربين العظام على العربات، عادوا فاستردّوا جميع الماشية؛ وبعد أن هزموا سوشَرما أعادوا كامل الثروة التي كانت قد سُلِبت.

Verse 52

स्वबाहुबलसम्पन्ना ह्वीनिषेवा यतव्रता: । विराटस्य महात्मान: परिक्लेशविनाशना:,वे सभी अपने बाहुबलसे सम्पन्न, लज्जाशील, संयमपूर्वक व्रतपालनमें तत्पर, महात्मा तथा विराटका सारा क्लेश दूर करनेवाले थे

قال فايشَمبايانا: كانوا جميعًا موفورين بقوة سواعدهم، متحفظين في السلوك، ثابتين على نذورٍ منضبطة؛ أولئك العظام النفوس صاروا سببًا في إزالة كل كربٍ عن فيرَاطا.

Verse 53

स्थिता: समक्ष ते सर्वे त्वथ भीमो5भ्यभाषत

فلما وقفوا جميعًا بين يدي الملك، تكلّم بهيما قائلاً: «إن سوشَرما الآثم لا يستحق أن يفلت من يدي حيًّا؛ ولكن ماذا عساي أن أفعل؟ إن ملكنا لا يزال رحيمًا على الدوام.»

Verse 54

नायं पापसमाचारो मत्तो जीवितुम्ति । कि तु शक्‍यं मया कर्तु यद्‌ राजा सततं घृणी

أعلن بهيماسينا: «إنّ سوشَرما هذا، الفاجر الآثم، لا يستحق أن يفلت من يدي ويظل حيًّا. ولكن ماذا عساي أن أفعل؟ إنّ ملكَنا دائمُ الرحمة.»

Verse 55

गले गृहीत्वा राजानमानीय विवशं वशम्‌ । तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदर:

قال فايشَمبايَنا: أمسك أرجونا الملكَ من حنجرته وجرّه إلى الداخل فأخضعه إخضاعًا تامًّا. ثمّ، والملك يتخبّط ويتلوّى، قيّده بهيما (فِرِكودَرا) بإحكام.

Verse 56

अभ्येत्य रणमध्यस्थमभ्यगच्छद्‌ युधिष्ठिरम्‌

قال فايشَمبايَنا: تقدّم واقترب مباشرةً من يودهيشثيرا، الذي كان قائمًا في وسط ساحة القتال.

Verse 57

प्रोवाच पुरुषव्याप्रो भीममाहवशोभिनम्‌

قال فايشَمبايَنا: خاطب يودهيشثيرا، نمرَ الرجال، بهيما المتألّق في ساحة الوغى. ولمّا رأى سوشَرما وقد أُتي به على تلك الحال، ضحك الملك يودهيشثيرا وقال لبهيمسينا: «أطلق سراح هذا الأرذل من الناس». ومع ذلك، تكلّم بهيما الجبّار إلى سوشَرما.

Verse 58

त॑ राजा प्राहसद्‌ दृष्टवा मुच्यतां वै नराधम: । एवमुक्तोडब्रवीद्‌ भीम: सुशर्माणं महाबलम्‌

لمّا رآه الملك يودهيشثيرا على تلك الحال ضحك وقال: «أطلقوا هذا الوغد». فلمّا قيل ذلك، تكلّم بهيما إلى سوشَرما شديد البأس.

Verse 59

भीम उवाच जीवितु चेच्छसे मूढ हेतुं मे गदत: शृणु । दासोस्मीति त्वया वाच्यं संसत्सु च सभासु च

قال بهيما: «أيها الأحمق! إن كنت تريد النجاة بحياتك فاسمع الوسيلة التي أقولها لك. في المجالس والمحافل العامة يجب أن تُعلن: “أنا عبدٌ/خادمٌ”» (أي أن تُظهر قبولك بحال العبودية شرطًا للعفو عنك).

Verse 60

एवं ते जीवितं दद्यामेष युद्धजितो विधि: । तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वच:

«إن قبلتَ ذلك منحتُك الحياة؛ فهذه سنّةُ من ظفر في القتال.» وبعد أن قال بهيما هذا، خاطبه الأخ الأكبر يودهيشثيرا بكلماتٍ ودودةٍ مُصالِحة، مُشيرًا إلى أن النصر ينبغي أن يُضبط بالدَّرما وبكبح النفس لا بمجرد الغضب.

Verse 61

युधिछिर उवाच मुज्च मुज्चाधमाचारं प्रमाणं यदि ते वयम्‌ । दासभावं गतो होष विराटस्य महीपते: । अदासो गच्छ मुक्तोडसि मैवं कार्षी: कदाचन

قال يودهيشثيرا: «أطلقوه، أطلقوه—أطلقوا هذا الرجل سيّئ السيرة إن كنتم تقبلوننا مرجعًا وحُكمًا. فقد صار بالفعل في حال العبودية تحت ملك فيرَاطا. (ثم قال لسوشَرما:) لستَ عبدًا بعد اليوم؛ اذهب—فقد أُعتِقت. وإياك أن تعود لمثل هذا الفعل أبدًا.»

Verse 343

युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभ: । नकुलने अपने बाणोंसे सात सौ सैनिकोंको यमराजके घर भेज दिया तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ प्रतापी वीर सहदेवने युधिष्ठिरकी आज्ञासे तीन सौ शूरवीरोंका संहार कर डाला

قال فايشَمبايانا: امتثالًا لأمر يودهيشثيرا، ضرب «ثور الرجال» العدوَّ فأرداه. وأما ناكولا فبسِهامه أرسل سبعمائة جنديّ إلى دار يَما؛ وأما البطل الجسور سهاديڤا—وهو من أكرم الرجال—فبأمر يودهيشثيرا أهلك ثلاثمائة من الشجعان. ويُبرز هذا المقطع طاعةً منضبطة للقيادة الشرعية في قلب المعركة، حيث تُسخَّر البأسُ الفرديّة ضمن إطار الواجب المأمور به.

Verse 353

हत्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथ: । तदनन्तर महारथी सहदेव त्रिगर्तोंकी उस महासेनाका संहार करके अत्यन्त उग्र रूप धारण किये हाथमें धनुष ले सुशर्मापर चढ़ आये

قال فايشَمبايانا: بعدما قتل سهاديڤا، فارس العربة العظيم، جيشَ التريغارتا الجرّار، اتخذ هيئةً شديدةً مُهيبة، وأمسك قوسه بيده، ثم تقدّم نحو الملك سوشَرما. ويُبرز هذا المقطع اندفاع المقاومة العادلة في ساحة القتال: فبعد كسر جموع العدو، يمضي المحارب إلى قائد الخصم ليضع حدًّا لمزيد من الأذى والاضطراب.

Verse 373

अविध्यन्नवभिर्बाणैश्षतुर्भि श्षतुरो हयान्‌ । तब सुशर्माने भी अत्यन्त कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ नौ बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको बींध डाला

قال فايشَمبايانا: بسِهامٍ تسعةٍ أصاب (الملك) يودهيشثيرا، وبأربعةِ سهامٍ طعن الخيولَ الأربع. ثم إن سوشَرما أيضًا، وقد استبدّ به الغضبُ غايةَ الاستبداد، اندفع بسرعةٍ عظيمة—فجرح يودهيشثيرا بتسعةِ نِبالٍ، وطعن جيادَ الملك الأربع بأربعة. ويُبرز هذا المشهد كيف تُحدِّدُ الحنقُ في ساحة القتال العنفَ وتُسرِّعُ الانتقام، حتى على ملكٍ عُرف بالتحفّظ وبالدارما.

Verse 393

अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपातयत्‌ । राजन! फिर तो शीघ्रता करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमने सुशमाके पास पहुँचकर उत्तम बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला। साथ ही उसके पृष्ठरक्षकोंको भी मारकर कुपित हो उसके सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया

قال فايشَمبايانا: وقد استبدّ به الغضبُ، أسقط سائقَ مركبةِ ذلك المحارب من مقعد العربة. أيها الملك! ثم إن بهيما ابنَ كونتي، السريعَ إلى الفعل الشديدَ العزم، دنا من سوشَرما فقتل خيولَه بسهامٍ ممتازة، وصرع حُرّاسَ مؤخرته، ثم في ثورته قذف السائقَ أيضًا من العربة إلى الأرض. وتُبرز هذه الحادثة اندفاعَ المعركة القاسي، حيث تمتزج الضرورةُ التكتيكية بالغضب لتعطيل حركة الخصم وحمايته.

Verse 403

समायाद्‌ विरथं दृष्ट्वा त्रिगर्त प्राहरत्‌ तदा । सुशर्माको रथहीन हुआ देखकर राजा विराटके चक्ररक्षक सुप्रसिद्ध वीर मदिराक्ष भी वहाँ आ पहुँचे और त्रिगर्तनरेशपर बाणोंसे प्रहार करने लगे

قال فايشَمبايانا: لما رأوا ملكَ التريغارتا يُقبل بلا عربة، هاجمه المحاربون في الحال. وفي تلك اللحظة وصل مَديراكشا، بطلُ فيرَاطا المشهور وحارسُ «العجلة الملكية» (فيلق العربات)، وشرع يمطر حاكمَ التريغارتا بالسهام. ويُبرز هذا المشهد خُلُقَ ساحة القتال: حمايةَ الملك والمملكة، وإن تقلبت أحوال الحرب وتبدلت.

Verse 553

रथमारोपयामास विसंज्ञ पांसुगुण्ठितम्‌ इसके बाद भीम राजा सुशर्माका गला पकड़कर ले आये। उस समय वह लाचार होकर उनके वशमें पड़ा था और छूटनेके लिये छटपटा रहा था। दुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माको रस्सियोंसे बाँधकर रथपर रख दिया। उसके सारे अंग धूलमें सने थे और चेतना लुप्त-सी हो रही थी

قال فايشَمبايانا: ثم إن بهيما أمسك سوشَرما من عنقه وجاء به. وكان حينئذٍ عاجزًا واقعًا تحت قهره، يتخبط محاولًا الإفلات. فقيّد بهيما ابنُ كونتي سوشَرما بالحبال، ورفعه فوضعه على العربة. وقد تلطخت أعضاؤه كلها بالغبار، وكادت وعيُه أن يضمحل.

Verse 563

दर्शयामास भीमस्तु सुशर्माणं नराधिपम्‌ | इसके बाद भीमने रणभूमिमें स्थित राजा युधिष्ठिरके पास जाकर उन्हें राजा सुशर्माको दिखलाया

قال فايشَمبايانا: ثم قدّم بهيما الملكَ سوشَرما إلى الملك (يودهيشثيرا). فبعد الصدام، مضى بهيما إلى يودهيشثيرا القائم في ساحة القتال وأراه سوشَرما—إشارةً إلى أن أداء الواجب في الحرب يكون بالكفّ، وإقامة الدليل، وتحمل المسؤولية، لا بمجرد التفاخر.

Verse 3636

अभिपत्य सुशर्माणं शरैरभ्याहनद्‌ भृशम्‌ । तत्पश्चात्‌ महारथी राजा युधिष्ठिर भी बड़ी उतावलीके साथ सुशर्मापर धावा बोलकर उसे बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे

قال فايشامبايانا: اندفع الملك يودهيشثيرا، ذلك المحارب العظيم على العربة، مباشرةً نحو سوشَرما، فأمطَره بوابلٍ من السهام ضربًا شديدًا. ثم عاد، بعزمٍ عاجل لا يلين، يكرّ عليه مرةً بعد مرة، يطعنه بأسهمه طعنًا متتابعًا.

Frequently Asked Questions

The dilemma centers on proportional and timely protection of civilian economic life (pastoral settlements) under sudden coercion: how a polity responds to a raid without reckless escalation, while preserving legitimacy and minimizing harm.

Public authority is sustained by visible competence in protection: safeguarding mobile wealth (cattle), responding rapidly to threats, and maintaining morale through disciplined mobilization and credible leadership signaling.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter functions primarily as narrative causation, establishing the operational context for subsequent actions and revelations within the Virāṭa-parva sequence.

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