Adhyaya 49
Bhishma ParvaAdhyaya 4996 Versesकौरव पक्ष को स्थानीय बढ़त—द्रोण के तीव्र प्रतिघात से पाण्डव मोर्चे पर दबाव बढ़ता है, पर समग्र परिणाम अभी अनिर्णीत।

Adhyaya 49

Droṇa–Dhṛṣṭadyumna-yuddha (द्रोण-धृष्टद्युम्न-युद्धम्) — Tactical duel and allied interventions

Upa-parva: Bhīṣma-vadha-prastāva / Droṇa–Dhṛṣṭadyumna-saṃyoga (contextual battle-episode within Bhīṣma Parva)

Dhṛtarāṣṭra questions Sañjaya about the battlefield encounter between Droṇa and Dhṛṣṭadyumna and, by extension, about why Bhīṣma’s presence has not produced a swift Pandava collapse. Sañjaya responds by asserting the practical difficulty of “defeating the Pāṇḍavas,” framing the war as extraordinarily severe and not reducible to mere individual prowess. The chapter then narrates a high-intensity exchange: Droṇa strikes Dhṛṣṭadyumna’s chariot-system (charioteer and horses), while Dhṛṣṭadyumna answers with concentrated arrow volleys and direct challenges. Droṇa prepares a formidable killing-arrow; the army reacts with alarm, but Dhṛṣṭadyumna displays resilience by cutting down the incoming threat and countering with missile-rain. Weapon transitions follow: spear is thrown and split; bow is cut; mace is launched and deflected; Dhṛṣṭadyumna dismounts with sword and shield, attempting direct approach, yet is checked by Droṇa’s arrow-barrage. Bhīma intervenes to stabilize Dhṛṣṭadyumna’s position by providing rapid support and re-mounting assistance. Command dynamics widen: Duryodhana dispatches Kaliṅga forces to protect Droṇa; Droṇa disengages from the Panchala prince to engage the elder allies Virāṭa and Drupada, while Dhṛṣṭadyumna moves toward Dharmarāja (Yudhiṣṭhira). The chapter ends by indicating the onset of a broader, tumultuous engagement between Bhīma and the Kaliṅgas—an escalation from duel to multi-front confrontation.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को पूर्वाह्न के रण-उद्घोष का चित्र खींचकर सुनाते हैं—कुरु और सृञ्जय सेनाएँ विजय-लालसा में सिंहों-सी गर्जना करती हैं; शंख-तल, किलकिला और रथों की गड़गड़ाहट से दिशाएँ काँप उठती हैं। → ध्वनि-तूफान के साथ युद्ध सघन होता है और अनेक मोर्चों पर एक साथ टक्करें पड़ती हैं—सात्यकि-कृतवर्मा आमने-सामने आते हैं; धृष्टकेतु क्रुद्ध बाह्लीक पर टूट पड़ता है; शिखण्डी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को ललकारता है। → द्रोणाचार्य के विरुद्ध धृष्टद्युम्न का प्रचंड आक्रमण चरम पर पहुँचता है; प्रत्युत्तर में द्रोण क्रोधोन्मत्त होकर पाञ्चाल्य (धृष्टद्युम्न) के धनुष को युद्ध में त्रिधा काटते हैं और कालदण्ड-सदृश भयानक बाण-प्रहार से उसे गहरे संकट में डाल देते हैं। → रण का शोर थमता नहीं—एक-एक द्वंद्व अपने-अपने परिणाम की ओर बढ़ता है, पर निर्णायक पलटाव अभी स्थिर नहीं होता; दोनों पक्षों की जिजीविषा और प्रतिगर्जना युद्ध को अगले चरण में ढकेल देती है। → धृष्टद्युम्न पर द्रोण के घातक प्रहार के बाद यह अनिश्चित रह जाता है कि पाञ्चाल्य सेनापति संभलकर प्रतिघात करेगा या द्रोण का दबाव पाण्डव पक्ष को पीछे धकेल देगा।

Shlokas

Verse 1

[दाक्षिणात्य अधिक पाठका इं श्लोक मिलाकर कुल ३० ६ “लोक हैं।] नल रत (0) आज अत 3 पज्चचत्वारिशो< ध्याय: उभय पक्षके सैनिकोंका उन्ड-युद्ध संजय उवाच पूर्वाह्नि तस्य रौद्रस्य युद्धमह्नो विशाम्पते । प्रावर्तत महाघोरें राज्ञां देहावकर्तनम्‌,संजय कहते हैं--प्रजानाथ! उस भयंकर दिनके प्रथम भागमें महाभयानक युद्ध होने लगा, जो राजाओंके शरीरका उच्छेद करनेवाला था

قال سنجيا: يا سيّدَ الناس، في صبيحة ذلك اليوم المروّع اندلعت معركةٌ بالغةُ الهول—معركةٌ تقطع أجسادَ الملوك وتُسقطهم صرعى.

Verse 2

कुरूणां सृञजयानां च जिगीषूणां परस्परम्‌ । सिंहानामिव संह्वादो दिवमुर्वी च नादयन्‌,कौरव और सूंजयवंशी वीर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा रखकर सिंहोंके समान दहाड़ रहे थे। उनका वह सिंहनाद पृथ्वी और आकाशको प्रतिध्वनित कर रहा था

وكان الكورو والسِّرِنْجَيَة، وكلٌّ منهما يتوق إلى قهر الآخر، يزأرون زئيرَ الأسود. فدوّى ذلك الزئير في الآفاق، حتى ارتجّت له الأرضُ والسماء.

Verse 3

आसीत्‌ किलकिलाशब्दस्तलशड्खरवै: सह । जज्षिरे सिंहनादाश्न शूराणां प्रतिगर्जताम्‌,तल और शंखोंकी ध्वनिके साथ सैनिकोंका किलकिल शब्द गूँज उठा। एक-दूसरेके प्रति गर्जना करनेवाले शूरवीरोंके सिंहनाद होने लगे

ومع دويّ الطبول اليدوية ونفخ الأصداف، ارتفع صخبٌ عارم. وإذ كان الأبطال يزأر بعضُهم في وجه بعض، تردّدت صيحاتُهم القتالية كزئير الأسود، نذيرًا بفورة الحماسة الحربية.

Verse 4

तलत्राभिह्वताश्षैव ज्याशब्दा भरतर्षभ | पत्तीनां पादशब्दक्ष वाजिनां च महास्वन:,भरतश्रेष्ठ) तलत्राणके आघातसे टकरायी हुई प्रत्यंचाओंके शब्द, पैदल सिपाहियोंके पैरोंकी धमक, उच्चस्वरसे होनेवाली घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चाबुक और अंकुशके आघातका शब्द, हथियारोंकी झनझनाहट तथा एक-दूसरेपर धावा करनेवाले गजराजोंके घण्टानाद--ये सब शब्द मिलकर ऐसी भयंकर आवाज प्रकट करने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उसीमें रथोंके पहियोंकी घरघराहट होने लगी, जो मेघोंकी विकट गर्जनाके समान जान पड़ती थी

قال سَنْجَيا: يا ثورَ آلِ بهاراتا، إنَّ صليلَ واقياتِ الكفوفِ وطرْقَ أوتارِ الأقواس، ودَوِيَّ خُطى المشاةِ الثقيلة، وصهيلَ الخيلِ الجَهْوَر—قد ارتفعَتْ جميعًا في زئيرٍ واحدٍ مُرعِب، كأنه ضجيجُ نذيرٍ يُعلن أن الجيوشَ قد اندفعتْ بكاملها إلى ساحةِ القتال.

Verse 5

तोत्राडकुशनिपातश्च आयुधानां च नि:स्वनः । घण्टाशब्दश्न नागानामन्योन्यमभिधावताम्‌,भरतश्रेष्ठ) तलत्राणके आघातसे टकरायी हुई प्रत्यंचाओंके शब्द, पैदल सिपाहियोंके पैरोंकी धमक, उच्चस्वरसे होनेवाली घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चाबुक और अंकुशके आघातका शब्द, हथियारोंकी झनझनाहट तथा एक-दूसरेपर धावा करनेवाले गजराजोंके घण्टानाद--ये सब शब्द मिलकर ऐसी भयंकर आवाज प्रकट करने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उसीमें रथोंके पहियोंकी घरघराहट होने लगी, जो मेघोंकी विकट गर्जनाके समान जान पड़ती थी

قال سَنْجَيا: ارتفعَتْ فرقعةُ السياطِ وضرباتُ مِهْمَازِ الفيل، وصليلُ السلاحِ المتصادم، ورنينُ الأجراسِ حين اندفعتِ الفيلةُ العِظامُ بعضها إلى بعض. واجتمعتْ تلك الأصواتُ كلُّها فانتفختْ إلى زئيرٍ مُرعِبٍ يُقيمُ الشَّعرَ من هولِه—صورةٍ سمعيّةٍ لظلمةِ الحربِ الأخلاقية، حيث تُساقُ الكائناتُ الحيّةُ وتُضرَبُ لكي تتقدّمَ الجيوش.

Verse 6

तस्मिन्‌ समुदिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे । बभूव रथनिर्घोष: पर्जन्यनिनदोपम:,भरतश्रेष्ठ) तलत्राणके आघातसे टकरायी हुई प्रत्यंचाओंके शब्द, पैदल सिपाहियोंके पैरोंकी धमक, उच्चस्वरसे होनेवाली घोड़ोंकी हिनहिनाहट, हाथियोंके चाबुक और अंकुशके आघातका शब्द, हथियारोंकी झनझनाहट तथा एक-दूसरेपर धावा करनेवाले गजराजोंके घण्टानाद--ये सब शब्द मिलकर ऐसी भयंकर आवाज प्रकट करने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी। उसीमें रथोंके पहियोंकी घरघराहट होने लगी, जो मेघोंकी विकट गर्जनाके समान जान पड़ती थी

قال سَنْجَيا: لمّا ارتفع ذلك الضجيجُ العاصفُ المُقشَعِرّ، اندفعَ دَوِيُّ العَرَباتِ الحربية—كأنه رعدُ سُحُبِ المطرِ المُفزِع. وتلاقتْ أصواتُ الميدانِ الكثيرةُ في زئيرٍ واحدٍ طاغٍ، مُعلِنةً أن نارَ الحربِ قد اشتعلتْ تمامًا، وأن ثِقَلَها الأخلاقيَّ على وشكِ أن ينكشف.

Verse 7

ते मन: क्रूरमाधाय समभित्यक्तजीविता: । पाण्डवानभ्यवर्तन्त सर्व एवोच्छितध्वजा:,वे समस्त कौरव सैनिक अपने मनको कठोर बना प्राणोंकी बाजी लगाकर ऊँची ध्वजाएँ फहराते हुए पाण्डवोंपर धावा करने लगे

قال سَنْجَيا: قسَّوا قلوبَهم ورهنوا أرواحَهم، فانقضَّ جميعُ محاربي الكورو على الباندافا، وراياتُهم مرفوعةٌ عاليًا.

Verse 8

अथ शान्तनवो राजन्नभ्यधावद्‌ धनंजयम्‌ | प्रगृह्य॒ कार्मुकं घोरं कालदण्डोपमं रणे,राजन! तदनन्तर शान्तनुनन्दन भीष्म उस युद्धभूमिमें कालदण्डके समान भीषण धनुष लेकर अर्जुनकी ओर दौड़े

قال سَنْجَيا: ثم، أيها الملك، اندفعَ بِهِيشْما ابنُ شانتانو نحو دَهنَنْجَيا (أرجونا). قابضًا على قوسِه الرهيب—كأنه عصا الموتِ نفسها—أسرعَ إلى قلبِ المعركة.

Verse 9

अर्जुनो5पि धनुर्गृह्म गाण्डीवं लोकविश्रुतम्‌ अभ्यधावत तेजस्वी गाज़ेयं रणमूर्धनि,उधरसे महातेजस्वी अर्जुन भी अपना लोकविख्यात गाण्डीव धनुष लेकर युद्धके मुहानेपर गंगानन्दन भीष्मकी ओर दौड़े

قال سنجيا: إن أرجونا أيضًا، وقد تناول القوس «غانديڤا» المشهور في العالم، اندفع البطل المتلألئ إلى مقدّمة ساحة القتال، قاصدًا بيشما ابن نهر الغانغا. ويُبرز هذا المشهد توتّر الحرب الأخلاقي الجسيم: فالمحارب البارّ لا بد أن يتقدّم حتى في مواجهة شيخٍ مُبجَّل، حين يقتضي الواجب صون النظام والوفاء بالعهد والدور الملتزم به في المعركة.

Verse 10

तावुभौ कुरुशार्दूलौ परस्परवधैषिणौ । गाड़ेयस्तु रणे पार्थ विद्धवा नाकम्पयद्‌ बली,वे दोनों कुरुकुलके सिंह थे और एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छा रखते थे। बलवान्‌ भीष्म युद्धमें अर्जुनको घायल करके भी उन्हें विचलित न कर सके

قال سنجيا: كان هذان البطلان، أسدين بين الكورو، يتطلّع كلٌّ منهما إلى قتل الآخر. غير أنّ بيشما الجبّار، على الرغم من أنّه أصاب بارثا (أرجونا) في القتال وجرحه، لم يستطع أن يزعزع ثباته—فبانت عزيمة المحارب الذي لا يتزلزل وسط الجراح والمخاطر.

Verse 11

तथैव पाण्डवो राजन्‌ भीष्मं नाकम्पयद्‌ युधि । सात्यकिस्तु महेष्वास: कृतवर्माणमभ्ययात्‌,राजन! उसी प्रकार पाण्डुनन्दन अर्जुन भी भीष्मको युद्धमें हिला न सके। दूसरी ओर महाधनुर्धर सात्यकिने कृतवर्मापर धावा किया

قال سنجيا: وكذلك، أيها الملك، لم يستطع الباندڤي (أرجونا) أن يزعزع بيشما في القتال. وفي الوقت نفسه اندفع ساتيكي، الرامي العظيم، مباشرةً نحو كريتافارما.

Verse 12

तयो: समभवद्‌ युद्ध तुमुलं लोमहर्षणम्‌ । सात्यकि: कृतवर्माणं कृतवर्मा च सात्यकिम्‌

قال سنجيا: واندلعت بينهما معركة ضارية، صاخبة تُقشعرّ لها الأبدان. ضرب ساتيكي كريتافارما، وضرب كريتافارما بدوره ساتيكي—كلٌّ يلاقي الآخر وجهًا لوجه في زحام الحرب المروّع.

Verse 13

तौ शरार्चितसर्वाड्रौ शुशुभाते महाबलौ

قال سنجيا: إنّ هذين المحاربين العظيمي القوة كانا يتلألآن فوق تلك الكتلة من الجند الشبيهة بالجبل، وقد غدت مزدانةً وموسومةً بوابل السهام. لقد برزا في ساحة القتال مثالين ساطعين للبأس، وسط الثقل الأخلاقي لحربٍ يقتل فيها القريبُ قريبه.

Verse 14

अभिमन्युर्महेष्वासं बृहदूबलमयोधयत्‌,अभिमन्युने महान्‌ धनुर्धर बृहदबलके साथ युद्ध किया। प्रजानाथ! कोसलनरेश बृहदबलने उस युद्धमें अभिमन्युके ध्वजको काट दिया और सारथिको मार गिराया

قال سانجيا: إن أبهيمانيو اشتبك في القتال مع الرامي العظيم بْرِهادبالا. يا سيد الناس، إن ملك كوسالا بْرِهادبالا في ذلك النزال قطع راية أبهيمانيو وأسقط سائقه عن العربة.

Verse 15

तत: कोसलराजासावभिमन्योर्विशाम्पते । ध्वजं चिच्छेद समरे सारथिं च न्यपातयत्‌,अभिमन्युने महान्‌ धनुर्धर बृहदबलके साथ युद्ध किया। प्रजानाथ! कोसलनरेश बृहदबलने उस युद्धमें अभिमन्युके ध्वजको काट दिया और सारथिको मार गिराया

قال سانجيا: ثم إن ملك كوسالا—يا سيد القوم—في خضم المعركة قطع راية أبهيمانيو وأسقط سائقه.

Verse 16

सौभद्रस्तु ततः क्रुद्ध: पातिते रथसारथौ । बृहदूबलं महाराज विव्याध नवभि: शरै:,महाराज! अपने रथके सारथिके मारे जानेपर सुभद्राकुमार अभिमन्यु कुपित हो उठे और उन्होंने बृहदबलको नौ बाणोंसे घायल कर दिया

قال سانجيا: عندئذٍ غضب ساوبهدرا (أبهيمانيو) حين سقط سائقه، فجرح الملك بْرِهادبالا بتسعة سهام.

Verse 17

अथापराशभ्यां भल्लाभ्यां शिताभ्यामरिमर्दन: । ध्वजमेकेन चिच्छेद पा्णिमेकेन सारथिम्‌

قال سانجيا: ثم إن ذلك المحارب القاهر للأعداء، بسهمين حادّين من نوع «بهلّا»، قطع الراية بأحدهما، وبالآخر قطع ذراع السائق.

Verse 18

मानिनं समरे दृप्तं कृतवैरं महारथम्‌

قال سانجيا: «(كان) رجلاً معتدًّا بنفسه، متكبّرًا في ساحة القتال، قد جعل العداوة نهجًا راسخًا له، وهو من عظماء فرسان العربة.»

Verse 19

तावुभौ नरशार्दूलौ कुरुमुख्यौ महाबलौ

قال سنجيا: إنّ هذين الاثنين—كأنهما نمران بين الرجال، وهما من أعيان الكورو وأشدّهم بأسًا—برزا كمحاربين جليلين؛ فقامتُهما وقوّتُهما تُنبئان بثِقَل الصراع الذي أوشك أن ينكشف.

Verse 20

तौ वीक्ष्य तु महात्मानौ कृतिनौ चित्रयोधिनौ

قال سنجيا: ولمّا وقع البصر على هذين العظيمي النفس—المُحكَمَيْن في الصنعة، العجيبين في ساحة القتال—مال مشهد الميدان إلى حضورهما وبأسهما، وكأنّ ثِقَل المعنى الأخلاقي للمعركة المقبلة يُوزَن على قدر مقام المحاربين فيها.

Verse 21

विस्मय: सर्वभूतानां समपद्यत भारत । भारत! वे दोनों महामनस्वी अस्त्रविद्याके विद्वान्‌ तथा विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेवाले थे। उन्हें देखकर समस्त प्राणियोंको बड़ा विस्मय हुआ || २० है ।। दुःशासनस्तु नकुलं प्रत्युद्याय महाबलम्‌

قال سنجيا: «يا بهاراتا، لقد استولى العجب على جميع الكائنات. كان هذان المحاربان العظيمان عارفين بعلم الأسلحة، يقاتلان بأساليب مدهشة شتّى؛ فلمّا رآهما الخلق امتلأوا دهشة. ثم تقدّم دُحشاسَنَة، ذو القوة العظيمة، ليلاقي ناكولا.»

Verse 22

तस्य माद्रीसुत: केतुं सशरं च शरासनम्‌,भारत! तब माद्रीकुमार नकुलने भी हँसते हुए-से तीखे बाण मारकर दुःशासनके धनुष- बाण और ध्वजको काट गिराया और पचीस बाण मारकर उसे घायल कर दिया

قال سنجيا: يا بهاراتا، عندئذٍ إنّ ناكولا ابن مادري، كأنّه يبتسم، رمى بسهامٍ حادّة فقطع قوس دُحشاسَنَة وسهامه ورايته وأسقطها. ثم أرداه بخمسٍ وعشرين سَهْمًا فجرحه.

Verse 23

चिच्छेद निशितैर्बाणै: प्रहसन्निव भारत । अथैनं पज्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समार्पयत्‌,भारत! तब माद्रीकुमार नकुलने भी हँसते हुए-से तीखे बाण मारकर दुःशासनके धनुष- बाण और ध्वजको काट गिराया और पचीस बाण मारकर उसे घायल कर दिया

قال سنجيا: «يا بهاراتا، إنّ ناكولا—ابن مادري—مبتسمًا كأنّ الأمر لهوٌ، قطع بسهامٍ حادّة قوس دُحشاسَنَة وسهامه ورايته؛ ثم أصابه بخمسٍ وعشرين سَهْمًا صغيرًا سريعًا فجرحه.»

Verse 24

पुत्रस्तु तव दुर्धर्षो नकुलस्य महाहवे । तुरज्गांश्विच्छिदे बाणैर्ध्वजं चैवाभ्यपातयत्‌,इसके बाद आपके दुर्धर्ष पुत्रने उस महायुद्धमें नकुलके घोड़ोंको अपने सायकोंद्वारा काट डाला और ध्वजको भी नीचे गिरा दिया

قال سانجيا: ثم إن ابنك الذي لا يُقاوَم، في تلك المعركة العظمى، قطع خيول ناكولا بسهامه، وأسقط رايته أيضًا.

Verse 25

दुर्मुख: सहदेवं च प्रत्युद्याय महाबलम्‌ । विव्याध शरवर्षेण यतमानं महाहवे,महाबली सहदेव उस महासमरमें अपनी विजय-के लिये बड़ा प्रयत्न कर रहे थे। उन्हें आपके पुत्र दुर्मुखने धावा करके अपने बाणोंकी वर्षासे घायल कर दिया

قال سانجيا: تقدم دورموخا لملاقاة سهاديفا الجبار، وفي المعركة العظمى، وبينما كان سهاديفا يجاهد بشدة طلبًا للنصر، طعنه بوابلٍ من السهام.

Verse 26

सहदेवस्ततो वीरो दुर्मुखस्य महारणे । शरेण भृशतीक्ष्णेन पातयामास सारथिम्‌,तब वीरवर सहदेवने उस महायुद्धमें अत्यन्त तीखे बाणसे दुर्मुखके सारथिको मार गिराया

قال سانجيا: ثم إن سهاديفا الشجاع، في تلك المعركة العظمى، أسقط سائق عربة دورموخا بسهمٍ بالغ الحِدّة.

Verse 27

तावन्योन्यं समासाद्य समरे युद्धदुर्मदौ । त्रासयेतां शरैघोरै: कृतप्रतिकृतेषिणा,वे दोनों युद्धदुर्मद वीर समरांगणमें एक-दूसरेसे टक्कर लेकर पूर्वकृत अपराधोंका बदला लेनेकी इच्छा रखते हुए भयंकर बाणोंद्वारा एक-दूसरेको भयभीत करने लगे

قال سانجيا: إنهما، وقد استبدّ بهما زهوُ القتال، تقاربا في المعمعة؛ يطلب كلٌّ منهما القصاص لما مضى من مظالم، فأخذا يُرهب أحدهما الآخر بوابلٍ مروّع من السهام.

Verse 28

युधिष्ठिर: स्वयं राजा मद्रराजानमभ्ययात्‌ । तस्य मद्राधिपश्षापं द्विधा चिच्छेद मारिष,स्वयं राजा युधिष्ठिरने मद्रराज शल्यपर आक्रमण किया। राजन! मद्रराजने युधिष्ठिरके धनुषके दो टुकड़े कर दिये

قال سانجيا: إن الملك يودهيشتيرا نفسه تقدّم لملاقاة حاكم مادرا. ثم إن سيد مادرا، أيها الملك الموقّر، قطع قوس يودهيشتيرا شطرين.

Verse 29

तदपास्य भनुश्कछिन्न॑ कुन्तीपुत्रो युधिष्िर: । अन्यत्‌ कार्मुकमादाय वेगवद्‌ बलवत्तरम्‌,तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा वेगयुक्त एवं प्रबलतर धनुष ले लिया और झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा मद्रराज शल्यको ढक दिया। फिर क्रोधमें भरकर कहा--“खड़े रहो, खड़े रहो”

قال سانجيا: إن يودهيشثيرا ابن كونتي طرح القوس الذي قُطع جانبًا، وأخذ قوسًا آخر أسرع حركةً وأشد قوةً، وأغرق شاليا ملك مادرا بوابلٍ من السهام الحادّة. ثم امتلأ غضبًا فصاح: «اثبت! اثبت!»

Verse 30

ततो मद्रेश्वर॑ राजा शरैः संनतपर्वभि: । छादयामास संक्रुद्धस्तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌,तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा वेगयुक्त एवं प्रबलतर धनुष ले लिया और झुकी हुई गाँठवाले तीखे बाणोंद्वारा मद्रराज शल्यको ढक दिया। फिर क्रोधमें भरकर कहा--“खड़े रहो, खड़े रहो”

ثم إن ملك مادرا، سيدها، اندفع في غضبٍ عارم، فأمطر خصمه بسهامٍ حادّةٍ محكمة الانثناء عند المفاصل، كأنما يلفّه بعاصفةٍ من النبال؛ وصاح: «اثبت! اثبت!»

Verse 31

धृष्टद्युम्नस्ततो द्रोणमभ्यद्रवत भारत । तस्य द्रोण: सुसंक्रुद्ध: परासुकरणं दृढम्‌

قال سانجيا: عندئذٍ اندفع دْهْرِشْتَديومنَة نحو درونا اندفاعًا مباشرًا، يا بهاراتا. فاشتد غضب درونا عليه، فثبت ثابتًا لا يلين، بعزمٍ صلبٍ قاصدًا أن يُنزل الموت بعدوّه.

Verse 32

शरं चैव महाघोरं कालदण्डमिवापरम्‌

قال سانجيا: ثم أطلق سهمًا بالغ الرهبة، كأنه عصا أخرى للموت ذاته.

Verse 33

अथान्यद्‌ धनुरादाय सायकांश्व चतुर्दश,तत्पश्चात्‌ द्रुपदपुत्र धृष्टद्यम्नने दूसरा धनुष लेकर चौदह सायक चलाये और उस युद्धभूमिमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेपर अत्यन्त कुपित हो भीषण संग्राम करने लगे

قال سانجيا: ثم إن دْهْرِشْتَديومنَة ابن دروبادا أخذ قوسًا آخر وأطلق أربعة عشر سهمًا. وفي ساحة القتال أصاب دروناآتشاريّا وأوجعه. فاشتد غضب كلٍّ منهما على الآخر، وانخرطا في قتالٍ رهيب.

Verse 34

द्रोणं द्रुपदपुत्रस्तु प्रतिविव्याध संयुगे । तावन्योन्यं सुसंक्रुद्धौ चक्रतु: सुभृशं॑ रणम्‌,तत्पश्चात्‌ द्रुपदपुत्र धृष्टद्यम्नने दूसरा धनुष लेकर चौदह सायक चलाये और उस युद्धभूमिमें द्रोणाचार्यको घायल कर दिया। फिर तो वे दोनों एक-दूसरेपर अत्यन्त कुपित हो भीषण संग्राम करने लगे

قال سنجيا: في خِضَمِّ المعركة، ردَّ ابنُ دروبادا الضربةَ على درونا فأصابه. ثم إنهما—وقد استبدَّ بهما الغضبُ أحدُهما على الآخر—انخرطا في مبارزةٍ بالغةِ الشراسة. ويُبرز هذا المشهد كيف تُؤجِّج العداوةُ الشخصيةُ والكبرياءُ الجريحُ عنفَ ساحة القتال، حتى بين سادة السلاح، حين يطغى السخطُ على ضبط النفس وعلى مقتضيات الدارما في الحرب.

Verse 35

सौमदत्तिं रणे शड्खो रभसं रभसो युधि । प्रत्युद्ययौ महाराज तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्‌,महाराज! वेगशाली शंखने उस युद्धमें वेगवान्‌ वीर भूरिश्रवापर धावा किया और कहा -- खड़े रहो, खड़े रहो”

قال سنجيا: أيها الملك، في خِضَمِّ القتال اندفع شانخا، وقد امتلأ باندفاعٍ غاضب، نحو سومادتّي (بهوريشرافاس) صراحةً وهو يصيح: «اثبت! اثبت!»—وهو تحدّي المحارب وفق سنن القتال المكشوف، حيث يُعلَن الشجاعة وجهاً لوجه حتى وسط عنف الحرب.

Verse 36

तस्य वै दक्षिणं वीरो निर्बिभेद रणे भुजम्‌ | सौमदत्तिस्तथा शड्खं जत्रुदेशे समाहनत्‌,वीर शंखने रणभूमिमें भूरिश्रवाकी दाहिनी भुजा विदीर्ण कर डाली; फिर भूरिश्रवाने भी शंखके गलेकी हँसलीपर बाण मारा

قال سنجيا: في خِضَمِّ المعركة، طعنَ ذلك البطلُ ذراعَ خصمه اليمنى فشقّها ومزّقها. ثم ضرب سومادتّي (بهوريشرافاس) شانخا عند موضع الترقوة. وتُبرز الآية دقّةَ فنون القتال القاتمة، وتصاعدَ العنف الذي لا يلين والذي تُطلقه الحرب، حيث يُعبَّر عن البأس بإيقاع الأذى بالجسد لا بكبح النفس.

Verse 37

तयोस्तदभवद्‌ युद्ध॑ं घोररूप॑ विशाम्पते । दृप्तयो: समरे पूर्व वृत्रवासवयोरिव,राजन्‌! उस समरभूमिमें इन्द्र और वृत्रासुरकी भाँति उन दोनों अभिमानी वीरोंमें बड़ा भयंकर युद्ध हुआ

قال سنجيا: يا سيّد الرجال، لقد نشبت بين هذين المحاربين المتكبّرين معركةٌ ذات منظرٍ مروّع، كقتالٍ قديمٍ في ساحة الوغى بين إندرا (فاسافا) وفِرترا. وتُبيّن هذه المقارنة كيف يمكن للغرور وللهياج الحربي أن يجعلا مبارزةً بشرية تبدو كصدامٍ كوني، فيعظّم ذلك ثِقل العنف الأخلاقي في الحرب.

Verse 38

बाल्लीकं तु रणे क्रुद्धं क़ुद्धलूपो विशाम्पते । अभ्यद्रवदमेयात्मा धृष्टकेतुर्महारथ:,प्रजानाथ! रणक्षेत्रमें कृपित हुए बाह्नीकपर अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न महारथी धृष्टकेतुने क्रोधपूर्वक आक्रमण किया

قال سنجيا: يا سيّد الرجال، في ساحة القتال اندفع محاربُ العربة العظيم دِهريشتاكيتو—ذو روحٍ لا تُقاس—غاضباً نحو بالليكا، وكان هو أيضاً متّقداً بالسخط. وتُبرز الآية أن الغضب إذا اشتعل في الجانبين دفع المحاربين إلى الهجوم المباشر، فزاد الكلفة الإنسانية والأخلاقية للحرب.

Verse 39

बाह्लीकस्तु रणे राजन्‌ धृष्टकेतुममर्षण: । शरैर्बहुभिरानर्च्छत्‌ सिंहनादमथानदत्‌,राजन! अमर्षशील बाह्लीकने समरांगणमें बहुत-से बाणोंद्वारा धृष्टकेतुको पीड़ा दी और सिंहके समान गर्जना की

قال سانجيا: أيها الملك، في غمرة القتال هاجم باهليكا سريع الغضب دِهْرِشْتَكيتو بوابلٍ من السهام فعذّبه، ثم أطلق زئيرًا كزئير الأسد—ليُعلن سطوته ويُلقي الرهبة في قلب المعمعة بين المحاربين المقيّدين بالدارما.

Verse 40

चेदिराजस्तु संक्रुद्धो बाह्लीकं नवभि: शरै: | विव्याध समरे तूर्ण मत्तो मत्तमिव द्विपम्‌,तब चेदिराज धृष्टकेतुने अत्यन्त क्रुद्ध होकर जैसे मतवाला हाथी किसी मदोन्मत्त गजराजपर हमला करता है, उसी प्रकार तुरंत ही नौ बाण मारकर उस युद्धभूमिमें बाह्नलीकको क्षत-विक्षत कर दिया

عندئذٍ اشتعل ملك تشيدي، دِهْرِشْتَكيتو، غضبًا، فطعن باهليكا في ساحة القتال سريعًا بتسعة سهام—كفيلٍ هائجٍ يهاجم فيلًا هائجًا مثله.

Verse 41

तौ तत्र समरे क्रुद्धौ नर्दन्तौ च पुन: पुनः । समीयतु: सुसंक्रुद्धावड्रारकबुधाविव,उस रणभूमिमें वे दोनों वीर परस्पर कुपित हो रोषमें भरे हुए मंगल और बुधकी भाँति बारंबार गर्जते हुए युद्ध कर रहे थे

وهناك في ساحة القتال كان البطلان، وقد استبدّ بهما الغضب، يزمجران مرارًا وتكرارًا، ويتقاربان للاشتباك مرة بعد مرة—كأنهما أَنْغارَكَة (المريخ) وبُودْهَا (عطارد) في لقاءٍ عدائي.

Verse 42

राक्षसं रौद्रकर्माणं क्रूरकर्मा घटोत्कच: । अलनम्बुषं प्रत्युदियाद्‌ बल॑ं शक्र इवाहवे,जैसे इन्द्रने युद्धमें बल नामक दैत्यपर चढ़ाई की थी, उसी प्रकार क्रूरकर्मा घटोत्कचने भयंकर कर्म करनेवाले अलम्बुष नामक राक्षसपर आक्रमण किया

وكما أن إندرا تقدّم قديمًا في الحرب على العفريت بالا، كذلك اندفع غَطوتكچا—صاحب الأفعال القاسية—لمهاجمة الراکشسا ألانامبوشا، ذي الأعمال الوحشية المرعبة.

Verse 43

घटोत्कचस्तत: क्रुद्धो राक्षसं तं महाबलम्‌ । नवत्या सायकैस्ती&णैर्दारयामास भारत,भरतनन्दन! क्रोधमें भरे हुए घटोत्कचने नब्बे तीखे बाणोंद्वारा उस महाबली राक्षस अलम्बुषको विदीर्ण कर दिया

ثم إن غَطوتكچا، وقد اشتعل غضبًا، مزّق ذلك الراکشسا الجبار بتسعين سهمًا حادًّا، فشقّه إربًا—يا بهاراتا، يا بهجة آل بهاراتا.

Verse 44

अलम्बुषस्तु समरे भैमसेनिं महाबलम्‌ । बहुधा दारयामास शरै: संनतपर्वभि:,तब अलम्बुषने भी महाबली भीमसेनपुत्र घटोत्कचको झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा समरांगणमें बहुत प्रकारसे घायल कर दिया

قال سانجيا: في أتون القتال هاجم ألامبوشا البهيمسينيَّ الجبار—غاتوتكاتشا ابن بهيماسينا—فطعنه وجرحه على وجوه شتى بسهامٍ معقوفة المفاصل.

Verse 45

व्यभ्राजेतां ततस्तौ तु संयुगे शरविक्षतौ । यथा देवासुरे युद्धे बलशक्रौ महाबलौ,जैसे देवासुर-संग्राममें महाबली बलासुर और इन्द्र घायल हो गये थे, उसी प्रकार इस युद्धमें एक-दूसरेके बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अलम्बुष और घटोत्कच अद्भुत शोभा धारण कर रहे थे इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वन्द्ययुद्धे पज्चचत्वारिंशो 5ध्याय: ।। ४५ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वद्ध-युद्धविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال سانجيا: ثم إنّ كليهما—وقد مُزِّقا وجُرحا بالسهام في خضمّ المعركة—أخذا يلمعان لمعانًا عجيبًا، كما لمع الجباران بالا (من الأسورا) وشَكرا (إندرا) حين أُصيبا في حرب الآلهة والشياطين.

Verse 46

शिखण्डी समरे राजन्‌ द्रौणिमभ्युद्ययौ बली । अश्वत्थामा ततः क्रुद्ध/ शिखण्डिनमुपस्थितम्‌,राजन! बलवान्‌ शिखण्डीने रफक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामापर धावा किया। तब अश्वत्थामाने कुपित हो एक तीखे नाराचके द्वारा निकट आये हुए शिखण्डीको अत्यन्त घायल करके कम्पित कर दिया। महाराज! तब शिखण्डीने भी पीले रंगके तेज धारवाले तीखे सायकसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको गहरी चोट पहुँचायी; तदनन्तर वे दोनों अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे

قال سانجيا: أيها الملك، في ساحة القتال تقدّم شيخَنْدي الجسور لملاقاة ابن درونا. فغضب أشفَتّامان وخرج يواجه شيخَنْدي وهو يقترب.

Verse 47

नाराचेन सुतीक्ष्णेन भृशं विद्ध्वा ह्रकम्पयत्‌ । शिखण्ड्यपि ततो राजन द्रोणपुत्रमताडयत्‌,राजन! बलवान्‌ शिखण्डीने रफक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामापर धावा किया। तब अश्वत्थामाने कुपित हो एक तीखे नाराचके द्वारा निकट आये हुए शिखण्डीको अत्यन्त घायल करके कम्पित कर दिया। महाराज! तब शिखण्डीने भी पीले रंगके तेज धारवाले तीखे सायकसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको गहरी चोट पहुँचायी; तदनन्तर वे दोनों अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे

قال سانجيا: بسهمٍ ناراچا حادٍّ كالموسى، طعن أشفَتّامان شيخَنْدين طعنةً عنيفة فأماله وجعله يرتجف. ثم، أيها الملك، ردّ شيخَنْدين الضربة فجرح ابن درونا بسهامٍ قاطعة.

Verse 48

सायकेन सुपीतेन तीक्ष्णेन निशितेन च । तौ जघ्नतुस्तदान्योन्यं शरैर्बहुविधैर्मुधे,राजन! बलवान्‌ शिखण्डीने रफक्षेत्रमें द्रोणपुत्र अश्वत्थामापर धावा किया। तब अश्वत्थामाने कुपित हो एक तीखे नाराचके द्वारा निकट आये हुए शिखण्डीको अत्यन्त घायल करके कम्पित कर दिया। महाराज! तब शिखण्डीने भी पीले रंगके तेज धारवाले तीखे सायकसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको गहरी चोट पहुँचायी; तदनन्तर वे दोनों अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे

قال سانجيا: في تلك المعركة، أيها الملك، أخذ الاثنان يضرب أحدهما الآخر بأنواع كثيرة من السهام—مصقولة الإعداد، حادّة، قاطعة الحواف—في قلب الوغى.

Verse 49

भगदत्तं रणे शूरं विराटो वाहिनीपति: । अभ्ययात्‌ त्वरितो राजंस्ततो युद्धमवर्तत,राजन! संग्रामशूर भगदत्तपर सेनापति विराटने बड़ी उतावलीके साथ आक्रमण किया। फिर तो उन दोनोंमें युद्ध होने लगा

قال سنجيا: أيها الملك، إنَّ فيرَاطا، قائدَ الجموع، اندفع مسرعًا لملاقاة بهاگاداتّا، البطلَ الشجاع في ساحة القتال. فنهضت بينهما معركةٌ؛ إذ التقيا في زحمة الحرب، وكلٌّ منهما عازمٌ على إظهار البأس وسلطان القيادة وفق واجب الكشترية.

Verse 50

विराटो भगदत्तं तु शरवर्षेण भारत । अभ्यवर्षत्‌ सुसंक्रुद्धो मेघो वृष्ट्या इवाचलम्‌,भारत! विराटने अत्यन्त कुपित होकर भगदत्तपर अपने बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो मेघ पर्वतपर जलकी बूँदें बरसा रहा हो

قال سنجيا: يا بهاراتا، إنَّ فيرَاطا وقد اشتعل غضبُه أمطر بهاگاداتّا وابلًا من السهام، كالسحاب يسكب مطره على جبل. فالغضب حاضر، غير أنّه يتجلّى في فعلٍ قتاليٍّ منضبط، إذ يمضي المحاربون في أداء واجبهم في الحرب.

Verse 51

भगदत्तस्ततस्तूर्ण विराट पृथिवीपतिम्‌ । छादयामास समरे मेघ: सूर्यमिवोदितम्‌,तब जैसे बादल उगे हुए सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार भगदत्तने समरभूमिमें बाणोंकी वर्षद्वारा पृथ्वीपति विराटको आच्छादित कर दिया

قال سنجيا: ثم إنَّ بهاگاداتّا أسرع فغطّى الملكَ فيرَاطا في ساحة القتال بوابلٍ كثيف من السهام، كما يحجب السحابُ الشمسَ عند طلوعها. وتُبرز الصورة كيف يمكن لبأس الحرب أن يكسف لحظةً حتى ملكًا مشهورًا، إذ قد تُحجب الحظوظ والرؤية فجأةً.

Verse 52

बृहत्क्षत्रं तु कैकेयं कृप: शारद्वतो ययौ । त॑ं कृप: शरवर्षेण छादयामास भारत

قال سنجيا: ثم تقدّم كِرْپا، ابنُ شارَدْوَت، لملاقاة بْرِهَتْكْشَتْرا، المحاربِ الجسور من قوم الكايكَيَة. يا بهاراتا، فغطّاه كِرْپا بوابلٍ من السهام—صورةً لمهارةٍ قتاليةٍ منضبطة تُساق إلى واجب الحرب الكالح.

Verse 53

गौतम॑ं कैकय: क्रुद्धः शरवृष्ट्या भ्यपूरयत्‌ । भरतनन्दन! केकयराज बृहत्क्षत्रपर शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यने आक्रमण किया और अपने बाणोंकी वर्षद्वारा उन्हें ढक दिया। तब केकयराजने भी क्ुद्ध होकर अपने सायकोंकी वर्षासे कृपाचार्यको आच्छादित कर दिया || ५२ ह || तावन्योन्यं हयान्‌ हत्वा धनुश्छित्त्वा च भारत,भारत! वे दोनों वीर एक-दूसरेके घोड़ोंको मार धनुषके टुकड़े करके रथहीन हो अमर्षमें भरकर खड्गद्वारा युद्ध करनेके लिये आमने-सामने खड़े हुए। फिर तो उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर एवं दारुण युद्ध होने लगा

قال سنجيا: وقد استبدّ الغضبُ بملك الكايكَيَة، فأغرق غوتَما (كِرْپا) بوابلٍ كثيف من السهام. وفي لهيب المعركة، يجيب الغضبُ الغضبَ: يتصاعد اللقاء بتبادل الرمي، كاشفًا كيف تُسرّع الحميّة في ساحة الحرب وتيرة العنف وتدفع إلى انتقامٍ أشدّ فأشدّ.

Verse 54

विरथावसियुद्धाय समीयतुरमर्षणौ । तयोस्तदभवद्‌ युद्ध घोररूपं सुदारुणम्‌,भारत! वे दोनों वीर एक-दूसरेके घोड़ोंको मार धनुषके टुकड़े करके रथहीन हो अमर्षमें भरकर खड्गद्वारा युद्ध करनेके लिये आमने-सामने खड़े हुए। फिर तो उन दोनोंमें अत्यन्त भयंकर एवं दारुण युद्ध होने लगा

تقدّم البطلان إلى القتال وقد امتلآ غيظًا لا يُحتمل. فقتل كلٌّ منهما خيلَ صاحبه، وكسّرا القسيَّ حتى صارت قطعًا، فغدوا بلا مركبات. ثم، وقد استبدّ بهما السخط، وقفا متقابلين ليقتتلا بالسيوف. عندئذٍ، يا بهاراتا، نشبت بينهما معركةٌ رهيبة الصورة، بالغة الشدة والقسوة.

Verse 55

द्रुपदस्तु ततो राजन्‌ सैन्धवं वै जयद्रथम्‌ । अभ्युद्ययौ हृष्टरूपो हृष्टरूपं परंतप:,राजन! दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले ट्रुपदने बड़े हर्षके साथ सिन्धुराज जयद्रथपर धावा किया। जयद्रथ भी बहुत प्रसन्न था

قال سنجيا: ثم، أيها الملك، اندفع دروبادا—مُلهِبُ الأعداء—بفرحٍ عظيم نحو جايادراثا، ملك السِّندهو. وكان جايادراثا هو أيضًا مبتهجًا، فاستقبله بالروح الواثقة نفسها.

Verse 56

ततः सैन्धवको राजा द्रुपदं॑ विशिखैस्त्रिभि: । ताडयामास समरे स च त॑ प्रत्यविध्यत,तत्पश्चात्‌ सिन्धुराज जयद्रथने समरांगणमें तीन बाणोंद्वारा द्रपदको गहरी चोट पहुँचायी। ट्रुपदने भी बदलेमें उसे बींध डाला

قال سنجيا: ثم إن ملك السِّندهو، جايادراثا، ضرب دروبادا في ساحة القتال بثلاثة سهامٍ حادّة. فطعنه دروبادا بدوره ردًّا عليه.

Verse 57

तयोस्तदभवद्‌ युद्ध घोररूपं सुदारुणम्‌ । ईक्षणप्रीतिजननं शुक्राड्रारकयोरिव,उन दोनोंका वह घोर एवं अत्यन्त भयंकर युद्ध शुक्र और मंगलके संघर्षकी भाँति नेत्रोंके लिये हर्ष उत्पन्न करनेवाला था

قال سنجيا: واشتعل بينهما قتالٌ رهيب الصورة، بالغ القسوة؛ ومع ذلك، كتصادم الزهرة والمريخ، كان منظرًا يبهج العيون.

Verse 58

विकर्णस्तु सुतस्तुभ्यं सुतसोम॑ महाबलम्‌ । अभ्ययाज्जवनैरश्वैस्ततो युद्धमवर्तत,आपके पुत्र विकर्णने तेज चलनेवाले घोड़ोंद्वारा महाबली सुतसोमपर धावा किया। तत्पश्चात्‌ उनमें भारी युद्ध होने लगा

قال سنجيا: إن ابنك فيكارنا، على خيلٍ سريعة، اندفع نحو سوتاسُوما العظيم القوة. ثم دارت بينهما معركةٌ عنيفة.

Verse 59

विकर्ण: सुतसोम॑ तु विद्ध्वा नाकम्पयच्छरै: । सुतसोमो विकर्ण च तदद्भुतमिवाभवत्‌,विकर्ण अपने बाणोंसे सुतरोमको घायल करके भी उन्हें कम्पित न कर सका। इसी प्रकार सुतसोम भी विकर्णको विचलित न कर सके। उन दोनोंका यह पराक्रम अद्भुत-सा प्रतीत हुआ

قال سانجيا: مع أن فيكارنا أصاب سوتاسوما بسهامه، لم يستطع أن يجعله يتزعزع. وكذلك لم يقدر سوتاسوما أن يهزّ فيكارنا. إن ثبات بأسهما، وكلٌّ منهما لا يلين تحت الضرب، بدا حقًّا عجيبًا.

Verse 60

सुशर्माणं नरव्याप्रश्नेकितानो महारथ: । अभ्यद्रवत्‌ सुसंक्रुद्ध: पाण्डवार्थे पराक्रमी,नरश्रेष्ठ पराक्रमी महारथी चेकितानने पाण्डवोंके लिये अत्यन्त कुपित होकर सुशर्मापर धावा किया

قال سانجيا: إن تشيكيتانا، ذلك المقاتل العظيم على العربة، نمرُ الرجال، وقد استبدّ به الغضب نصرةً للپاندڤا، اندفع مباشرةً نحو سوشارما.

Verse 61

सुशर्मा तु महाराज चेकितानं महारथम्‌ | महता शरवर्षेण वारयामास संयुगे,महाराज! सुशर्माने भारी बाण-वर्षाके द्वारा महारथी चेकितानको युद्धमें आगे बढ़नेसे रोक दिया

قال سانجيا: أيها الملك، إن سوشارما كبح تشيكيتانا، فارس العربة العظيم، في ساحة القتال، إذ أمطره بوابلٍ كثيف من السهام فحبسه عن التقدّم في المعمعة.

Verse 62

चेकितानो<पि संरब्ध: सुशर्माणं महाहवे | प्राच्छादयत्‌ तमिषुभिर्महामेघ इवाचलम्‌,तब चेकितानने भी रोषमें भरकर उस महायुद्धमें अपने बाणोंकी वर्षासे सुशर्माको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे महामेघ जलकी वर्षासे पर्वतको आच्छादित कर देता है

قال سانجيا: وكذلك تشيكيتانا، وقد اشتعل غضبًا، في تلك المعركة العظمى غطّى سوشارما بزخّاتٍ كثيفة من السهام، كما يحجب السحاب الماطر الجبلَ بسيل مطره.

Verse 63

शकुनि: प्रतिविन्ध्यं तु पराक्रान्तं पराक्रमी । अभ्यद्रवत राजेन्द्र मत्त: सिंह इव द्विपम्‌,राजेन्द्र! पराक्रमी शकुनि पराक्रमसम्पन्न प्रतिविन्ध्यपर चढ़ आया, ठीक उसी तरह जैसे मतवाला सिंह किसी हाथीपर आक्रमण करता है

قال سانجيا: أيها الملك، إن شكوني الشجاع، لما رأى براتيفينديا يتقدّم بقوة، اندفع إليه اندفاعًا مباشرًا، كأن أسدًا ثملًا بالبطش يهجم على فيل.

Verse 64

यौधिष्ठिरस्तु संक्रुद्ध: सौबलं निशितै: शरै: । व्यदारयत संग्रामे मघवानिव दानवम्‌,जिस प्रकार इन्द्र संग्रामभूमिमें किसी दानवको विदीर्ण करते हैं, उसी प्रकार युधिष्ठिरके पुत्र प्रतिविन्ध्यने अत्यन्त कुपित होकर सुबलपुत्र शकुनिको अपने तीखे बाणोंसे बेध डाला

قال سانجيا: في غمرة القتال، وقد استبدّ به الغضب، مزّق ابنُ يودهيشثيرا ساوبالا (شكوني) بسهامٍ حادّة، كما يمزّق ماغهافان (إندرا) دانافًا في ساحة الحرب.

Verse 65

शकुनि: प्रतिविन्ध्यं तु प्रतिविध्यन्तमाहवे । व्यदारयन्महाप्राज्ञ: शरै: संनतपर्वभि:,युद्धमें अपनेको बेधनेवाले प्रतिविन्ध्यको भी परम बुद्धिमान्‌ शकुनिने झुके हुए गाँठवाले बाणोंसे घायल कर दिया

قال سانجيا: في غمرة القتال، حين كان براتيفيندْهيا يطعن فيه، ردّ شكوني، وهو بالغ الدهاء، فثقب ومزّق براتيفيندْهيا بسهامٍ ذات عُقَدٍ منحنية.

Verse 66

सुदक्षिणं तु राजेन्द्र काम्बोजानां महारथम्‌ | श्रुतकर्मा पराक्रान्तमभ्यद्रवत संयुगे,राजेन्द्र! काम्बोजदेशके राजा पराक्रमी महारथी सुदक्षिणपर रणभूमिमें श्रुतकर्माने आक्रमण किया

قال سانجيا: أيها الملك، في غمرة القتال اندفع شروتاكارما اندفاعًا مباشرًا نحو سودكشينا، ذلك المحارب العظيم على العربة من قوم كامبوجا.

Verse 67

सुदक्षिणस्तु समरे साहदेविं महारथम्‌ | विद्ध्वा नाकम्पयत वै मैनाकमिव पर्वतम्‌,तब सुदक्षिणने समरांगणमें सहदेवपुत्र महारथी श्रुतकर्माको क्षत-विक्षत कर दिया; तो भी वह उन्हें कम्पित न कर सका। वे मैनाक पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे

قال سانجيا: في غمرة القتال أصاب سودكشينا شروتاكارمان، المحارب العظيم على العربة، ابنَ سهاديفا، إصابةً موجعة؛ لكنه لم يستطع أن يزعزعه. فثبت ثابتًا كجبل مايناكا لا يتزحزح.

Verse 68

श्रुतकर्मा ततः क्रुद्ध: काम्बोजानां महारथम्‌ | शरैरबहुभिरानर्च्छदू दारयन्निव सर्वश:,तदनन्तर श्रुतकर्माने कुपित होकर महारथी काम्बोजराजको सब ओरसे विदीर्ण-सा करते हुए अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा भलीभाँति पीड़ित किया

قال سانجيا: ثم إن شروتاكارما، وقد اشتعل غضبًا، أمطر محاربَ كامبوجا العظيم على العربة بوابلٍ من السهام الكثيرة، كأنه يمزّقه من كل جانب.

Verse 69

इरावानथ संक्ुद्धः श्रुतायुषमरिंदमम्‌ । प्रत्युद्ययौ रणे यत्तो यत्तरूपं परंतप:,दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले यत्नशील इरावानने युद्धमें कुपित होकर शत्रुदमन श्रुतायुषपर धावा किया। श्रुतायुष भी प्रयत्नपूर्वक उनका सामना कर रहा था

قال سنجيا: عندئذٍ اندفع إيرافان، وقد اشتعل غضبًا وعزم على القتال، في ساحة المعركة مهاجمًا شروتايوس، قاهر الأعداء. ذلك المُحرق لخصومه تقدّم بعزيمة لا تلين، وشروتايوس أيضًا جاهد ليلقاه وجهًا لوجه—وكلاهما يضغط إلى الأمام في واجب الحرب العنيف.

Verse 70

आर्जुनिस्तस्य समरे हयान्‌ हत्वा महारथ: । ननाद बलवन्नादं तत्‌ सैन्यं प्रत्यपूरयत्‌,अर्जुनके उस महारथी पुत्र इरावानने रणक्षेत्रमें श्रुतायुषके घोड़ोंको मारकर बड़े जोरसे गर्जना की और उसकी सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर दिया

قال سنجيا: في تلك المعركة، قتل آرجوني (إيرافان)، المحارب العظيم على العربة، خيول خصمه، ثم أطلق زئيرًا هائلًا ملأ به جيش العدو. وبوابل من السهام غطّى صفوفهم.

Verse 71

श्रुतायुस्तु ततः क्रुद्ध: फाल्गुने: समरे हयान्‌ । निजघान गदाग्रेण ततो युद्धमवर्तत,यह देख श्रुतायुषने भी रुष्ट होकर रणभूमिमें अर्जुनपुत्र इरावानके घोड़ोंको अपनी गदाकी चोटसे मार डाला। तत्पश्चात्‌ उन दोनोंमें खूब जमकर युद्ध होने लगा

قال سنجيا: ثم إن شروتايوس، وقد استبدّ به الغضب، ضرب في المعركة خيول فالغوني (إيرافان) بضربة من رأس هراوته فصرعها. وبعد ذلك نشب بينهما قتالٌ عنيفٌ متلاحم.

Verse 72

विन्दानुविन्दावावन्त्यौ कुन्तिभोजं महारथम्‌ । ससेन॑ ससुतं वीर॑ संससज्जतुराहवे,अवन्तिदेशके राजकुमार विन्द और अनुविन्दने सेना और पुत्रसहित वीर महारथी कुन्तिभोजके साथ युद्ध आरम्भ किया

قال سنجيا: إن فيندا وأنوفيندا، أميري أفنتي، اشتبكا في القتال مع كونتيبوجا، المحارب العظيم البطل على العربة، وقد جاء ومعه جيشه وابنه.

Verse 73

तत्राद्भुतमपश्याम तयोघघोरें पराक्रमम्‌ । अयुध्येतां स्थिरौ भूत्वा महत्या सेनया सह,वहाँ मैंने उन दोनोंका अदभुत और भयंकर पराक्रम देखा। वे दोनों ही अपनी विशाल वाहिनीके साथ स्थिरतापूर्वक खड़े होकर एक-दूसरेका सामना कर रहे थे

قال سنجيا: هناك رأيت بأسًا عجيبًا ولكنه مهيبٌ مخيف لدى هذين الاثنين. وقفا ثابتين، كلٌّ منهما ومعه جيشٌ عظيم، يتواجهان في القتال—لا يتزعزعان، كأن ثِقَل جموعهما قد صار عزيمتهما.

Verse 74

अनुविन्दस्तु गदया कुन्तिभोजमताडयत्‌ | कुन्तिभोजश्न तं॑ तूर्ण शरब्रातैरवाकिरत्‌,अनुविन्दने कुन्तिभोजपर गदासे आघात किया। तब कुन्तिभोजने भी तुरंत ही अपने बाणसमूहोंद्वारा उसे आच्छादित कर दिया

قال سانجيا: ضرب أنوفيندا كونتيبوجا بهراوته. غير أن كونتيبوجا أجابه على الفور، فأمطره بوابلٍ من السهام حتى غطّاه من كل جانب.

Verse 75

कुन्तिभोजसुतश्चापि विन्दं विव्याध सायकै: । सचतं प्रतिविव्याध तदद्भुतमिवाभवत्‌,साथ ही कुन्तिभोजके पुत्रने विन्दको भी अपने सायकोंसे घायल कर दिया। विन्दने भी बदलेमें कुन्तिभोजपुत्रको क्षत-विक्षत कर दिया। वह अद्भुत-सी घटना हुई

قال سانجيا: إن ابن كونتيبوجا طعن فيندا بسهامه. فبادر فيندا إلى الردّ، فأصابه بجراحٍ بالغة. وكان ذلك التبادل الخاطف للضربات كأنه أمرٌ عجيب وسط ضراوة القتال.

Verse 76

केकया भ्रातर: पञ्च गान्धारान्‌ पञठ्च मारिष | ससैन्यास्ते ससैन्यांश्ष॒ योधयामासुराहवे,राजन! पाँच भाई केकयराजकुमारोंने सेनासहित आकर युद्धमें अपनी विशाल वाहिनीके साथ खड़े हुए गान्धारदेशीय पाँच वीरोंके साथ युद्ध आरम्भ किया

قال سانجيا: أيها الملك، إن إخوة كيكيا الخمسة قدموا بجيوشهم فاشتَبكوا في القتال مع أبطال غاندھارا الخمسة الذين اصطفّوا هم أيضًا مع قواتهم. وهكذا، ومع الجيوش على الجانبين، اندلع الصدام في أتون الحرب العظمى.

Verse 77

वीरबाहुश् ते पुत्रो वैराटिं रथसत्तमम्‌ | उत्तरं योधयामास विव्याध निशितै: शरै:

قال سانجيا: إن ابنك فيراباهو اشتبك مع أوتّارا، فارس العربة الممتاز من سلالة فيرَاطا، وأصابه بسهامٍ حادّة.

Verse 78

चेदिराट्‌ समरे राजन्नुलूकं समभिद्रवत्‌,राजन! चेदिराजने समरांगणमें उलूकपर धावा किया और उसे अपने बाणोंकी वर्षासे बींध डाला। वैसे ही उलूकने भी पंखयुक्त तीखे बाणोंद्वारा चेदिराजको गहरी चोट पहुँचायी

قال سانجيا: أيها الملك، في خضمّ المعركة اندفع ملك تشيدي مباشرة نحو أولوكا وطعنه بوابلٍ من السهام. فأولوكا بدوره ردّ بسهامٍ حادّةٍ مُريَّشة، فأحدث جرحًا غائرًا في ملك تشيدي.

Verse 79

तथैव शरवर्षेण उलूकं॑ समविद्धयत । उलूकश्चापि त॑ं बाणैर्निशितैलोमवाहिभि:,राजन! चेदिराजने समरांगणमें उलूकपर धावा किया और उसे अपने बाणोंकी वर्षासे बींध डाला। वैसे ही उलूकने भी पंखयुक्त तीखे बाणोंद्वारा चेदिराजको गहरी चोट पहुँचायी

قال سنجيا: وعلى النحو نفسه أمطرَ ملكُ تشيدي أولوكا بوابلٍ من السهام. وأولوكا أيضًا، أيها الملك، قابل ذلك بأن طعنه بسهامٍ حادّةٍ مُريَّشة. وهكذا في ساحة القتال لاقى كلٌّ منهما هجومَ الآخر بعزمٍ مماثل؛ ففي الحرب يجيب البأسُ بالثأر سريعًا، بينما تظلّ الكلفةُ الأخلاقيةُ لهذا الجرح المتبادل تتراكم.

Verse 80

तयोरयुद्धं समभवद्‌ घोररूपं विशाम्पते । दारयेतां सुसंक्रुद्धावन्योन्यमपराजितौ,प्रजानाथ! फिर उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होने लगा। किसीसे पराजित न होनेवाले वे दोनों वीर अत्यन्त कुपित होकर एक दूसरेको विदीर्ण किये देते थे

قال سنجيا: يا سيدَ الرعية، لقد نشبت بينهما معركةٌ ذاتُ منظرٍ مروّع. لم يُقهَرْ واحدٌ منهما قطّ على يدِ أحد، وقد اشتعلا بغضبٍ عارم، فأخذا يمزّق أحدُهما الآخر—كلٌّ يسعى إلى كسر خصمه—حتى تضخّمت وحشيةُ الحرب بلا كابح.

Verse 81

एवं द्वन्दडसहस्राणि रथवारणवाजिनाम्‌ । पदातीनां च समरे तव तेषां च संकुले,इस प्रकार उस घमासान युद्धमें आपके और पाण्डवपक्षके रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैन्यके सहसोरों योद्धाओंमें द्वन्ध-युद्ध चल रहा था

قال سنجيا: وهكذا، في ذلك الميدان المكتظّ بالاضطراب—حيث اختلطت جموعُكم بجموعِهم—كانت تُخاض آلافٌ مؤلّفة من المبارزات الفردية بين مقاتلي العربات، وراكبي الفيلة، والفرسان، والمشاة. إن المشهد يُجسّد الفوضى الأخلاقية للحرب: فعندما تتصادم الجيوش يُمتحَن بأسُ الفرد وواجبه الخاص (svadharma) وسطَ اضطرابٍ طاغٍ ودمارٍ متبادل.

Verse 82

मुहूर्तमिव तद्‌ युद्धमासीन्मधुरदर्शनम्‌ | तत उन्मत्तवद्‌ राजन न प्राज्ञायत किंचन,महाराज! दो घड़ीतक तो वह युद्ध देखनेमें बड़ा मनोरम प्रतीत हुआ; फिर उन्मत्तकी भाँति विकट युद्ध चलने लगा। उस समय किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता था

قال سنجيا: «لبرهةٍ وجيزة بدا ذلك القتال كأنه حسنُ المنظر؛ ثم ما لبث، أيها الملك، أن اندفع إلى هياجٍ مروّع كجنونٍ مطبق. وفي تلك الساعة لم يستطع أحدٌ أن يميّز شيئًا بوضوح.»

Verse 83

गजो गजेन समरे रथिनं च रथी ययौ । अश्वो5श्व॑ं समभिप्रायात्‌ पदातिश्न॒ पदातिनम्‌,उस समरभूमिमें हाथी हाथीके साथ भिड़ गया, रथीने रथीपर आक्रमण किया, घुड़सवार घुड़सवारपर चढ़ आया और पैदलने पैदलके साथ युद्ध किया

قال سنجيا: في صدمة القتال التقى الفيلُ بالفيل؛ واندفع مقاتلُ العربة على مقاتلِ العربة؛ وهاجم الفارسُ الفارس؛ واشتبك الراجلُ مع الراجل. وهكذا انحدرت المعركة إلى مواجهاتٍ متكافئة، يطلب فيها كلُّ مقاتلٍ نِدًّا يماثله في زحمة الحرب.

Verse 84

ततो युद्ध सुदुर्धर्ष व्याकुलं समपद्यत । शूराणां समरे तत्र समासाद्येतरेतरम्‌,कुछ ही देरमें उस रणक्षेत्रके भीतर शूरवीर सैनिकोंका एक-दूसरेसे भिड़कर अत्यन्त दुर्धर्ष एवं घमासान युद्ध होने लगा

قال سنجيا: ثم في ذلك الميدان، لما تقارب الأبطال واصطدم بعضهم ببعض، انقلب القتال سريعًا إلى ملحمةٍ مضطربةٍ عاتيةٍ عسيرةِ الدفع—صدامٍ شديدٍ لا يُحتمل، وُلد من التحامهم المتبادل في الحرب.

Verse 85

तत्र देवर्षय: सिद्धाश्चारणाश्न समागता: । प्रैक्षनत तद्‌ रणं घोरं देवासुरसमं भुवि,वहाँ आये हुए देवर्षियों, सिद्धों तथा चारणोंने भूतलपर होनेवाले उस युद्धको देवासुर- संग्रामके समान भयंकर देखा

قال سنجيا: هناك اجتمع الرِّشِيّون الإلهيون، والسِّدْهَة، والشارَنَة، وشاهدوا على وجه الأرض تلك المعركة الرهيبة—مخيفة كحربٍ قديمةٍ بين الآلهة والآسورا.

Verse 86

ततो दन्तिसहस्राणि रथानां चापि मारिष | अश्वौघा: पुरुषौघाश्व विपरीतं समाययु:,आर्य! तदनन्तर हजारों हाथी, रथ, घुड़सवार और पैदल सैनिक द्वन्द-युद्धके पूर्वोक्त क्रमका उल्लंघन करके सभी सबके साथ युद्ध करने लगे

قال سنجيا: ثم، أيها الجليل، اندفعت آلاف الفيلة والعربات، ومعها جموع الفرسان وجموع المشاة، وقد نبذوا نظام المبارزات الفردية السابق، فاختلطوا اندفاعًا في فوضى معكوسة—حتى صار الجميع يقاتل الجميع.

Verse 87

तत्र तत्र प्रदृश्यन्ते रथवारणपत्तय: । सादिनश्न नरव्याप्र युध्यमाना मुहुर्मुहु:,नरश्रेष्ठ) जहाँ-जहाँ दृष्टि जाती, वहीं रथ, हाथी, घुड़सवार और पैदल सैनिक बारंबार युद्ध करते दिखायी देते थे

قال سنجيا: «حيثما اتجه البصر، شوهدت العربات والفيلة والفرسان والمشاة—رجالٌ أبطال—يتشابكون في القتال مرة بعد مرة.»

Verse 126

आनर्च्छतु: शरैघेरिस्तक्षमाणौ परस्परम्‌ | उन दोनोंमें बड़ा भयंकर रोमांचकारी युद्ध हुआ। सात्यकिने कृतवर्माको और कृतवर्मनि सात्यकिको भयंकर बाणोंसे घायल करते हुए एक-दूसरेको बड़ी पीड़ा पहुँचायी

قال سنجيا: ثم إن ساتياكي وكريتافَرمان، وقد تناوشا بأسهمٍ مروِّعة، يجرح كلٌّ منهما الآخر تِباعًا، خاضا قتالًا شديدًا مُثيرًا للرهبة، وأوقع كلٌّ منهما بالآخر ألمًا عظيمًا.

Verse 136

वसन्ते पुष्पशबलौ पुष्पिताविव किंशुकौ । वे दोनों महाबली वीर सर्वांगमें बाणोंसे छिदे होनेके कारण वसन्त-ऋतुमें खिले हुए दो पुष्पयुक्त पलाश वृक्षोंके समान शोभा पा रहे थे

قال سنجيا: في فصل الربيع، بدا هذان البطلان الجباران—وقد خُرِّقا بالسهام في سائر الجسد—متألقين كأنهما شجرتا كِمْشُكا (بالاشا) في تمام الإزهار، مرقَّطتين بالأزهار.

Verse 176

अन्योन्यं च शरै: क्रुद्धों ततक्षाते परस्परम्‌ | तत्पश्चात्‌ शत्रुमर्दन अभिमन्युने अन्य दो तीखे बाणोंसे बृहद्बलके ध्वजको काट डाला, फिर एक बाणसे उनके पृष्ठरक्षकको और दूसरेसे सारथिको मार डाला। फिर वे दोनों अत्यन्त कुपित हो तीखे सायकोंद्वारा एक-दूसरेको बेधने लगे

وتغاضبا كلاهما، فأخذا يجرح أحدهما الآخر بالسهام، يطعن كلٌّ منهما صاحبه. ثم إن أبهيمانيو—قاهر الأعداء—قطع براهمدبالا رايته بسهمين حادّين؛ ثم بسهمٍ قتل حارس ظهره، وبآخر قتل سائقه. وبعد ذلك اشتد غضبهما، فأخذا يتبادلان الطعن بسهامٍ قاطعة.

Verse 186

भीमसेनस्तव सुतं दुर्योधनमयोधयत्‌ । युद्धमें अभिमान प्रकट करनेवाले, घमंडी और पहलेके वैरी आपके महारथी पुत्र दुर्योधनसे भीमसेन युद्ध करने लगे

قال سنجيا: إن بهيماسينا نازل ابنك دوريوذانا في القتال. وفي غمار المعركة واجه بهيما دوريوذانا—المتكبّر المتباهي، العدوّ القديم—مواجهةً مباشرة، إذ دفعت الخصومة والغرور إلى اصطدام هذين الفارسين العظيمين.

Verse 196

अन्योन्यं शरवर्षाभ्यां ववृषाते रणाजिरे । वे दोनों नरश्रेष्ठ महाबली वीर कुरुकुलके प्रधान व्यक्ति थे। उन्होंने समरांगणमें एक- दूसरेपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

قال سنجيا: في ساحة القتال أمطر المحاربان أحدهما الآخر بوابلٍ من السهام. وكانا من أسبق أبطال آل كورو، شديدَي البأس عظيمَي الشأن، فانكشف لقاؤهما عن منازلةٍ مباشرة في فنون الحرب ضمن ذلك القتال المحتوم.

Verse 216

अविध्यन्निशितैर्बाणर्बहुभिमर्म भेदिभि: । दुःशासनने आगे बढ़कर मर्मस्थानोंको विदीर्ण करनेवाले अपने बहुसंख्यक तीखे बाणोंद्वारा महाबली नकुलको घायल कर दिया

قال سنجيا: تقدّم دوحشاسانا إلى الأمام، فأصاب ناكولا الجبار بكثرةٍ من السهام الحادّة، تخترق المَرامِن—مواضع الجسد الحيوية—وتمزّق مكامن الضعف.

Verse 316

त्रिधा चिच्छेद समरे पाञ्चाल्यस्य तु कार्मुकम्‌ भरतनन्दन! एक ओरसे धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया। तब द्रोणने अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धमें दूसरोंके मारनेके साधनभूत धृष्टद्युम्नके सुदृढ़ धनुषके तीन टुकड़े कर डाले

قال سنجيا: في غمرة القتال، يا بهجة آل بهاراتا، قطع درونا قوس أمير بانشالا إلى ثلاث قطع. إذ إن دريشتاديومنا كان قد شنّ هجوماً مباشراً على دروناآتشاريّا؛ فاستشاط درونا غضباً، وحطّم قوس دريشتاديومنا المتين—وهو أداة كان يمكن أن يُقتل بها كثيرون—فكبح اندفاعه وأثبت سطوته في ساحة الحرب.

Verse 326

प्रेषयामास समरे सो5स्य काये न्‍न्यमज्जत । तदनन्तर उस रणक्षेत्रमें उन्होंने द्वितीय कालदण्डके समान अत्यन्त भयंकर बाण चलाया। वह बाण धूृष्टद्युम्नके शरीरमें धँस गया

قال سنجيا: في غمرة القتال أطلق سهماً فغاص في جسده. ثم ما لبث في ساحة المعركة أن رمى بسهم بالغ الهول، كأنه العصا الثانية للموت نفسه. فاخترق ذلك السهم جسد دريشتاديومنا واستقر فيه، فزاد زخم الحرب قتامةً ووحشة.

Verse 776

उत्तरश्षापि तं वीर विव्याध निशितै: शरै: । आपके पुत्र वीरबाहुने विराटके पुत्र श्रेष्ठ रथी उत्तरके साथ युद्ध किया और उसे तीखे बाणोंद्वारा घायल कर दिया। उत्तरने भी वीरबाहुको अपने तीक्ष्ण सायकोंका लक्ष्य बनाकर बेध डाला

قال سنجيا: وأصاب أُتَّرا ذلك البطل أيضاً بسهام حادّة. وفي صدام فرسان المركبات، كان كلٌّ منهما يسعى إلى كبح تقدّم الآخر بسهام دقيقة نافذة—صورةٌ للتبادُل الذي لا يلين في ساحة القتال، حيث تُقاس الشجاعة بضبط النفس، وحسن التصويب، والثبات وسط العنف.

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra juxtaposes fate (diṣṭa) and human effort (pauruṣa) while questioning why overwhelming martial authority (Bhīṣma, Droṇa) does not yield immediate results—an implicit inquiry into whether outcomes are governed by moral order, competence, or inevitability.

The chapter models that battlefield effectiveness depends on systems and support (chariot-team integrity, allies, reinforcements) rather than isolated heroism; resilience includes rapid adaptation across weapons and roles when primary capacities are neutralized.

No formal phalaśruti is stated in the provided passage; the meta-commentary functions implicitly through Sañjaya’s framing that the conflict’s severity exceeds ordinary measures and through the narrative demonstration of constrained agency under dharma and circumstance.