
भीष्मपर्व — अध्याय ११०: पार्थभीमयोः प्रहारः तथा भीष्माभिमुखं संग्रामविस्तारः (Arjuna and Bhima’s pressure; escalation toward Bhishma)
Upa-parva: Kurukṣetra-yuddha Vṛttānta (Day-by-day war reportage under Bhīṣma’s command)
Saṃjaya reports that Arjuna, in a high-intensity chariot engagement, suppresses Śalya and other leading Kaurava fighters with disciplined volleys, striking Suśarmā, Kṛpa, Jayadratha, and additional mahārathas in rapid sequence. Jayadratha counters by wounding Bhīma while positioned with Citraseṇa, and multiple Kaurava princes coordinate arrow attacks on both Arjuna and Bhīma. The two Kunteyas maintain battlefield superiority, cutting bows and weapons, producing a visible collapse of chariots, horses, elephants, and foot-soldiers; the terrain becomes strewn with broken insignia and armor, emphasizing the scale of attrition. Observing the momentum shift, Kaurava leaders converge: Kṛpa, Kṛtavarmā, Jayadratha, and the Avanti princes enter the engagement; Droṇa and a Māgadha ally move in by Duryodhana’s order. Bhīma exchanges concentrated strikes with Jayatsena and then with Droṇa, showing reciprocal elite combat within a larger formation battle. As pressure mounts, Bhīṣma, the king, Śakuni (Saubala), and Bṛhadbala advance toward Arjuna and Bhīma; the Pāṇḍava side responds by driving toward Bhīṣma with Dhṛṣṭadyumna urging the troops, and Śikhaṇḍin is placed at the front. The chapter culminates in the war’s widening convergence upon Bhīṣma, framed as a decisive “wager” of victory or defeat for the Kauravas, with Bhīṣma receiving the oncoming army like an ocean meeting a shoreline.
Chapter Arc: नवम युद्ध-दिवस की संध्या उतरती है; युधिष्ठिर देखते हैं कि भीष्म के बाणों से पीड़ित पाण्डव-सेना अस्त्र त्यागकर भयाक्रान्त हो पीछे हट रही है। → सेना के पलायन और भीष्म के अजेय प्रहार से युधिष्ठिर का धैर्य टूटता है। वे प्रतिज्ञा करते हैं कि यदि अर्जुन पितामह को नहीं मारेंगे तो वे स्वयं भीष्म को रण में ललकारकर वध करेंगे—धार्तराष्ट्रों के देखते-देखते। कृष्ण को वे स्मरण कराते हैं कि भीष्म ही उनके राज्य-स्थापक और नीति-मार्गदर्शक रहे हैं, अतः अब उन्हीं से ‘वधोपाय’ पूछना/करना भी धर्मसंगत मार्ग है। → अर्जुन का अंतर्द्वंद्व फूट पड़ता है—‘सनातन धर्म जानकर मैं कैसे वृद्ध, शस्त्र-त्यागी पितामह पर प्रहार करूँ?’ भीष्म की ओर से भी चुनौती-सी प्रतिध्वनित होती है: ‘इस अवसर का लाभ लेकर अर्जुन मुझे चारों ओर से शीघ्र बाणों से घेरकर मारें।’ दोनों पक्षों में गुरु-शिष्य, पितामह-पौत्र का धर्म-संकट युद्ध-नीति से बड़ा हो उठता है। → कृष्ण की उपस्थिति निर्णायक धुरी बनती है—भीष्म स्वयं स्वीकारते हैं कि कृष्ण या धनंजय के अतिरिक्त कोई उन्हें रण में वैसा नहीं देखता/झेलता। अध्याय का निष्कर्ष किसी मृत्यु में नहीं, बल्कि इस सत्य में है कि भीष्म-वध का मार्ग केवल शौर्य नहीं, नीति और धर्म-व्याख्या की कसौटी है; अर्जुन को ‘कैसे लड़ूँ’ का उत्तर अभी पाना है। → युधिष्ठिर की प्रतिज्ञा और अर्जुन की धर्म-झिझक के बीच अगला प्रश्न लटकता है—क्या कृष्ण अर्जुन को ऐसा उपाय देंगे जिससे भीष्म पर विजय भी हो और धर्म-भंग भी न लगे?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ इ “लोक मिलाकर कुल ८९ ६ “लोक हैं।] नल + (0) आज अत+- सप्ताधिकशततमो< ध्याय: नवें दिनके है 52043/ 20% रातमें पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा पाण्डवोंका भीष्मसे मिलकर उनके वधका उपाय जानना संजय उवाच युध्यतामेव तेषां तु भास्करे5स्तमुपागते । संध्या समभवद् घोरा नापश्याम ततो रणम्,संजय कहते हैं--राजन्! कौरवों और पाण्डवोंके युद्ध करते समय ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये और भयंकर संध्याकाल आ गया। फिर हमलोगोंने युद्ध नहीं देखा
قال سنجيا: «أيها الملك، وبينما كان الكورو والباندافا لا يزالون يتقاتلون، غربت الشمس. وحلّ شفقٌ مهيبٌ مخيف، وبعد ذلك لم نعد نرى القتال.»
Verse 2
ततो युधिष्छिरो राजा संध्यां संदृश्य भारत । वध्यमानं च भीष्मेण त्यक्तास्त्र भयविह्धलम्,भरतनन्दन! तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने देखा कि संध्या हो गयी। भीष्मके द्वारा गहरी चोट खाकर मेरी सेनाने भयसे व्याकुल हो हथियार डाल दिया है। किसीमें लड़नेका उत्साह नहीं रह गया है। सारी सेना बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त पीड़ित हो गयी है। कितने ही सैनिक युद्धसे विमुख हो भागने लग गये हैं। उधर महारथी भीष्म क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें सबको पीड़ा दे रहे हैं। सोमकवंशी महारथी पराजित होकर अपना उत्साह खो बैठे हैं और घोररूप भयानक प्रदोषकाल आ पहुँचा है। इन सब बातोंपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने सेनाको युद्धसे लौटा लेना ही ठीक समझा
قال سانجيا: عندئذٍ رأى الملك يودهيشثيرا، وقد أقبل المساء، يا بهاراتا، ورأى الجيش يُحصد على يد بهيشما—وقد أُلقيت الأسلحة وارتجف الرجال من الخوف—فعلم أن قتال ذلك اليوم قد كسر عزيمتهم، وأن الانسحاب من ساحة المعركة هو الرأي الأسلم.
Verse 3
(निरुत्साहं बल॑ दृष्टवा पीडितं शरविक्षतम् ।) स्वसैन्यं च परावृत्तं पलायनपरायणम् | भीष्मं च युधि संरब्धं पीडयन्तं महारथम्,भरतनन्दन! तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने देखा कि संध्या हो गयी। भीष्मके द्वारा गहरी चोट खाकर मेरी सेनाने भयसे व्याकुल हो हथियार डाल दिया है। किसीमें लड़नेका उत्साह नहीं रह गया है। सारी सेना बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त पीड़ित हो गयी है। कितने ही सैनिक युद्धसे विमुख हो भागने लग गये हैं। उधर महारथी भीष्म क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें सबको पीड़ा दे रहे हैं। सोमकवंशी महारथी पराजित होकर अपना उत्साह खो बैठे हैं और घोररूप भयानक प्रदोषकाल आ पहुँचा है। इन सब बातोंपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने सेनाको युद्धसे लौटा लेना ही ठीक समझा
قال سانجيا: إذ رأى الجيش واهن العزيمة—مُعذَّبًا ممزقًا بالسهام—ورأى جنوده هم أنفسهم يرتدّون وقد عقدوا نية الفرار، ورأى بهيشما، المحارب العظيم على العربة، محتدمًا في القتال يُنزل الأذى بالمقاتلين، يا بهجة آل بهاراتا—(فكّر يودهيشثيرا أن المساء قد أقبل ورأى أن الصواب سحب الجيش).
Verse 4
सोमकांश्व जितान् दृष्टवा निरुत्साहान् महारथान् | (निशामुखं च सम्प्रेक्ष्य घोररूपं भयानकम् ।) चिन्तयित्वा ततो राजा अवहारमरोचयत्,भरतनन्दन! तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने देखा कि संध्या हो गयी। भीष्मके द्वारा गहरी चोट खाकर मेरी सेनाने भयसे व्याकुल हो हथियार डाल दिया है। किसीमें लड़नेका उत्साह नहीं रह गया है। सारी सेना बाणोंसे क्षत-विक्षत हो अत्यन्त पीड़ित हो गयी है। कितने ही सैनिक युद्धसे विमुख हो भागने लग गये हैं। उधर महारथी भीष्म क्रोधमें भरकर युद्धस्थलमें सबको पीड़ा दे रहे हैं। सोमकवंशी महारथी पराजित होकर अपना उत्साह खो बैठे हैं और घोररूप भयानक प्रदोषकाल आ पहुँचा है। इन सब बातोंपर विचार करके राजा युधिष्ठिरने सेनाको युद्धसे लौटा लेना ही ठीक समझा
قال سانجيا: لما رأى محاربي السومَكَة—أولئك العظام من فرسان العربات—قد هُزموا وخمدت فيهم حمية القتال، ورأى الليل يُقبل ذا هيئة مروّعة مخيفة، اختار الملك (يودهيشثيرا)، بعد أن فكّر في هذه الأحوال، أن يسحب الجيش من المعركة، يا بهجة آل بهاراتا.
Verse 5
(कथं जयेम भीष्मं वै महाबलपराक्रमम् । बुद्धि स्वशिबिरं गन्तुं चक्रे राजा युधिष्ठिर: ।।) महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न भीष्मको हम किस प्रकार जीत सकेंगे, यही सोचते हुए राजा युधिष्ठिरने अपने शिविरमें जानेका विचार किया। ततो&वहारं सैन्यानां चक्रे राजा युधिष्ठिर: । तथैव तव सैन्यानामवहारो हाभूत् तदा,इसके बाद महाराज युधिष्ठिरने अपनी सेनाको पीछे लौटा लिया। इसी प्रकार आपकी सेना भी उस समय युद्धस्थलसे शिविरकी ओर लौट चली
قال سانجيا: «كيف لنا أن نهزم بهيشما، وهو ذو قوة عظيمة وبأسٍ بطولي؟» هكذا فكّر الملك يودهيشثيرا فعزم على الانسحاب إلى معسكره. ثم أصدر يودهيشثيرا أمره لقواته بالتراجع؛ وفي الوقت نفسه بدأت جيوشك أنت أيضًا تنسحب من ساحة القتال نحو معسكرها.
Verse 6
ततो<वहारं सैन्यानां कृत्वा तत्र महारथा: । न्यविशन्त कुरुश्रेष्ठ संग्रामे क्षतविक्षता:,कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार संग्राममें क्षत-विक्षत हुए वे सब महारथी सेनाको लौटाकर शिविरमें विश्राम करने लगे
قال سانجيا: ثم بعد أن أُنجز انسحاب الجيوش، استقرّ هناك فرسان العربات العظام—وقد جُرحوا ومُزّقوا في تلك المعركة—ليستريحوا في معسكرهم، يا خير الكورو.
Verse 7
भीष्मस्य समरे कर्म चिन्तयानास्तु पाण्डवा: | नालभन्त तदा शान्तिं भीष्मबाणप्रपीडिता:,पाण्डव भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उन्हें समरांगणमें भीष्मके पराक्रमका चिन्तन करके तनिक भी शान्ति नहीं मिलती थी
قال سنجيا: إنّ الباندافا، وقد عُذِّبوا بسهام بهيشما، ظلّوا يتأمّلون أعماله وبأسه في ساحة القتال؛ وفي ذلك الحين لم يجدوا أدنى سكينة.
Verse 8
भीष्मो5पि समरे जित्वा पाण्डवान् सहसूंजयान् । पूज्यमानस्तव सुतैर्वन्द्यमानश्च भारत
قال سنجيا: «حتى بهيشما، بعدما قهر الباندافا في المعركة مع السِّرِنْجَيَة، كان يُكرَّم من أبنائك ويُسلَّم عليه مرارًا، يا بهاراتا.»
Verse 9
न्यविशत् कुरुभि: सार्ध हृष्टरूपै: समन््तत: । भारत! भीष्म भी समरभूमिमें सूृंजयों तथा पाण्डवोंको जीतकर आपके पुत्रोंद्वारा प्रशंसित और अभिवन्दित हो अत्यन्त हर्षमें भरे हुए कौरवोंके साथ शिविरमें गये ।। ततो रात्रि: समभवत् सर्वभूतप्रमोहिनी,तत्पश्चात् सम्पूर्ण भूतोंको मोहमयी निद्रामें डालनेवाली रात्रि आ गयी। उस भयंकर रात्रिके आरम्भकालमें वृष्णिवंशियोंसहित दुर्धर्ष संजय और पाण्डव गुप्तमन्त्रणाके लिये एक साथ बैठे
قال سنجيا: وقد أحاط به الكورو من كل جانب ووجوههم تتلألأ فرحًا، انسحب بهيشما إلى المعسكر بعد أن هزم في ساحة القتال السِّرِنْجَيَة والباندافا، وكان أبناءُك يثنون عليه ويحيّونه بإجلال. ثم أقبل الليل—ليلٌ يُذهِل جميع الكائنات—فأغرق العالم كله في نومٍ موهوم. وفي مطلع ذلك الليل الرهيب، جلس السِّرِنْجَيَة الذين لا يُقهرون والباندافا، ومعهم آل فْرِشْنِي، في موضع واحد لعقد مجلسٍ سريّ.
Verse 10
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे पाण्डवा वृष्णिभि: सह । सृंजयाश्च दुराधर्षा मन्त्राय समुपाविशन्,तत्पश्चात् सम्पूर्ण भूतोंको मोहमयी निद्रामें डालनेवाली रात्रि आ गयी। उस भयंकर रात्रिके आरम्भकालमें वृष्णिवंशियोंसहित दुर्धर्ष संजय और पाण्डव गुप्तमन्त्रणाके लिये एक साथ बैठे
قال سنجيا: لما ابتدأ ذلك الليل الرهيب، جلس الباندافا مع آل فْرِشْنِي ومع السِّرِنْجَيَة الذين لا يُقهرون للتشاور في مجلسٍ وثيق.
Verse 11
आत्मनि:श्रेयसं सर्वे प्राप्तकालं महाबला: । मन्त्रयामासुरव्यग्रा मन्त्रनिश्चयकोविदा:,उस समय वे समस्त महाबली वीर समयानुसार अपनी भलाईके प्रश्नपर स्वस्थचित्तसे विचार करने लगे। वे सभी लोग मन्त्रणा करके किसी निश्चयपर पहुँच जानेमें कुशल थे
قال سنجيا: عندئذٍ رأى أولئك المحاربون العظام أن الوقت قد آن، فتشاوروا بهدوء فيما يكفل لهم خيرَ مصلحتهم. غير مضطربين، تداولوا الرأي فيما بينهم—حُذّاقًا بالمشورة، بارعين في بلوغ قرارٍ راسخ.
Verse 12
(हनिष्याम यथा भीष्म जयेम पृथिवीमिमाम् ।।) ततो युधिष्छिरो राजा मन्त्रयित्वा चिरं नूप । वासुदेवं समुद्वीक्ष्य वचनं चेदमाददे,उनमें यह विचार होने लगा कि हम भीष्मको कैसे मार सकेंगे और किस प्रकार इस पृथ्वीपर विजय प्राप्त करेंगे। नरेश्वर! उस समय राजा युधिष्ठिरने दीर्घकालतक गुप्तमन्त्रणा करनेके पश्चात् वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखकर यह बात कही--
قال سنجيا: «خطر لهم خاطرٌ: كيف نقتل بهيشما، وبأي وسيلة نظفر بهذه الأرض؟ ثم إن الملك يودهيشثيرا، بعد مداولةٍ طويلةٍ سرّية، التفت إلى فاسوديفا (شري كريشنا) وتكلّم بهذه الكلمات—ملتمسًا سبيلًا يضمن الظفر من غير أن يهجر مقتضيات الدَّرما وسط ضرورات الحرب.»
Verse 13
कृष्ण पश्य महात्मानं भीष्मं भीमपराक्रमम् । गजं नलवनानीव विमृद्नन्तं बल॑ मम,“श्रीकृष्ण! देखिये, भयंकर पराक्रमी महात्मा भीष्म हमारी सेनाका उसी प्रकार विनाश कर रहे हैं, जैसे हाथी सरकंडोंके जंगलोंको रौंद डालते हैं
قال سنجيا: «يا كريشنا، انظر إلى بهيشما العظيم النفس، شديد البأس. إنه يسحق جندي كما يسحق الفيل غياض القصب حين يطؤها.»
Verse 14
(मम माधव सैन्येषु वध्यमानेषु तेन वै । कथं योत्स्याम दुर्धर्ष श्रेयो मे5त्र विधीयताम् ।। त्वमेव गतिरस्माकं नान्यां गतिमुपास्महे | न युद्ध रोचते महां भीष्मेण सह माधव । हन्ति भीष्मो महावीरो मम सैन्यं च संयुगे ।।) “माधव! इनके द्वारा जब हमारी सेनाएँ मारी जा रही हैं, उस अवस्थामें इन दुर्धर्ष वीर भीष्मके साथ हमलोग कैसे युद्ध करें? यहाँ जिस प्रकार हमारा भला हो, वह उपाय कीजिये। माधव! आप ही हमारे आश्रय हैं। हम दूसरे किसीका सहारा नहीं लेते। हमें भीष्मजीके साथ युद्ध करना अच्छा नहीं लगता है। इधर महावीर भीष्म युद्धस्थलमें हमारी सेनाका संहार करते चले जा रहे हैं। न चैवैनं महात्मानमुत्सहामो निरीक्षितुम् | लेलिहामान सैन्येषु प्रवृद्धमिव पावकम्,'ये प्रजजलित अग्निके समान बाणोंकी लपटोंसे हमारी सेनामें सबको चाटते (भस्म करते) जा रहे हैं, हमलोग इन महात्माकी ओर देख भी नहीं पा रहे हैं
قال سنجيا: «يا ماذافا، إذ تُقطَع جموعُنا بسيفه، كيف نقاتل بهيشما الذي لا يُدافَع؟ فاقضِ هنا بما هو خيرٌ لي حقًّا. أنت وحدك ملاذُنا؛ لا نلتمس ملجأً سواك. لا أرى صوابًا أن أشنّ الحرب على بهيشما، يا ماذافا. ومع ذلك فإن بهيشما، ذلك البطل العظيم، لا يزال يُفني جيشي في المعركة. بل لا تطيب لنا نفسٌ أن ننظر إلى ذلك العظيم النفس، وهو يهيج في الصفوف كالنار المتأجّجة، يلعق كلَّ شيءٍ بألسنة سهامه.»
Verse 15
यथा घोरो महानागस्तक्षको वै विषोल्बण: । तथा भीष्मो रणे क्रुद्धस्ती क्ष्णशस्त्र: प्रतापवान्
قال سنجيا: «كما أن الحيّة العظيمة تَكشَكَة رهيبةٌ شديدةُ السُّمّ، كذلك كان بهيشما إذا غضب في ساحة القتال—مهيبَ البطش، شديدَ السطوة، مسلّحًا بأسلحةٍ حادّة.»
Verse 16
गृहीतचाप: समरे प्रमुडचन् निशिताउछरान् | 'जैसे महानाग तक्षक अपने प्रचण्ड विषके कारण भयंकर प्रतीत होता है, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीष्म युद्धस्थलमें जब हाथमें धनुष लेकर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगते हैं, उस समय अपने तीखे अस्त्र-शस्त्रोंके कारण बड़े भयानक जान पड़ते हैं ।। १५६ || शक्यो जेतुं यम: क्रुद्धो वज़पाणिश्व देवराट्,“समरभूमिमें क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, पाशधारी वरुण अथवा गदाधारी कुबेरको भी जीता जा सकता है; परंतु इस महासमरमें कुपित भीष्मको पराजित करना असम्भव है
قال سنجيا: «حين يمسك بهيشما قوسه في ساحة القتال ويشرع، في نشوة المعركة، يمطر سهامًا حادّة، يبدو مروّعًا—كالحية العظيمة تَكشَكَة التي يشتدّ رعبها بقوة سمّها العنيف. إن يَما الغضبان، وإندرا سيّد الآلهة بصاعقته، وفارونا بحبله، وكوبيرا بهراوته قد يُغلَبون؛ أمّا في هذه الحرب العظمى فهزيمةُ بهيشما إذا استعر غضبُه أمرٌ مستحيل.»
Verse 17
वरुण: पाशभूृच्चापि सगदो वा धनेश्वर: । न तु भीष्म: सुसंक्रुद्ध: शक््यो जेतुं महाहवे,“समरभूमिमें क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, पाशधारी वरुण अथवा गदाधारी कुबेरको भी जीता जा सकता है; परंतु इस महासमरमें कुपित भीष्मको पराजित करना असम्भव है
قال سنجيا: «حتى فارونا حاملُ الحبل، أو كوبيرا ربُّ الثروة حاملُ الهراوة، يمكن التغلب عليهما في القتال؛ أمّا بهيشما—إذا استحكم غضبه—فلا يُقهر في هذه الحرب العظمى».
Verse 18
सो5हमेवंगते कृष्ण निमग्न: शोकसागरे । आत्मनो बुद्धिदौर्बल्याद् भीष्ममासाद्य संयुगे,“श्रीकृष्ण! ऐसी स्थितिमें मैं अपनी बुद्धिकी दुर्बलताके कारण युद्धसस््थलमें भीष्मको सामने देखकर शोकके समुद्रमें डूबा जा रहा हूँ
قال سنجيا: «يا كريشنا، في هذه المحنة أغرق في بحرٍ من الحزن. وبسبب ضعف بصيرتي أنا، حين واجهتُ بهيشما في ساحة القتال، اجتاح الأسى قلبي.»
Verse 19
वन॑ यास्यामि दुर्धर्ष श्रेयो वै तत्र मे गतम् । न युद्ध रोचते कृष्ण हन्ति भीष्मो हि न: सदा,“दुर्धर्ष वीर श्रीकृष्ण! अब मैं वनको चला जाऊँगा। मेरे लिये वनमें जाना ही कल्याणकारी होगा। मुझे युद्ध अच्छा नहीं लग रहा है; क्योंकि उसमें भीष्म सदा ही हमारे सैनिकोंका विनाश करते आ रहे हैं
قال سنجيا: «يا من لا يُقهر، يا كريشنا، سأمضي إلى الغابة؛ فذلك عندي هو السبيل الأَولى. لا أجد لهذه الحرب طعماً، يا كريشنا، لأن بهيشما ما برح يُفني جندنا مرة بعد مرة.»
Verse 20
यथा प्रज्वलितं वह्निं पतड़: समभिद्रवन् । एकतो मृत्युमभ्येति तथाहं भीष्ममीयिवान्,'जैसे पतंग प्रजजलित आगकी ओर दौड़ा जाकर एकमात्र मृत्युको ही प्राप्त होता है, उसी प्रकार हमने भी भीष्मपर आक्रमण करके मृत्युका ही वरण किया है
قال سنجيا: «كما تندفع الفراشات إلى النار المتأججة فلا تنال إلا الموت، كذلك أنا—إذ تقدّمتُ لمنازلة بهيشما—لم ألقَ إلا الموت وجهاً لوجه.»
Verse 21
क्षयं नीतो5स्मि वार्ष्णेय राज्यहेतो: पराक्रमी । भ्रातरश्वैव मे शूरा: सायकैर्भशपीडिता:,4ार्ष्णेय! राज्यके लिये पराक्रम करके मैं क्षीण होता जा रहा हूँ। मेरे शूरवीर भाई बाणोंकी मारसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे हैं
قال سنجيا: «يا وارشنيّا، مع أني أظهرتُ البأس من أجل المُلك، فإني أُساق إلى الإعياء والهلاك. وإخوتي الأبطال كذلك يُعذَّبون عذاباً شديداً بسِهامٍ تنهال عليهم.»
Verse 22
मत्कृते भ्रातृसौहार्दाद् राज्य भ्रष्टा वनं गता: । परिक्लिष्टा तथा कृष्णा मत्कृते मधुसूदन,“मधुसूदन! मेरे लिये भ्रातृस्नेहवश ये भाई राज्यसे वंचित हुए और वनमें भी गये। मेरे ही कारण कृष्णाको भरी सभामें अपमानका कष्ट भोगना पड़ा
قال سنجيا: «من أجلي—وبدافع مودة الإخوة—حُرم هؤلاء الإخوة مُلكهم ومضوا إلى الغابة. ومن أجلي أيضًا ذاقت كِرِشنا (دروبادِي) مرارة الإهانة والألم في قلب المجلس العام، يا مدهوسودانا.»
Verse 23
जीवितं बहु मन्ये5हं जीवितं हाद्य दुर्लभम् । जीवितस्याद्य शेषेण चरिष्ये धर्ममुत्तमम्,“इस समय मैं जीवनको ही बहुत मानता हूँ। आज तो जीवन भी दुर्लभ हो रहा है। अबसे जीवनके जितने दिन शेष हैं, उनके द्वारा मैं उत्तम धर्मका ही आचरण करूँगा
قال سنجيا: «إنني الآن أُعظّم الحياة كثيرًا؛ فاليوم صارت الحياة نفسها عسيرة المنال. وبما تبقّى لي من العمر من هذا اليوم فصاعدًا، سأعيش على ممارسة الدارما العليا.»
Verse 24
यदि ते5हमनुग्राह्मों भ्रातृभि: सह केशव । स्वधर्मस्याविरोधेन हितं व्याहर केशव,“केशव! यदि भाइयोंसहित मुझपर आपका अनुग्रह है तो मुझे स्वधर्मके अनुकूल कोई हितकारक सलाह दीजिये”
قال سنجيا: «يا كيشافا، إن كنتُ—مع إخوتي—جديرًا بفضلك، فقل لي ما هو نافع حقًّا، من غير أن يُخالف سْفَدهَرماي (واجبي الخاص)، يا كيشافا.»
Verse 25
एवं श्रुत्वा वचस्तस्य कारुण्याद् बहुविस्तरम् । प्रत्युवाच तत: कृष्ण: सान्त्वयानो युधिष्ठिरम्,करुणासे प्रेरित होकर कहे हुए युधिष्ठिरके ये विस्तृत वचन सुनकर श्रीकृष्णने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए कहा
فلما سمع كṛṣṇa كلام يودهيشثيرا—وقد صدر عن رحمة وبُسط بإسهاب—أجابه حينئذٍ مُواسيًا ومُسكنًا روعه.
Verse 26
धर्मपुत्र विषादं त्वं मा कृथा: सत्यसड्रर । यस्य ते भ्रातर: शूरा दुर्जया: शत्रुसूदना:,“धर्मपुत्र! सत्यप्रतिज्ञ कुन्तीकुमार! विषाद न कीजिये, आपके भाई बड़े ही शूरवीर, दुर्जय तथा शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ हैं
قال سنجيا: «يا دهرمابوترا، لا تُسلِم نفسك لليأس، يا ثابتًا على الحق. فإن إخوتك أبطالٌ شجعان—عسيرو الغلبة—قادرون تمام القدرة على سحق العدو.»
Verse 27
अर्जुनो भीमसेनश्च वाय्वग्निसमतेजसौ । माद्रीपुत्रौ च विक्रान्तौ त्रिदशानामिवेश्वरी,“अर्जुन और भीमसेन वायु तथा अग्निके समान तेजस्वी हैं। माद्रीकुमार नकुल और सहदेव भी पराक्रममें दो इन्द्रोंके समान हैं
قال سانجيا: «إن أرجونا وبهيمسينا يتوهّجان ببهاء الريح والنار؛ وأما ابنا مادري الشجاعان (ناكولا وسهاديفا) فيبدوان كسيّدين بين الآلهة.»
Verse 28
मां वा नियुड्धक्ष्व सौहार्दाद् योत्स्ये भीष्मेण पाण्डव | त्वत्प्रयुक्तो महाराज कि न कुर्या महाहवे,'पाण्डुनन्दन! महाराज! आप सौहार्दवश मुझे भी आज्ञा दीजिये। मैं भीष्मके साथ युद्ध करूँगा। भला आपकी आज्ञा मिल जानेपर मैं इस महासमरमें क्या नहीं कर सकता
قال سانجيا: «بدافع المودّة، يا ابن باندو، مُرْني أنا أيضًا بالقتال. سأبارز بهيشما. أيها الملك العظيم، إذا ما اندفعتُ بأمرك، فماذا يعجزني في هذه الحرب العظمى؟»
Verse 29
हनिष्यामि रणे भीष्ममाहूय पुरुषर्षभम् । पश्यतां धार्तराष्ट्राणां यदि नेच्छति फाल्गुन:,“यदि अर्जुन भीष्मको मारना नहीं चाहते हैं तो मैं युद्धमें पुरुषप्रवर भीष्मको ललकारकर धृतराष्ट्रपुत्रोंके देखते-देखते मार डालूँगा
قال سانجيا: «إن لم يُرِد فالغونا (أرجونا) أن يفعل ذلك، فسأتحدّى بهيشما—ثور الرجال—في ساحة القتال، وأقتله أمام أعين أبناء دريتاراشترا.»
Verse 30
यदि भीष्मे हते वीरे जयं पश्यसि पाण्डव । हन्तास्म्येकरथेनाद्य कुरुवृद्धं पितामहम्,'पाण्डुनन्दन! यदि भीष्मके मारे जानेपर ही आपको अपनी विजय दिखायी दे रही है तो मैं एकमात्र रथकी सहायतासे आज कुरुकुलवृद्ध पितामह भीष्मको मार डालूँगा
قال سانجيا: «يا باندافا، إن كنت لا ترى النصر إلا إذا قُتل بهيشما البطل، فإني اليوم، معتمدًا على عربة واحدة، سأقتل ذلك الجدّ الأكبر للكورو، الشيخ بيتامها بهيشما.»
Verse 31
पश्य मे विक्रमं राजन् महेन्द्रस्येव संयुगे । विमुज्चन्तं महास्त्राणि पातयिष्यामि तं रथात्,“राजन्! कल युद्धमें इन्द्रके समान मेरा पराक्रम देखियेगा। मैं बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रहार करनेवाले भीष्मको रथसे मार गिराऊँगा
قال سانجيا: «أيها الملك، انظر بأسِي في القتال كَبأسِ الإندرا العظيم. وحتى وهو يطلق الأسلحة العظمى، فسأطرحه عن عربته.»
Verse 32
यः शत्रु: पाण्डुपुत्राणां मच्छत्रु: स न संशय: । मदर्था भवदीया ये ये मदीयास्तवैव ते,'जो पाण्डवोंका शत्रु है, वह मेरा भी शत्रु है, इसमें संदेह नहीं है। जो आपके सुहृद् हैं, वे मेरे हैं और जो मेरे सुहृद् हैं, वे आपके ही हैं
قال سانجيا: «من كان عدوًّا لأبناء باندو فهو، بلا ريب، عدوّي أيضًا. ومن وقف معك من أجلي فهو لك؛ ومن كان لي فهو لك حقًّا».
Verse 33
तव भ्राता मम सखा सम्बन्धी शिष्य एव च | मांसान्युत्कृत्य दास्यामि फाल्गुनार्थे महीपते,“राजन! आपके भाई अर्जुन मेरे सखा, सम्बन्धी और शिष्य हैं। मैं अर्जुनके लिये अपना मांस भी काटकर दे दूँगा
قال سانجيا: «أيها الملك، إن أخاك أرجونا صديقي وقريبي، بل وتلميذي أيضًا. ومن أجل فالغونا لقطعتُ من لحمي وأعطيته».
Verse 34
एष चापि नरव्याप्रो मत्कृते जीवितं त्यजेत् । एष न: समयस्तात तारयेम परस्परम्,'ये पुरुषसिंह अर्जुन भी मेरे लिये अपने प्राणोंतकका परित्याग कर सकते हैं। तात! हमलोगोंमें यह प्रतिज्ञा हो चुकी है कि हम एक-दूसरेको संकटसे उबारेंगे
قال سانجيا: «إن هذا الرجل، الدائب في بأس الرجال، قد يترك حياته من أجلي. يا عزيزًا، هذا عهدنا الموثوق: أن نُنقذ بعضنا بعضًا من المهالك».
Verse 35
स मां नियुद्धक्ष्व राजेन्द्र यथा योद्धा भवाम्यहम् । प्रतिज्ञातमुपप्लव्ये यत् तत् पार्थेन पूर्वतः,'राजेन्द्र! आप मुझे युद्धके काममें नियुक्त कीजिये। मैं आपका योद्धा बनूँगा। युद्धके पहले उपप्लव्यनगरमें सब लोगोंके सामने अर्जुनने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं गंगानन्दन भीष्मका वध करूँगा, बुद्धिमान् पार्थके उस वचनका पालन करना मेरे लिये आवश्यक है
قال سانجيا: «يا خير الملوك، عيّنني لعمل القتال لأكون مقاتلك. فإن أرجونا ابن بريثا كان قد نذر من قبل في أوبابلافيا، أمام الجميع، أن يقتل بهيشما ابن الغانغا. ولا بدّ عندي أن تُنفَّذ كلمة بارثا الحكيم الموثوقة».
Verse 36
घातयिष्यामि गाड़ेयमिति लोकस्य संनिधौ | परिरक्ष्यमिदं तावद् वच: पार्थस्य धीमत:,'राजेन्द्र! आप मुझे युद्धके काममें नियुक्त कीजिये। मैं आपका योद्धा बनूँगा। युद्धके पहले उपप्लव्यनगरमें सब लोगोंके सामने अर्जुनने जो यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं गंगानन्दन भीष्मका वध करूँगा, बुद्धिमान् पार्थके उस वचनका पालन करना मेरे लिये आवश्यक है
قال سانجيا: «لقد أعلن أمام الناس جميعًا: “سأجعل غانغيا (بهيشما) يُقتَل.” لذلك، في هذه الساعة، يجب صون كلمة بارثا الحكيم الموثوقة وإتمامها».
Verse 37
अनुज्ञातं तु पार्थेन मया कार्य न संशय: । अथवा फाल्गुनस्यैष भार: परिमितो रणे,“अर्जुनने जिस बातके लिये प्रतिज्ञा की हो, उसकी पूर्ति करना मेरा कर्तव्य है, इसमें संशय नहीं है अथवा रणक्षेत्रमें अर्जुनके लिये यह बहुत थोड़ा भार है
قال سانجيا: «ما دام بارثا (أرجونا) قد أذن، فواجبي أن أعمل—ولا شك في ذلك. بل إن هذا العبء في ساحة القتال ليس إلا حملاً يسيراً على فالغونا (أرجونا).»
Verse 38
स हनिष्यति संग्रामे भीष्मं परपुरज्जयम् । अशक्यमपि कुर्याद्धि रणे पार्थ: समुद्यत:,“वे शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मको युद्धमें अवश्य मार डालेंगे। कुन्तीपुत्र अर्जुन उद्यत हो जाय॑ँ तो युद्धमें असम्भवको भी सम्भव कर सकते हैं
قال سانجيا: «في المعركة سيصرع حتماً بهيشما، قاهر حصون الأعداء. فإن بارثا (أرجونا)، ابن كونتي، إذا نهض بعزم راسخ، استطاع في الحرب أن يجعل حتى ما يبدو مستحيلاً أمراً ممكناً.»
Verse 39
त्रिदशान् वा समुदुक्तान् सहितान् दैत्यदानवै: । निहन्यादर्जुन: संख्ये किमु भीष्मं नराधिप,“नरेश्वर! दैत्यों और दानवोंसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी अर्जुन युद्धमें मार सकते हैं; फिर भीष्मको मारना कौन बड़ी बात है
قال سانجيا: «يا سيد الرجال! إن أرجونا قادر في ساحة القتال أن يقتل حتى آلهة العوالم الثلاثة لو اجتمعوا جميعاً مع الدايتيَة والداناڤة. فكيف ببهيشما إذن؟»
Verse 40
विपरीतो महावीरयों गतसत्त्वोडल्पजीवन: । भीष्म: शान्तनवो नून॑ कर्तव्यं नावबुध्यते,“महापराक्रमी शान्तनुनन्दन भीष्म तो हमारे विपरीत पक्षका आश्रय लेनेवाले और बलहीन हैं। इनके जीवनके दिन अब बहुत थोड़े रह गये हैं, तथापि यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है कि वे अपने कर्तव्यको नहीं समझ रहे हैं!
قال سانجيا: «إن بهيشما، البطل العظيم ابن شانتانو، قد انحاز إلى الجانب المقابل؛ وقد نضبت قوته وقصر ما بقي من عمره. ومع ذلك يبدو مؤكداً أنه لم يعد يدرك ما يقتضيه الواجب (الدهرما).»
Verse 41
युधिछिर उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । सर्वे होते न पर्याप्तास्तव वेगविधारणे,युधिष्ठिरने कहा--महाबाहो! माधव! आप जैसा कहते हैं, ठीक ऐसी ही बात है। ये समस्त कौरव आपका वेग धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं
قال يودهيشتيرا: «هكذا هو الأمر حقاً، يا ماذافا عظيم الساعدين، كما تقول. إن هؤلاء الكورافا جميعاً، ولو اجتمعوا، لا يكفون لصد اندفاعك وقوتك.»
Verse 42
नियतं समवाप्स्यामि सर्वमेतद् यथेप्सितम् । यस्य मे पुरुषव्यात्र भवान् पक्षे व्यवस्थित:,पुरुषसिंह! जिसके पक्षमें आप खड़े हैं, वह मैं यह सब अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण कर लूँगा
قال يودهيشثيرا: «سأبلغ يقينًا كلَّ هذا كما أبتغي، يا نمرَ الرجال؛ إذ إنك ثابتٌ راسخٌ في صفي. ومع حامٍ وحليفٍ مثلك، لن تخيب مقاصدي المشروعة.»
Verse 43
सेन्द्रानपि रणे देवाञ्जयेयं जयतां वर । त्वया नाथेन गोविन्द किमु भीष्म॑ महारथम्,विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ गोविन्द! आपको अपना रक्षक पाकर मैं युद्धमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी जीत सकता हूँ; फिर महारथी भीष्मपर विजय पाना कौन बड़ी बात है
قال يودهيشثيرا: «يا خيرَ الظافرين! ما دمتَ أنتَ، يا غوڤيندا، حامِيَ ظهري، لاستطعتُ أن أغلب حتى الآلهة في ساحة القتال، وإندرا بينهم. فكيف يكون الظفرُ على بهيشما—وإن كان فارسَ مركبةٍ عظيمًا—أمرًا جللًا؟»
Verse 44
नतु त्वामनृतं कर्तुमुत्सहे स्वात्मगौरवात् । अयुध्यमान: साहाय्यं यथोक्त कुरु माधव,माधव! परंतु मैं अपनी गुरुताका प्रभाव डालकर आपको असत्यवादी नहीं बना सकता। आप युद्ध किये बिना ही पूर्वोक्त सहायता करते रहिये
«لكنني لا أستطيع أن أحملك على قول الكذب، صونًا لكرامتك أنت. يا ماذافا، من غير أن ترفع سلاحًا، واصل العون كما وعدتَ من قبل.»
Verse 45
समयस्तु कृत: कश्चिन्मम भीष्मेण संयुगे | मन्त्रयिष्ये तवार्थाय न तु योत्स्ये कथठ्चन
قال يودهيشثيرا: «في خضمّ المعركة عقدتُ عهدًا ما مع بهيشما. ومن أجلك سأشير بالرأي وأدبّر التدابير، لكنني لن أقاتل—مهما كانت الحال.»
Verse 46
स हि राज्यस्य मे दाता मन्त्रस्यैव च माधव,अतः माधव! भीष्मजी मुझे राज्य और मन्त्र (हितकर सलाह) दोनों देंगे। इसलिये मधुसूदन! हम सब लोग पुनः आपके साथ देवव्रत भीष्मके पास उन्हींसे उनके वधका उपाय पूछने चलें
قال يودهيشثيرا: «يا ماذافا، إنه حقًّا واهبُ مُلكي وواهبُ المشورة أيضًا. لذلك، يا مدهوسودانا، هلمّ بنا جميعًا نذهب مرةً أخرى معك إلى ديفافراتا بهيشما، ونسأله هو نفسه عن الوسيلة التي يمكن بها أن يُقتل.»
Verse 47
तस्माद् देववब्रतं भूयो वधोपायार्थमात्मन: । भवता सहिता: सर्वे प्रयाम मधुसूदन,अतः माधव! भीष्मजी मुझे राज्य और मन्त्र (हितकर सलाह) दोनों देंगे। इसलिये मधुसूदन! हम सब लोग पुनः आपके साथ देवव्रत भीष्मके पास उन्हींसे उनके वधका उपाय पूछने चलें
قال يودهيشثيرا: «لذلك، يا مدهوسودانا، هلمّ بنا جميعًا نعود مرة أخرى، وأنت معنا، إلى ديفافراتا (بهِيشما) لنعرف وسيلة قتله. فمنه ينبغي أن نلتمس المشورة التي تُثبّت قضيتنا—مهما كانت الضرورة موجعة—كي تمضي الحرب وفق خطة مُدركة لا وفق سَورة عمياء.»
Verse 48
तद् वयं सहिता गत्वा भीष्ममाशु नरोत्तमम् | नचिरात् सर्वे वार्ष्णेय मन्त्रं पृष्छाम कौरवम्,वृष्णिनन्दन! हम सब लोग शीघ्र ही एक साथ कुरुवंशी नरश्रेष्ठ भीष्मके पास चलें और उनसे सलाह लें
«فلنذهب إذن جميعًا معًا حالًا إلى بهِيشما، خير رجال الكورو. ومن غير إبطاء، يا وارشنيّا—يا بهجة آل فْرِشْني—لنلتمس منه المشورة.»
Verse 49
स वक्ष्यति हित॑ वाक््यं सत्यमस्माञ्जनार्दन | यथा च वक्ष्यते कृष्ण तथा कर्तास्मि संयुगे
«سيقول لنا جاناردانا كلامًا نافعًا صادقًا. وأنت يا كريشنا، كما تُرشدني هكذا سأعمل في ساحة القتال، متخذًا هدايتك سبيلًا قويمًا.»
Verse 50
जनार्दन! पूछनेपर वे हमें सत्य और हितकर बात बतायेंगे। श्रीकृष्ण! वे जैसा कहेंगे, युद्धमें वैसा ही करूँगा ।। स नो जयस्य दाता स्यान्मन्त्रस्य च दृढव्रत: । बाला: पित्रा विहीनाश्न तेन संवर्धिता वयम्,दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले भीष्मजी हमारे लिये विजय और सलाहके भी दाता हो सकते हैं। बाल्यावस्थामें जब हम पितृहीन हो गये थे, उस समय उन्होंने ही हमारा पालन-पोषण किया था
قال يودهيشثيرا: «يا جاناردانا، إذا سألناه أخبرنا بالحق وبما فيه النفع. يا شري كريشنا، مهما أشار به فسأعمل به في هذه الحرب. إن ذلك الثابت على نذوره قد يكون لنا واهب النصر وواهب المشورة معًا. حين كنا صغارًا وقد حُرمنا أبانا، كان هو الذي كفلنا وربّانا.»
Verse 51
त॑ं चेत् पितामहं वृद्ध हन्तुमिच्छामि माधव । पितु: पितरमिष्टं च धिगस्तु क्षत्रजीविकाम्,माधव! यद्यपि वे हमारे पिताके भी पिता और प्रिय हैं, तो भी उन बूढ़े पितामह भीष्मको भी मैं मारना चाहता हूँ। क्षत्रियकी इस जीविकाको धिक्कार है!
«إن كنتُ قد عزمتُ على قتل ذلك الجدّ الشيخ، يا ماذافا—وهو أبو أبي، وهو أيضًا عزيز محبوب—فلتقع اللعنة والعار على معيشة الكشترِيّا نفسها، يا ماذافا! إن أخلاق الحرب هنا تنقلب إلى الداخل: فواجب القتال يفرض فعلًا يُحَسّ كأنه تدنيس لحرمة توقير الأسرة.»
Verse 52
संजय उवाच ततोअब्रवीन्महाराज वार्ष्णेय: कुरुनन्दनम् । रोचते मे महाप्राज्ञ राजेन्द्र तव भाषितम्,संजय कहते हैं--महाराज! तब भगवान् श्रीकृष्णने कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे कहा --“महामते राजेन्द्र! आपका कथन मुझे ठीक जान पड़ता है
قال سنجيا: «ثم، أيها الملك العظيم، خاطب وارشنيّا (شري كريشنا) مُبهِجَ آل كورو (يودهيشثيرا) قائلاً: ‘يا سيد الملوك بالغ الحكمة، إن قولك يروق لي ويبدو لي صوابًا.’»
Verse 53
देवव्रतः कृती भीष्म: प्रेक्षितेनापि निर्दहेत् । गम्यतां स वधोपायं प्रष्टं सागरगासुत:,'देवव्रत भीष्म पुण्यात्मा पुरुष हैं। वे दृष्टिपातमात्रसे सबको दग्ध कर सकते हैं; अतः गंगानन्दन भीष्मसे उनके वधका उपाय पूछनेके लिये आप अवश्य उनके पास चलें
قال سنجيا: «إن ديفافراتا—بهِيشما، البطل المقتدر المكتمل الشأن—يستطيع أن يُحرق حتى من يكتفي بالنظر إليه. فلنذهب إليه ونسأل ابن النهر (بهِيشما) عن الوسيلة التي يمكن بها قتله.»
Verse 54
वक्तुमर्हति सत्यं स त्वया पृष्टो विशेषत: । ते वयं तत्र गच्छाम: प्रष्टं कुरपितामहम्,“विशेषत: आपके पूछनेपर वे अवश्य सच्ची बात बतायेंगे। अतः हम सब लोग मिलकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मसे अभीष्ट प्रश्न पूछनेके लिये साथ-साथ वहाँ चलें और भारत! चलकर उनसे हितकारक मन्त्रणा पूछें। वे आपको ऐसी मन्त्रणा देंगे, जिससे हमलोग शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे
قال سنجيا: «إذا سألته أنت على وجه الخصوص، فهو حقًّا أهلٌ لأن ينطق بالصدق. فلنذهب جميعًا إلى هناك معًا لنسأل جدَّ آل كورو. هلمَّ، يا بهاراتا—لنقترب من بهِيشما ابن شانتانو، ولنلتمس منه مشورة نافعة حقًّا؛ فإنه سيمنحك توجيهًا به نواجه العدو في الحرب.»
Verse 55
गत्वा शान्तनवं वृद्ध मन्त्र पृष्छाम भारत । स वो दास्यति मन्त्र यं तेन योत्स्यामहे परान्,“विशेषत: आपके पूछनेपर वे अवश्य सच्ची बात बतायेंगे। अतः हम सब लोग मिलकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मसे अभीष्ट प्रश्न पूछनेके लिये साथ-साथ वहाँ चलें और भारत! चलकर उनसे हितकारक मन्त्रणा पूछें। वे आपको ऐसी मन्त्रणा देंगे, जिससे हमलोग शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे
قال سنجيا: «لنذهب، يا بهاراتا، ولنستشر الشانتنويَّ الشيخ، الجدَّ الأكبر. سيعطيك المشورة التي تطلبها؛ وبتلك المشورة سنحارب أعداءنا.»
Verse 56
एवमामन्त्रय ते वीरा: पाण्डवा: पाण्डुपूर्वजम् जग्मुस्ते सहिता: सर्वे वासुदेवश्च वीर्यवान्,वे वीर पाण्डव इस प्रकार सलाह करके सब एक साथ मिलकर अपने पिता पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मपितामहके पास गये; उनके साथ पराक्रमी भगवान् वासुदेव भी थे
قال سنجيا: «وبعد أن تشاور أولئك الباندافا الأبطال على هذا النحو وأخذوا بالرأي، مضوا جميعًا معًا إلى بهِيشما، كبير سلالة باندو الموقَّر كالأب؛ ومضى معهم أيضًا فاسوديفا الجبار.»
Verse 57
विमुक्तशस्त्रकवचा भीष्मस्य सदन प्रति । प्रविश्य च तदा भीष्म॑ शिरोभ्ि: प्रणिपेदिरे,उन सबने अस्त्र-शस्त्र और कवच रख दिये थे। वे भीष्मके शिविरकी ओर गये और उसके भीतर प्रवेश करके उन्होंने भीष्मको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया
قال سنجيا: بعدما وضعوا أسلحتهم ودروعهم جانبًا، مضوا نحو مقرّ بهيشما. ولما دخلوا معسكره انحنوا انحناءة عميقة وقدّموا له تحيةً مفعمة بالإجلال—فعلُ انضباطٍ وكبحٍ للنفس واحترام، حتى وسط قسوة مطالب الحرب.
Verse 58
पूजयन्तो महाराज पाण्डवा भरतर्षभम् | प्रणम्य शिरसा चैनं भीष्म॑ं शरणमभ्ययु:,महाराज! पाण्डवोंने भरतश्रेष्ठ भीष्मकी पूजा करते हुए उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और उन्हींकी शरण ली
قال سنجيا: أيها الملك، إنّ الباندافا، وهم يجلّون بهيشما—ثورَ آلِ بهاراتا—انحنوا له ووضعوا رؤوسهم عند قدميه وسألوا الاحتماء به. وحتى عشية القتال تمسّكوا بأخلاق توقير الشيوخ والمعلمين، معترفين بسلطته المعنوية وهم يستعدّون لملاقاته في الحرب.
Verse 59
तानुवाच महाबाहुर्भीष्म: कुरुपितामह: । स्वागतं तव वार्ष्णेय स्वागतं ते धनंजय
قال سنجيا: ثم خاطبهم بهيشما عظيمُ الساعد، جدُّ الكورو: «مرحبًا بك يا وارشنيّا (كريشنا)، ومرحبًا بك يا دهننجايا (أرجونا).» وفي خضمّ الحرب الوشيكة، تُقيم كلمات الشيخ آداب الشرف والاعتراف حتى تجاه الخصوم، مُجسِّدةً شريعة الكشاتريا في مخاطبة الآخر باحترام قبل الصدام.
Verse 60
स्वागतं धर्मपुत्राय भीमाय यमयोस्तथा । कि वा कार्य करोम्यद्य युष्माकं प्रीतिवर्धनम्
قال سنجيا: «مرحبًا بدهرماپوترا (يودهيشثيرا)، ومرحبًا ببهيمَ، وكذلك بالتوأمين ابني ياما. أيَّ خدمةٍ أؤديها اليوم لتزدادوا رضًا وسرورًا؟»
Verse 61
(युद्धादन्यत्र हे वत्सा: व्रियन्तां मा विशड्कथ ।) सर्वात्मनापि कर्तास्मि यदपि स्यात् सुदुष्करम् । उस समय कुरुकुलके पितामह महाबाहु भीष्मने उन सब लोगोंसे कहा--'वृष्णिनन्दन! आपका स्वागत है। धनंजय! तुम्हारा भी स्वागत है। धर्मपुत्र युधिष्ठि, भीमसेन और नकुल- सहदेव सबका स्वागत है। आज मैं तुम सब लोगोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला कौन-सा कार्य करूँ। पुत्रो! युद्धके अतिरिक्त जो चाहो, माँग लो, संकोच न करो। तुम्हारी माँग अत्यन्त दुष्कर हो तो भी मैं उसे सब प्रकारसे पूर्ण करूँगा” ।। ५९-६० है ।। तथा ब्रुवाणं गाड़ेयं प्रीतियुक्तं पुनः: पुन:
قال سنجيا: «يا أبنائي الأحبّة، اطلبوا ما شئتم سوى القتال؛ لا تترددوا. وإن كانت طلبتكم بالغةَ العسر، فسأُنجزها بكلّ كياني.» وفي سياق الحكاية، هذا وعدُ بهيشما السخيّ للباندافا وكريشنا—إيماءةُ ضيافةٍ ومودّةٍ أبوية—غير أنّها محكومةٌ بواقعٍ كئيب: الشيء الوحيد الذي لن يمنحه هو وقفُ الحرب نفسها.
Verse 62
उवाच राजा दीनात्मा प्रीतियुक्तमिदं वच: । गंगानन्दन भीष्म जब बारंबार इस प्रकार प्रसन्नता-पूर्वक कह रहे थे, उस समय राजा युधिष्ठटिरने दीन हृदयसे प्रेमपूर्वक यह बात कही-- || ६१ ई ।। कथं जयेम सर्वज्ञ कथं राज्यं लभेमहि,'सर्वज्ञ! युद्धमें हमारी जीत कैसे हो? हम किस प्रकार राज्य प्राप्त करें?
قال سنجيا: لما كان بهيشما، ابن الغانغا، يكرر القول على هذا النحو بروحٍ راضيةٍ رحيمة، خاطبه الملك يودهيشتيرا—وقلبه مثقلٌ بالأسى غير أنه مفعمٌ بالإجلال—بمودة قائلاً: «أيها العليم بكل شيء، كيف ننتصر في هذه الحرب، وكيف نسترد المملكة؟»
Verse 63
प्रजानां संशयो न स्यात् कथं तन्मे वद प्रभो । भवान् हि नो वधोपायं ब्रवीतु स्वयमात्मन:,प्रभो! हमारी प्रजाका जीवन संकटमें न पड़े, यह कैसे सम्भव हो सकता है? कृपया यह सब मुझे बताइये। आप स्वयं ही हमें अपने वधका उपाय बताइये
قال سنجيا: «لكي لا يقع الناس في شكٍّ ولا في خطر، أخبرني—كيف يُضمن ذلك، يا مولاي؟ بل إنك أنت بنفسك ينبغي أن تُبيّن لنا الوسيلة التي يمكن بها قتلك.»
Verse 64
भवन्तं समरे वीर विषहेम कथं वयम् । न हि ते सूक्ष्ममप्यस्ति रन्ध्रं कुरूपितामह,“वीर! समरभूमिमें हमलोग आपका वेग कैसे सह सकते हैं? कुरुकुलके वृद्ध पितामह! आपमें कोई छोटा-सा भी छिद्र (दोष) नहीं दृष्टिगोचर होता है
قال سنجيا: «أيها البطل، كيف لنا أن نحتملك في ساحة القتال؟ يا جدَّ الكورو المهيب، لا يُرى فيك حتى أصغر ثغرة—لا عيب يُدرك ولا موضع ضعف يُلمح.»
Verse 65
मण्डलेनैव धनुषा दृश्यसे संयुगे सदा । आददान संदधान विकर्षन्तं धनुर्न च
قال سنجيا: في خضمّ القتال لا يُرى منك إلا قوسٌ يرسم دائرةً في الهواء؛ تتناول السهام، وتضعها على الوتر، ثم تشدّ القوس مرة بعد مرة، بسرعةٍ تكاد تُخفي الرامي نفسه عن الأبصار.
Verse 66
रथाश्वनरनागानां हन्तारं परवीरहन्
قال سنجيا: «(إنه) قاتلُ العربات والخيول والرجال والفيلة—الذي يصرع أبطالَ الصفّ المقابل.»
Verse 67
वर्षता शरवर्षाणि संयुगे वैशसं कृतम्
قال سَنجايا: «وبينما كانت سِهامٌ كالمطر تُصبّ في ساحة القتال، ارتُكبت في خِضمّ المعمعة فِعلةٌ قاسيةٌ لا رحمة فيها.»
Verse 68
क्षयं नीता हि पृतना संयुगे महती मम । “आपने युद्धस्थलमें बाणोंकी वर्षा करके भारी संहार मचा रखा है। रणक्षेत्रमें मेरी विशाल सेना आपके द्वारा नष्ट हो चुकी है ।। ६७ है ।। यथा युधि जयेम त्वां यथा राज्यं भूशं॑ मम
قال سَنجايا: «في هذه المعركة العظمى، لقد سِيق جيشي العظيم حقًّا إلى الهلاك. فكيف لنا في الحرب أن نغلبكم، وكيف لسيدي أن يستردّ مملكته وسيادته؟»
Verse 69
मम सैन्यस्य च क्षेमं तन्मे ब्रूहि पितामह । “पितामह! हमलोग युद्धमें जिस प्रकार आपको जीत सकें, जिस प्रकार हमें विपुल राज्यकी प्राप्ति हो सके और जिस प्रकार मेरी सेना भी सकुशल रह सके, वह उपाय मुझे बताइये' ।। ६८ ह ।। ततोअब्रवीच्छान्तनव: पाण्डवान् पाण्डुपूर्वज:,तब पाण्डुके पितृतुल्य शान्तनुकुमार भीष्मजीने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा --'कुन्तीकुमार! मेरे जीते-जी युद्धमें किसी प्रकार तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। सर्वज्ञ! मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ
قال سَنجايا: «أخبرني، أيها الجدّ الجليل، عن سلامة جيشي وعافيته.» وفي السياق المحيط، لا يقتصر قلق الملك على الظفر وحده، بل يمتدّ إلى صون قوّاته—كاشفًا توتّرًا أخلاقيًّا بين طلب النصر في الحرب والخوف من الخراب الذي لا بدّ أن تجلبه الحرب.
Verse 70
न कथउज्चन कौन्तेय मयि जीवति संयुगे । जयो भवति सर्वज्ञ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते,तब पाण्डुके पितृतुल्य शान्तनुकुमार भीष्मजीने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा --'कुन्तीकुमार! मेरे जीते-जी युद्धमें किसी प्रकार तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। सर्वज्ञ! मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ
«يا ابنَ كُنتي، ما دمتُ حيًّا في ساحة القتال فلن تكون لكم الغلبة بحال. يا من يُوصَف بالعلم، إنما أقول لك هذا صدقًا.»
Verse 71
निर्जिते मयि युद्धेन रणे जेष्यथ पाण्डवा: । क्षिप्रं मयि प्रहरध्वं यदीच्छथ रणे जयम्,'पाण्डवो! यदि युद्धके द्वारा मैं किसी प्रकार जीत लिया जाऊँ, तभी तुमलोग रणक्षेत्रमें विजयी हो सकोगे। यदि युद्धमें विजय चाहते हो तो मुझपर शीघ्र ही (घातक) प्रहार करो
«يا أبناءَ باندو، لن تظفروا في هذا الميدان إلا إذا غُلِبتُ أنا في القتال. فإن كنتم تريدون النصر حقًّا، فاسرعوا إلى ضربي.»
Verse 72
अनुजानामि व: पार्था: प्रहरध्वं यथासुखम् । एवं हि सुकृतं मन्ये भवतां विदितो हाहम्
قال سَنْجَايَا: «يا أبناء بْرِثَا، إني آذن لكم—فاضربوا كما ترون، بلا كفٍّ ولا تهيّب. فبهذا أعدّ واجبي قد أُدِّي على أحسن وجه: لقد عرّفتكم بنفسي وبالرسالة التي أحملها إليكم».
Verse 73
युधिछिर उवाच ब्रूहि तस्मादुपायं नो यथा युद्धे जयेमहि
قال يُدْهِشْثِيرَا: «فأخبرْنا إذن بالوسيلة التي بها نغلب في هذه الحرب.»
Verse 74
भवन्तं समरे क्रुद्धं दण्डहस्तमिवान्तकम् । युधिष्ठिरने कहा--पितामह! हमलोग युद्धमें दण्डधारी यमराजकी भाँति क्रोधमें भरे हुए आपको जिस प्रकार जीत सकें, वैसा उपाय हमें आप ही बताइये ।। ७३ ह ।। शकक््यो वज्धरो जेतुं वरुणो5थ यमस्तथा
قال يُدْهِشْثِيرَا: «يا جدّاه (بيتامها)! إنك في المعركة تتأجّج غضبًا كالموت نفسه، والعصا في يدك. فقل لنا أنتَ الوسيلة التي بها نستطيع أن نغلبك في الحرب. حتى إندرا حامل الصاعقة، وكذلك فارونا ويَما، يمكن قهرهم—فدلّنا إذن كيف يمكن قهرك.»
Verse 75
भीष्म उवाच सत्यमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डव,भीष्मने कहा--महाबाहो! पाण्डुनन्दन! तुम जैसा कहते हो, यह सत्य है। जबतक मेरे हाथमें शस्त्र होगा, जबतक मैं श्रेष्ठ धनुष लेकर युद्धके लिये सावधान एवं प्रयत्नशील रहूँगा, तबतक इन्द्रसहित सम्पूर्ण देववा और असुर भी रणक्षेत्रमें मुझे जीत नहीं सकते
قال بِهِيشْمَة: «صدقْتَ يا عظيمَ الساعد من أبناء باندو. ما دام السلاح في يدي، وما دمتُ أقبض على قوسي الممتاز وأقف يقِظًا مجتهدًا للقتال، فلن يقدر عليّ في ساحة الحرب لا الآلهة مع إندرا ولا الأسورا.»
Verse 76
नाहं जेतुं रणे शक््य: सेन्द्रैरपि सुरासुरै: । आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुक:,भीष्मने कहा--महाबाहो! पाण्डुनन्दन! तुम जैसा कहते हो, यह सत्य है। जबतक मेरे हाथमें शस्त्र होगा, जबतक मैं श्रेष्ठ धनुष लेकर युद्धके लिये सावधान एवं प्रयत्नशील रहूँगा, तबतक इन्द्रसहित सम्पूर्ण देववा और असुर भी रणक्षेत्रमें मुझे जीत नहीं सकते
قال بِهِيشْمَة: «يا ابنَ باندو عظيمَ الساعد، إن قولك حقّ. ما دمتُ أقف في المعركة والسلاح في يدي—يقِظًا مجتهدًا، قابضًا على قوسي المختار—فلن يقدر عليّ في ميدان الحرب حتى الآلهةُ والأسورا مجتمعين، وفيهم إندرا.»
Verse 77
ततो मां न्यस्तशस्त्र तु एते हन्युर्महारथा: । निक्षिप्तशस्त्रे पतिते विमुक्तकवचध्वजे
ثم إن أولئك الفرسان العظام على المركبات سيصرعونني—حين أكون قد ألقيت سلاحي، وحين تُطرح أسلحتي وأقع صريعًا، وقد تراخى درعي وانخفض لوائي.
Verse 78
द्रवमाणे च भीते च तवास्मीति च वादिनि । स्त्रियां स्त्रीनामथेये च विकले चैकपुत्रके
قال بهيشما: «لا ينبغي ضرب المرأة ولا إيذاؤها—وخاصة إذا كانت تهرب مذعورة، أو كانت خائفة، أو كانت تستسلم قائلة: “أنا لك”، أو كانت بين النساء بلا حامٍ، أو كانت عاجزةً أو لا حول لها، أو كانت أمًّا وحيدة لابنٍ وحيد.»
Verse 79
अप्रशस्ते नरे चैव न युद्ध रोचते मम । जब मैं अस्त्र-शस्त्र डाल दूँ, उस अवस्थामें ये महारथी मुझे मार सकते हैं। जिसने शस्त्र नीचे डाल दिया हो, जो गिर पड़ा हो, जो कवच और ध्वजसे शून्य हो गया हो, जो भयभीत होकर भागता हो, अथवा 'मैं तुम्हारा हूँ” ऐसा कह रहा हो, जो स्त्री हो, स्त्रियों-जैसा नाम रखता हो, विकल हो, जो अपने पिताका इकलौता पुत्र हो अथवा जो नीच जातिका हो, ऐसे मनुष्यके साथ युद्ध करना मुझे अच्छा नहीं लगता है || ७७-७८ ह ।। इमं मे शृणु राजेन्द्र संकल्पं पूर्वचिन्तितम्
قال بهيشما: «لا أجد لذّةً في مقاتلة رجلٍ يسلك سلوكًا مذمومًا. يا خير الملوك، اسمع عزمي الذي طالما تدبّرته: إذا وضعتُ سلاحي فربما استطاع أولئك المها رَثَة أن يقتلوني؛ لكن أن أضرب من ألقى سلاحه، أو من سقط، أو من جُرِّد من درعه ولوائه، أو من فرّ خوفًا، أو من تضرّع قائلاً: “أنا لك”—وكذلك من كانت امرأة، أو من يحمل اسمًا كأسماء النساء، أو من كان عاجزًا، أو الابن الوحيد لأبيه، أو من كان وضيـع المولد—فهذا القتال لا يروق لي.»
Verse 80
य एष द्रौपदो राजंस्तव सैन्ये महारथ:,राजन! तुम्हारी सेनामें जो यह ट्रुपदपुत्र महारथी शिखण्डी है, वह समरभूमिमें अमर्षशील, शौर्यसम्पन्न तथा युद्धविजयी है। वह पहले स्त्री था, फिर पुरुषभावको प्राप्त हुआ है
قال بهيشما: «أيها الملك، إن هذا المها رَثَة في جيشك—شيكاندي ابن دروبادا—في ساحة القتال شديد العزم، موفور الشجاعة، ظافرٌ في الحرب. كان في السابق امرأة، ثم بلغ حال الرجولة.»
Verse 81
शिखण्डी समरामर्षी शूरश्च समितिज्जय: । यथाभवच्च स्त्री पूर्व पश्चात् पुंस्त्वं समागत:,राजन! तुम्हारी सेनामें जो यह ट्रुपदपुत्र महारथी शिखण्डी है, वह समरभूमिमें अमर्षशील, शौर्यसम्पन्न तथा युद्धविजयी है। वह पहले स्त्री था, फिर पुरुषभावको प्राप्त हुआ है
شيكاندي شديدٌ في المعركة، شجاعٌ ظافرٌ في القتال. كان في السابق امرأة، ثم بلغ حال الرجولة.
Verse 82
जानन्ति च भवन्तो$5पि सर्वमेतद् यथातथम् | अर्जुन: समरे शूर: पुरस्कृत्य शिखण्डिनम्
قال بهيشما: «إنكم أنتم أيضًا تعلمون كلَّ هذا على حقيقته كما هو. ومع ذلك تقدّم أرجونا—بطلُ ساحة القتال—وقد جعل شيخاندين أمامه.»
Verse 83
अमडूल्यध्वजे तस्मिन् स्त्रीपूर्वेच विशेषत:
وفي ذلك الحين كان لواءُ شيخاندين—الذي كان فيما مضى امرأة—بارزًا على نحوٍ خاص.
Verse 84
न प्रहर्तुमभीप्सामि गृहीतेषु: कथठ्चन । शिखण्डीकी ध्वजा अमांगलिक चिह्नसे युक्त है तथा विशेषत:ः वह पहले स्त्री रहा है; इसलिये मैं हाथमें बाण लिये रहनेपर भी किसी प्रकार उसके ऊपर प्रहार नहीं करना चाहता ।। ८३ ह || तदन्तरं समासाद्य पाण्डवो मां धनंजय:
قال بهيشما: «لا أرغب، بأي وجهٍ كان، أن أضرب ما دامت السهام في يدي. فذاك الذي يحمل راية شيخاندين وتعلوه علاماتُ الشؤم كان فيما مضى امرأة؛ لذلك، وإن كنت قابضًا على سهامي مستعدًّا، فلا أريد أن أهاجمه. ثم بعد ذلك، وقد دنا، أقبل عليّ دهننْجَيا ابنُ باندو.»
Verse 85
न तं पश्यामि लोकेषु मां हन्याद् यः समुद्यतम्
«لا أرى في العوالم كلّها من يستطيع أن يصرعني وأنا قائمٌ مستعدٌّ تمام الاستعداد.»
Verse 86
एष तस्मात् पुरोधाय कज्चिदन्यं ममाग्रत:,इसलिये यह अर्जुन श्रेष्ठ धनुष तथा दूसरे अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्धमें सावधानीके साथ प्रयत्नशील हो और उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त किसी पुरुषको अथवा शिखण्डीको मेरे सामने खड़ा करके स्वयं बाणोंद्वारा मुझे मार गिरावे। इसी प्रकार तुम्हारी निश्चितरूपसे विजय हो सकती है
قال بهيشما: «لذلك، بوضع رجلٍ آخر أمامي، فليُقاتِل أرجونا—المُحسنُ لأفضل قوسٍ ولسائر الأسلحة—بعزمٍ حذر. وليُقِم أمامي من يحمل العلامات المذكورة، أو شيخاندين، ثم ليُسقِطني بالسهام. وبهذه الطريقة تُجعل غلبتكم مؤكَّدة.»
Verse 87
आत्तशस्त्रो रणे यत्तो गृहीतवरकार्मुक: । मां पातयतु बीभत्सुरेवं तव जयो ध्रुवम्,इसलिये यह अर्जुन श्रेष्ठ धनुष तथा दूसरे अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्धमें सावधानीके साथ प्रयत्नशील हो और उपर्युक्त लक्षणोंसे युक्त किसी पुरुषको अथवा शिखण्डीको मेरे सामने खड़ा करके स्वयं बाणोंद्वारा मुझे मार गिरावे। इसी प्रकार तुम्हारी निश्चितरूपसे विजय हो सकती है
قال بهيشما: «ليتقدّم بيبهاتسو (أرجونا) مُتسلّحًا، عاقد العزم على القتال، قابضًا على قوسه الممتاز، فيُسقطني صريعًا. إن فعل ذلك فالنصر لكم محقَّق لا ريب فيه».
Verse 88
एतत् कुरुष्व कौन्तेय यथोक्तं मम सुव्रत । संग्रामे धार्तराष्ट्रां श्ष हन्या: सर्वान् समागतान्,उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर! तुम मेरे ऊपर जैसे मैंने बतायी है, वैसी ही नीतिका प्रयोग करो। ऐसा करके ही तुम रणक्षेत्रमें आये हुए सम्पूर्ण धृतराष्ट्रपुत्रों एवं उनके सैनिकोंको मार सकते हो
قال بهيشما: «يا ابن كونتي، يا ثابتًا على النذور الكريمة، افعل تمامًا كما أوصيتك. فبهذه الحيلة وحدها في ساحة القتال تستطيع أن تقتل جميع أبناء دريتاراشترا وقواتهم الذين اجتمعوا في الميدان».
Verse 89
संजय उवाच ते तु ज्ञात्वा ततः पार्था जग्मु: स्वशिबिरं प्रति । अभिवाद्य महात्मानं भीष्म॑ कुरुपितामहम्
قال سنجيا: لما أدرك أبناء باندو ذلك، رجعوا إلى معسكرهم. وبعد أن أدّوا التحية بخشوع لبهیشما عظيم النفس، بيتامها آل كورو، انصرفوا—محافظين على شريعة الفروسية والاحترام حتى في قلب العداء.
Verse 90
संजय कहते हैं--राजन्! यह सब जानकर कुन्तीके सभी पुत्र कुरुकुलके वृद्ध पितामह महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरकी ओर चले गये ।। तथोक्तवति गाड़ेये परलोकाय दीक्षिते । अर्जुनो दुःखसंतप्त: सत्रीडमिदमब्रवीत्,गंगानन्दन भीष्म परलोककी दीक्षा ले चुके थे। उन्होंने जब पूर्वोक्त बात बतायी, तब अर्जुन दुःखसे संतप्त एवं लज्जित होकर श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले--
قال سنجيا: «أيها الملك! لما علم أبناء كونتي ذلك كله، انحنوا إجلالًا لبهیشما عظيم النفس، بيتامها آل كورو الشيخ، ثم عادوا إلى معسكرهم. فلما تكلّم ابن الغانغا، بهيشما—وقد تهيّأ كالمكرَّس للرحيل إلى العالم الآخر—على هذا النحو، خاطب أرجونا، وقد ألهبه الحزن وملأه الخجل، شري كريشنا بهذه الكلمات».
Verse 91
“माधव! कुरुकुलके वृद्ध गुरुजन विशुद्ध-बुद्धि, मतिमान् पितामह भीष्मसे मैं रणक्षेत्रमें कैसे युद्ध करूँगा
قال أرجونا: «يا ماذافا! كيف أقاتل في ساحة المعركة بهيشما—بيتامها آل كورو الشيخ، الشيخ الموقَّر والمعلم الجليل، صاحب الحكم الصافي والحكمة؟»
Verse 92
क्रीडता हि मया बाल्ये वासुदेव महामना: । पांसुरूषितगात्रेण महात्मा परुषीकृत:,“वासुदेव! बचपनमें खेलते समय मैंने अपने धूलि-धूसर शरीरसे उन महामनस्वी महात्माको सदा दूषित किया है
قال سنجيا: «يا فاسوديفا! في طفولتي، وأنا ألعب، كنتُ—وجسدي مغطّى بالغبار—أعامل ذلك العظيم النفس، النبيل الهمة، بخشونة مرارًا وأدنّسه. وإذ أتذكر ذلك الآن، أقرّ بخطيئتي».
Verse 93
यस्याहमधिरुह्याडुकं बाल: किल गदाग्रज । तातेत्यवोचं पितरं पितु: पाण्डोर्महात्मन:,“गदाग्रज! कहते हैं, मैं बचपनमें अपने पिता महात्मा पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मजीकी गोदमें चढ़कर जब उन्हें तात कहकर पुकारता था, उस समय उस बाल्यावस्थामें ही वे मुझसे इस प्रकार कहते थे--“भरतनन्दन! मैं तुम्हारा तात नहीं, तुम्हारे पिताका तात हूँ।' वे ही वृद्ध पितामह मेरे द्वारा मारनेयोग्य कैसे हो सकते हैं?
قال سنجيا: «يا أخا حامل الهراوة الأكبر! يُروى أنّي حين كنت طفلًا كنت أصعد إلى حجر ذلك الرجل نفسه وأدعوه “أبي”. لكنه كان يصحح لي حتى في صباي: “يا ابن بهاراتا، لستُ أباك؛ بل أنا أبو أبيك.” فكيف يكون ذلك الجدّ الشيخ—الذي كان لي بمنزلة الأب—ممن يليق أن أقتله؟»
Verse 94
नाहं तातस्तव पितुस्तातो5स्मि तव भारत । इति मामब्रवीद् बालये य: स वध्य: कथं मया,“गदाग्रज! कहते हैं, मैं बचपनमें अपने पिता महात्मा पाण्डुके भी पितृतुल्य भीष्मजीकी गोदमें चढ़कर जब उन्हें तात कहकर पुकारता था, उस समय उस बाल्यावस्थामें ही वे मुझसे इस प्रकार कहते थे--“भरतनन्दन! मैं तुम्हारा तात नहीं, तुम्हारे पिताका तात हूँ।' वे ही वृद्ध पितामह मेरे द्वारा मारनेयोग्य कैसे हो सकते हैं?
قال سنجيا: «يا بهاراتا: “لستُ أباك؛ بل أنا أبو أبيك.” هكذا خاطبني وأنا بعدُ طفل. فكيف يكون ذلك الجدّ الشيخ نفسه—الذي قوّمني بعنايةٍ أبوية—ممن يليق أن أقتله؟ إن هذه الذكرى تكشف صراع الضمير حين يُقاتِل المرءُ شيوخه في حربٍ تُسمّى عادلة.»
Verse 95
काम वध्यतु सैन्यं मे नाहं योत्स्ये महात्मना | जयो वास्तु वधो वा मे कथं वा कृष्ण मन्यसे,“भले ही वे मेरी सेनाका नाश कर डालें, मेरी विजय हो अथवा मृत्यु; परंतु मैं उन महात्मा भीष्मके साथ युद्ध नहीं करूँगा; अथवा श्रीकृष्प!ी आप कैसा ठीक समझते हैं?
قال سنجيا: «فليُهلكوا جيشي إن شاءوا. سواء أكانت الغلبة لي أم كان الموت نصيبي—فلن أقاتل بهيشما العظيم النفس. يا كريشنا، ما الذي تراه صوابًا في هذا الأمر؟»
Verse 96
(कथमस्मद्विध: कृष्ण जानन् धर्म सनातनम् | न्यस्तशस्त्रे च वृद्धे च प्रहरेद्धि पितामहे ।।) “श्रीकृष्ण! अपने सनातन धर्मको जाननेवाला मेरे-जैसा पुरुष हथियार डालकर बैठे हुए अपने बूढ़े पितामहपर प्रहार कैसे करेगा? वायुदेव उवाच प्रतिज्ञाय वध॑ जिष्णो पुरा भीष्मस्य संयुगे | क्षत्रधर्मे स्थित: पार्थ कथं नैनं हनिष्यसि,भगवान् श्रीकृष्ण बोले--विजयी कुन्तीकुमार! तुम क्षत्रियधर्ममें स्थित हो। युद्धमें तुम पहले भीष्मके वधकी प्रतिज्ञा करके अब उन्हें कैसे नहीं मारोगे?
قال فايُو: «يا كريشنا، كيف لرجلٍ مثلي—يعرف الدارما الأزلية—أن يضرب جدَّه، شيخًا طاعنًا قد ألقى سلاحه؟» وتابع فايُو: «يا جِشنو (أرجونا)، لقد نذرتَ من قبلُ في ساحة القتال أن تُفضي إلى موت بهيشما. وأنت ثابتٌ على دارما الكشاتريا، يا بارثا، فكيف تمتنع الآن عن قتله؟»
Verse 97
पातयैनं रथात् पार्थ क्षत्रियं युद्धदुर्मदम् नाहत्वा युधि गाड़ेयं विजयस्ते भविष्यति,पार्थ! तुम युद्धदुर्मद क्षत्रियप्रवर भीष्मको रथसे मार गिराओ। रणक्षेत्रमें गंगानन्दन भीष्मको मारे बिना तुम्हारी विजय नहीं होगी
Vāyu said: “O Pārtha, strike down from his chariot this kṣatriya, intoxicated with the pride of battle. Unless you slay this steadfast Gāṅgeya in the thick of combat, victory will not be yours, O Pārtha.”
Verse 98
दृष्टमेतत् पुरा देवैर्गमिष्यति यमक्षयम् । यद् दृष्ट हि पुरा पार्थ तत् तथा न तदन्यथा,इस बातको देवताओंने पहलेसे ही देख रखा है। भीष्म इसी प्रकार यमलोकको जायँगे। पार्थ!! जिसे देवताओंने देखा है, वह उसी प्रकार होगा। उसे कोई बदल नहीं सकता
Vāyu said: “This has long ago been foreseen by the gods: Bhīṣma will depart to the imperishable realm of Yama. O Pārtha, what the gods have already seen will come to pass exactly so—never otherwise. No one can alter it.”
Verse 99
न हि भीष्म दुराधर्ष व्यात्तानममिवान्तकम् | त्वदन्य: शक्नुयाद् योद्धुमपि वज्रधर: स्वयम्,दुर्धर्ष वीर भीष्म मुँह फैलाये हुए कालके समान प्रतीत होते हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कोई, भले ही वह साक्षात् वज्रधारी इन्द्र ही क्यों न हो, उनके साथ युद्ध नहीं कर सकता
Verse 100
जहि भीष्म॑ स्थिरो भूत्वा शृणु चेद॑ं वचो मम । यथोवाच पुरा शक्रं महाबुद्धिर्बहस्पति:,अर्जुन! तुम स्थिर होकर भीष्मको मारो और मेरी यह बात सुनो, जिसे पूर्वकालमें महाबुद्धिमान् बृहस्पतिजीने देवराज इन्द्रको बताया था
“Slay Bhīṣma, standing firm, and listen to these words of mine—words that the great-minded Bṛhaspati once spoke long ago to Śakra (Indra).” In the ethical frame of the war, the speaker urges resolute action without inner collapse, grounding the hard necessity of battle in counsel sanctioned by ancient, authoritative instruction.
Verse 101
ज्यायांसमपि चेद् वृद्ध गुणैरपि समन्वितम् । आततायिनमायान्तं हन्याद् घातकमात्मन:,कोई बड़े-से-बड़े गुरुजन, वृद्ध और सर्वगुणसम्पन्न पुरुष ही क्यों न हों, यदि शस्त्र उठाकर अपना वध करनेके लिये आ रहे हों तो उस आततायीको अवश्य मार डालना चाहिये
Even if the assailant is one’s superior—an elder and a man endowed with virtues—if he comes as an ātatāyin, weapon raised to take your life, then he should be struck down; one must kill the would-be killer of oneself. The ethical point is that imminent murderous aggression cancels ordinary deference to age, status, or merit, and self-protection becomes a duty.
Verse 102
शाश्वतो<यं स्थितो धर्म: क्षत्रियाणां धनंजय । योद्धव्यं रक्षितव्यं च यष्टव्यं चानसूयुभि:,धनंजय! यह क्षत्रियोंका निश्चित सनातन धर्म है। उन्हें किसीके प्रति दोषदृष्टि न रखकर सदा युद्ध, प्रजाओंकी रक्षा और यज्ञ करते रहने चाहिये
قال فايُو: «يا دهننْجَيا، هذا هو الدَّرْمَا (dharma) الثابت والأزلي للكشاتريا (kṣatriya): من غير حقد ولا تتبّع لعيوب أحد، عليهم أن يقاتلوا حين يدعو الواجب، وأن يحموا الرعية، وأن يداوموا على إقامة القرابين والذبائح الطقسية (yajña).»
Verse 103
अजुन उवाच शिखण्डी निधन कृष्ण भीष्मस्य भविता ध्रुवम् । दृष्टवैव हि सदा भीष्म: पाज्चाल्यं विनिवर्तते
قال أرجونا: «يا كريشنا، لا ريب أن شيخَنْدي (Śikhaṇḍī) سيكون سبب سقوط بهيشما (Bhīṣma). فبهیشما، ما إن يرى محارب بانچالا (Pāñcāla) ذاك حتى يرتدّ دائماً، رافضاً المبارزة.»
Verse 104
अर्जुनने कहा--श्रीकृष्ण! शिखण्डी निश्चय ही भीष्मकी मृत्युका कारण होगा; क्योंकि भीष्म उस पांचाल-राजकुमारको देखते ही सदा युद्धसे निवृत्त हो जाते हैं ।। ते वयं प्रमुखे तस्य पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् । गाड़ेयं पातयिष्याम उपायेनेति मे मति:,अतः: हम सब लोग उनके सामने शिखण्डीको खड़ा करके श्त्रप्रहाररूप उपायद्वारा गंगानन्दन भीष्मको मार गिरायेंगे, यही मेरा विचार है
قال أرجونا: «يا شري كريشنا، إن شيخَنْدي سيكون يقيناً سبب موت بهيشما؛ لأن بهيشما ما إن يرى أمير بانچالا ذاك حتى ينصرف دائماً عن القتال. لذلك سنجعل شيخَنْدي أمامه، وبحيلة ضربات السلاح سنُسقط بهيشما—ابن الغانغا. هذا رأيي بعد نظر.»
Verse 105
अहमन्यान् महेष्वासान् वारयिष्यामि सायकै: । शिखण्ड्यपि युधां श्रेष्ठ भीष्ममेवाभियोधयेत्,मैं बाणोंद्वारा अन्य महाधनुर्धरोंको रोकूँगा। शिखण्डी भी योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्मके साथ ही युद्ध करे
قال أرجونا: «سأكفّ سائر الرماة العظام بسهامي. وليُبارز شيخَنْدين أيضاً—يا خيرَ المحاربين—بهیشما وحده.»
Verse 106
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें नवें दिनके युद्धका समाप्तिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ,श्रुतं हि कुरुमुख्यस्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् । कन्या होषा पुरा भूत्वा पुरुष: समपद्यत कुरुकुलके प्रधान वीर भीष्मका यह निश्चय है कि मैं शिखण्डीको नहीं मारूँगा; क्योंकि वह पहले कन्यारूपमें उत्पन्न होकर पीछे पुरुष हुआ है
قال سانجَيا: «لقد سمعتُ عزمَ بهيشما، وهو أسبقُ الكورو: “لن أقتل شيخَنْدين؛ لأنه وُلد قديماً أنثى، ثم صار رجلاً بعد ذلك.”»
Verse 107
(अर्जुनस्य वच: श्रुत्वा भीष्मस्य वधसंयुतम् । जद्वषुहष्टरोमाण: सकृष्णा: पाण्डवास्तदा ।।) अर्जुनका भीष्मके वधसे सम्बन्ध रखनेवाला यह वचन सुनकर श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। उस समय हर्षातिरेकके कारण उनके शरीरोंमें रोमांच हो आया। इत्येवं निश्चयं कृत्वा पाण्डवा: सहमाधवा: । अनुमान्य महात्मानं प्रययुर्ष्टमानसा: । शयनानि यथास्वानि भेजिरे पुरुषर्षभा:,ऐसा निश्चय करके श्रीकृष्णसहित पाण्डव मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट हो महात्मा भीष्मसे विदा लेकर चले गये और उन पुरुषशिरोमणियोंने अपनी-अपनी शय्याओंका आश्रय लिया इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि नवमदिवसावहारोत्तरमन्त्रे सप्ताधिकशततमो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ा भारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें नवें दिनके युद्धके समाप्त होनेके पश्चात् परस्पर गुप्तमन्त्रणाविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ
فلما سمع الباندافا، ومعهم كريشنا، كلام أرجونا—الكلام المتصل بالعزم على إسقاط بهيشما—امتلأوا فرحًا عظيمًا. وغلبتهم النشوة حتى اقشعرت أبدانهم. وإذ ثبتوا على هذا القرار، انصرف الباندافا مع ماذافا وقد اطمأنت نفوسهم، فاستأذنوا بهيشما العظيم النفس وودّعوه ثم مضوا؛ ثم آوى أولئك الأخيار من الرجال كلٌّ إلى مضجعه.
Verse 456
दुर्योधनार्थ योत्स्यामि सत्यमेतदिति प्रभो । मेरी भीष्मजीके साथ एक शर्त हो चुकी है। उन्होंने कहा है कि “मैं युद्धमें तुम्हारे हितके लिये सलाह दे सकता हूँ, परंतु तुम्हारी ओरसे किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। युद्ध तो मैं केवल दुर्योधनके लिये ही करूँगा।' प्रभो! यह बिलकुल सच्ची बात है
قال يودهيشثيرا: «يا مولاي، سأقاتل من أجل دوريودhana—وهذا حقٌّ لا ريب فيه». وفي سياق الكلام يذكر شرط بهيشما السابق: يجوز لبهیشما أن يسدي المشورة لما فيه خير الباندافا، لكنه لن يحمل السلاح نيابةً عنهم؛ وفي ساحة القتال لن يقاتل إلا من أجل دوريودhana.
Verse 656
पश्यामस्त्वां महाबाहो रथे सूर्यमिवापरम् । “आप युद्धमें सदा मण्डलाकार धनुषके साथ ही परिलक्षित होते हैं। महाबाहो! आप रथपर दूसरे सूर्यके समान विराजमान होकर कब बाण हाथमें लेते हैं, कब धनुषपर रखते हैं और कब उसकी डोरीको खींचते हैं, यह सब हमलोग नहीं देख पाते हैं
قال سنجيا: «نراك، أيها العظيم الذراعين، قائمًا على مركبتك كأنك شمسٌ ثانية. وفي ساحة القتال تُرى دائمًا وقوسك يدور كالدائرة التامة؛ وبسرعةٍ مدهشة—تأخذ السهام بيدك، وتضعها على القوس، وتشد الوتر—حتى إننا لا نكاد ندرك تتابع أفعالك.»
Verse 666
को<थ वोत्सहते जेतु त्वां पुमान् भरतर्षभ । शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले भरतश्रेष्ठ. आप रथ, अश्व, पैदल मनुष्य और हाथियोंका भी संहार करनेवाले हैं। कौन पुरुष आपको जीतनेका साहस कर सकता है?
قال سنجيا: «من ذا الذي يجرؤ من الرجال على قهرك، يا ثورَ آلِ بهاراتا؟ يا أفضلَ بهاراتا، أنت مُهلكُ أبطال الأعداء؛ تُسقط العربات والخيول والمشاة، بل وحتى الفيلة. أيُّ رجلٍ يملك الجرأة على هزيمتك؟»
Verse 726
हते मयि हतं सर्व तस्मादेवं विधीयताम् । “कुन्तीकुमारो! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम सुख-पूर्वक मेरे ऊपर प्रहार करो। मैं तुम्हारे लिये यह पुण्यकी बात मानता हूँ कि तुम्हें मेरे इस प्रभावका ज्ञान हो गया कि मेरे मारे जानेपर सारी कौरव-सेना मरी हुई ही हो जायगी; अतः ऐसा ही करो (मुझे मार डालो)'
قال سنجيا: «إذا قُتلتُ فكأن كلَّ شيءٍ قد قُتل؛ فليُفعل الأمر على هذا الوجه.» إن هذا القول لا يصوّر القتل ثأرًا شخصيًا، بل ضرورةً قاتمةً في الحرب، استراتيجيةً وأخلاقيةً معًا: فسقوطُ محاربٍ محوريّ يُقدَّم شرطًا حاسمًا لانهيار جيش الخصم، ويحثّ السامع على المضيّ وفق ذلك.
Verse 746
न भवान् समरे शक: सेन्द्रैरपि सुरासुरै: । वज्रधारी इन्द्र, वरूण और यम--इन सबको जीता जा सकता है; परंतु आपको तो समरभूमिमें इन्द्र आदि देवता और असुर भी नहीं जीत सकते
قال يودهيشثيرا: «في ساحة القتال أنتَ لا تُقهَر—ولو اجتمع الآلهةُ والأسورا معًا، وعلى رأسهم إندرا. إندرا حاملُ الصاعقة، وفارونا، وياما—هؤلاء يمكن التغلب عليهم؛ أمّا أنتَ في ميدان الحرب فلا يقدر على قهرك إندرا وسائرُ الآلهة، ولا الأسورا.»
Verse 796
अमड्ुल्यध्वजं दृष्टवा न युध्येयं कदाचन । राजेन्द्र! मेरे पहलेसे सोचे हुए इस संकल्पको सुनो, जिसकी ध्वजामें कोई अमंगलसूचक चिह्न हो, ऐसे पुरुषको देखकर मैं कभी उसके साथ युद्ध नहीं कर सकता
قال بهيشما: «إذا رأيتُ رجلًا رايتُه تحمل علامة شؤم، فلن أقاتله أبدًا. يا خيرَ الملوك، اسمع هذا العهد الذي عقدتُه من قبل: إذا أبصرتُ من يحمل لواءً عليه إشارة تنذر بالنحس، فلا أستطيع أن أشتبك معه في القتال.»
Verse 823
मामेव विशिखैस्ती3्ष्णैरभिद्रवतु दंशित: । ये सारी बातें जैसे हुई हैं, वह सब तुमलोग भी जानते हो। शूरवीर अर्जुन समरांगणमें कवच धारण करके शिखण्डीको आगे रखकर मुझपर तीखे बाणोंद्वारा आक्रमण करे
قال بهيشما: «ليُقبلْ عليَّ المحاربُ المدرَّع اندفاعًا مباشرًا، لا بسوى السهام الحادّة. أنتم جميعًا تعلمون كيف جرت الأمور. فليلبسْ أرجونا البطل درعه في ساحة القتال، وليجعلْ شيخَنْدي أمامه، ثم ليُمطرني بالنبال القاطعة.»
Verse 846
शरैर्घातयतु क्षिप्रं समन््ताद् भरतर्षभ | भरतश्रेष्ठ] इसी अवसरका लाभ लेकर पाण्डुपुत्र अर्जुन मुझे चारों ओरसे शीघ्रतापूर्वक बाणोंद्वारा मार डालनेका प्रयत्न करे
قال بهيشما: «يا ثورَ آلِ بهاراتا، فليُسقطني سريعًا بسهامه من كل جانب.»
Verse 856
ऋते कृष्णान्महाभागात् पाण्डवाद् वा धनज्जयात् । मैं महाभाग भगवान् श्रीकृष्ण अथवा पाण्डुपुत्र धनंजयके सिवा दूसरे किसीको जगतमें ऐसा नहीं देखता, जो युद्धके लिये उद्यत होनेपर मुझे मार सके
قال بهيشما: «ما خلا كريشنا الجليل، أو دهنَنْجَيا (أرجونا) ابنَ باندو، فلا أرى في هذا العالم أحدًا—إذا ما حملتُ السلاح وعزمتُ على القتال—يستطيع أن يصرعني.»
Verse 931
गुरुणा कुरुवृद्धेन कृतप्रज्ञेन धीमता । पितामहेन संग्रामे कथं योद्धास्मि माधव
قال سَنْجَيَا: «يا مَادْهَفَا، كيف أقاتل في هذه المعركة ضدّ الجدّ الجليل—معلّمي، أكبر الكورو سنًّا—وهو الحكيم الثابت الفهم، ذو التمييز الواضح؟»
The chapter implicitly stages the dilemma of duty under escalation: elite warriors intensify force to stabilize formations, while the narrative highlights the human and material cost—testing how kṣātra-dharma is executed without losing strategic restraint.
Competence and composure function as ethical instruments: disciplined action, coordination, and clarity of role can contain chaos, even when outcomes remain uncertain and consequences accumulate rapidly.
No explicit phalaśruti appears in this unit; the meta-commentary is embedded in Saṃjaya’s evaluative framing—Bhīṣma is described as the Kauravas’ decisive stake (glaha), signaling the interpretive weight of understanding command, morale, and strategy in the epic’s dharma inquiry.