Mahabharata Adhyaya 83
Adi ParvaAdhyaya 8342 Verses

Adhyaya 83

आदि पर्व — अध्याय ८३: ययाति-इन्द्र-संवादः तथा अष्टक-प्रश्नः (Yayāti–Indra Dialogue and Aṣṭaka’s Inquiry)

Upa-parva: Sambhava (Genealogical Origins) — Yayāti–Indra–Aṣṭaka Episode

This chapter presents a layered ethical discourse on merit, pride, and the fragility of exalted states. Indra questions Yayāti—who has renounced household life for the forest—asking to whom he is comparable in austerity. Yayāti replies that he sees no equal to his own tapas among devas, humans, gandharvas, or great ṛṣis, prompting Indra to diagnose the consequence: because Yayāti disparaged those similar, superior, and inferior without understanding their true power, the worlds he attained are finite, and with merit exhausted he falls. Yayāti accepts the causal logic and states a preference: if deprived of the deva-world, he wishes to fall among the virtuous (sat) rather than into dishonor. Indra affirms that among the virtuous Yayāti regains stability and warns against contempt toward peers and superiors. The narration then shifts (Vaiśaṃpāyana) to Aṣṭaka observing the radiant figure falling from the divine path and, with others, inquiring about his identity and the reason for his descent. The chapter closes with gnomic statements on “prabhutva” (excellence/sovereignty) in domains—fire in heating, earth in sustaining, sun in illumination, and the preeminence of the virtuous as a refuge for those who have fallen from comfort.

Chapter Arc: देवयानी, आहत अभिमान और धर्म-भय से काँपती हुई, शर्मिष्ठा से पूछ बैठती है—“कामलुब्ध होकर तुमने यह कैसा पाप कर डाला?”; सखियों का संबंध अब न्यायालय बन जाता है। → शर्मिष्ठा अपने कृत्य का औचित्य गढ़ती है—एक धर्मात्मा ऋषि के वरदान/धर्मसम्मत याचना का हवाला देकर वह देवयानी के आरोप को टालती है। उधर दोनों का साझा-समर्पण (देवयानी की पिता-गुरु शुक्राचार्य द्वारा) ययाति के गृह में एक ही छत के नीचे ईर्ष्या, अधिकार और ‘कौन किसकी’ की आग को और भड़काता है। → ययाति के सामने प्रसंग फूट पड़ता है और शुक्राचार्य के समक्ष निर्णायक प्रश्न उठता है—शर्मिष्ठा ऋतु-दान/संतान-धर्म की याचना करती है, ययाति उसे देने से हिचकता है; तब शुक्राचार्य कठोर शाप देते हैं—राजा पर जरा का आरोपण। शाप के साथ ही एक असंभव-सा उपाय भी खुलता है: जरा को किसी अन्य में संक्रामित किया जा सकता है। → ययाति, शाप की सत्यता स्वीकार कर, शुक्राचार्य से अनुमति माँगता है कि कोई पुत्र उसे अपना यौवन दे; शुक्राचार्य धर्म-भाव से स्मरण करने पर पाप-रहित संक्रांति की अनुमति देते हैं। अध्याय का अंत वैम्पायन के सूत्र-वाक्य से होता है—राजा से पूछकर अब वह कुमारों (पुत्रों) से प्रश्न करेगा, अर्थात् ययाति का यौवन-याचना प्रसंग अगली कड़ी की ओर बढ़ता है। → ययाति किस पुत्र से यौवन माँगेगा, कौन देगा, और इस ‘यौवन-दान’ का धर्मफल किस पर पड़ेगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ११ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं) ऑपन-आ प्रात बछ। अर: 2 तग्रय्शीतितमो<ध्याय: देवयानी और शर्मिष्ठाका संवाद

قال فايشَمبايانا: لما سمعت دِڤَياَني—ذات الابتسامة الطاهرة—أن غلاماً قد وُلد، استولى عليها الحزن وأخذت تُعمل فكرها في ألم، موجِّهة خواطرها المضطربة نحو شَرْمِشْتَا، يا بهاراتا.

Verse 2

देवयान्युवाच किमिदं वृजिनं सुभ्रु कृतं वै कामलुब्धया,देवयानीने कहा--सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठे! तुमने कामलोलुप होकर यह कैसा पाप कर डाला?

قالت ديفاياني: «يا شارميشثا ذات الحاجبين الحسنين، ما هذا الإثم الذي اقترفتِه—حقًّا بدافع الشهوة الجامحة؟ أيُّ فعلٍ آثمٍ هذا الذي أقدمتِ عليه!»

Verse 3

शर्मिष्ोवाच ऋषिरभ्यागत: कश्रिद्‌ धर्मात्मा वेदपारग: । स मया वरद: काम याचितो धर्मसंहितम्‌

قالت شارميشثا: «يا صديقتي، لقد قدم إلينا ناسكٌ من الرِّشي، تقيّ النفس، بالغُ الإحاطة بالڤيدا. ومن ذلك الرائي الواهب للبركات طلبتُ—وفق الدارما—تحقيق رغبتي.»

Verse 4

नाहमन्यायत: काममाचरामि शुचिस्मिते । तस्मादृषेर्ममापत्यमिति सत्यं ब्रवीमि ते,शुचिस्मिते! मैं न्यायविरुद्ध कामका आचरण नहीं करती। उन ऋषिसे ही मुझे संतान पैदा हुई है, यह तुमसे सत्य कहती हूँ

«يا ذات الابتسامة الطاهرة، لستُ أتّبع الرغبة على وجهٍ يخالف العدل وحُسن السلوك. لذلك أقول لكِ الحق: إن الطفل الذي لي هو من نسل ذلك الرِّشي.»

Verse 5

देवयान्युवाच शोभनं भीरु यद्येवमथ स ज्ञायते द्विज: । गोत्रनामाभिजनतो वेत्तुमिच्छामि तं॑ द्विजम्‌

قالت ديفاياني: «حسنٌ يا خجولة، إن كان الأمر كذلك فذاك خير. وإن أمكن التعرف إلى ذلك البراهمن حقًّا، فإني أود أن أعرف نسبه: غوترته، واسمه، وأصل أسرته.»

Verse 6

शर्मिष्शोवाच तपसा तेजसा चैव दीप्यमानं यथा रविम्‌ | त॑ दृष्टवा मम सम्प्रष्टं शक्तिनासीच्छुचिस्मिते

قالت شارميشثا: «يا ذات الابتسامة الطاهرة، لقد كان متوهّجًا بتقشّفه وبريقه الروحي كالشمس. فلما رأيته لم تكن لي جرأةٌ ولا طاقةٌ على سؤاله.»

Verse 7

देवयान्युवाच यद्येतदेवं शर्मिछे न मन्युर्विद्यते मम । अपत्यं यदि ते लब्धं ज्येष्ठाच्छेष्ठाच्च वै द्विजात्‌

قالت ديفاياني: «إن كان الأمر حقًّا كذلك، يا شارميشثا، فلا يبقى في نفسي غضب. وإن كنتِ قد رُزِقتِ ذريةً من رجلٍ من ذوي الميلادين، وهو أقدم سنًّا وأرفع منزلةً، فلن أحمل عليكِ حقدًا بعد اليوم».

Verse 8

वैशम्पायन उवाच अन्योन्यमेवमुक्‍त्वा तु सम्प्रहस्य च ते मिथ: । जगाम भार्गवी वेश्म तथ्यमित्यवजग्मुषी

قال فيشامبايانا: وبعد أن تكلّمتا إحداهما إلى الأخرى على هذا النحو، ضحكتا معًا. وأمّا البهارغفية (ديفاياني)، إذ رأت أن قول شارميشثا حقّ، عادت إلى القصر صامتةً.

Verse 9

ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नूप: । यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ

قال فيشامبايانا: إن الملك يَياطي أنجب من ديفاياني ابنين: يَدو وتُرفَسو، وكانا يبدوان كأنهما إندرا وفيشنو آخران، متلألئين قوةً وبشارةً.

Verse 10

तस्मादेव तु राजर्षे: शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी । | चानुं च पूरुं च त्रीन्‌ कुमारानजीजनत्‌,उन्ही राजर्षिसे वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने तीन पुत्रोंको जन्म दिया, जिनके नाम थे द्रुह्मु, अनु और पूरु

قال فيشامبايانا: ومن ذلك الملك الحكيم نفسه، ولدت شارميشثا—ابنة فْرِشَپَرفَن—ثلاثة بنين: دْرُهْيُو، وأَنُو، وبُورو.

Verse 11

ततः काले तु कम्मिंश्चिद्‌ देवयानी शुचिस्मिता । ययातिसहिता राजञ्जगाम रहित॑ वनम्‌,राजन्‌! तदनन्तर किसी समय पवित्र मुसकानवाली देवयानी ययातिके साथ एकान्त वनमें गयी

قال فيشامبايانا: ثم في وقتٍ ما، مضت ديفاياني—ذات الابتسامة الطاهرة الرقيقة—مع الملك يَياطي إلى غابةٍ منعزلة.

Verse 12

ददर्श च तदा तत्र कुमारान्‌ देवरूपिण: । क्रीडमानान्‌ सुविश्रब्धान्‌ विस्मिता चेदमब्रवीत्‌

قال فايشَمبايانا: عندئذٍ، هناك، رأت فتيانًا ذوي جمالٍ كجمال أبناء الآلهة، يلعبون بلا خوف، مطمئنين مستريحين. فلما أبصرت ذلك دهشت، وقالت على النحو الآتي—مُطلِقةً انعطافةً جديدة في السرد، حيث يقود العجبُ والسؤالُ إلى التعرّف، وإلى انكشاف أحداثٍ موثوقةٍ بقيود الدارما.

Verse 13

देवयान्युवाच कस्यैते दारका राजन देवपुत्रोपमा: शुभा: । वर्चसा रूपतश्वैव सदृशा मे मतास्तव

قالت ديفاياني: «أيها الملك، لمن هؤلاء الغلمان، ذوو السِّمات المباركة، الشبيهون بأبناء الآلهة؟ إنهم في إشراقهم وجمالهم—فيما أرى—يشبهونك.»

Verse 14

देवयान्युवाच कि नामधेयं वंशो व: पुत्रका: कश्न वः पिता । प्रत्रूत मे यथातथ्यं श्रोतुमिच्छामि त॑ हाहम्‌

قالت ديفاياني: «ما اسم سلالتكم؟ يا أبنائي، من أبوكم؟ أخبروني بالحق، على وجه الدقة كما هو، فإني أريد أن أسمع اسمه.»

Verse 15

(एवमुक्ता: कुमारास्ते देवयान्या सुमध्यमा ।) तेडदर्शयन्‌ प्रदेशिन्या तमेव नृपसत्तमम्‌ | शर्मिष्ठां मातरं चैव तथा5<चख्युश्न॒ दारका:

قال فايشَمبايانا: فلما خاطبتهم ديفاياني ذات الخصر الرشيق بذلك، أشار أولئك الغلمان بالسبّابة إلى ذلك الملك نفسه، خير الملوك، وصرّحوا أيضًا بأن شارميشْثا هي أمّهم. ويكشف هذا المشهد في هدوء توتّرًا أخلاقيًا ينشأ عن نسبٍ مستور، وعن حقيقةٍ لا بد أن تطفو داخل البيت الملكي.

Verse 16

अभिगम्य च शर्मिष्ठां देवयान्यब्रवीदिदम्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पवित्र मुसकानवाली देवयानीने जब सुना कि शर्मिष्ठाके पुत्र हुआ है

قال فايشَمبايانا: إن ديفاياني تقدّمت إلى شارميشْثا وخاطبتها بهذه الكلمات. وقال فايشَمبايانا أيضًا: وبعد أن قيل ذلك، تقدّم أولئك الغلمان جميعًا معًا إلى الملك؛ غير أنّ الملك، وديفاياني قائمةٌ بقربه، لم يرحّب بهم—لم يتلقَّهم بمودّة. ويُبرز المشهد كيف يمكن للغيرة والمحاباة داخل البيت أن تُشوِّه سلوك الحاكم، فتجعل دفءَ الأبوة الطبيعي عرضًا محسوبًا، تصوغه خشيةُ النزاع والحرصُ على المنزلة.

Verse 17

रुदन्तस्ते5थ शर्मिष्ठामभ्ययुर्बालकास्तत: । श्र॒ुत्वा तु तेषां बालानं सब्रीड इव पार्थिव:,तब वे बालक रोते हुए शर्मिष्ठाके पास चले गये। उनकी बातें सुनकर राजा ययाति लज्जित-से हो गये

ثم إنّ الغلمان، وهم يبكون، دنَوا من شارميشثا. فلمّا سمع الملك يَياتي كلام أولئك الأطفال بدا كأنّ الخجل قد غلبه—إذ اضطرب ضميره لما توحي به دموعهم، ولما في الأمر من تصرّف غير لائق أوقعهم في تلك الشدّة.

Verse 18

दृष्टवा तु तेषां बालानां प्रणयं पार्थिवं प्रति । बुद्ध्वा च तत्त्वं सा देवी शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्‌,उन बालकोंका राजाके प्रति विशेष प्रेम देखकर देवयानी सारा रहस्य समझ गयी और शर्मिष्ठासे इस प्रकार बोली

ولمّا رأت دِفَياني ذلك الودّ الخاص الذي يكنّه الغلمان للملك، وأدركت حقيقة الأمر، فهمت السِّرّ المستور، ثم خاطبت شارميشثا على هذا النحو—لتدفع الحكاية إلى محاسبةٍ أخلاقية في ضوء الدَّرما، تتعلّق بالولاء والنفوذ وعواقب المقاصد المضمَرة.

Verse 19

देवयान्युवाच (अभ्यागच्छति मां कश्रिदृषिरित्येवमब्रवी: | ययातिमेव नूनं॑ त्वं प्रोत्माहयसि भामिनि ।।

قالت دِفَياني: «كنتِ تقولين: “يأتيني رِشيٌّ”، وما كان ذلك إلا ذريعة. لا ريب، أيتها المتقدة، أنّك إنما كنتِ تحثّين الملك يَياتي نفسه على المجيء إليك. لقد أنذرتك من قبل، ومع ذلك ارتكبتِ الإثم. وأنتِ تحت سلطاني، لِمَ فعلتِ ما يسيء إليّ؟ لقد عدتِ إلى تلك السيرة الأسورية بعينها—أفلا تخافينني؟»

Verse 20

शर्मिष्टोवाच यदुक्तमृषिरित्येव तत्‌ सत्यं चारुहासिनि । न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते

أجابت شارميشثا: «يا صاحبة الابتسامة العذبة، إنّ ما قلته عن “رِشيٍّ” هو حقّ. إنني أسير وفق العدل ووفق الدَّرما، فلذلك لا أخافك.»

Verse 21

यदा त्वया वृतो भर्ता वृत एव तदा मया । सखीभर्ता हि धर्मेण भर्ता भवति शोभने,(त्वत्पित्रा गुरुणा मे च सह दत्ते उभे शुभे । तव भर्ता च पूज्यश्न पोष्यां पोषयतीह माम्‌ ।।

قال فَيْشَمْبايَنَة: «حين اخترتِ زوجكِ، في تلك اللحظة نفسها اختيرتُ أنا أيضًا. أيتها الحسناء، فبحكم الدَّرما يصبح زوج المرأة—على وجهٍ مشروع—زوجًا كذلك لرفيقاتها غير المتزوّجات اللواتي هنّ في كنفها. إنّ أباكِ، وهو أيضًا شيخي الموقَّر، قد سلّمنا كلتينا معًا. لذلك فزوجكِ جدير بالإجلال؛ ولأنني ممن يجب إعالتهم فهو يعولني هنا. أفلا تفهمين؟»

Verse 22

पूज्यासि मम मान्या च ज्येष्ठा च ब्राह्मणी हासि । त्वत्तोडपि मे पूज्यतमो राजर्षि: कि न वेत्थ तत्‌,(त्वत्पित्रा गुरुणा मे च सह दत्ते उभे शुभे । तव भर्ता च पूज्यश्न पोष्यां पोषयतीह माम्‌ ।।

قال فايشَمبايانا: «إنكِ جديرة بعبادتي واحترامي؛ فأنتِ الكبرى، وأنتِ امرأةٌ براهمنية. غير أنّ هذا الحكيمَ الملكَ أحقُّ عندي بالتبجيل منكِ—أفلا تعلمين ذلك؟ لأن أباكِ، وهو أيضًا مُعلّمي، قد زوّجنا كلتينا معًا في وقتٍ واحد. وزوجُكِ، وهو في ذاته مُوقَّر، يعولني هنا على أنّي ممّن هم في حمايته ورعايته».

Verse 23

शुभे! तुम्हारे पिता और मेरे गुरु (शुक्राचार्यजी)-ने हम दोनोंको एक ही साथ महाराजकी सेवामें समर्पित किया है। तुम्हारे पति और पूजनीय महाराज ययाति भी मुझे पालन करनेयोग्य मानकर मेरा पोषण करते हैं। वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा तस्यास्ततो वाक्यं देवयान्यब्रवीदिदम्‌ राजन्‌ नाद्येह वत्स्यामि विप्रियं मे कृतं त्वया

قال فايشَمبايانا: فلمّا سمعت ديفَياني كلامها قالت: «أيها الملك، لن أمكث هنا بعد اليوم. لقد فعلتَ ما هو شديد الإيذاء لي وممقوت عندي».

Verse 24

सहसोत्पतितां श्यामां दृष्टवा तां साश्रुलोचनाम्‌ | तूर्ण सकाशं काव्यस्य प्रस्थितां व्यथितस्तदा

قال فايشَمبايانا: لمّا رأى الملكُ يَياتِي الفتاةَ السمراء تنهض فجأةً ودموعُها تملأ عينيها، وتسرع من فورها نحو كافْيَا (شُكراچاريا)، اضطرب قلبُه يومئذٍ واشتدّ عليه الأسى.

Verse 25

अनुवदव्राज सम्भ्रान्त: पृष्ठतः सान्त्वयन्‌ नृपः । न्यवर्तत न चैव सम क्रोधसंरक्तलोचना,वे व्याकुल हो देवयानीको समझाते हुए उसके पीछे-पीछे गये, किंतु वह नहीं लौटी। उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं

قال فايشَمبايانا: تبعها الملكُ مضطربًا، يواسيها بكلماتٍ من خلفها. لكنها لم تلتفت قطّ، وكانت عيناها محمرّتَين من شدة الغضب.

Verse 26

अविब्रुवन्ती किंचित्‌ सा राजानं साश्रुलोचना । अचिरादेव सम्प्राप्ता काव्यस्योशनसो$5न्तिकम्‌

قال فايشَمبايانا: لم تُجِبِ الملكَ بكلمة؛ بعينين دامعتين لم تكن إلا تبكي. وما لبثت أن بلغت حضرة كافْيَا—أوشَنَس (شُكراچاريا).

Verse 27

सातु दृष्टवैव पितरमभिवाद्याग्रतः स्थिता । अनन्तरं ययातिस्तु पूजयामास भार्गवम्‌,पिताको देखते ही वह प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हो गयी। तदनन्तर राजा ययातिने भी शुक्राचार्यकी वन्दना की

فلما رأت أباها سجدت له إجلالًا من فورها، ثم وقفت بين يديه. وبعد ذلك أدّى الملك يَياطي ما يجب من الإكرام والتعظيم للبهارغَفيّ (شُكراچاريا)، ملتزمًا بما تقتضيه السُّنَن من توقير الشيوخ والمعلمين.

Verse 28

देवयान्युवाच अधर्मेण जितो धर्म: प्रवृत्तमधरोत्तरम्‌ । शर्मिष्ठयातिवृत्तास्मि दुहतित्रा वृषपर्वण:

قالت ديفياني: «يا أبتِ، لقد غلب اللادهرما الدهرما. ارتفع الوضيع وانحطّ الشريف. إنّ شارميشثا، ابنة فريشابرفان، قد تجاوزتني وتقدّمت عليّ.»

Verse 29

त्रयो5स्यां जनिता: पुत्रा राज्ञानेन ययातिना | दुर्भगाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते

«لقد أنجب الملك يَياطي من هذه المرأة ثلاثة أبناء. أمّا أنا—ويا لسوء حظّي—فليس لي إلا ابنان. يا أبتِ، إنما أقول لك الحق.»

Verse 30

धर्मज्ञ इति विख्यात एष राजा भृगूद्वह । अकिक्रान्तश्न मर्यादां काव्यैतत्‌ कथयामि ते

قال فايشامبايانا: «إن هذا الملك، يا أكرمَ آلِ بهريغو، مشهورٌ بأنه عارفٌ بالدهرما؛ غير أنه قد تجاوز حقًّا حدود السلوك القويم. يا ابن الشاعر (كافيا)، سأقصّ عليك هذا الخبر على وجه الصدق.»

Verse 31

शुक्र उवाच धर्मज्ञ: सन्‌ महाराज यो<धर्ममकृथा: प्रियम्‌ । तस्माज्जरा त्वामचिराद्‌ धर्षयिष्यति दुर्जया

قال شُكرا: «أيها الملك العظيم، مع أنك عارفٌ بالدهرما، فقد أحببت الأدهرما وسلكت سبيله. لذلك فإن الشيخوخة التي لا تُغلَب ستقهرُك قريبًا.»

Verse 32

पाए शेख ययातिरुवाच ऋतुं वै याचमानाया भगवन्‌ नान्यचेतसा । दुहितुर्दानवेन्द्रस्य धर्म्यमेतत्‌ कृत॑ं मया

قال يَياطي: «أيها المبجَّل! إن ابنةَ سيِّدِ الدانَفَة كانت تطلب مني “موسمها المستحق” (ṛtu)؛ ومن غير قصدٍ آخر فعلتُ ما يُعَدّ موافقًا للدهرما. فإن الرجلَ الذي يرفض أن يمنح “عطيةَ الرِّتو” لامرأةٍ تطلبه على وجهٍ مشروع، تُسَمِّيه طائفةُ البراهمَفادين وأهلُ العلم كمن يقتل الجنين. وكذلك إذا كانت امرأةٌ هي شريكةٌ مشروعة، مدفوعةً برغبةٍ محقّة، تطلب سرًّا الوصالَ، فلا يقترب منها، فإن كتبَ الدهرما—بحسب قول الحكماء—تصفه مذنبًا كمن يُهلك ثمرةَ الرحم.»

Verse 33

ऋतुं वै याचमानाया न ददाति पुमानृतुम्‌ । भ्रूणहेत्युच्यते ब्रह्मन्‌ स इह ब्रह्म॒वादिभि:

قال شُكرا: «يا براهمن، إن الرجل إذا لم يمنح المرأةَ ما طلبته من “الرِّتو” (ṛtu)، سُمِّي في هذه الدنيا عند البراهمَفادين قاتلَ الجنين.»

Verse 34

अभिकामा स्त्रियं यश्न गम्यां रहसि याचित: । नोपैति स च धर्मेषु भ्रूणहेत्युच्यते बुध:

قال شُكرا: «إذا كانت امرأةٌ يجوز الاقتراب منها شرعًا، وقد اشتهاها قلبها، فطلبت سرًّا، فلم يأتِها الرجل، فإن الحكماء في أبواب الدهرما يسمّونه قاتلَ الجنين.»

Verse 35

(यद्‌ यद्‌ याचति मां कश्चित्‌ तत्‌ तद्‌ देयमिति व्रतम्‌ । त्वया च सापि दत्ता मे नान्‍्यं नाथमिहेच्छति ।।

قال شُكرا: «نذري هذا: أيًّا ما يطلبه أحدٌ مني فذلك بعينه يجب أن أُعطيه. وإن شارميشثا نفسها—التي سلّمتَها إليّ—لم تكن تريد في هذا العالم أن تتخذ رجلًا غيري زوجًا. فلذلك، إذ حسبتُ أن إتمام رغبتها واجبٌ عليّ وفق الدهرما، فعلتُ ما فعلت. يا براهمن، فاعفُ عني.» وبعد أن وازنتُ هذه الأسباب، يا أفضلَ آلِ بهريغو، وإذ ارتجفتُ خوفًا من الوقوع في الأدهرما، مضيتُ إلى شارميشثا.

Verse 36

शुक्र उवाच नन्वहं प्रत्यवेक्ष्यस्ते मदधीनो 5सि पार्थिव । मिथ्याचारस्य धर्मेषु चौर्य भवति नाहुष

قال شُكرا: «كان ينبغي لك أن تنتظر توجيهي في هذا الأمر، أيها الملك، لأنك تحت سلطاني. يا من أنت من نسل نَهُوشا، إن من يتزيّا بلباس الدهرما ثم يسلك سلوكًا كاذبًا، فإن فعله في أبواب الدهرما يُلحق به إثمَ السرقة.»

Verse 37

वैशम्पायन उवाच क्रुद्धनोशनसा शप्तो ययातिनहुषस्तदा । पूर्व वय: परित्यज्य जरां सद्योडन्वपद्यत

قال فَيْشَمْبَايَنَة: لما أطلق الحكيم أُشَنَس (شُكْرَاتشارْيَة)، وقد اشتعل غضبًا، لعنته، فإن الملك يَياَتي ابن نَهُوشَة في تلك اللحظة بعينها ترك فتوة شبابه، وسقط حالًا في الشيخوخة.

Verse 38

ययातिरुवाच अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह । प्रसाद कुरु मे ब्रह्म॒ज्जरेयं न विशेच्च माम्‌

قال يَياَتي: «يا أكرمَ آلِ بْهْرِغُو! مع أني تمتّعتُ بالشباب مع دِفَيَانِي، فما زلتُ غيرَ مُرتوٍ. فامنحني يا براهمن نعمتك—ولا تدع هذه الشيخوخة تدخل إليّ.»

Verse 39

शुक्र उवाच नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोड्सि भूमिप | जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन्‌ संक्रामय यदीच्छसि

قال شُكْرَة: «إني لا أكذب في هذا الأمر، أيها الملك. لقد أدركتك الشيخوخة حقًّا. غير أني أمنحك خيارًا: إن شئتَ فانقل هذه الشيخوخة نفسها إلى شخصٍ آخر.»

Verse 40

ययातिरुवाच राज्यभाक्‌ स भवेद्‌ ब्रद्मन्‌ पुण्यभाक्‌ कीर्तिभाक्‌ तथा | यो मे दद्यात्‌ वय: पुत्रस्तद्‌ भवाननुमन्यताम्‌

قال يَياَتي: «يا براهمن! الابنُ الذي يمنحني فتوتَه يكونُ شريكًا في الثواب والذكر الحسن، ويكون له أيضًا نصيبٌ من مُلكي. فلتُقِرَّ ذلك.»

Verse 41

शुक्र उवाच संक्रामयिष्यसि जरां यथेष्टं नहुषात्मज । मामनुध्याय भावेन न च पापमवाप्स्यसि

قال شُكْرَة: «يا ابنَ نَهُوشَة، ستقدر أن تنقل الشيخوخة كما تشاء. وإذا تأملتَني بقلبٍ مُخلصٍ متعبّد، فلن يلحقك إثم.»

Verse 136

वैशम्पायन उवाच एवं पृष्टवा तु राजानं कुमारान्‌ पर्यपृच्छत । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजासे इस प्रकार पूछकर उसने उन कुमारोंसे प्रश्न किया

قال فَيْشَمْبَايَنَة: لمّا سأل الملك على هذا النحو، مضى بعد ذلك يسأل الأمراء أيضًا—مواصِلًا الاستقصاء على نظام، يلتمس روايةً أتمّ وأشدّ مسؤوليةً من جميع من كان لهم في الأمر يد.

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns self-evaluation versus humility: Yayāti’s claim of unmatched tapas is treated as ethically hazardous when it implies contempt for others, leading to loss of attained standing.

Attainments are unstable when grounded in pride; association with the virtuous and disciplined speech/judgment are presented as the durable supports when merit wanes or status reverses.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in Indra’s causal explanation (finite worlds, merit exhaustion) and the closing maxims that elevate sat-saṅga as a restorative moral principle.

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