आदि पर्व — अध्याय ८३: ययाति-इन्द्र-संवादः तथा अष्टक-प्रश्नः
Yayāti–Indra Dialogue and Aṣṭaka’s Inquiry
शर्मिष्टोवाच यदुक्तमृषिरित्येव तत् सत्यं चारुहासिनि । न्यायतो धर्मतश्चैव चरन्ती न बिभेमि ते,शर्मिष्ठा बोली--मनोहर मुसकानवाली सखी! मैंने जो ऋषि कहकर अपने स्वामीका परिचय दिया था, सो सत्य ही है। मैं न्याय और धर्मके अनुकूल आचरण करती हूँ, अतः तुमसे नहीं डरती
أجابت شارميشثا: «يا صاحبة الابتسامة العذبة، إنّ ما قلته عن “رِشيٍّ” هو حقّ. إنني أسير وفق العدل ووفق الدَّرما، فلذلك لا أخافك.»
वैशम्पायन उवाच