Adhyaya 30
Shalya ParvaAdhyaya 3073 Versesयुद्ध निर्णायक रूप से कौरव-पक्ष के पतन की ओर; अब केवल दुर्योधन के अंतिम प्रतिरोध पर परिणाम निर्भर।

Adhyaya 30

Dvaipāyana-hrade Duryodhanasya Māyā — Yudhiṣṭhirasya Dharmoktiḥ (Śalya-parva, Adhyāya 30)

Upa-parva: Dvaipāyana-hrada Episode (Duryodhana Concealed in the Lake)

Sañjaya reports that the Pāṇḍavas arrive at the Dvaipāyana-hrada where Duryodhana has immobilized and entered the waters through a supernatural stratagem. Yudhiṣṭhira identifies the act as a daivī māyā and declares that Duryodhana will not escape alive, even if assisted by higher powers. Kṛṣṇa responds with a strategic maxim: a practitioner of māyā is to be countered through suitable counter-means (kriyābhyupāya), illustrating the point with exempla of mythic defeats achieved through method rather than brute force. The Pāṇḍavas then address Duryodhana directly, urging him to rise and fight, and framing concealment as contrary to sanātana kṣātra-dharma and unworthy of a Kaurava. Duryodhana replies that he entered the water from exhaustion and tactical isolation, not fear, and argues that with his allies fallen the kingdom has lost its meaning; he proposes withdrawal to the forest and offers the earth to Yudhiṣṭhira. Yudhiṣṭhira rejects any ‘gift’ of sovereignty obtained through adharma, insists on winning by rightful contest, and reminds Duryodhana of his earlier refusal to yield even minimal land—therefore he must now face the decisive engagement. The chapter closes with continued exhortations that the outcome must be resolved through direct confrontation.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से पूछे गए प्रश्न का उत्तर उठाते हैं—कृतवर्मा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और मन्दबुद्धि दुर्योधन उस घोर संध्या-काल में क्या कर रहे थे, जब रणभूमि शून्य-सी हो चली थी। → पाण्डव दुर्योधन को खोजते हुए चारों ओर गुप्तचर भेजते हैं; थके-हारे योद्धा दूर तक भटकते हैं, घोड़े-हाथी-पैदल की छिन्न-भिन्न टोलियाँ साथ चलती हैं, और अंततः एक न्यग्रोध (बरगद) के पास विश्राम करते हुए भी मन में एक ही लक्ष्य रखते हैं—दुर्योधन का पता। → वे सरोवर के समीप पहुँचते हैं और जल में छिपे/शयन करते दुर्योधन को ललकारते हैं—‘उठो, भारत! या तो पृथ्वी का राज्य भोगो, या युद्ध में मारे जाकर स्वर्ग पाओ’; साथ ही उसे स्मरण कराते हैं कि उसने भी पाण्डव-सेना का संहार किया है, अतः अब निर्णायक सामना टालना अधर्म है। → दुर्योधन के छिपे होने का रहस्य खुल जाता है; पाण्डवों की खोज सफल होती है और युद्ध का अंतिम निर्णय अब केवल प्रत्यक्ष द्वंद्व पर टिक जाता है। → सरोवर-तट पर घिरा दुर्योधन उठेगा या नहीं—और उठे तो किस शर्त पर, किसके साथ निर्णायक गदा-युद्ध होगा—यह अगले प्रसंग की देहरी पर छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमयहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत ह्वदप्रवेशपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २९ ॥/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं।) अपना बक। ] अि्शशा:< (गदापर्व) त्रिशो5थ्याय: अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर युधिष्ठिरका सेनासहित सरोवरपर जाना और कृपाचार्य आदिका दूर हट जाना धृतराष्ट्र रवाच हतेषु सर्वसैन्येषु पाण्डुपुत्रै रणाजिरे । मम सैन्यावशिष्टास्ते किमकुर्वत संजय,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब पाण्डुके पुत्रोंने समरांगणमें समस्त सेनाओंका संहार कर डाला, तब मेरी सेनाके शेष वीरोंने क्या किया?

持国王说道:“三阇耶,当般度之子在战场上歼灭了全部军势之后,我军尚存的那些武士,当时做了什么?”

Verse 2

कृतवर्मा कृपश्चैव द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान्‌ । दुर्योधनश्व मन्दात्मा राजा किमकरोत्‌ तदा

三阇耶说道:“那时,心智迷误的杜尔约陀那王,与克利多跋摩、克利波以及勇武的德罗那之子一道,做了什么?”

Verse 3

कृतवर्मा, कृपाचार्य, पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा मन्दबुद्धि राजा दुर्योधनने उस समय क्या किया? ।। संजय उवाच सम्प्राद्रवत्सु दारेषु क्षत्रियाणां महात्मनाम्‌ विद्रुते शिबिरे शून्ये भृशोद्धिग्नास्त्रयो रथा:,संजयने कहा--राजन्‌! जब महामनस्वी क्षत्रिय राजाओंकी पत्नियाँ भाग चलीं और सब लोगोंके पलायन करनेसे सारा शिविर सूना हो गया, उस समय पूर्वोक्त तीनों रथी अत्यन्त उद्विग्न हो गये

三阇耶说道:“大王啊,当那些心志高迈的刹帝利勇士之妻惊惶奔逃,众人四散而去,使营地空寂无存之时,那三位伟大的车战勇士也被强烈的恐惧所攫住。”

Verse 4

निशम्य पाण्डुपुत्राणां तदा वै जयिनां स्वनम्‌ | विद्रुतं शिबिरं दृष्टवा सायाह्ले राजगृद्धिन:

三阇耶说道:“听到般度诸子得胜的欢呼,又见傍晚时分营地溃散奔逃,那位渴求胜利的国王心中焦灼,急欲知晓究竟发生了什么。”

Verse 5

युधिष्ठिरो5पि धर्मात्मा भ्रातृभि: सहितो रणे

三阇耶说道:“就连以达摩为本的坚正者——坚战(郁提施提罗)——也与诸弟一同立于战场。”

Verse 6

मार्गमाणास्तु संक्रुद्धास्तव पुत्रं जयैषिण:

三阇耶说道:“他们怒火中烧,志在取胜,便四处搜寻你的儿子。”

Verse 7

यत्नतो<न्वेषमाणास्ते नैवापश्यज्जनाधिपम्‌ । विजयके अभिलाषी पाण्डव अत्यन्त कुपित होकर आपके पुत्रका पता लगाने लगे; परंतु यत्नपूर्वक खोज करनेपर भी उन्हें राजा दुर्योधन कहीं दिखायी नहीं दिया ।। स हि तीव्रेण वेगेन गदापाणिरपाक्रमत्‌

三阇耶说道:“他们竭力搜寻,却仍不见那‘人中之主’(国王)的踪影。般度诸子渴望胜利、怒火炽盛,便开始追寻你的儿子;然而纵使细细查找,也到处不见都律约陀那王。因为他手执铁杵,以猛烈的速度迅疾退去。”

Verse 8

यदा तु पाण्डवा: सर्वे सुपरिश्रान्तवाहना:

三阇耶说道:然而当众般度子弟连同其坐骑与车队都因鏖战劳顿而极度疲惫,陷入深沉的倦乏之时,交锋的势头也随之转为一阵停歇——这表明,即便最为正直、最为坚毅的战士,在战争的苛求之下也终究受制于肉身的限度。

Verse 9

ततः कृपश्च द्रौणिश्व॒ कृतवर्मा च सात्वत:

三阇耶说道:随后,克利波、阿湿婆陀曼(德罗纳之子)以及萨特瓦塔族的克利多跋摩一同上前——他们被点名为战后阴惨余波中将协同行动的关键人物。

Verse 10

ते त॑ हदे समासाद्य यत्र शेते जनाधिप:,जित्वा वा पृथिवीं भुड्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्तुहि । जिसमें राजा दुर्योधन सो रहा था, उस सरोवरके समीप पहुँचकर, वे जलमें सोये हुए उस दुर्धर्ष नरेशसे इस प्रकार बोले--“राजन्‌! उठो और हमारे साथ चलकर युधिष्ठिरसे युद्ध करो। विजयी होकर पृथ्वीका राज्य भोगो अथवा मारे जाकर स्वर्गलोक प्राप्त करो

三阇耶说道:他们来到那湖畔——国王藏身其间——便对那位在水中歇息、难以征服的君主说道:“大王,请起,与我等同往,与坚战(由提施提罗)决战。若胜,则享有大地之王权;若败而殒,则当升入天界。”

Verse 11

अभ्यभाषन्त दुर्धर्ष राजानं सुप्तमम्भसि । राजनज़ुत्तिष्ठ युद्धयस्व सहास्माभियुधिष्ठिरम्‌

三阇耶说道:“他们对那位难以制服、在水中仿佛沉睡的国王说道:‘大王,请起!与我等一道,去与坚战(由提施提罗)交战。’”

Verse 12

तेषामपि बल सर्व हत॑ दुर्योधन त्वया,अस्माभिरपि गुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत । “प्रजानाथ दुर्योधन! भरतनन्दन! तुमने भी तो पाण्डवोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला है। वहाँ जो सैनिक शेष रह गये हैं, वे भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः जब तुम हमारेद्वारा सुरक्षित होकर उनपर आक्रमण करोगे तो वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे; इसलिये तुम युद्धके लिये उठो'

三阇耶说道:“杜律约陀那啊,你也已摧毁了他们军阵的全部力量;即便尚存者亦多重伤。故而在我等护卫之下,请起身吧,婆罗多后裔,乘势猛攻——他们将承受不住你的冲击。”

Verse 13

प्रतिविद्धाश्व भूयिष्ठं ये शिष्टास्तत्र सैनिका: । न ते वेगं विषहितुं शक्तास्तव विशाम्पते

三阇耶说道:留在那里的兵士人数最多者——皆为有名望之士——其战马尽被刺穿。噢,人民之主,他们无法承受你的猛冲;也抵挡不住你进攻的威势。

Verse 14

दुर्योधन उवाच दिष्ट्या पश्यामि वो मुक्तानीदृशात्‌ पुरुषक्षयात्‌

难敌说道:“幸甚!我见你们众人皆从如此惨烈的杀戮中脱身。”

Verse 15

पाण्डुकौरवसम्मर्दाज्जीवमानान्‌ नरर्षभान्‌ | दुर्योधन बोला--मैं ऐसे जनसंहारकारी पाण्डव-कौरव-संग्रामसे आप सभी नरश्रेष्ठ वीरोंको जीवित बचा हुआ देख रहा हूँ, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ।। विजेष्यामो वयं सर्वे विश्रान्ता विगतक्लमा:,हम सब लोग विश्राम करके अपनी थकावट दूर कर लें तो अवश्य विजयी होंगे। आप लोग भी बहुत थके हुए हैं और हम भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं। उधर पाण्डवोंका बल बढ़ा हुआ है; इसलिये इस समय मेरी युद्ध करनेकी रुचि नहीं हो रही है

难敌说道:在般度族与俱卢族那场碾压般的混战、吞噬无数性命之后,我仍能见到如此多的上等勇士尚存,实乃罕有之幸。他劝众人暂且休整,拂去疲惫,如此仍可夺取胜利。他也承认两军皆已困顿——己方伤痕累累——而般度族之势反而高涨;因此此刻,他并无继续交战之意。

Verse 16

भवन्तश्न परिश्रान्ता वयं च भृशविक्षता: । उदीर्ण च बल तेषां तेन युद्ध न रोचये,हम सब लोग विश्राम करके अपनी थकावट दूर कर लें तो अवश्य विजयी होंगे। आप लोग भी बहुत थके हुए हैं और हम भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं। उधर पाण्डवोंका बल बढ़ा हुआ है; इसलिये इस समय मेरी युद्ध करनेकी रुचि नहीं हो रही है

难敌说道:“你们已疲惫不堪,我们也伤重累累;况且他们的力量正盛。因此此刻,我并不愿再战。”

Verse 17

न त्वेतदद्भधुतं वीरा यद्‌ वो महदिदं मनः । अस्मासु च परा भक्तिर्न तु काल: पराक्रमे,वीरो! आपके मनमें जो युद्धके लिये महान्‌ उत्साह बना हुआ है, यह कोई अद्भुत बात नहीं है। आपलोगोंका मुझपर महान्‌ प्रेम भी है, तथापि यह पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है

难敌说道:“诸位英雄,你们胸中充满如此宏大的战意,并不稀奇;你们对我的深厚忠诚也昭然可见。然而,此刻并非施展武勇之时。”

Verse 18

विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्धि: सहितो रणे । प्रतियोत्स्याम्यहं शत्रून्‌ श्वो न मे5स्त्यत्र संशय:,आज एक रात विश्राम करके कल सबेरे रणभूमिमें आप लोगोंके साथ रहकर मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा, इसमें संशय नहीं है

杜尤陀那说道:“今日且歇息这一夜;明日我将与你们同立战场,与敌交锋。对此,我心中毫无疑虑。”

Verse 19

संजय उवाच एवमुक्तो<ब्रवीद्‌ द्रौणी राजान युद्धदुर्मदम्‌ । उत्तिष्ठ राजन्‌ भद्ठरें ते विजेष्यामो वयं परान्‌,संजय कहते हैं--राजन! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणकुमारने उस रणदुर्मद राजासे इस प्रकार कहा--“महाराज! उठो, तुम्हारा कल्याण हो। हम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करेंगे

三阇耶说道:杜尤陀那如此言毕,德罗那之子(阿湿婆他摩)便对那沉醉于战意的国王说道:“大王,请起身,愿吉祥临于你。我们必将战胜诸敌。”

Verse 20

इष्टापूर्तेन दानेन सत्येन च जपेन च । शपे राजन्‌ यथा हाद्य निहनिष्यामि सोमकान्‌,“राजन! मैं अपने इष्टापूर्त कर्म, दान, सत्य और जयकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आज सोमकोंका संहार कर डालूँगा

三阇耶说道:“大王,我以我所修的祭祀功德——iṣṭa与pūrta——以布施、以真实、以圣咒诵持起誓:今日我必诛灭索摩迦诸军。”

Verse 21

मा सम यज्ञकृतां प्रीतिमाप्तुयां सज्जनोचिताम्‌ । यदीमां रजनी व्युष्टां न हि हन्मि परान्‌ रणे

三阇耶说道:“若此夜既尽、黎明已至,而我仍不在战场上击杀敌军,愿我不得那种唯善人方配得的清净满足——如同祭祀圆满所生之喜悦。”

Verse 22

“यदि यह रात बीतते ही प्रातःकाल रणभूमिमें शत्रुओंको न मार डालूँ तो मुझे सज्जन पुरुषोंके योग्य और यज्ञकर्ताओंको प्राप्त होनेवाली प्रसन्नता न प्राप्त हो ।। नाहत्वा सर्वपञज्चालान्‌ विमोक्ष्ये कवचं विभो । इति सत्य ब्रवीम्येतत्तन्मे शूणु जनाधिप,'प्रभो! नरेश्वर! मैं समस्त पांचालोंका संहार किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। मेरे इस कथनको तुम ध्यानसे सुनो”

“若此夜一过、晨光初现,而我不在战场上诛杀诸敌,愿我不得那种唯贤善之士与行祭者方配得的欢悦。强大的主上啊,人中王者啊!不尽诛诸般遮罗,我决不卸下甲胄(kavaca)。此言我以真实宣告——请你细听,我的人间君主。”

Verse 23

तेषु सम्भाषमाणेषु व्याधास्तं देशमाययु: । मांसभारपरिश्रान्ता: पानीयार्थ यदृच्छया,वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि मांसके भारसे थके हुए बहुत-से व्याध उस स्थानपर पानी पीनेके लिये अकस्मात्‌ आ पहुँचे

三阇耶说:他们尚在交谈之时,许多猎人恰巧来到那处。因肩负沉重肉担而疲惫不堪,他们偶然到此寻水而饮。

Verse 24

ते तत्र घिछितास्तेषां सर्व तद्‌ वचनं रह: । दुर्योधनवचश्चैव शुश्रुवु: संगता मिथ:,उन्होंने वहाँ खड़े होकर उनकी एकान्तमें होनेवाली सारी बातें सुन लीं। परस्पर मिले हुए उन व्याधोंने दुर्योधनकी भी बात सुनी

三阇耶说:他们站在那儿,暗中听尽了密谈中的一切言语。那些聚在一起的猎人,也听到了杜尤陀那在相互商议时所说的话。

Verse 25

तेडपि सर्वे महेष्वासा अयुद्धार्थिनि कौरवे । निर्बन्ध॑ं परमं चक्रुस्तदा वै युद्धकाड्क्षिण:,कुरुराज दुर्योधन युद्ध नहीं चाहता था तो भी युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वे सभी महाधनुर्धर योद्धा उससे युद्ध छेड़नेके लिये बड़ा आग्रह कर रहे थे

三阇耶说:纵然那位俱卢王并不愿战,那些大弓手却因渴望交锋而以最强烈的逼迫催促他,执意要他开战。

Verse 26

तांस्तथा समुदीक्ष्याथ कौरवाणां महारथान्‌ | अयुद्धमनसं चैव राजानं स्थितमम्भसि,राजन! उन कौरवमहारथियोंकी वैसी मनोवृत्ति जानकर जलमें ठहरे हुए राजा दुर्योधनके मनमें युद्धका उत्साह न देखकर और सलिलनिवासी नरेशके साथ उन तीनोंका संवाद सुनकर व्याध यह समझ गये कि दुर्योधन इसी सरोवरके जलमें छिपा हुआ है!

三阇耶说:猎人见俱卢诸大车战士如此情状,又察觉那位立于水中的国王并无战意;他们听见那三人与“居于水中”的国王的对话,便明白杜尤陀那正藏身在这湖水之中。

Verse 27

तेषां श्रुत्वा च संवादं राज्ञश्न सलिले सतः । व्याधाभ्यजाननू्‌ राजेन्द्र सलिलस्थं सुयोधनम्‌,राजन! उन कौरवमहारथियोंकी वैसी मनोवृत्ति जानकर जलमें ठहरे हुए राजा दुर्योधनके मनमें युद्धका उत्साह न देखकर और सलिलनिवासी नरेशके साथ उन तीनोंका संवाद सुनकर व्याध यह समझ गये कि दुर्योधन इसी सरोवरके जलमें छिपा हुआ है!

三阇耶说:大王啊,猎人听见那些人与那位停留在水中的国王的对话,便明白善战者苏尤陀那(杜尤陀那)就藏在那湖中。

Verse 28

ते पूर्व पाण्डुपुत्रेण पृष्ठा ह्यासन्‌ सुतं तव । यद्च्छोपगतास्तत्र राजानं परिमार्गता,पहले राजा दुर्योधनकी खोज करते हुए पाण्डुकुमार युधिष्ठिरने दैववश अपने पास पहुँचे हुए उन व्याधोंसे आपके पुत्रका पता पूछा था

三阇耶说道:先前,般度之子、国王由提施提罗在寻觅那位国王(难敌)之时,向那些因机缘偶至此处的猎人询问你儿子的下落。此景昭示:纵在战乱纷纭之中,探问与行动亦仍在命运与境遇的驱使下推进。

Verse 29

ततस्ते पाण्डुपुत्रस्य स्मृत्वा तद्‌ भाषितं तदा । अन्योन्यमन्रुवन्‌ राजन्‌ मृगव्याधा: शनैरिव,राजन्‌! उस समय पाण्डुपुत्रकी कही हुई बात याद करके वे व्याध आपसमें धीरे-धीरे बोले--

三阇耶说道:于是,噢,大王,他们忆起般度之子当时所言,那些猎人便彼此低声交谈,缓缓而语——如猎者潜行逼近猎物——以谨慎与用意衡量每一句话。

Verse 30

दुर्योधनं ख्यापयामो धनं दास्यति पाण्डव: । सुव्यक्तमिह न: ख्यातो हदे दुर्योधनो नृप:,“यदि हम दुर्योधनका पता बता दें तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमें धन देंगे। हमें तो यहाँ यह स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गया कि राजा दुर्योधन इसी सरोवरमें छिपा हुआ है इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि त्रिंशोडध्याय:

三阇耶说道:“若我们告知难敌的藏身之处,般度五子必赐我们财物。此地我们已看得分明:难敌王正藏匿在这湖中。”

Verse 31

तस्माद्‌ गच्छामहे सर्वे यत्र राजा युधिष्ठिर: । आख यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम्‌,अतः जलमें सोये हुए अमर्षशील दुर्योधनका पता बतानेके लिये हम सब लोग उस स्थानपर चलें, जहाँ राजा युधिष्छिर मौजूद हैं

三阇耶说道:“因此,我们众人当往由提施提罗王所在之处去,好将那倔强不屈、卧伏水中如睡的难敌之所在禀告。”

Verse 32

धृतराष्ट्रात्मजं तस्मै भीमसेनाय धीमते । शयानं सलिले सर्वे कथयामो धनुर्भते,“बुद्धिमान्‌ धनुर्थर भीमसेनको हम सब यह बता दें कि धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन जलमें सो रहा है

三阇耶说道:“我们众人将告知那智勇的毗摩军、执弓之士:持国之子(难敌)正卧藏于水中。”

Verse 33

स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि बहुलान्युत । कि नो मांसेन शुष्केण परिक्लिप्टेन शोषिणा,“इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर वे हमें बहुत धन देंगे। फिर हमें शरीरका रक्त सुखा देनेवाले इस सूखे मांसको ढोकर व्यर्थ कष्ट उठानेकी क्या आवश्यकता है?”

三阇耶说道:“他若对我们欢喜,必定赐予我们丰厚的财物。既如此,我们何必徒然受苦,背负这干肉——它只会耗尽身躯的精血与元气?”

Verse 34

एवमुकक्‍त्वा तु ते व्याधा: सम्प्रह्ष्टा धनार्थिन: । मांसभारानुपादाय प्रययु: शिबिरं प्रति,इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके धनकी अभिलाषा रखनेवाले वे व्याध बड़े प्रसन्न हुए और मांसके बोझ उठाकर पाण्डव-शिविरकी ओर चल दिये

三阇耶说道:“他们彼此如此商议后,那些猎人——贪求财利者——大为欢喜。于是扛起一担担肉,朝般度子弟的营地而去,被赏赐的前景驱使,在战争的艰困中赶路。”

Verse 35

पाण्डवापि महाराज लब्धलक्ष्या: प्रहारिण: । अपश्यमाना: समरे दुर्योधनमवस्थितम्‌,महाराज! प्रहार करनेमें कुशल पाण्डवोंने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया था; उन्होंने दुर्योधनको समरांगण-में खड़ा न देख उस पापीके किये हुए छल-कपटका बदला चुकाकर वैरके पार जानेकी इच्छासे उस संग्रामभूमिमें चारों ओर गुप्तचर भेज रखे थे

三阇耶说道:“大王啊,般度子弟亦然——善于出击,且已达成所图——当他们不见都利约陀那立于战阵之中,便在战场上四处搜寻。此举不唯出于兵法,更出于法义的重压:要清算欺诈与背信之债,并以战争中的正当报应,将宿怨推至终局。”

Verse 36

निकृतेस्तस्य पापस्य ते पारं गमनेप्सवः । चारान्‌ सम्प्रेषयामासु: समन्तात्‌ तद्रणाजिरे,महाराज! प्रहार करनेमें कुशल पाण्डवोंने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया था; उन्होंने दुर्योधनको समरांगण-में खड़ा न देख उस पापीके किये हुए छल-कपटका बदला चुकाकर वैरके पार जानेकी इच्छासे उस संग्रामभूमिमें चारों ओर गुप्तचर भेज रखे थे

三阇耶说道:“大王啊,为了以偿还那罪人之欺诈而越过仇怨之岸,他们在那战场上向四面八方派出了密探。”

Verse 37

आगम्य तु ततः सर्वे नष्ट दुर्योधनं नृपम्‌ । न्यवेदयन्त सहिता धर्मराजस्य सैनिका:,धर्मराजके उन सभी गुप्तचर सैनिकोंने एक साथ लौटकर यह निवेदन किया कि “राजा दुर्योधन लापता हो गया है”

三阇耶说道:“随后他们全都归来,同心禀告达摩罗阇的军队:‘都利约陀那王已然失踪。’此讯息承载着战争中问责的道义分量:纵在纷乱之际,职责仍要求如实侦察,并迅速呈报于正当的权威。”

Verse 38

तेषां तद्‌ वचन श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ | चिन्तामभ्यगमत्‌ तीव्रां नि:शश्वास च पार्थिव:,भरतश्रेष्ठ! उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर घोर चिन्तामें पड़ गये और लंबी साँस खींचने लगे

三阇耶说道:“噢,婆罗多族中的雄牛!国王听罢那些密探的言语,顿被强烈的忧惧所攫,长长叹息一声——心神内敛,思量法义之责与战争迫近的沉重后果。”

Verse 39

अथ स्थितानां पाण्डूनां दीनानां भरतर्षभ | तस्माद्‌ देशादपक्रम्य त्वरिता लुब्धका विभो

三阇耶说道:“噢,婆罗多族中的雄牛!见般度诸子在彼处愁苦伫立,那些猎人被贪欲驱使,便迅速离开了那地方,噢,强者。”

Verse 40

आज म्मु: शिबिरं हृष्टा दृष्टवा दुर्योधनं नृपम्‌ । वार्यमाणा: प्रविष्टाश्ष॒ भीमसेनस्य पश्यत:

三阇耶说道:“今日,他们见过都利约陀那王后,兴高采烈地进入营中。虽有人阻拦,他们仍强行闯入——就在毗摩塞那眼前。”

Verse 41

भरतभूषण! नरेश! तदनन्तर जब पाण्डव खिन्न होकर बैठे हुए थे, उसी समय वे व्याध राजा दुर्योधनको अपनी आँखों देखकर तुरंत ही उस स्थानसे हट गये और बड़े हर्षके साथ पाण्डव-शिविरमें जा पहुँचे। द्वारपालोंके रोकनेपर भी वे भीमसेनके देखते-देखते भीतर घुस गये ।। ते तु पाण्डवमासाद्य भीमसेनं महाबलम्‌ | तस्मै तत्‌ सर्वमाचख्युर्यद्‌ वृत्तं यच्च वैश्रुतम्‌,महाबली पाए्डुपुत्र भीमसेनके पास जाकर उन्होंने सरोवरके तटपर जो कुछ हुआ था और जो कुछ सुननेमें आया था, वह सब कह सुनाया

他们到了般度军营,走近大力的毗摩塞那,将一切尽数禀告——既有亲见之事,也有耳闻之言。

Verse 42

ततो वृकोदरो राजन्‌ दत्त्वा तेषां धनं बहु । धर्मराजाय तत्‌ सर्वमाचचक्षे परंतप:

于是,弗利拘陀罗(毗摩),噢,大王!先赐予他们丰厚财物,继而将此事始末尽数禀告达摩罗阇(郁提施提罗)——焚灭仇敌者。

Verse 43

राजन! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमने उन व्याधोंको बहुत धन देकर धर्मराजसे सारा समाचार कहा ।। असौ दुर्योधनो राजन्‌ विज्ञातो मम लुब्धकै: । संस्तभ्य सलिलं शेते यस्यार्थे परितप्यसे,वे बोले--“धर्मराज! मेरे व्याधोंने राजा दुर्योधनका पता लगा लिया है। आप जिसके लिये संतप्त हैं, वह मायासे पानी बाँधकर सरोवरमें सो रहा है”

三阇耶说道:“大王啊,随后那令仇敌受苦的毗摩以丰厚财物酬谢了那些猎人,并将全部情报禀告法王。‘大王,杜律约陀那已被我的猎人寻得。你为之忧伤的那个人,正以幻术制住水势,卧于湖中。’”

Verse 44

तद्‌ वचो भीमसेनस्य प्रियं श्रुत्वा विशाम्पते । अजातशणत्रु: कौन्तेयो हृष्टो$भूत्‌ सह सोदरै:,प्रजानाथ! भीमसेनका वह प्रिय वचन सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए

三阇耶说道:“民众之主啊,听到毗摩军那令人欣慰的话语,阿阇多沙怛卢——昆蒂之子坚战——与诸弟一同欢喜充盈。”

Verse 45

त॑ च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्दे । क्षिप्रमेव ततो5गच्छन्‌ पुरस्कृत्य जनार्दनम्‌,महाधनुर्थर दुर्योधनको पानीसे भरे सरोवरमें घुसा सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान्‌ श्रीकृष्णको आगे करके शीघ्र ही वहाँसे चल दिये

三阇耶说道:“听闻那强弓大射手已潜入湖水之中,他们便立刻自彼处出发,推尊阇那尔达那(圣奎师那)在前引领。”

Verse 46

स्थान नारोचयंस्तत्र ततस्ते हृदम भ्ययु: । सायंकालमें विजयी पाण्डवोंकी गर्जना सुनकर और अपने सारे शिविरके लोगोंको भागा हुआ देखकर राजा दुर्योधनको चाहनेवाले उन तीनों महारथियोंको वहाँ ठहरना अच्छा न लगा; इसलिये वे उसी सरोवरके तटपर गये,तत:ः किलकिलाशब्द: प्रादुरासीद्‌ विशाम्पते । पाण्डवानां प्रह्ृशानां पठचालानां च सर्वश: प्रजानाथ! फिर तो हर्षमें भरे हुए पाण्डव और पांचालोंकी किलकिलाहटका शब्द सब ओर गूँजने लगा

三阇耶说道:“他们不愿再停留于彼处,便转而前往湖畔。随后,民众之主啊,欢庆的喧呼声四面迸起——般度族与旁遮罗人因胜利而欣喜若狂,呼声震天。”

Verse 47

सिंहनादांस्ततकश्षक्रुः क्ष्वेडाश्न भरतर्षभ । त्वरिता: क्षत्रिया राजन्‌ जम्मुर्देपायनं हृदम्‌,भरतभूषण नरेश! वे सभी क्षत्रिय सिंहनाद एवं गर्जना करने लगे तथा तुरंत ही द्वैपायन नामक सरोवरके पास जा पहुँचे

三阇耶说道:“婆罗多族中的雄牛啊,他们发出狮子般的咆哮与震天的战呼。随后,国王啊,那些刹帝利急速前行,抵达名为‘德外波耶那’的湖畔。”

Verse 48

ज्ञात: पापो धार्॑राष्ट्रो दृष्टश्वेत्यसकृद्रणे । प्राक्रोशन्‌ सोमकास्तत्र हृष्टरूपा: समन्‍्ततः,हर्षमें भरे हुए सोमकवीर रणभूमिमें सब ओर पुकार-पुकारकर कहने लगे “धृतराष्ट्रके पापी पुत्रका पता लग गया और उसे देख लिया गया”

三阇耶说道:在战阵之中,娑摩迦诸军欢呼雀跃,从四面八方反复高喊:“持国之罪子已被辨认——确已现身,被人看见了!”

Verse 49

तेषामाशु प्रयातानां रथानां तत्र वेगिनाम्‌ | बभूव तुमुल: शब्दो दिविस्पूक्‌ पृथिवीपते,पृथ्वीनाथ! वहाँ शीघ्रतापूर्वक यात्रा करनेवाले उनके वेगशाली रथोंका घोर घर्घर शब्द आकाशकमें व्याप्त हो गया

三阇耶说道:当那些迅疾的战车飞驰而去时,那里骤起一阵巨大而喧腾的轰鸣——大王啊——其声仿佛直击苍穹,充塞天际。

Verse 50

दुर्योधनं परीप्सन्तस्तत्र तत्र युधिष्ठिरम्‌ । अन्वयुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहना:

三阇耶说道:为求逼近都利约陀那,那些诸王纵使坐骑已疲,仍急速追随坚战(郁提施提罗),他往何处,他们便随至何处。

Verse 51

अर्जुनो भीमसेनश्व माद्रीपुत्रौी च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नश्ष पाउ्चाल्य: शिखण्डी चापराजित:

三阇耶说道:阿周那与怖摩塞那,以及摩德利所生的两位般度子;又有旁遮罗的德里什塔丢摩那,和不可战胜的尸佉ṇḍī(悉皆挺身而出/向前推进)。

Verse 52

उत्तमौजा युधामन्यु: सात्यकिश्व महारथ: । पज्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेयाश्ष भारत

三阇耶说道:“婆罗多(持国)啊,乌多摩乌阇、优陀摩纽,以及萨底耶迦——大车战士——并有旁遮罗诸族中最为精锐而守纪之士,亦有德劳帕迪之诸子同在。”

Verse 53

हयाश्च सर्वे नागाश्न शतशश्न पदातय: । भारत! उस समय अर्जुन, भीमसेन, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्मन, अपराजित वीर शिखण्डी, उत्तमौजा, युधामन्यु, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा पांचालोंमेंसे जो जीवित बच गये थे, वे वीर दुर्योधनको पकड़नेकी इच्छासे अपने वाहनोंके थके होनेपर भी बड़ी उतावलीके साथ राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे गये। उनके साथ सभी घुड़सवार, हाथीसवार और सैकड़ों पैदल सैनिक भी थे || ५०--५२ $ ।। ततः प्राप्तो महाराज धर्मराज: प्रतापवान्‌

三阇耶说道:随后,所有骑兵与象骑兵,连同数百步卒,一齐继续前进。噢,婆罗多啊!当时,阿周那与毗摩塞那,摩德丽所生的双子——那俱罗与娑诃提婆,般遮罗王子提师陀昙那,不可战胜的勇士尸佉ṇḍī,优多摩欧阇,优陀摩尼优,大车战士萨底耶吉,德罗帕蒂的五子,以及仍然存活的般遮罗诸人——纵使坐骑已疲惫不堪——仍急切地紧随在尤提施提罗王之后,意欲擒拿杜罗约陀那。

Verse 54

द्वैपायन ह्दं घोरं यत्र दुर्योधनो5भवत्‌ । महाराज! तत्पश्चात्‌ प्रतापी धर्मराज युधिष्ठिर उस भयंकर द्वैपायनह्दके तटपर जा पहुँचे, जिसके भीतर दुर्योधन छिपा हुआ था || ५३ $ ।। शीतामलजलं हद्यं द्वेतीयमिव सागरम्‌,उसका जल शीतल और निर्मल था। वह देखनेमें मनोरम और दूसरे समुद्रके समान विशाल था। भारत! उसीके भीतर मायाद्वारा जलको स्तम्भित करके दैवयोग एवं अद्भुत विधिसे आपका पुत्र विश्राम कर रहा था

三阇耶说道:“大王啊,此后,英勇的法王尤提施提罗来到那可怖的湖——名为‘德外波耶那’——的岸边;杜罗约陀那正藏身于其内。湖水清凉澄澈,悦目可观,广阔浩瀚,宛如第二大海。噢,婆罗多后裔啊,就在那里——以幻术使水凝止不动,并凭借命运奇异的安排——你的儿子在湖中歇息。”

Verse 55

मायया सलिल स्तभ्य यत्रा भूत्‌ ते स्थित: सुतः । अत्यद्भुतेन विधिना दैवयोगेन भारत,उसका जल शीतल और निर्मल था। वह देखनेमें मनोरम और दूसरे समुद्रके समान विशाल था। भारत! उसीके भीतर मायाद्वारा जलको स्तम्भित करके दैवयोग एवं अद्भुत विधिसे आपका पुत्र विश्राम कर रहा था

在那里,以幻术使水凝止不动,你的儿子便停驻其间。噢,婆罗多啊,凭借命运的契合与奇异的法则,他在那湖中歇息;湖水清凉澄净,广阔如第二大海。

Verse 56

सलिलान्तर्गतः शेते दुर्दर्शः कस्यचित्‌ प्रभो । मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिप:,प्रभो! नरेन्द्र! हाथमें गदा लिये राजा दुर्योधन जलके भीतर सोया था। उस समय किसी भी मनुष्यके लिये उसको देखना कठिन था

三阇耶说道:“主上啊,人中之雄啊:杜罗约陀那王手执铁杵,卧伏于水下,隐而不见。那时,任何凡人都极难察觉到他。”

Verse 57

ततो दुर्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो वसन्‌ । शुश्रुवे तुमुलं शब्द जलदोपमनि:स्वनम्‌,तदनन्तर पानीके भीतर बैठे हुए राजा दुर्योधनने मेघकी गर्जनाके समान भयंकर शब्द सुना

于是,潜居水下的杜罗约陀那王听见一阵喧腾巨响,其轰鸣如雷云咆哮。

Verse 58

युधिष्ठिरश्न राजेन्द्र तं हंदे सह सोदरै: । आजगाम महाराज तव पुत्रवधाय वै,राजेन्द्र! महाराज! आपके पुत्रका वध करनेके लिये राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ उस सरोवरके तटपर आ पहुँचे

三阇耶说道:大王啊,坚战(Yudhiṣṭhira)与诸弟同来,已至那湖之滨;伟大的君王啊,他确实怀着诛杀你之子的决意而来。

Verse 59

महता शड्खनादेन रथनेमिस्वनेन च । ऊर्ध्व॑ धुन्वन्‌ महारेणुं कम्पयंश्वापि मेदिनीम्‌,वे महान्‌ शंखनाद तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे पृथ्वीको कैँपाते और धूलका महान्‌ ढेर ऊपर उड़ाते हुए वहाँ आये थे। युधिष्ठिरकी सेनाका कोलाहल सुनकर कृततवर्मा, कृपाचार्य और अश्व॒त्थामा तीनों महारथी राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोले--

三阇耶说道:伴随着震天的海螺号声与战车轮辋的轰鸣,他们来到那里,扬起漫天尘云,使大地亦为之战栗。听到坚战军的喧嚣,三位大车战士——克利多跋摩、克利波阿阇梨与阿湿婆他摩——便如此对都利约陀那王说道。

Verse 60

यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शब्दं महारथा: । कृतवर्मा कृपो द्रौणी राजानमिदमन्रुवन्‌,वे महान्‌ शंखनाद तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे पृथ्वीको कैँपाते और धूलका महान्‌ ढेर ऊपर उड़ाते हुए वहाँ आये थे। युधिष्ठिरकी सेनाका कोलाहल सुनकर कृततवर्मा, कृपाचार्य और अश्व॒त्थामा तीनों महारथी राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोले--

三阇耶说道:听到坚战军喧腾之声,那些大车战士——克利多跋摩、克利波,以及德罗那之子(阿湿婆他摩)——便以如下言辞对都利约陀那王进言。

Verse 61

इमे हाायान्ति संहृष्टा: पाण्डवा जितकाशिन: । अपयास्यामहे तावदनुजानातु नो भवान्‌,'ये विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव बड़े हर्षमें भरकर इधर ही आ रहे हैं। अतः हमलोग यहाँसे हट जायँगे। इसके लिये तुम हमें आज्ञा प्रदान करो”

三阇耶说道:“看哪——般度五子正朝此处而来,因胜利在望而欢欣振奋、光彩照人。故此,暂且我们将从此地退避。请准许我们离去。”

Verse 62

दुर्योधनस्तु तच्छुत्वा तेषां तत्र तरस्विनाम्‌ । तथेत्युक्त्वा ह॒दं तं वै माययास्तम्भयत्‌ प्रभो,प्रभो! उन वेगशाली वीरोंकी वह बात सुनकर दुर्योधनने “तथास्तु/ कहकर उस सरोवरके जलको पुनः मायाद्वारा स्तम्भित कर दिया

三阇耶说道:都利约陀那听了那些勇猛战士的话,答道:“就这样吧。”随即他以自身的诡计,使那湖水再次凝止不动。

Verse 63

ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भूशं शोकपरायणा: । जम्मुर्दूरे महाराज कृपप्रभूतयो रथा:,महाराज! राजाकी आज्ञा लेकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए कृपाचार्य आदि महारथी वहाँसे दूर चले गये

三阇耶说道:大王,他们得了国王的许可,便在沉重的悲恸中驱车远去;以克利帕(Kṛpa)等长老勇士为首,战车渐行渐远。

Verse 64

ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोध॑ प्रेक्ष्य मारिष । न्यविशन्त भशं श्रान्ताश्विन्तयन्तो नृपं प्रति,मान्यवर! दूरके मार्गपर जाकर उन्हें एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया। वे अत्यन्त थके होनेके कारण राजा दुर्योधनके विषयमें चिन्ता करते हुए उसीके नीचे बैठ गये

三阇耶说道:尊者啊,他们走了很长一段路,望见一株榕树(菩提榕)。因疲惫不堪,便在树下坐歇,心中忧惧不安,惦念着国王——难敌(Duryodhana)——在这阴沉战局中的命运。

Verse 65

विष्टभ्य सलिल सुप्तो धार्तराष्ट्री महाबल: । पाण्डवाश्चापि सम्प्राप्तास्तं देशं युद्धमीप्सव:,इधर महाबली धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन पानी बाँधकर सो गया। इतनेहीमें युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डव भी वहाँ आ पहुँचे

三阇耶说道:那位强大的持国(Dhṛtarāṣṭra)之子在水中支撑着身子,躺下歇息。就在此时,般度五子(Pāṇḍava)也来到此地,怀着求战之心。

Verse 66

कथं नु युद्ध भविता कथं राजा भविष्यति । कथं नु पाण्डवा राजनू्‌ प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम्‌,राजन! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंकोी खोलकर यह सोचने लगे कि “अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे” ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे

三阇耶说道:“这场战斗究竟将如何继续?国王将会怎样?大王啊,般度五子又将如何寻到那位俱卢人(Kaurava)?”他们怀着这般忧惧与不祥的预感,克利帕阿阇黎(Kṛpācārya)等大车战士解下战车之马,就地坐下歇息,心头尽是迷惘与沉重。

Verse 67

इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्यो5श्वान्‌ विमुच्यते । तत्रासांचक्रिरे राजन्‌ कृपप्रभूतयो रथा:,राजन! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंकोी खोलकर यह सोचने लगे कि “अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे” ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे

三阇耶说道:当他们仍沉浸在忧惧的思虑之中时,便将战马从车上解下。大王啊,就在那处,御者与大车勇士——以克利帕(Kṛpa)为首——扎营歇息;然而他们心中仍被“战事将如何延续、难敌王究竟遭遇何事”的念头所搅扰。

Verse 73

त॑ हद प्राविशच्चापि विष्टभ्याप: स्वमायया । वह हाथमें गदा लेकर तीव्र वेगसे भागा और अपनी मायासे जलको स्तम्भित करके उस सरोवरके भीतर जा घुसा

三阇耶说道:随后他手执钉锤,以极快的速度猛然冲前,并以自身之力使湖水凝止不动;于是他潜入湖中,藏匿其内。此举并非合乎正法的退却,而是战术性的隐蔽——借非常之力操纵自然,以躲避眼前的正面交锋。

Verse 86

ततः स्वशिबिरं प्राप्य व्यतिष्ठन्त ससैनिका: । दुर्योधनकी खोज करते-करते जब पाण्डवोंके वाहन बहुत थक गये, तब सभी पाण्डव सैनिकोंसहित अपने शिविरमें आकर ठहर गये

三阇耶说道:随后他们回到本营,与诸军一同停驻。追寻杜罗约陀那良久,坐骑尽皆疲惫不堪,普利塔之子们便率军返营,在营中列阵而立——这无声地承认了追击之限度,也承认了在战争重压下必须整顿重聚。

Verse 96

संनिविष्टेषु पार्थेषु प्रयातास्तं ह॒दं शनै: । तदनन्तर जब कुन्तीके सभी पुत्र शिविरमें विश्राम करने लगे, तब कृपाचार्य, अश्वत्थामा और सात्वतवंशी कृतवर्मा धीरे-धीरे उस सरोवरके तटपर जा पहुँचे

三阇耶说道:当普利塔之子们(般度五子)已在营中安顿歇息之时,克利帕阿阇梨、阿湿婆他摩与萨特瓦塔族的克利多跋摩,悄然缓步,渐渐来到那湖的岸边。此偈在战后铺陈出一段紧绷而带道德阴影的停顿:一方休憩,一方潜行,暗示其后之举更多出于谋略与激情,而非依正法公开交战。

Verse 113

जित्वा वा पृथिवीं भुड्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्तुहि । जिसमें राजा दुर्योधन सो रहा था, उस सरोवरके समीप पहुँचकर, वे जलमें सोये हुए उस दुर्धर्ष नरेशसे इस प्रकार बोले--“राजन्‌! उठो और हमारे साथ चलकर युधिष्ठिरसे युद्ध करो। विजयी होकर पृथ्वीका राज्य भोगो अथवा मारे जाकर स्वर्गलोक प्राप्त करो

三阇耶说道:“或胜而享有大地,或若被杀,必得升天。”他们来到那湖边——杜罗约陀那王正潜藏于水中歇息——便对那难以撼动的君主说道:“大王,请起,与我等同往,与坚战者(郁提希提罗)交锋;胜则统御天下,败则战死而得天界。”此番劝说将战斗呈为刹帝利的严峻道德抉择:以胜利得世间王权,或以正战之死获功德而升天。

Verse 133

अस्माभिरपि गुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत । “प्रजानाथ दुर्योधन! भरतनन्दन! तुमने भी तो पाण्डवोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला है। वहाँ जो सैनिक शेष रह गये हैं, वे भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः जब तुम हमारेद्वारा सुरक्षित होकर उनपर आक्रमण करोगे तो वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे; इसलिये तुम युद्धके लिये उठो'

三阇耶说道:“因此,婆罗多啊,起身再战——我等亦将护卫于你。”此句以援助与庇护为保证,催促其重启行动,并将战争的下一步描绘为在盟友守护之下方能施行的精算一击。

Verse 523

ह्ृष्ट: पर्यचरद्‌ राजन्‌ दुर्योधनवधेप्सया । राजन! इधर धर्मात्मा युधिष्ठिर भी रणभूमिमें दुर्योधनके वधकी इच्छासे बड़े हर्षके साथ भाइयोंसहित विचर रहे थे

桑阇耶说道:大王啊,秉持正法的坚战(Yudhiṣṭhira)满怀喜悦,与诸弟同行,在战场上往来巡行,一心要诛杀难敌(Duryodhana)。

Frequently Asked Questions

The dilemma contrasts normative kṣātra accountability (to face one’s opponents openly after initiating large-scale conflict) with self-preservative withdrawal via concealment; it also tests whether pragmatic counter-strategy can be ethically justified when used to neutralize evasion of responsibility.

The chapter teaches that dharma is not merely outcome-based: legitimate authority and resolution require procedurally ethical conduct, yet practical intelligence (kriyā) remains necessary to confront deception; moral order is preserved by refusing advantages obtained through adharma.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as situational ethical instruction, reinforcing the epic’s broader framework in which conduct (dharma) and method (kriyā) jointly determine the legitimacy of victory and governance.