Adhyaya 3
Shalya ParvaAdhyaya 385 Versesकर्ण-वध के बाद कौरव-पक्ष का मनोबल टूटता है; पाण्डव-पक्ष निर्णायक रूप से प्रबल, कौरव-सेना पलायनशील और विघटित।

Adhyaya 3

अध्याय ३: कृपस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः (Kṛpa’s Counsel to Duryodhana)

Upa-parva: Kṛpa–Duryodhana Nīti-saṃvāda (Counsel after Karṇa’s fall)

Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra the scale of devastation after Karṇa’s fall: armies repeatedly scattered and reassembled, leaders and emblems disfigured, elephants and infantry slain, and the field likened to a terrifying, Rudra-like arena. The narrative then pivots to Arjuna’s battlefield dominance—his standard, bow-sound, and movement through formations—producing psychological collapse in Kaurava ranks. Kṛpa, moved by compassion and seniority, approaches Duryodhana and delivers a structured counsel on yuddha-dharma and rāja-nīti. He acknowledges the kṣatriya obligation to fight even kin, yet argues that flight is adharma while purposeless persistence amid strategic inferiority is also self-destructive. Citing the deaths of Bhīṣma, Droṇa, Karṇa, Jayadratha, and many allies, he frames the remaining situation as institutionally unsustainable. He advises safeguarding the ruler, seeking saṃdhi with the Pāṇḍavas, and leveraging the conciliatory capacity of Yudhiṣṭhira under Kṛṣṇa’s influence; he asserts that Kṛṣṇa and the Pāṇḍavas would respect Dhṛtarāṣṭra’s word. The chapter closes with Kṛpa’s emotional exhaustion—sighing, grieving, and fainting—marking counsel as both rational policy and human lament.

Chapter Arc: कर्ण-वध का समाचार फैलते ही कौरव-सेना पर भय का अंधकार उतर आता है; रणभूमि में दिशाएँ मानो बंद हो जाती हैं और सैनिकों के पाँव अपने-आप पीछे हटने लगते हैं। → पाण्डव-पक्ष के सिंहनाद और कौरव-पक्ष की भगदड़ साथ-साथ बढ़ते हैं। भयभीत हाथी-दल टूटता है, महावत गिरते हैं, गजराजों की सूँड़ें कटती हैं; ‘सर्वं पार्थमयं लोकम्’—हर ओर अर्जुन/पाण्डवों का ही प्रभुत्व दिखता है। जो थोड़े-से पैदल टिकते हैं, वे भीमसेन के सामने आ खड़े होते हैं—लगभग पचीस हजार का अंतिम अवरोध। → भीमसेन सुवर्णपत्र-जटित विशाल गदा उठाकर दण्डपाणि यमराज के समान कौरव-पैदल-सेना का संहार करते हैं; अंधकार-सा छा जाता है, दिशाएँ काँपती हैं, और कौरव-बल का यह शेष-आधार भी टूट जाता है। → पैदल-सेना के विनाश के बाद भीमसेन धृष्टद्युम्न को अग्रभाग में रखकर पुनः युद्ध-व्यवस्था बनाते हैं; कौरवों के लिए संदेश स्पष्ट है—भागना नहीं, अन्यथा शत्रु के वश में जाना है। → कौरव-पक्ष में पलायन बनाम प्रतिरोध का संकट तीव्र होता है—क्या दुर्योधन भय-ग्रस्त सेना को रोककर फिर से मोर्चा बाँध पाएगा, या यह भगदड़ अगले निर्णायक पतन का द्वार बनेगी?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजल बछ। जि तृतीयो<थध्याय: कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव-सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा-बुझाकर पुन: पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना संजय उवाच शृणु राजन्नवहितो यथावृत्तो महान्‌ क्षय: । कुरूणां पाण्डवानां च समासाद्य परस्परम्‌,संजय कहते हैं--राजन्‌! कौरवों और पाण्डवोंके आपसमें भिड़नेसे जिस प्रकार महान्‌ जनसंहार हुआ है, वह सब सावधान होकर सुनिये

三阇耶说道:“大王啊,请专心聆听:当俱卢与般度族在战场上相逼相撞之时,那场巨大的毁灭是如何发生的。我将如实叙述事情的经过。”

Verse 2

इस प्रकार श्रीमह्ााभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका विलापविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,निहते सूतपुत्रे तु पाण्डवेन महात्मना । विद्रुतेषु च सैन्येषु समानीतेषु चासकृत्‌

毗耶娑波耶那说道:当那车夫之子被大心的般度族所诛,而诸军溃散奔逃却又屡屡被收拢、重新结阵之时,战争在道义与情感上的重压愈发加剧——胜利与失落并行展开,在集体意志的崩塌与再聚之间交错起伏。

Verse 3

घोरे मनुष्यदेहानामाजौ नरवर क्षये । यत्तत्‌ कर्णे हते पार्थ: सिंहनादमथाकरोत्‌,इति श्रीमहा भारते शल्यपर्वणि कौरवसैन्यापयाने तृतीयो5ध्याय:

三阇耶说道:在那可怖的战场上,尸身横陈、人命如草,噫,人中之杰!当迦尔那既被诛灭,帕尔塔(阿周那)便发出狮子般的长吼——那是凯旋的呼号,宣示强敌的倾覆,也昭示战争在道义与谋略上的潮势已然转折。

Verse 4

तदा तव सुतान्‌ राजन्‌ प्राविशत्‌ सुमहद्‌ भयम्‌ । नरश्रेष्ठ! महात्मा पाण्डुकुमार अर्जुनके द्वारा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर जब आपकी सेनाएँ बार-बार भागने और लौटायी जाने लगीं एवं रणभूमिमें मानवशरीरोंका भयानक संहार होने लगा, उस समय कर्णवधके पश्चात्‌ कुन्तीकुमार अर्जुनने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। राजन्‌! उसे सुनकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। २-३ $ || न संधातुमनीकानि न चैवाथ पराक्रमे

三阇耶说道:于是,王啊,巨大的恐惧侵入你诸子的心中。他们既不能重整诸军阵列,也不能在勇武之举上站稳脚跟——迦尔那陨落之后,战场上屠戮所带来的震骇与道义重压,将他们尽数压倒。

Verse 5

वणिजो नावि भिन्नायामगाधे विप्लवा इव,राजन! जैसे अगाध महासागरमें नाव फट जानेपर नौकारहित व्यापारी उस अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छा रखते हुए घबरा उठते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप सूतपुत्रके मारे जानेपर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हम सब लोग भयभीत हो गये थे

三阇耶说道:“大王啊,正如商旅在深不可测的大海中,舟船破碎、无舟可依之时,虽仍渴望抵达彼岸,却惊惶失措;同样,当戴冠的阿周那诛杀迦尔那——那位车夫之子、曾如‘岛屿’般支撑我军之人——我们也都被恐惧攫住,身躯为箭矢所裂伤。”

Verse 6

अपारे पारमिच्छन्तो हते द्वीपे किरीटिना । सूतपुत्रे हते राजन्‌ वित्रस्ता: शरविक्षता:,राजन! जैसे अगाध महासागरमें नाव फट जानेपर नौकारहित व्यापारी उस अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छा रखते हुए घबरा उठते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप सूतपुत्रके मारे जानेपर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हम सब लोग भयभीत हो गये थे

三阇耶说道:“大王啊,如同商旅在无边大海中舟破无舟,仍欲渡至彼岸却被惊惶所制;同样,当那在战阵中如‘岛屿’般屹立的车夫之子被戴冠的阿周那所杀,我们也都惊惧不已,身躯为箭矢所创,支离破碎。”

Verse 7

अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगा: सिंहार्दिता इव । भग्नशृड्भरा इव वृषा: शीर्णदंष्टा इवोरगा:,हम अनाथ होकर कोई रक्षक चाहते थे। हमारी दशा सिंहके सताये हुए मृगों, टूटे सींगवाले बैलों तथा जिनके दाँत तोड़ लिये गये हों उन सर्पोंकी तरह हो रही थी

三阇耶说道:“失却庇护,我们渴望一位护持者。我们的境况如同被狮子追逼的群鹿——如同折断双角的公牛——如同毒牙被击碎的蛇。”

Verse 8

प्रत्युपायाम सायाद्वे निर्जिता: सव्यसाचिना । हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ता निशितै: शरै:,सायंकालमें सव्यसाची अर्जुनसे परास्त होकर हम सब लोग शिबिरकी ओर लौटे। हमारी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये थे। हम सब लोग पैने बाणोंसे घायल होकर विध्वंसके निकट पहुँच गये थे

三阇耶说道:“傍晚时分,我们转身退回营地,已被双手皆能开弓的神射阿周那击败。我们的首要勇士尽皆战死;我们被他锋利的箭矢击穿、斩落,军势崩碎——几近覆灭。”

Verse 9

सूतपुत्रे हते राजन पुत्रास्ते प्राद्रवंस्तत: । विध्वस्तकवचा: सर्वे कांदिशीका विचेतस:,राजन! सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सब पुत्र अचेत हो वहाँसे भागने लगे। उन सबके कवच नष्ट हो गये थे। उन्हें इतनी भी सुध नहीं रह गयी थी कि हम कहाँ और किस दिशामें जायेँ

三阇耶说道:“大王啊,当车夫之子迦尔纳被杀之时,您的诸子立刻从那里逃散。众人的甲胄尽碎;惶惑失神,四处奔走,如同彻底迷失方向之人。”

Verse 10

अन्योन्यमभिनिध्नन्तो वीक्षमाणा भयाद्‌ दिश: । मामेव नूनं बीभत्सुममिव च वृकोदर:

三阇耶说道:“他们彼此冲撞相击,因恐惧而四顾张望。如今,毗摩——弗利拘陀罗——必定只在寻我一人,仿佛我就是他选定的猎物。”

Verse 12

कुण्जरै: स्यन्दना भग्ना: सादिनश्न महारथै:

三阇耶说道:“在那惨烈的冲突中,战象将战车撞得粉碎,而诸位大车战士又斩落骑兵——这正是战争碾压之力的写照:在铺天盖地的暴烈之下,骄矜与武勇同被摧折。”

Verse 13

पदातिसंघाश्षाश्वौधै: पलायद्विर्भुशं हता: । भागते हुए हाथियोंने बहुत-से रथ तोड़ डाले, बड़े-बड़े रथोंने घुड़सवारोंको कुचल दिया और दौड़ते हुए अश्वसमूहोंने पैदल सैनिकोंको अत्यन्त घायल कर दिया ।। व्यालतस्करसंकीर्णे सार्थहीना यथा वने

三阇耶说道:步兵的密集队伍,被溃逃如洪流的马群重重冲击,死伤惨重。战场因惊惶与践踏而大乱,宛如一片森林:一支商旅失却向导与秩序,散落在猛兽与盗匪之间——这是战争崩塌为无法无天与恐惧的写照。

Verse 14

हतारोहास्तथा नागाश्छिन्नहस्तास्तथापरे

三阇耶说道:“有些战象的驭者已被杀死;又见另一些战象的‘手’——象鼻或前肢——被斩断。”

Verse 15

सर्व पार्थमयं लोकमपश्यन्‌ वै भयार्दिता: । कितने ही हाथियोंके सवार मारे गये, बहुत-से गजराजोंकी सूँड़ें काट डाली गयीं, सब लोग भयसे पीड़ित होकर सम्पूर्ण जगत्‌को अर्जुनमय देख रहे थे ।। तान्‌ प्रेक्ष्य द्रवत: सर्वान्‌ भीमसेनभयार्दितान्‌

三阇耶说道:他们被恐惧所压迫,仿佛看见整个世界都化作阿周那一人。许多象骑已被杀死,许多象王的象鼻也被砍断。惶惧之下,众人觉得整片战场尽是阿周那的身影。见他们尽皆奔逃——又为怖惧毗摩塞那所逼——(叙事仍将继续)。

Verse 16

नातिक्रमिष्यते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम्‌

三阇耶说道:“帕尔塔(阿周那)不会越过、也不会轻慢那位手执弓矢、严阵以待的武士。”

Verse 17

समरे युद्धयमानं हि कौन्तेयो मां धनंजय:

三阇耶说道:“确然,在鏖战之中,当我正与敌交锋时,昆蒂之子——檀那阇耶(阿周那)——向我走近/对我发话。”

Verse 18

नोत्सहेताप्यतिक्रान्तुं वेलामिव महार्णव: । “जैसे महासागर तटको नहीं लाँध सकता, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुन समरांगणमें युद्ध करते हुए मुझ दुर्योधनको लाँधघकर आगे जानेकी हिम्मत नहीं कर सकते ।। अद्यार्जुनं सगोविन्दं मानिनं च वृकोदरम्‌

三阇耶说道:“纵使他心有此愿,也无法越过我——正如大海不能越出自己的海岸。同样,昆蒂之子阿周那虽在战场厮杀,也无法鼓起勇气越过我——杜尔约陀那——而继续向前。”

Verse 19

निहत्य शिष्टान्‌ शत्रूंश्व॒ कर्णस्यानृण्यमाप्रुयाम्‌ । “आज मैं श्रीकृष्ण, अर्जुन, मानी भीमसेन तथा शेष बचे हुए अन्य शत्रुओंका संहार करके कर्णके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा” || १८ $ || तच्छुत्वा कुरुराजस्य शूरार्यसदृशं वचः

“杀尽余下的敌人,我便可偿清对迦尔那的债。今日我将毁灭圣奎师那、阿周那、傲然的毗摩塞那,以及仍存活的其他仇敌,如此便可摆脱我对迦尔那所负之债。”听到俱卢之王这番话——确如英勇贵胄之言——三阇耶继续叙述。

Verse 20

गजाश्वरथहीनास्तु पादाताश्चैव मारिष

三阇耶说道:“尊者啊,他们已失去战象、战马与战车,只得徒步作战。”

Verse 21

तान्‌ भीमसेन: संक्रुद्धों धृष्टद्युम्नश्व॒ पार्षत:

三阇耶说道:毗摩塞那怒火中烧,与帕尔沙塔之子提湿多迦牟那一同转身扑向他们。

Verse 22

प्रत्ययुध्यंस्तु ते सर्वे भीमसेनं सपार्षतम्‌

三阇耶说道:于是他们众人振作起来,合力迎战毗摩塞那及其随从。

Verse 23

अक्कुद्धयत रणे भीमस्तैर्म॑थे प्रत्यवस्थितै:

三阇耶说道:在鏖战最激烈之处,毗摩并未为怒火所驱。面对那些以密集阵形据守的勇士,他以沉着的决心稳立不退——这是受自制所统御的勇力,在战争重压之下仍不失纪律的胆魄。

Verse 24

न तान्‌ रथस्थो भूमिष्ठान्‌ धमपिक्षी वृकोदर:

三阇耶说道:立于战车之上,弗利拘陀罗并未向那些倒在地上的人吹响海螺——这是战怒之中仍存的克制;他不愿对倒下者或无力者夸示得意。

Verse 25

जातरूपपरिच्छन्नां प्रगृह्ा महतीं गदाम्‌

三阇耶说道:他执起一柄巨大的金饰钉头槌,整肃以待——王者的华彩被系于战争的阴沉劳作之上,外在的辉煌与其所役使的暴烈形成鲜明对照。

Verse 26

पदातयो हि संरब्धास्त्यक्तजीवितबान्धवा:

三阇耶说道:那些步卒怒志如焚,已将自身性命与亲族牵念尽皆抛却——被逼入一场孤注一掷的战狂之中。

Verse 27

आसाद्य भीमसेन ते संरब्धा युद्धदुर्मदा:

三阇耶说道:他们逼近毗摩塞那——怒火炽盛,又被战斗的狂醉所蛊惑而变得莽撞——遂奋然推进,与他交战。

Verse 28

श्येनवद्‌ व्यचरद्‌ भीम: खड्गेन गदया तथा

三阇耶说道:毗摩如鹰隼般游走战场——迅疾而凶猛——挥舞长剑,亦执铁棒(伽陀)。

Verse 29

हत्वा तत्‌ पुरुषानीक॑ भीम: सत्यपराक्रम:

三阇耶说道:毗摩斩杀那密集的战士群后——其勇力从不衰竭——破开敌阵,挺身而立。

Verse 30

धनंजयो रथानीकमन्वपद्यत वीर्यवान्‌,दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया। माद्रीकुमार नकुल-सहदेव तथा महाबली सात्यकि दुर्योधनकी सेनाका विनाश करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े

三阇耶说道:勇力无双的檀那阇耶(阿周那)逼近,猛攻密集的战车部队。另一边,摩德丽之子那俱罗与娑诃提婆,以及大力勇士萨底耶吉,一面歼灭都利约陀那的军势,一面以惊人之速直扑沙昆尼。

Verse 31

माद्रीपुत्रोी च शकुनिं सात्यकिश्न महाबल: । जवेनाभ्यपतन्‌ ह्ृष्टा घ्नन्तो दौर्योधनं बलम्‌,दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया। माद्रीकुमार नकुल-सहदेव तथा महाबली सात्यकि दुर्योधनकी सेनाका विनाश करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े

三阇耶说道:摩德丽的两位儿子——那俱罗与娑诃提婆——以及大力的萨底耶吉,心中振奋、行动迅疾,在屠戮都利约陀那军势之际,直冲沙昆尼而去。

Verse 32

तस्याश्ववाहान्‌ सुबहूंस्ते निहत्य शितै: शरै: । तमन्वधावंस्त्वरितास्तत्र युद्धमवर्तत,उन सबने शकुनिके बहुत-से घुड़सवारोंको अपने पैने बाणोंसे मारकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ शकुनिपर धावा किया। फिर तो उनमें भारी युद्ध छिड़ गया

三阇耶说道:他们以锐利的箭矢射杀了他许多骑兵之后,便迅速追击沙昆尼。就在那处,交锋骤然扩展为一场惨烈的大战。

Verse 33

ततो धनंजयो राजन्‌ रथानीकमगाहत । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं व्याक्षिपन्‌ धनु:,राजन! तदनन्तर अर्जुनने अपने त्रिभुवनविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए आपके रथियोंकी सेनामें प्रवेश किया

三阇耶说道:于是,大王,檀那ंज耶(阿周那)挥舞着名闻三界的神弓“甘狄婆”,其弓弦轰然作响,宣示无畏之志与正法之烈,径直冲入密集的战车武士阵列之中。

Verse 34

कृष्णसारथिमायान्तं दृष्टवा श्वेतहयं रथम्‌ । अर्जुन चापि योद्धारं त्वदीया: प्राद्रवन्‌ भयात्‌,श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं, उस श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए रथको और रथी योद्धा अर्जुनको आते देखकर आपके सारे रथी भयसे भाग चले

三阇耶说道:见那由白马牵引、以黑天(奎师那)为御者的战车逼近,又见车上武士阿周那前来,你方所有战车战士都因恐惧而奔逃。

Verse 35

विप्रहीनरथाश्वाश्ष शरैश्व॒ परिवारिता: । पज्चविंशतिसाहस्रा: पार्थमार्च्डनू पदातय:,तब रथों और घोड़ोंसे रहित तथा बाणोंसे आच्छादित हुए पचीस हजार पैदल योद्धाओंने कुन्तीकुमार अर्जुनपर चढ़ाई की

三阇耶说道:失却战车与战马,又被箭雨从四面围逼,二万五千名步兵仍被迫向前,进攻般度之子帕尔塔(阿周那)。

Verse 36

हत्वा तत्‌ पुरुषानीक॑ पञ्चालानां महारथः । भीमसेन पुरस्कृत्य नचिरात्‌ प्रत्यदृश्यत,उस पैदल सेनाका वध करके पांचाल महारथी धृष्टद्युम्न भीमसेनको आगे किये शीघ्र ही वहाँ दृष्टिगोचर हुए

三阇耶说道:诛灭那支步兵之后,般遮罗的伟大战车武士(德里ष्टद्युम्न)不久又再现于阵前,令毗摩塞那居于前锋,迅疾推进。

Verse 37

महाधनुर्धर: श्रीमानमित्रगणमर्दन: । पुत्र: पज्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महायशा:,पांचालराजके पुत्र धृष्टद्युम्न महाधनुर्धर, महायशस्वी, तेजस्वी तथा शत्रुसमूहका संहार करनेमें समर्थ थे

三阇耶说道:德里ष्टद्युम्न乃般遮罗王之子,光辉显赫、声名远播,是执弓无双的强弓手,足以摧折敌军之众。

Verse 38

पारावतसवर्णाश्वं कोविदारवरध्वजम्‌ । धृष्टद्युम्नं रणे दृष्टवा त्वदीया: प्राद्रवन्‌ू भयात्‌,जिनके रथमें कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जुते हुए थे तथा रथकी श्रेष्ठ ध्वजापर कचनारवृक्षका चिह्न बना हुआ था, उन धृष्टद्युम्नको रणभूमिमें उपस्थित देख आपके सैनिक भयसे भाग खड़े हुए

三阇耶说道:在战场上见到提利什塔丢摩那——其战车套着鸽色之马,卓绝的旗幡上又绘有拘毗陀罗(kachanāra)树的徽记——你的勇士们因恐惧而溃逃。

Verse 39

गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ । अचिरात्‌ प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रो ससात्यकी,सात्यकिसहित यशस्वी माद्रीकुमार नकुल और सहदेव शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले गान्धारराज शकुनिका तुरंत पीछा करते हुए दिखायी दिये

三阇耶说道:追逐健于用兵器、出手迅疾的犍陀罗王沙昆尼时,摩德丽的两位名将之子——并同萨底耶吉——不多时便映入眼帘。

Verse 40

चेकितान: शिखण्डी च द्रौपदेयाश्ष मारिष । हत्वा त्वदीयं सुमहत्‌ सैन्यं शड्खानथाधमन्‌

三阇耶说道:“尊贵者啊,契吉多那、尸佉ṇḍī,以及德罗帕蒂之子们,在斩杀了你军中极大一部之后,便吹响了海螺。”

Verse 41

माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र--आपकी विशाल सेनाका संहार करके शंख बजाने लगे ।। ते सर्वे तावकान प्रेक्ष्य द्रवतो वै पराड्मुखान्‌ | अभ्यधावन्त निष्नन्तो वृषाञ्जित्वा वृषा इव

三阇耶说道:“可敬的王啊,契吉多那、尸佉ṇḍī与德罗帕蒂的五子——屠戮了你那庞大军势之后——便吹响海螺。又见你的兵士背身奔逃,他们齐齐追击,斩杀不止——如雄壮之牛战胜群牛之后,乘势猛进。”

Verse 42

जैसे साँड़ साँड्रोंको परास्त करके उन्हें बहुत दूरतक खदेड़ते रहते हैं, उसी प्रकार उन सब पाण्डववीरोंने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धसे विमुख होकर भागते देख बाणोंका प्रहार करते हुए दूरतक उनका पीछा किया ।। सेनावशेषं तं दृष्टवा तव पुत्रस्य पाण्डव: । अवस्थितं सव्यसाची चुक्रोध बलवन्नूप,नरेश्वर! पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन आपके पुत्रकी सेनाके उस एक भागको अवशिष्ट एवं सामने उपस्थित देख अत्यन्त कुपित हो उठे

如同强壮之牛战胜群牛后,将其远远驱逐不止,般度诸英雄亦然——见你军尽皆背战而逃,便以箭矢连连击射,追逐至极远之处。随后,王啊,当以“善用双手”(Savyasachi)著称的般度之子阿周那,看见你儿子军中尚有一部残阵仍立于其前时,他怒火勃然而起。

Verse 43

तत एनं शरै राजन्‌ सहसा समवाकिरत्‌ | रजसा चोदगतेनाथ न सम किंचन दृश्यते,राजन! तदनन्तर उन्होंने सहसा बाणोंद्वारा उस सेनाको आच्छादित कर दिया। उस समय इतनी धूल ऊपर उठी कि कुछ भी दिखायी नहीं देता था

三阇耶说道:“于是,陛下,他忽然以箭如雨倾泻于那支军阵,四面八方尽皆遮覆。尘土腾起之时,战场中央迷雾浓重,竟无一物可得分明。”

Verse 44

अन्धकारीकृते लोके शरीभूते महीतले । दिश: सर्वा महाराज तावका: प्राद्रवन्‌ भयात्‌

三阇耶说道:“当世界陷入昏暗,连大地表面都仿佛化作可怖的有形之物时,陛下,你的勇士们因恐惧而四散奔逃,向四方而去。”

Verse 45

महाराज! जब जगत्‌में उस धूलसे अन्धकार छा गया और पृथ्वीपर बाण-ही-बाण बिछ गया, उस समय आपके सैनिक भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ।। भज्यमानेषु सर्वेषु कुरुराजो विशाम्पते । परेषामात्मनश्वैव सैन्ये ते समुपाद्रवत्‌

三阇耶说道:“人中之主啊,当那尘土使世界昏暗,大地又遍布箭矢之时,你的士卒因恐惧而向四方奔逃。及至诸军尽皆溃散之际,俱卢之王见敌阵与己军同陷骚乱,便奋然前驱,直入你的军中。”

Verse 46

प्रजानाथ! उन सबके भाग जानेपर कुरुराज दुर्योधनने शत्रुपक्षकी और अपनी दोनों ही सेनाओंपर आक्रमण किया ।। ततो दुर्योधन: सर्वानाजुहावाथ पाण्डवान्‌ | युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलि:,भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंका आह्वान किया

三阇耶说道:“护民之主啊,当众人尽皆奔逃之后,俱卢之王难敌(Duryodhana)竟向敌军与己军两边同时冲击。继而,婆罗多族之最胜者啊,难敌向诸般度婆(Pāṇḍava)尽数发出战斗的挑战,正如古时巴利王曾召唤诸天赴战一般。”

Verse 47

त एनमभिगर्जन्तं सहिता: समुपाद्रवन्‌ । नानाशस्त्रसृज: क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहु:

三阇耶说道:“当他放声咆哮之时,他们结为一体,齐齐冲向他。众人怒火炽盛,抛掷各类兵刃,又一次次以尖刻的辱骂围攻他。”

Verse 48

तब वे पाण्डवयोद्धा अत्यन्त कुपित हो गर्जना करनेवाले दुर्योधनको बारंबार फटकारते और क्रोधपूर्वक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए एक साथ ही उसपर टूट पड़े ॥। दुर्योधनो5प्यसम्भ्रान्तस्तानरीन्‌ व्यधमच्छरै: । तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम्‌

当时,般度族的战士们怒不可遏,发出震天咆哮,屡屡呵斥都利耶陀那;他们怀着怒火,倾泻出各式兵刃与飞射之器,如雨般落下,并一齐向他猛扑而去。都利耶陀那却毫不惊惶,以箭矢射击,压制那些敌人。就在那处,我们见到了奇异之事——陛下之子的英勇神力。

Verse 49

नातिदूरापयातं च कृतबुद्धि: पलायने

三阇耶说道:“他并未走远,因为心中早已决意逃遁。”

Verse 50

ततो<वस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मज:

随后,噢王者,你的儿子稳住阵脚,决意已定,便继续前行——心中已明白在战局推进之中当行之事。

Verse 51

हर्षयन्निव तान्‌ योधांस्ततो वचनमत्रवीत्‌ | राजेन्द्र! तब युद्धका ही दृढ़ निश्चय रखनेवाले आपके पुत्रने उन समस्त सैनिकोंको खड़ा करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए कहा-- || ५० ई ।। नतं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च

三阇耶说道:仿佛要使那些武士欢欣,他便说出此言。“噢诸王之最!就在那战斗的时刻,你的儿子意志坚决,使全军列阵而立,激起他们的斗志,说道:‘我在大地之上,乃至群山之间,也看不见有哪一处可以低头屈服而仍得安然……’”

Verse 52

स्वल्पं चैव बल॑ तेषां कृष्णा च भृशविक्षतौ

三阇耶说道:他们的力量确实微薄,而黑公主克利须那(德罗帕蒂)也身受重创。

Verse 53

यदि सर्वेजत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत्‌ | 'पाण्डवोंके पास थोड़ी-सी ही सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं। यदि हम सब लोग यहाँ डटे रहें तो निश्चय ही हमारी विजय होगी ।। ५२ कल || विप्रयातांस्तु वो भिन्नान्‌ पाण्डवा: कृतकिल्बिषान्‌

“若我等众人皆在此坚守不退,我方胜利必定到来。般度五子之军所余无几,室利·奎师那与阿周那亦已重伤。只要我们在此固守,胜利必然属于我们。”

Verse 54

अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयो न: समरे वध: । “यदि तुमलोग पृथक्‌-पृथक्‌ होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सभी अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे, अतः युद्धमें ही मारा जाना हमारे लिये श्रेयस्कर होगा ।। ५३ ई ।। सुख: सांग्रामिको मृत्यु: क्षत्रधर्मेण युध्यताम्‌

三阇耶说道:“若我等分散逃窜,般度五子必将追击,把我们当作罪人尽数诛杀。因此,对我们而言,战场上战死反而更为上策。凡依刹帝利之本分而战者,沙场之死乃是善终,亦为相称。”

Verse 55

शृण्वन्तु क्षत्रिया: सर्वे यावन्तो5त्र समागता:

三阇耶说道:“凡在此集会的诸位刹帝利,悉请倾听!”

Verse 56

पितामहैराचरितं न धर्म हातुमरहथ

三阇耶说道:“你们不应舍弃先祖诸长所奉行并守护的法(dharma)。”

Verse 57

न युद्धधर्माच्छेयान्‌ हि पन्था: स्वर्गस्थ कौरवा:

三阇耶说道:“噫,已登天界的俱卢族啊,诚然没有任何道路能胜过战斗之法(战士之达摩)。”

Verse 58

तस्य तदू वचन राज्ञ: पूजयित्वा महारथा:,राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्यु हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था

三阇耶说道:那些伟大的战车勇士尊奉国王之言,再次推进,迎向般度五子而战。败北已令他们难以忍受;因此他们唯以勇武为念,重振战意,再度奋力厮杀。

Verse 59

पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रिया: पाण्डवान्‌ प्रति । पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्न विक्रमे,राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्यु हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था

刹帝利诸军又一次转身冲向般度五子;他们不堪忍受败北,遂定下决心,只求以武勇雪耻。

Verse 60

ततः प्रववृते युद्ध पुनरेव सुदारुणम्‌ । तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम्‌,तदनन्तर आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें पुनः देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा

三阇耶说道:随后,你方与敌方之间的战斗又一次爆发,极其惨烈,宛如天神与阿修罗的传说之战。

Verse 61

युधिष्ठिरपुरोगांश्व॒ सर्वसैन्येन पाण्डवान्‌ | अन्यधावन्महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव,महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने अपनी सारी सेनाके साथ युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डवोंपर धावा किया था

三阇耶说道:大王啊,那时你的儿子难敌(Duryodhana)率领全军,径直冲向以坚战(Yudhiṣṭhira)为首的般度诸子。

Verse 103

अभियातीति मन्वाना:ः पेतुर्मम्लुश्न भारत । वे सब लोग एक-दूसरेपर चोट करते और भयसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए ऐसा समझते थे कि अर्जुन और भीमसेन मेरे ही पीछे लगे हुए हैं। भारत! ऐसा सोचकर वे हर्ष और उत्साह खो बैठते तथा लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे

三阇耶说道:噢,婆罗多啊,他们以为有人向他们冲杀,便在惊惶中纷纷倒下。彼此误击,又因恐惧而四顾张望,自以为阿周那与怖军(Bhīmasena)正紧紧追在我身后。如此一想,他们的欢欣与斗志尽失,踉跄跌倒在地。

Verse 116

आरुह्य जवसम्पन्ना: पादातान्‌ प्रजहुर्भयात्‌ । कुछ महारथी भयके मारे घोड़ोंपर, दूसरे लोग हाथियोंपर और कुछ लोग रथोंपर आरूढ़ हो पैदलोंको वहीं छोड़ बड़े वेगसे भागे

三阇耶说道:恐惧击中人心,有些战士跃上迅捷的骏马,当场抛下步卒,以极快的速度奔逃。此景昭示:一旦惊惶蔓延,战阵的纪律与忠义便会崩裂,自保之念压倒了与同袍并肩死战的职责。

Verse 131

अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथा:

三阇耶说道:“有的斩落战马,有的击倒战象,有的毁坏战车——那些大车战士一心要在一切形态上削弱并瘫痪敌军的力量。”

Verse 136

तथा त्वदीया निहते सूतपुत्रे तदाभवन्‌ । जैसे सर्पों और लुटेरोंसे भरे हुए जंगलमें अपने साथियोंसे बिछुड़े हुए लोग अनाथके समान भटकते हैं, वही दशा उस समय सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सैनिकोंकी हुई

三阇耶说道:当御者之子(迦尔纳)被杀之时,你的军队便如同在遍布毒蛇与盗匪的森林里与同伴失散的人——无依无靠,惶惶游走,仿佛失了庇护。于是,迦尔纳一倒,你军便陷入混乱、恐惧与群龙无首的困厄。

Verse 156

दुर्योधनो5थ स्वं सूतं हा हा कृत्वैवमब्रवीत्‌ । भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए समस्त सैनिकोंको भागते देख दुर्योधनने “हाय-हाय!! करके अपने सारथिसे इस प्रकार कहा--

三阇耶说道:随后,杜尤陀那哀号着“哀哉!哀哉!”,对自己的御者说道。见全军因惧畏毗摩塞那而震颤受迫,纷纷逃离战场,他痛苦发言——这哀叹显出:恐惧如何在战争的道义重压之下,瓦解军阵的决心,也动摇统帅的镇定。

Verse 163

जघने युद्धयमान मां तूर्णमश्चान्‌ प्रचोदय । “जब मैं सेनाके पिछले भागमें खड़ा हो हाथमें धनुष ले युद्ध करूँगा, उस समय कुन्तीकुमार अर्जुन मुझे लाँधकर आगे नहीं बढ़ सकेंगे; अतः तुम घोड़ोंको आगे बढ़ाओ

三阇耶说道:“快驱策战马。待我立于军阵后部,手执弓矢而战之时,昆蒂之子阿周那便不能越过我而向前推进;因此,催马前行。”

Verse 193

सूतो हेमपरिच्छन्नान्‌ शनैरश्वानचोदयत्‌ । कुरुराज दुर्योधनके इस श्रेष्ठ वीरोचित वचनको सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे ढके हुए अश्वोंको धीरेसे आगे बढ़ाया

三阇耶说道:听到俱卢王难敌那番高贵而具武士气概的话,御者便轻轻催动那套着金饰鞍具与缰络的骏马,令其缓缓向前行进,谨守军令而不纵于急躁。

Verse 203

पज्चविंशतिसाहस्रा: प्राद्रवनू शनकैरिव । माननीय नरेश! उस समय हाथी, घोड़े और रथोंसे रहित पचीस हजार पैदल सैनिक धीरे-ही-धीरे पाण्डवोंपर चढ़ाई करने लगे

三阇耶说道:“可敬的大王啊!当时有二万五千名步兵——既无战象、亦无战马、亦无战车——向般度诸子推进,行进之势仿佛缓慢而稳健。”

Verse 216

बलेन चतुरजड्रेण परिक्षिप्पाहनच्छरै: । तब क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपनी चतुरंगिणी सेनाके द्वारा उन्हें तितर-बितर करके बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया

三阇耶说道:他们凭四部军(象、马、车、步)的威力合围敌军,以箭矢痛击。继而,愤怒已满胸臆的毗摩塞那与德鲁帕达之子持军主——德里什塔丢摩那——又以己方四部军将对阵之众冲散四方,并以密集箭雨使其重创。

Verse 226

पार्थपार्षतयो श्वान्ये जगृहुस्तत्र नामनी । वे समस्त सैनिक भी भीमसेन और धूृष्टद्युम्मका डटकर सामना करने लगे। दूसरे बहुत- से योद्धा वहाँ उन दोनोंके नाम ले-लेकर ललकारने लगे

三阇耶说道:在那里,众武士高声呼喊“帕尔塔”(阿周那)与“帕尔沙塔”(德里什塔丢摩那)之名,直面挑衅。全军稳立不退,压上前来与毗摩塞那、德里什塔丢摩那相抗;又有许多战士反复点名呼喝二人,在战火炽热中抛出讥嘲与召战之辞。

Verse 236

सो<वतीर्य रथात्तूर्ण गदापाणिरयुध्यत । युद्धस्थलमें सामने खड़े हुए उन योद्धाओंके साथ जूझते समय भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे तुरंत ही रथसे उतरकर हाथमें गदा ले उन सबके साथ युद्ध करने लगे

三阇耶说道:随后,毗摩塞那迅疾下车,手执钉锤(伽陀),投入战斗。即便与面前列阵的武士在战场上近身搏斗之时,他的怒火仍愈发高涨;于是他选择贴身肉搏,挥起伽陀,与众敌当面相战。

Verse 243

योधयामास कौन्तेयो भुजवीर्यमुपाश्रित: । युद्धधर्मके पालनकी इच्छा रखनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने स्वयं रथपर बैठकर भूमिपर खड़े हुए पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करना उचित नहीं समझा। वे अपने बाहुबलका भरोसा करके उन सबके साथ पैदल ही जूझने लगे

三阇耶说道:俱提之子倚仗自身臂力,继续奋战。虽守战场之法(战法之法度),毗摩塞那却认为:自己仍坐战车之上,而与立于地面的步兵交锋,实非相称;因此他信赖体魄勇力,下车徒步与众兵搏斗,使其行止合乎他所认定的战争公正。

Verse 256

न्यवधीत्‌ तावकान्‌ सर्वान्‌ दण्डपाणिरिवान्तक: । उन्होंने दण्डपाणि यमराजके समान सुवर्णपत्रसे जटित विशाल गदा लेकर उसके द्वारा आपके समस्त सैनिकोंका संहार आरम्भ किया

三阇耶说道:他开始屠戮你方诸军,宛如安多迦(死神)亲临,仿佛手执惩罚之杖。手握那以金叶装饰的巨大铁棒(重槌),如同持杖的阎摩王(檀陀波尼),他遂开启对你全军的杀伐。

Verse 263

भीममभ्यद्रवन्‌ संख्ये पतजड़ा इव पावकम्‌ । उस समय अपने प्राणों और बन्धु-बान्धवोंका मोह छोड़कर रोष और आवेशमें भरे हुए पैदल सैनिक युद्धस्थलमें भीमसेनकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे पतंग चलती हुई अतापर टूट पड़ते हैं

三阇耶说道:在鏖战之中,他们直扑毗摩,犹如飞蛾被盲目的冲动牵引,投身烈焰。那时,这些步卒满腔愤怒与狂热,抛却对性命的顾惜,亦忘却对亲族的眷恋,便如扑火之虫一般,向毗摩塞那猛冲而去。

Verse 273

विनेदु: सहसा दृष्टवा भूतग्रामा इवान्तकम्‌ | क्रोधमें भरे हुए वे रणदुर्मद योद्धा भीमसेनसे भिड़कर सहसा उसी प्रकार आर्तनाद करने लगे, जैसे प्राणियोंके समुदाय यमराजको देखकर चीख उठते हैं

三阇耶说道:他们骤然看见毗摩塞那之时,那些战士虽怒火充盈、战场骄矜高涨,却立刻发出凄厉哀号,恰如众生见到安多迦——死之主宰——便惊叫不已。

Verse 283

पजञ्चविंशतिसाहस्रांस्तावकानां व्यपोथयत्‌ | उस समय भीमसेन रणभूमिमें बाजकी तरह विचर रहे थे। उन्होंने तलवार और गदाके द्वारा आपके उन पचीस हजार योद्धाओंको मार गिराया

三阇耶说道:毗摩塞那击倒了你方二万五千名战士。即便如此,他仍如鹰隼般游走于战场,或以剑斩裂,或以重槌碾碎——在战争阴沉的法度之下,勇武与屠戮并行不悖。

Verse 293

धृष्टय्युम्नं पुरस्कृत्य पुनस्तस्थी महाबल: । सत्यपराक्रमी महाबली भीमसेन उस पैदल-सेनाका संहार करके धृष्टद्युम्मनको आगे किये पुनः युद्धके लिये डट गये

三阇耶说道:他将德利什塔丢摩那(Dhṛṣṭadyumna)置于前锋,那力大无比的毗摩塞那(Bhīmasena)——其勇武从未落空——在歼灭那支步兵之后,又一次稳立阵前,整肃心神,准备再战。此偈彰显在战争严酷要求之中,坚忍的勇气与善用兵势的统御。

Verse 436

आसीद्‌ बुद्धि्ते कर्णे तव योधस्य कस्यचित्‌ । कर्णके मारे जानेपर आपके किसी भी योद्धाके मनमें न तो सेनाओंको एकत्र संगठित रखनेका उत्साह रह गया और न पराक्रममें ही वे मन लगा सके

三阇耶说道:当迦尔纳(Karṇa)被杀之后,你方诸将无一还能保有将军旅聚拢、整肃纪律的决心;他们也再难把心神系于勇武。首席勇士的陨落击碎了大军的凝聚,抽空了士气之力,显明在战场之上,统帅与信心如何支撑军队的战斗之法(dharma)。

Verse 486

यदेनं पाण्डवा: सर्वे न शेकुरतिवर्तितुम्‌ । दुर्योधन भी बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको छिन्न-भिन्न करने लगा। वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव मिलकर भी उसे लाँधकर आगे न बढ़ सके

三阇耶说道:纵使诸般度婆(Pāṇḍava)尽皆合力,也不能越过他。都律约陀那(Duryodhana)毫无惧色,以己之箭矢将那些敌人割裂粉碎。就在那处,我们见到你儿惊人的神勇:即便般度众军合为一体,也无法跨过他而向前推进。

Verse 493

दुर्योधन: स्वकं सैन्यमपश्यद्‌ भृशविक्षतम्‌ | दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना अत्यन्त घायल हो रणभूमिसे पलायन करनेका विचार रखकर भाग रही है, परंतु अधिक दूर नहीं गयी है

三阇耶说道:都律约陀那看见己方军队伤痕累累。见他们困顿失序、阵形崩散,他便明白他们已起逃离战场之念——只是尚未走远。此景昭示:由非正法(adharma)驱动的野心,一旦被战争的后果逼迫,纵是浩大之师也会转向恐惧与退却。

Verse 513

यत्र यातान्न वो हन्यु: पाण्डवा: कि सृतेन व: । “वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है?

三阇耶说道:“诸位勇士!我看不见任何地方——无论大地之上,抑或群山之间——你们若去到那里,般度众(Pāṇḍava)便不能将你们击倒。既如此,逃走又有何益?”

Verse 546

मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यम श्रुते । 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये संग्रामभूमिमें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है; क्योंकि वहाँ मरा हुआ मनुष्य मृत्युके दुःखको नहीं जानता और मृत्युके पश्चात्‌ अक्षय सुखका भागी होता है

三阇耶说道:“人既已死,便不再感受死亡之苦;离此世而去之后,便得无尽不坏之乐。因此,对依刹帝利之法而战的英雄而言,战场之死被视为吉祥,甚至可求;因为它与荣誉、尽责,以及死后所许的不朽福报相连。”

Verse 553

द्विषतो भीमसेनस्य वशमेष्यथ विद्रुता: । “जितने क्षत्रिय यहाँ आये हैं वे सब सुनें--“तुमलोग भागनेपर अपने शत्रु भीमसेनके अधीन हो जाओगे

三阇耶说道:“你们若惊惶逃遁,便将落入你们的仇敌——毗摩塞那——的掌控之下。”此句在战阵之中乃严厉警告:怯懦的退却并不能保全自由与荣誉,反而把主动与控制拱手让给对手,使刹帝利在道义上自取败亡。

Verse 563

नान्यत्‌ कर्मास्ति पापीय: क्षत्रियस्य पलायनात्‌ | “इसलिये अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो। क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है

三阇耶说道:“对刹帝利而言,没有比临阵逃遁更为罪恶之事。因此,莫要抛弃你们祖先世代奉行的达摩;弃战而逃,是为生来护持秩序者最沉重的道德败失。”

Verse 573

सुचिरेणार्जिताल्लोकान्‌ सद्यो युद्धात्‌ समश्षुते । “कौरवो! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गका श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। दीर्घकालतक पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकोंको वीर क्षत्रिय युद्धसे तत्काल प्राप्त कर लेता है!

三阇耶说道:“那些须经长久积累善业方能赢得的福德之界,战士却能凭战斗立刻获得。对刹帝利而言,通往天界再无高于正战之斗法(战之达摩)的道路。”

Frequently Asked Questions

Whether a ruler should continue role-based kṣatra-engagement despite severe depletion, or prioritize polity-preservation through negotiated settlement when further conflict risks total institutional collapse.

Effective dharma in governance is contextual: courage is not identical with escalation; prudent restraint and safeguarding the social vessel (the ruler/polity) can be ethically superior under decline.

No formal phalaśruti is stated; the meta-commentary is implicit in Kṛpa’s framing that prior misconduct yields present strategic consequences, positioning the episode as a lesson in karmic-political causality.