Adhyaya 56
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 5638 Verses

Adhyaya 56

Uttaṅka’s Petition for Madayantī’s Divine Earrings (Maṇikuṇḍala) — Agreement, Proof, and Vigilance

Upa-parva: Uttaṅka–Saudāsa–Madayantī Episode (Maṇikuṇḍala-Prārthanā)

Vaiśaṃpāyana describes a formidable king, Saudāsa, encountered by the brahmin Uttaṅka. Despite the king’s frightening appearance, Uttaṅka remains composed. Saudāsa states that at the sixth time-period his meal is prescribed and cannot be relinquished, presenting a competing obligation. Uttaṅka identifies himself as acting for a guru’s purpose and asserts that one engaged in gurv-artha should not be harmed; he proposes a samaya: he will complete the teacher’s task and then return under the king’s control. Uttaṅka further argues donor–recipient propriety, positioning Saudāsa as a legitimate giver and himself as a fit recipient for a specific requested item. Saudāsa affirms his truthfulness and asks what is to be received; Uttaṅka requests the maṇikuṇḍale. Saudāsa replies that the earrings belong to his queen Madayantī and instructs Uttaṅka to ask her directly, indicating where she can be found. Madayantī accepts the plausibility of the request but asks for identification/proof; she explains the earrings’ divine status, their luminous qualities, and the persistent risk of seizure by devas, yakṣas, and nāgas through moments of negligence (placing them down, impurity, sleep). The chapter closes with her demand for an appropriate token of recognition before transfer, emphasizing custody-discipline as part of dharma.

Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को उत्तंक के तेज, तप और गुरु-भक्ति का स्मरण कराते हैं—ऐसा शिष्य जो गुरु के अतिरिक्त किसी की पूजा नहीं करता, उसी के जीवन में एक परीक्षा उतरती है। → गुरुकुल में ऋषिकुमारों की आकांक्षा ‘औत्तड़की’ गुरु-वृत्ति पाने की है; गुरु-पुत्री (धर्मज्ञ, विनीत) पिता की आज्ञा से शिष्य-धर्म की मर्यादा को रेखांकित करती है। गौतम ऋषि दक्षिणा को गुरु-संतोष का सार बताते हैं और उत्तंक को पूर्ण तृप्त घोषित करते हैं—पर साथ ही एक ऐसी आज्ञा/कार्य का संकेत बनता है जो शिष्य की देह-सीमा और धैर्य की परीक्षा लेगा। → उत्तंक गुरु-पत्नी के प्रियार्थ/आज्ञार्थ ‘बहुत अच्छा’ कहकर निकल पड़ता है और कठोर श्रम में पड़ जाता है—भारी लकड़ियों का बोझ उठाते-उठाते वह थककर धरती पर गिर पड़ता है; भूख और भार से पिसकर अपनी दयनीय अवस्था देखकर आर्तस्वर में रो पड़ता है। → अध्याय का अंत उत्तंक की शारीरिक-मानसिक चरम-सीमा पर होता है—गुरु-भक्ति का संकल्प बना है, पर देह टूट रही है; कथा उसे आगे की निर्णायक सहायता/घटना की दहलीज़ पर छोड़ देती है। → भूख, थकान और गिरावट के बाद उत्तंक को कौन सहारा देगा—और गुरु/गुरुपत्नी की आज्ञा पूरी करने हेतु वह किस उपाय से उठ खड़ा होगा?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपववके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तडुको पाख्यानमें कृष्णवाक्यविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५५ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं) भीकम (2 अमान षट्पज्चाशत्तमो< ध्याय: उत्तंककी गुरुभक्तिका वर्णन, गुरुपुत्रीके साथ उत्तंकका विवाह, गुरुपत्नीकी आज्ञासे दिव्यकुण्डल लानेके लिये उत्तंकका राजा सौदासके पास जाना जनमेजय उवाच उत्तड़क: केन तपसा संयुक्तो वै महामना: । यः शापं दातुकामो<भूद्‌ विष्णवे प्रभविष्णवे,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन्‌! महात्मा उत्तंक मुनिने ऐसी कौन-सी तपस्या की थी, जिससे वे सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत भगवान्‌ विष्णुको भी शाप देनेका संकल्प कर बैठे?

于是,在《摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀篇之《阿努吉塔》分篇中,乌坦迦传说里关于克里希纳之言的第五十五章至此完结。随后,阇那梅阇耶问道:“婆罗门啊,那位大心的乌坦迦以何等苦行与灵修戒律自持,竟至于生起要诅咒毗湿奴——那位大能之主、万力之源——的念头?”

Verse 2

वैशम्पायन उवाच उत्तड़को महता युक्तस्तपसा जनमेजय । गुरुभक्त: स तेजस्वी नान्यत्‌ किंचिदपूजयत्‌,वैशम्पायनजीने कहा--जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुक सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी

毗湿摩波耶那说:“阇那梅阇耶啊,仙人乌坦迦具足大苦行。其灵威炽盛,且对师长之奉爱坚固不移;他不礼敬他神,唯以师(Guru)为至上所敬。”

Verse 3

सर्वेषामृषिपुत्राणामेष आसीन्मनोरथ: । औत्तड़कीं गुरुवृत्तिं वै प्राप्तुयामेति भारत,भरतनन्दन! जब वे गुरुकुलमें रहते थे, उन दिनों सभी ऋषिकुमारोंके मनमें यह अभिलाषा होती थी कि हमें भी उत्तंकके समान गुरुभक्ति प्राप्त हो

毗湿摩波耶那说:“这正是诸仙之子心中共同的夙愿:‘噢婆罗多啊,婆罗多族之欢悦者,愿我们也能获得乌坦迦那般对师长的奉爱之行。’”

Verse 4

गौतमस्य तु शिष्याणां बहूनां जनमेजय । उत्तड़के< भ्यधिका प्रीति: स्नेहश्वैवाभवत्‌ तदा

毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那美阇耶!在乔达摩众多弟子之中,当时对优多楞迦(Uttaṅka)生起了格外深厚的慈爱与温热的眷恋,使他在诸弟子里尤为受宠、最为可亲。”

Verse 5

जनमेजय! गौतमके बहुत-से शिष्य थे, परंतु उनका प्रेम और स्नेह सबसे अधिक उत्तंकमें ही था ।। स तस्य दमशौचाभ्यां विक्रान्तेन च कर्मणा । सम्यक्‌ चैवोपचारेण गौतम: प्रीतिमानभूत्‌,उत्तंकके इन्द्रियसंयम, बाहर-भीतरकी पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवासे गौतम बहुत प्रसन्न रहते थे

毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那美阇耶!乔达摩虽有众多弟子,然而他最深的慈爱与温柔却尤其倾注于优多楞迦。凭借优多楞迦的诸根调御、内外清净、奋力尽责,以及恭谨周到的侍奉,乔达摩大为欢喜。”

Verse 6

अथ शिष्यसहस्राणि समनुज्ञातवानृषि: । उत्तड़क॑ परया प्रीत्या नाभ्यनुज्ञातुमैच्छत । त॑ क्रमेण जरा तात प्रतिपेदे महामुनिम्‌,उन महर्षिने अपने सहस्रों शिष्योंको पढ़ाकर घर जानेकी आज्ञा दे दी; परंतु उत्तड़कपर अधिक प्रेम होनेके कारण वे उन्हें घर जानेकी आज्ञा नहीं देना चाहते थे। तात! क्रमश: उन महामुनि उत्तंकको वृद्धावस्था प्राप्त हुई

毗湿摩波耶那说道:那位仙人既已依礼准许数千弟子辞归,却不愿遣散优多楞迦,因为他对其爱重至深。然而,亲爱的啊,岁月流转,衰老终究追上了那位大苦行者。

Verse 7

न चान्वबुध्यत तदा स मुनिर्गुरुवत्सल: । ततः कदाचिद्‌ राजेन्द्र काष्ठान्यानयितुं ययौ

当时,那位对师长至为眷恋的牟尼并未察觉事情的真相。随后,噢,诸王之最!有一次他外出取来薪柴。

Verse 8

स तद्धाराभिभूतात्मा काष्ठ भारमरिंदम,तत: काष्ठै: सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये। उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था। वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे। जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी

毗湿摩波耶那说道:被那重担压迫而精疲力竭,那位制敌者因薪柴之重压身,遂与木柴一同仆倒在地。

Verse 9

निचिक्षेप क्षितौ राजन्‌ परिश्रान्तो बुभुक्षित: । तस्य काष्ठे विलग्नाभूज्जटा रूप्यसमप्रभा

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,他疲惫饥饿,便倒身伏地。其旁一段木头上,粘着一绺纠结的发髻(jaṭā),光泽如银般闪耀。”

Verse 10

ततः स भारनिष्षिष्ट: क्षुधाविष्टश्न भारत

随后,他虽已卸下重担,却被饥饿攫住——婆罗多啊——仍继续前行。

Verse 12

जग्राहाश्रूणि सुश्रोणी करेण पृथुलोचना । पितुर्नियोगाद्‌ धर्मज्ञा शिरसावनता तदा

毗湿摩波耶那说道:于是那位贤淑女子——腰肢纤细、双眸广大——用手拭去泪水。她明了法(dharma)之所当为,又奉父命,便低首顺从。

Verse 13

ततो गुरुसुता तस्य पद्मपत्रनि भानना,तब कमलदलके समान प्रफुल्ल मुखवाली विशाललोचना परम सुन्दरी धर्मज्ञ गुरुपुत्रीने पिताकी आज्ञा पाकर विनीत भावसे सिर झुकाये वहाँ आयी और अपने हाथोंमें उसने मुनिके आँसू ग्रहण कर लिये ।। तस्या निपेततुर्दग्धौ करौ तैरश्रुबिन्दुभि: । न हि तानश्रुपातांस्तु शक्ता धारयितुं मही उन अभश्रुबिन्दुओंसे उसके दोनों हाथ जल गये और आँसुओंसहित पृथ्वीसे जा लगे। परंतु पृथ्वी भी उन गिरते हुए अश्रुबिन्दुओंके धारण करनेमें असमर्थ हो गयी

随后,师尊之女——面容灿然如莲瓣——奉父命而来,神情谦恭,在双手中捧接牟尼的泪水。然而那泪滴炽热如火,灼伤了她的双手,泪水遂坠落大地。即便大地,也承受不住那坠落泪滴的重量与热力。

Verse 14

गौतमस्त्वब्रवीद्‌ विप्रमुत्तड़कं प्रीतमानस: । कस्मात्‌ तात तवाद्येह शोकोत्तरमिदं मन: । स स्वैरं ब्रूहि विप्रषें श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः,फिर गौतमने प्रसन्नचित्त होकर विप्रवर उत्तंकसे पूछा--“बेटा! आज तुम्हारा मन शोकसे व्याकुल क्यों हो रहा है? मैं इसका यथार्थ कारण सुनना चाहता हूँ। ब्रह्मर्ष! तुम नि:संकोच होकर सारी बातें बताओ'

毗湿摩波耶那说道:乔达摩心怀欢悦与慈意,对婆罗门优檀迦说道:“孩子啊,你今日为何忧愁满怀?请坦然直言,婆罗门圣仙;我愿从头至尾听闻其中真实缘由。”

Verse 15

उत्तडुक उवाच भवद्गतेन मनसा भवत्प्रियचिकीर्षया । भवद्धक्तिगतेनेह भवद्धावानुगेन च,उत्तंकने कहा--गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा। आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपटहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला। मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी

优陀杜迦说道:“尊师啊!我心恒系于您,只愿行您所喜之事;唯以您为归依,我留在此地侍奉左右,怀着坚定不移的眷恋追随您。沉浸于对您的虔敬之中,我既不求世间享乐,连衰老的到来也未曾察觉。纵然我在此居住已满百年,您仍未准许我归返故里。”

Verse 16

जरेयं नावबुद्धा मे नाभिज्ञातं सुखं च मे । शतवर्षोषितं मां हि न त्वमभ्यनुजानिथा:,उत्तंकने कहा--गुरुदेव! मेरा मन सदा आपमें लगा रहा। आपहीका प्रिय करनेकी इच्छासे मैं निरन्तर आपकी सेवामें संलग्न रहा, मेरा सम्पूर्ण अनुराग आपटहीमें रहा है और आपहीकी भक्तिमें तत्पर रहकर मैंने न तो लौकिक सुखको जाना और न मुझे आये हुए इस बुढ़ापाका ही पता चला। मुझे यहाँ रहते हुए सौ वर्ष बीत गये तो भी आपने मुझे घर जानेकी आज्ञा नहीं दी

优陀迦说道:“我竟未觉察衰老已临于身,也从未识得世间之乐。实在说来,我在此居住已满百年,您仍未赐我准许。”

Verse 17

भवता त्वभ्यनुज्ञाता: शिष्या: प्रत्यवरा मम । उपपन्ना द्विजश्रेष्ठ शशशो5थ सहस्रश:,द्विजश्रेष्ठ! मेरे बाद सैकड़ों और हजारों शिष्य आपकी सेवामें आये और अध्ययन पूरा करके आपकी आज्ञा लेकर चले गये (केवल मैं ही यहाँ पड़ा हुआ हूँ)

优陀迦说道:“噢,二次生中之最胜者!蒙您许可,后来到来的弟子——成百上千——皆已学业圆满,领受您的准许而离去。唯独我一人仍留在此,仿佛被拘系不放。”

Verse 18

गौतम उवाच त्वत्प्रीतियुक्तेन मया गुरुशुश्रूषया तव । व्यतिक्रामन्महाकालो नावबुद्धो द्विजर्षभ,गौतमने कहा--विप्रवर! तुम्हारी गुरुशुश्रूषासे तुम्हारे ऊपर मेरा बड़ा प्रेम हो गया था। इसीलिये इतना अधिक समय बीत गया तो भी मेरे ध्यानमें यह बात नहीं आयी

乔达摩说道:“噢,二次生中的雄者!因你以至诚侍奉师长,我对你满怀慈爱;于是漫长岁月悄然流逝,而我竟未曾觉察。”

Verse 19

कि त्वद्य यदि ते श्रद्धा गमनं॑ प्रति भार्गव । अनुज्ञां प्रतिगृहा त्वं स्‍्वगृहान्‌ गच्छ मा चिरम्‌,भृगुनन्दन! यदि आज तुम्हारे मनमें यहाँसे जानेकी इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहाँसे अपने घरको चले जाओ

乔达摩说道:“然而,若你今日确有离去之志,噢,婆罗伽婆,婆利古族之欢悦者——便领受我的许可,速速归返你自己的家园,莫再迟延。”

Verse 20

उत्तडुक उवाच गुर्वर्थ क॑ प्रयच्छामि ब्रूहि त्वं द्विजसत्तम । तमुपाहत्य गच्छेयमनुज्ञातस्त्वया विभो,उत्तंकने पूछा-<द्विजश्रेष्ठ! प्रभो! मैं आपको गुरुदक्षिणामें क्या दूँ? यह बताइये। उसे आपको अर्पित करके आज्ञा लेकर घरको जाऊँ

优陀迦说道:“噢,最上之婆罗门,请告知我——我当以何物作为师资之礼(guru-dakṣiṇā)奉献于师?待我携来呈献之后,可否蒙您允准,使我得以返归家中,噢,尊者?”

Verse 21

गौतम उवाच दक्षिणा परितोषो वै गुरूणां सद्धिरुच्यते तव ह्याचरतो ब्रह्ांस्तुष्टो 5हं वै न संशय:,गौतमने कहा--ब्रह्मन्‌! सत्पुरुष कहते हैं कि गुरुजनोंको संतुष्ट करना ही उनके लिये सबसे उत्तम दक्षिणा है। तुमने जो सेवा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ, इसमें संशय नहीं है

乔多摩说道:“婆罗门啊,贤者常言:令师长心满意足,便是献给师长最上之师资礼。你所行之侍奉使我甚为欢喜——毫无疑虑。”

Verse 22

इत्थं च परितुष्टं मां विजानीहि भृगूद्वह । युवा षोडशवर्षो हि यद्यद्य भविता भवान्‌,भगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती

“因此你当知我已全然满足,噢,婆利古族中之翘楚。噢,婆利古家族之荣饰——若你能成为十六岁的少年,我便将我那尚为处女的女儿许配于你为妻;因为除她之外,别无女子能承受你苦行威力所放之光辉。”

Verse 23

ददानि पत्नीं कन्यां च स्वां ते दुहितरं द्विज । एतामृते<ड्रना नान्या त्वत्तेजो5हति सेवितुम्‌,भगुकुलभूषण! इस तरह तुम मुझे पूर्ण संतुष्ट जानो। यदि आज तुम सोलह वर्षके तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नीरूपसे अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूँगा; क्योंकि इसके सिवा दूसरी कोई स्त्री तुम्हारे तेजको नहीं सह सकती

乔多摩说道:“噢,二次生者(dvija),我将我的妻子以及我那尚为处女的女儿——我亲生的孩子——都许与你。除她之外,再无女子能承受并侍奉如你这般光辉之人,噢,婆利古家族之荣饰。”

Verse 24

ततस्तां प्रतिजग्राह युवा भूत्वा यशस्विनीम्‌ । गुरुणा चाभ्यनुज्ञातो गुरुपत्नीमथाब्रवीत्‌,तब उत्तंकने तपोबलसे तरुण होकर उस यशस्खविनी गुरुपुत्रीका पाणिग्रहण किया। तत्पश्चात्‌ गुरुकी आज्ञा पाकर वे गुरुपत्नीसे बोले--

于是,优陀迦凭其苦行之力复得青春,迎娶那位声名卓著的少女为妻。又蒙师长允可之后,他便转而对师母开口说道——

Verse 25

कं भवत्यै प्रयच्छामि गुर्वर्थ विनियुड्धक्ष्य माम्‌ । प्रियं हितं च काड्क्षामि प्राणैरपि धनैरपि,“माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं गुरुदक्षिणामें आपको क्या दूँ? अपना धन और प्राण देकर भी मैं आपका प्रिय एवं हित करना चाहता हूँ

乔达摩说道:“我当以何物奉献于您,作为师资之礼(guru-dakṣiṇā)?请您命令我。我渴望成就那既为您所爱、又对您有益之事——纵使要以性命为代价,或倾尽我所有财富亦在所不惜。”

Verse 26

यद्‌ दुर्लभं हि लोकेडस्मिन्‌ रत्नमत्यद्भुतं महत्‌ | तदानयेयं तपसा न हि मे<त्रास्ति संशय:,“इस लोकमें जो अत्यन्त दुर्लभ, अद्भुत एवं महान्‌ रत्न हो, उसे भी मैं तपस्याके बलसे ला सकता हूँ; इसमें संशय नहीं है”

乔达摩说道:“此世间无论何等极其难得、奇妙而伟大的宝珠,我都能凭苦行之力将其取来。对此,我心中毫无疑虑。”

Verse 27

अहल्योवाच परितुष्टास्मि ते विप्र नित्यं भकत्या तवानघ । पर्याप्तमेतद्‌ भद्गं ते गच्छ तात यथेप्सितम्‌,अहल्या बोली--निष्पाप ब्राह्मण! मैं तुम्हारे भक्ति-भावसे सदा संतुष्ट हूँ। बेटा! मेरे लिये इतना ही बहुत है। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ

阿诃梨耶说道:“无垢的婆罗门啊!我常因你的虔敬而心满意足。孩子,这对我已足够。愿吉祥护佑于你。如今你可随心所欲而去。”

Verse 28

वैशम्पायन उवाच उत्तड़कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद्‌ वच: । आज्ञापयस्व मां मात: कर्तव्यं च तव प्रियम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--महाराज! गुरुपत्नीकी बात सुनकर उत्तंकने फिर कहा --“माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये--मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना है!

毗湿摩衍那说道:“大王啊,乌坦迦听罢师母之言,又复说道:‘母亲,请命令我——我当作何事?我必定要成就您所喜悦之事。’”

Verse 29

अहल्योवाच सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले । ते समानय भद्ठं ते गुर्वर्थ: सुकृतो भवेत्‌,अहल्या बोली--बेटा! राजा सौदासकी रानीने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। उनके ला देनेसे तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जायगी

阿诃梨耶说道:“孩子,把娑乌达萨王之妻所佩戴的那一对天赐宝石耳环带来。愿吉祥护佑于你。将它们带来,你的师资之礼(guru-dakṣiṇā)便算圆满。”

Verse 30

स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय । गुरुपत्नीप्रियार्थ वै ते समानयितुं तदा,जनमेजय! तब “बहुत अच्छा" कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये

毗湿摩波耶那说:“就如此吧。”他向阇那美阇耶应诺后,便立刻动身去求取那对耳饰,意在成全师母所钟爱的心愿。

Verse 31

स जगाम ततः: शीघ्रमुत्तड़को ब्राह्मणर्षभ: । सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले,ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक नरभक्षी राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा सौदाससे उन मणिमय कुण्डलोंकी याचना करनेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए

毗湿摩波耶那说:随后,那位卓越的婆罗门乌坦迦从那里疾速启程,意欲向已成食人者的苏陀娑王乞求那对镶宝耳环。

Verse 32

गौतमस्त्वब्रवीत्‌ पत्नीमुत्तड़को नाद्य दृश्यते । इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा,उनके चले जानेपर गौतमने पत्नीसे पूछा--“आज उत्तंक क्‍यों नहीं दिखायी देता है?' पतिके इस प्रकार पूछनेपर अहल्याने कहा--“वह सौदासकी महारानीके कुण्डल ले आनेके लिये गया”

乌坦迦离去之后,乔多摩对妻子说道:“今日为何不见乌坦迦?”被如此问及,阿诃利耶答道:“他为耳环之事而去。”

Verse 33

ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम्‌ । शप्त: स पार्थिवो नून॑ ब्राह्मणं तं वधिष्यति,यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा--'देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजा सौदास शापवश राक्षस हो गये हैं। अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे”

于是他对妻子说:“你此举并不妥当。那位国王确已受诅咒;因此他必定会杀死那位婆罗门。”

Verse 34

अहल्योवाच अजानन्त्या नियुक्त: स भगवन्‌ ब्राह्मणो मया | भवत्प्रसादान्न भयं किंचित्‌ तस्य भविष्यति,अहल्या बोली--भगवन्‌! मैं इस बातको नहीं जानती थी, इसीलिये उस ब्राह्मणको ऐसा काम सौंप दिया। मुझे विश्वास है कि आपकी कृपासे उसे वहाँ कोई भय नहीं प्राप्त होगा

阿诃利耶说道:“尊者,我并不知情,才将此事托付给那位婆罗门。我深信凭借您的恩佑,他在那儿不会遭遇任何恐惧与祸患。”

Verse 35

इत्युक्त: प्राह तां पत्नीमेवमस्त्विति गौतम: । उत्तड़को5पि बने शून्ये राजानं तं॑ ददर्श ह

毗湿摩耶那说道:被如此问及,乔多摩对妻子答道:“就这样吧。”而优陀迦亦在一片荒寂的森林中,恰巧见到了那位国王。

Verse 56

यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा--'अच्छा, ऐसा ही हो।” उधर उत्तंक निर्जन वनमें जाकर राजा सौदाससे मिले ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तड़कोपाख्याने कुण्डलाहरणे षट्पञ्चाशत्तमो5ध्याय:

听罢此言,乔多摩对妻子说:“好,就依你所言。”与此同时,优陀迦走入寂寥的森林,在那里遇见了娑乌达萨王。至此,《圣摩诃婆罗多》阿湿婆梅陀篇、阿努吉塔分部、优陀迦故事中“夺取耳环”一节,第五十六章终。

Verse 73

उत्तड़क: काष्ठ भारं च महान्तं समुपानयत्‌ । किंतु वे गुरुवत्सल महर्षि यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया। राजेन्द्र! एक दिन उत्तंक मुनि लकड़ियाँ लानेके लिये वनमें गये और वहाँसे काठका बहुत बड़ा बोझ उठा लाये

毗湿摩耶那说道:优陀迦搬来了一大捆柴薪。然而那位圣仙——如师长般怜爱弟子——却未察觉我已至老境。噢,诸王之最!有一日,苦行者优陀迦入林采薪,归来时肩负着极其沉重的一大担木柴。

Verse 96

तत: काष्ठै: सह तदा पपात धरणीतले । शत्रुदमन नरेश! बोझ भारी होनेके कारण वे बहुत थक गये। उनका शरीर लकड़ियोंके भारसे दब गया था। वे भूखसे पीड़ित हो रहे थे। जब आश्रमपर आकर उस बोझको वे जमीनपर गिराने लगे, उस समय चाँदीके तारकी भाँति सफेद रंगकी उनकी जटा लकड़ीमें चिपक गयी थी, जो उन लकड़ियोंके साथ ही जमीनपर गिर पड़ी

毗湿摩耶那说道:于是他连同那捆柴薪一并倒在地上。噢,降伏仇敌的国王啊!因负荷沉重,他已疲惫至极;身躯被木柴的重量压迫,饥饿又折磨着他。及至回到道场,正要卸下重担时,他那如银丝般雪白的结发却缠挂在木柴上,便也随着木柴一同坠落尘土。

Verse 106

दृष्टवा तां ववसो5वस्थां रुरोदार्तस्वरस्तदा । भारत! भारसे तो वे पिस ही गये थे, भूखने भी उन्हें व्याकुल कर दिया था। अतः अपनी उस अवस्थाको देखकर वे उस समय आर्त स्वरसे रोने लगे

毗湿摩耶那说道:见到那般凄惨的境况,他便以哀切之声哭泣起来。噢,婆罗多的后裔啊!他被重担磨损,饥饿亦使他烦乱;因此,当他看见自己这般模样时,便在那一刻痛哭呼号。

Frequently Asked Questions

A conflict of obligations: Saudāsa asserts a fixed feeding-time duty, while Uttaṅka must fulfill a guru-directed mission; dharma is resolved through a negotiated, truth-bound samaya rather than coercion.

Dharma operates as disciplined reliability: truthfulness, explicit agreements, and vigilance in handling entrusted valuables are portrayed as stabilizing virtues in high-risk contexts.

No explicit phalaśruti appears; the implicit meta-lesson is that ethical success depends on apramāda (non-negligence) and satya in both speech and custodial action, aligning personal conduct with broader social order.